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वीरेन्द्र जैन का व्यंग्य : आतंकियों को पोटा और पोटा का आतंक

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व्यंग्यआतंकियों को पोटा और पोटा का आतंक-वीरेन्द्र जैनपहले हर घर में एक अस्त्र-शस्त्र हुआ करता था जिस का नाम सोंटा होता था। यह जब फेंक कर मारा जाता था तो अस्त्र कहलाता था और जब हाथ में पकड़े पकड़े इस से धुनाई की जाती थी तब ये शस्त्र बन जाता था। बाहर के चोर डकैत ही नहीं पत्नियाँ और बच्चे तक इससे डरते थे तथा इसी के कारण पत्नियाँ चरित्रवती और पुत्र आज्ञाकारी होते थे। अंग्रेजों के जमाने में यह दफ्तरों में रूलर की तरह भी प्रयोग किया जाता था जिससे रजिस्टरों में लाइनें खींची जाती थीं। यह पुलिस थाने में भी पाया जाता था और स्कूल के मास्टरों के पास भी पाया जाता था, जिससे अपराधी लाइन में रह कर पुलिस का हिस्सा दबा नहीं पाते थे और छात्र मास्टरजी के लिए घर में बने मालपुये लाने में कोताही नहीं करते थे। कुछ लोककथाओं में यह मिस्टर इंडिया की तरह अदृश्य हाथों में रह कर भी अपना काम करता हुआ बताया जाता है।अब यह नहीं पाया जाता। अब दुनिया की सारी कमियों को इसकी अनुपस्थिति के नीचे ढका जा सकता है। अब तो अगर ट्रेन भी लेट होती है तो लोग कहने लगते हैं कि पहले ट्रेनें इतनी लेट नहीं होती थीं क्योंकि पहले की बात और …

कान्ति प्रकाश त्यागी की कविता : परतंत्र या स्वतंत्र

परतन्त्र या स्व्तन्त्र-डॉ० कान्ति प्रकाश त्यागीपहले तो हम परतन्त्र थेहम आज भी पर-तन्त्र हैंपहले विदेशियों के अधीन थेअब अपनों के अधीन हैंपहले एक शासक था,अब अनेक शासक हैंपहले पुलिस रक्षक थीअब पुलिस भक्षक हैपहले विधवा निडर थीबच्चे एवं वृद्ध निडर थेसामान्य आदमी चैन से थाक्योंकि सिर्फ़ कानून थाअब सभी सहमे सहमे हैंकिसी सदमे में डूबे हैंघर से बाहर निकलने मेंपूरी तरह डरते हैंपता नही कब और कौनउनको छुरा भोंक देउनकी ज़ेब काट लेउनकी इज़्ज़त लूट लेउन पर तेज़ाब फेंक देउनका सामान छीन लेअकारण जेल में डाल देआज यह पता नहीं, क्यावे घर लौट पायेंगे सुरक्षितबाहर तो बाहर, वे तोघर में भी नहीं हैं सुरक्षितजब जनता असुरक्षित हैआम आदमी असुरक्षित हैतो फिर कौन है सुरक्षितदेश के नेता हैं सुरक्षितइनके लिए अनेकों बाडीगार्ड हैंयदि सौभाग्य से जेल मेंतो जेलर ही बाडीगार्ड हैजेल में सब सुविधायें उपलब्ध हैंटी. वी, फ़ोन एवं ए.सी सभी प्राप्त हैइनकी सुरक्षा के लिए, बड़ी फ़ौज चलती हैजो आधुनिक हथियारों से लैस रहती हैयह बात अलग है कि येइन सिपाहियों का इस्तेमाल कैसे करेंबाज़ार से सब्ज़ी मंगाएं, बच्चों के स्कूल भेजेंअथवा बीबी के साथ, रॊब हे…

शामिख फराज की कविता : तुम्हारी याद

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तुम्हारी याद
वह इक हाथ फिराना बालों में
वह नाम काढ़ना रुमालों में
कुछ बातें कहना मध्यम से उजालों में
याद आता है आज भी
वह शख्स ख्यालों में
जो छोड़ गया है मुझको
अनसुलझे से सवालों में --संपर्क: शामिख फराज    
कमल्ले चैराहा
पीलीभीत.262001
उत्तर प्रदेश

