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निशा भोसले की लघुकथाएं

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दो लघुकथाएँ-निशा भोसले
(1) यकीन           आपका काम अभी तो नहीं हुआ है, दो तीन दिनों में अवश्य हो जायेगा.  उस आदमी को समझाकर  लिपिक अपने काम में लगा गया.                वह आदमी फिर भी वहीं खड़ा रहा.  उसे वहीं खड़ा देखकर लिपिक ने कहा- अभी बताया ना कि आपका काम हो जायेगा, विश्वास करें.            वह आदमी फिर भी वही ठिठक कर खड़ा रहा.  यह देखकर लिपिक को रहा नही गया, उसने कुछ नाराजगी से उस आदमी से कहा- आप ही बताइये मैं आपको कैसे यकीन दिलाऊं.  वह आदमी कुछ डरा हुआ थोड़ा साहस के साथ बोला- बस!आप ये लिफाफा रख लीजिये. (2)                                    सामान              वह बुजुर्ग अस्वस्थ था.  उसने अपने सभी बच्चों को पास बुला लिया था.  और उनसे कहा- इस आलमारी में रखे सामानों में से तुम्हें जो चीजें पसंद आये अपने पास रख ले.              जो चीजें छूट गयी थी वह थी उस बुजुर्ग की डायरी, चश्मा और कुछ पुरानी तस्वीर जो उन्होंने अब तक संभाल कर रखे थे.              सभी बच्चों को प्रसन्नचित्त देखकर उन्होंने बस इतना ही कहा- इन बचे हुए सामान को मेरे पास लाकर रख दो क्योंकि इन सामानों को मैने सबसे ज्यादा अब त…

अनुज खरे का व्यंग्य : टंगड़ीमार प्रबंधन

प्रो. टीएम उर्फ 'टंगड़ीमार प्रबंधन ' --अनुज खरे
सारी दुनिया में इस समय महान कैसे बनें, महानतम सफलता कैसे पाएं टाइप की किताबों की बाढ़ आई हुई है। ऐसी ही एक किताब मेरे हाथ लग गई है। उसके लेखक और उसने सादे सिद्धांतों को मैंने पढ़ा, मानवता के इतिहास में यदा-कदा ही इतना महान काम इतनी सरल भाष में हुआ होगा, ऐसा मेरा मानना है। हालांकि जब आप खुद पढ़ लेंगे तो मान लेंगे कि मैं कितना सही कह रहा हूं। महात्वाकांक्षियों के हितार्थ अलंकार रहित यह किताब इतनी सरल और लोकल भाष में लिखी गई है कि आपको लगेगा कि जैसे आप अपने आसपास के ही किसी व्यक्ति का संस्मरण सुन रहे हों। यही इस किताब के लेखक और उसके सिद्धांत की खासियत है। खैर, मैं यों पूरी कहानी सुना दूं आप ही पढ़ लें, लेखक का प्रेरणादायी जीवन और उनका कालजयी सिद्धांत की दास्तान... नोटः यह रचना जीवन को बेहतर बनाने से संबंधित है। अतः शुरू में ही बताता चलूं कि पूरी रचना में व्यंग्य या हास्य जैसी फिजूल की चीजों को ढ़ूंंढने का अनावश्यक प्रयास कताई ना करें, प्रेरणादायी रचना को महान नजरिए से पढ़ें।
तो चलिए शुरू से शुरू करते हैं। जीवन परिचय... वैसे उनका अस…

