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केदारनाथ अग्रवाल का आलेख : गीत और कविता

गीत भी कविता की अनेक विधाओं में से एक विधा है। इस विधा में व्यक्त हुई कविता गेय होती है। इसलिए गीत की पहचान उसकी गेयता में निहित होती है। इसलिए गीत तभी गीत है जब वह गेय हो। इसलिए जो कविता गेय नहीं है वह गीत नहीं है। कविता के गेय होने का मतलब है कि उसमें गान के तत्त्व हैं और वह गायी जा सकती है।

गान के वह तत्त्व, जो कविता को गेयता प्रदान करते हैं, वह उसकी लय में प्रवाहित रहते हैं और लय में प्रवाहित रहना ही उनका अचूक धर्म और आचरण है। इसलिए बिना गान के तत्वों की लय की कविता गीत नहीं हो सकती। गान के वह तत्व-लय में प्रवाहित वह तत्त्व-गीत में सन्नद्व शब्दों की व्यवस्था कायम किये रहते हैं। वह व्यवस्था स्वर-मुखर व्यवस्था होती है। उस स्वर-मुखर व्यवस्था में व्यंजनों के उच्चारणों के रूप (आकार) प्रतिष्ठित रहते हैं।

उच्चारणों के इन्हीं रुपों की संहति लय का नाम पाती है। उस संहति में आदमी की साँस की एक निश्चित लम्बान-चौड़ान और ऊँचान-नीचान होती है। उस संहति में सन्नद्ध शब्दों के अक्षर-अक्षर के बीच का अन्तराल ह्रस्व और दीर्घ स्वरों से भरा रहता है और इसी प्रकार शब्द-शब्द के बीच का अन्तराल भी वैसे ही स…

सत्येंद्र शरत का बाल नाट्य : इच्छा पूर्ति

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राजकुमार चंद्रचूड़, राजकुमार कपिलदेव तथा उनका छोटा भैया, तीनों एक के पीछे एक मंच पर प्रवेश करते है। ये हमारे नाटक के मुख्य पात्र हैं। ये हैं सबसे बड़े राजकुमार चंद्रचूड़। ये है उनके छोटे भाई राजकुमार कपिलदेव और ये हैं इन दोनों के छोटे भैया। राजकुमार चंद्रचूड़ और राजकुमार कपिलदेव आज मछलियों का शिकार करने जा रहे हैं और इस बात से कुछ खिन्न है कि उनका छोटा भाई भी उनके साथ आ गया है, जबकि वे दोनों उसे मना कर चुके हैं कि तुम हमारे साथ नहीं चलो। तुम छोटे हो और सुनहरी नदी में गिर जाओगे। मगर छोटे भैया इनकी बात अनसुनी कर इनके साथ आ ही गये हैं। छोटी बहिन राजकुमारी कामनापूर्ति भी राजकुमारों के साथ आना चाहती थी मगर वो कपड़े बदल ही रही थी कि राजकुमार राजमहल से चले आये।चंद्रचूड़ : (कुछ खीज के साथ) छोटे भैया, बहुत छोटे हो। इतने छोटे बच्चे मछली नहीं पकड़ सकते। छोटे भैया : मगर ये तो बतलाइये पहले कि सुनहरी नदी है कहाँ? कपिलदेव : यहीं तो है। हम उसी के किनारे तो खड़े हैं। छोटे भैया : (इधर-उधर देखकर, आश्चर्य से) यही है सुनहरी नदी? मुझे तो दिखलाई नहीं दे रही है। चंद्रचूड़ : (खिन्नभाव से) नदी इसलिए दिखलाई नही…

