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June 2008
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गीत भी कविता की अनेक विधाओं में से एक विधा है। इस विधा में व्यक्त हुई कविता गेय होती है। इसलिए गीत की पहचान उसकी गेयता में निहित होती है। इसलिए गीत तभी गीत है जब वह गेय हो। इसलिए जो कविता गेय नहीं है वह गीत नहीं है। कविता के गेय होने का मतलब है कि उसमें गान के तत्त्व हैं और वह गायी जा सकती है।

गान के वह तत्त्व, जो कविता को गेयता प्रदान करते हैं, वह उसकी लय में प्रवाहित रहते हैं और लय में प्रवाहित रहना ही उनका अचूक धर्म और आचरण है। इसलिए बिना गान के तत्वों की लय की कविता गीत नहीं हो सकती। गान के वह तत्व-लय में प्रवाहित वह तत्त्व-गीत में सन्नद्व शब्दों की व्यवस्था कायम किये रहते हैं। वह व्यवस्था स्वर-मुखर व्यवस्था होती है। उस स्वर-मुखर व्यवस्था में व्यंजनों के उच्चारणों के रूप (आकार) प्रतिष्ठित रहते हैं।

उच्चारणों के इन्हीं रुपों की संहति लय का नाम पाती है। उस संहति में आदमी की साँस की एक निश्चित लम्बान-चौड़ान और ऊँचान-नीचान होती है। उस संहति में सन्नद्ध शब्दों के अक्षर-अक्षर के बीच का अन्तराल ह्रस्व और दीर्घ स्वरों से भरा रहता है और इसी प्रकार शब्द-शब्द के बीच का अन्तराल भी वैसे ही स्वरों के भराव से भरा रहता है। यदि स्वरों का भराव न हो तो अक्षर-अक्षर के बीच की दूरी तय करना कठिन होगा। ऐसे भराव के अभाव में शब्द-शब्द के बीच की दूरी भी तय करना कठिन होगा। इसलिए गेयता और कुछ नहीं, गीत की गतिमयता है।

गीत की यह गतिमयता जब स्वरों के भराव से एक सुनियोजित क्रम-बद्वता पा लेती हैं तब संगीतात्मक हो जाती है। संगीतात्मक हो जाने का मतलब है कि गीत को उसका सुनियोजित प्रवाह किया जाता है और वह गाया जा सकता है। कोई भी कभी उसे गाये तो उसे उसी प्रवाह से गाना होगा। उस प्रवाह की दिशा निर्धारित दिशा होती है।

निर्धारित दिशा से उच्चारित होकर ही गीत ग्रहणीय होता है और ग्रहण करने वाले पर अपना प्रभाव डालता है। लेकिन गीत मात्र-संगीत की अभिव्यक्ति या इकाई नहीं होता। जो गीत मात्र-संगीत की अभिव्यक्ति या इकाई होता है वह काव्य का गीत नहीं होता। वह तो मात्र ध्वनियों का नियोजित प्रवाह होता है। काव्य के गीत और संगीत के गीत का यह स्पष्ट अन्तर कभी भी अवहेलित करने योग्य नहीं है।

काव्य के गीत में कथ्य का होना अनिवार्य है। यह भी अनिवार्य है कि वह कथ्य शब्द और अर्थ की संश्लिष्ट और संयुक्त इकाई होकर दूसरों के लिए अभिव्यक्तिशील हो जाय। संगीतात्मकता काव्य के गीत की लय को अधिक स्वर-मुखर बनाती है और अपने सूक्ष्म अमूर्तन से कथ्य को अधिक स्पंदनशील कर देती है। यह नहीं, कथ्य को कविता के तत्त्वों के अलावा भी संगीत का एक और आयाम सुलभ हो जाता है।

उस आयाम से कविता का कथ्य गीत के रूप में ढल जाता है। ऐसे ढलने में-गीत का रूप पाने में-कविता में आकाश तत्त्व अधिक आ जाता है और इस तत्त्व के समाहित होने से वह, साधारण कविता से कहीं अधिक मात्रा में ध्वनिपरक होकर दूर-दूर तक देश-काल और मानव-मस्तिष्क में व्याप्त हो जाती है और अपना चेतन और अचेतन प्रभाव दीर्घकाल तक डाले रहती है। निश्चय ही गीत की गतिमयता का गेयता का संगीतमयता का यह तत्व गीत के कथ्य को व्यंजित करने वाले शब्दों के संघटन से निरुपित और निबद्ध होता है।

गीत के कथ्य को व्यंजित करने वाले शब्द भी उसकी गतिमयता-गेयता-संगीतमयता के तत्व से संघबद्व होने के लिए विवश होते हैं और समर्पित होते हैं और तब कहीं वह संघटन का कृतिरूप पाते हैं। मतलब यह कि गीत का कथ्य तत्त्व और गेय तत्त्व एक-दूसरे के नियामक और निर्धारक होते हैं। उनमें एक-दूसरे के प्रति प्रगाढ़ आत्मीयता होती है।

एक के बिना दूसरा जी नहीं सकता, पूरा विकास नहीं पा सकता। एक का पर्यवसान दूसरे का पर्यवसान होता है। इसलिए गीत के गेय-तत्त्व की, गीत से अलग, उसके कथ्य से अलग, व्याख्या करना मूलभूत भूल होगी। वैसे ही गीत के कथ्य-तत्व की, गीत से अलग, उसकी गेयता से अलग, व्याख्या करना मूलभूत भूल होगी। उन दोनों तत्वों का आकलन उनके संयुक्त और संपुष्ट रूप में ही करना होगा। गीत अपने जिस रूप और अर्थ में आज गीत स्वीकार किया जाता है अपने उस रूप औऱ अर्थ में वह पहले स्वीकार नहीं किया जाता था।

कारण यह था कि पहले कभी वह सम्भावनाएँ उत्पन्न नहीं हुई थीं जो सम्भावनाएँ आज उत्पन्न हो चुकी हैं और गीत को अपने अनुरूप गढ़ रही हैं। गीत भी अपने रूप और अर्थ के लिए उतना ही परिवेश पर निर्भर होता है जितना आदमी और आदमी के कर्म और भाव और विचार।

इतिहास की युगीन प्रवृत्तियाँ आदमी के युग-बोध को और उसकी कला-क्षमता को अधिक-से-अधिक प्रभावित करती हैं। गीतकार का व्यक्तित्व अपने युग के इतिहास की सीमाओं में बनता है। यदि गीतकार सशक्त और समर्थ हुआ तो उसका व्यक्तित्व भी अपने युग के इतिहास को बनाता है। वैसे, साधारणतया, वस्तु-स्थिति यही रहती है कि गीतकार अपने युग से प्रभावित रहा करता है और जो गीत वह देता है अपने युगबोध के अनुरूप ही देता है।

गीत के कथ्य और शिल्प दोनों ही युगबोध को ही रुपायित किये रहते हैं। पहले, यानी बहुत पहले, हिन्दी में कविता ही गायी जाती थी। वह कविता, चाहे मात्रिक हो या वर्णिक, इसका कोई असर उसके गाये जाने में नहीं पड़ता था। उसे संगीतज्ञ गाते थे। साधारणजन भी उसे अपनी क्षमता के अनुसार गाने की तरह गुनगुना लेते थे। वाद्ययंत्रों के साथ भी वह गायी जाती थी।

तब इस बात का भी ध्यान नहीं रक्खा जाता था कि गेय कविता को वर्णना-त्मक या तथ्यपरक न होना चाहिए बल्कि उसे आन्तरिक मनोवेगों की अभिव्यक्ति करना चाहिए। गायक का कंठ उन कविताओं को अपने संगीत से बाँध लेता था। वह ताल और तान से निबद्ध होकर गेयता का तत्त्व पा लेती थी। जब वह गायी नहीं जाती थी तब वह मात्र छंद रहती थी। कवित्त और सवैये भी बड़ी खूबी से संगीतपरकता पा लिया करते थे। तब छंदों से अलग गीत का अपना निजी अस्तित्व न था। यह भी होता था कि संगीत की रागिनियों में-रागों में कुछेक कुशल गायक कुछ कथ्य समाहित कर लेते थे और उन्हें ही संगीत की कृति के रूप में उनके अनुयायी शिष्य गा-बजा लेते थे।

तब भी लोक गीत थे। परन्तु वह काव्य के अन्तर्गत नहीं आते थे। काव्य की मान्यताएँ उनके प्रतिकूल थीं। अतएव वह लोक गीत जनसाधारण के दैनिक जीवन के विशेष अवसरों से जुड़ कर कंठ-कंठ से निकलते रहे और लोकमानस का मनोरंजन करते रहे। उन्हें तब तक साहित्यिक प्रतिष्ठा नहीं मिली थी। कविगण काव्य के सिद्धान्तों के आधार पर ही कविताओं का सृजन करते रहे। वह लोग लोक धुनें लेकर कविता की रचना करने में संलग्न नहीं हुए। वह कविताएँ देवी-देवताओं से सम्बन्धित हों या निराकार या साकार ब्रह्म से हों अथवा प्रेमी ईश्वर और प्रेयसी आत्मा से हों सब-की-सब काव्य की मूल मान्यताओं के मानदण्ड पर ही आधारित होती थीं।

"आल्हा" भी ढोलक और मृदंग के साथ गाँव-गाँव में गाया जाता था। वीर रस के निरूपण में छंद-के-छंद शब्दों की ध्वनियों से झनझना उठते थे। तेग-तलवार की चाल और चमक बिजली को भी मात करने में सक्षम होती थी। सेनाओं की उमड़-घुमड़ को और उनके वेग और बल को घनघोर बरसात के बादलों की घटा का घमंड भी नहीं लजा सकता था। वीर योद्धाओं की मूर्तियाँ ऐसी गढ़ी जाती थीं कि स्वयं वीर की मूर्ति तक तुच्छ जान पड़ने लगती थी।

युद्ध-स्थल के वर्णनों में भी अपरिमित काव्य-कौशल का परिचय दिया जाता था। वीर रस के कथ्य में यही सब व्यंजित होता था। उसके कथ्य के छंदों को चारण कवि और संगीतज्ञ गा-बजा कर गीत-जैसा अस्तित्व दे देते थे। रसराज श्रृंगार को प्रतिष्ठित किये छंद भी अपने कथ्य में अनेकानेक नायक-नायिकाओं की मुद्राओं को ही समाहित किये रहते थे। नायक लोभी, लालची, रूपासक्त, वासना-विलास -भोगी होते थे।

नायिकाएँ काम-कला की सार्थकता सिद्ध करने में अपने सम्पूर्ण आंगिक, वाचिक और मानसिक अस्तित्व का खुला कामुक प्रदर्शन करती थीं। छंद-के-छंद उनके देह-सौन्दर्य की यष्टि बन जाते थे। प्रकृति उनके रमण करने के लिए ही उद्दीपित दिखायी जाती थी। यह छंद भी बड़े चाव से सुमधुर कंठों से राजदरबारों में गाये-बजाये जाते थे।

इन छंदों के अतिरिक्त भी सूर, तुलसी, मीराँ और कबीर के पद भी गाये-बजाये जाते थे। वह सब अब भी लोक जीवन में, गाँव-गाँव में, मधुर स्वर से गूँजते पाये जाते हैं। इन पदों को ही आज के गीत का पूर्वज कहना न्यायसंगत होगा। वे ही तब गेय तत्वों को पाकर हवा में तैरते पाये जाते थे और वे ही नर-नारी (दोनों) के कंठों से निकल कर मन की व्यथा-मन का अनुराग-मन की दीनता-आत्मसमर्पण-आराध्य के प्रति आराधना-आदि सूक्ष्म मनो-भावनाएँ व्यक्त कर रहे थे। वे भक्त को भगवान् से जोड़ते थे। वे दीन-हीन को जीने की आस्था देते थे। राम, रहीम और कृष्ण उनमें ही निरूपित हो-कर जन-मानस के ह्रदयेश्वर बन गये। उनकी लीलाओं से वलयित वे पद केवल गेय होकर ही देश-काल में गूँजते रहे।

पद वास्तव में, उस युग के गीत हैं। गेयता में उनकी बराबरी छंदों में लिखी और गायी गयी कविताएँ नहीं कर सकीं-नहीं कर सकीं। काव्य की पारम्परिक रुढ़ियाँ पदों में भी आयीं पर उस सीमा तक नहीं जिस सीमा तक वे और कविताओं में आयीं। पद फिर भी सहजता, स्वाभाविकता और निश्छलता से छलकते रहे। इसीलिए वे जनता के गले लगे रहे और आज भी गेय बने गुनगुनाये जाते हैं। गेय पद अगेय छंद-बद्ध कविताओं से कोई बातों में भिन्न और विशिष्ट होते थे। गेय पदों की बुनावट अन्य कविताओं की बुनावट से गझिन कम और आत्मपरक अधिक होती थी। गझिन कम की बुनावट के पद साधारणतया आदमी की सहज स्वाभाविक प्रवृत्तियों के पद होते थे। उनके बनाने वाले काव्य के सिद्धान्तों के आचार्य नहीं होते थे।

पदों के रचयिता जीवन भोगते थे और अपने भोगे हुए जीवन को जीवन की वाणी में व्यक्ति करते थे। इसके विपरीत काव्य की रीतियों के अनुगामी कवि जीवन को उन रीतियों के सन्दर्भ में देखते, सुनते, समझते और पकड़ते थे और उन्हीं के सन्दर्भ में उसे विशिष्ट बना कर कविता का रूप देते थे। इस वजह से गेय पदों में जीवन की झाँकी कुछ और ही होती थी और अगेय छंद-बद्ध कविताओं में कुछ और ही होती थी।

काव्य की रीतियाँ, काव्य के सिद्धान्त, काव्य के अलंकरण, काव्य के संस्कार-सब कुछ आदमी की सहज वृत्तियों की प्राकृत स्थिति में मूलभूत परिवर्तन कर देते थे। परिणाम यह होता था कि आदमी की सहज वृत्तियाँ व्यक्त होकर आदमी की सहज बोधगम्यता से दूर चली जाती थीं और विशिष्ट व्यक्तियों की सम्प्रेषणीयता पा लेती थीं। तभी अगेय छंद-बद्ध कविताओं की सम्प्रेषणीयता गुणज्ञ सामाजिकों की रुचि को तुष्ट करती थी। पदों की सम्प्रेषणीयता जन-साधारण की रुचि को पुष्ट करती थी।

जब राज-दरबार में काव्य-गोष्ठी होती थी तब वाणी का वैभव-विलास राजा की राजकीय मनोवृत्तियों की पुष्टि के लिये होता था। उस राज-दरवार का सम्पर्क जनता के जीवन से नहीं होता था। अतएव पदों का वाचन और पाठन राज-दरबारों में नहीं होता था। अतएव पदों के नायकों को राज-दरबार का कवि नहीं बनाया जाता था। जनता ही-राज-दरवर से बाहर-उन पदों के गायकों को आश्रय देती थी और उसी में रह कर उसी के सुख-दु:ख में वह डूबे रहते थे। हाँ, मंदिरों के प्रांगणों में भी उन्हें अपने पद गाने का सुअवसर सुलभ होता था।

जब पद-गायक किसी देवस्थान से सम्बद्ध हो जाता था तब उसके पदों में धर्म-विशेष की छाप भी पड़ने लगती थी और तब ऐसी स्थित में उसके पदों से मानवीय प्राकृत सहजता विलुप्त होने लगती थी। चाहे राज-दरवार हो-चाहे देवस्थान-वहाँ पहुँच कर कवि सहज स्वाभाविक वृत्तियों का कवि नहीं रह जाता था। इसीलिए गेय पदों में भी बहुत-से ऐसे पद मिलेंगे जो धर्म के संस्कारों से संस्कृत हो चुके हैं और अपने मूल-गेय स्वरूप से दूर पहुँच चुके हैं।

धार्मिकता पदों की गेयता को धार्मिक संस्थानों की अपनी मान्यताओं से दूसरे प्रकार की गेयता में बदलती देखी गयी है। उस बदली गेयता में जो मानवीय प्रवृत्तियाँ व्यंजित होती देखी गयी हैं वह उदात्त भले ही रही हों-दैवी भले हों-मानव-मानव के जागतिक सम्बन्धों की व्यंजक होती कदापि नहीं देखी गयीं। उस गेयता से मानव से मानव जुड़ता नहीं देखा गया। उस गेयता का प्रमुख लक्ष्य रहा है कि वह धर्म की ध्वनि से, मानव को मानव की हैसियत से नहीं, बल्कि एक धार्मिक को दूसरे धार्मिक से जोड़ती रहे। यही उसने किया भी। उस किये का परिणाम यह हुआ कि गेय पदों के विभिन्न धार्मिक गेय स्वरूप हुए।

कभी-कभी यह भी हुआ कि भिन्न धर्मावलम्बियों के गेय पद एक-दूसरों से टकराये और त्याज्य भी समझे गये। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि आदमी जीवन जीने के बजाय धर्म जीने लगा था। ऐसी दशा में पदों के सहज स्वर का धार्मिक स्वर हो जाना स्वाभाविक था। कुछ हद तक तो ऐसे होने की विवशता थी। उस विवशता से इनकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन जब धार्मिक प्रवृत्तियाँ रूढ़ हो जाती हैं और उनकी रूढ़िवादिता सहज मानव के मन को दबोच लेती हैं। और उस पर भरपूर हावी हो जाती हैं तब इस रूढ़िवादिता से पदों की गेयता में भी भारी अन्तर आ जाता है और यह अन्तर इतना स्पष्ट हो जाता है कि गेय पद भी अगेय कविता की तरह के हो जाते हैं। वह गाये भले ही जायें लेकिन उनकी गेयता सहज स्वाभाविक मानवीय गेयता नहीं होती। काव्य का इतिहास इसे प्रमाणित कर चुका है।

धार्मिक मानव की मानवीयता सहज मानव की मानवीयता से अलग रूप और प्रकार की होती देखी गयी है। तभी तो जो सहज मानवीयता मीराँ और सूर के पदों में गेय होकर व्यक्त हुई है वह अधिक बोधगम्य, सम्प्रेषणीय और संवेदनशील है बजाय उस मानवीयता के जो अन्य धर्मानुयायी कवियों ने अपने धार्मिक पदों में गेय बना कर प्रस्तुत की थी।

मतलब यह कि पदों की गेयता वास्तव में सहज मानव के जागतिक सम्बन्धों की गेयता होती है जो आगे चल कर आज के युग के गीत की गेयता में परिणत हो जाती है।

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(टीडीआईएल के हिन्दी पाठ कार्पोरा से साभार)

ichha purti 

राजकुमार चंद्रचूड़, राजकुमार कपिलदेव तथा उनका छोटा भैया, तीनों एक के पीछे एक मंच पर प्रवेश करते है। ये हमारे नाटक के मुख्य पात्र हैं। ये हैं सबसे बड़े राजकुमार चंद्रचूड़। ये है उनके छोटे भाई राजकुमार कपिलदेव और ये हैं इन दोनों के छोटे भैया। राजकुमार चंद्रचूड़ और राजकुमार कपिलदेव आज मछलियों का शिकार करने जा रहे हैं और इस बात से कुछ खिन्न है कि उनका छोटा भाई भी उनके साथ आ गया है, जबकि वे दोनों उसे मना कर चुके हैं कि तुम हमारे साथ नहीं चलो। तुम छोटे हो और सुनहरी नदी में गिर जाओगे। मगर छोटे भैया इनकी बात अनसुनी कर इनके साथ आ ही गये हैं। छोटी बहिन राजकुमारी कामनापूर्ति भी राजकुमारों के साथ आना चाहती थी मगर वो कपड़े बदल ही रही थी कि राजकुमार राजमहल से चले आये।

चंद्रचूड़ : (कुछ खीज के साथ) छोटे भैया, बहुत छोटे हो। इतने छोटे बच्चे मछली नहीं पकड़ सकते।

छोटे भैया : मगर ये तो बतलाइये पहले कि सुनहरी नदी है कहाँ?

कपिलदेव : यहीं तो है। हम उसी के किनारे तो खड़े हैं।

छोटे भैया : (इधर-उधर देखकर, आश्चर्य से) यही है सुनहरी नदी? मुझे तो दिखलाई नहीं दे रही है।

चंद्रचूड़ : (खिन्नभाव से) नदी इसलिए दिखलाई नहीं दे रही है क्योंकि सूत्रधार मंच पर नदी लाना भूल गये हैं। (ताली बजाकर)

कपिलदेव : धीरे बोलो कामनापूर्ति, तुम्हारी आवाज से मछलियाँ डर कर भाग जायेंगी।

चंद्रचूड़ : मगर तुम यहाँ क्या करने आई हो?

