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October 2008
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व्यंग्य

एक नेता का पॉलिग्रॉफ़िक टेस्ट

 

-- अनुज खरे

 

आजकल देश में झूठ पकड़ने के पॉलिग्राफिक टेस्ट के बड़े हूल दिए जा रहे हैं। डराया जा रहा है कि कुछ छुपाया नहीं जा सकेगा। चाहे जिसको लेकर इस मशीन के सामने बैठा दिया जाता है कि बेटा सच बोल। सच का कैमिकल खोपड़े में जाकर खदबदाता नहीं है कि आदमी बोलना शुरू कर देता है, कम से कम सरकारी एजेंसियां तो मान के बैठती ही हैं कि जो बोला है वो सच ही होगा, क्योंकि पी के बोलने और सच ही बोलने के संदर्भ में सदियों से हम कन्विन्स हैं। हमारे यहां माना ही जाता है कि भले ही शपथ खाके झूठ बोल दें, लेकिन दो लोग पीके सच ही बोलते हैं। फिर तो इस गरीब को खुद सरकारी हाथों से कैमिकलपिलाई जा रही है। महकमा सेवा-टहल में जुटा है। चढ़ेगी कैसे नहीं, रंग गहरा ही आएगा, फिर इस भावना से मुग्ध सामने वाला दनादन सच उगलने लगेगा। इस तरह चलता है पॉलिग्राफिक टेस्ट। फिर एक बात अपन समझ नहीं पा रहे हैं, किस की भावनाओं को काबू करके उससे सच बुलवाया जा रहा है, लेकिन भाया अगर भावनाएं होती तो क्या बनते वे दुर्दांत अपराधी। अच्छा फिर हौसला तो देखो किन्हें कैमिकल पिला रहे हैं, जो सैकड़ों बोतलें डकारें बैठे हैं सांस तक नहीं खींचते। कैमिकल-सेमिकल उनका क्या बिगाड़ लेगा, समझते नहीं हैं, लगता है कच्चे खिलाड़ी हैं। अच्छा फिर देखिए मशीन से चैक किया जा रहा है, भावनात्मक स्तर, झूठ बोलते समय बढ़ने वाली पसीने की मात्रा, जो बताएगी कि सामने वाला सच बोल रहा है कि नहीं। लोजी, इन आधारों पर दनादन बैठाए जा रहे हैं किसिम-किसम के जीवोंमशीन पर। अब देखिए एक नेता को लाए हैं। बैठा रहे हैं, मामला है करोड़ों के घोटाले का, कहते हैं पता लगा लिया जाएगा।

ठीक है भैइया, पर मशीन पर तो कुछ रहम करो, उसे तो लाए हो विदेश से। वहां वो पकड़ती है अपराधियों के झूठ जो यहां-वहां के लगभग एक से ही होते हैं, लेकिन नेतागिरी में वे हमारे बाएं पैर के अंतिम अंगुली के नाखून के बराबर भी मेधानहीं रखते। वहां का नेता किसी भी मायने में नेता के अलावा अंततः इंसान भी तो होता ही है, यहां के नेता का मायना है, जो नेता ही हो, यानी लगभग दुर्लभ प्रजाति का हो। यहां की सदियों से चली आ रही परिभाषा तो यही कहती है, जो इस परिभाषा को ठीक से नहीं समझते, वे नेता हो ही नहीं सकते हैं, लिख लो। यकीन नहीं आता तो हमारे यहां कई सालों में विकसित हुई नेता बनने की घोर कष्टशील सुदीर्घ परंपरा को ही देख लो, जिसके तहत नेता बनने की कई विशेषताओं की बात सामने आती है।

नेता बनने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आत्मज्ञान यही होता है कि संबंधित शरीर की सभी खिड़कियां खोलकर जान ले कि वो नेता मैटैरियल है। हालांकि सावधानी के नाते यह चैक कर लेना भी जरूरी होता है कि कहीं आत्मा किसी बोझ तले दबा हुआ सा तो नहीं महसूस कर रही है, क्योंकि यदि ऐसा हो रहा है तो वही बात की आप नेता नहीं बन सकते। क्योंकि नेता की आत्मा किसी भी ऐरी-गैरी बात पर दमित-बोझित महसूस करे तो हो लिए नेता, चल चुकी नेतागिरी। आत्मा यदि बुलबुला रही है तो निश्चित जान लीजिए कि अभी आफ नेता बनने की स्टैज नहीं आई है। पहले आपको इस आत्मानामक जीव का माइंड सैटपरिवर्तित करवाना होगा। हालांकि ये भी इतना आसान काम नहीं है क्योंकि आत्मा का सदियों से एक सैट पैटर्न में काम रहा है टोकने का, आदमी जरा खाल से बाहर जाता दिखे और उसे कोंचने का, पहले का आदमी भी नेता बनने से पहले इस बात को तवज्जो दे देता था, अब तो आम इनसान तक आत्मा की नहीं सुनता, नेता तो हर वक्त उसका गला घोंटने को उद्यत रहता है। अच्छा एक बात और खास आत्माके साथ नेता पूर्व से ही शरीर में उत्पन्न हो जाने वाले अल्पज्ञात तंतु जमीरका भी पूर्णरूपेण पोस्टमार्टम कर शवठिकाने लगा चुका होता है। जीभ को अपने अनुकूल कर लेता है और दिमाग होता तो भाई साहब क्यों नेता होता। गुर्दे-पिस्ते-तिल्ले आदि-आदि आइटमों पर सैकडों बोतल अल्कोहल डालकर आदत का अलजाईमर्स लगा देता है। फिर आता है दिमाग का नंबर तो इस बारे में जान लें कि दिमाग होता तो क्यों...बिलकुल सही...। यानी खुद को झांसे देने में सफल होने पर ही नेतागिरी की शुरुआत हो पाती है। अब आप खुद ही सोचिए कहां एक भारतीय नेता बनने की इतनी सुदीर्घ-सुपोषित-सुस्पष्ट-सुपाच्य परंपरा कहां, कलपुर्जों के जोड़ से बनी एक टटपुंजियां मशीन। कहीं कोई मुकाबला नहीं, और देखिए कि पिले पड़े हैं मशीन की धौंस पर नेता से सच बुलवाने के लिए। खैर, आप भी देखिए नेता को मशीन पर बैठाकर किया क्या जा रहा है। मशीन चला दी गई है। अधिकारी चारों तरफ खड़े पूछताछ में जुटे हैं, विशेषज्ञ मशीन से माप-तौल ले रहे हैं। नजारा गजब का है। देखें-

नेता कुछ-कुछ मदहोशी के आलम में हैं, दिमाग में कैमिकल खड़खड़ा रहा है। अधिकारी उनसे पूछ रहे हैं।

‘‘आप कौन हैं’’

‘‘सरकार ’’ नेताजी ने उसी आलम में जवाब दिया।

अधिकारी कड़के- ‘‘सच बताइए’’

‘‘सत्ता-अधिकार-भ्रष्टाचार-बोटियां-तंदूरी रोटियां’’

‘‘अपना नाम बताइए, अपने ढाबे का विवरण नहीं दें’’

‘‘वही बता रहा हूं, आदमी की खाल मंढी कुर्सी पर बैठी सरकार’’

‘‘ठीक है जी, तो सरकार आपने ये घोटाला कैसे किया’’

‘‘अब ठीक है तुमको मैं नौसेनाध्यक्ष बना दूंगा, पुलिस में कमांडर भी बनवा सकता हूं, घोटाले की जांच जरूर होगी, कमीशन बैठाऊंगा, घोटाला तो उस साले रामदयाल ने ही किया होगा, विरोधियों की चाल है आरोप हम पर मंढने के लिए तुमको इस्तेमाल कर रही है। एक-एक को कालापानी ट्रांसफर करवा दूंगा, नेता पर रौब गांठते हो’’

- उधर मशीन के कई बल्ब एक साथ चमक रहे हैं। स्क्रीन पर सन्नाटा छाया है।

अधिकारी ने विशेषज्ञ से पूछा, उसने बताया मशीन कुछ समझ नहीं पा रही है। विशेषज्ञ लगातार जांच कर रहे हैं। हालांकि अधिकारी भी सरकारी हैं। ऐसी मशीनों से सच बुलवाना अच्छी तरह से जानते हैं। सो पिले पड़े हैं। मशीन को ठोंक रहे हैं, हिला रहे हैं, ठोकरें मार रहे हैं कि कुछ तो बता, एटीएम मशीन की तरह कोई तो पर्ची बाहर फेंक। मशीन से कुछ झुंझलाता हुआ अधिकारी फिर नेता से पूछना शुरू कर देता है।

- ‘‘घोटाले में कितने लोग शामिल थे, कैसे किया था घोटाला, जल्दी बता’’

-‘‘ काहै का घोटाला, झुग्गी बस्ती खड़ी थी, हमसे देखा नहीं गया गरीबों का दुख, एक बिल्डर से कहकर वहां बिल्डिंगें बनवा दी, गरीबी हटाने के लिए इतना अच्छा काम किया। मान लिया सरकारी जमीन थी, तो क्या हुआ। हमने कुछ की गरीबी तो हटा दी ना, इसमें क्या घोटाला है। गरीब आराम से फ्लैटों में रह रहे हैं। विरोधियों से थोड़ी देखी जा रही होगी हमारी उपलब्धि।’’

मशीन का हरा बल्ब जलने लगा। अधिकारी ने फिर पूछा।

‘‘घोटाला अकेले किया या कई लोग शामिल थे’’

‘‘काहै का घोटाला, कैसी धांधली, हमने कोई करोड़ों नहीं खाए हैं। हम नेता हैं जनता के सेवक, जो थोड़ा बहुत बन पड़ता है लोगों के लिए कर देते हैं। फिर गरीब हैं बेचारे, एक-एक, दो-दो कोठी, दो-चार गाड़ियां, इतने से भला आज क्या होता है, कर दिया उद्धार, दे दी रहने की जगह। अब इसमें कोई बुरा माने तो ये तो अच्छी बात नहीं है ना।’’

‘‘यानी’’ अधिकारी ने फिर कहा।

‘‘यानी कुछ नहीं, जनता की सेवा ही सेवा, कहीं कुछ गलत नहीं, सब सही, एकदम कायदे से, कानून से, जनता की सौगंध’’ नेता ने कहा।