महेन्द्र भटनागर की दो कविताएं

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View full size घटाएँछा गये सारे गगन परनव घने घन मिल मनोहर,दे रहे हैं त्रस्त भू को आज तो शत-शत दुआएँ!देख लो, कितनी अँधेरी हैं घटाएँ!कर रहा है व्योम गर्जन,मंद्र ध्वनि से, वाद्य-सा बन,चाहता देना सुना जो आज सारी स्वर-कलाएँ!देख लो, ये व्योम-चेरी हैं घटाएँ!अरुक बरसो बिन्दु जल केतीव्र गति से, ना कि हलके,विश्व भर में वृष्टि कर दो, दूर हों सारी बलाएँ!देख लो, कितनी घनेरी हैं घटाएँ!********आज़ादी का त्यौहार
लज्जा ढकने को
मेरी खरगोश सरीखी भोली पत्नी के पास
नहीं हैं वस्त्र,
कि जिसका रोना सुनता हूँ सर्वत्र !
घर में, बाहर,
सोते-जगते
मेरी आँखों के आगे
फिर-फिर जाते हैं
वे दो गंगाजल जैसे निर्मल आँसू
जो उस दिन तुमने
मैले आँचल से पोंछ लिए थे ! मेरे दोनों छोटे
मूक खिलौनों-से दुर्बल बच्चे
जिनके तन पर गोश्त नहीं है,
जिनके मुख पर रक्त नहीं है,
अभी-अभी लड़कर सोये हैं,
रोटी के टुकड़े पर,
यदि विश्वास नहीं हो तो
अब भी
तुम उनकी लम्बी सिसकी सुन सकते हो
जो वे सोते में�����…

अनुज खरे का व्यंग्य – नवगति-अद्योगति-दुर्गति

व्यंग्यनवगति-अद्योगति-दुर्गति...-- अनुज खरेवे छह छंदमुक्त कविताएं सुना लेने के पश्चात् सातवीं के लिए ‘स्टार्ट’ ले रहे थे। जीभ लपलपा रहे थे। पिछली टांगों... माफ कीजिए पैर से पैर खुजा रहे थे। ज्ञान की खूंखार चमक चेहरे पर थी। छह सुना लेने की प्रचंड संतुष्टि से आप्लावित दिखाई दे रहे थे। उनका घर इन क्षणों में अस्थायी तौर पर खाली हो चुका था। माताजी दांयी और की अम्माजी का भेजा खाने निकल गई थी। पिताजी जो खांसते-खांसते बलगम थूकने गए तो नाले के पास चबूतरे पर ही आसनाधीन हो गए। उनकी पत्नी ‘सदियों’ तक उनके इस ‘कृत्य’ को सहन करने के पश्चात् विद्रोह कर सुनने-सुनाने की इस व्यवस्था से बाहर निकल चुकी थी। बच्चे उनके पक्ष में बाहरी दरवाजे पर इसलिए तैनात हो गए थे ताकि इस समय किसी भी बाहरी ‘आक्रांता’ के बैठक में जाने से रोका जा सके, जहां मैं टॉर्चर किया जा रहा था। घर भांय-भांय कर रहा था, हवां सांय-सांय कर रही थी, मेरी आत्मा हांय-हांय कर रही थी। पूरा माहौल गहन अनुभूति से भरा ‘वैराग्यमयी’ टच दे रहा था। पूरी स्थिति पुलिस की भाषा में ‘कंट्रोल’ में है, वाली ही थी। टीन-टप्परों से खंगालकर, तकिया हटाकर, सोफे के नी…