के. पी. त्यागी की हास्य कविता : इडियट

इडियट-डॉ. के. पी. त्यागीसुप्रीम कोर्ट में, मर्डर केस पर बहस चल रही थी
वादी, प्रतिवादी में,बात बात पर झड़प चल रही थी
प्रतिवादी पक्ष का कहना था, खू़न हरीराम ने किया है
वादी पक्ष ने कबूल किया, खू़न हरीराम ने ही किया है ताज़ीरात हिन्द दफ़ा 302 के तहत,
मुज़रिम को मौत की सज़ा दी जाए
स्वर्गीय पन्ना लाल की आत्मा को
अदालत से इंसाफ़ दिया जाये श्रीमान ! ,माना खू़न हरीराम ने किया है
ख़ून उसने होश हवास में नहीं किया है
वह इडियट है, उसे कुछ भी नहीं मालूम
यह भी नहीं मालूम, कि उसे नही मालूम वह इडियट है या नहीं, अदालत बतायेगी
उसके बाद ही, अदालत फ़ैसला सुनायेगी
योर ऑनर, हम सब की है जिज्ञासा
आप ही बतायें, इडियट की परिभाषा सुनिए, इडियट वह मनुष्य है,
जो बीस तक गिनती नहीं गिन सकता
अपने माँ बाप का नाम नहीं बता सकता
जिसे यह भी पता नहीं, वह है या नही
जो मानसिक रूप से अस्वस्थ है
जो शारीरिक रूप से अस्त-व्यस्त है इस देश में हज़ारों लोग मौज़ूद हैं
जिन्हें, दस तक गिनती नहीं आती
जिन्हें माँ बाप का नाम  नहीं मालूम
माँ बाप को बच्चों नाम नहीं मालूम
कि…

बृजमोहन श्रीवास्तव का व्यंग्य : व्यंग्य हमारी समझ न आवे

आज से लगभग पचास साल पूर्व जब मैंने कोर्स की पुस्तकों के अतिरिक्त कुछ पढ़ना शुरू किया था तब मेरी समझ में यह नहीं आता था की व्यंग्य क्या है और व्यंग्य कार कौन है ,यह बात आज भी मेरी समझ में नहीं आती है , इतना जरूर समझ में आता है मैंने व्यंग्य पढ़े नहीं , व्यंग्य समझता नहीं और व्यंग्य लिखने की कोशिश करता हूँ यही व्यंग्य है /लेख में व्यक्तिगत आक्षेप ,द्विअर्थी बात या चुटकुले लेख को व्यंग्य बना देते हैं /चुटकुले और व्यंग्य का अन्तर भी मैं नही समझ पाता, क्या जिस चुटकुले को सुनकर हंसी आ जाये वह चुटकुला और जिसे सुन कर हंसी न आए वह व्यंग्य / किसी किसी को चुटकुले देर में समझ में आते है तो क्या जब तक समझ में न आवे तब तक व्यंग्य और समझ में आते ही चुटकुला हो जाता है /चेनल की बातें हास्य हैं ,व्यंग्य है , हकीकत है , फ़साना है क्या है मसलन ''''कहीं भी मत जाइयेगा , दिल थाम कर बैठिएगा ,आपके दिल दहल जायेंगे, आप देखेंगे एक ऐसी कातिल पिस्टल जो आपने अभी तक नहीं देखी होगी -केवल हम ही पहली बार आपको दिखा रहे हैं -और आप भी पहली बार इसे देखेंगे ,एक ऐसी पिस्तोल जो देखने में तो आम पिस्तोल जैसी है मगर…

सतपाल खयाल की दो ग़ज़लें

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ग़ज़ल १दरिया से तालाब हुआ हूँ
अब मैं बहना भूल गया हूँ.
तूफ़ाँ से कुछ दूर खड़ा हूँ
साहिल पर कुछ देर बचा हूँ
नज़्में ग़ज़लें सपने लेकर
बिकने मैं बाजा़र चला हूँ
हाथों से जो दी थी गाँठें
दाँतों से वो खोल रहा हूँ
यह कह — कह कर याद किया है
अब मैं तुझको भूल गया हूँ
याद ख़्याल आया वो बचपन
दूर जिसे मैं छोड़ आया हूँ. ग़ज़ल २मैं शायर हूँ ज़बाँ मेरी कभी उर्दू कभी हिंदी
कि मैंने शौक़ से बोली कभी उर्दू कभी हिंदी
न अपनों ने कभी चाहा यही तकलीफ़ दोनों की
हैं बेबस एक ही जैसी कभी उर्दू कभी हिंदी
अदब को तो अदब रखते ज़बानों पर सियासत क्यों
सियासत ने मगर बाँटी कभी उर्दू कभी हिंदी
न लफ़्जों का वतन कोई न है मज़हब कोई इनका
ये कहते हैं फ़कत दिल की कभी उर्दू कभी हिंदी
महब्बत है वतन उसका , ज़बाँ उसकी महब्बत है
ख़्याल उसने ग़ज़ल कह दी कभी उर्दू कभी हिंदी.---
और भी ग़ज़लें आप पढ़ सकते हैं सतपाल ख्याल के ब्लॉग http://aajkeeghazal.blogspot.com पर