मशीन फिर हरा बल्ब जलाने लगी। अधिकारी ने विशेषज्ञ की तरफ देखा, विशेषज्ञ ने बताया मशीन बता रही है। सही बता रहा है। अधिकारी चौंके, लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है। विशेषज्ञ ने बताया मशीन झूठ नहीं बोलती। खैर, अधिकारी आगे पूछने लगा।

‘‘आपने जिंदगी में कोई गलत काम, घपला-घोटाला किया है’’

‘‘कभी नहीं। हम तो जनता के जन्मजात सेवक हैं।’’

मशीन ने फिर हरा बल्ब जला दिया।

अधिकारी के साथ अब विशेषज्ञ भी चौंका, उसने मशीन को फिर चैक किया। सारे पुर्जे ठीक, मशीन एकदम दुरुस्त हालत में। दोबारा सारे तार नेता की बॉडी में लगाए। इतने में अधिकारी ने कुछ सोचा और पूछना शुरू किया।

‘‘आपने कभी किसी चुनावी सभा में भाषण दिया है।’’

‘‘हां’’। मशीन का लाल बल्ब जलने लगा। अधिकारी ने पूछा।

‘‘कभी लाल बत्ती की गाड़ी में घूमने की तमन्ना रखी है।’’

‘‘हां’’। मशीन फिर लाल बल्ब जलाने लगी। अधिकारी ने अगला प्रश्न पूछा।

‘‘किसी पद के लिए टिकट मांगा है।’’

‘‘हां’’। फिर लाल बल्ब। प्रश्न अनवरत पूछे जा रहे हैं।

‘‘कोई गलत आरोप आप पर लगता है तो बुरा लगता है।’’

‘‘हां’’। अबकी बार मशीन के सारे लाल बल्ब चमकने लगे।

मशीन से ढेर सारे कागज निकलना शुरू हो गए। विशेषज्ञ उनके अध्ययन में लग गए। कुछ समय पश्चात् उन्होंने अधिकारी को बताया कि शुरुआत में जो उत्तर इन्होंने दिए वे सही हैं, क्योंकि उन पर ही हरा बल्ब जला। बाद के उत्तरों पर लाल बल्ब जला अर्थात् वे गलत हैं।

अधिकारी ने कहा- ऐसा कैसे हो सकता है। एक बच्चा भी बता सकता है कि नेता माने घोटाला। फिर मशीन से कैसे कह दिया फिर देखो जो सच बता रहे हैं, उन्हें मशीन झूठ बता रही है।

विशेषज्ञों ने बताया कि झूठ बोलते समय बढ़ने वाली पसीने की मात्रा, घबराहट आदि शारीरिक कारकों में परिवर्तन के आधार पर मशीन तय करती है कि आदमी सच बोल रहा है या झूठ।

‘‘याने लिख दें कि इस नेता ने कोई घोटाला नहीं किया’’-अधिकारी ने कहा।

‘‘’बिल्कुल। विशेषज्ञ ने कहा।

... तो मित्रों ऐसे हुआ एक देसी नेता और विदेशी मशीन के मुकाबले का अंत।

आपको भी जानने की दिलचस्पी होगी कि आखिर मशीन ने ऐसा विश्लेषण कैसे किया? वो तो मशीन थी। आप तो नेताओं को जानते हैं ना, लगता है नेता बनने की शुरू में दी गई सुदीर्घ परंपरा का ख्याल नहीं है आपको। नेता यानी झूठा। जिंदगी भर एक नेता इतना झूठ बोलता है कि वो गुण तो उसकी आत्मा तक में रच-बस जाता है। अब को बेचारी मशीन कहां से पकड़ती उनके झूठ-सच को। हां, बेचारी उसके सच को झूठ इसलिए बता रही थी कि उसे आदत ही नहीं है सच बोलने की। सच बोलते समय नेता सहज नहीं रहता। इस कारण पसीना-पसीना होने लगता है, ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है।

‘‘... तो मित्रों, पूरी कहानी से सरल सबक तो ये ही हाथ लगता है कि विदेशी मशीन से झूठ पकड़वाते समय किसी नेता को उस पर नहीं बैठाना चाहिए। है, ना...। ’’

इति.

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संपर्क:

 

अनुज खरे

सी-175 माडल टाउन

जयपुर।

गीत

कोई कबीर अभी जिन्दा है

भाट चारणों की बस्ती में

कोई कबीर अभी जिन्दा है

सब चुप, सबके मुंह पर ताले

ऑंखों में स्वारथ के जाले

इनमें अलख जगाने निकला

एक फकीर अभी जिन्दा है

कोई कबीर अभी जिन्दा है

सब फ्रेमों में जड़े हुये हैं

मुर्दों जैसे पड़े हुये हैं

लाशों के इन अम्बारों में

कोई अधीर अभी जिन्दा है

कोई कबीर अभी जिन्दा है

अपने घर को फूंक चुका है

सारे लालच थूक चुका है

चॉंदी की जूती के आगे

इक शमशीर अभी जिन्दा है

कोई कबीर अभी जिन्दा है

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गीत

चॉंदी की जूती

नंगों की बस्ती में चलती

चॉंदी की जूती

पैसा जिसके पास उसी की

बोल रही तूती

लक्ष्मी जिसके पास

उसी का रंग है चमकीला

कौन देखता चकाचौंध में

काला या पीला

धूम धड़ाके में दब जाती

उसकी करतूती

नंगों की बस्ती में चलती

चॉंदी की जूती

उसकी गाड़ी उसके बैनर

उसके ही झन्डे

उसके बाबा उसके मुल्ले

उसके ही पण्डे

ठाकुर साहब साथ हो लिये

कर मूंछें नीची

नंगों की बस्ती में चलती

चॉंदी की जूती

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सम्पर्क:

वीरेन्द्र जैन

२/१ शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल (म.प्र.)

दो ग़ज़लें

 

० शरद तैलंग

 

जो अलमारी में हम अखबार के नीचे छुपाते हैं

वही कुछ चंद पैसे मुश्किलों में काम आते हैं।

 

कभी ऑखों से अश्कों का खज़ाना कम नहीं होता

तभी तो हर खुशी हर ग़म में हम उसको लुटाते हैं।

 

दुआएं दी हैं चोरों को हमेशा दो किवाड़ों ने

कि जिनके डर से ही सब उनको आपस में मिलाते हैं।

 

मैं अपने गॉंव से जब शहर की जानिब निकलता हूं

तो खेतों में खड़े पौधे इशारों से बुलाते हैं।

 

ख़ुदा हर घर में रहता है वो हम से प्यार करता है

बस इतना फर्क है हम उसको मां कहकर बुलाते हैं।

 

‘शरद' गज़लों में जब भी मुल्क की तारीफ करता है

तो भूखे और नंगे लोग सुन कर मुस्कराते हैं।

०००

जब कबाड़ी घर की कुछ चीजें पुरानी ले गया

वो मेरे बचपन की यादें भी सुहानी ले गया।

 

इस तरह सौदा किया है आदमी से वक्त ने

तजऱुबे देकर वो कुछ उसकी जवानी ले गया।

 

आ गया अखबार वाला हादसे होने के बाद

बातों ही बातों में वो मेरी कहानी ले गया।

 

दिन ढले जाकर तपिश सूरज की यूं कुछ कम हुई

अपने पहलू में उसे सागर का पानी ले गया़।

 

क्या पता फिर ज़िन्दगी उससे मिलना हो न हो

बस ‘शरद' यह सोचकर उसकी निशानी ले गया।

art16

बह उठे ज्योति की धार ।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु”’

 

कच्चे आँगन की पुती दीवारें

नन्हें मुन्नों की किलकार ।

भाव-भीगे सरस हाथ जुड़कर करते हैं मनुहार ।

नहा उठे द्वार-देहरी,जब सजे दीप से दीप हज़ार ॥

 

मन बाँधो न अँधियारे से

उजियारा बहुत उदास रहेगा।

रो लेगा छुपकर कोने में

पर न अपना इतिहास कहेगा ।

जितनी जलती इसकी बाती,उतना झरे आँखों से प्यार ।

 

ऐसा फैल जाए उजियारा

कोई दीपक न भूल्रे राह ।

आँचलमें वह गन्ध बसे

करे चन्दन भी जिसकी चाह ।

होंठों पर मुस्कान खेलती तिरता पलकों पर भिनसार ।

 

युगों –युगों से घोर अँधेरा

मिटता आया घिरता आया ।

जैसे ही लौ बुझी नेह की

वैसे ही उसने अवसर पाया ।

गाँठ खोल दो जो इस उर की,बह उठे ज्योति की धार ।

 

Deepak

तुलसी में दियना जलाए हो माय

Ashwini kesharwani (WinCE)

प्रो. अश्‍विनी केशरवानी

दीपावली आज केवल हिन्‍दुओं का ही त्‍योहार ही नहीं है बल्‍कि सभी वर्गो और सम्‍प्रदायों के द्वारा मनाया जाने वाला एक राष्‍ट्रीय त्‍योहार है। राष्‍ट्रीय एकता के प्रतीक यह त्‍योहार लोगों में आपसी सौहार्द्र बनाये रख्‍ाने में सहयोग करता है। पांच दिनों तक मनाए जाने वाले इस त्‍योहार के पीछे अनेक किंवदंतियां प्रचलित हैं। दीपों का यह पर्व ख्‍ाुशियों का प्रतीक है। भगवान श्रीरामचंद्र जी 14 वर्ष बनवास के दौरान अनेक राक्ष्‍ासों और रावण जैसे श्‍ाूरवीरों को मारकर जब अयोध्‍या लौटे तो न केवल अयोध्‍या में बल्‍कि पूरे ब्रह्मांड में दीप जलाकर ख्‍ाुशियां मनायी गयी थी और उनका स्‍वागत किया गया था। तब से दीप जलाकर इस पर्व को मनाने की परंपरा प्रचलित हुई। बुंदेलख्‍ांडी लोकगीतों में इस बात का उल्‍लेख मिलता है कि रामायण काल में दीवाली जेठ मास में मनायी जाती थी जिसे द्वापर युग में श्रीकृष्‍ण जी के जन्‍म के बाद कार्तिक मास की श्‍ाुक्‍ल पक्ष में मनायी जाने लगी।