अनिता सनाढ्य की कविता

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कविताअकेले-अनिता सनाढ्ययह कविता बिछुड़े प्रियजनों के बीच की भावनाएं हैं। वह प्रेमी-प्रेमिका हो सकती है या बिछुड़े हुए पति-पत्नी के बीच की घटनाएं। लंबे विरह के बाद नायिका नायक से क्या चाहती है और किस तरह असली प्रेम को प्रदर्शित करती है, उन्हें यहां शब्दों के अलंकारों में पिरोया गया है। हम हैं अकेले कोसों दूरतुम भी हम से दूर अकेले ये मीलों का है रास्ताकिस तरह हो कम यह फासला हम हैं अकेलेतुम हो दूर अकेले अब हैं दूर, हालत है ऐसी ना मिले सोना, ना मिले चांदी बैठी हुई हूं ऐसे, जंग लग गया हो लौहखंड को जैसे तुम हो ऐसे कि हमें मिलने भी नहीं आतेहम हैं अकेले, तुम हो दूर अकेले उम्मीद थी गले मिलने की तुम हो कि ख्वाबों में भी मिलने नहीं आते अब तो नहीं मिलता बाजार में सोना-चांदीसोना हो गया महंगा, चांदी भी नहीं मिलती मजबूर हुए हम इतनेजब जब तुम मिलने आना लाना सोने के गहने, ना पहनूंगी चांदीपहनूंगी सोना ही, चढ़ा ले चाहे सोने का पानी भले हो पीतल के गहनेपहनूंगी, मैं सोना,ना पहनूंगी चांदी नहीं मिलता बाजार में सोना और गुल हो गई चांदीतू इतना करना मेरे यारअसली गहना है प्यारलग जा गले मेरे, यहीं है सोना, असली चां…

अनुज खरे की कविता : कैसे जहां में आ गए हम…

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कैसे जहां में आ गए हम---- अनुज खरेकिलकारियां भी डराती हों हंसी भी बिखेरती हो मायूसी,गर्मजोशी से गायब जैसे गर्माहट,आंसुओं पर भी होता शुबा,प्यार पर शक का आलम,खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।भावनाएं लगे डरानेरिश्ते करें परेशान,दुख करें हंसी पैदा,निश्छलता पर लगा हो पहरा,करुणा का हो निर्वासनखुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।मिले कोई अपना तो फासले ना घटेंतेरे-मेरे की दिखें दरारें,मिलन में आए बिरह की सदा,सहयोग पर पाबंदी का कोहरा,नफरत ने लिया आदर का स्थान,खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।उम्मीदों में दिखती हो आशंका,एहसास कराते हों कांटें पैदा,दोस्ती में दिखे दर्द का सबब,बात अब हों कुछ बेमतलब,झूठ ने पैदा किए सारे भरम,खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।मिट्टी की गंध बिखेरती हो दुर्गंध,सावन की झड़ी नहीं लगती पावन,सर्दी की धूप भी नहीं देती कोमल एहसास,तपती दोपहरी नहीं नींद की आस,सारे मौसम करने लगे जीना हराम,खुदा जाने कैसे जहां में आ गए हम ।----.(चित्र – कृष्णकुमार अजनबी की कलाकृति)

सनत कुमार जैन की दो कविताएं

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कविताएं- सनत कुमार जैनआश्वासन अगर मैं यह चुनाव जाता हूँ जीत दल का नेता बन जाउँ उनके बीचप्रधानमंत्री की कुर्सी से चिपक जाऊंगाचाहे को हल्लबोल, इरादे से बदल नहीं पाऊंगाअधिकारों का दुरुपयोग कर दूसरों को अधिकार दिलाऊंगापहला काम होगा मेरा पूल के नीचे उसके ठेकेदारों का मकान बनवाऊंगा ठेके में बनी हर इमारत में उसके बनाने वालों को मुफ्त फ्लैट दिलवाऊंगा बांध के बहते जल के बाजू सिचाई कर्मियों की बस्ती बसवाऊंगा काम दूसरा होगा मेरा एक सरकारी स्कूल के अध्यापक के बच्चों को दूसरी सरकारी स्कूल में पढ़वाऊंगाआरक्षण समर्थक नेता, जनता का इलाज उन्हीं आरक्षण प्राप्त डाक्टरों से करवाऊंगाआरक्षण प्राप्त इंजीनियरों से उनके मकान का निर्माण करवाऊंगाआरक्षण प्राप्त ड्रायवरों से उनकी गाड़िया चलवाऊंगाकाम तीसरा होगा मेरा पुलिस की भर्ती के लिए पहले उम्मीदवार को पुलिसिया मार खिलवाऊंगाजो जनता अनपढ़ नेता चुने वहां के सारे स्कूल कॉलेज बंद करवाऊंगा-----सन्निपातदोस्तों ये प्रजातंत्र है प्रजा तो ठीक है पर तंत्र में सन्निपात है खुद उतारती है कपड़े कन्याएं इतराती है सार्वजनिक करती है दिल की कामनाएं मन यदि लड़के का ललचाता है जरा …