कामनापूर्ति : माताजी ने मुझसे कहा कि आप लोग वहाँ भूखे होगे। उन्होंने आप लोगों का खाना लेकर मुझे यहाँ भेजा है। लेकिन अगर आप चाहते हैं कि मैं यहाँ से चली जाऊँ, तो मैं चली जाती हूँ। (टोकरी उठाकर वापस चलने को होती है।)

चंद्रचूड़ : तुम खाना लाई हो तो फिर रुक ही जाओ। थक गई होगी, थोड़ी देर आराम कर लो। हम खाना खा लें। बेचारी थक गई होगी।

कपिलदेव : (टोकरी लेने के लिए आगे बढ़ता हुआ) मैं तो खुद ही सोच रहा था। (टोकरी लेकर नीचे रखता हुआ) खाने में से बड़ी महक आ रही है। बड़ा स्वादिष्ट खाना जान पड़ता है।

छोटे भैया : (टोकरी के निकट आकर, उसे खोल कर देखते हुए) तो फिर मैं देख ही लूँ, माताजी ने क्या-क्या भेजा है? ....ओ हो! बड़े माल हैं!....गोभी के परांवठे, मटर का पलाव, पापड़, अचार, चटनी, मरब्बे... भाई साहब जल्दी कीजिए, मेरे मुँह में पानी आ रहा है।

चंद्रचूड़ : (आकर टोकरी के निकट बैठते हुए) हाँ, अब देर किस बात की है? आओ कपिलदेव, खाना खाओ। किस सोच में पड़े हो?

कपिलदेव : आ रहा हूँ भाई साहब। टोकरी के निकट बैठ जाता है। तीनों भाई खाना खाने का अभिनय करते हैं। सूत्रधार आगे बढ़ जाता है और दर्शकों को संबोधित कर कहता है।

सूत्रधार : किसी को खाना खाते हुए देखना अच्छा नहीं। खाने वालों को तो संकोच होता ही है। देखने वालों के मुँह में भी पानी आता है। जब तक ये तीनों राजकुमार खाना खाते हैं, मैं आप लोगों को बतला दूँ कि नाटक में आगे क्या होने वाला है। बहुत जल्दी ही एक बूढ़ी औरत यहाँ आयेगी। देखने में वह भिखारिन लगती है। अरे! ये तो खाना खत्म कर चुके हैं। (तीनों राजकुमार टोकरी एक ओर सरकाकर उठ खड़े होते है) अच्छा मैं चलकर घंटी बजा दूँ ताकि बूढी औरत मंच पर आ जाये और नाटक आगे चले। सूत्रधार आगे बढ़ घंटी बजा देता है। लाठी टेकती हुई एक बूढी औरत फटे-पुराने कपड़ों मे मंच पर धीरे-धीरे प्रवेश करती है। उसने एक लंबा-सा चोगा पहन रखा है जो बहुत पुराना और फटा है। उसमें कई पैबंद भी लगे हुए हैं। वह इधर-उधर देखती है और उस जगह आ जाती है जहाँ पर तीनों राजकुमार खड़े हैं।

बूढ़ी औरत : मैं बहुत थक गयी हूँ... मैं बहुत ज्यादा थक गयी हूँ।

कामनापूर्ति : बूढी-अम्माँ, प्रणाम!

बूढी औरत : (प्रसन्नता के साथ) प्रणाम बेटी ! बड़ी हो और बड़ी बनो क्या ये तुम्हारे भाई हैं?

 

कामनापूर्ति : हाँ बूढ़ी अम्मा (हाथ से संकेत करती हुई) ये मेरे सबसे बड़े भाई हैं.....चंद्रचूड़।

चंद्रचूड़ : (घमंड के साथ) राजकुमार चंद्रचूड़।

कामनापुर्ति : और ये हैं मझले भैया कपिलदेव, और ये हमारा सबसे छोटा भैया। इसे हम छोटे भैया ही कहते हैं।

बूढ़ी औरत : तुम लोगों से मिलकर बड़ी खुशी हुई। (टोकरी की ओर देखती हुई) अच्छा, इस टोकरी में क्या रखा है? इसमें खाने-पीने की चीजों की महक आ रही है। क्या इसमें कुछ खाने को है?....मुझे भूख लग रही है।

चंद्रचूड़ : इसमें जो कुछ भी था, वह सब खत्म हो गया है। अब इसमें कुछ भी नहीं बचा है।

कामनापूर्ति : मेरे ख्याल से इसमें कुछ गुझियाँ भी रखी हैं। माताजी ने वे खासतौर से तुम लोगो के लिए बनाई हैं। तुम लोगों ने शायद उन्हें खाया नहीं है।

चंद्रचूड़ :(फुर्ती से) हम थोड़ी देर में उन्हें भी खा लेंगे। वो हैं कितनी?

कामनापूर्ति : लेकिन भाई साहब, हम दो-एक गुझिया तो बड़ी अम्मा को दे ही सकते हैं। वो बेचारी बहुत भूखी है न!

चंद्रचूड़ : कैसी बातें कर रही हो कामनापूर्ति? तुम चाहती हो कि हम लोग भूखे रहें?

कामनापूर्ति : (दृढ़ता के साथ) ठीक है आप लोग अपने हिस्से की गुझिया खाइये। मैं अपने हिस्से की गुझियाँ बड़ी अम्माँ को देती हूँ। टोकरी में से दो गुझियाँ निकाल कर बूढ़ी अम्माँ को देती है।

बूढ़ी औरत : (खुशी के साथ गुझियाँ लेती है। बड़े चाव से उन्हें खाती हुई) जुग-जुग जियो बिटिया। सुखी रहो। भगवान तुम्हें बहुत सारा दे। तुम अच्छी लड़की को। गुझियाँ सचमुच बहुत अच्छी हैं। बहुत ही स्वादिष्ट हैं। इन्हें खाते ही मेरी सारी भूख मिट गयी। मैं कई दिन से भूखी थी। राजकुमार चंद्रचूड़ को अपनी बहिन का यह भला काम पसंद नहीं आया। वह क्रोध और कुछ विरक्ति के साथ अपना मुँह दूसरी ओर कर लेता है। काँटा हाथ में ले नदी में डाल कर मछली पकड़ने का अभिनय करने लगता है। उसकी देखा-देख कपिलदेव और छोटे भैया भी अपने काँटे नदी में डाल मछली पकड़ने का अभिनय करते हैं।

बूढी औरत : बहुत दिनों के बाद इतनी अच्छी तरह कुछ खाया है। मैं तुम्हारे उपकार को कभी नहीं भूल सकूँगी, बेटी।

कामनापूर्ति : आप कैसी बातें कर रही हैं बूढ़ी अम्मा। इसमें उपकार की क्या बात है

चंद्रचूड़ : (कुछ क्रोध के साथ) तुम लोग अपनी बातें बंद नहीं कर सकती कामनापूर्ति? तुम देख नहीं रही हो, हम लोग मछली पकड़ रहे हैं।

बूढ़ी औरत : (राजकुमारों को अचरज से देख, कामनापूर्ति से) क्या ये लोग इस नदी में मछलियाँ पकड़ रहे हैं?

कामनापूर्ति : हाँ बूढ़ी अम्मा! बूढ़ी औरत :(जोर से हँसती है) पगले कहीं के। (फिर हँसती है।)

छोटी भैया : बूढ़ी अम्मा, तुम इस तरह क्यों हँस रही हो?

बूढ़ी औरत : (हँसते हुए) मेरे बच्चे, ये मछलियाँ नहीं हैं। इस नदी में मछलियाँ हो ही नहीं सकतीं... ये मामूली नदी नहीं है। ये सुनहरी नदी है... इच्छाओं की नदी... कामनाओं की नदी...

छोटे भैया: बूढ़ी अम्माँ, हमारी समझ में तुम्हारी बात नहीं आ रही है।

बूढ़ी औरत: मेरी बात तो सीधी सादी है मेरे बच्चो। मेरा मतलब है कि तुम्हें इस नदी में मछलियाँ पकड़ने की कोशिश करने की बजाय, अपनी इच्छायें, अपनी कामनायें पूरी करने की कोशिश करनी चाहिए।

चारों बच्चे: (एक स्वर में) अपनी इच्छायें पूरी करने की कोशिश करनी चाहिए।

सूत्रधार!.... नदी... जल्दी लाइये... सूत्रधार जल्दी से अलमारी की ओर बढ़ता है। अलमारी खोल उसमें से दो बड़ी-बड़ी पट्टियाँ निकालता है। दोनों पट्टियाँ लिपटी हुई हैं। मोटे कपड़े की पट्टी गहरे नीले रंग की है और पतले कपड़े की पट्टी सुनहरे रंग की। शीघ्रता के साथ वह पहले नीले रंग की पट्टी मंच पर बिछाता है और उसके ऊपर सुनहरे रंग की पतली पट्टी।

कपिलदेव : लो छोटे भैया, नदी को अच्छी तरह देख लो। अब ध्यान रखना, कहीं तुम नदी में डुबकी न लगा जाओ।

छोटे भैया : नहीं मंझले भैया, मै इतना टुइयाँ थोड़े ही हूँ कि नदी में गिर पडूँ....(नदी की ओर देखते हुए) अच्छा, ये तो बताइये, नदी में मछलियाँ कहाँ है? मुझे तो मछलियाँ दिखाई नहीं दे रही हैं।

कपिलदेव : छोटे भैया, नदी का पानी बहुत गहरा है इसलिए मछलियाँ दिखाई नहीं पड़ रही हैं।

चंद्रचूड़ : और मछलियाँ पानी में बहुत नीचे हैं इसलिए तुम्हें दिखाई नहीं पड़ रही हैं।

छोटे भैया : (नदी की ओर देख, गंभीरता से सोचते हुए) मेरा ख्याल है कि सुत्रधार नदी में मछली डालना भूल गया है।

सूत्रधार : छोटा भैया ठीक कहता है। मैं अभी नदी में मछलियाँ डालता हूं।

 

(सूत्रधार जल्दी से अलमारी में से रबर की कुछ रंगबिरंगी मछलियाँ निकालता है और नीली व सुनहरी पट्टी पर इधर-उधर डाल देता है।)

छोटे भैया : खुशी से तालियाँ बजाते हुए हाँ, अब मुझे मछलियाँ दिखाई दे रही हैं। ये तो बहुत बड़ी-बड़ी हैं।

चंद्रचूड़ : (लापरवाही से) ये तुम्हारे लिए बड़ी हैं। अगर ये तुम्हारे काँटे में फँस भी जायें तुम इन्हें खींच कर बाहर नहीं निकाल सकते।

कपिलदेव : हाँ, तुम्हारा काँटा भी टूट जायेगा और मछली भी हाथ से निकल जायेगी।

छोटे भैया : आप लोग मुझे इतना टुइयाँ क्यों समझते हैं? मेरे हाथ में काँटा तो आने दीजिए, तब देखिये मैं कितनी बड़ी मछली पकड़ता हूँ। सूत्रधार तत्काल अलमारी से तीन बंसी और काँटे निकाल कर लाता है और तीनों भाइयों को दे देता है। वे काँटों में चुग्गे फँसा कर बंसी पानी में डालकर मछली पकड़ने का अभिनय करते हैं।

चंद्रचूड़ : (चीखते हुए) पकड़ ली। पकड़ी...। मुझे लगता है, बहुत ही बड़ी मछली है। (काँटा बाहर निकालता है। (वह बिल्कुल खाली है) धत् तेरे की!

कपिलदेव : आपने थोड़ी जल्दी कर दी भाईसाहब। इससे मछली निकल भागी!

चंद्रचूड़ :(काँटा पानी में डालते हुए) खैर, अब कहाँ जायेगी बच कर। अब तो उसे फँसना ही पड़ेगा।

सूत्रधार : (दर्शकों से) कितने अफसोस की बात है कि हमारे अभिनेताओं को मछली मारना भी नही आता। ये लोग इतने जोर से बोल रहे हैं। मछलियाँ जरुर इनसे डर कर भाग गयी होंगी।

छोटे भैया : (जम्हाई लेते हुए) मुझे तो मछलियाँ मारना एकसा लग रहा है जैसे हम सब मार रहे हों।

छोटे भैया : अब मैं थोड़ी देर आराम करुँगा। मगर सूत्रधार, मुझे तो भूख लग आई है।

चंद्रचूड़ : हाँ सूत्रधार, मुझे भी भूख महसूस होने लगी है। हमारे खाने का इंतजाम करो।

सूत्रधार : (जल्दी से सूची को ऊपर से नीचे तक देखकर) नहीं, निर्देशक साहब ने मेरी लिस्ट में आप लोगों का खाना नहीं लिखवाया था। इसलिए मैंने खाने का कोई प्रबंध नहीं किया।

 

कपिलदेव : अब क्या होगा? हमें तो भूख सताने लगी है। (सहसा पृष्ठभूमि से राजकुमारी कामनापूर्ति की आवाज आती है).... भाई साहब! भाई साहब!

चंद्रचूड़ : अरे, ये तो कामनापूर्ति की आवाज है। ये यहाँ कैसे आ गई?

कपिलदेव : मेरे ख्याल से ये हमारे पीछे-पीछे आ गई है।

राजकुमारी कामनापूर्ति बायीं ओर से मंच पर प्रवेश करती है। उसके हाथ में एक छोटी टोकरी है जिसे वह बड़ी कठिनाई से उठाये हुए है।

कामनापूर्ति : हूँ! तो आप लोग यहाँ हैं.....! मुझे पता था। बताइए, अब तक आपने कितनी मछलियाँ पकड़ी हैं?

बूढ़ी औरत : हाँ बच्ची, भाग्वान लोग अपने मन में इच्छायें लेकर उन्हें पुरी करने के लिए ही इस नदी पर आते हैं।

कामनापूर्ति : और क्या यहाँ उनकी इच्छायें पूरी हो जाती हैं? बूढ़ी औरत : हाँ, इच्छाओं को इसी तरह पकड़ना होता है जैसे मछलियों को। और जब एक बार वे पकड़ में आ जाती हैं तो फिर वे पूरी हो जाती हैं।

 

तीनों बच्चे : अच्छा! हम देखते हैं कि हमारी इंच्छा पूरी होती है या नहीं! तीनों अपनी-अपनी बंसी में चुग्गी लगाकर नदी में डालते हैं। फिर बाहर निकालते हैं। उन्में मछलियाँ फँसी हुई हैं।

बूढ़ी औरत : अब ये मछलियाँ ही बताएंगी कि तुम्हारी इच्छा पूरी होगी या नहीं।

कामनापूर्ति : अब मैं कोशिश करती हूँ। (वह बंसी नदी में डालती है। जैसे ही मछली फँसकर बाहर निकलती है कि बुढ़िया के फटे कपड़े उतर जाते हैं। वह कीमती चमचमाते कपड़े पहने खड़ी है।) अरे! मेरी इच्छा तो पूरी हो गई! सच मैंने यही चाहा था कि बूढी माँ की गरीबी दूर हो जाये।

बूढ़ी औरत : और इन तीनों की इच्छा इसलिए पूरी नहीं हुई क्योंकि सिर्फ अपने लिए माँगा था। प्यारे बच्चों, सदैव इस बात को याद रखो कि किसी चीज की इच्छा सिर्फ अपने लिए नहीं दूसरों के लिए भी करों। दुनिया में कुछ देकर ही तुम पा सकते हो। (रुककर) अच्छा! जरा बंसी दो मुझे! मैं भी अपनी इच्छा पूरी करुँ!

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(टीडीआईएल के हिन्दी पाठ कार्पोरा से साभार)

दुनिया भर की दमनकारी, अलोकतांत्रिक और तानाशाही सरकारों तथा संस्थानों के विरुद्ध संघर्ष करते लोगों को इंटरनेट के जरिए एक नया हथियार मिल गया है।

- बालेन्दु दाधीच

wikileaks

दुनिया भर की दमनकारी, अलोकतांत्रिक और तानाशाही सरकारों तथा संस्थानों के विरुद्ध संघर्ष करते लोगों को इंटरनेट के जरिए एक नया हथियार मिल गया है। इन सरकारों ने जिन गोपनीय सूचनाओं और रहस्यों को बड़े जतन से छिपाकर रखा था उन्हें कुछ वेबसाइटों के जरिए लीक किया जा रहा है। यानी करीब-करीब वही काम जो खोजी पत्रकार करते रहे हैं। लेकिन खोजी पत्रकारों और उनके संस्थानों का दमन अपेक्षाकृत आसान है, सूचनाओं की आजादी और पारदर्शिता में यकीन रखने वाले इंटरनेट योद्धाओं का मुंह बंद करना उतना सरल नहीं। आम आदमी के पक्ष में सूचना-युद्ध लड़ती इन वेबसाइटों को कौन, कहां से संचालित कर रहा है, उनमें गोपनीय आंकड़े प्रकाशित करने वाले लोग कौन हैं, यह स्वयं उनके अलावा कोई नहीं जानता। ऐसे में कोई त्रस्त सरकार उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई करे तो कैसे?

सन 2006 में लांच हुई विकीलीक्स.ऑर्ग ऐसी वेबसाइटों में अग्रणी है जिसने थाईलैंड और चीन ही नहीं, अमेरिका तक की सरकार की नींद हराम कर दी है। और सरकारों ही क्यों, अनेक धार्मिक संगठनों, नौकरशाहों और संस्थानों को समझ नहीं आ रहा कि लोहे के संदूकों में बरसों से दबे उनके राज इंटरनेट पर किसने फास कर दिए और अब वे करें तो क्या? विकीलीक्स की स्थापना करने वाले वे लोग हैं जो खुद सरकारी दमनचक्र और यातनाओं के शिकार हो चुके हैं, या फिर इस किस्म के दमन के धुर-विरोधी हैं। इसीलिए विश्व में कहीं भी होने वाली अलोकतांत्रिक और मानवाधिकार-विरोधी कार्रवाइयों के विरुद्ध उनके मन में गहरा आक्रोश है, उनसे पीड़ित हुए लोगों के प्रति सहानुभूति और जुड़ाव है। उनका सीधा सा लक्ष्य है- विश्व को शांतिपूर्ण तथा अन्याय-मुक्त बनाने के लिए सूचनाओं के हथियार का साहसिक और कुछ हद तक चालाकी भरा इस्तेमाल।

विकीलीक्स की स्थापना करने वाले कुछ तिब्बती शरणार्थियों, चीनी असंतुष्टों और थाई राजनैतिक कार्यकर्ताओं ने शायद ही कल्पना की हो कि दो साल के भीतर उनके पास दुनिया भर से आए करीब 12 लाख सरकारी-गैरसरकारी गोपनीय दस्तावेजों का भंडार होगा। हां, उन्हें इस काम में निहित जोखिमों का अंदाजा जरूर था और वे यह भी जानते थे कि अगर उनकी वेबसाइट चल निकली तो वह संसदों और अदालतों की बहसों का केंद्र बन जाएगी, विश्व की बड़ी से बड़ी ताकत भी गोपनीय सूचनाओं के मुक्त प्रकाशन को बर्दाश्त नहीं कर सकती। जल्दी ही विकीलीक्स के खिलाफ मुकदमों की झड़ी लग गई और एकाध बार तो उसे इंटरनेट से मिटा ही दिया गया। लेकिन दूसरों के संघर्षों को ताकत देती यह वेबसाइट अब तक हारी नहीं है। वह आघात सहती है और फिर खड़ी हो जाती है। वह खुद भी एक जीवंत विद्रोह की मिसाल बन रही है।

पिछले साल नवंबर में विकीलीक्स पर अमेरिका की कुख्यात गुआंतनामो जेल के अमानवीय हालात के बारे में एक आधिकारिक रिपोर्ट लीक की गई थी। इसने अमेरिकी प्रशासन और सैनिक तंत्र को हिला दिया जिन्होंने बाद में खिसियाने अंदाज में स्वीकार किया कि 238 पेजों की यह रिपोर्ट (जेल मैनुअल) असली है। इसमें गुआंतनामो जेल में कैदियों को लाने और रखने संबंधी खेदजनक परिस्थितियों से लेकर वहां हो रहे जिनेवा समझौते के खुले उल्लंघन तक का ब्यौरा था। अगस्त 2008 में इसी वेबसाइट ने केन्या के पूर्व शासक डेनियल अलाप मोई के परिवार वालों द्वारा किए गए एक अरब यूरो से अधिक के गबन संबंधी 110 पेज की एक गोपनीय जांच रिपोर्ट भी उजागर कर दी थी जिससे केन्या की राजनीति में भारी उथल-पुथल मची। ब्रिटेन में नार्दर्न रॉक नामक वित्तीय संस्थान के पतन के बाद वहां की अदालत ने अखबारों में उसके लीक हुए सेल्स प्रोस्पेक्टस के प्रकाशन पर रोक लगा दी थी। लेकिन विकीलीक्स ने यह प्रोस्पेक्टस प्रकाशित कर दिया और साथ ही साथ उसके प्रकाशन पर लगी रोक संबंधी आदेश भी।

