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चार्ली चैप्लिन की आत्मकथा (5)

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मेरी आत्मकथाचार्ली चैप्लिनचार्ली चैप्लिन की आत्मकथा-अनुवाद : सूरज प्रकाश(पिछले अंक 4 से जारी…)सात1909 में मैं पेरिस गया। फोलीज़ बेरजेरे ने कार्नो कम्पनी को एक महीने की सीमित अवधि के लिए प्रदर्शन करने के लिए अनुबंधित किया था। मैं दूसरे देश में जाने के ख्याल से ही कितना उत्तेजित था। यात्रा शुरू करने से पहले हमने एक सप्ताह के लिए वूलविच में प्रदर्शन किये। ये एक वाहियात शहर में बिताया गया वाहियात और सड़न भरा सप्ताह था और मैं परिवर्तन की राह देख रहा था। हमें रविवार की सुबह निकलना था। मुझसे गाड़ी, बिल्कुल छूटने वाली ही थी। किसी तरह भाग कर मैंने प्लेटफार्म से छूटती गाड़ी पकड़ी। मैं सामान वाला आखिरी डिब्बा ही पकड़ पाया था। उन दिनों मुझे गाड़ियां मिस करने में महारत हासिल थी।चैनल पर तेज धूंआधार बरसात होने लगी। लेकिन कोहरे में लिपटे फ्रांस को पहली नजर से देखना कभी न भूलने वाला रोमांचक अनुभव था। ...ये इंगलैंड नहीं है। मुझे अपने आपको बार-बार याद दिलाना पड़ रहा था। ये महाद्धीप है। फ्रांस। मैंने अपनी कल्पना में हमेशा इसे देखने की अपील की थी। मेरे पिता आधे फ्रेंच थे। दरअसल, चैप्लिन परिवार मूलत: फ्रां…

चार्ली चैप्लिन की आत्मकथा (4)

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चार्ली चैप्लिनमेरी आत्म कथा-अनुवाद : सूरज प्रकाश(पिछले अंक 3 से जारी…)मैं अकेला होता चला गया। रविवारों की रात को उत्तरी शहरों में पहुंचना, अंधियारी मुख्य गली में से गुजरते हुए गिरजा घर की घंटियों की उदास टुनटुनाहट सुनना। ये सारी बातें मेरे अकेलेपन में कुछ भी न जोड़ पाती। सप्ताह के अंत की छुट्टियों के दिनों में मैं स्थानीय बाजार खंगालता, और अपनी खरीदारी करता, राशन-पानी खरीदता, मांस खरीदता जिसे मकान मालकिन पका कर दे देती। कई बार मुझे खाने और रहने की सुविधा मिल जाती और मैं तब रसोई में बैठ कर परिवार के साथ ही खाता। मुझे वह व्यवस्था अच्छी लगती क्योंकि उत्तरी इंगलैंड के रसोईघर साफ-सुथरे और भरे पूरे होते, वहां पॉलिश किए हुए फायरग्रेट होते और नीली भट्टियाँ होतीं। मकान मालकिन का ब्रेड सेंकना, और ठंडे अंधियारे दिन में से निकल कर लंकाशायर रसोई की जलती आग की लाल लौ के दायरे में आना हमेशा अच्छा लगता। वहाँ बिना सिंकी डबलरोटियों के डिब्बे भट्टी के आस-पास पार बिखरे होते, तब परिवार के साथ चाय के लिए बैठना, भट्टी से अभी-अभी निकली गरमा-गरम डबलरोटी की सोंधी-सोंधी महक, उस पर लगाया गया ताज़ा मक्खन...मैं गं…

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