दीपों के इस पर्व के साथ घ्‍ारों और दुकानों की साफ सफाई और रंग रोगन भी हो जाता है। साफ सफाई से जहां साल भर से जमते आ रहे कचरा और गंदगी की सफाई हो जाती है और ख्‍याल से उतरे कुछ जरूरी सामान और कागजात की छंटाई सफाई हो जाती है। व्‍यापारी वर्ग के लिए तो यह नये वर्ष की श्‍ाुरूवात होती है। पुराने हिसाब किताब बराबर करना और नये ख्‍ााता बही की श्‍ाुरूवात जैसे लक्ष्‍मी आगमन का प्रतीक है। रंग रोगन से जहां मकानों और दुकानों की श्‍ाोभा बढ़ जाती है, वहीं टूटे फूटे मकानों, दीवारों और सामानों की मरम्‍मत आदि हो जाती है। मान्‍यता भी यही है कि साफ सुथरे जगहों में लक्ष्‍मी जी का वास होता है और संभवतः लोगों का यह प्रयास लक्ष्‍मी जी को बहलाने फुसलाने का माध्‍यम भी होता है। इससे एक ओर तो ध्‍ान्‍ना सेठों के घ्‍ार चमकने लगते हैं वहीं दाने दाने को मोहताज लोग एक दीप भी नहीं जला पाते। कार्तिक अमावस्‍या को मनाये जाने वाले इस त्‍योहार के प्रति पुराने जमाने में जो ख्‍ाुशी और उत्‍साह होता था उसका आज पूर्णतः अभाव देख्‍ाा जा सकता है। आज दीवाली के प्रति लोगों की ख्‍ाुशियां कृित्रम और क्ष्‍ाणिक होती है। जबकि पुराने समय में दीवाली के आगमन की तैयारी एक माह पहले से श्‍ाुरू हो जाती थी। इस दिन सबके चेहरे पर रौनक होती थी। सभी आपसी भेद भाव को भूलकर एकता के सूत्र में बंध जाया करते थे। ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, छूत-अछूत जैसा भेद नहीं होता था बल्‍कि आपसी समझ-बूझ से लोग यह त्‍योहार मनाया करते थे। पर्व और त्‍योहारों का संबंध आजकल मन से कम और ध्‍ान से ज्‍यादा होता है। सम्‍पन्‍नता विशेष आयोजनों और त्‍योहारों को विभाजित कर देती है, विपन्‍नता तो महज जीवन को जिंदा रख्‍ाती है और मरने भी नहीं देती।

दीपों का यह त्‍योहार ख्‍ाुशी, आनंद और भाईचारा का प्रतीक माना जाता है पर बदलते परिवेश में इसकी परिभाषा फिजूलख्‍ार्ची और दिख्‍ाावे ने ले लिया है। इससे मध्‍यम वर्गीय परिवारों का आर्थिक ढांचा बहुत हद तक चरमरा जाता है। हमारे समाज में उच्‍च-मध्‍यम और निम्‍न वर्गीय लोग रहते हैं। उच्‍च वर्ग का फिजुलख्‍ार्ची और भोंडा प्रदर्शन मध्‍यम और निम्‍न वर्गीय लोगों को बरगलाने के लिये काफी होता है। कुछ लोग तो इन्‍हें हेय समझने लगे हैं। निम्‍न वर्ग तो हमेशा यही समझता है कि अमीरों के लिये ही सभी त्‍योहार होते हैं। सबसे ज्‍यादा आर्थिक और सामाजिक बोझ मध्‍यम वर्गीय परिवारों के उपर ही पड़ता है। उनकी स्‍थिति सांप और छुछंदर जैसी होती है। वे त्‍योहारों को न तो छोड़ सकती है न ही उनसे जुड़ सकती है। मेरा अपना अनुभव है कि कुछ लोग इस कोशिश में रहते हैं कि अपनी दीवाली सबसे ज्‍यादा रंगीन और आकर्षक हो। इसके लिये वे अधिक ख्‍ार्च करना अपनी श्‍ाान समझते हैं। अपनी श्‍ाान और अभियान को बनाये रख्‍ाने तथा पड़ोसियों के उपर अपना रोब जमाने का यह प्रयास मात्र होता है। इससे न उसके श्‍ाान और मान में बढ़ोतरी होती है, न ही लोग उनसे जुड़ पाते हैं। सामाजिक जुड़ाव के लिये आर्थिक सम्‍पन्‍नता का भोंडा प्रदर्शन के बजाय व्‍यावहारिक होकर सादगी से इस पर्व को मनाना उचित होगा।

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संपर्क:

राघव, डागा कालोनी, चांपा (छ.ग.)

(कोश, समांतर कोश और द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी के रचयिता अरविंद कुमार का यह विशेष आलेख वर्तमान भारत के द्वंद्व, संघर्ष और टकराव युक्त सामाजिक स्थिति को बेहद पैनेपन के साथ चित्रित करता है. आत्मावलोकन हेतु प्रत्येक भारतीय के लिए आवश्यक रूप से पठनीय)

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लंदन में अँगरेजी के महान कोशकार जानसन के घर के बाहर अरविंद कुमार

लेखक वरिष्ठ पत्रकार रहे हैं। अनेक नाटकों के सफल अनुवादक हैं। नाटक और फ़िल्म जगत से निकट संबंध से बहुत कुछ सीखा है। आजकल स्वतंत्र रूप से कोश निर्माण में व्यस्त रहते हैं।

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(G लक्ष्मी जी के चरण चिह्न).

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दीवाली पर विशेष

वर्तमान भारत के द्वंद्व...

लक्ष्मीजी के चरण घर घर पहुँचाने के लिए

भारत के टकराते बढ़ते क़दम

द्वंद्व, संघर्ष, टकराव जीवन की, प्रगति की पहली शर्त हैं। सृष्टि के आरंभ से हर जीवजाति, वनस्पति, समूह, इकाई आपस में टकराते लड़ते भिड़ते कमज़ोर के विध्वंस और मज़बूत के उत्कर्ष के साथ आगे बढ़ते रहे हैं।

ये बड़ी बड़ी वैज्ञानिक सिद्धांत की बातें वैज्ञानिकों विचारकों के पल्ले डाल कर हम आधुनिक भारत के टकरावों पर नज़र डालें। आज के भारत की शुरूआत मैं सन '47 से मान कर चलता हूँ। तब मैं 17 साल का था... देशभक्ति से भरपूर, दिल्ली कांग्रेस में छोटे से स्वयंसेवक के तौर पर सक्रिय... उस साल की 14-15 अगस्त की रात हम लोगों की टोली ट्रक में लद कर करोलबाग़ की सड़कों पर मस्ती में झूमती नारे लगाती चक्कर लगाती रही। सुबह हुई तो नए जोश से भरपूर हम लाल क़िले जा पहुँचे... पंडितजी का भाषण सुनने... हज़ारों लाखों सुनने वाले थे। पंडितजी ने पूरे लंबे इतिहास का कम शब्दों में जायज़ा लेते हुए सीधी सादे शब्दों में बता दिया कि हम कौन हैं, कितने पुराने हैं और अब जाना कहाँ है।

सरकार के पास ख़ुशियों में खो जाने का समय नहीं था। पाकिस्तान बन चुका था। देश इतिहास के सब से भारी टकराव से जूझ रहा था। हर तरफ़ दंगा, मारपीट, ख़ूनखच्चर... से पार हो जाने पर ही देश बच सकता था। देश न सिर्फ़ बचा बल्कि आज दुनिया के सब से बड़े स्वतंत्र प्रजातंत्र के रूप में सब की आँखों का तारा है।

विभाजन हिंदु-मुस्लिम टकराव का परिणाम था। आज़ादी से पहले मुसलमान नेता कहते थे कि हिंदु-बहुल भारत में मुसलमान पिच जाएँगे। हिंदु नेता हिंदुत्व ख़तरे में है का नारा लगाते रहते थे। कमाल की बात यह है कि वह टकराव आज साठ साल बाद भी चल रहा है। कुछ नेताओं की रोज़ी रोटी इसी बात पर चलती है टकराव को जितना बढ़ाएँगे चढ़ाएँगे, जितने उत्तेजक नारे लगाएँगे, जितने भ्रामक तर्क पेश करेंगे, उतना ही दोनों कमाएँगे, सत्ता के क़रीब आएँगे... कई बार लगता है दोनों में मिलीभगत है...

इसी से जु़ड़ा है आतंकवाद का सवाल। आज जिस आतंकवाद से दुनिया जूझ रही है वह इसलामी आतंकवाद के नाम से जाना जाता है। हर धर्म समय समय पर कई लहरों से आंदोलित होता रहा है। कभी उग्रवाद ज़ोर पर होता है, कभी उदारतावाद। आज इसलाम उग्रवाद के भीषण दौर में है। उग्रवाद से लड़ाई भारत में ही नहीं, पाकिस्तान में, मिस्र में, सूडान में, जार्जिया में, सिंकियांग (चीन) में चल रही है। हल किसी एक के पास नहीं है। निपटने का रास्ता मात्र हथियार नहीं हैं। यह लड़ाई वैचारिक स्तर पर बहुत देर तक चलने वाली है।

हाँ, इस क्षेत्र में हम ने कुछ तरक़्क़ी भी की है... अब ईसाइयों से भी बैर भाव रहने लगा है। ध्यान देने की बात यह है कि यह बार, झगड़ा उन प्रदेशों में अधिक है जहाँ हिंदू-मुस्लिम टकराव कम है, उस के नाम पर जनता को देर तक भड़काए रखना संभव नहीं है, जैसे उड़ीसा, या फिर कर्नाटक जहाँ मुसलमानों के साथ साथ ईसाइयों की बड़ी आबादी के कारण हिंदुओं को उकसा कर सत्ता में आने का रास्ता प्रशस्त हो सकता है...

हिंदु मुसलमान, सिख ईसाई से हट कर देखें तो सब टकरावों का जड़ है आर्थिक भागीदारी। हमारे पास जितनी भी रोटी है उसमें से किसको कितनी मिलेगी?