अपने ग्राहकों संबंधी सूचनाओं को गोपनीय रखने वाले जूरिख के जूलियस बायर बैंक को भी विकीलीक्स ने जबरदस्त झटका दिया जब उसने वहां बेनामी खाते रखने वाले अनेक लोगों का ब्यौरा प्रकाशित कर दिया। उसने बताया कि किस तरह स्विस बैंकों में काला धन रखने वाले लोग विदेशी न्यासों में अपना धन छिपाकर रखते हैं। इन लोगों में पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर से संबंध रखने वाला एक व्यक्ति भी था जिसने एक गोपनीय न्यास में करीब दस करोड़ डालर की रकम छिपाई हुई थी। विकीलीक्स से उजागर हुई सूचनाओं के आधार पर जर्मनी में कई कर-अपवंचकों के यहां छापे मारे गए और स्विस बैंक विकीलीक्स को होस्ट करने वाली कंपनी के खिलाफ अदालत में चली गई। अमेरिकी न्यायाधीश जैफ्री व्हाइट ने वेबसाइट पर पाबंदी लगा दी और वह बंद हो गई। अलबत्ता, नागरिक अधिकार गुटों की तरफ से मचाए गए हो-हल्ले के बाद न्यायाधीश को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने प्रतिबंध के दो सप्ताह बाद ही इसे फिर शुरू किए जाने की अनुमति दे दी।

अमेरिकी अदालत की इस कार्रवाई के अलावा भी इस वेबसाइट को कई सरकारों के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है। चीन में तो कठोर सरकारी नियंत्रणों के कारण विकीलीक्स या उससे जुड़ी किसी भी अन्य वेबसाइट को देखना लगभग असंभव है और करीब-करीब यही स्थिति थाईलैंड की है जहां के विपक्षी कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में इस वेबसाइट पर सरकारी धतकरमों की पोल खोली है।

विकीलीक्स से पहले भी इंटरनेट पर गोपनीय सूचनाएं उजागर करने के प्रयास हो चुके हैं। न्यूयॉर्क का एक वास्तुकार जॉन यंग पिछले कुछ साल से अपनी वेबसाइट क्रिप्टोम.ऑर्ग पर इसी तरह के टॉप सीक्रेट दस्तावेज उपलब्ध कराता रहा है। लाइवलीक.कॉम नामक एक अन्य वेबसाइट ने भी कुछ दमदार रहस्योद्धाटन किए हैं। लेकिन विकीलीक्स ने बहुत जल्दी सबको पीछे छोड़ दिया और अब वह दुनिया में अपनी श्रेणी की सबसे बड़ी, सबसे सफल और सबसे कारगर वेबसाइट है। इसके नाम से यह भ्रम हो सकता है कि विकीलीक्स का इंटरनेट आधारित विश्वकोश विकीपीडिया से कोई संबंध होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। विकीपीडिया और इस वेबसाइट में नाम के अलावा सिर्फ एक ही समानता है कि दोनों बुनियादी रूप से एक ही टेक्नॉलॉजी (विकी) का इस्तेमाल करती हैं। ऐसी टेक्नॉलॉजी का, जो विश्व के किसी भी व्यक्ति को इन वेबसाइटों पर सूचनाएं दर्ज करने का अधिकार देती हैं। लेकिन विकीपीडिया पर मौजूद सूचनाओं को जहां कोई भी व्यक्ति संपादित कर सकता है, वहीं विकीलीक्स के मामले में ऐसा नहीं है। इस पर रखी सामग्री पूरी तरह एनक्रिप्टेड (कूट संकेतों में परिवर्तित कर रखी गई) है जिसे संपादित करना तो दूर, हैक करना भी लगभग असंभव है।

विकीलीक्स की लोकतांत्रिक प्रकृति के कारण वहां कोई भी व्यक्ति किसी भी किस्म का गोपनीय दस्तावेज भेजने के लिए स्वतंत्र है। ऐसे लोगों की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाती है और संभवत: यह उसकी सफलता का बड़ा कारण है। इसके संस्थापक यह भी मानते हैं उनके यहां उपलब्ध सौ फीसदी दस्तावेज प्रामाणिक ही हों, यह जरूरी नहीं है। इस संदर्भ में वे व्यक्तिगत विवेक का हवाला देते हुए कहते हैं कि जो दस्तावेज प्रामाणिक नहीं होंगे, वे स्वयं ही पाठकों द्वारा उपेक्षित कर दिए जाएंगे।

क्या गोपनीय सूचनाओं को लीक करना या उजागर करना नैतिक रूप से उचित है? इस सवाल पर विकीलीक्स से जुड़े लोगों का कहना है कि हां, निरंकुश सरकारों, दमनकारी संस्थानों और भ्रष्ट कंपनियों पर इस किस्म का दबाव डालना जरूरी है। जहां अन्याय और पराधीनता को कानूनी रूप दे दिया गया हो वहां इस तरह की 'नागरिक अवज्ञा' वाली कार्रवाई की जरूरत है। कुछ-कुछ गांधीजी वाली भावना लगती है!

(लेखक हिंदी पोर्टल प्रभासाक्षी.कॉम के संपादक हैं)।

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कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़

dil_se_final (2) (WinCE)

श्रीमती देवी नागरानी जी के अब तक दो ग़ज़ल संग्रह "ग़म में भीगी ख़ुशी" और "चराग़े-दिल" प्रकाशित हो चुके हैं। अपनी संवेदना और भाषा की काव्यात्मकता के कारण देवी जी संवेदनशील रचनाकार कही जा सकती हैं। देवी जी अपने इस नये ग़ज़ल- संग्रह में ग़ज़लों को कुछ इस अंदाज़ से कहती हैं कि पाठक पूरी तरह उन में डूब जाता है। विचारों के बिना भाव खोखले दिखाई देते हैं। इस संग्रह में भावों और विचारों का सुंदर सामंजस्य होने के कारण यह पुस्तक सारगर्भित बन गई है।
शाइर ज़िन्दगी की जटिलताओं के बीच अपने संघर्ष का इज़हार करने के लिए एक उपकरण ढूंढता है जो देवी जी की ग़ज़लों में अभिव्यक्त हुई है। देवी जी तकनीकी नज़ाकतों से भी भली भांति परिचित हैं। ज़िन्दगी अक्सर सीधी-सादी नहीं हुआ करती। उन्होंने लंबे संघर्षों के बीच अपनी राह बनाई हैः

जिसे लोग कहते हैं जिंदगी
वो तो इतना आसां सफ़र नहीं.

तवील जितना सफ़र ग़ज़ल का
कठिन है मंज़िल का पाना उतना.

नारी से जुड़े हुए गंभीर सवालों को उकेरने और समझाने के लिए उनके पारदर्शी प्रयास से ग़ज़लों के फलक का बहुत विस्तार हो गया है। फिर भी स्त्री-मन की तड़प, चुभन और अपने कष्टों से झूझना, समाज की रुग्ण मानसिकता आदि स्थितियों की परतें खोल कर रख देना तथा अपनी रचनाओं की अंतरानुभूति के साथ पाठकों को बहा ले जाती हैं:

कैसी दीमक लगी है रिश्तों की

रेज़े देवी है भाईचारों के.

नारी के जीवन की पीड़ा, संघर्ष और अस्तित्व की पहचान भी कराती हैं:

"ये है पहचान एक औरत की
माँ बाहन, बीवी, बेटी या देवी. "

ग़ज़ल कहने की अपनी अलग शैली के कारण देवी जी की ग़ज़लों की रंगत कुछ और
ही हो जाती है। अतीत का अटूट हिस्सा हो कर यादों के साथ पहाड़ जैसे वर्तमान
को भी देख सकते हैं:

कुछ न कुछ टूटके जुड़ता है यहाँ तो यारो
हमने टूटे हुए सपनों को बहुत ढोया है

इम्तिहाँ ज़ीस्त ने कितने ही लिए हैं देवी
उन सलीबों को जवानी ने बहुत ढोया है.
उनकी शब्दावली, कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़ देखिएः
मुहब्बत की ईंटें न होती अगरचे
तो रिश्तों की पुख़्ता इमारत न होती.

वो सोच अधूरी कैसे सजे
लफ़्ज़ों का लिबास ओढ़े न कभी.

आज की शा'इरी अपने जीवन और वक्त के बीच गुज़रते हुए तरक्की कर रही है। समय की यातना से झूझती है, टकराती है और कभी कभी लाचार हालत में तड़प कर रह जाती हैः

ज़िदगी से जूझना मुशकिल हुआ इस दौर में
ख़ुदकुशी से ख़ुद को लेकिन मैं बचाकर आई हूँ

वक्ते आखिर आ के ठहरे है फरिश्ते मौत के
जो चुराकर जिस्म से ले जायेंगे जाने कहाँ.
उनकी ग़ज़लों के दायरे का फैलाव सुनामी जैसी घटनाओं के समावेश करने में देखा जा सकता है, जिसमें आर्द्रता है, मानवीयता हैः

सुनामी ने सजाई मौत की महफ़िल फ़िज़ाओं में
शिकारी मौत बन कर चुपके-चुपके से कफ़न लाया.
आज धर्म के नाम पर इंसान किस तरह पिस रहा है। धनलोलुपता के कारण धर्म के रक्षक ही भक्षक बन कर धर्म और सत्य को बेच रहे हैं। इस ग़ज़ल के दो मिस्रों को देखिएः

मौलवी पंडित खुदा के नाम पर
ख़ूब करते है तिजारत देखलो

दाव पर ईमान और बोली ज़मीरों पर लगी
सौदेबाज़ी के नगर में बेईमानी दे गया.

निम्नलिखित पंक्तियों में अगर ग़ौर से देखा जाए तो यह आईना उनके अंदर का आईना है या वक्त का या फिर महबूब का जिसके सामने खड़े होकर वो अपने आप को पहचानतीं हैं :

मुझको सँवरता देखके दर्पण
मन ही मन शरमाया होगा.

इन अशा'र में गूंजती हुई आवाज़ उनकी निजी ज़िन्दगी से जुड़ी हुई है। कितनी ही यातनाएं भुगतनी पड़े, पर वे हार नहीं मानती, बस आगे बढ़ती जाती हैं:

पाँव में मजबूरियों की है पड़ी ज़ंजीर देवी
चाल की रफ़्तार लेकिन हम बढ़ाकर देखते हैं.

हौसलों को न मेरे ललकारो
आँधियों को भी पस्त कर देंगे.

जीवन के लंबे अथक सफ़र पर चलते चलते देवी जी ज्यों ही मुड़ कर अतीत में देखती हैं तो बचपन के वो क्षण ख़ुशी देकर दूर कहीं अलविदा कहते हुए विलीन हो गयाः

वो चुलबुलाहट, वो खिलखिलाहट
वो मेरा बचपन न फिर से लौटा.

आशा है कि देवी नागरानी जी का यह ग़ज़ल-संग्रह ग़ज़ल साहित्य में अपना उचित स्थान पायेगा। हार्दिक शुभकामनाओं सहित
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संपर्क:

महावीर शर्मा

7 Hall Street

London, North Finchley

N12, 8DB. UK

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नामे किताबः दिल से दिल तक

, शायराः देवी नागरानी, पन्नेः १४४, मूल्यः १५०,प्रकाशकः लेखक

 

रचना और आलोचना का अंतर्वलंबन

 

-मोहन वीरेन्द्र

 

रचना जीवन की आलोचना का सांस्कृतिक प्रकार्य है और आलोचना उस रचना में व्यक्त जीवन की खोज और विश्लेषण का रचनात्मक माध्यम। मुक्तिबोध की दृष्टि में आलोचक या समीक्षक का कार्य वस्तुत: कलाकार या लेखक से भी अधिक तन्मयतापूर्ण और सृजनशील होता है। उसे एक साध जीवन में वास्तविक अनुभवों के समुद्र में डूबना पड़ता है और उससे उबरना भी पड़ता है। निश्चित रूप से मुक्तिबोध के सामने आलोचना की नई चुनौंतियाँ खड़ी हो गई थीं, जिनसे कि उन्हें टकराना था। आलोचना को या तो रचना का पिछलग्गू मान लिया गया था या फिर आलोचना के विकास की सीमाएं अवरुद्ध हो गयीं थी। फलत: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जिस आलोचना की बुनियाद डाली थी। उसका तर्क-संगत विकास नहीं हो सका। मुक्तिबोध की चिन्ता स्वाभाविक है इसीलिए उनका संकेत आलोचना के जीवन कर्म की ओर है और वह यह कि उसका कार्य जीवन की वास्तविकता का संवेदनात्मक ओर ज्ञानात्मक विकास करना है।

इस अर्थ में रचना के कर्म से आलोचना का कर्म भिन्न नहीं कहा जायेगा। इसी अर्थ में आलोचना भी सृजनात्मक कर्म है ठीक रचना की तरह यह तभी संभव है जब आलोचक को जीवन के विकास की स्थितियों की भागीदारी निभाने का तजुर्बा हो। कहा जा सकता है कि रचना और आलोचना दोनों समान रूप से जीवन की वास्तविकता को खोजने के लिए प्रयत्नशील हैं। खोज की इस प्रक्रिया में विविधता होना स्वाभाविक है; क्योंकि जीवन की वास्तविकता जटिल और द्वंदपूर्ण है, सपाट और एकांगी नहीं। इसलिए दोनों का मार्ग भिन् न-भिन् न होते हुए भी लक्ष्य समान है।

माना कि रचना जीवन की जटिलताऔं का उद्घाटन है तो आलोचना का कार्य यह खोज करना है कि रचना में व्यक्त जीवन वास्तविक भी है या नहीं। पाठक भी यह कार्य करता है। इसलिए विवेकवान पाठक या सहृदय भी एक आलोचक कहा गया है। यह भी हो सकता है कि रचनाकार पाठक का सहारा लेकर आलोचना की परवाह न करें; क्योंकि रचनाकार आलोचना की सत्ता को अपनी अनुवर्ती भी बनाना चाहता है। मैं इस बहस को फिलहाल आगे नहीं बढ़ाना चाहता। बात अन्तरावलम्बन की है। मैं यह मानता हूँ कि आलोचक के लिए भी जीवन का गहरा और व्यापक सरोकार वास्तविक आलोचना कर्म की ओर प्रेरित करता है। आलोचक के लिए भी जीवन के प्रति उतनी पक्षधरता आवश्यक है, जितनी कि एक रचनाकार के लिए। तटस्थ रहकर ईमानदार आलोचना कर्म संभव नहीं।

केवल साहित्यिक या अकादमिन मानदण्डों का पालन करके आलोचना अपने कर्तव्य से मुक्त नहीं हो सकती। यदि रचना जीवन का ह्रास करने वाले मूल्यों की वकालत करती है तो आलोचना की पटरी उसके साथ नहीं बैठेगी, ऐसे में आलोचना उग्र और कटु भी हो सकती है। पर ऐसा सर्वत्र और सदैव नहीं होता। परन्तु यदि आलोचना अपनी अन्ध जड़ता के आगे कविता के जीवन विकास के संकेतों को ग्रहण करने में असफल सिद्ध होती है तो कविता भी उसका जवाब अवश्य देगी। इसका तात्पर्य यह नहीं कि कविता आलोचना परम्परा की सत्ता को ही अस्वीकार कर दे। मुक्तिबोध ने समीक्षा की समस्याएँ, विषय पर चर्चा करते हुए इन सीमाओं का स्पष्ट उल्लेख किया है। यहाँ कवि और समीक्षक दोनों की स्थितियों पर विचार किया गया है। नागार्जुन ऐसी ही आलोचना से क्षुब्ध होकर व्यंग्य का सहारा लेते हैं। वे पूरे आलोचना कर्म के विरोधी नहीं हैं: अगर कीर्ति का फल चखना है कलाकार ने फिर-फिर सोचा आलोचक को खुश करना है। नागार्जुन की ये पंक्तियां आलोचना की एक विशेष स्थिति की ओर संकेत करती है।

इसी प्रकार त्रिलोचन भी आलोचना कर्म की संकीर्णता का संकेत करते हैं :'रुख देख कर समीक्षा का अब मैं हूँ हामी/ कोई लिखा करे कुछ जल्दी होगा नामी' मैं यह नहीं मानता कि आलोचना को रचना का अनुवर्ती माना जाए, न ही रचना को आलोचना का अनुवर्ती माना जा सकता है। इन दोनों का सम्बन्ध द्वंदात्मक है; पर यह जरूर कहना चाहता हूँ कि आलोचना रचनाकार के जीवनानुभव को समझे, वह जीवनानुभव जो रचना में झिल-मिला रहा है। रचना में व्यक्त जीवन किस प्रकार का है और उसके कौन से कारण हैं ;इसकी पड़ताल भी आलोचना का धर्म है। यह स्वीकार करना पड़ेगा कि रचना में व्यक्त जीवन जैसा भी है, उसके भी ऐतिहासिक और भौतिक कारण हैं। इससे इंकार कर आलोचना अपने दायित्व का निर्वाह ईमानदारी के साथ नहीं कर सकती। आलोचना पर यह आरोप लगाया जाता है कि वह रचना के जीवन संवेदना से शून्य होकर विचार और चिंतन का सहारा लेती है, पर यह आरोप बेबुनियाद है। ऐसा कहना आलोचना मात्र को कठघरे में खड़ा करना है, जबकि आलोचना का कार्य रचना को समझना प्रकारान्तर से, संवेदनात्मक जीवन को समझना भी है।

जीवन को समझने के मूलाधार अलग-अलग हो सकते हैं। आलोचना उन मूलाधारों की खोज करती है। इन मूलाधारों की खोज रचना के उपकरणों को केन्द्र में रखकर की जाती है। आलोचना का यह भी कार्य है कि जीवन में उन मूलाधारों की सार्थकता या निरर्थकता की खोज करे। रचनाकार को इस पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आलोचना के अपने नियम और सिद्धान्त भी होते हैं। वस्तुत: आलोचना भी एक अनुशासन है। इन सिद्धान्तों या नियमों के प्रयोग का एक तरीका होता है। रचना की तरह आलोचना के ये सिद्धान्त भी जीवन पर अवलम्बित हैं। इस तथ्य को स्वीकार कर ही आलोचना-आलोचना को विश्वसनीय और प्रामाणिक बनाया जा सकता है इसलिये आलोचना का यह भी कार्य है कि वह जीवन के वास्तविक संवेदनात्मक सत्य का साक्षात्कार करते हुए, रचना के संवेदनात्मक सत्य का उद्घाटन करते हुए रचनाकार को रचना के वस्तु सत्यों से अधिक से अधिक परिचित करायें। उस पर नई से नई रोशनी डाले, जिससे रचनाकार के लिए भी वह प्रेरक सिद्ध हो सके। रचना भी आलोचना के लिए नई चुनौती बनकर आये।

रचना और आलोचना के इस अन्तरावलम्बन में आलोचना और रचना परस्पर सहयोगी की भूमिका का निर्वाह करती है। आलोचक रचनाकार की चेतना की परिधि को व्यापक बनाता है; पर शर्त यही है कि आलोचक को जीवन सत्यों के विषय में रचनाकार से अधिक परिचित होना पड़ेगा। वस्तुतः आलोचना के लिए खुले और अनुशासित, साथ ही संवेदनशील मस्तिष्क की आवश्यकता है। उसे रचना में व्यक्त खरा और बट्टा लगे जीवन में फर्क करना है। यही आलोचना की ईमानदारी है। वस्तुतः आलोचना का काम केवल शब्दों की बाजीगरी द्वारा एक ऐसे ठाठ का निर्माण नहीं करना है जिसमें जीवन का अंश ही न हो। आलोचना जीवन जीतने की प्रक्रिया के मार्ग की खोज का नाम है। इसी अर्थ में वह रचनात्मक प्रकार्य है आज की रचनात्मक आलोचना यह कार्य बखूबी कर रही है। उसमें एक रचना का आस्वाद मौजूद है। वह रचना के जीवन-सत्य से परिचित कराने के मददगार साबित हो रही है।

भारतीय साहित्य शास्त्र में रचना और आलोचना के सम्बन्धों पर लगातार विचार होता रहा है यहाँ आलोचना की दोयम दर्जें का कार्य कभी नहीं माना गया। राजशेखर इसका प्रमाण है। आलोचना की निन्दा और तिरस्कार पश् िचम में हुआ। गेटे ने आलोचक को कुत्ता कर उसे मार डालने तक की बात कही। उसी के चलते रचना और आलोचना के मध्य एक भयानक अन्तराल आया। पर क्या एक रचनाकार खुद आलोचक नहीं होता। वह अपनी रचना का पाठक और आलोचक एक साथ होता है। तब आलोचना को गैर रचनात्मक कार्य कैसे नहीं कहा जा सकता है। वह तो उत्पादक श्रम का एक विशिष्ट प्रकार है। यह बात जरूर है कि आलोचना रचना को अराजक रूप से समझने के लिए स्वतंत्र नहीं है। रचना के साथ उसे संघर्ष करना होता है, जूझना पड़ता है। यह द्वंदात्मक संघर्ष जरूरी है शर्त यही है कि वह रचना को केन्द्र बनाकर अपनी परिधि की संभावनाओं का विकास करे। आलोचना के भीतर से रचनाकार को खोजना होता है। इसीलिए रचना ओर आलोचना को एक दूसरे का विरोधी नहीं, वरन् सहयोगी भी कहा जा सकता है। तभी आलोचना रचना को अराजक होने से बचा सकता है।

