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October, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अनुज खरे का व्यंग्य : एक नेता का पॉलिग्राफिक टेस्ट

व्यंग्यएक नेता का पॉलिग्रॉफ़िक टेस्ट-- अनुज खरेआजकल देश में झूठ पकड़ने के पॉलिग्राफिक टेस्ट के बड़े हूल दिए जा रहे हैं। डराया जा रहा है कि कुछ छुपाया नहीं जा सकेगा। चाहे जिसको लेकर इस मशीन के सामने बैठा दिया जाता है कि बेटा सच बोल। सच का कैमिकल खोपड़े में जाकर खदबदाता नहीं है कि आदमी बोलना शुरू कर देता है, कम से कम सरकारी एजेंसियां तो मान के बैठती ही हैं कि जो बोला है वो सच ही होगा, क्योंकि पी के बोलने और सच ही बोलने के संदर्भ में सदियों से हम कन्विन्स हैं। हमारे यहां माना ही जाता है कि भले ही शपथ खाके झूठ बोल दें, लेकिन दो लोग पीके सच ही बोलते हैं। फिर तो इस गरीब को खुद सरकारी हाथों से कैमिकलपिलाई जा रही है। महकमा सेवा-टहल में जुटा है। चढ़ेगी कैसे नहीं, रंग गहरा ही आएगा, फिर इस भावना से मुग्ध सामने वाला दनादन सच उगलने लगेगा। इस तरह चलता है पॉलिग्राफिक टेस्ट। फिर एक बात अपन समझ नहीं पा रहे हैं, किस की भावनाओं को काबू करके उससे सच बुलवाया जा रहा है, लेकिन भाया अगर भावनाएं होती तो क्या बनते वे दुर्दांत अपराधी। अच्छा फिर हौसला तो देखो किन्हें कैमिकल पिला रहे हैं, जो सैकड़ों बोतलें डका…

वीरेन्द्र जैन के दो गीत

गीत१कोई कबीर अभी जिन्दा हैभाट चारणों की बस्ती मेंकोई कबीर अभी जिन्दा हैसब चुप, सबके मुंह पर तालेऑंखों में स्वारथ के जालेइनमें अलख जगाने निकलाएक फकीर अभी जिन्दा है कोई कबीर अभी जिन्दा हैसब फ्रेमों में जड़े हुये हैंमुर्दों जैसे पड़े हुये हैंलाशों के इन अम्बारों मेंकोई अधीर अभी जिन्दा हैकोई कबीर अभी जिन्दा हैअपने घर को फूंक चुका हैसारे लालच थूक चुका हैचॉंदी की जूती के आगेइक शमशीर अभी जिन्दा हैकोई कबीर अभी जिन्दा है-------गीत२चॉंदी की जूतीनंगों की बस्ती में चलती चॉंदी की जूतीपैसा जिसके पास उसी की बोल रही तूतीलक्ष्मी जिसके पास उसी का रंग है चमकीलाकौन देखता चकाचौंध मेंकाला या पीलाधूम धड़ाके में दब जाती उसकी करतूतीनंगों की बस्ती में चलती चॉंदी की जूतीउसकी गाड़ी उसके बैनरउसके ही झन्डेउसके बाबा उसके मुल्लेउसके ही पण्डेठाकुर साहब साथ हो लियेकर मूंछें नीचीनंगों की बस्ती में चलती चॉंदी की जूती----सम्पर्क:वीरेन्द्र जैन २/१ शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल (म.प्र.)