बालेंदु दाधीच का आलेख : सरकार छिपाए, इंटरनेट दिखाए

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दुनिया भर की दमनकारी, अलोकतांत्रिक और तानाशाही सरकारों तथा संस्थानों के विरुद्ध संघर्ष करते लोगों को इंटरनेट के जरिए एक नया हथियार मिल गया है।- बालेन्दु दाधीचदुनिया भर की दमनकारी, अलोकतांत्रिक और तानाशाही सरकारों तथा संस्थानों के विरुद्ध संघर्ष करते लोगों को इंटरनेट के जरिए एक नया हथियार मिल गया है। इन सरकारों ने जिन गोपनीय सूचनाओं और रहस्यों को बड़े जतन से छिपाकर रखा था उन्हें कुछ वेबसाइटों के जरिए लीक किया जा रहा है। यानी करीब-करीब वही काम जो खोजी पत्रकार करते रहे हैं। लेकिन खोजी पत्रकारों और उनके संस्थानों का दमन अपेक्षाकृत आसान है, सूचनाओं की आजादी और पारदर्शिता में यकीन रखने वाले इंटरनेट योद्धाओं का मुंह बंद करना उतना सरल नहीं। आम आदमी के पक्ष में सूचना-युद्ध लड़ती इन वेबसाइटों को कौन, कहां से संचालित कर रहा है, उनमें गोपनीय आंकड़े प्रकाशित करने वाले लोग कौन हैं, यह स्वयं उनके अलावा कोई नहीं जानता। ऐसे में कोई त्रस्त सरकार उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई करे तो कैसे?सन 2006 में लांच हुई विकीलीक्स.ऑर्ग ऐसी वेबसाइटों में अग्रणी है जिसने थाईलैंड और चीन ही नहीं, अमेरिका तक की सरकार की नींद हर…

महावीर शर्मा की पुस्तक समीक्षा : दिल से दिल तक

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कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़श्रीमती देवी नागरानी जी के अब तक दो ग़ज़ल संग्रह "ग़म में भीगी ख़ुशी" और "चराग़े-दिल" प्रकाशित हो चुके हैं। अपनी संवेदना और भाषा की काव्यात्मकता के कारण देवी जी संवेदनशील रचनाकार कही जा सकती हैं। देवी जी अपने इस नये ग़ज़ल- संग्रह में ग़ज़लों को कुछ इस अंदाज़ से कहती हैं कि पाठक पूरी तरह उन में डूब जाता है। विचारों के बिना भाव खोखले दिखाई देते हैं। इस संग्रह में भावों और विचारों का सुंदर सामंजस्य होने के कारण यह पुस्तक सारगर्भित बन गई है।
शाइर ज़िन्दगी की जटिलताओं के बीच अपने संघर्ष का इज़हार करने के लिए एक उपकरण ढूंढता है जो देवी जी की ग़ज़लों में अभिव्यक्त हुई है। देवी जी तकनीकी नज़ाकतों से भी भली भांति परिचित हैं। ज़िन्दगी अक्सर सीधी-सादी नहीं हुआ करती। उन्होंने लंबे संघर्षों के बीच अपनी राह बनाई हैःजिसे लोग कहते हैं जिंदगी
वो तो इतना आसां सफ़र नहीं.
तवील जितना सफ़र ग़ज़ल का
कठिन है मंज़िल का पाना उतना.
नारी से जुड़े हुए गंभीर सवालों को उकेरने और समझाने के लिए उनके पारदर्शी प्रयास से ग़ज़लों के फलक का बहुत विस्तार हो गय…

मोहन वीरेन्द्र का आलेख : रचना क्या है?