इतिहास में ऐसे दौर आये हैं जब ईमानदारी आलोचना के अभाव में रचना अराजक हुई है। फलत: रचना के विकास मानवीय संवेदन से शून्य सिद्ध हुआ है। जब रचना और आलोचना दोनों का केन्द्र मनुष्य का केन्द्र मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन है तो फिर इन दोनों के रिश्ते में फाँक कहां से आ गयी। इसमें एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालना साहित्य की राजनीति कहर की बात होगी। वस्तुत: इस स्थिति का सबसे बड़ा कारण अतिवाद रहा है और वह अतिवाद भी एक तरफा नहीं है। चरम स्वीकार और चलते, इन दोनों के रास्ते अलग हुए और दूरियां आगे बढ़ी। इतिहास की कुछ परिस्थितियों के कारण ऐसा होना अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता । इन स्थितियों ने आलोचना की परस्पर विरोधी पद्धतियों को जन्म दिया। लेकिन तब से अब इतिहास आगे बढ़ गया है। अब विरुद्धों का सामंजस्य हो गया है; ; चाहे रचना में हो या आलोचना में एक स्वस्थ परंपरा पुन: कायम हुई है। इसीलिए रचना और आलोचना के अन्तरावलम्बन का सवाल नये सिरे से उठाया जा रहा है। इन दोनों की मैत्री ने विकास की नयी संभावनाओं को जन्म दिया है। दोनों का उद्देश्य मनुष्य की सम्पूर्णता की खोज करना है। यह बात जरूर है कि आलोचना रचना के उन्हीं तत्वों को खोजने का कार्य करती है जो विकासमान होते हैं। इसीलिए वह रचना में झिलमिलाते गतिशील जीवन को पकड़ती है।

प्रकारान्तर से रचना में यह खोज रचनात्मक तरीके से की जाती है। यहाँ मैं आलोचना की यांत्रिक पद्धतियों की बात नहीं कर रहा हूँ जैसा कि अकादमिक, कलावादी या शैलीवादी आलोचनाओं में होता है, जिनके कि अपने पूर्वाग्रह होते हैं, जिनके मूल्यांकन के मानदण्ड रचना से बाहर के होते हैं। यदि रचना के अपने आन्तरिक नियम हैं तो आलोचना भी एक अनुशासन का नाम है। यह ठीक है कि रचना जीवन-संघर्ष और आत्मसंघर्ष के रास्ते से आती है तो आलोचना भी इस संघर्ष में रचना के साथ होती है। दोनों एक दूसरे की सहयोगी बनकर आती है। तो फिर रचना आलोचना की भूमिका को आसानीं से स्वीकार क्यों नहीं करती। आलोचना अपनी वस्तुपरक स्थिति के कारण रचना को बाध्य करती है। रचना से एक सतर्क विवेक की मांग करती है। मुक्तिबोध ने इसे ही संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना कहा है। आलोचना को पता है कि उसका उपजीव्य रचना ही है। इसलिए रचना और आलोचना का द्वंदात्मक रिश्ता दोनों के लिए अनिवार्य है। यदि रचनाकार रचने के लिए सतर्क और प्रतिबद्ध है तो आलोचना उसे जांचने-परखने के लिए संकल्पवान। इन दोनों के बीच एक सहज संघर्ष देखा जाता है। यह संघर्ष भी दोनों के लिए प्रेरणाप्रद है।

प्रकारान्तर से लेखक ने सांस्कृतिक निकाय में हम दोनों सफर हैं। दोनों की भूमिका समान रूप से जिम्मेदारी पूर्ण है। आज जब कि सभी कुछ वर्ग विभक्त हो गया है। रचना और आलोचना की शक्ति का निर्माण भी वर्ग की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति से होता है। इसलिए दोनों के तत्व भी बुनियादी रूप से एक समान हो सकते है। तभी यह भी कहा जा सकता है कि रचना और आलोचना सांस्कृतिक प्रक्रिया के अविभाज्य अंग हैं, जो विरुद्धों के सामंजस्य से बनती हैं। इसीलिए एक रचनाकार समय आने पर आलोचक के दायित्व का का निर्वाह भी करता है। आज आवश्यकता रचना और आलोचना के रिश्तों को मजबूत बनाने की है; फूट डालने की नहीं; क्योंकि रचना और दोनों को मिलाकर ही साहित्य पूर्णता प्राप्त कर सकता है। इसी के रचनाकार के अन्तर्बाह्य को जानना भी आलोचना के लिए आवश्यक है। इससे आलोचना को विश्वसनीय बनाया जा सकता है।

जीवन लक्ष्यों की वास्तविकता मानव यथार्थ का ज्ञान बँटवारे की चीजें नहीं हैं। ये रचना के लिए भी आवश्यक हैं, जितना आलोचना के लिए। सिद्धान्तों का समावेश भी इसी के अन्तर्गत है, इससे बाहर जाकर नहीं। फैसले दागने से ही सब कुछ नहीं हो जाता। आलोचना का काम फैसला करना नहीं है। विश्लेषण और विवेचन भी आवश्यक है। चाहे अच्छाई हो या बुराई स्पष्टीकरण की आवश्कता उचित है। आत्म निरपेक्ष होना रचना और आलोचना दोनों के लिए आवश्यक है। आलोचना भी एक तरह का कलात्मक चिंतन है और सृजन भी इसलिए वास्तविक मानव जीवन का ज्ञान हुए बिना वह विवेक विकसित नहीं हो सकता जो रचना तो क्या आलोचना कर्म के लिए भी आवश्यक है। ऐसी आलोचना रचना से कम प्रभावी नहीं होती। ऐसी आलोचना सार संग्रह का कार्य करती है। तभी रचना में जो अवांछनीय हैं, आलोचना उसका निषेध और विरोध भी करती है। यह विरोध भी रचनात्मक हैं।

आलोचना का काम भले ही रखवारे और प्रहरी का न हो पर उसे रचनात्मकता की रक्षा करनी पड़ती है। रचना उस़से यही अपेक्षा करती है। अत: यह देखना आवश्यक है कि आलोचना के पास चीजों को व्यवस्थित रूप देने की क्षमता है या नहीं, उसके पास ज्ञानात्मक और संवेदनात्मक प्रकाश है कि नहीं, वह जिन औजारों से रक्षा करना चाहती है वे औजार मोर्चे के लिए उपयुक्त भी हैं या नहीं। इसका बहुत ज्यादा सामान्यीकरण इस लिए संभव नहीं है; क्योंकि रचना प्रक्रिया भी एक सामान्यीकृत प्रक्रिया नहीं है और न ही रचनाप्रक्रिया को यांत्रीकृत किया जा सकता है। वस्तुत: रचना प्रक्रिया बहुत कुछ आत्मबद्ध क्रिया भी हो जाती है परन्तु आत्मकेंन्द्रित नहीं ; अत: उसकी सामाजिकता भी नष्ट नहीं होती है। अत: अलग-अलग रचनाकार रचना प्रक्रिया का भिन्न-भिन्न अनुभव अर्जित करता है और वह संवेदन की नवीनता की खोज करता है। आलोचना का काम सभी को एक लाठी से हांकने के समान नहीं है। उसे अपने औजारों का एक ही अनुपात और संतुलन सर्वत्र प्रयोग करने की छूट नहीं दी जा सकती। इसके परिणाम कभी भी अच्छे नहीं निकले हैं। ऐसी स्थिति रचना के साथ न्याय कतई नहीं कर सकती।

यह भी जरूरी नहीं है कि एक समीक्षक अलग-अलग रचनाकारों का एक जैसा एप्रीसियेटिव विश्लेषण और मूल्यांकन करे, पर इसका यह भी मतलब नहीं कि हम इस आलोचक के सम्पूर्ण आलोचना कर्म को ही खारिज करदें। कई बार पूरी आलोचना के भीतर हमें प्रकाश की एक ऐसी हल्की और बारीक किरण मिल जाती है कि हम उसी की रोशनी में रचना की गहराइयों तक पहुँच जाते हैं। इसलिए आलोचना से सार संग्रह की मांग करना भी गलत नहीं कहा जायेगा। जहाँ तक रचना का प्रश्न है चुनाव यहाँ भी करना पड़ता है। इसलिए वही रचना हमें अपनी ओर आकर्षित करने में समर्थ भी होती है, जो नवीनता को धारण करती है, जो जीवन को काव्यमय बना देती है।

(टीडीआईएल हिन्दी पाठ कार्पोरा से साभार)

किसान...बैल, और...

आदमी और जानवर के बीच का सांस्कृतिक अन्तर जानते हैं आप ? नहीं जानते होंगे। मै बताता हूँ।...मोटे तौर पर अगर कोई जानवर मनुष्यों जैसा कर्म कर बैठे तो रातों रात प्रसिद्ध हो जाता है...खबरों में आ जाता है।...इसके विपरीत, आदमी जानवरों जैसा आचरण करता रहे तो इसे कोई खास खबर नहीं माना जाता।...आदमी के सारे गुनाह माफ हैं, क्योंकि जुर्म भी आदमी ही करता है और कानून भी आदमी ही बनाता है। ...आपको एक बैल की सच्ची श्री कथा सुना रहा हूं।...सुनिये और जन-तांत्रिक ढंग से गुनिये।...

भिन्ड (ग्वालियर) के इलाके में एक किसान अनाज बेचकर नोटों की मोटी गड्डी लाया। अपनी इस कमाई को सुरक्षित रखने के लिए, नोटों को भूसे के ढेर में दबा दिया। किसान जी की वाइफ ने रोजाना के नियमानुसार भूसा बैलों को डाला और साथ ही नोटों की गड्डी भी बैल महोदय के लंच में चली गई। बैल जी थके माँदे खेत से लौटे थे, सो दनादन भूसा खाना शुरू कर दिया। मालूम तब हुआ जब यान (चारे की जगह) की सफ़ाई करते समय नोटों के चबाये और अध चबाये टुकड़े पड़े मिले। बैल चुपचाप जुगाली कर रहा था और मुंह से नोटों के टुकड़े बह रहे थे। किसान जी माथा पीट कर रह गये। बैल जी निर्दोष खड़े थे।

इस सत्य कथा से सरकारी निष्कर्ष यह निकलता है कि आप अपने पैसे बैंक-पोस्ट आफिस में जमा करो और देश की तरक्की में योगदान दो। ...मेरे पास चूंकि आम हिन्दुस्तानी की तरह जमा करने के लिए पैसे ही नहीं बचते, सो मैं इस पूरे प्रसंग पर जरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चिन्तन कर रहा हूं। बैल क्या हैं ?...नोट क्यों है ?...चारा किसे कहते हैं ? वगैरा-वगैरा..इतना तो आपने किताबों में पढ़ा ही होगा कि हमारा भारत एक कृषि प्रधान और राजनीति प्रधान देश है। दोनों ही क्षेत्रों में बैलों की कमी नहीं है।...बैल उस पशु को कहते हैं जो चुपचाप आंखें मिलाये बगैर माल डकार लेता है और सिर झुकाये जुगाली करता रहता है।...उसके सम्बन्ध में कौन क्या कह रहा है, इसका बैल की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। एकदम निर्विकार...सीधा सादा।...खेती से 'भूतपूर्व' हो जाने के बाद भी बैल संचित माल की जुगाली करता रहता है।...उसे किसी की कटु आलोचनाओं की कोई चिन्ता नहीं।...जो चाहे कमीशन बिठा दे।...

अब प्रश्न यह उठता है कि जब एक-से-एक हाई पावर भूतपूर्व बैल नोटों की गड्डियाँ पर गड्डियाँ डकार गया और जुगाली तक न की तो फिर इस बेचारे भिन्ड के बैल को बदनाम करने से क्या हासिल। ...इसे परम्परा क्यों नहीं मान लिया जाता कि जो बैल है उसे नोट डकारने का हक है।...

आप भाई साहब, पिछले ३६ वर्षों का इतिहास और गणित उठाकर देख लो कि कितना किसान के हिस्से में आया, कितना बैलों के ? बैल हमेशा किसान के आगे-आगे चलता है। आगे चलने वाले का हिस्सा भी ज्यादा हो सकता है। किसान माथा पीट कर रह जाता है कि काश वह एक विशेष किस्म का 'सफेद बैल' हो जाता और उसे भी नोट चबाने की सुविधा रहती।...होटल एग्री-कल्चर पर निगाह डालें, आप! किसान वहीं का वहीं है...जमीन वहीं की वहीं हैं...बैल अपनी घण्टी बजाता हुआ आगे बढ़ गया है।...ग्रामसभा से कमेटी...कमेटी से असेम्बली, असेम्बली से संसद...संसद से...जाने कितने ही खेत-खलिहान लांघ गया बैल। किसान की आँख में अब भी उतने ही आंसू हैं जितने गाँधी बाबा या लार्ड कर्जन के टाइम में थे...बल्कि कुछ ज्यादा ही।

मैं यहाँ पर उन किसानों की बात नहीं कर रहा हूँ जिन्हें कृषि विकास प्रदर्शनियों के पोस्टरों में बीवी बच्चों के साथ हंसते गाते दिखाया जाता है। वे सब नुमायशी और काल्पनिक किसान हैं जो सिर्फ पोस्टरों पर सजते हैं... हल नहीं चलाते...उधर हर बैल हर किसान से अधिक पावरफुल होता है।...बैल बनते ही वह अपनी शक्ति आँक लेता है और किसान के भूसे के साथ-साथ उसके नोट भी चबा लेता है। किसान खामोश रहता है। वह जानता है कि इतिहास हमेशा बैलों से बनता है...किसानों से नहीं।

बैल की एक खास खूबी यह भी होती है कि चाहे वह किसी रंग का हो, खुद को किसानों का सच्चा हमदर्द कहता है।...किसान घबरा जाता है कि बैलों की इस भीड़ में सच्चा बैल कौन है।...उसकी आत्मा जानती है कि चाहे कोई सा भी बैल क्यों न हो चारे के साथ उसके नोट जरूर चवायेगा। फिर भी किसान रैली में जाता है और भेंट देकर लौट आता है। वह जानता है कि बैलों से उसका जनम-मरन का नाता है।...बैल ही उसका भाग्य विधाता है।...

मैंने यूंही बाई द वे, भिन्ड वाले बैल साहब से पूछा कि जनाब, आपने गरीब किसान की साल भर की कमाई क्यों चबा डाली ?...बैल साहब मुस्कराये ओर बोले-'चबाना और सींग मारना हमारी आदत है।...हम नहीं चबाते तो कोई दूसरा बैल चबा जाता।...किसान को नोटों की गड्डी की क्या जरूरत ? उसे सिर्फ अपना कर्म करना चाहिए और फल 'बैलों'के लिए छोड़ देना चाहिए, यही कृषक धर्म है ! जमींदारी युग से यही चला आ रहा है !...किसान के पास यदि नोट सही सलामत रह गये तो हम बैलों को पूछेगा कौन ?..वह ट्रैक्टर नहीं खरीद लेगा ?...श्री बैल के ऐसे श्रीवचन सुनकर बैलों के प्रति मेरी आस्था और भी बढ़ गई!...किसान का क्या? उसका यही धर्म है कि हर सुबह पीपल पर उगते सूरज की रोशनी में नई फसल का ख्वाब देखे और हम डूबते सूरज के साथ अपने सपने दफन कर दें !...उसे अपनी सारी उम्र बैलों के चारे का बन्दोबस्त करते हुए ही गुजारनी है !

इन दिनों 'बैल' और भी सक्रिय हो उठते हैं और अपनी आस्मानी हमदर्दी ऊपर से बरसाने लगते हैं।...किसान कृतज्ञ हो उठता है कि बैलों की हमदर्दी उसके साथ है !...बैलों की आंख़ों में भी आँसु हैं ! उसे और क्या चाहिये ?... मेरा ख्याल है कि अब आप आदमी और जानवर...किसान और बैल के बीच का फर्क समझ गये होंगे ! अत: भिन्ड के बैल ने किसान के नोट चबाकर सिर्फ अपना बैल धर्म निभाया है !...दोष किसान का है ! नोट भूसे में क्यों रखे?...क्या वह जानता था कि इन नोटों पर उसका कोई हक नहीं है ? क्या उसे पता था कि नोट अन्तत: 'बैल' के हवाले ही होने हैं। बैल से मैं बातचीत कर चुका हूँ...किसान का इटंरव्यू बेकार है !... सब कुछ दे चुकने बाद किसान इंटरव्यू देने लायक नहीं रह जाता है !

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चन्दनवुड चिल्ड्रन स्कूल...!

आँख मुलमुल...गाल...गुलगुल...बदन थुलथुल, मगर आवाज बुलबुल ! वे मात्र वन पीस तहमद में लिपटे, स्टूल पर उकडूं बैठे, बीड़ी का टोटा सार्थक कर रहे थे ! रह-रह कर अंगुलियों पर कुछ गिन लेते और बीड़ी का सूंटा फेफड़ों तक खींच डालते थे! जहां वे बैठे थे वहाँ कच्ची पीली ईंट का टीन से ढका भैंसों का एक तवेला था ! न कोई खिड़की न रौशनदान ! शायद उन्हें डर था कि भैंसें कहीं रोशनदान के रास्ते ख़िसक ने जाएं ! सुबह सवेरे का टाइम था और भैंसें शायद नाश्तोपराँत टहलने जा चुकी थीं ! तवेला खाली पड़ा था ! उन्होंने मुझे भर आँख देखा भी नहीं और बीड़ी चूसते हुए अंगुलियों पर अपना अन्तहीन केल्क्यूलेशन जोड़ते रहे !...

मैंने उनसे सन्दलवुड चिल्डन स्कूल का रास्ता पूछा तो उनकी आंखों और बीड़ी में एक नन्ही सी चमक उभरी !...धीरे से अंगुली आकाश की ओर उठा दी गोया नया चिल्ड्रन स्कूल कहीं अन्तरिक्ष में खुला हो ! मगर मैं उनका संकेत समझ गया ! नजर ऊपर उठाई तो तवेले की टीन के ऊपर एक तख्ती नजर आई, जिस पर गोराशाही अंग्रेजी में कोयले से लिखा था-दि सन्दलवुड चिल्ड्रन स्कूल !...प्रवेश चालू ! इंगलिश मीडियम से कक्षा ६ तक मजबूत पढ़ाई ! प्रिन्सिपल से मिलें !...

'तख्ती पढ़कर मैं दंग रह गया !...यही है चंदन लकड़ी स्कूल ?...चंदन दर किनार, कहीं तारपीन या कोलतार तक की बू नहीं थी ! मेरी मजबूरी अपनी जगह थी ! मुहल्ले के गनेशी लाल के पोते के दाखले की जिम्मेदारी मुझ पर थी ! खुद गनेशी लाल उम्र भर पढ़ाई लिखाई की इल्लत से पाक रहे और अपने बेटे को भी पाक रखा ! सिर्फ गुड़ की किस्में जान लीं और खान्दानी कारोबार चलाते रहे ! मगर पोता ज्यों ही नेकर में पांव डालने की उम्र को पहुंचा, उनकी पतोहू ने जिद पकड़ ली कि छुटकन्ना पढ़ि़ है जरूर, और वह भी निखालिस इंगलिश मीडियम से !...उसकी नजर में हिन्दी मीडियम से पढ़ने से बेहतर है कि गुड़ बेच ले !

पतोहू ने अपने मैके में देखा कि अंग्रेजी मीडियम से पढ़े छोकरे कैसे फट-फट आपस में इंगलिश में गाली गलौज करते हैं !...एक स्मार्टनेस सी रहती है सुसरी !...चुनांचे गनेशी लाल मेरे पीछे पड़ गये कि छोकरे को कहीं अंग्रेजी मीडियम में डलवा ही दूं !...उधर जुलाई-अगस्त की झड़ी लगते ही चिल्ड्रन स्कूलों में वह किच-किच होती है कि आदमी अपना मरा हुआ बाप भले ही दोबारा हासिल कर ले, मगर बच्चे को स्कूल में नहीं ठूंस सकता !...