नेताओं ने इन टकरावों की संभावना 1930 में ही देख ली थी। पंडित नेहरू ने तब कहा था कि हमें यह भी तय करना चाहिए कि आज़ादी किसके लिए होगी। देश--मतलब क्या? गाँव, शहर, किसान, व्यापारी, उद्योगपति, दिल्ली, पंजाब, बंगाल... हिंदु, मुसलमान, ईसाई, सिख, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र... अहीर, यादव... नागा, गोरखा... आदिवासी... भील, संथाल... टाटा बिरला, किसान, मज़दूर... ? आख़िर देश इनमें कोई एक है या सब किसी को मिला कर? तरह तरह के टकरावों की पूरी संभावना थी। योजना आयोग बने तो सब से पहले तय किया गया कि उद्योग किसी एक इलाक़े में नहीं हर हिस्से में फैलाए जाएँगे। विकास का मतलब होगा -- सब का विकास।

पर देखा गया कि अधिकांश मलाई उच्च वर्गों के मुँह में जा रही है। पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की माँग उठना अनिवार्य था। (अगर हिंदुओं का ही देश मान लिया जाता तो भी बहुत देर तक हिंदु का मतलब द्विज जातियाँ नहीं रह सकता था। पिछड़ी जातियाँ पिछड़ी रहें यह देर तक नहीं चल सकता था।) आरक्षण की ज़रूरत न भी पड़ती अगर समाज, सरकार, व्यापारी, कल कारख़ाने सब वर्गों के लोगों को काम मुहैया करने के लिए सचेत सक्रिय क़दम उठा रहे होते। हम जानते हैं कि कितने उच्च वर्गीय युवकों को नौकरियाँ क्षमता या क्वालिफ़िकेशन के आधार पर मिलती हैं और कितनों को सिफ़ारिश से। हम कहते कुछ भी रहें, सिफ़ारिश नौकरियों का मुख्य स्रोत रही हैं। क्वालिफ़िकेशन की बात तब आती है जब कोई सिफ़ारिशी सामने न हो।

क्वालिफ़िकेशन की बात तब तक आती रहेगी जब तक उँची नीची सभी जातियों के लोगों को पढ़ाई का समान अवसर न मिले। ग़रीबों को कम फ़ीस पर बड़े कालिजों में दाख़िला न मिल सके। मैं अपनी ही बात कहता हूँ। मैं वैश्य वंश से हूँ पर निर्धन घर से हूँ। मेरी पढ़ाई मेरठ में मुफ़्त के म्यूनिसपल स्कूल में हुई। मैट्रिक की पढ़ाई भी लगभग मुफ़्त सी, बेहद कम फ़ीस वाले स्कूलों में हुई। चार विषयों में डिस्टिंक्शन पाने के बाद भी पारिवारिक क्षमता नहीं थी कि मुझे कालिज भेजा जा सके। बाल श्रमिक के रूप में मैंने 1945 में काम करना शुरू किया। मित्रों की प्रेरणा से शाम के समय सस्ते प्राइवेट स्कूलों में पढ़ना शुरू किया। भला हो पंजाब विश्वविद्यालय का कि पचासादि दशक में दिल्ली में उन्होंने शाम के समय उच्च शिक्षा का सस्ता कालिज--कैंप कालिज--खोल दिया। नाममात्र की फ़ीस पर मैं वहाँ से अच्छे नंबरों इंग्लिश साहित्य में ऐमए कर पाया। उसी के बूते पर बाद में मैं समांतर कोश हिंदी थिसारस और द पेंगुइन इंग्लिशहिंदी/हिंदीइंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी जैसे मानक कोश दे पाया।

तो मुख्य टकराव अमीर ग़रीब सभी के लिए तरक्की के समान रास्ते खोलने के हैं। यह तभी होगा जब उच्च सिक्षा सभी को सुलभ हो। लेकिन आजकल उच्च तकनीकी शिक्षा महँगी की जा रही है। यह एक और तरीक़ा है धनी वर्गों के हाथों में सत्ता बनाए रखने का। आईईटी जैसे संस्थानों में नाममात्र की फ़ीस और आरक्षण ही निम्न वर्ग को सत्ता में भागीदारी देने का कारगर तरीक़ा है।

भाषा के टकराव भी देश में उपलब्ध कम दूध में से मलाई पाने की कोशिशों के टकराव हैं। चाहे आंध्र प्रदेश का मुल्की-ग़ैरमुल्की टकराव हो, बंबई में कभी मराठी-बनाम-मद्रासी या आज हिंदी-मराठी के नाम पर टकराव हो, मलाई के और नेतागिरी के टकराव हैं। भाषा के सवालों में इंग्लिश भाषा के पुनरुत्थान का सवाल भी है। आज़ादी से पहले हम लोग अँगरेजी को विदेशियों द्वारा हम पर लादी गई भाषा के तौर पर देखते थे। आज़ादी के नारों में एक नारा अँगरेजी के विरोध का भी था। बाद में यह नारा कई पार्टियाँ साठ सत्तर वाले दशक में भी लगाती रहीं। पर जनता ने इस नारे को सिरे से रीजैक्ट कर दिया है। '47 के बाद हमने देखा कि अँगरेजी हमारे पास एक ऐसी खिड़की या महापथ है जिससे हम संसार से संपर्क तो कर ही सकते हैं, बाहर काम करके धनदौलत भी बटोर सकते हैं। आज अँगरेजी सामाजिक और निजी तरक़्क़ी की सीढ़ी के तौर पर हर अगड़े पिछड़े वर्ग के मन में बस गई है। बहुतेरे हिंदी वाले अब भी हिंदी ख़तरे में का नारा लगा रहे हैं। जब कि मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हिंदी भी तेज़ी से बढ़ रही है। हाँ, वह हिंदी नहीं जो सरकारी संस्थानों द्वारा करोड़ों रुपए बरबाद करके बनाने की काशिश की गई थी, बल्कि वह हिंदी जो जनता, लेखक, पत्रकार और टीवी वाले बना रहे हैं--एक जीतीजागती हिंदी।

जैसा कि हमने देखा कि टकरावों के मूल में रोटी रोज़ी है। एक नारा रहा है जो कुछ भी है सबमें बराबर बाँट दो। पिछले दो सौ सालों से यह संसार के सब से मोहक नारों में रहा है। इसके पीछे भावना बिल्कुल सही है। मैं स्वयं इस नारे के साथ कई दशक रहा हूँ। पर हमेशा यह सवाल मन को सालता था कि बँटवारा किसका? ग़रीबी का या अमीरी का? अमीरी होगी तब बँटेगी न! हम ग़रीबी का वितरण करेंगे तो परिणाम क्या होगा? ग़रीब को ग़रीबी का बराबर हिस्सा मिले तो किसी के पल्ले क्या पड़ेगा? वैसा ही भूखापन, नंगापन जो 47 में ग्रामीण भारत का अभिशाप था!

आतंकवाद से लड़ने के लिए भी भूख मिटाना ज़रूरी है। इसके लिए हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने चार बातें बताईं--1) नागरिक सचेत रहें, 2) देश में एकीकृत इंटैलिजेंस विभाग हो, 3) अदालतों में मुक़दमों का निपटारा जल्द से जल्द हो, और 4) आर्थिक प्रगति के माध्यम से ग़रीबी का सफ़ाया हो।

यह चौथी बात सब से महत्त्वपूर्ण है। ग़रीबी हटाए बिना हम गहरे दलदल में धँसते चले जाएँगे। आर्थिक विकास के लिए सबसे पहली ज़रूरत है ऊर्जा उत्पादन में तेज़ी से बढोतरी। यही कारण है कि परमाणु समझौते के समर्थन में डाक्टर कलाम ने आवाज़ बुलंद की थी। इसके लिए आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हमारे प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने सरकार तक दाँव पर लगा दी। ख़ुशी की बात है कि अब यह समझौता हो चुका है और अब हम तेज़ी से परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगा सकेंगे।

परिणामस्वरूप आर्थिक क्षमता बढ़ने से देश की ताक़त बढ़ेगी। ताक़तवर देश की तरफ़ टेढ़ी नज़र से देखने की हिम्मत बड़े से बड़ा देश नहीं कर सकता, चाहे वह अमरीका हो, रूस हो, चीन हो, पाकिस्तान तो चीज़ क्या है! आज सन 47 वाला भूखा नंगा भारत नहीं है। कल वह दुनिया के सब से धनी देशों में होगा। तब के टकराव कुछ अलग तरह के होंगे। *****

संपर्क:

--अरविंद कुमार, सी-18 चंद्रनगर, ग़ाज़ियाबाद 201011

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(कोश, समांतर कोश और द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी के रचयिता अरविंद कुमार का आत्मकथ्य उन्हीं की जुबानी – “मैं मेरठ शहर के म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ा. दिल्ली से मैट्रिक किया—सन 45 में. मैट्रिक का इम्तहान देते ही मुझे कनाट सरकस में दिल्ली प्रैस में छापेख़ाने का काम सीखने बालश्रमिक के रूप में जाना पड़ा. पंदरह साल का किशोर जो बोर्ड के दसवीं के परिणाम आने पर चार विषयों में—हिंदी, संस्कृत, गणित और अँगरेजी में—डिस्टिंक्शन पाने वाला था, जिस का दिल दिमाग़ जहाँ से जो कुछ मिले ग्रहण करने को तैयार रहता था, जो हर बहती धारा में बहने से कतराता नहीं था, शब्दों के, भाषा के, पत्रकारिता के कारख़ाने में पहुँच गया. पहुँचा तो बड़े बेमन से था, लेकिन जल्दी ही रम गया और काम सीखने में लग गया.” …  )

-अरविंद कुमार

samantarkosh एट gmail.com

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हमारी ही तरह हमारे लंदनवासी पत्रकार मित्र राकेश माधुर प्रकृति प्रेमी हैं. लंदन के पार्क में राकेश द्वारा खींचा गया हमारा एक चित्र....

कोश, समांतर कोश और द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी

शब्द और भाषा...

कहते हैं कि बृहस्पति जैसा गुरु पा कर भी देवराज इंद्र हज़ारों वर्ष तक शब्द की थाह नहीं पा सके. फिर कहाँ देवों के गुरु बृहस्पति और कहाँ में. निपट अज्ञानी. मुझ जैसे लोगों के ज्ञान को संस्कृत में चंचु प्रवेश कहा जाता है. इधर उधर चोंच घुसा कर जो पाया, उसी को ज्ञान समझ लेना. जो कुछ भी मैं ने पिछले साठ बरसों में शब्दों के संसार में प्रवेश करने के बाद इधर उधर चोंच मार कर, पढ़ कर, काम कर के सीखा है, वही अपने शब्दों में लिखने की आधी अधूरी कोशिश कर रहा हूँ...