शरद तैलंग की ग़ज़लें

दो ग़ज़लें० शरद तैलंगजो अलमारी में हम अखबार के नीचे छुपाते हैंवही कुछ चंद पैसे मुश्किलों में काम आते हैं।कभी ऑखों से अश्कों का खज़ाना कम नहीं होतातभी तो हर खुशी हर ग़म में हम उसको लुटाते हैं।दुआएं दी हैं चोरों को हमेशा दो किवाड़ों नेकि जिनके डर से ही सब उनको आपस में मिलाते हैं।मैं अपने गॉंव से जब शहर की जानिब निकलता हूंतो खेतों में खड़े पौधे इशारों से बुलाते हैं। ख़ुदा हर घर में रहता है वो हम से प्यार करता हैबस इतना फर्क है हम उसको मां कहकर बुलाते हैं।‘शरद' गज़लों में जब भी मुल्क की तारीफ करता हैतो भूखे और नंगे लोग सुन कर मुस्कराते हैं।०००जब कबाड़ी घर की कुछ चीजें पुरानी ले गयावो मेरे बचपन की यादें भी सुहानी ले गया।इस तरह सौदा किया है आदमी से वक्त ने तजऱुबे देकर वो कुछ उसकी जवानी ले गया।आ गया अखबार वाला हादसे होने के बाद बातों ही बातों में वो मेरी कहानी ले गया।दिन ढले जाकर तपिश सूरज की यूं कुछ कम हुईअपने पहलू में उसे सागर का पानी ले गया़।क्या पता फिर ज़िन्दगी उससे मिलना हो न होबस ‘शरद' यह सोचकर उसकी निशानी ले गया।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की दीवाली कविता : बह उठे ज्योति की धार

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बह उठे ज्योति की धार । रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु”’कच्चे आँगन की पुती दीवारेंनन्हें मुन्नों की किलकार ।भाव-भीगे सरस हाथ जुड़कर करते हैं मनुहार ।नहा उठे द्वार-देहरी,जब सजे दीप से दीप हज़ार ॥मन बाँधो न अँधियारे से उजियारा बहुत उदास रहेगा।रो लेगा छुपकर कोने मेंपर न अपना इतिहास कहेगा ।जितनी जलती इसकी बाती,उतना झरे आँखों से प्यार ।ऐसा फैल जाए उजियाराकोई दीपक न भूल्रे राह ।आँचलमें वह गन्ध बसे करे चन्दन भी जिसकी चाह ।होंठों पर मुस्कान खेलती तिरता पलकों पर भिनसार ।युगों –युगों से घोर अँधेरा मिटता आया घिरता आया ।जैसे ही लौ बुझी नेह की वैसे ही उसने अवसर पाया ।गाँठ खोल दो जो इस उर की,बह उठे ज्योति की धार ।

अश्विनी केशरवानी का विशेष दीवाली आलेख : तुलसी में दियना जलाए हो माय

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तुलसीमेंदियनाजलाए होमायप्रो. अश्‍विनीकेशरवानीदीपावली आज केवल हिन्‍दुओं का ही त्‍योहार ही नहीं है बल्‍कि सभी वर्गो और सम्‍प्रदायों के द्वारा मनाया जाने वाला एक राष्‍ट्रीय त्‍योहार है। राष्‍ट्रीय एकता के प्रतीक यह त्‍योहार लोगों में आपसी सौहार्द्र बनाये रख्‍ाने में सहयोग करता है। पांच दिनों तक मनाए जाने वाले इस त्‍योहार के पीछे अनेक किंवदंतियां प्रचलित हैं। दीपों का यह पर्व ख्‍ाुशियों का प्रतीक है। भगवान श्रीरामचंद्र जी 14 वर्ष बनवास के दौरान अनेक राक्ष्‍ासों और रावण जैसे श्‍ाूरवीरों को मारकर जब अयोध्‍या लौटे तो न केवल अयोध्‍या में बल्‍कि पूरे ब्रह्मांड में दीप जलाकर ख्‍ाुशियां मनायी गयी थी और उनका स्‍वागत किया गया था। तब से दीप जलाकर इस पर्व को मनाने की परंपरा प्रचलित हुई। बुंदेलख्‍ांडी लोकगीतों में इस बात का उल्‍लेख मिलता है कि रामायण काल में दीवाली जेठ मास में मनायी जाती थी जिसे द्वापर युग में श्रीकृष्‍ण जी के जन्‍म के बाद कार्तिक मास की श्‍ाुक्‍ल पक्ष में मनायी जाने लगी।दीपों के इस पर्व के साथ घ्‍ारों और दुकानों की साफ सफाई और रंग रोगन भी हो जाता है। साफ सफाई से जहां साल भर से जमते …