अंग्रेजी के 'डोनेशन' और हिन्दी के 'अनुदान' का फर्क इसी वक्त समझ में आता है आदमी को ! अनुदान के बीस रूपयों में बच्चा हिन्दी मीडियम में धंस जाता है, मगर डोनेशन तीन अंकों से नीचे होता ही नहीं !...अंग्रेजी की ग्रेटनेस का पता यहीं पर चलता है ! खैर...! शिक्षा सन्दर्भ में यह एक अच्छी बात है कि बारिश में फूली लकड़ी पर उगे

कुकुरमुत्तों की तरह, जुलाई-अगस्त में चिल्ड्रन स्कूल भी दनादन उग आते हैं ! हर गली-मुहल्ले में भूतपूर्व लकड़ी की टालों और हलवाईयों की दुकानों पर नर्सरी मोन्टेसरी स्कूलों के बोर्ड टंग जाते हैं ! हर साइन बोर्ड का यही दावा होता है कि हमारे यहाँ बच्चा माँ की गोद जैसा सुरक्षित रहेगा और आगे चलकर बेहद नाम कमायेगा !...ऐसे ही दुर्लभ तथा नये उगे स्कूलों में 'सन्दल वुड चिल्ड्रन स्कूल' का नाम भी मेरे कान में पड़ा था !

नाम में ही चंदन सी महक और हाली-वुड जैसी चहक थी !...और अब मैं टीन जड़ीत, रोशनदान रहित उसी स्कूल के सामने खड़ा था !... बीड़ी तहमद वाले थुलथुल सज्जन ने आखिरी कश खींच कर बीड़ी को सदगति तक पहुंचाया, और तहमद के स्वतन्त्र कोने से मुंह पोंछ कर आंखों ही आंखों में पूछा कि क्या चाहिए ?...मैंने दोनों हाथों से बच्चे का साइज बताया और धीरे से पूछा कि प्रिंसिपल कहाँ हैं...कब उपलब्ध होंगे ? वे भड़क गये ! गुर्रा कर बोले-'हम आपको क्या नजर आवे हैं ? टाई-कमीज अन्दर टंगी है तो हम प्रिन्सिपल नहीं रहे ? जरा बदन को हवा दे रहे थे ! आप बच्चा और फीस उठा लाइए ! भर्ती कर लेंगे ! '

मैं सटपटा गया और इस बार उन्हें उस ढंग से अभिवादन पेश किया जिस ढंग से अमूमन अंग्रेजी मीडियम से होता है ! यह पूछने पर कि बाकी टीचिंग स्टाफ कहाँ है, उन्होंने बताया कि बाकी का स्टाफ भी वह खुद ही हैं ! क्लास थ्री स्टाफ भी, और क्लास फोर (झाडू, पोंछा, सफाई) भी !...दो अदद लेडी टीचस भी हैं, जिनमें से एक उनकी मौजूदा पत्नी हैं और दूसरी भूतपूर्व ! फिलहाल दोनों घर में लड़ाई-झगड़े में मसरूफ हैं ! चट से टीचिंग सेशन शुरू होते ही आ जाएगी !...अभी कुल तेईस बच्चे नामजद हुए हैं ! पच्चीस पूरे होते ही ब्लैक बोर्ड मंगवा लेंगे और पढ़ाई जो है उसे शुरू करवा देंगे !...मुझे तसल्ली हुई ! डरते-डरते पूछा-खिड़कियां, रोशनदानों, पंखों और बैंचों वगैरा का झंझट आपने क्यों नहीं रखा ?'...

वे दूरदर्शी हो गए !...आप चाहते हैं कि बच्चों को अभी से आराम तलब बना दें ?... ग्लासगो कभी गए हैं आप ? वहाँ के सन चालीस के पैटर्न पर हमने स्कूल शुरू किया है ! बच्चों को, उसे क्या कहते हैं...हां...हार्डशिप की आदत डालनी होगी !...फिर धीरे-धीरे सब कुछ हो जइहे !...अगले साल रोशनदान खुलवा देंगे...फिर अगले साल पंखों वगैरा की देखी जाएगी !...पईसा चाहिए, कि नाहीं चाहिए ?...पच्चीस बच्चों की फीस लईके सुरू में ही आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी खोल दें का ?...टाइम पास होते-होते सब कुछ हुई जयिहे !...बच्चा ले आवो !...दो ही सीटें बची हैंगी !...

'सो साहब, चंदन वुड चिल्ड्रन स्कूल के प्रधानाचार्य के श्रीवचन सुनकर मैं काफी से भी अधिक प्रभावित हुआ ! सारी हिम्मत बटोर कर एक अन्तिम प्रश्न पूछा- 'माहसाब ! वैसे तो अपने इण् डिया में चारे-भूसे की कमी चाहे भले ही हो, मगर बच्चों का टोटा नहीं है ! फिर भी मगर दो बच्चे और न हाथ लगे तो क्या आप स्कूल डिजाल्व कर देंगे ?' वे पुन: भड़क गये !...आये गए सूबे-सूबे नहूसत फैलाने !... जिस भगवान ने तेईस बच्चे दिये, वह दो और नाहीं भेजिहे का ? डिजालव कर भी दें तो कौन सी भुस में लाठी लग जईहे ?...पहले इस टीन में पक्के कोयला कर गुदाम रहा !...सोचा कि इस्कूल डाल लें ! डाल लिया !...इन्ते पढ़े लिखे हैंगे कि कक्षा ६ तक पढ़ाये ले जावें ! नाहीं चल पईहे इस्कूल तो कोयले का लैसंस कोई खारिज हुई गवा है का ?...लपक के बच्चा लै आओ !...' मैं लपक कर चल पड़ा !...

रास्ते भर प्रधानाचार्य की उस अंग्रेजी से प्रभावित रहा जो एक फिल्मी गाने 'आकाश में पंछी गाइंग...भौरां बगियन में गाइंग' जैसी थी ! मास्साब दूर तक टकटकी बांधे मुझे उम्मीदवार नजरों से देख रहे थे, गोया कह रहे हों-बच्चा लईहे जरूर ! जईहे कहां ? इधर मैं यह सोच रहा था कि गनेशी लाल के पोते के भविष्य के लिए गुड़ बेचना मुनासिब रहेगा या सन्दलवुड चिल्ड्रन स्कूल में अंग्रेजी मीडियम से शिक्षा अर्जित करना ?...

(नोट-यदि किसी स्कूल का नाम यही हो, तो अन्यथा न लें ! नाम काल्पनिक है !...)

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(टीडीआईएल के हिन्दी पाठ कार्पोरा से साभार)

 

पटते तालाब, कटते जंगल और बंजर होती जमीन

 

-प्रो. अश्विनी केशरवानी

Ashwini kesharwani (WinCE) 

गांव अब शहर में तब्दील होते जा रहे हैं। आज यहां बड़ी बड़ी इमारतें, मोटर-गाड़ी देखे जा सकते हैं। गांव का गुड़ी@ चैपाल और अमराई आज देखने को नहीं मिलता... नई पीढ़ी के लोगों को मालूम भी नहीं होगा कि गांवों में ऐसा कुछ रहा भी होगा। हमारे पूर्वजों ने गांव में अमराई लगाना, कुंआ खुदवाना और तालाब खुदवाना पुण्य कार्य समझा और उसे करवाया। रसीले और पक्के आम का स्वाद भी हमने चखा। आज नई पीढ़ी के बच्चे बोतल में बंद मेंगो जूस, फ्रूटी और आमरस का जेली आदि को सर्वोत्तम भले मान ले लेकिन पलाई आम को चूसने और आम का अमसरा खाने का मजा कुछ और ही था। मुझे मेरे घर में हमारे पूर्वजों के द्वारा कुंआ और खुदवाने संबंधी कागजात मिले हैं जिसके एवज में डिप्टी कमिश्नर, रायपुर के द्वारा प्रशस्ति पत्र दिये गये हैं। अर्थात! डस काल में कुंआ और तालाब खुदवाना अत्यंत पुण्य कार्य था। तालाबों के किनारे बरगद, पीपल और नीम के पेड़ लगवाये थे जिसकी छांव में हमारा बचपन गुजरा था। मेरी दादी बताती है कि उनकी 5-6 वर्ष का बच्चा खत्म हो गया जिसकी याद में उनके ससुर ने छुइया तालाब के किनारे पांच पेड़ लगवाये थे जिसकी छाया आज भी सबको मिलती है। प्रायः सभी गांवों में अनेक तालाब, तालाब के किनारे पेड़ और शिव मंदिर अवश्य होते थे। इसी प्रकार धर्मार्थ कुएं खुदवाये जाते थे। तालाब ‘वाटर हार्वेस्टिंग‘ का बहुत अच्छा माध्यम था।

आज गांवों की तस्वीर बदली हुई है। लोगो ने घरों के फर्नीचर के लिए अमराई के पेड़ों को कटवा डाला है। आज वहां पेड़ों के ठूंठ ही शेष हैं। अमराई के आमों की बातें किस्से कहानियों जैसे लगता है। तालाब अब जाना नहीं होता क्यों कि घरों में बोरिंग हो गया है, पंचायत द्वारा पानी सप्लाई भी की जाती है... अर्थात् घर बैठे पानी की सुविधा हो गयी है। इसलिए तालाब की उपयोगिता या तो मछली पालन के लिए रह गयी है या फिर उसे पाटकर को इमारत बनाये जा रहे हैं। गांव से शहर बन रहे कस्बों के तालाबों में घरों का गंदा पानी डाला जा रहा है। रतनपुर, मल्हार, खरौद और अड़भार में कभी 120 से 1400 तालाब होने की बात कही जाती है। रायगढ़ में इतने तालाब थे कि उसे ‘खइया गांव‘ के नाम से संबोधित किया जाने लगा था। लेकिन आज वहां कुछ ही तालाब शेष हैं बाकी सबको पाटकर बड़ी बड़ी इमारतें, स्कूल-कालेज और सिनेमा हाल बना दिया गया है। कहना न होगा कि तालाब और नदियों के किनारे लगे पेड़ों के जड़ मिट्टी को बांधे रखता था, जिसके कटने से नदियों का कटाव बढ़ते जा रहा है और आने वाले समय में समूचे गांव के नदी में समा जाने का खतरा बनने लगा है।

गांव के बाहर प्रायः सभी छोटे-बड़े किसानों का ‘घुरवा‘ होता था जिसमें गाय और भैंस का गोबर डाला जाता था। भविष्य में यही उत्तम खाद बन जाता था और बरसात के पहले उसे खमतों में डाला जाता था जिससे खमतों की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती थी और पैदावार अच्छी होती थी। तब दुबराज चांवल की खुशबू पूरे घर में फैल जाती थी। आज गांवों में ऐसा कुछ नहीं होता क्यों कि आज हल की जगह ट्रेक्टर, गोबर खाद की जगह यूरिया खाद ले लिया है। पानी नहीं बरसा तो नहर से लिया जाता है जब नहर से पानी नहीं मिला तो ट्यूब बेल खोदकर पानी खींचकर सिंचाई की जाती है। फसल में कीड़े हो जाते हैं तो कीट नाशक दवाईयां डाली जाती है। भले ही अब दुबराज चांवल में खुशबू नहीं है लेकिन सरकार के द्वारा कम समय में अधिक पैदावार वाले धान के बीज उपलब्ध करा दिया जाता है।

किसानों की चिंता है कि उनके बच्चे खेतों में जाना नहीं चाहते। वे तो पान ठेला, होटल और अन्य दुकान खोलकर जीने के आदी होते जा रहे हैं। नई पीढ़ी के खेती-किसानी के प्रति अरूचि से खेत बंजर होते जा रहे हैं, यह चिंता की बात है। घर में खाने को कुछ हो या न हो लेकिन एक मोटर सायकल अवश्य होना चाहिये। इसके लिए बैंक और फाइनेंसिंग कंपनियां लोन देने को तैयार बैठे हैं। लोन के कर्ज में घर भले ही डूब जाये, इससे किसी को कुछ लेना देना नहीं होता। लोगों का मानना है कि कर्ज में हम जन्म लेते हैं, कर्ज में जीते हैं और कर्ज लिए मर जाते हैं...।

खुशी करने की बात है कि नदी किनारे वाले गांवों में औद्योगिक प्रतिष्ठान लगते जा रहे हैं। लोगों को उम्मीद है कि औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लगने से उन्हें रोजगार मिल जायेगा, व्यापारियों का व्यापार बढ़ जायेगा, मकान मालिकों को किरायेदार मिल जायेगा.....। छत्तीसगढ़ शासन औद्योगिक समूहों को प्रतिष्ठान लगाने के लिए आमंत्रित कर रही है, यहां उन्हें भूमि मुहैया करा रही है तो स्वाभाविक है कि यहां औद्योगिक प्रतिष्ठान लगेंगे ही... लगते जा रहे हैं। अकेले रायगढ़ जिले के आसपास लगभग 150 आयरन और पावर प्लांट लग चुके हैं। छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जिंदल स्पंज और स्टील प्लांट लग चुका है और जल्द ही उनका पावर प्लांट लगने वाला है। इसके लिए केलो नदी में उनका पावर प्लांट लगने वाला है। इसी प्रकार अनेक औद्योगिक प्रतिष्ठान लग चुके हैं और लगते जा रहे हैं। स्वाभाविक रूप से इन सभी प्रतिष्ठानों को पानी की आवश्यकता होगी जिसकी पूर्ति नदियों के उपर बने बांधों से की जा रही है। बांध के बनने से नदियों में पानी ही नहीं है और है भी तो औद्योगिक प्रतिष्ठानों से निकला रासायन युक्त गंदा पानी है जिससे नदियां प्रदूषित हो गयी है।

प्रदेश में औद्योगिक प्रतिष्ठानों के लगने से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में विकास का ग्राफ अवश्य बढ़ा है। लेकिन विकास के साथ साथ अनेक प्रकार की बुराईयां भी आती हैं जिसे प्रत्यक्ष रूप से देखा जा सकता है। औद्योगिक प्रतिष्ठानों से निकला धुंआ जहां पेड़ों के चक्रीय जीवन को प्रभावित कर रहा है, वहीं उसके धुएं से खेत की उर्वरा शक्ति खत्म होती जा रही है और खेत बंजर होते जा रहे हैं। अधिकांश नदियों में बांध बनाये जा चुके हैं जिससे नदियां सूख गयी है। उसमें जो थोड़ा बहुत जल है उसमें औद्योगिक प्रतिष्ठानों का रासायन युक्त गंदा पानी प्रवाहित हो रहा है। इससे जन जीवन अस्त व्यस्त होते जा रहा है।

आज फसल चक्र की बात की जाती है... फसल चक्र तो नहीं बदला लेकिन जलवायु परिवर्तन अवश्य हो गया है। एक ही नगर में कहीं बरसात होती है तो कहीं नहीं होती। जल का चक्र के प्रभावित होने से ऐसा होता है। जलवायु परिवर्तन विकसित और विकासशील देशों के बीच वाद विवाद का विषय जरूर बना है लेकिन सच्चाई यह है कि हवा, पानी, भोजन, स्वास्थ्य, खेती, आवास आदि सभी के उपर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ने वाला है। समुद्री जल स्तर के बढ़ने से प्रभावित होते तटीय क्षेत्र के लोग हों या असामान्य मानसून अथवा जल संकट से त्रस्त किसान, विनाशकारी समुद्री तूफान का कहर झेलते तटवासी हों अथवा सूखे से त्रस्त और असमान्य मौसम से जनित अजीबो-गरीब बीमारियां झेलते लोग या फिर विनाशकारी बाढ़ में अपना सब कुछ गवां बैठे और दूसरे क्षेत्रों में पलायन करते तमाम लो जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं।

प्रकृति के तीन उपकार ः मिट्टी पानी और बयार

औद्योगिक क्रांति की भट्ठी में हमने अपना जंगल झोंक दिया है। पेड़ काट डाले और सड़कें बना डालीं। कुल्हाड़ी-आरी से जंगल काटने में देर होती थी, तो पावर से चलने वाली आरियां गढ़ डालीं। सन् 1950 से 2000 के बीच 50 वर्षो में दुनियां के लगभग आधे जंगल काट डाले, आज भी बेरहमी से काटे जा रहे हैं। जल संग्रहण के लिए तालाब बनाये जाते थे जिससे खेतों में सिंचाई भी होती थी। लेकिन आज तालाब या तो पाटकर उसमें बड़ी बड़ी इमारतें बनायी जा रही है या उसमें केवल मछली पालन होता है। मछली पालन के लिए कई प्रकार के रसायनों का उपयोग किया जाता है जिसका तालाबों का पानी अनुपयोगी हो जाता है। इसी प्रकार औद्योगिक धुओं से वायुमंडल तो प्रदूषित होता ही है, जमीन भी बंजर होती जा रही है। इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा है और दुष्परिणाम हम भुगत रहे हैं। आखिर जंगल क्यों जरूरी है ? पेड़ हमें ऐसा क्या देते हैं, जो उन्हें बचाना जरूरी है ? पेड़ हमें फल, फूल, जड़ी-बूटी, भोजन, र्इंधन, ईमारती लकड़ी, गोंद, कागज, रेशम, रबर और तमाम दुनियां के अद्भूत रसायन देते हैं। इसलिए हमने उसका दोहन (शोषण) तो किया, पर यह भूल गये कि वृक्षों के नहीं होने से यह धरती आज वीरान बनती जा रही है। वनों के इस उपकार का रूपयों में ही हिसाब लगायें तो एक पेड़ 16 लाख रूपये का फायदा देता है। घने जंगलों से भाप बनकर उड़ा पानी वर्षा बनकर वापस आता है और धरती को हरा भरा बनाता है। पेड़ पौधों की जड़ें मिट्टी को बांधे रहती है। पेड़ों की कटाई से धरती की हरियाली खत्म हो जाती है। धरती की उपजाऊ मिट्टी को तेज बौछारों का पानी बहा ले जाती है। पेड़ों की ढाल के बिना पानी की तेज धाराएं पहाड़ों से उतर कर मैदानों को डुबाती चली जाती है। हर साल बाढ़ का पानी अपने साथ 600 करोड़ टन मिट्टी बहा ले जता है। मिट्टी के इस भयावह कटाव को रोकने का एक ही उपाय है-वृक्षारोपण। मिट्टी, पानी और बयार, ये तीन उपकार हैं वनों के हम पर। इसलिए हमारे देश में प्राचीन काल से पेड़ों की पूजा होती आयी है।

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रचना, आलेख एवं प्रस्तुति,

प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव, डागा कालोनी, चांपा-495671 (छ.ग.)

sitaram gupta

कबीर की एक साखी हैः

कबीरा मन निर्मल भया , जैसे गंगा नीर,

पाछे-पाछे हरि फिरै , कहत कबीर-कबीर।

कबीर कहते हैं कि मनुष्य के मन के गंगा जल की तरह निर्मल हो जाने पर हरि अर्थात् ईश्वर को खोजने की आवश्यकता नहीं अपितु हरि ही मनुष्य के पीछे-पीछे दौड़ा चला आएगा। संत रविदास भी कहते हैं कि मन चंगा तो कठौती में गंगा। कबीर और रविदास ही नहीं सभी संतों ने मन की निर्मलता पर बल दिया है और निर्मलता भी गंगाजल -सी। एक प्रार्थना में भी पंक्ति आती है कि गंगाजल सा निर्मल मन हो, मिला मुझे विद्या का धन हो। प्रश्न उठता है कि मन की निर्मलता से क्या तात्पर्य है और इसकी क्या उपयोगिता और महत्त्व है तथा मन की निर्मलता की उपमा गंगा के जल से क्यों दी जाती है?