शब्द भाषा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण और अपरिहार्य कड़ी है. हमारे संदर्भ में शब्द का केवल एक अर्थ है... एकल, स्वतंत्र, सार्थक ध्वनि. वह ध्वनि जो एक से दूसरे तक मनोभाव पहुँचाती है. संसार की सभी संस्कृतियों में इस सार्थक ध्वनि को भारी महत्व दिया गया है. संस्कृत ने शब्द को ब्रह्म का दर्जा दिया था. शब्द जो स्वयं ईश्वर के बराबर है, जो फैलता है, विश्व को व्याप लेता है. ग्रीक और लैटिन सभ्यताओं में शब्द की, लोगोस logos की, महिमा का गुणगान विस्तार से है. ईसाइयत में शब्द या लोगोस को कारयित्री प्रतिभा (क्रीएटिव जीनियस creative genius) माना गया है. कहा गया है कि यह ईसा मसीह में परिलक्षित ईश्वर की रचनात्मकता ही है.

कारण यह कि भाषा आज के मानव, हम मनु मानवों या होमो सैपिएंस, के मन मस्तिष्क का, यहाँ तक कि अस्तित्व का, अंतरंग अंग है—भाषा सीखने की क्षमता, भाषा के द्वारा कुछ कहने की शक्ति. इस शक्ति के उदय ने ही मानव को संगठन की सहज सुलभ क्षमता प्रदान की और आदमी को प्रकृति पर राज्य कर पाने में सक्षम बनाया. इसी के दम पर सारा ज्ञान और विज्ञान पनपा है. शब्दों और वाक्यों से बनी भाषा के बिना समाज का व्यापार नहीं चल सकता. आदमी अनपढ़ हो, विद्वान हो, वक्ता हो, लेखक हो, बच्चा हो, बूढ़ा हो... कुछ कहना है तो उसे शब्द चाहिए, भाषा चाहिए. वह बड़बड़ाता भी है तो शब्दों में, भाषा में. गूँगे लोग अपंग माने जाते हैं. धरती के बाहर अगर कभी कोई बुद्धियुक्त जीव जाति पाई गई, तो मुझे पूरा विश्वास है कि उस में संप्रेषण का रूप कोई भी हो, उस के मूल में किसी न किसी प्रकार की व्याकृता भाषा ज़रूर होगी और शब्द ज़रूर होगा.

शब्द के बिना भाषा की कल्पना करना निरर्थक है. शब्द हमारे मन के किसी अमूर्त्त भाव, इच्छा, आदेश, कल्पना का वाचिक प्रतीक, ध्वन्यात्मक प्रतीक है. शब्द जब मौखिक था, तो मात्र हवा था. उस का अस्तित्व क्षणिक था. वह क्षणभंगुर था.

शब्द को लंबा जीवन देने के लिए कंठस्थ कर के, याद कर के, वेदों को अमर रखने की कोशिश की गई थी. वेदों को कंठस्थ करने वाले वेदी, द्विवेदी, त्रिवेदी और चतुर्वेदी ब्राह्मणों की पूरी जातियाँ बन गईं जो अपना अपना वेद पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखती थीं. इसी प्रकार क़ुरान को याद रखने वाले हाफ़िज कहलाते थे.

शब्द को याददाश्त की सीमाओं से बाहर निकाल कर सर्वव्यापक करने के लिए, लंबा जीवन देने के लिए, लिपियाँ बनीं. लिपियों में अंकित हो कर शब्द साकार चित्र या मूर्ति बन गया. वह ताड़पत्रों पर, पत्थरों पर, अंकित किया जाने लगा. काग़ज़ आया तो शब्द लिखना और भी आसान, सस्ता हो कर और भी टिकाऊ हो गया. लिपि ने शब्द को स्थायित्व दिया. काल और देश की सीमाओं से बाहर निकल कर वह व्यापक हो गया. अब वह एक से दूसरे देश और एक से दूसरी पीढ़ी तक आसानी से जा सकता था. मुद्रण कला के आविष्कार से मानव के ज्ञान में विस्तार के महाद्वार खुल गए. और अब इंटरनैट सूचना का महापथ और ज्ञान विज्ञान का अप्रतिम भंडार बन गया है. बिजली की गति से हम अपनी बात सात समंदर पार तत्काल पहुँचाते हैं.

हमारा संबंध केवल वाचिक और लिखित शब्द मात्र से है—लिपि कोई भी हो, भाषा कोई भी हो, हिंदी हो, अँगरेजी हो, या चीनी... एक लिपि में कई भाषाएँ लिखी जा सकती हैं, जैसे देवनागरी में हिंदी और मराठी, और नेपाली... हिंदी के लिए मुंडी जैसी पुरानी कई लिपियाँ थीं... हिंदी के कई काव्य ग्रंथ उर्दू लिपि में लिखे गए. आज उर्दू कविताएँ देवनागरी में छपती और ख़ूब बिकती हैं. रोमन लिपि में यूरोप की अधिकांश भाषाएँ लिखी जाती हैं. रोमन में हिंदी भी लिखी जाती है. ब्रिटिश काल में सैनिकों को रोमन हिंदी सिखाई जाती थी. आज इंटरनैट पर कई लोग हिंदी पत्रव्यवहार रोमन लिपि में ही करते हैं. रोमन में आजकल संसार की कई अन्य भाषाएँ लिखने के कई विकल्प मिलते हैं...

चीनी जापानी या प्राचीन मिस्री भाषाएँ चित्रों में लिखी जाती हैं. चित्रों में लिखी लिपि का आधुनिकतम रूप शार्टहैंड कहा जा सकता है. चित्र लिपियो में अक्षरों का होना आवश्यक नहीं है. हाँ, जो बात सब भाषाओं और लिपियों में कामन है, एक सी है, समान है, वह है शब्द. हर भाषा शब्दों में बात करती है. शब्द लिखती. सुनती और पढ़ती है.

हर भाषा का अपना एक कोड होता है. इसी लिए संस्कृत में भाषा को व्याकृता वाणी कहा गया है, नियमों से बनी और नियमों से बँधी सुव्यवस्थित क्रमबद्ध बोली. शुरू में यह कोड लिखा नहीं गया था. सब मन ही मन यह कोड जानते थे. पढ़ें या नहीं फिर भी हम यह कोड जानते हैं. यह कोड किसी भी समाज के सदस्यों के बीच एक तरह का अलिखित अनुबंध है. लिखना पढ़ना सीखने से पहले बच्चा यह कोड समझ चुका होता है.

भाषा और कोड निरंतर नवीकरण की प्रक्रिया में रहते हैं...

पहले आम आदमी भाषा बनाता है, बाद में विद्वान मग़ज़ खपा कर उस के कोड बनाते हैं. फिर आम आदमी उन कोडों को तोड़ता हुआ नए शब्द बनाता रहता है, शब्दों का रूप और अर्थ बदलता रहता है. कोडों की सीमाएँ लाँघती, बाढ़ में आई नदी की तरह किनारे तोड़ती भाषाएँ नई धाराएँ बना लेती हैं. पहले विद्वान माथा पीटते हैं, इस प्रवृत्ति को उच्छृंखलता कहते हैं, भाषा का पतन कहते हैं, फिर बाद में नए कोड बनाने में जुट जाते हैं...

इसी तरह भाषाएँ एक से कई बन जाती हैं, और कालांतर में अपने को फिर से बनाती रहती हैं. जैसे संस्कृत से अपभ्रंश, अपभ्रंशों से उत्तर भारत की आधुनिक भाषाएँ. भाषाओं को विकारों से बचाने के लिए विद्वान व्याकरण बनाते हैं, शब्दकोश बनाते हैं. जानसन और वैब्स्टर जैसे कोशकारों ने लिखा है कि उन का उद्देश्य था इंग्लिश और अमरीकन इंग्लिश को स्थायी रूप देना, उसे बिगड़ने से बचाना. उन के कोश आधुनिक संसार के मानक कोश बने. लेकिन हुआ क्या? उन के देखते देखते भाषा बदल गई, नए शब्द आ गए. फिर कोशों के नए संस्करण बनने लगे. आजकल अँगरेजी के कोशों में हर साल हज़ारों नए शब्द डाले जाते हैं.

यही तो जीवित भाषाओं का गुण है...

बहुत देर तक सैद्धांतकि बातों में न उलझ मैं सीधे सादे शब्दों में मैं अपनी रामकहानी सुनाता हूँ. कैसे मैं पत्रकारिता में, लेखन में आया, कैसे मैं थिसारसकार बन बैठा. इस कहानी में कोई बँधाबँधाया प्लाट नहीं है. नदी की धारा की तरह यह छोटे से सोते से शुरू होती है, इधर उधर भटकती बहती अपनी नियति की ओर बढ़ती रहती है.

मैं मेरठ शहर के म्युनिसिपल स्कूल में पढ़ा. दिल्ली से मैट्रिक किया—सन 45 में. मैट्रिक का इम्तहान देते ही मुझे कनाट सरकस में दिल्ली प्रैस में छापेख़ाने का काम सीखने बालश्रमिक के रूप में जाना पड़ा. पंदरह साल का किशोर जो बोर्ड के दसवीं के परिणाम आने पर चार विषयों में—हिंदी, संस्कृत, गणित और अँगरेजी में—डिस्टिंक्शन पाने वाला था, जिस का दिल दिमाग़ जहाँ से जो कुछ मिले ग्रहण करने को तैयार रहता था, जो हर बहती धारा में बहने से कतराता नहीं था, शब्दों के, भाषा के, पत्रकारिता के कारख़ाने में पहुँच गया. पहुँचा तो बड़े बेमन से था, लेकिन जल्दी ही रम गया और काम सीखने में लग गया.