अरविंद कुमार का दीवाली विशेष आलेख : वर्तमान भारत के द्वंद्व

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(कोश, समांतर कोश और द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी के रचयिता अरविंद कुमार का यह विशेष आलेख वर्तमान भारत के द्वंद्व, संघर्ष और टकराव युक्त सामाजिक स्थिति को बेहद पैनेपन के साथ चित्रित करता है. आत्मावलोकन हेतु प्रत्येक भारतीय के लिए आवश्यक रूप से पठनीय)लंदन में अँगरेजी के महान कोशकार जानसन के घर के बाहर अरविंद कुमार लेखक वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं। अनेक नाटकों के सफल अनुवादक हैं। नाटक और फ़िल्म जगत से निकट संबंध से बहुत कुछ सीखा है। आजकल स्वतंत्र रूप से कोश निर्माण में व्यस्त रहते हैं। (Gलक्ष्मी जी के चरण चिह्न).दीवाली पर विशेषवर्तमान भारत के द्वंद्व...लक्ष्मीजी के चरण घर घर पहुँचाने के लिएभारत के टकराते बढ़ते क़दमद्वंद्व, संघर्ष, टकराव जीवन की, प्रगति की पहली शर्त हैं। सृष्टि के आरंभ से हर जीवजाति, वनस्पति, समूह, इकाई आपस में टकराते लड़ते भिड़ते कमज़ोर के विध्वंस और मज़बूत के उत्कर्ष के साथ आगे बढ़ते रहे हैं।ये बड़ी बड़ी वैज्ञानिक सिद्धांत की बातें वैज्ञानिकों विचारकों के पल्ले डाल कर हम आधुनिक भारत के टकरावों पर नज़र डालें। आज के भारत की शुरूआत मैं सन '47 से…

अरविंद कुमार का आलेख : शब्द और भाषा

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(कोश, समांतर कोश और द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी के रचयिता अरविंद कुमार का आत्मकथ्य उन्हीं की जुबानी – “मैं मेरठ शहर के म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ा. दिल्ली से मैट्रिक किया—सन 45 में. मैट्रिक का इम्तहान देते ही मुझे कनाट सरकस में दिल्ली प्रैस में छापेख़ाने का काम सीखने बालश्रमिक के रूप में जाना पड़ा. पंदरह साल का किशोर जो बोर्ड के दसवीं के परिणाम आने पर चार विषयों में—हिंदी, संस्कृत, गणित और अँगरेजी में—डिस्टिंक्शन पाने वाला था, जिस का दिल दिमाग़ जहाँ से जो कुछ मिले ग्रहण करने को तैयार रहता था, जो हर बहती धारा में बहने से कतराता नहीं था, शब्दों के, भाषा के, पत्रकारिता के कारख़ाने में पहुँच गया. पहुँचा तो बड़े बेमन से था, लेकिन जल्दी ही रम गया और काम सीखने में लग गया.” …  )-अरविंद कुमारsamantarkosh एट gmail.comहमारी ही तरह हमारे लंदनवासी पत्रकार मित्र राकेश माधुर प्रकृति प्रेमी हैं. लंदन के पार्क में राकेश द्वारा खींचा गया हमारा एक चित्र....कोश, समांतर कोश और द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरीशब्द और भाषा...कहते हैं कि बृहस्पति जैसा गुरु…

चतुरानन झा 'मनोज' की निर्गुण प्रार्थना

निर्गुण प्रार्थनानमन करुँ मैं तुच्छ सा सेवक, हे परमेश्वर हे सरकार ।चर-अचरों के तुम हो स्वामी, तुम ही सबके पालनहार॥हे परमेश्वर हे सरकार ॥तुम से विनय, तुम्हीं से क्रीड़ा, तुम से हास, तुम्हीं से रुदन ।जन्म - मरण सब कुछ तुम ही हो, तुम ही तो जीवन संसार ॥हे परमेश्वर हे सरकार ॥तुम ही एक अमर- सब नश्वर, जल, स्थल, नभ तुम ही देवेश्वर।देह, प्राण सब कुछ तुम ही हो, कालचक्र गति के आधार॥हे परमेश्वर हे सरकार॥प्रेम में तुम, शान्ति में तुम हो, योग, भोग और श्रम में तुम होविश्व रचयिता, मधु के सूदन, तुम ही हो नदियों की धार ॥हे परमेश्वर हे सरकार ॥इस प्रकृति के कण-कण में तुम, कालचक्र के क्षण-क्षण में तुमभक्तजनों के लिए पद्म तुम, पर दुष्टों पर तुम हो असिधार ॥हे परमेश्वर हे सरकार ॥ज्ञान में तुम, वस्त्र में तुम हो, तुम हो धर्म, तुम ही तो धन होमसि में तुम, वस्त्र में तुम हो, तुम 'चतुरानन' के निराकार ॥हे परमेश्वर हे सरकार ॥: चतुरानन झा 'मनोज', सिलिगुड़ी, ( दार्जीलिंग ), पश्चिम बंगाल