अनुज खरे का व्यंग्य : आलोचकों के श्री चरणों में सादर…

व्यंग्यआलोचकों के श्री चरणों में सादर...-- अनुज खरेआलोचकों के सम्मुख एक नवागत व्यंग्यकार का विनम्र-दीन-हीन-आदर भरा विनय निवेदन मय एफिडेविट प्रस्तुत है। इस आशा में कि मामला जमा तो खताएं माफ होंगी। बंदा दैदीप्यमान नक्षत्र की तरह व्यंग्याकाश में मंडराता फिरेगा। बात के सपोर्ट में विनम्रता की पर्याप्त मात्रा चली जाए इसी पुख्ता बंदोबस्त के तहत एफिडेविट की व्यवस्था की गई है, कि जो कहा जा रहा है वह सच है और साहित्य की अदालत में लीगल तौर पर सच। अतः एक नजर डाल लें। मैं नवागत व्यंग्यकार, फादर ऑफ... फादर क्या इस क्षेत्र में तो मैं गॉडफादर की तलाश में जुटा हूं, सो, नाम मिलते ही सूचित करूंगा। स्थायी निवासी- स्थायी निवास को लेकर भी ठीक-ठीक नहीं लिख पाऊंगा। जहां भी रहा मोहल्लेवासियों ने लेखन जैसी ‘आदतों’ के कारण स्थायी होने ही नहीं दिया। खैर, मैं अपने पूरे होशोहवास में शपथपूर्वक बयान करता हूं... -- कि मैं व्यंग्य क्षेत्र का महान लेखक हूं, ऐसी मुझे कोई गलतफहमी नहीं है। मेरी पूरी रचनाएं मौलिक हैं, ऐसा भी मेरा कोई दावा नहीं है। मेरा दिमाग इतना तेज चलता है कि आइडिए के लिए मुझे कहीं से प्रेरणा लेने की जरू…

विजय कुमार मुदगल का लघु आलेख : देहदान सर्वस्व दान

रक्त दान महा दाननेत्र दान दानों में दानशरीर दान सर्वस्व दानमनुष्य योनि ईश्वर की महान् कृति है और हम मनुष्यों ने कई बार ये चरितार्थ भी किया है कि वास्तव में हम सर्वश्रेष्ठ हैं । हम सभी पैदा होने से लेकर मृत्यु शैया तक सारा जीवन अपने लिए ही कुछ न कुछ करते रहते हैं । हालांकि इस शाश्वत सत्य से हम सभी परिचित भी हैं कि जीवन क्षणभंगुर है । एक बार ऋषि दधीचि ने अपने सम्पूर्ण शरीर को गैया से इसीलिए चटवाया था कि उनकी हड्डियों से बने वज्र से देवता विजयी हों अर्थात् धर्म का पालन हो सके । तो आओ क्यों न हम अपने जीवन को आने वाली पीढियों के नाम कर दें। वर्तमान समय में रक्त दान, नेत्र दान और उससे भी आगे बढकर अपने शरीर को मृत्यु के बाद मेडिकल साइंस के लिए दान देना कोई आश्चर्य का विषय नहीं है । हम बहुत समय से पाश्चात्य संस्कृति की ओर आकर्षित रहते हैं । वहां भी कई महान् व्यक्तियों ने अपने शरीर को मेडिकल साइंस के लिए दान देकर चिकित्सा विज्ञान में अपना वो योगदान दिया जिसे भुलाया ना जा सकेगा और हम सभी इसके लिए उनके ऋणी रहेंगे ।मृत्यु के पश्चात् शरीर को मेडिकल साइंस को दान देकर हम ऐसी कई लाइलाज बीमारियों के इ…