नन्दलाल भारती की लघुकथाएं

लघुकथाएँ-नन्दलाल भारती।। कुत्ता।। लघु कथाआचार्य-लाल साहेब आपने खबर सुनी क्या। लाल साहेब-कौन सी खबर आचार्य जी। आचार्य-नेहरू नगर में एक कुत्ता पच्चास लोगों को काट लिया। लाल साहेब-आचार्य जी बस पच्चास। आचार्य जी-लाल साहेब कैसी बात कर रहे हो। एक कुत्ता पच्चास को काट लिया। आप खुशी मना रहे हो। आचार्य जी-मैं बहुत दुखी हूं। मैं कोई हनुमान नहीं हूं कि छाती फाड़कर दिखा दूं। आपको मालूम है वह कुत्ता पागल था। एक बात और आपको बता दूं कुत्ता के काटने का इलाज है। आज का आदमी जो होशो हवास में हजारों आदमियों को काट रहा है उसका कोई इलाज है। आचार्य जी-नहीं। सचमुच बहुत जहरीला हो गया है आदमी आज का।========।। एडस।। लघु कथाभ्रष्टाचारी, ठग बेइमान, दगाबाज किस्म के लोग कामयाबी पर जश्न मनाने में लगे रहते हैं। कर्मठ,परिश्रमी नेक लोग आंसू से रोटी गीली करते रहते हैं। जबकि जगजाहिर है कि दंगाबाजी से खडी की गयी दौलत की मीनार ज्वालामुखी हैं। मेहनत सच्चाई से कमाई गये चन्द सिक्के भी चांद की शीतलता देते हैं। सकून की नींद देते हैं। कहते हुए बाबा शनिदेव धम्म से टूटी काठ की कुर्सी में समा गये। जगदेव-बाबा दगाबाज लोग पूरी कायनात …

शरद तैलंग का व्यंग्य : राष्ट्रीय स्तर का पशु

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राष्ट्रीय स्तर का पशु० शरद तैलंगजिस प्रकार उत्तर भारत के निवासी दक्षिण भारत के निवासियों को चाहे वो तमिलनाडु के हो या केरल के कर्नाटक के हो या आन्ध्र प्रदेश के सभी को मद्रासी कहकर सम्बोधित करते हैं उसी प्रकार चाहे वह चीता हो तेन्दुआ हो बाध हो या शेर हो सभी शेर कहे जाते हैं. इनमें से ही कोई एक हमारा राष्ट्रीय पशु है. इस बात से चाहे शेर को एतराज हो सकता है लेकिन हम भारतवासियों को कोई आपत्ति नहीं है. अब वह यदि अपना यह सम्मान लौटाना भी चाहे तो भी उसे किसी न किसी के कहने स अपना लौटाया हुआ सम्मान वापस लेना ही पड़ेगा .हम भारतवासियों को आपत्ति इसलिए भी नहीं है क्योंकि उसके दर्शन ही दुर्लभ हैं. राष्ट्रीय ओहदा पाने वालों के दर्शन अक्सर दुर्लभ हो जाते है. उनके दर्शन पाने के लिए एक लम्बे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है . कभी कभी तो कई कई सालों तक. वैसे यदि राष्ट्रीय पशु के दर्शन न हों यही सबके लिए लाभदायक स्थिति है. उसके दर्शन होने के बाद फिर हम कुछ नहीं कर सकते जो करता है वो ही करता है. इसलिए हम लोग राष्ट्रीय पक्षी को देख कर ही काम चला लेते है. राष्ट्रीय पुष्प में तो आजकल कीचड़ की बदबू ज्यादा आने…

अनुज खरे का व्यंग्य : शीशी भरी गुलाब की...