रचना और आलोचना का अंतर्वलंबन-मोहन वीरेन्द्ररचना जीवन की आलोचना का सांस्कृतिक प्रकार्य है और आलोचना उस रचना में व्यक्त जीवन की खोज और विश्लेषण का रचनात्मक माध्यम। मुक्तिबोध की दृष्टि में आलोचक या समीक्षक का कार्य वस्तुत: कलाकार या लेखक से भी अधिक तन्मयतापूर्ण और सृजनशील होता है। उसे एक साध जीवन में वास्तविक अनुभवों के समुद्र में डूबना पड़ता है और उससे उबरना भी पड़ता है। निश्चित रूप से मुक्तिबोध के सामने आलोचना की नई चुनौंतियाँ खड़ी हो गई थीं, जिनसे कि उन्हें टकराना था। आलोचना को या तो रचना का पिछलग्गू मान लिया गया था या फिर आलोचना के विकास की सीमाएं अवरुद्ध हो गयीं थी। फलत: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जिस आलोचना की बुनियाद डाली थी। उसका तर्क-संगत विकास नहीं हो सका। मुक्तिबोध की चिन्ता स्वाभाविक है इसीलिए उनका संकेत आलोचना के जीवन कर्म की ओर है और वह यह कि उसका कार्य जीवन की वास्तविकता का संवेदनात्मक ओर ज्ञानात्मक विकास करना है। इस अर्थ में रचना के कर्म से आलोचना का कर्म भिन्न नहीं कहा जायेगा। इसी अर्थ में आलोचना भी सृजनात्मक कर्म है ठीक रचना की तरह यह तभी संभव है जब आलोचक को जीवन के विका…

के. पी. सक्सेना के दो व्यंग्य

किसान...बैल, और... आदमी और जानवर के बीच का सांस्कृतिक अन्तर जानते हैं आप ? नहीं जानते होंगे। मै बताता हूँ।...मोटे तौर पर अगर कोई जानवर मनुष्यों जैसा कर्म कर बैठे तो रातों रात प्रसिद्ध हो जाता है...खबरों में आ जाता है।...इसके विपरीत, आदमी जानवरों जैसा आचरण करता रहे तो इसे कोई खास खबर नहीं माना जाता।...आदमी के सारे गुनाह माफ हैं, क्योंकि जुर्म भी आदमी ही करता है और कानून भी आदमी ही बनाता है। ...आपको एक बैल की सच्ची श्री कथा सुना रहा हूं।...सुनिये और जन-तांत्रिक ढंग से गुनिये।... भिन्ड (ग्वालियर) के इलाके में एक किसान अनाज बेचकर नोटों की मोटी गड्डी लाया। अपनी इस कमाई को सुरक्षित रखने के लिए, नोटों को भूसे के ढेर में दबा दिया। किसान जी की वाइफ ने रोजाना के नियमानुसार भूसा बैलों को डाला और साथ ही नोटों की गड्डी भी बैल महोदय के लंच में चली गई। बैल जी थके माँदे खेत से लौटे थे, सो दनादन भूसा खाना शुरू कर दिया। मालूम तब हुआ जब यान (चारे की जगह) की सफ़ाई करते समय नोटों के चबाये और अध चबाये टुकड़े पड़े मिले। बैल चुपचाप जुगाली कर रहा था और मुंह से नोटों के टुकड़े बह रहे थे। किसान जी माथा पीट कर र…

अश्विनी केशरवानी का आलेख : पटते तालाब, कटते जंगल और बंजर होती जमीन

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पटते तालाब, कटते जंगल और बंजर होती जमीन -प्रो. अश्विनी केशरवानीगांव अब शहर में तब्दील होते जा रहे हैं। आज यहां बड़ी बड़ी इमारतें, मोटर-गाड़ी देखे जा सकते हैं। गांव का गुड़ी@ चैपाल और अमराई आज देखने को नहीं मिलता... नई पीढ़ी के लोगों को मालूम भी नहीं होगा कि गांवों में ऐसा कुछ रहा भी होगा। हमारे पूर्वजों ने गांव में अमराई लगाना, कुंआ खुदवाना और तालाब खुदवाना पुण्य कार्य समझा और उसे करवाया। रसीले और पक्के आम का स्वाद भी हमने चखा। आज नई पीढ़ी के बच्चे बोतल में बंद मेंगो जूस, फ्रूटी और आमरस का जेली आदि को सर्वोत्तम भले मान ले लेकिन पलाई आम को चूसने और आम का अमसरा खाने का मजा कुछ और ही था। मुझे मेरे घर में हमारे पूर्वजों के द्वारा कुंआ और खुदवाने संबंधी कागजात मिले हैं जिसके एवज में डिप्टी कमिश्नर, रायपुर के द्वारा प्रशस्ति पत्र दिये गये हैं। अर्थात! डस काल में कुंआ और तालाब खुदवाना अत्यंत पुण्य कार्य था। तालाबों के किनारे बरगद, पीपल और नीम के पेड़ लगवाये थे जिसकी छांव में हमारा बचपन गुजरा था। मेरी दादी बताती है कि उनकी 5-6 वर्ष का बच्चा खत्म हो गया जिसकी याद में उनके ससुर ने छुइया तालाब क…