अनिता सनाढ्य की कविता : यूनिक ट्रेंड…

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कविता-अनिता सनाढ्ययूनिक ट्रेंड... चाहे हो जाए सब टेंश
ऐसा आया ट्रेंड
बनाए हैं बहुत फ्रेंड्स
चाहे हो जाए खुद का एण्ड
ऐसे बनाने हैं बहुत फ्रेंड्स
चाहे हो जाए खुद का एण्ड
ऐसा आया ट्रेंड करना है हर क्षण फैशन
चाहे रह जाए स्कूल लैशन
होती रहे टेंशन
ऐसा आया ट्रेंड देना है सबको चैलेंज
चाहे ऐसा आया ट्रेंड देना है सबको चैलेंज
चाहे चैलेंज
चाहे सिर्फ लेजी गलती करते फिरते
ना छोडेंगे कोई ऐसा निशान
क्योंकि सबको होगी पहचान अपनों को दे रहे हैं गम
खुद भी हो चुके हैं डंप
नहीं होने ये राइट
इन्हें करना होगा इनसाइड
ऐसा आया ट्रेंड सब हो जाए साइलेंट
सैट करते खुद के बाल
चाहे फैल हो जाए इस साल
ऐसा आया ट्रेंड करेंगे स्कूल बंक
फिर मारेंगे बातों से डंक
देखेंगे बिन्दास मूवी
बताएंगे अपनी खूबी
चाहे हो जाए सबसे दूरी
ऐसा आया ट्रेंड करना नहीं है इन्हें रिविजन
चाहे पीछे रह जाए डिविजन
एक्जाम होता जब नीयर
तब कॉपी करते फेयर
ऐसा आया ट्रेंड चाहिए सबको अपना सैल
करनी है फ्रेंड को बैल
ना जाने करते किसको कॉल
देते फिरते मिस्ड कॉल नहीं चूक…

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ के दस नंबरी दोहे

कविताएँ-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’दस नम्बरी दोहेनेता ऐसा चाहिए, डाकू तक घबराय ।धुआँधार भाषण करे ,ले सबको बहकाय ॥कुर्सी मधु से सौ गुनी,मादकता अधिकाय ।वा पीकर बौराय जग ,या पाकर बौराय ॥कुर्सी जननी ,ज़िन्दगी,सबकी इस तक दौर ।इसके बिन संसार में ,और कहाँ पर ठौर ॥बधिक आज नेता बने ,भरे हज़ारों खोट ।जिस वोट से विजय मिली ,देते उसको चोट ॥काले ब्रजबिहारी को पूज रहा संसार ।काले धन को जोड़कर क्यों घबराते यार ॥नेता खड़ा बज़ार में,जोड़े दोनों हाथ ।जेब हमारी जो भरे ,चले हमारे साथ॥जन-सेवा के नाम की झोंकी ऐसी धूल ।जनता झाँसे में फँसी, गई सभी कुछ भूल ।जीवन कच्चा काँच है ,कर लो पक्का काम।रिश्वत लेकर घर भरो,जपो हरि का नाम ॥मिली छूट माँ –बाप से ,लूट मची दिन-रात ,गाली देकर और को,खाओ खुद भी लात ॥>>>>>>>>>>>>>>>> कलियुगी एकलव्यकलियुग में बोले द्रोणाचार्य एकलव्य से-‘प्रसन्न हूँ तुम्हारी भक्ति से जो चाहते सो माँगो ।’एकलव्य बोला –‘गुरुदेव ,यदि प्रसन्न हैं मुझसेतो एक काम कीजिए-द्वापर में आपने कटवाया था अँगूठायह कलियुग है अपना दायाँ हाथकाटकर दे दीजिए ।------फूल कनेर केकिसने …

सीमा सचदेव की बाल कहानियाँ : आओ सुनो एक कहानी भाग 1

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बाल कहानियाँ-सीमा सचदेव1.शेर और कुत्ता
आओ बच्चो सुनो कहानी
न बादल न इसमें पानी