गंगा भारत की एक अत्यंत पवित्र नदी है जिसका जल काफी दिनों तक रखने के बावजूद अशुद्ध नहीं होता जबकि साधारण जल कुछ दिनों में ही सड़ जाता है। गंगा का उद्गम स्थल गंगोत्री या गोमुख है। गोमुख से भागीरथी नदी निकलती है और देवप्रयाग नामक स्थान पर अलकनंदा नदी से मिलकर आगे गंगा के रूप में प्रवाहित होती है। भागीरथी के देवप्रयाग तक आते-आते इसमें कुछ चट्टानें घुल जाती हैं जिससे इसके जल में ऐसी क्षमता पैदा हो जाती है जो उसके पानी को सड़ने नहीं देती।

हर नदी के जल में कुछ ख़ास तरह के पदार्थ घुले रहते हैं जो उसकी विशिष्ट जैविक संरचना के लिए उत्तरदायी होते हैं। ये घुले हुए पदार्थ पानी में कुछ ख़ास तरह के बैक्टीरिया को पनपने देते हैं तो कुछ को नहीं। कुछ ख़ास तरह के बैक्टीरिया ही पानी की सड़न के लिए उत्तरदायी होते हैं तो कुछ पानी में सड़न पैदा करने वाले कीटाणुओं को रोकने में सहायक होते हैं। वैज्ञानिक शोधों से पता चलता है कि गंगा के पानी में भी ऐसे बैक्टीरिया हैं जो गंगा के पानी में सड़न पैदा करने वाले कीटाणुओं को पनपने ही नहीं देते इसलिए गंगा का पानी काफी लंबे समय तक ख़राब नहीं होता और पवित्र माना जाता है।

कहा गया है कि संकल्पविकल्पात्मकं मनः अर्थात् मन संकल्प और विकल्प स्वरूप है। मन में हर पल असंख्य विचार आते और जाते हैं और उनमें परिवर्तन होता रहता है। मन अत्यंत चंचल है, कहीं एक स्थान पर टिकता नहीं, भागता रहता है। इसमें परस्पर विरोधी विचारों का प्रवाह चलता रहता है। कभी अच्छे विचार तो कभी बुरे विचार। मन की इसी चंचलता के कारण मनुष्य अनेक समस्याओं और व्याधियों से ग्रस्त रहता है। विचारों के अनुरूप ही हमारी आदतों का विकास होता है और विचार ही कर्म करने के लिए उत्प्रेरक तत्त्व की भूमिका का निर्वाह करते हैं। सकारात्मक विचार हमें सही कर्म की ओर अग्रसर करते हैं तो नकारात्मक विचार गलत कर्म की ओर। हमारे अच्छे स्वास्थ्य के लिए सकारात्मक सोच ही उत्तरदायी है तो बुरे स्वास्थ्य के लिए नकारात्मक सोच। मन की चंचलता के कारण अथवा मन की निर्मलता के अभाव में ही हम अपनी चेतना से एकाकार नहीं हो पाते हैं।

मन की निर्मलता से तात्पर्य है मन का विकारों अर्थात् गलत विचारों से रहित होना। विकार रूपी बैक्टीरिया ही हमारे मन की निर्मलता को नष्ट करते हैं अतः उनसे छुटकारा पाना अनिवार्य है। जहाँ तक जल की निर्मलता की बात है शुद्ध जल का न तो कोई स्वाद होता है और न कोई रंग या गंध ही। हम प्रायः कहते हैं कि ये पानी मीठा है और ये खारा है। वास्तव में शुद्ध पानी मीठा नहीं होता अपितु जो पानी खारा नहीं होता या जिसमें अशुद्धियाँ नहीं होतीं उसे ही मीठा पानी कह देते हैं। और यह बिलकुल स्वादहीन, रंगहीन तथा गंधहीन होता है।

हमारा मन भी शुद्ध पानी की तरह ही होना चाहिए तभी वह निर्मल माना जाएगा अर्थात् मन में भी किसी प्रकार के भाव नहीं होने चाहिएँ लेकिन यह असंभव है क्योंकि मन विचार शून्य नहीं हो सकता। विचार के अभाव में तो कर्म ही संभव नहीं। जैसे विचार या भाव वैसा मनुष्य अतः मनुष्य को कर्मशील बने रहने के लिए तथा सही दिशा में अग्रसर होने के लिए अच्छे विचारों से ओतप्रोत होना चाहिए। मनुष्य नकारात्मक विचारों या भावों के वशीभूत होकर ही ग़लत कार्य करता है अतः विचारों पर नियंत्रण अनिवार्य है और विचारों पर नियंत्रण के लिए अनिवार्य है मन की निर्मलता।

जिस प्रकार पानी को सड़ने से रोकने के लिए पानी में पनपने वाले घातक बैक्टीरिया को रोकने के लिए उसमें उपयोगी बैक्टीरिया की उपस्थिति अनिवार्य है उसी प्रकार मन में भावों के प्रदूषण को रोकने के लिए सकारात्मक विचारों के निरंतर प्रवाह की भी आवश्यकता है। जब भी कोई नकारात्मक विचार उत्पन्न हो सकारात्मक विचार द्वारा उसे समाप्त कर दीजिए। सकारात्मक विचार रूपी बैक्टीरिया द्वारा ही हम अपने मन को निर्मल कर सकते हैं और मन की निर्मलता का अर्थ है मन में राग-द्वेष् आदि परस्पर विरोधी भावों व विकारों की समाप्ति द्वारा समता की स्थापना।

जब व्यक्ति समता में स्थित हो जाता है तो द्वंद्व की भी समाप्ति हो जाती है और द्वंद्व की समाप्ति ही वास्तविक उपचार है। सकारात्मक विचारों के निरंतर प्रवाह द्वारा न केवल शारीरिक व्याधियों का उपचार संभव है अपितु स्वयं के वास्तविक स्वरूप अथवा चेतना से एकाकार होना भी संभव है। स्वयं के वास्तविक स्वरूप अथवा चेतना से एकाकार होने का अर्थ ही है अपने अंदर के ईश्वर की खोज। मन की निर्मलता के बाद ईश्वर को खोजने की आवश्यकता ही नहीं रहती क्योंकि स्वयं ईश्वर ही पीछे-पीछे दौड़ा चला आता है अर्थात् मनुष्य के मन में आ उपस्थित होता है। यही मन की वास्तविक निर्मलता है।

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संपर्क:

 

सीताराम गुप्ता

ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,

दिल्ली-110034

फोन नं. 011-27313954@27313679

Email: srgupta54@yahoo.com

साभार ः द स्पीकिंग ट्री नवभारत टाइम्स, नई दिल्ली,

दिनाँकः जून 23, 2008

kranti yagya 

पुस्तक : क्रान्ति यज्ञ (1857-1947 की गाथा)

 

-समीक्षक : गोवर्धन यादव

 

राष्ट्रीय अस्मिता के रेखांकन का सार्थक प्रयास है ‘‘क्रान्ति-यज्ञ‘‘

स्वतंत्रता और स्वाधीनता प्राणिमात्र का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसी से आत्मसम्मान और आत्मउत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। भारतीय राष्ट्रीयता को दीर्घावधि विदेशी शासन और सत्ता की कुटिल-उपनिवेशवादी नीतियों के चलते परतंत्रता का दंश झेलने को मजबूर होना पड़ा और जब इस क्रूरतम कृत्यों से भरी अपमानजनक स्थिति की चरम सीमा हो गई तब जनमानस उद्वेलित हो उठा था। अपनी राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पराधीनता से मुक्ति के लिए सन् 1857 से सन् 1947 तक दीर्घावधि क्रान्तियज्ञ की बलिवेदी पर अनेक राष्ट्रभक्तों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। इसी ‘क्रान्ति यज्ञ‘ की गौरवगाथा जनमानस में साहित्य और साहित्येतिहास में अंकित है। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी एवं युवा साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव व युवा लेखिका आकांक्षा यादव द्वारा सुसम्पादित पुस्तक ‘‘क्रान्ति यज्ञ ः 1857-1947 की गाथा‘‘ में भारतीय स्वाधीनता संग्राम की अमर बलिदानी गौरव गाथाओं एवं इनके विभिन्न पहलुओं को विविध जीवन क्षेत्रों से संकलित करके ऐतिहासिक शोधग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया है। इस प्रस्तुति में भारतीय स्वाधीनता संग्राम के ज्ञात व अज्ञात अमर शहीदों और सेनानियों को विस्तृत राष्ट्रीय अस्मिता के भावपूर्ण परिवेश में अंकित करने का सार्थक प्रयास किया गया है, जो अपने राष्ट्रीय जीवन के आदर्शमय संदेशों से परिपूर्ण है। अपनी सम्पादकीय में कृष्ण कुमार यादव ने स्वयं कहा है कि- ‘‘भारत का स्वाधीनता संग्राम एक ऐसा आन्दोलन था जो अपने आप में एक महाकाव्य है। लगभग एक शताब्दी तक चले इस आन्दोलन ने भारतीय राष्ट्रीयता की अवधारणा से संगठित हुए लोगों को एकजुट किया। यह आन्दोलन किसी एक धारा का पर्याय नहीं था बल्कि इसमें सामाजिक- धार्मिक-सुधारक, राष्ट्रवादी साहित्यकार, पत्रकार, क्रान्तिकारी, कांग्रेसी, गाँधीवादी इत्यादि सभी किसी न किसी रूप में सक्रिय थे।‘‘ इन्ही विचारों को प्रामाणिकता प्रदान करते हुए इस शोध साहित्य में उन सभी विचारकों, चिन्तकों इतिहासकारों और अमर बलिदानी क्रान्तिकारी शहीदों से जुड़े एवं उनकी लेखनी से निकले ऐतिहासिक दस्तावेजों का संकलन किया गया है।

‘‘क्रान्ति यज्ञ ः 1857-1947 की गाथा‘‘‘ में जिन लेखों को संकलित किया गया है, उन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है। प्रथम भाग 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम की पृष्ठभूमि, क्रान्ति की तीव्रता और क्रान्ति के नायकों पर केन्द्रित है, तो दूसरे भाग में 1857 की क्रान्ति के परवर्ती आन्दोलनों और नायकों का चित्रण है। प्रथम स्वाधीनता संग्राम पर स्वयं सम्पादक कृष्ण कुमार यादव का लिखा हुआ लेख ‘1857 की क्रान्ति ः पृष्ठभूमि और विस्तार‘ सर्वाधिक उल्लेखनीय है। इस आलेख में तत्कालीन ईस्ट इण्डिया कम्पनी की शोषण नीति और भारतीयों के प्रति उनकी क्रूरता को 1857 की क्रान्ति का प्रमुख कारण माना गया है। इसके अलावा भारतीय परम्पराओं और धार्मिक मान्यताओं को कुचल कर ईसाई धर्म के विस्तार की नीति को भी क्रान्ति उपजने का कारण माना गया है। घटनाओं का तर्कसंगत विश्लेषण करते हुए विद्वान लेखक ने उस क्रान्ति को मात्र ‘सिपाहियों का विद्रोह‘ अथवा ‘सामन्ती विरोध‘ के अंग्रेज इतिहासकारों के झूठे प्रचार का खण्डन भी किया है। कृष्ण कुमार ने बड़े नायाब तरीके से अंकित किया है कि 1857 की क्रान्ति को कुछ इतिहासकारों ने महास्वप्न की शोकान्तिका भले ही कहा हो, पर इस गर्वीले उपक्रम के फलस्वरूप ही भारत का नायाब मोती ईस्ट इण्डिया कम्पनी के हाथों से निकल गया और जल्द ही कम्पनी भंग हो गई।

पं0 जवाहर लाल नेहरू की पुस्तक ‘भारत की खोज‘ से उद्धृत ऐतिहासिक आलेख ‘1857ः आजादी की पहली अंगड़ाई‘ इस संग्रह का महत्वपूर्ण आलेख है, जिसमें विश्व इतिहास की झलक के साथ तत्कालीन राष्ट्रीय विचारधाराओं व उनके प्रभावों का सांस्कृतिक और सामाजिक पक्ष उजागर हुआ है। इसमें भारत के प्रथम प्रधानमंत्री ने उन सभी पक्षों का वर्णन किया है, जो जनमानस में ब्रिटिश शासन के विरूद्ध उपजे आक्रोश का कारण थे। संग्रह में एक और महत्वपूर्ण आलेख डाॅ0 रामविलास शर्मा का ‘1857 की राज्य क्रान्तिःइतिहासकारों का दृष्टिकोण‘ है। 1857 की क्रान्ति का अध्ययन करने के लिए श्री शर्मा ने इतिहासकार श्री मजूमदार, श्री सेन और श्री जोशी के लेखों का विश्लेषण किया है। माक्र्सवादी दृष्टिकोण और पद्धति को स्वीकार करने वाले इतिहासकारों ने ब्रिटिश सत्ता का पक्ष लिया है। डाॅ0 शर्मा ने ऐसे तथ्यों का तर्कसंगत खण्डन किया है।

‘स्त्रियों की दुनियां घर के भीतर है, शासन-सूत्र का सहज स्वामी तो पुरूष ही है‘ अथवा ‘शासन व समर से स्त्रियों का सरोकार नहीं‘ जैसी तमाम पुरूषवादी स्थापनाओं को ध्वस्त करता आकांक्षा यादव का लेख ‘वीरांगनाओं ने भी जगाई स्वाधीनता की अलख‘ स्वातंत्र्य समर में महिलाओं की प्रभावी भूमिका को करीने से प्रस्तुत करता है। इनमें से कई वीरांगनाओं का जिक्र तो इतिहास के पन्नों में मिलता है, पर कई वीरांगनाओं की महिमा अतीत के पन्नों में ही दबकर रह गयी। इसी क्रम में आशारानी व्होरा द्वारा प्रस्तुत ‘प्रथम क्रान्तिकारी शहीद किशोरीःप्रीतिलता वादेदार‘ एवं स्वतंत्रता सेनानी युवतियों में सर्वाधिक लम्बी जेल सजा भुगतने वाली नागालैण्ड की रानी गिडालू के सम्बन्ध में लेख भी महत्वपूर्ण हैं। आजाद हिन्द फौज में लेफ्टिनेन्ट रहीं मानवती आय्र्या का मानना है कि भारत अपनी सज्जनता के व्यवहार के कारण साम्राज्यवादी अंग्रेजों की कूटनीतिक चालों व हिंसावादी गतिविधियों का शिकार बना था। अपने लेख ‘‘भारतीय स्वतंत्रता की दो सशस्त्र क्रान्तियाँ‘‘ में वे 1857 की क्रान्ति व आजाद हिन्द फौज की लड़ाई को भारत की आजादी के प्रमुख आधार स्तम्भ के रूप में चिन्हित करती हैं।

1857 की क्रान्ति का इतिहास मंगल पाण्डे, बहादुर शाह जफर, तात्या टोपे, नाना साहब, अजीमुल्ला खान, मौलवी अहमदुल्ला शाह, कुँवर सिंह, रानी लक्ष्मीबाई जैसे क्रान्तिधर्मियों के बिना अधूरा है। विद्वान लेखक श्री राम शिव मूर्ति यादव ने 1857 की क्रान्ति का प्रथम शहीद मंगल पाण्डे को मानते हुए जो तथ्य प्रस्तुत किये हैं वह अंग्रेजों की बर्बरता-तानाशाही और निरंकुशता का पर्दाफाश करने वाले-प्रामाणिक-कानूनी-पहलू को उजागर करते हैं। जबलपुर के सेना आयुध कोर के संग्रहालय में रखे मंगल पाण्डे के फांसीनामा का हिन्दी अनुवाद इस लेख की विशिष्टता है। विजय नारायण तिवारी द्वारा अतीत के पन्नों से उद्धृत ‘‘बहादुरशाह जफर का ऐतिहासिक घोषणा पत्र‘‘ सांस्कृतिक और सामाजिक समरसता को आधार देता, सभी भारतीयों को संगठित होकर आतातायी के विरूद्ध आन्दोलित होने का निमंत्रण पत्र है। गुरिल्ला युद्ध में माहिर तात्या टोपे के सम्बन्ध में दिनेश बिहारी त्रिवेदी का लेख कई पहलुओं की पड़ताल करता है। अंग्रेजों ने ऐसे क्रान्तिधर्मी के लिए गलत नहीं लिखा था कि- ‘‘यदि उस समय भारत में आधा दर्जन भी तात्या टोपे सरीखे सेनापति होते तो ब्रिटिश सेनाओं की हार तय थी।‘‘ एक हाथ में कलम, दूजे में तलवार लेकर अवध क्षेत्र में क्रान्ति की अलख जगाने वाले विलक्षण वैरागी मौलवी अहमदुल्ला शाह ने क्रान्ति का अनूठा अध्याय रचा। कुमार नरेन्द्र सिंह द्वारा उन पर प्रस्तुत आलेख वर्तमान परिवेश में हर घटना को साम्प्रदायिक नजर से देखने वालों के लिए एक सबक है।

1857 की क्रान्ति का विश्लेषण संचार-तंत्र की भूमिका के बिना नहीं किया जा सकता। 1857 में हरकारों ने क्रान्तिकारियों को जबकि तार ने अंग्रेजों को जो मदद दी, उसने मोटे तौर पर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की जय-पराजय का लेखा-जोखा लिख दिया। अरविन्द सिंह ने ‘‘1857 और संचार तंत्र‘‘ में इन भावनाओं को बखूबी व्यक्त किया है। जैसे-जैसे लोगों में स्वाधीनता की अकुलाहट बढ़ती गयी, वैसे-वैसे अंग्रेजों ने स्वाधीनता की आकांक्षा का दमन करने के लिए तमाम रास्ते अख्तियार किये, जिनमें सबसे भयानक कालापानी की सजा थी। कृष्ण कुमार यादव का लेख ‘‘क्रान्तिकारियों के बलिदान की साक्षीः सेल्युलर जेल‘‘ मानवता के विरूद्ध अंग्रेजों के कुकृत्यों का अमानवीय पक्ष स्पष्ट करता है। इसमें कालापानी की सजा का आतंकित करने वाला सत्य और उससे संघर्ष करते क्रान्तिकारियों की वीरता-धीरता और राष्ट्रहित के लिए स्वतंत्रता की बलिबेदी पर कुर्बान हो जाने की अदम्य लालसा का आत्मोत्सर्गपरक वर्णन प्रेरक शब्दावली में व्यक्त किया गया है। वीर सावरकर की आत्मकथा से उद्धृत कालापानी की यातना का वर्णन तो रोंगटे खड़ा कर देता है।

1857 की क्रान्ति के जय-पराजय की अपनी मान्यतायें हैं। पर इसमें कोई शक नहीं कि 1947 की आजादी की पृष्ठभूमि 1857 में ही तैयार हो गई थी। यहाँ तक की फ्रांसीसी प्रेस ने भी 1857 को गम्भीरता से लिया था। स्वतंत्रता किसी एक व्यक्ति, जाति, धर्म या प्रान्त की मोहताज नहीं है बल्कि यह सबके सम्मिलित प्रयासों से ही प्राप्त हुई। ‘‘क्रान्ति यज्ञ‘‘ पुस्तक में डा0 एस0एल0 नागौरी ने स्वतंत्रता में जैनों के योगदान, डा0 एम0 शेषन ने तमिलनाडु के योगदान, के0 नाथ ने दलितों-पिछड़ों के योगदान को चिन्हित किया है। कहते है कि इतिहास उन्हीं का होता है, जो सत्ता में होते हैं पर सत्तासीन लोग यह भूल जाते हैं कि इतिहास अपनी गाथा खुद कहता है। यह सिर्फ पन्नों पर ही नहीं बल्कि लोकमानस के कंठ में, गीतों और किंवदंतियों इत्यादि के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होता रहता है। ऐतिहासिक घटनाओं के सार्थक विश्लेषण हेतु लोकेतिहास को भी समेटना जरूरी है। डा0 सुमन राजे ने अपने लेख ‘‘लोकेतिहास और 1857 की जन-क्रान्ति‘‘ में इसे दर्शाने का गम्भीर प्रयास किया है। भारतीय स्वाधीनता का संग्राम सिर्फ व्यक्तियों द्वारा नहीं लड़ा गया बल्कि कवियों और लोक गायकों ने भी लोगों को प्रेरित करने में प्रमुख भूमिका निभायी। इसी कड़ी में युवा लेखिका आकांक्षा यादव के लेख ‘‘लोक काव्य में स्वाधीनता‘‘ में 1857-1947 की स्वातंत्र्य गाथा का अनहद नाद सुनाई पड़ता है।

साहित्य का उद्देश्य है सामाजिक रूपान्तरण। यह अनायास ही नहीं है कि तमाम क्रान्तिकारी व नेतृत्वकर्ता अच्छे साहित्यकार व पत्रकार भी रहे है। वस्तुतः क्रान्ति में कूदने वाले युवक भावावेश मात्र से संचालित नहीं थे, बल्कि सुशिक्षित व विचार सम्पन्न थे। विचार-साहित्य-क्रान्ति का यह बेजोड़ संतुलन रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह, अशफाकउल्ला खान, शचीन्द्र नाथ सान्याल, भगत सिंह, बाल गंगाधर तिलक इत्यादि जैसे तमाम क्रान्तिकारियों में महसूस किया जा सकता है। डा0 सूर्य प्रसाद दीक्षित ने ‘‘क्रान्तिकारी आन्दोलन और साहित्य रचना‘‘ में क्रान्ति की मशाल को जलाये रखने में लेखनी के योगदान पर खूबसूरत रूप में प्रकाश डाला है। कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी द्वारा प्रकाशित ‘‘प्रताप‘‘ अखबार की भूमिका स्वतंत्रता के आन्दोलन को गति देने में रही है। इस राष्ट्रीय अस्मिता के संरक्षक पत्र को तथा उसके यशस्वी देशभक्त संपादक को महत्व देकर सम्मान प्रदान करना अपनी साहित्यिक विरासत को सम्मान देना है। डा0 रमेश वर्मा द्वारा प्रस्तुत लेख ‘स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास में प्रताप की भूमिका‘ को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। यह साहित्यिक क्रान्ति का ही कमाल था कि अंग्रेजों ने अनेक पुस्तकों और गीतों को प्रतिबन्धित कर दिया था। मदनलाल वर्मा ‘कांत‘ ने इन दुर्लभ साहित्यिक रचनाओं को अनेक विस्मृत आख्यानों और पन्नों से ढँूढ़ निकाला है और ‘‘प्रतिबन्धित क्रान्तिकारी साहित्य‘‘ में ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त की गयी पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं पर सूचनात्मक ढंग में महत्वपूर्ण लेख लिखा है।