सच कहें तो मेरे भावी समांतर कोश और अभी हाल ही में प्रकाशित द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी की दिमाग़ी नीवँ वहीं पड़ी. मैं ने वहाँ देखा और सीखा (उस ज़माने की तकनीक में) एक एक अक्षर या उस का टाइप कैसे ख़ानों में रखा होता है, जुड़ जुड़ कर छपता है, छप जाने के बाद फिर उन्हीं ख़ानों में वापस रख दिया जाता है. मैं ने सीखा कैसे हम अपनी आवश्यकता के अनुसार ये टाइप रखने के ख़ाने और ख़ानोंदार केस कम ज़्यादा कर सकते हैं. टाइपों का वर्गीकरण कर सकते हैं, रैकों में रख सकते हैं, मुद्रण में काम आने वाली अन्य सामग्री रखने के लिए डिब्बे बना सकते हैं. फिर जब कंपोज़िंग करने लगा, तो मैं ने सीखा कैसे एक एक अक्षर जोड़ा जाता है, कैसे एक के बाद एक शब्द रख कर पंक्तियाँ बनती हैं, कैसे ये पंक्तियाँ पैरा बनती हैं, गेली बनती हैं, पेज बनते हैं, और बनते हैं पूरा लेख, किताब, पत्रिका, अख़बार... आज यह काम कंप्यूटर पर देख मैं मुग्ध हो जाता हूँ. कहां वह ज़माना था, और कहाँ यह सुपर फ़ास्ट युग...

छापेख़ाने में कई काम किए. कई काम सीखे. कंपोज़िंग, मशीन मैनी, बुक बाइंडिंग, ख़ज़ाँचीगीरी, अँगरेजी हिंदी टाइपिंग... साथ साथ शाम के समय मैट्रिक से आगे की पढ़ाई. ऐफ़ए, बीए, और अँगरेजी साहित्य में ऐमए.

इस बीच मैं छापेख़ाने में प्रूफ़ रीडर बना. मेरे लिए नए दरवाज़े खुलने लगे. धीरे धीरे सरिता कैरेवान पत्रिकाओं के संस्थापक संपादक विश्वनाथ जी मुझे बढ़ावा देने लगे. पहले सरिता में उपसंपादक बनाया. अब लेखकों की रचनाएँ पढ़ने लगा, उन पर कमैंट देने लगा... रचना, अच्छी हो या बुरी, पढ़नी पड़ती थी. अच्छे बुरे का विवेक जागने लगा. स्वीकृत रचनाओं का संपदान करने लगा. अँगरेजी से हिंदी में अनुवाद.

जब विश्वनाथ जी आश्वस्त हो गए कि मैं अच्छी ख़ासी हिंदी लिख लेता हूँ और अँगरेजी की समझ मुझ में पनपने लगी है, जब उन्हों ने देखा कि मैं ने शाम को बी.ए. में दाख़िला ले लिया है और मेरी रुचि अँगरेजी के साथ साथ विश्व साहित्य और आधुनिक ज्ञान विज्ञान में हो गई है, तो उन्हों ने मुझे हिंदी से अँगरेजी में धकेल दिया. पहले मैं सरिता में था, अब मैं अँगरेजी की कैरेवान पत्रिका में उप संपादक बन गया.

अब आई कसाले की बात...

मेरे बहुत से कामों में एक था हिंदी से अँगरेजी में अनुवाद. मुझे नानी याद आने लगी. हिंदी से अँगरेजी कोश बहुत अच्छे नहीं थे. अब भी कुल एक दो कोश हैं जो कामचलाऊ कहे जा सकते हैं. उन में मुझे संतोषप्रद अँगरेजी शब्द न मिलते थे. मात्र इतना संतोष था कि मुझे यह पता चलने लगा था कि कौन सा शब्द मेरे संदर्भ में उपयुक्त नहीं है. इस के माने थे कि मैं अब अच्छा अँगरेजी उपसंपादक बनने की राह पर था.

शुरू हुआ मेरा शब्द संपदा से खेल

सन 52-53 में मुझे एक अनोखी पुस्तक के बारे में पता चला. पुस्तक का पूरा नाम था रोजट्स थिसारस आफ़ इंग्लिश वर्ड्स ऐंड फ़्रेज़ेज़. संक्षेप में उसे रोजट्स थिसारस ही कहते थे और हैं. मैं ने यह छोटी सी किताब तुरंत ख़रीद ली. फ़्राँसीसी मूल के कला-नाटक समीक्षक, इंजीनियर, वैज्ञानिक पीटर मार्क रोजट ने इस किताब के शब्दों का संकलन एक बिल्कुल नए क्रम से किया था. रोजट की हालत भी मेरे जैसे ही हुआ करती थी. उसे शब्द चाहिए होते थे, मिलते नहीं थे. उस ने अपने निजी काम के लिए जो सूची बनाई, वही बाद में महान पुस्तक बन गई. 1852 में छपते ही यह पुस्तक लोकप्रिय हो गई थी. इस के छपने के 101 साल बाद दिल्ली में मैं ने इस का जो संस्करण ख़रीदा वह लगभग इसी आउटडेट संस्करण का पुनर्मुद्रण था.

यह था मेरे जीवन का सब से बढ़िया ख़ज़ाना जो मुझे मिला. मानो किसी ने मुझ अली बाबा को शब्दों के रत्न भंडार में घुसने का सिम सिम खुल जा मंत्र बता दिया हो. दिन में कैरेवान के संपादन विभाग में काम करता था, रात में बी.ए. में पढ़ रहा था. सारी पढ़ाई अँगेरजी में होती थी. हिंदी से अँगरेजी में अनुवाद करना होता था. दूसरों के अंगरेजी में लिखे को जहाँ तक हो सके सुधारना होता था. नए नए शब्दों की ज़रूरत होती. लेखक के किसी एक शब्द के लिए मैं दूसरा कौन सा शब्द डालूँ, इस में कोशों से सहायता मिलती ही नहीं थी. अब रोजट में मुझे अधिकाधिक शब्द मिलने लगे.

पहले तो मैं रोजट की किताब केवल शब्द खोजने के लिए खोलता था. कोई भी पन्ना खोलता और ठगा सा रह जाता. फिर तो जब चाहे किताब खोलना, पढ़ना, पढ़ते रहना मेरे लिए लाभप्रद मनोरंजन बन गया.

तभी मैं ने चाहा था कि हिंदी में भी कोई ऐसी किताब हो.

हाँ, यह ज़रूर है कि तब मैं ने यह कभी नहीं सोचा था कि कभी पैंतालीस साल बाद एक दिन सन 1996 के दिसंबर में मैं और कुसुम भारत के पहले आधुनिक बृहद थिसारस समांतर कोश की पहली प्रति राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा को भेंट करेंगे. यह सुखद घटना भी मुझे मिले इस ख़ज़ाने का तब अकल्पित अप्रत्याशित परिणाम थी.

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दिसंबर 1996 में तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर शंकर दयाल शर्मा को समांतर कोश की प्रतियाँ भेंट करते सहरचेता अरविंद कुमार और श्रीमती कुसुम कुमार...

रोजट को ही ले कर एक और बात यहीं कह दूँ. विषयांतर तो होगा पर ठीक रहेगा. पश्चिमी देश हमेशा दावा करते हैं कि कोशकारिता का आरंभ वहाँ हुआ था. वहाँ कोशों के किसी इतिहास में भारत का ज़िक्र नहीं होता. स्वयं रोजट इस भ्रम या सुखभ्रांति में थे कि उन का थिसारस संसार का पहला थिसारस है. पुस्तक छपते छपते उन्हों ने सुना कि संस्कृत में किसी अमर सिंह ने यह काम छठी सातवीं सदी में ही कर लिया था. कहीं से अमर कोश का कोई अँगरेजी अनुवाद उन्हों ने मँगाया, इधर उधर पन्ने पलट कर देखा और भूमिका में फ़ुटनोट में टिप्पणी कर दी कि 'मैं ने अभी अभी अमर कोश देखा, बड़ी आरंभिक क़िस्म की बेतरतीब बेसिरपैर की लचर सी कृति है.'

काश, वह यह बात समझ पाए होते कि हर कोश की तरह अमर कोश भी अपने समसामयिक समाज के लिए बनाया गया था.

शब्द संकलन

शब्दों के संकलन और कोश निर्माण की बात करें तो—

सभ्यता और संस्कृति के उदय से ही आदमी जान गया था कि भाव के सही संप्रेषण के लिए सही अभिव्यक्ति आवश्यक है. सही अभिव्यक्ति के लिए सही शब्द का चयन आवश्यक है. सही शब्द के चयन के लिए शब्दों के संकलन आवश्यक हैं. शब्दों और भाषा के मानकीकरण की आवश्यकता समझ कर आरंभिक लिपियों के उदय से बहुत पहले ही आदमी ने शब्दों का लेखाजोखा रखना शुरू कर दिया था. इस के लिए उस ने कोश बनाना शुरू किया. कोश में शब्दों को इकट्ठा किया जाता है.

सब से पहले शब्द संकलन भारत में ही बने. हमारी यह शानदार परंपरा वेदों जितनी—कम से कम पाँच हज़ार साल—पुरानी है. प्रजापति कश्यप का निघंटु संसार का प्राचीनतम शब्द संकलन है. इस में 18 सौ वैदिक शब्दों को इकट्ठा किया गया है. निघंटु पर महर्षि यास्क की व्याख्या निरुक्त संसार का पहला शब्दार्थ कोश और विश्वकोश यानी ऐनसाइक्लोपीडिया है! इस महान शृंखला की सशक्त कड़ी है छठी या सातवीं सदी में लिखा अमर सिंह कृत नामलिंगानुशासन या त्रिकांड जिसे सारा संसार अमर कोश के नाम से जानता है.

भारत के बाहर संसार में शब्द संकलन का एक प्राचीन प्रयास अक्कादियाई संस्कृति की शब्द सूची है. यह शायद ईसा पूर्व सातवीं सदी की रचना है. ईसा से तीसरी सदी पहले की चीनी भाषा का कोश है ईर्या.

आधुनिक कोशों की नीवँ डाली इंग्लैंड में 1755 में सैमुएल जानसन ने. उन की डिक्शनरी आफ़ इंग्लिश लैंग्वेज (Samuel Johnson's Dictionary of the English Language) ने कोशकारिता को नए आयाम दिए. इस में परिभाषाएँ भी दी गई थीं.

असली आधुनिक कोश आया इक्यावन साल बाद 1806. अमरीका में नोहा वैब्स्टर की ए कंपैंडियस डिक्शनरी आफ़ इंग्लिश लैंग्वेज (Noah Webster's A Compendious Dictionary of the English Language) प्रकाशित हुई. इस ने जो स्तर स्थापित किया वह पहले कभी नहीं हुआ था. साहित्यिक शब्दावली के साथ साथ कला और विज्ञान क्षेत्रों को स्थान दिया गया था. कोश को सफल होना ही था, हुआ. वैब्स्टर के बाद अँगरेजी कोशों के रिवीज़न और नए कोशों के प्रकाशन का व्यवसाय तेज़ी से बढ़ने लगा. आज छोटे बड़े हर शहर में, विदेशों में तो हर गाँव में, किताबों की दुकानें हैं. हर दुकान पर कई कोश मिलते हैं. हर साल कोशों में नए शब्द शामिल किए जाते हैं.