इक कुत्ता जंगल में रहता
और स्वयं को राजा कहता
मैं सबकी रक्षा करता हूँ
और न किसी से मैं डरता हूँ
बिन मेरे जंगल है अधूरा
असुरक्षित पूरा का पूरा
मुझ पर पूरा बोझ पड़ा है
मेरे कारण हर कोई खड़ा है
मै न रहूँ , न रहेगा जंगल
मुझसे ही जंगल में मंगल
सारे उसकी बातें सुनते
पर सुन कर भी चुप ही रहते
समझे स्वयं को सबसे स्याना
था अन्धों में राजा काना
-------------------------------------
पर यह अहम भी कब तक रहता
कब तक कोई यह बातें सुनता
इक दिन टूट गया अहँकार
जंगल में आ गई सरकार
बना शेर जंगल का राजा
खाता-पीता मोटा-ताजा
शेर ने कुत्ते को बुलवाया
और प्यार से यह समझाया
छोड़ दो तुम झूठा अहँकार
और आ जाओ मेरे द्वार
बिन तेरे नहीं जंगल सूना
यह तो फलेगा फिर भी दूना
पर कुत्ते को समझ न आई
उसने अपनी पूँछ हिलाई
----------------------------------------
मैं यहाँ पहले से ही रहता
हर कोई मुझको राजा कहता
कौन हो त…

अनुज खरे का व्यंग्य : उत्खनन सदगुणों के जीवाश्म का

उत्खनन सदगुणों के जीवाश्म का--अनुज खरेभारत के एक प्रसिद्ध नगर के बाजू म खुदाई चल रही है। विदेशों से आयातित बड़ी मशीनें काम पर लगी हैं। तुच्छ किस्म की कुछ छोटी-मंझोली मशीनें भी काम्प्लेक्स फील करते हुए बड़ी को टक्कर देने में जुटी हैं। चल क्या रहा है बॉस? भाईजान, खुदाई चल रही है।काहै कि?अरे भाई, जमीन की खुदाई चल रही है। अच्छा हां, क्यों चल रही है। सरकार के आदेश से।..... फिर क्यों? अरे भाई हाल ही में एक कमीशन ने रिपोर्ट समिट की है नैतिकता-सदाचार के पूर्ण लोप की। सो, इस बाबत खुदाई करके देखा जाएगा कि कहां लुप्त हुई है। सदाचार नैतिकतायुक्त जीवों की अंतिम कड़ी। कहीं इनके जीवाश्म यहां मिल जाएं तो उनके डीएनए परीक्षण से पता लगाया जाएगा कि कैसे, कब ये महत्वपूर्ण प्रजाति इन गुणों सहित धरा से विलुप्त हुई थी। अन्यथा तो इसे पृथ्वी से पूर्णरूप से लुप्तप्रायः ही मान लिया जाएगा। फिर बुराई को लेकर कोई परंपरागत दुख नहीं रहेगा। इस कारण पूरे आयोजन का संयोजन बिठाया गया है।होरिजेंटल, वर्टिकल में कई ‘ट्रेंचे’ लगी पड़ी हैं। कई स्तरों पर उत्खनन का प्रयास किया जा रहा है। फिलहाल प्रथम स्तर पर एक हड्डी मिली है। वै…