1857 की क्रान्ति के 150 वर्ष पूरे होने के साथ-साथ 2007 का महत्व इसलिए भी और बढ़ जाता है कि यह सरदार भगत सिंह, सुखदेव और दुर्गा देवी वोहरा का जन्म शताब्दी वर्ष है। योग्य सम्पादक द्वय कृष्ण कुमार और आकांक्षा यादव की यह खूबी ही कही जायेगी कि इस तथ्य को विस्मृत करने की बजाय उनके योगदान को भी क्रान्ति यज्ञ में उन्होंने रेखांकित किया। भगत सिंह पर उनके क्रान्तिकारी साथी शिव वर्मा द्वारा लिखा संस्मरणात्मक आलेख इस पुस्तक को महत्वपूर्ण बनाती है तो ‘पहला गिरमिटिया‘ से चर्चित गिरिराज किशोर ने ‘‘जब भगत सिंह ने हिन्दी का नारा बुलन्द किया‘‘ में एक नये संदर्भ में भगत सिंह को प्रस्तुत किया है। कोई भी देश अपनी भाषा और साहित्य के बिना अपनी पहचान नहीं बना सकता और भारतीय संदर्भ में हिन्दी को प्रतिष्ठित करने की भगत सिंह की स्वर्णिम कल्पना वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पुनः प्रासंगिक है। भगत सिंह भावावेश होने की बजाय तार्किक ढंग से अपनी बात कहना पसन्द करते थे। यतीन्द्र नाथ दास की शहादत के बाद ‘माडर्न रिव्यू‘ के सम्पादक द्वारा ‘इन्कलाब जिन्दाबाद‘ नारे की सम्पादकीय आलोचना के प्रत्युत्तर में भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त द्वारा लिखा गया ऐतिहासिक पत्र ‘‘क्रान्ति यज्ञ‘‘ पुस्तक में समाहित है। इस पत्र में क्रान्ति शब्द का अर्थ ‘प्रगति के लिए परिर्वतन की भावना एवं आकांक्षा‘ व्यक्त किया गया था। क्रान्तिकारी सुखदेव पर सत्यकाम पहारिया का लेख और दुर्गा देवी वोहरा पर आकांक्षा यादव का लेख उनके विस्तृत जीवन पर प्रकाश डालते हैं। आकांक्षा यादव ने इस तथ्य को भी उदधृत किया है कि एक ही वर्ष की विभिन्न तिथियों में जन्मतिथि पड़ने के बावजूद भगतसिंह अपना जन्मदिन दुर्गा देवी के जन्मदिन पर उन्हीं के साथ मनाते थे और उनके पति भगवतीचरण वोहरा सहित तमाम क्रान्तिकारी इस अवसर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे।

‘‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा‘‘ की भावना को आत्मसात करते हुए अमित कुमार यादव ने ‘स्वतंत्रता संघर्ष और क्रान्तिकारी आन्दोलन‘ के माध्यम से क्रान्तिकारी गतिविधियों को बखूबी संजोया है तो सत्यकाम पहारिया ने स्वाधीनता में योगदान देने वाले तमाम मनीषियों व क्रान्तिकारियों की भूमिकाओं को सहेजा है। क्रान्तिकारी मन्मथनाथ गुप्त की कलम से अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला देनी वाले ‘काकोरी काण्ड का सच‘ युवा पीढ़ी का ध्यान आकृष्ट करता है। चन्द्रशेखर आजाद क्रान्तिकारी आन्दोलन में प्रमुख स्तम्भ थे। क्रान्तिकारी रामकृष्ण खत्री का उन पर लिखा संस्मरणात्मक आलेख कई छुये-अनछुये पहलुओं की पड़ताल करता है। आजाद के माउजर पिस्तौल की रोचक दास्तां भी ‘क्रान्ति-यज्ञ‘ में शामिल है। राम प्रसाद बिस्मिल की 110वीं जयन्ती पर संकलित लेख ‘कलम और रिवाल्वर पर बिस्मिल की समान जादूगरी‘ प्रेरणास्पद है। स्वाधीनता आन्दोलन में स्वराज्य, स्वदेशी व वहिष्कार की भूमिका पर अलगू राय शास्त्री का लेख उस समय की भावनाओं को खूबसूरती से अभिव्यक्त करता है तो डा0 बद्रीनारायण तिवारी का चेतावनी भरा आलेख स्वाधीनता संग्राम की बलिदानी भावना को सहेजने और उसे बनाये रखने का संदेश देता है।

स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास महात्मा गाँधी के बिना अधूरा है। संयुक्त राष्ट्र संघ वर्ष 2007 से ‘गाँधी जयन्ती‘ को ‘विश्व अहिंसा दिवस‘ के रूप में मनाये जाने की घोषणा करके शान्ति व अहिंसा के पुजारी महात्मा गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता को एक बार पुनः सिद्ध कर दिया है। ऐसे में कृष्ण कुमार यादव का लेख ‘समग्र विश्वधारा में व्याप्त हैं महात्मा गाँधी‘ वर्तमान परिप्रेक्ष्य में काफी प्रासंगिक है। कानपुर 1857 की क्रान्ति और उसके पश्चात भी गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र रहा है। नाना साहब, तात्या टोपे व अजीमुल्ला खां ने यहीं से सारे देश में क्रान्ति की अलख जगाई तो कालान्तर में भगत सिंह व ‘आजाद‘ जैसे तमाम क्रान्तिकारियों हेतु यह धरती प्रेरणा-बिन्दु बनी। ऐसे में ‘जंग-ए-आजादी कानपुर‘ लेख कई महत्वपूर्ण घटनाओं को सामने लाता है। गणेश शंकर विद्यार्थी की सुपौत्री डाॅ0 मधुलेखा विद्यार्थी ने भी स्वाधीनता संग्राम में कानपुर की भूमिका पर विस्तृत प्रकाश डाला है।

‘‘क्रान्ति-यज्ञ‘‘ के विशेषता सिर्फ यह नहीं है कि इसमें स्वाधीनता संग्राम से जुड़े हर पहलू को छूने की कोशिश की गयी है बल्कि इसमें अजीमुल्ला खां द्वारा रचित ‘1857 का महाप्रयाण गीत‘, राष्ट्रगीत ‘वन्देमातरम्‘, पार्षद जी द्वारा रचित ‘झण्डा गीत‘, क्रान्तिकारियों की गीताः1857-द वार आफ इंडिपेन्डेन्स एवं भारत-भ्रमण पर निकली ‘आजादी एक्सप्रेस‘ जैसी रोचक बातों को शामिल कर इसे जीवन्त व समसामयिक बनाया गया है। आवरण पृष्ठ पर मशाल, तोप व ढाल के साथ आजादी की लड़ाई को धार देने वाले महापुरूषों के चित्रों का अंकन इस पुस्तक को और भी खूबसूरत बनता है।

विश्व साहित्य में राष्ट्रीय भावना का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। राष्ट्रीय और क्रान्तिकारी साहित्य ने भारतवर्ष की जीवन गति को भी क्रान्तिदर्शी भूमिका प्रदान करने में योगदान दिया है। हमें अपने राष्ट्रभक्त क्रान्तिकारियों के प्रति कृतज्ञ होना ही चाहिए। कृष्ण कुमार और आकांक्षा यादव ने अपने अनेक साहित्यिक आलेखों में सामाजिक शुचिता के जीवन्त बिम्ब प्रस्तुत किये हैं। उन्होंने साहित्यिक सन्दर्भों में सामाजिक प्रगति के अनेक नूतन आयाम स्थापित करने वाले आलेख लिखे हैं तो और बालमन के निकट आदर्श प्रस्तुत करने वाले प्रेरक सृजन को भी अपनी साहित्यिक प्रतिभा से अभिव्यक्ति प्रदान करने में सफलता पाई है। इसी गति को आगे बढ़ाते हुए उनका प्रस्तुत संकलन ‘क्रान्ति यज्ञ‘ अपनी अस्मिता का आदर्श संरक्षक बना है। निःसन्देह यह संकलन लेखकीय कर्तव्य का ही प्रतिपालन है। इससे अतीत और वर्तमान की जो भूली-बिसरी विरासत थी वह समाज के सामने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और राष्ट्रीय स्तर पर आदर्शोन्मुख होकर प्रस्तुत हो सकी है। हमारी वर्तमान पीढ़ी और आने वाले समय और समाज के लिए यह पुस्तक स्वाभिमान का, मानवीय गुणों का और राष्ट्रप्रेम का अनुपम पथ प्रशस्त करने वाली, संदर्शिका बनेगी तथा इसके सन्दर्भों से शोध और चिंतनपरक साहित्य को उत्कृष्ट सन्दर्भ प्राप्त हो सकेंगे। ‘‘क्रान्ति यज्ञ‘‘ पुस्तक वस्तुतः अपनी राष्ट्रीय अस्मिता का ही दर्शन है।

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समीक्ष्य पुस्तक ः क्रान्ति-यज्ञ (1857-1947 की गाथा)

सम्पादकद्वय ः कृष्ण कुमार यादव, भारतीय डाक सेवा, वरिष्ठ डाक अधीक्षक, कानपुर kkyadav.y@ rediffmail. com

आकांक्षा यादव, प्रवक्ता, राजकीय बालिका इण्टर कालेज, कानपुर kk_akanksha@yahoo.com

प्रकाशक ः मानस संगम, प्रयाग नारायण शिवाला, कानपुर

समीक्षक ः गोवर्धन यादव, 103, कावेरी नगर, छिन्दवाड़ा, मध्य प्रदेश

पृष्ठ संख्या ः 124,

मूल्य ः रू0 125

हास्य-ग़ज़ल

 

-कुणाल

 

(मूल प्रकाशित रचना फ़ालतू की लाइनें यहाँ पढ़ें)

 

तुम भी तो कोडिंग किये जा रहे हो, हम भी ये कोडिंग किये जा रहे हैं,
ज़हन में दोनों के खयाल है लरज़ा, क्यों बेसाख़्ता ज़िंदगी जिये जा रहे हैं ??

ये डिफेक्टों की लिस्ट में ये बगों का सामना, दोनों ही बैठे किये जा रहे हैं,
PM ही जीता है लड़ाई में आखिर, ज़ख़्म क्यों हम ही झेले जा रहे हैं ??

रहे सामने वो क्लायंट की हाज़िरी में, हम ही क्यों पर्दे के पीछे जा रहे हैं !!
c.e.o. के ethics किसी ने न देखे, हमें ही सारी ट्रेनिंग दिये जा रहे हैं !!

HR यहां है, Manager वहां है, हमारे सिवा क्या मैनेज किये जा रहे हैं ??
ब्रेक-डाउन में सैलरी के किये हैं घपले, हम हैं कि सब कुछ सहे जा रहे हैं !!!

पता है हमें भी, पता है तुम्हें भी, कि सपने कैसे कैसे बुने जा रहे हैं !!
कभी न कभी तो PM बनेंगे, अरमान यही दिल में किये जा रहे हैं !!

करेंगे वो ही जलसे, के घूमेंगे हम भी, प्लानिंग अभी से किये जा रहे हैं…
हैं हम भी ढक्कन! कि कोडिंग के बदले ये फालतू की लाईनें लिखे जा रहे हैं …

 

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- કુણાલ (Kunal)

PM = Project Manager
HR = Human Resource
Manager = HR Manager

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कुणाल की अन्य रचनाओं के लिए देखें उनका ब्लॉग - जीवन पुष्प

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गीत

- कवि कुलवंत सिंह

 

अभिलाषा

बन दीपक मैं ज्योति जगाऊँ

अंधेरों को दूर भगाऊँ,

दे दो दाता मुझको शक्ति

शैतानों को मार गिराऊँ ।

 

बन पराग कण फूल खिलाऊँ

सबके जीवन को महकाऊँ,

दे दो दाता मुझको भक्ति

तेरे नाम का रस बरसाऊँ ।

 

बन मुस्कान हंसी सजाऊँ

सबके अधरों पर बस जाऊँ,

दे दो दाता मुझको करुणा

पाषाण हृदय मैं पिघलाऊँ ।

 

बन कंपन मैं उर धड़काऊँ

जीवन सबका मधुर बनाऊँ,

दे दो दाता मुझको प्रीति

जग में अपनापन बिखराऊँ ।

 

बन चेतन मैं जड़ता मिटाऊँ

मानव मन मैं मृदुल बनाऊँ,

दे दो दाता मुझको दीप्ति

जगमग जगमग जग हर्षाऊँ ।

 

 

आओ दीप जलाएँ

आओ खुशी बिखराएँ छाया जहां गम है ।

आओ दीप जलाएँ गहराया जहाँ तम है ॥

 

एक किरण भी ज्योति की

आशा जगाती मन में;

एक हाथ भी कांधे पर

पुलक जगाती तन में;

आओ तान छेड़ें, खोया जहाँ सरगम है।

आओ दीप जलाएँ गहराया जहाँ तम है ॥

 

एक मुस्कान भी निश्छल

जीवन को देती संबल;

प्रभु पाने की चाहत

निर्बल में भर देती बल;

आओ हंसी बसाएँ, हुई आँखे जहां नम हैं।

आओ दीप जलाएँ गहराया जहाँ तम है ॥

 

स्नेह मिले जो अपनो का

जीवन बन जाता गीत;

प्यार से मीठी बोली

दुश्मन को बना दे मीत;

निर्भय करें जीवन जहाँ मनु गया सहम है।

आओ दीप जलाएँ गहराया जहाँ तम है ॥

 

कवि कुलवंत सिंह

दो कविताएं Two Poems by Prabha Mujumdar

sanja 1

-प्रभा मुजुमदार

1

समुन्दर की

उफनती लहरों ने

मन के अनजान द्वीपों को

जहां बसती थी

सुप्त आकांक्षाएं

काल और सीमाओं से

अपरिचित, अपरिभाषित

जिंदगी की

आपाधापी से बेखबर

पिछड़ी हुई

पत्थर युगीन बस्तियां

आदिम और अभावग्रस्त

फिर भी

निजता के आग्रह

और अहंकार से ग्रस्त

छोटे छोटे बिन्दु

अपनी शर्तों पर

समॄद्धि का समुद्र

जगने नहीं देगा

अछूते और एकाकी

बिंदुओं जैसे द्वीप

विश्व विजय को आतुर

अश्वमेघ का कुचक्र

बीती सभ्यताओं के

भग्नावशेषों को

मिटा देने को बेताब

एकान्त और अप्रासंगिक

पिछड़े और पराजित

होने की व्यथा

इतिहास के लंबे दौर में

जीने के बावजूद,

विशाल भूखंड से

छितर बिखर कर

निर्वासित एकाकी द्वीप

सत्ता की उद्दाम लहरों के बीच

कब तक रह सकते हैं

नक्शे पर

आकार बचा कर ।

2

समुद्र कोई भी हो

भूखंडों को

निगल जाना चाहता है

उन्हीं भूखंडों को

जहां जगते हैं सपने

वर्तमान और अतीत भी

गरजती | फुफकारती लहरों में

डुबो देना चाहता है

बालू के घरौंदे

इरादों की चट्टानें

स्मॄतियों के चिन्ह

समुद्र सब कुछ

समेट लेना चाहता है

अपने तल में

आकाश के

अपरिमित विस्तार के नीचे

किनारों को तोड़, देने के लिये

व्याकुल

गरजता है समुद्र

अथाह गहराई में

अनमोल संपदा संजोये

लहरों के उछाल के साथ

आकाश को भी

छू लेना चाहता है

विश्व विजय के लिये

अश्वमेघ को निकले

किसी आक्रामक | महत्वाकांक्षी

सम्राट की तरह

धरती और आकाश के बीच

लहराता है समुद्र ।

नेताजी कहिन

 

-मनोहर श्याम जोशी

 

ब्रेकफास्ट के साथ नेताजी ने लठ-मार डिप्लोमेसी शुरू की। मक्खन और जैम दोनों से लिपे हुए एक टोस्ट को मुँह में पूरा-का-पूरा धकिया लेने और चबाने लगने के बाद उन्होने शहरी बाबू किस्म के एकमात्र 'डिसिडेण्ट' से पूछा, "चिठिया पठाइ आये, लेबर लीडर आसूतोस बाबू ? लयटर डिल्विर एट पी एम. कि नाट?"

"टुमारो। काल का टाइम दिया हाय।"

"टुमारो का एइसा हय," नेताजी ने कहा, "ससुर आता नहीं कभी। इंगलिस का टाप पोयट शक्कूपीर कुछ कहि गया हय टुमारो की बाबत। क्या कहि गया हय कक्का जरा बताया जाय आसूतोस बाबू को।"

आशुतोष बाबू ने तुनुककर सूचना दी कि शेक्सपियर की वह पंक्ति उन्हें भी याद है। उन्होंने जानना चाहा कि नेताजी सी.एम. की ओर से कोई "सालिड प्रपोजल' लाये हैं कि नहीं ?"

"अरे यह कोई चउधरी चरनसिंह राजनारायन वाली राजनीत हय कि प्रपोजल लाते ! डिसपोजल का खेल हय यह तो।"

"ठीके बा, सी. यमो डिसपोज हुइ जाइ।" एक थुलथुले विरोधी ने हँसकर कहा। नेताजी ने ठहाका बलन्द किया। फिर थुलथुले की तोंद को तर्जनी से कोंचते हुए कहा, "हमार सी. यम जब गिरी कूढ़ादान मा, तब तोहरे टाइप के लायल इलिमण्ट पहिले गिराय के गिरी। जमाना भर का भ्रस्ट आचार अउर आहार भकोंसी एइसन तोंदन का गद्दा रही तो सी.यम के गिरे पर जियादा चोट न आयी। बोलो रामसुख बाबू के तोंद के जै।"

नेता बिरादरी के सदस्य इस फब्ती पर अपनी-अपनी श्रद्धा के अनुसार हुचहुचाये, हिनहिनाये अथवा जी खोलकर हँसे । फिर नेताजी ने आशुतोष बाबू के कन्धे पर धौल जमाया और कहा, "बहुत स्रम किया हय स्रमिक नेता आसतोस चिठिया ड्राफ्ट करे में। यही न हय डस-डण्ट का अस्पेलिंग जानने वाला डस-डण्ट। बाकी इनके प्रेरना-स्रोत केन्द्री मन्त्रीजी के लिए तो वही बिलैक लय-टर इज इकुअल टू बफैलो हय। का लिखे हो चिठिया में पी.यम के नाम ?" "शे तो सीक्रेट। काल पी.यम को देगा लैटर, तारपोर डिसाइड करेगा प्रेस को दे या न दे। अभी यही कि कारप्शन चार्जेज हय सीरियस सी.एम का खिलाफ आउर अमार नाइण्टी एट एम.एल.ए साइन किया हाय दिस लेटर रिक्वेस्टिंग सी. एम का रिमूवल।" "एक यतीम यम यले.अउर पकड़ लिया होता, निनानबे का फेर हुई जाता पूरा।"

नेताजी हिनहिनाये, "बाकी सिक्रेट विक्रेट कुच्छ नही। सी.यम के खिलाफ पी.यम को क्या लिखा जाय इसका हमरे सास्त्रों में विधान हय। कोई सी.यम हो कोई पी.यम, लयटर का ड्राफ्ट एकहि होता हय-अस्टण्ड-अर्ड। पहिला पाइण्ट : सी.यम अपना भाई-भतीजा को आगे बढ़ा रहा हय, जातवाद फइला रहा हय। दुसरा पाइण्ट : पइसा खा गया-अलां घोटाला, फलां घोटाला। तीसरा पाइण्ट: ला एण्ड आडर का बुरा हाल हय-अलां काण्ड फलां काण्ड। चउथा पाइण्ट: बायलेक्सन डिफीट-सी.यम की गलत नीत के कारन अलां बायलेक्सन में हमारा लीड कम हुआ अउर फलां बायलेक्सन में हमें डिफीट मिला। चउथे से पाँचवाँ पाइण्ट आपने कोई लिखा हो तो बताएँ ! होइए नहीं सकता पाँचवाँ पाइण्ट। अच्छा, अब जरा हर पाइण्ट का तोड़ सुन लिया जाय, पाइण्ट-बाइ-पाइण्ट। अपना भाई-भतीजा का नही करे आपके भाई-भतीजा का करे तो भी होगा भाई-भतीजावादे ना ? यह कहाँ लिखा हय कि अपना भाई-भतीजा जोग्य हो तो उसे इस आधार पर कण्डम कर दो कि अपना भाई-भतीजा हय। जिसका भाई-भतीजा होना ही किसी को कण्डम बना दे,वह ससुर खुद कितना कण्डम होगा !