अपने कोशों के लिए वैब्स्टर ने 20 भाषाएँ सीखीं ताकि वह अँगरेजी शब्दों के उद्गम तक जा सके. आप को जान कर आश्चर्य होगा और प्रसन्नता भी कि उन भाषाओं में एक संस्कृत भी थी. तभी उस कोश में अनेक अँगरेजी शब्दों का संस्कृत उद्गम तक वर्णित है. मैं पिछले तीस सालों से वैब्स्टर कोश का न्यू कालिजिएट संस्करण काम में ला रहा हूँ. मुझे इस में मेरे काम की हर ज़रूरी सामग्री मिल जाती है. यहाँ तक कि भारोपीय मूल वाले अँगरेजी शब्दों के संस्कृत स्रोत भी. समांतर कोश के द्विभाषी संस्करण द पेंगुइन इग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी पर काम करते करते कई बार तो अनपेक्षित जगहों पर भी शब्दों के संस्कृत मूल मिल गए. पता चला कि ईक्विवैले, बाईवैलेंट जैसे शब्दों के मूल में है संस्कृत का वलयन. एअर यानी हवा का मूल संस्कृत में है, सोनिक के मूल में हैं संस्कृत के स्वन और स्वानिक. कई बार मैं सोचता था--काश, डाक्टर रघुवीर की टीम ने और बाद में तकनीकी शब्दावली बनाने वाले सरकारी संस्थानों ने ये संस्कृत मूल जानने की कोशिश की होती! उन के बनाए शब्दों को एक भारतीय आधार मिल जाता और लोकप्रियता सहज हो जाती. ख़ैर, उन लोगों ने जो किया वह भी भागीरथ प्रयास था...

कोश कई तरह के होते हैं. किसी भाषा के एकल कोश, जैसे ऊपर लिखे अँगरेजी कोश या हिंदी से हिंदी के कोश. इन में एक भाषा के शब्दों के अर्थ उसी भाषा में समझाए जाते हैं. कोश द्विभाषी भी होते हैं. जैसे संस्कृत से अँगरेजी के कोश. सन 1872 में छपी सर मोनिअर मोनिअर-विलियम्स की (बारीक़ टाइप में 8.5"x11.75" आकार के तीन कालम वाले एक हज़ार तीन सौ तैंतीस पृष्ठों की अद्वितीय संस्कृत-इंग्लिश डिक्शनरी इस का अनुपम उदाहरण है. या आजकल बाज़ार में मिलने वाले ढेर सारे अँगेरेजी-हिंदी कोश और हिंदी-अँगरेजी कोश. इन का उद्देश्य होता है एक भाषा जानने वाले को दूसरी भाषा के शब्दों का ज्ञान देना. जिस को जिस भाषा में पारंगत होना होता है या उस के शब्दों को समझने की ज़रूरत होती है, वह उसी भाषा के कोशों का उपयोग करता है.

कोशों के पीछे सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्य भी होते हैं.

मोनिअर-विलियम्स के ज़माने में अँगरेज भारत पर राज करने के लिए हमारी संस्कृति और भाषाओं को पूरी तरह समझना चाहते थे, इस लिए उन्हों ने ऐसे कई कोश बनवाए. आज हम अँगरेजी सीख कर सारे संसार का ज्ञान पाना चाहते हैं तो हम अँगरेजी से हिंदी के कोश बना रहे हैं. हमारे समांतर कोश और उस के बाद के हमारे ही अन्य कोश भी हमारे दैश की इसी इच्छा आकांक्षा के प्रतीक हैं, प्रयास हैं.

शब्दकोश और थिसारस में अंतर

अच्छा कोश हमें शब्द का मर्म समझाता है. एक से अधिक अर्थ देता है, और कभी एक से ज़्यादा समानार्थी शब्द भी. लेकिन ये एकाधिक शब्द कोई बहुत ज़्यादा नहीं होते. बड़े कोश भाषा समझने के लिए शब्दों की व्युत्पत्ति भी बताते हैं. कुछ कोश प्रिस्क्रिपटिव या निदानात्मक निदेशात्मक कहलाते हैं. वे यह भी बताते हैं कि अमुक शब्द आंचलिक है, सभ्य है या अशिष्ट. वे शब्द के उपयोग की विधि भी बताते हैं. ऐसे आधिकारिक कोश मैं ने हिंदी में नहीं देखे हैं.

कोशकारिता पूरी तरह सामाजिक प्रक्रिया है. हर कोश अपने समसामयिक संदर्भ में रचा जाता है. कोशकार को ध्यान रखना पड़ता है कि उस का उपयोग करने वाले लोगों की ज़रूरतें क्या हैं, वह कोश को किस संदर्भ में देखेगा, उस से लाभ उठाएगा. जो कोश बच्चों के लिए लिखा गया है वह ऐम.ए. के छात्र के लिए नाकाफ़ी है. वनस्पति शास्त्र या भौतिकी के विद्यार्थी को जो कोश चाहिए उस में किसी भी फल, पेड़, वस्तु के बारे में वैज्ञानिक जानकारी होनी चाहिए. बच्चों के कोश में किसी शब्द के मोटे मोटे अर्थ लिखे जा सकते हैं. उच्च स्तर के कोश में परिभाषाएँ भी होनी चाहिएँ. प्रसंगवश यहाँ मैं बस इतना ही संकेत करूँगा कि अभी तक हिंदी के किसी कोश में परिभाषाओं का स्तर संतोषजनक नहीं है... न हिंदी के किसी एकल कोश में, न किसी अँगरेजी-हिंदी कोश में...

मैं ने अपने संपादन काल में अनुभव किया कि शब्दकोश से हमें लेखन में, संपादन में बहुत सहायता नहीं मिलती. अनुवाद में भी जो सहायता मिलती है वह आधी अधूरी होती है. संक्षेप में मैं यही कह सकता हूँ कि शब्दार्थ कोश लेखक के लिए नहीं होता. वह उस के काम आता है जो किसी अज्ञात शब्द का अर्थ जानना चाहता है या वह विद्यार्थियों के काम की चीज़ है.

लेखन में, अनुवाद में, संपादन में काम आते हैं थिसारस.

19वीं सदी के बीच में अँगरेजी थिसारसों की परंपरा बनाई रोजट ने संसार के पहले आधुनिक थिसारस की रचना कर के. 20वी सदी के अंतिम छोर पर हिंदी में इस तरह का पहला और बृहद काम था हमारा समांतर कोश - हिंदी थिसारस. और अब 21वीं सदी के सातवें वर्ष में हम ने इस में एक नई कड़ी जोड़ी है द्विभाषी थिसारस बना कर है. वह है द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी.

कोश और थिसारस के क्षेत्र अलग अलग हैं. दोनों में बहुत अंतर होता है.

एक सूत्र वाक्य में कहें तो शब्दकोश शब्द को अर्थ देता है, थिसारस अर्थ को, विचार को, शब्द देता है.

मुझे रात के लिए अँगरेजी शब्द चाहिए तो मैं हिंदी-अँगरजी कोश खोलूँगा. यदि नाइट की हिंदी चाहिए तो इंग्लिश-हिंदी डिक्शनरी काम में लाऊँगा. लेकिन मुझे रात का पर्यायवाची चाहिए, या दिन का, या राम का, या रावण का... या मुझे समय बताने वाले किसी उपकरण का नाम चाहिए, तो क्या वह कोश में मिल सकता है? मैं जानता हूँ, और आप भी जानते हैं, कि इस दिशा में कोई कोश हमारी कैसी भी मदद नहीं करता. यहाँ काम आता है थिसारस.

थिसारसकार यह मान कर चलता है कि उसे काम में लाने वाले किसी लेखक, अनुवादक, विज्ञापन लेखक, या आप को और मुझे--भाषा आती है. लेकिन हमें किसी ख़ास शब्द की तलाश है. वही रात वाला उदाहरण आगे बढ़ाता हूँ. मुझे रात नहीं तो रात का कोई और शब्द आता होगा, जैसे रजनी. नहीं तो मुझे शाम याद होगी, सुबह याद होगी. या दिन याद होगा. अब मुझे क्या करना है? बस थिसारस के अनुक्रम खंड में इन में से कोई एक शब्द खोज कर उस का पता नोट करना है. हमारे थिसारसों में क्यों कि थिसारस खंड और अनुक्रम अलग अलग जिल्दों में हैं, तो बस वह पेज खोल कर अपने सामने रखना है जहाँ वह शब्द है और उस का पता लिखा है. उस पते पर थिसारस में ढेर सारे शब्द मिल ही जाएँगे. रजनी से ता हम सीधे रात तक पहुँचेंगे, शाम, सुबह या दिन तो भी मैं एक दो पन्ने आगे पीछे पलट कर वहीं पहुँचेंगे जहाँ रात के सारे शब्द लिखे हैं. ये सभी उदाहरण मैं ने अपने समांतर कोश से लिए हैं. शीघ्र ही यह बात और स्पष्ट हो जाएगी.

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समांतर कोश

थिसारसों में सामाजिक संदर्भ मुख्य होते हैं. थिसारस बनाने वाले का काम है कि इन संदर्भों की तलाश करे. ओर अपनी किताब में इन का संकलन करे. उसे अपने समाज की मानसिकता के आधार पर काम करना होता है. एक चीज़ के लिए बहुत सारे लिंक बनाने होते हैं, ताकि किताब का उपयोग करने वाला किसी भी जगह से, कोण से, मनवांछित शब्द तक पहुँच सके. कई बार ये लिंक फ़ालतू से, जाने पहचाने से अनावश्यक लग सकते हैं. पर यही थिसारस की जान होते हैं.