शिवा अग्रवाल का आलेख : गंगा को भी अब मोक्ष चाहिए

गंगा को भी अब मोक्ष चाहिए-शिवा अग्रवालगंगा जो समस्त चराचर के प्राणियों को जीवन व मोक्ष प्रदान करती है आज मानव द्वारा उसकी कैसी दुर्गति की जा रही है कि स्वयं गंगा आज अपने मोक्ष के लिए छटपटाती दिखायी दे रही है। कारण मात्र एक ही है गंगा में गिरने वाले गंदे नाले। गंगा में विभिन्न अन्य कारणों से बढ़ता प्रदूषण। इन पर लाख कोशिशों के बावजूद भी रोक लगा पाना संभव नहीं दिख रहा है। आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ तथा स्वार्थ सिद्धि के चलते मानव ने प्रकृति का हमेशा से दोहन किया परन्तु इसी दोहन की पराकाष्ठा सृष्टि के विनाश का कारण बनती है। आज मनुष्य अपने क्रियाकलापों से अपने जमींदोज होने का साजो समान तैयार कर रहा है। प्रदूषण की समस्या विकराल होकर जनमानस के सामने है। परन्तु फिर भी हम मूकदर्शक बने बैठे हैं। गंगा की अस्मिता के साथ खिलवाड़ भी इसका एक हिस्सा है। कहते हैं गंगा के दर्श, पर्श और जल के पान से ही मनुष्य पवित्र हो जाता है किन्तु गंगा का जल आज मनुष्य द्वारा अपवित्र कर दिया गया है। जो केवल दर्श मात्र तक ही सिमटकर रह गया है। स्नान और पीने के पानी योग्य गंगा का जल आज मानव ने नहीं छोड़ा। गौमुख से पूर्व मीलों …

शिवेश श्रीवास्तव की हास्य-व्यंग्य कविता – आधुनिक बहू का आधुनिक जवाब

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हास्य व्यंग्य आधुनिक बहू का आधुनिक जवाब-शिवेश श्रीवास्तवसास ने दुखी मन सेअपनी आधुनिक और कम कपड़े पहनी बहू को समझायाघर की मान मर्यादा के बारे मेंबतलायाकहा कि नारी की लाज उसके ढंके-छुपेतन में होती हैतो बहू ने हंसते हुए जवाब दिया, मां जी तन में नहींमन में होती हैसास ने फिर कहा बेटीबड़ों की सीख को इस तरह मजाक में नहीं उड़ाना चाहिएबहू ने कहा मां जी मेरा दिमाग खराब न करेंआप चुपचाप जाकरमंदिर में भजन गाइएबहू ने क्रोधित होकर फिर से कहामेरे खूबसूरत कपड़ों पर इस तरह शोर न मचाइएशादी के वक्त आपने और आपके बेटे ही नेतो मेरे मम्मी पापा से कहा थाहमें तो बस दो कपड़ों में आपकी बेटी चाहिएमैं तो आप लोगों के कहे अनुसार ही जिंदगी जीती जा रही हूंफिक्र मत करिए बाजार से एक औरटॉप और स्कर्ट लेने जा रही हूं।====संपर्क:शिवेश श्रीवास्तव9893586229Shivesh786@gmail.com-----------------चित्र - शिवेश

अनुज खरे का व्यंग्य : टेकं लोनं, घृतं पिवेत: ….

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व्यंग्यटेकं लोनं, घृतं पिवेतः ....-अनुज खरेआधुनिक युग में इंडिया के आकाश के ऊपर से तीव्र गति से चार्वाक ऋषि की आत्मा गुजर रही है। साथ में कुछ हल्के मंझोले शिष्य भी इस अनंत मात्र में उन पर बोझ बने चिमटे हुए हैं। ऋषि भौतिकवाद का आनंद नहीं ले पा रहे हैं। शिष्य सिद्धांत समझने के नाम पर उन्हें खसोटते से रहते हैं। शिष्यों में एक परवर्तीकाल में उनके सिद्धांतों के अनुसरण द्वारा ‘मोक्ष’ को प्राप्त हुआ कुछ ज्यादा ही वाचाल प्राणी है। अपनी मातृभाषा आंग्ल का प्रचंड प्रेमी भी है। अतः ऋषि को इससे बराबर ‘डर’ बना रहता है। बाकियों के सामने आंग्ल में ना जाने क्या गिटपिट करता रहता है। वो तो उनका अनुभव है, जिससे वे ‘सिचुएशन हैंडिल’ कर लेते हैं, अन्यथा तो बाकी शिष्यों के किसी और ज्ञानी संप्रदाय की ओर खिसकने का खतरा भी तैयार रहता है। फिलहाल वे मुंबई के ‘स्काई जोन’ में कुछ ठिठक गए हैं, नीचे मायानगरी असंख्य लाइटों की आगोश में भौतिकवाद-ऐश्वर्य के शीर्ष पर दमक रही है। शिष्यों की ओर नजर डालते ही समझ गए ‘ज्ञान’ देने का अद्भुत अवसर। मूढ़ शिष्यों को ज्ञान वर्षा से सराबोर कर ‘स्नातक’ ही बना देना चाहिए।- शिष्यों ! कु…