सीताराम गुप्ता का आलेख : गंगाजल सा निर्मल मन क्यों ?

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कबीर की एक साखी हैःकबीरा मन निर्मल भया , जैसे गंगा नीर,पाछे-पाछे हरि फिरै , कहत कबीर-कबीर।कबीर कहते हैं कि मनुष्य के मन के गंगा जल की तरह निर्मल हो जाने पर हरि अर्थात् ईश्वर को खोजने की आवश्यकता नहीं अपितु हरि ही मनुष्य के पीछे-पीछे दौड़ा चला आएगा। संत रविदास भी कहते हैं कि मन चंगा तो कठौती में गंगा। कबीर और रविदास ही नहीं सभी संतों ने मन की निर्मलता पर बल दिया है और निर्मलता भी गंगाजल -सी। एक प्रार्थना में भी पंक्ति आती है कि गंगाजल सा निर्मल मन हो, मिला मुझे विद्या का धन हो। प्रश्न उठता है कि मन की निर्मलता से क्या तात्पर्य है और इसकी क्या उपयोगिता और महत्त्व है तथा मन की निर्मलता की उपमा गंगा के जल से क्यों दी जाती है?गंगा भारत की एक अत्यंत पवित्र नदी है जिसका जल काफी दिनों तक रखने के बावजूद अशुद्ध नहीं होता जबकि साधारण जल कुछ दिनों में ही सड़ जाता है। गंगा का उद्गम स्थल गंगोत्री या गोमुख है। गोमुख से भागीरथी नदी निकलती है और देवप्रयाग नामक स्थान पर अलकनंदा नदी से मिलकर आगे गंगा के रूप में प्रवाहित होती है। भागीरथी के देवप्रयाग तक आते-आते इसमें कुछ चट्टानें घुल जाती हैं जिससे इसके …

पुस्तक समीक्षा : क्रान्ति यज्ञ (1857-1947 की गाथा)

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पुस्तक : क्रान्ति यज्ञ (1857-1947 की गाथा)-समीक्षक : गोवर्धन यादवराष्ट्रीय अस्मिता के रेखांकन का सार्थक प्रयास है ‘‘क्रान्ति-यज्ञ‘‘स्वतंत्रता और स्वाधीनता प्राणिमात्र का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसी से आत्मसम्मान और आत्मउत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। भारतीय राष्ट्रीयता को दीर्घावधि विदेशी शासन और सत्ता की कुटिल-उपनिवेशवादी नीतियों के चलते परतंत्रता का दंश झेलने को मजबूर होना पड़ा और जब इस क्रूरतम कृत्यों से भरी अपमानजनक स्थिति की चरम सीमा हो गई तब जनमानस उद्वेलित हो उठा था। अपनी राजनैतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक पराधीनता से मुक्ति के लिए सन् 1857 से सन् 1947 तक दीर्घावधि क्रान्तियज्ञ की बलिवेदी पर अनेक राष्ट्रभक्तों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। इसी ‘क्रान्ति यज्ञ‘ की गौरवगाथा जनमानस में साहित्य और साहित्येतिहास में अंकित है। भारतीय डाक सेवा के अधिकारी एवं युवा साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव व युवा लेखिका आकांक्षा यादव द्वारा सुसम्पादित पुस्तक ‘‘क्रान्ति यज्ञ ः 1857-1947 की गाथा‘‘ में भारतीय स्वाधीनता संग्राम की अमर बलिदानी गौरव गाथाओं एवं इनके विभिन्न पहलुओं को विविध जीवन क्षेत्र…