सीमा सचदेव की दीपावली विषयक बाल रचनाएं

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1.
धन तेरस
नमस्कार बच्चों ,
अभी त्यौहारों का मौसम चल रहा है दुर्गा पूजा, दशहरा, करवा चौथ, धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज.....खूब मजे ले रहे है आप लोग। क्यों न ले आखिर हम भारत वासी हैं और हर त्योहार को उत्साह-उल्लास से मनाना तो हमारी परम्परा है। दीपावली के लिए तो आप सब ने सुन रखा होगा कि हम क्यों मनाने है?
दीपावली से दो दिन पहले "धनतेरस " का त्यौहार भी मनाया जाता है धन का अर्थ है लक्ष्मी और तेरस का अर्थ है तेरहवाँ दिन अर्थात् यह त्योहार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को मनाया जाता है इसको धन-त्रयोदशी भी कहा जाता है आपको पता है इस दिन लोग कुछ न कुछ खरीददारी अवश्य करते हैं। मुख्य रूप से बर्तन। आजकल तो सोने और चाँदी के गहने /बर्तन खरीदने का प्रचलन बढ़ रहा है और लोग इस
दिन एक-दूसरे को उपहार भी बाँटने लगे हैं। चलो आज मैं आपको वो कहानी सुनाती हूँ जिसके साथ यह त्योहार जुड़ा है :- ---- समुद्र मंथन धनतेरस की सुनो कहानी
कथा बड़ी ही जानी-मानी
इन्द्र था देवलोक का भूप
अति-सुन्दर था उसका रूप
धन-धान्य था अति अपार
स्वर्ग में सजता था दरबार
हो…

हिमांशु कुमार पाण्डेय का आलेख – करूणोदात्तशील ‘निराला’

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(सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’) करुणोदात्तशील ’निराला‘-हिमांशु कुमार पाण्डेयकरुणोदात्त शील एक ऐसी सुन्दर डायरी होता है जिसमें तीन सौ पैंसठ दुःख होते हैं किन्तु उसके प्रारब्ध की कार्य-कारण व्याख्या उसके कर्मों से नहीं हो सकती । प्रारब्ध उसके कर्मों से अतिरिक्त पड़ता है । उसकी गाथा हमारे मन में वीर तथा करुण रस की प्रपानक अनुभूति कराती है । उसमें भाव-द्वैत नहीं भाव का गुण-कल्प होता है । करुणोदात्तशील की उदात्तता दूसरों के विध्वंस या पराजय करने की क्षमता में नहीं, अपितु सामरिक उत्साह तथा पीड़ा सह सकने की, स्वाभिमान को अक्षुण्ण बनाये रखने की निस्सीम शक्ति में, संकल्प की वज्र कठोरता में होती है । निराला जी हिन्दी साहित्याकाश के ऐसे कवि वीर जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं जो प्रारब्ध से पराजित होकर भी हार न माने, दस हजार तीर एक साथ झेलकर भी अपना तीर छोड़ता जाय, तन चला जाय, धन चला जाय, लेकिन मन न माने । निराला जिन शक्तियों से संघर्ष करते हैं वे अखिल मानवता से, शिव मूल्यों से या स्वभावधर्म से विरोध या उनपर व्यंग करती-सी प्रतीत होती हैं; किन्तु निराला का करुणोदात्त शील सबका बंधुत्व प्राप्त कर लेता है । …

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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