अमर ज्योति ‘नदीम’ की चंद ग़ज़लें

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ग़ज़लें

-अमर ज्योति ‘नदीम’



(1) राजा लिख राजा लिख और रानी लिख। फिर से वही कहानी लिख॥ बैठ किनांरे लहरें गिन। दरिया को तूफ़ानी लिख॥ गोलीबारी में रस घोल। रिमझिम बरसा पानी लिख॥ राम-राज के गीत सुना। हिटलर की क़ुरबानी लिख॥ राजा को नंगा मत बोल। परजा ही बौरानी लिख॥ फ़िरदौसी के रस्ते चल। मत कबीर की बानी लिख॥

(2) जिस्म और जान जिस्म और जान बिक चुके होंगे। दीन ओ ईमान बिक चुके होंगे। इन दिनों मण्डियों में रौनक है; खेत खलिहान बिक चुके होंगे। मन्दिरों मस्जिदों के सौदे में राम ओ रहमान बिक चुके होंगे। कँस बेख़ौफ़ घूमता है अब , क्रष्ण भगवान बिक चुके होंगे। ताजिरों का निज़ाम है; इसमें सारे इन्सान बिक चुके होंगे।

(3) दूर का मसला दूर का मसला घरों तक आ रहा है बाढ़ का पानी सरों तक आ रहा है। आग माना दूर है, लेकिन धुआं तो, इन सुहाने मंज़रों तक आ रहा है। लद चुके दिन चूड़ियों के,मेंहदियों के; फावड़ा कोमल करों तक आ रहा है। मंदिरों से हट के अब मुद्दा बहस का जीविका के अवसरों तक आ रहा है। इसने कुछ इतिहास से सीखा नहीं है; एक प्यासा सागरों तक आ रहा है।

(4) उसने कभी भी उसने कभी भी पीर पराई सुनी नहीं . कितना भला किया …

एक विनम्र अनुरोध – समाजसेवा के इस प्रकल्प को अपने-अपने शहरों मे शुरु करें

उज्जैन में रहने वाले श्री पीडी कुलकर्णी एक निम्न-मध्यम वर्ग के नौकरीपेशा व्यक्ति हैं। उनका एक बड़ा ऑपरेशन 2005 में सम्पन्न हुआ। उसके बाद किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या के कारण उन्हें काफ़ी दिन बिस्तर पर बिताने पड़े और पूरा परिवार उनकी सेवा में दिन-रात लगा रहा। उन दिनों उन्हें कई तरह के मेडिकल उपकरण खरीदने पड़े, जो कि उनके काम के थे, जैसे व्हील चेयर, वॉकर और फ़ोल्डिंग लेट्रिन सीट आदि। भगवान की कृपा से दो वर्ष के भीतर ही वह एकदम स्वस्थ हो गये, बीमा निगम की कृपा से उपचार में लगा कुछ प्रतिशत पैसा भी वापस मिल गया। लेकिन कुलकर्णी परिवार "पोस्ट-ऑपरेटिव केयर" पर जितना खर्च कर चुका था, उसकी आर्थिक भरपाई भी सम्भव नहीं थी, न ही इस सम्बन्ध में कोई सरकारी नियम हैं। भारत में निजी स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार तेजी से जारी है, क्योंकि सरकारी स्वास्थ्य सेवायें भ्रष्टाचार, लालफ़ीताशाही और राजनीति के चलते लगभग निष्प्राण अवस्था में पहुँच चुकी हैं। इन निजी स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ इनसे जुड़े दो उद्योग भी तेजी से पनपे हैं वे हैं दवा उद्योग तथा मेडिकल उपकरण उद्योग। जैसा कि सभी जानते हैं कि महंगाई के कारण ध…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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