कुणाल की एक फ़्यूज़न, कोड युक्त ग़ज़ल

हास्य-ग़ज़ल-कुणाल(मूल प्रकाशित रचना फ़ालतू की लाइनें यहाँ पढ़ें) तुम भी तो कोडिंग किये जा रहे हो, हम भी ये कोडिंग किये जा रहे हैं,
ज़हन में दोनों के खयाल है लरज़ा, क्यों बेसाख़्ता ज़िंदगी जिये जा रहे हैं ??ये डिफेक्टों की लिस्ट में ये बगों का सामना, दोनों ही बैठे किये जा रहे हैं,
PM ही जीता है लड़ाई में आखिर, ज़ख़्म क्यों हम ही झेले जा रहे हैं ??रहे सामने वो क्लायंट की हाज़िरी में, हम ही क्यों पर्दे के पीछे जा रहे हैं !!
c.e.o. के ethics किसी ने न देखे, हमें ही सारी ट्रेनिंग दिये जा रहे हैं !!HR यहां है, Manager वहां है, हमारे सिवा क्या मैनेज किये जा रहे हैं ??
ब्रेक-डाउन में सैलरी के किये हैं घपले, हम हैं कि सब कुछ सहे जा रहे हैं !!!पता है हमें भी, पता है तुम्हें भी, कि सपने कैसे कैसे बुने जा रहे हैं !!
कभी न कभी तो PM बनेंगे, अरमान यही दिल में किये जा रहे हैं !!करेंगे वो ही जलसे, के घूमेंगे हम भी, प्लानिंग अभी से किये जा रहे हैं…
हैं हम भी ढक्कन! कि कोडिंग के बदले ये फालतू की लाईनें लिखे जा रहे हैं …--- કુણાલ (Kunal)PM = Project Manager
HR = Human Resource
Manage…

कवि कुलवंत के दो गीत

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गीत - कवि कुलवंत सिंहअभिलाषाबन दीपक मैं ज्योति जगाऊँअंधेरों को दूर भगाऊँ,दे दो दाता मुझको शक्तिशैतानों को मार गिराऊँ ।बन पराग कण फूल खिलाऊँसबके जीवन को महकाऊँ,दे दो दाता मुझको भक्तितेरे नाम का रस बरसाऊँ ।बन मुस्कान हंसी सजाऊँसबके अधरों पर बस जाऊँ,दे दो दाता मुझको करुणापाषाण हृदय मैं पिघलाऊँ ।बन कंपन मैं उर धड़काऊँजीवन सबका मधुर बनाऊँ,दे दो दाता मुझको प्रीतिजग में अपनापन बिखराऊँ ।बन चेतन मैं जड़ता मिटाऊँमानव मन मैं मृदुल बनाऊँ,दे दो दाता मुझको दीप्तिजगमग जगमग जग हर्षाऊँ ।आओ दीप जलाएँआओ खुशी बिखराएँ छाया जहां गम है ।आओ दीप जलाएँ गहराया जहाँ तम है ॥एक किरण भी ज्योति कीआशा जगाती मन में; एक हाथ भी कांधे परपुलक जगाती तन में; आओ तान छेड़ें, खोया जहाँ सरगम है।आओ दीप जलाएँ गहराया जहाँ तम है ॥एक मुस्कान भी निश्छलजीवन को देती संबल; प्रभु पाने की चाहतनिर्बल में भर देती बल; आओ हंसी बसाएँ, हुई आँखे जहां नम हैं।आओ दीप जलाएँ गहराया जहाँ तम है ॥स्नेह मिले जो अपनो काजीवन बन जाता गीत; प्यार से मीठी बोलीदुश्मन को बना दे मीत; निर्भय करें जीवन जहाँ मनु गया सहम है।आओ दीप जलाएँ गहराया जहाँ तम है ॥कवि कुलवंत सिं…