गाडी के कार्बोरेटर, तुझे हुआ क्या है,आखिर इस धकाधक धुएं की वजह क्या है।व्यंग्यशीशी भरी गुलाब की...-अनुज खरेमैं आजकल कुछ भयंकर सी खोजबीन में लगा हूं। हालांकि मेरी खोजबीन का ताल्लुक अदीबो-अदब, शेरो-शायरी की दुनिया से है। आपको भी कुछ अजीब सा लग रहा होगा कि शेरो-शायरी में क्या भयंकर खोजा जा रहा है। हुजूर, मेरी खोजबीन बहुत गहराई लिए हुए है। मैं पता करने के प्रयास में जुटा हूं कि ट्रकों-टैंपुओं, रिक्शे के पीछे युगांतरकारी शेर लिखने वाले ये अज्ञात लोग कौन हैं, उनकी शिक्षा-दीक्षा, पठन-पाठन का लेवल क्या है, उनकी आर्थिक-सामाजिक हैसियत क्या रही होगी, वे अपनी विरासत में कैसी परंपरा को प्राप्त किए होंगे, वगैरहा-वगैरहा। मैंने अत्यंत ही सूक्ष्म दृष्टि से विश्लेषण करने के पश्चात् पाया है कि ये शेर अत्यंत ही गहन जीवन दर्शन से ओतप्रोत, मारकता से भरपूर, ताडकता से अविछिन्न, भाषिकता से लदे-फदे शायरी की अदबी दुनिया में गुलशन नंदाई हैसियत से अभिहित होते हैं। कई शेरो की तीक्ष्णता तो कमाल-ए-दाद है, मुलाहिजा फरमाएं...बुरी नजर वाले, तेरा मुंह कालादिल है तेरा काला और जां भी है कालीप्राचीनकाल में पहली-पहली बा…

आकांक्षा यादव का आलेख : खबरदार! जो अब महिलाओं व बच्चों का दिल दुखाया

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उत्तर प्रदेश में एक सरकारी अधिकारी ने शराब के नशे में धुत अपनी बेटी की सहेली से बद्सलूकी करने का प्रयास किया और बेटी द्वारा इसका विरोध करने पर उसे जमकर मारा-पीटा और सारी हदों को तोड़ते हुए अपने बेटी के साथ ही बलात्कार कर डाला। बेटी द्वारा इसकी शिकायत करने पर आला अफसरों ने घटना की जाँच का जिम्मा आरोपित अधिकारी को ही सौंप दिया। शिकायत किये जाने से बौखलाये अधिकारी पिता ने उसके बाद अपनी बेटी के साथ कई बार बलात्कार किया। अंततः प्रताड़नाओं से त्रस्त आकर बेटी ने एक दूर के रिश्तेदार के संग शादी कर ली। मर्जी के खिलाफ शादी करने पर अधिकारी पिता ने उसकी ससुराल में जमकर तोड़फोड़ की और भाड़े के लोगों द्वारा उसको ससुराल से जबरन उठवा कर अपनी अनैतिक करतूतों के गवाह बने गर्भ का गर्भपात करवा दिया। वर्ष 2001 में घटित इस घटना की रिपोर्ट राज्य महिला आयोग व अन्य संगठनों के हस्तक्षेप के बाद वर्ष 2006 में ही जाकर लिखी गयी। इसी प्रकार एक अन्य घटनाक्रम में जब एक गरीब छात्रा ने हाई स्कूल परीक्षा अच्छे अंकोंे से पास करने के बाद इण्टर में दाखिला लेना चाहा तो उसके परिजनों ने उसे डपट दिया और अंततः पढ़ाई जारी रखने से…