जहाँ तक भाई-भतीजा की जोग्यता का सवाल हय, आप सरीखा पचासियो चमचा सट्टिफिकेट दिये को बइठा हय एवर-रयडी। अब लीजिए भ्रष्टाचार का पाइण्ट।" नेताजी ने झुककर सब विरोधियों के चरण छूने का अभिनय किया और कहा,"आप गुरुजन है। भ्रष्टाचार में आप जो कीर्तमान अस्थापित किये है उनके समच्छ हम का, सी.यमो नतमस्तक है। फाइलें सारी तैयार हैं। सी.यम नहीं चाहिते कि किसी गरीब का टांस्पोट का धन्धा खराब हो, किसी की नय-पाल से अस्मग्लिंग बन्द हुइ जाय, किसी का गैरकानूनी खान पकड़ में आ जाय, किसी के सहकार से निज उद्धार का भण्डाफोड़ हो, किसी का जमीने हड़पने का करतब जग-उजागर हो। तीसरा पाइण्ट ला एण्ड आडर। समझियेगा एक सांइस का बात : ला एण्ड आडर अउर मउसम ये दो किसी के बस का नहीं। मउसम ससुर एक बार बस में आ भी जाये, ला एण्ड आडर आप जइसे महानुभावों के जीते जी किसी के बस का हय नहीं। चउथा पाइण्ट बायलेक्सन डिफीट। तो आसुतोस बाबू आप समझे रहियेगा इसमें आपहि धर लिये जायेंगे।

आप कइसे लेबर लीडर बने, इधर मडण्ल दादा को आमरन अनसन की सूली पर चढ़ा के अउर उधर मानेजमण्ट से मिलकर सो ट्रेड जूनियन के इतिहास में स्वर्न अक्छरो में लिखा ही जा चुका हय। तो लेबर का ओट हमें नहीं मिल पाया इस बार। कांरिटटुअंसी के दिहाती इलाके में ओट मिला हमें, इण्डस्ट्री-एरियाज में चोट खा गये। अगर आप कहिते है कि लेबर पर होल्ड हय आपका तो मामला अउर भी संगीन हो जाता हय। आपने सेबोटाज किया होई। तनि बताया जाय-आपका लेबर लीडरी फुसफुस हय कि आप सेबोटाज किये रहे मामला?" नेताजी ने आशुतोष बाबू के कन्धे पर धौल जमाया और ठहाका बलन्द किया। नेता बिरादरी भी हँसी।

आशुतोष बाबू ने कहा, "जे आपनी कोई सालिड प्रपोजल लाये है तो ठीक। नहीं तो एइसा माफिक फालतू बकबक से तो हम लोग को कुछ असर होगी नहिं।" "अरे तो कउन आपहि की बकबक से सी.यम का बाल बाँका हुइ जायेगा। काल के जब आप हुआँ जायेगा ना दादा,तब आपका वह लयटर लयटरीन में रख दिया जायेगा !फौरिन गेस्ट लोग के लिए। अउर किस काम का हय वह ससुर। पी.यम कहीं भी डसडंस नहीं कहती, प्रयशर में परिवर्तन करना उनका सुभाव नहीं हय। अरे आप इन पत्रकारों से पूछो। बताया जाय कक्का इन्हें।"

हमारे भतीजाजी ने हमारे लिए यह भूमिका सोच रखी थी। हमने कहा,"पी.एम क्या करेंगी यह कह सकना बहुत मुश्किल है। जो भी वह करेगी अपनी मर्जी से करेगी किसी के जोर देने से नहीं।" "करेक्ट!" नेताजी ने कहा, "जो लोग यह समझे हुए है कि इंगरेजी पेपर मगजीन में उल्टा-सीधा छपवाने से सी. यम बदलवाये जा सकते है उनकी बुद्धि पर तरसे खाया जा सकता हय। क्यों कक्का, होता हय कुच्छ अखबारवालो के कहिने-लिखने से?" हम चुप रहे। भतीजाजी ने कहा, "कुछ नहीं ना।" हम अब झेंपे-झेंपे-से मुस्करा दिये।

भतीजाजी बोले, "मौन मीनिंग आइ एग्री। अउर आसुतोस बाबू आपको सी.यम का इमेज डैमेज करने के लिए यह लिखवाने की का सूझी कि पूजा करिते रहिते है। पूजा करने से इस मुल्क में इमेज बनता है, बिगड़ता नहीं। ठीक हय आप लोग उनसे मिलना चाहिते थे, आपको जवाब मिला कि पूजा में बइठे है, मुलाकात हो नहीं सकी। इसमें कउन आफत आ गयी? हम नेता फुर्सत के समय तीन में से एक जगह बइठा होता है इस देस में-पाखाने में,पिराइवेट में या पूजाघर में। फोन मिला के देख लीजिए चाहे जिसकी कोठी में। हमारे सी.यम को भगवान की दया से कब्ज की सिकायत नहीं। महरारू की सोहबत उन्होंने केन्द्री मन्त्रीजी को मुबारक कर रखी हय, इसलिए पिरइवेट में बइठने की गुंजाइस नहीं। बचा पूजाघर तो बइठते है उसमें ठाठ से। मन्त्र सिद्ध करते हैं आप जइसो को मारने का।"

नेता जी ने ठहाका बलन्द किया। नेता बिरादरी हँसी। आशुतोष बाबू ने कहा, "शे सब बेशी फनी एण्ड आल दैट लेकिन सालिड प्रपोजल नहीं होने से सीरियस नेगोशियेशंस होने नहीं सकता।" नेताजी ने उनके धौल जमाया और कहा, "दादा, तुम सालिड आदमी हय। आप लोग करप्शन चार्ज से डरते नहीं। आप लोगों सें लावल्टी की बात करना बेकार हय। आप में से किसके लिए सी.यम ने कब क्या किया यह बताना फिजूल हय। तो सुनियेगा एक ठो सालिड बात दिहाती कहावत में-हमरे सी.यम का यह कहना हय आपसे कि भाइयो मुझको साँय से फुरसत ना, आप जइसन देवर माँगे चुम्मा! तो साँय यानी केन्द्री मन्त्रीजी की कराइए छुट्टी।

अरे आप उन्हें नेता-नेता कहि रहे हैं तो बिरोधियों से कान्प्रमाइज के नाम पर सी.यम जो भी दे सकते है उन्हें देते है। आप उनसे अलग हो जाइए और सीधे खुद पा जाइए मेवा। केन्द्री मन्त्री होकर वह आपको हद-से-हद फोकट फण्ड में घुमवा सकते है यहाँ-वहाँ। राज्य में सी.यम विरोधियों को जो मन्त्रालय दे सकते थे सो केन्द्री मन्त्रीजी अपने भाई-भतीजा के नाम लिखवाय लिये है। अब एइसा हय आप कल केन्द्री मन्त्रीजी के खिलाफ अस्टेटमेण्ट दें कि डस-डंस भड़काकर राज्य में पा-रटी का इमेज चउपट करि रहे है। इसके बाद सी.यम रिस-फल करेंगे केबिनेट अउर आप लोगो के नुमाइन्दा अकमोडेट करेंगे। कहिए कइसा हय प्रपोजल ?" "करेंगे ओ सब फ्यूचर टेंस, प्रेजण्ट टेंस में बोलने से होगा।" आशुतोष बाबू ने कहा। "फूचर में सालिड प्रपोजल प्रेजेण्ट में लिक्विड कइश! " नेताजी हिनहिनाये, "साला बाबू दिया जाय। बिस-बिस हजार। आधा अभी। आधा अस्टेटमेण्ट आने पर।"

नेता बिरादरी ने भेंट में प्राप्त बटुए खोले और मुँह बनाया। रामसुख बाबू बोले, "इ का करत आहा। आधा देये का मतलब तो इ ना होय कि नोटुवे फाड़-फाड़ के आधा टुकुड़ा देय दिहा।" "जब तूँ लोग अस्टेटमेण्ट दे दइवे तब आधा टुकड़ा उहो मिल जाइ, जोड़ के काम चलाय लिहा।" इस पर ठहाका और धौल-धप्पा हुआ। होटल से लौटते हुए हमने नेताजी को अपना 'अड-टोरियल' सुनाया कि नेता बिरादरी देस को रसातल में पहुँचा रही है। नेताजी बोले, "अरे आपको गोंसाई तुलसीदास से जियादा जानकारी हय दस-काल की? वह कहि गये है कि, कलिजुग में नेता की क्वालिफिकेशन का होनी चाहिए। सुना जाय: चोर चतुर, बटमार नट, प्रभुपिय भंडुआ भण्ड। सब भच्छक परमार्थी कलि सुपन्थ पाषण्ड।"

आप समझे कि इंगरेजी में ट्रांस्लेट करें ? अउर जो आपने यह कहा कि नेता लोग लूट-खसोट न करें तो इस देस में सुअर्ग बसी जाइ, तो कक्का पहिले देस के लोगो से तनि पूछ लिया जाय कि सुअर्गवासी होना चाहिते है कि नाही ?"

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सवन हवंसिन नाइट-डे मोसन

हमारी सूरत और सीरत यों भी खासी रोनी है और जिस घड़ी हम सुबह-सुबह अखबार पढ़ चुके होते है, उस घड़ी तो कुछ न पूछिए! अब आपसे क्या छिपायें। इतने वर्ष पत्रकार रह चुकने के बाद भी समाचारों के प्रति हमारा दृष्टिकोण गुलशन नन्दा को भगवान माननेवाली किशोरी से बेहतर नहीं है।

हम पढ़ते है 'गोलीकाण्ड में चार मरे, पन्द्रह घायल' और सोचने लगते है कि वे कौन चार थे जो मरे? उनके परिवारों पर क्या बीती ? यह भी कि जिस पुलिसकर्मी की गोली से वे मरे क्या बाद में वह इस घटना के बारे में सोचते-सोचते पगला गया ? हम पढ़ते है कि अमुक नेता ने 'प्रशासन को स्वच्छ बनाने की प्रतिज्ञा की है' और उत्साहित हो उठते है। अगले दिन हम पढ़ते है कि 'उसी नेता पर करोड़ों का घोटाला करने का आरोप है' और हम गहन निराशा में डूब जाते है। लोगों को जाड़ो में शीत लहर' से, गर्मियों में 'लू से', बरसात में 'बाढ़ से' और बदलते मौसम में विषाणुजन्य किसी रहस्यमय रोग से मरते देखकर अपने अखबार में, हमारा मूड मातमी होता रहा है।

संक्षेप में यह कि हमारी सोहबत आमतौर से कभी भी और खासतौर से नगर-संस्करण-वाचन-काल में,न करने की सलाह हमारी श्रीमतीजी जैसे विशेषज्ञ देते आये है। हमारे लायक भतीजाजी उर्फ नेताजी अभी उस दिन हमारे मानस के इसी राहु-काल में प्रकट हुए। कन-सुनने कैसेट-प्लेयर से लैस। थिरकते हुए उस विशेष शैली में, जिसमें पाश्चात्य ट्विस्ट, पंजाबी भंगड़ा और हिंजड़ा-ठुमके का मिश्रण हुआ है और जिसे उत्साही बारातियों की कृपा से बहराइच से लेकर बम्बई तक राष्ट्रीय नृत्य का दर्जा मिल चुका है। इस नर्त्तन के साथ उनका गायन भी चल रहा था-कक्का हो,हो,हो। नाचते-थिरकते ही उन्होंने पायलागी की। हमने अनमना-सा आशीर्वाद दिया। अब नेताजी ने हमारे कन्धे पर धौल जमाया और कहा, "यह आपका नक्से बयासी हय ससुर ! बइठक में मार तमाम हइपी नू ईयर कहि मजाये हुए है अउर सूरत रोनी बनाये हुए है। नू ईयर नाइण्टी एट्टि टू, हवाई स्टिल वीपिंग यू ?"

नेताजी ने हैड-फोन हमारे कान की ओर बढ़ाये। 'रम्बा हो,हो,हो'-ऐसा कोई बेतुका गाना बज रहा था। हमने सुनने से इन्कार किया। नेताजी बोले, "सुना जाय। कवि हो-हो-हो वादी हय ससुर। ट्रस्टकोन पाजटिव हय उसका। गीता का सन्देस भी यहियै हय। अरे कुछ कीजिए, करने से ही होगा ना। अब अइसे ही हर करम से सरमाइएगा सरकार तब कइसन हुइयै बेड़ा पार ? फजूल की चिन्ता में घबराना ठीक नहीं। सियोर-सौट सायर कहि गया हय-सबन हवंसिन नाइट-डे मोसन, दिसौर दैट इज टु हप्पन, हवाई वरी इन अण्टस्पेसन ? मउज-मस्ती का रखा चाही मुडवा समझे कक्का। आप जो नेचरुवा बनाय लिये है अपना वह अण्टी-सोसल कहा जाता हय। अण्टी सोसल इलमेण्ट्स के साथ आप कहीं धर न लिये जायँ।" नेताजी हिनहिनाये। फिर उन्होंने तय पाया कि कक्का का मूड चैतन्यचूर्ण के अभाव में डाउन है।

उन्होंने नौकर को बुलाकर कार की चाबी दी और उसमें से ब्रीफकेस लाने को कहा। नौकर दो ब्रीफकेस लाया। नेताजी ने उनमें से एक अलग रख दिया, 'अरे यह काहे उठा लाये, इसमें सालिड माल हय ससुर !" फिर जैसे लोभ संवरण न कर पा रहे हों, उन्होंने उसी ब्रीफकेस को उठाया और खोलकर दिखाया। भीतर नोटों की गड्डियाँ भरी हुई थी। बोले, "देख लिया जाय, नाती-पोतों को बतानेवाली चीज हय कबहुँ फुरसत से बुढ़ापे में। सी.यम. के साला बाबू को पहुँचाना हय एक पा-रटी की तरफ से। अपने राम तो पोस्टाफिस है, मनीआडर यहाँ से वहाँ पहुँचा देते है। कमीशन अलबत्ता काट लेते है, दुतरफा।" फिर नेताजी ने दूसरे ब्रीफकेस में से पान मसाले का डिब्बा, तम्बाकू और चूना निकाला। चेतना की खुराक बनायी, आधी हमें खिलायी, आधी खुद खायी। फिर खाली ब्रीफकेस हमारी ओर बढ़ाते हुए बोले, "ग्रहन किया जाय। नू इयर गिफ्ट। भतीजा का उपहार अंक।" हमने कहा, "हमारे पास है।"

नेताजी बोले, "एकहि ना, अरे भतीजा के पास आपकी दया से इस समय दस ठो हय। जो आता हय ससुर एकहि-सा गिफ्ट दे जाता हय। कलेण्डर-डायरी लायवल डेढ़ दुई सउ भगत आया, फूलदान कलमदान लयवल नब्बे, एसट्रे, चाबी गुच्छा, बटुआ लयवल पिचहत्तर, नटराज के मूर्त लयवल पैतीस, लैम्प लयवल पचीस ,पारकर-शेफर पइन- सयट लयवल वाइस अउर क्रफकेस लयवल नउ। एक ससुरी कार्डनेसन कमेटी बिठानी पड़ेगी ताकि हर भगत अलग-अलग माल लाये। रख लिया जाय कक्का ई ब्रीफकेस। अरे कोई नोटुवा भरकर थोड़ो दे रहे है जो भ्रस्टाचार में सुमार हो। आपको जरूरत न हो, किसी को दे दीजियेगा - फिरी का गाहक बहूत हय इण्डया में। रामराज की परकल्पना इण्डयन हइयै यही कि हर माल मिलेगा फोकट पें !"

नेताजी हुचहुचाये और अपनी चिबुक पर बहती लार पोंछने लगे। "लोग गरीब है। अगर मुफ्त की चीज के लिए ललच जाते हो तो उसमें हँसी उड़ाने की क्या बात है।" हमने विरोध किया। नेताजी उठे और पीक वाशवेसिन में थूक आये। आकर बोले, "इस देस में कउनो इतना अमीर नाही कि फिरी फण्ड के माल के लिए नाही कर दे! वह किस्सा सुने हो न कि एक इण्डयन फोरन में गया। मारकिट में पेंसिल लेने पहुँचा। आधा दाम कराने मोल-भाव में जुटा। दुकानदार ने तंग होकर कहा, आप फिरी में रख लीजिए-गिफ्ट ! इण्डयन बोला - फिरी में दो नहीं दोगे गुरु ?"

नेताजी ने अब ठहाका बलन्द किया और नौकर को बुलाकर ब्रेकफास्ट के लिए आदेश दिया। वह बोले, "मामला क्या हय, आप आज खुस ही नहीं हो रहे हैं ।" "खुश होने की बात क्या है ?" हमने पूछा। "अरे कोई एक बात हय ! अखबारवालो के मनिस्टर साठे टी.वी. में जहाँगीर बास्सा बनकर झलक दिखा गये आपको तो इसी से खुस हो जाने चाहिए था। टी.वी. पर "पुकार" फिल्म भी दिखवा दी कि आपको याद आ जाय जहाँगीर क्या चीज था। अब आपको कोई दुख हो तो साठेजी के यहाँ जाय के फरियादी घण्टा बजा दीजिए। रोनी सूरत बनाये काहे बइठे हैं।" "आप नेता लोग कभी गम्भीर भी होते हैं।" हमने झिड़ककर कहा, "जब देखो तब कहकहे लगाते दिखते हो। देश जल रहा है और ये सारंगी बजा रहे हैं !" "अरे कक्का, आपके सामने तो हम भतीजावतार में प्रकट भये हैं। नेतावतार में हम बहुत सिरयस हैं। पालटक्स कोई हँसी-ठट्ठा नहीं ! बाकी यह बताया जाय कि देस कहाँ जल रहा हय।"

हमने अखबार उठाकर नेताजी की नाक पर दे मारा कि पढ़िए। बोले, "इसमें तो आगजनी की कउनो खबर नहीं हय। अउर कक्का, जरा पाइण्ट नोट किया जाय-अगर देस जलहि रहा होता तो हम कक्का-भतीजा का भुरता न बन गया होता ! जल-उल कुछ नहीं रहा हय - मस्त हय बिल्कुल फिट, एक अउर हंगामा नक्से बयासी की प्रतीच्छा में।" "तुमने वह नहीं पढ़ा जो जिला मैनपुरी में होता रहा है इधर !" "अरे पढ़ लिया हय कक्का। बगैर अखबार पढ़े नेता को हाजत नहीं होती सुबह, समझे ! बाकी वहाँ कोई देस जला नहीं हय । डाकू आकर दुइ-चार हरिजन मारि गये है। अउर सारगी कोई बजा नहीं रहा हय ससुर। आपके अटलजी महाराज पद-यात्रा जरूर कर रहे है। सो बेलवी में मयडम गजयात्रा किये रहीं। अपने-अपने अस्टण्डर्ड की बात हय। वइसे अटलजी पइदल चल रहे हैं तो ठीक कर रहे हैं; विदेस मन्त्री को बइंक्वट बहूत खाना पड़ता हय। इससे अटलजी को कुछ चर्बी चढ़ गयी रही। अब चलिहे पइदल तो बिनोबा के जइसे रूप निखरि आई।"

हम शायद थोड़ा-सा मुस्करा दिये। नेताजी उत्साहित हुए, "देखिए कक्का ! दो में से एक बात पर हाँ कीजियेगा। या तो यह देस ससुर अनाट काल से जलि रहा हय। धधकना इसका सयकण्ड नेचुरुवा हय। आप जउन टाइप का बुरा समाचार आज की तारीख में हमें दिखाइयेगा, हम खोजकर बरसों पहिले का वइसा समाचार प्रस्तुत कर देंगे सेवा में। या फिर एइसा हय कि देस जल-उल कुछ नहीं रहा हय, देस जल रहा हय एइसा भी नक्शेवाजी हय। कहिए कउन बात जँचती हय आपको ?" "इससे यही प्रकट होता हय कि देश में वास्तविक और बुनियादी परिवर्तन नहीं हो पाया है। यह भी कि नेता-बिरादरी ढोंगी है।" "अब यहाँ जइसी हय सो सेवा में हाजिर हय" नेताजी हुचहुचाये, "कहिए इम्पोट करायें ? कुछ नहीं आप अखबारवाले सनिकल है खुद अउर सनि-सज्म फइला रहे है पब्लिक में। सनि-सज्म रास्ट्र के लिए ससुर सनिग्रह से ज्यादा घातक है।" "अनास्था, पत्रकार नहीं, नेता जगा रहे है!" हमने भतीजाजी को झिड़का।

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(टीडीआईएल के हिन्दी कार्पोरा से साभार)

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