प्रभा मुजुमदार् की दो कविताएं

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दो कविताएं Two Poems by Prabha Mujumdar-प्रभा मुजुमदार1समुन्दर कीउफनती लहरों नेमन के अनजान द्वीपों कोजहांबसती थीसुप्त आकांक्षाएंकाल और सीमाओं सेअपरिचित,अपरिभाषितजिंदगी कीआपाधापी से बेखबरपिछड़ी हुईपत्थर युगीन बस्तियांआदिम और अभावग्रस्तफिर भीनिजता के आग्रहऔर अहंकार से ग्रस्तछोटे छोटे बिन्दुअपनी शर्तों परसमॄद्धि का समुद्रजगने नहीं देगाअछूते और एकाकीबिंदुओं जैसे द्वीपविश्व विजय को आतुरअश्वमेघ का कुचक्र बीती सभ्यताओं केभग्नावशेषों कोमिटा देने को बेताबएकान्त और अप्रासंगिकपिछड़े और पराजितहोने की व्यथाइतिहास के लंबे दौर मेंजीने के बावजूद,विशाल भूखंड सेछितर बिखर करनिर्वासित एकाकी द्वीपसत्ता की उद्दाम लहरों के बीचकब तक रह सकते हैंनक्शे परआकार बचा कर ।2समुद्र कोई भी होभूखंडों कोनिगल जाना चाहता हैउन्हीं भूखंडों कोजहांजगते हैं सपनेवर्तमान और अतीत भीगरजती | फुफकारती लहरों मेंडुबो देना चाहता हैबालू के घरौंदेइरादों की चट्टानेंस्मॄतियों के चिन्हसमुद्र सब कुछसमेट लेना चाहता हैअपने तल मेंआकाश केअपरिमित विस्तार के नीचेकिनारों को तोड़, देने के लियेव्याकुलगरजता है समुद्रअथाह गहराई मेंअनमोल संपदा संजोयेलहरो…

मनोहर श्याम जोशी का व्यंग्य : नेताजी कहिन

नेताजी कहिन-मनोहर श्याम जोशीब्रेकफास्ट के साथ नेताजी ने लठ-मार डिप्लोमेसी शुरू की। मक्खन और जैम दोनों से लिपे हुए एक टोस्ट को मुँह में पूरा-का-पूरा धकिया लेने और चबाने लगने के बाद उन्होने शहरी बाबू किस्म के एकमात्र 'डिसिडेण्ट' से पूछा, "चिठिया पठाइ आये, लेबर लीडर आसूतोस बाबू ? लयटर डिल्विर एट पी एम. कि नाट?""टुमारो। काल का टाइम दिया हाय।" "टुमारो का एइसा हय," नेताजी ने कहा, "ससुर आता नहीं कभी। इंगलिस का टाप पोयट शक्कूपीर कुछ कहि गया हय टुमारो की बाबत। क्या कहि गया हय कक्का जरा बताया जाय आसूतोस बाबू को।" आशुतोष बाबू ने तुनुककर सूचना दी कि शेक्सपियर की वह पंक्ति उन्हें भी याद है। उन्होंने जानना चाहा कि नेताजी सी.एम. की ओर से कोई "सालिड प्रपोजल' लाये हैं कि नहीं ?" "अरे यह कोई चउधरी चरनसिंह राजनारायन वाली राजनीत हय कि प्रपोजल लाते ! डिसपोजल का खेल हय यह तो।" "ठीके बा, सी. यमो डिसपोज हुइ जाइ।" एक थुलथुले विरोधी ने हँसकर कहा। नेताजी ने ठहाका बलन्द किया। फिर थुलथुले की तोंद को तर्जनी से कोंचते हुए कहा, "ह…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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