शरद तैलंग की दो ग़ज़लें

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दो ग़ज़लें शरद तैलंग(1)अपनी बातों में असर पैदा कर
तू समन्दर सा जिगर पैदा कर| बात इक तरफ़ा न बनती है कभी
जो इधर है वो उधर पैदा कर| कुछ भरोसा नहीं है सूरज का
तू नई रोज सहर पैदा कर| बात जो है कबीर रहिमन में
शायरी में वो हुनर पैदा कर| गंध माटी की बसे गांवों सी
एक ऐसा तू शहर पैदा कर| अपनी पहचान हो न मजहब से
मुल्क में ऐसी लहर पैदा कर| ज़ीस्त का लुत्फ जो लेना हो ‘शरद’
एक बच्चे सी नजर पैदा कर| (2)पत्थरों का ये बड़ा एहसान है
हर कदम पर अब यहां भगवान है | वो बुझा पाई न नन्हे दीप को
ये हवाओं का भी तो अपमान है | फिर खिलौनों की दुकानें सज गई
मुश्किलों में बाप की अब जान है | दफ़न है सीने में  मेरी आरजू
बन गया दिल जैसे कब्रिस्तान है | शब्द बेचारा रहा बस देखता ही
अर्थ को मिलता रहा सम्मान है | जब कोई प्यारा सा बच्चा हंस दिया
यूं लगे सरगम भरी इक तान है | आप सब के ख्वाब हों पूरे सभी
बस ‘शरद’ के दिल में यह अरमान है | ---शरद तैलंग की अन्य रचनाएँ पढ़ें उनके ब्लॉग http://www.sharadkritya.blogspot.com/ परसंपर्क:0 शरद तैलंग
   240 माला रोड हाट स्थल
   कोटा जंक्शन 324002
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सत्येन्द्र शलभ की कविताएँ

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क्या बताऊँ, बताने को क्या रह गया ।
जितना पानी था आँखों में सब बह गया ॥
०००००
फ़िर भरोसा न करना कभी आस पर,
दिल न दे बैठना ऐसे विश्वास पर,
ज़िंदगी को पड़े जब गला घोंटने ,
और लग जाएं प्रतिबन्ध हर साँस पर।
मौत भी गुदगुदाने लगे कांख में ,
तो सिवा साथ हँसने के क्या रह गया॥
क्या बताऊँ, बताने को क्या रह गया ।।
०००००
जो ये कहते थे दुनिया न उनके बगैर,
श्मशानों में लेटे हैं फैलाये पैर,
कब्र है भी कि सारे निशान मिट गए ,
लेने वाला नहीं कोई उनकी है खैर।
अर्थ अपने शलभ हैं लगे पूछने ,
ऐसे शब्दों का बस कारवां रह गया।।
क्या बताऊँ, बताने को क्या रह गया ।।---सत्येन्द्र शलभ की अन्य रचनाएँ पढ़ें उनके ब्लॉग http://satyendrashalabh.blogspot.com/ पर---(चित्र – रेखा की कलाकृति)

राजेश कुमार पाटिल की कहानी : स्मृति

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कहानीस्मृति-राजेश कुमार पाटिललीला, कुछ खास नहीं बदला है पिछले बीस वर्षों में हमारी तहसील के इकलौते सरकारी कॉलेज में, वही बिल्डिंग है, वही कक्षाएं हैं, हाँ अपनी क्लास की खिड़की से लगे हुए बगीचे के किनारे-किनारे पंक्ति से लगे अशोक के पेड़ अब काफी बड़े हो गए हैं । जहाँ पहले तार की फेंसिंग हुआ करती थी अब पक्की बाउंड्री बन गई है । कितना सुखद होता है जिस कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की उसी में अध्यापन का अवसर मिल जाना । कॉलेज प्रांगण में कदम पड़ते ही अतीत जैसे फिर जीवंत होकर वर्तमान के धरातल पर दौड़ने लगता है । मुझे याद है, कॉलेज में तुम्हारा नया-नया एडमीशन हुआ था । उस दिन फीस जमा करने की अंतिम तिथि थी । एक ही कैश काउंटर होने के कारण काउंटर पर अत्यधिक भीड़ थी छात्र-छात्रायें यद्यपि अलग अलग लाइनों में लगे हुए थे, किंतु धक्कामुक्की इतनी अधिक थी कि समझ नहीं आ रहा था कि छात्र-छात्राओं की लाईनें अलग-अलग कैसी बनी है, हर कोई जितनी जल्दी हो सके फीस जमा कर, भीड़ और धक्कामुक्की से मुक्त होना चाह रहा था । तुम भी उसी भीड में फीस जमा करने के प्रयास में लगी हुई थी कि अचानक तुम जोर-जोर से चिल्लाने लगी ’बद्तमीज …

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तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

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अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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