अमर कोश पर अपनी कुख्यात टिप्पणी देते समय रोजट इसी तथ्य को नज़रअंदाज़ कर गए थे. मुझे शक़ है कि जीवन भर वह थिसारस के इस मर्म को समझ पाए या नहीं. अमर कोश का गठन प्राचीन भारत में वर्णों पर आधारित समाज में हुआ था. उस से सामाजिक सरोकार के एक दो उदाहरण देता हूँ. अमर कोश में संगीत नैसर्गिक गतिविधि है, वह हमें स्वर्ग वर्ग में मिलता है. लेकिन संगीतकार की गिनती शूद्र वर्ग में की गई है. गाय की गिनती जानवरों में नहीं है वैश्य वर्ग में है क्यों कि तब वैश्यों का कर्म था. इसी प्रकार हाथी राजाओं की सवारी होने के कारण क्षत्रिय वर्ग में है. यह उचित ही था. उस ज़माने के भारतीय हर चीज़ को वर्णों के आधार पर याद रखते थे. पर ये संदर्भ 21वीं सदी में हमें एक से दूसरे भाव तक नहीं ले जाते.

हम ने समांतर कोश को बनाया मानव मात्र के मन में रहने वाले सहज परस्पर संबंधों के आधार पर. जैसे: कुछ शीर्षक इस क्रम से सामने आते हैं--

ब्रहमांड, आकाश, आकाश पिंड...सौर मंडल, सूर्य चंद्रमा...पृथ्वी, भूगोल, मैदान मरुथल...

जब हम काल संबंधी शब्द कोटियों के पस पहुँचते हैं तो कुछ शीर्षक हैं...

काल, शाश्वतता, अशाश्वतता... युग... पंचाग... दिन, रात

अपनी बात और स्पष्ट करने के लिए अब मैं पेश करता हूँ, दिन और रात शीर्षकों में मिलने वाले सभी शब्दों की सूची--

दिन

53.11. दिन सं अहोरात्र सूर्याभिमुख काल, उजाला, दिनमान, दिवस, द्यौ, सूर्यकाल, सूर्योदय-सूर्यास्त काल, lअपराह्न, lपूर्वाह्न, lप्रातःकाल, lमध्याह्न, lसायंकाल, lदिवस, lधूप, lप्रकाश, tरात.

53.22. त्रिसंध्या सं त्रिकाल, त्रैकाल्य, दिन तीन भाग, संध्या.

53.33. त्रिसंध्या (सूची) सं प्रातःकाल, मध्याह्न काल, सायंकाल.

53.44. तड़का सं कुकड़ू कूँ, झुटपुटा, दिनमुख, दिनागम, निशावसान, पौ, प्रभात, प्रभात काल, बिहान, भिनसार, भुरहटा, भुरहरा, सफ़ेदा, सहर, सुबह, सूर्योदय काल, lप्रातःकाल, lब्राह्म मुहूर्त, lसूर्योदय.

53.55. प्रातःकाल सं अरुण काल, उषाकाल, कलेवा काल, दिनारंभ, पहला पहर, प्रभात, प्रातः, भोर, विहान, सकाल, सबेरा, सवेरा (विकल्प), सुबह, lपूर्वाह्न, lसूर्योदय, lझुटपुटा, lतड़का, lब्रेकफ़ास्ट, lमध्याह्न, tसायंकाल, tसूर्यास्त.

53.66. वाराणसी प्रातःकाल सं वाराणसी पूजाकाल, सुबहे बनारस, tअवध सायंकाल, tमालवा रात.

53.77. मध्यरात्रि के बाद के कुछ घंटे सं मध्यरात्रि उपरांत काल, lब्राह्म मुहूर्त.

53.88. ब्राह्म मुहूर्त सं ब्रह्ममुहूर्त, ब्रह्मरात्र, रात के पिछले पहर के अंतिम दो दंड, lतड़का, lमध्यरात्रि के बाद के कुछ घंटे.

53.99. पूर्वाह्न सं दुपहर, दोपहर, पूर्वाह्न काल, प्रातर्दिन, बारह बजे से पहले, मध्याह्न पूर्वकाल, lमध्याह्न, tअपराह्न.

53.1010. संगव बेला सं गाय चरने जाना समय, दोहन काल, संगव, संगव मुहूर्त, lग्वाला, tगोधूलि बेला.

53.1111. मध्याह्न सं जून, दिन के बारह बजे, दिनार्ध, दुपहर, दुपहरिया, दुपहरी, दोपहर, भरी दुपहर, मध्यंदिन, लंच टाइम, lपूर्वाह्न, lलंच, tअपराह्न, tमध्य रात्रि.

53.1212. अपराह्न सं अपराह्न काल, टी टाइम, तिजहरी, तिपहर, तिपहरी, तीसरा पहर, पराह्न, मध्याह्न उपरांत काल, lसायंकाल, tपूर्वाह्न.

53.1313. गोधूलि बेला सं आरंभिक सायंकाल, गाय चर कर लौटना समय, गो आगमन समय, गोधूलि, बाल संध्या, सायं संध्या, tसंगव बेला.

53.1414. सायंकाल सं अस्तकाल, दिन अंत, दिनांत, दिनास्त, दिवसांत, दिवसावसान, निशादि, प्रदोष काल, विभावरी मुख, शाम, संझा, संध्या, संध्याकाल, साँझ, सांध्यकाल, सायं, lअपराह्न, lझुटपुटा, lरात, lसूर्यास्त, tप्रातःकाल, tसूर्योदय.

53.1515. अवध सायंकाल सं लखनवी शाम, शामे अवध, lमालवा रात, tवाराणसी प्रातःकाल.

53.1616. झुटपुटा सं दिन रात संधिकाल, संगम काल, संधिकाल, संध्या, lप्रातःकाल, lरात, lसायंकाल.

53.1717. प्रातःकाल होना क्रि अँधेरा छँटना, चाँदना होना, दिन निकलना, पौ फटना, प्रभात होना, रात बीतना, lउदित होना.

53.1818. सायंकाल होना क्रि अंधकार छाना, अँधेरा छाना, दिन डूबना, दिन ढलना, दिन बीतना, रात पड़ना, lअस्त होना.

53.1919. दिवसकालीन वि उजाले का, दिन का, दिनीय, दिवसीय, सूर्यकालीन, tरात्रिकालीन.

53.2020. दिन भर चलने वाला वि दिन भर का, पूरे दिन चलने वाला, lएक दिवसीय, lपूर्ण दिवसीय, tपूर्णरात्रीय.

53.2121. दिनचर वि दिवाचर, दिवाटन, tरात्रिचर.

53.2222. प्रातःकालीन वि आरंभिक, उदयकालीन, उषाकालीन, पूर्वाह्निक, प्रभातकालीन, प्रभातीय, प्रातःकालिक, प्रातःकालीय, प्राभातिक, मार्निंग, सहरी, सूर्योदयकालीन, lमध्याह्नीय, tसायंकालीन.

53.2323. मध्याह्नीय वि उद्दिनीय, दिनार्धीय, दिवामध्यीय, दोपहरी का, मध्यंदिन, lप्रातःकालीन, lसायंकालीन.

53.2424. सायंकालीन वि अस्तकालीन, वैकालिक, शाम का, सँझवाती, सँझैया, संध्याकालिक, संध्याकालीन, सांध्य, सायंकालिक, सायंतन, सूर्यास्तकालीन, lमध्याह्नीय, tप्रातःकालीन.

53.2525. प्रातःकाल में क्रिवि अँधेरे मुँह, अलस्सुबह, गजर दम, जल्दी, तड़के, दिन निकलते निकलते, दिन निकले, निन्ने मुँह, पौ फटते, पौ फटे, प्रभात में, प्रातःकाल, भिनसारे, भुरहरे, मुँह अँधेरे, सकारे, सबेरे, सवेरे (विकल्प), सहरदम, सिदौसी, सुबह, सुबह दम, सुबह सबेरे, सुबह सुबह, lपूर्वाह्न में, tदेर रात में, tसायंकाल में.

53.2626. पूर्वाह्न में क्रिवि एऐम, दोपहर से पहले, मध्याह्न से पहले, सुबह, lप्रातःकाल में, tअपराह्न में.

53.2727. अपराह्न में क्रिवि पीऐम, शाम को, सायंकाल, lसायंकाल में, tपूर्वाह्न में.

53.2828. सायंकाल में क्रिवि अँधेरा होने पर, चिराग़ जले, दिन ढले, दिया जले, पीऐम, रात पड़े, शाम, शाम को, सँझोखैं, सरे शाम, सायं, सायंकाल, lअपराह्न में, lजल्दी रात में, lदेर रात में, lरात में, tप्रातःकाल में.

रात

54.11. रात सं अंधकार, अँधेरा, अमा, अहोरात्र सूर्यविमुख काल, कलापिनी, कालिमा, क्षपा, ज्योतिष्मती, ज्योत्स्ना, तमस्विनी, तमा, तमिस्रा, तमी, त्रियामा, नक्त, निशा, निशि, निशीथ, निशीथिनी, यामा, यामिनी, यामी, याम्या, रजनी, रत-, रतिया, रात्रि, रैन, रैना, रैनी, वासुरा, विभावरी, शब, शयन काल, शर्वरी, श्यामा, सूर्यास्त से सूर्योदय तक काल, lअमावस रात, lपूर्णिमा रात, lमध्य रात्रि, lअंधकार, lचाँदनी, lनिद्रा, lसूर्यास्त, tदिन, tप्रकाश.

54.22. अमावस रात सं अँधेरी रात, अचंद्रा, अमावस, अमावस्या, कालनिशा, चंद्रमाहीन रात, श्यामा, lदीवाली, lरात, tचाँदनी, tपूर्णिमा रात.

54.33. पूर्णिमा रात सं चौदहवीं की रात, पूनम, पूनों, पूनौं, पून्यो, पूरा चाँद रात, पूर्णिमा, राका, lशरद पूर्णिमा, lहोली, lचाँदनी, tअमावस रात.

54.44. मालवा रात सं शबे मालवा, lअवध सायंकाल, tवाराणसी प्रातःकाल.

54.55. मध्यरात्रि सं अधरात, अर्धनिशा, अर्धरात्रि, आधी रात, निशीथ, निशीथिनी, महानिशा, महारात्र, रात के बारह बजे, lरात, tमध्याह्न.

54.66. रात्रिकालीन वि तमीय, नक्तीय, निशीथीय, यामिनीय, रजनीय, रत-, रात्र, रात्रीय, tदिवसकालीन.

54.77. पूर्णरात्रीय वि पूरी रात चलने वाला, रत-, रात भर चलने वाला, रात्रीय, tदिन भर चलने वाला.

54.88. रात्रिचर वि तमचर, नक्तंचर, निशाचर, निशाटन, निशाद, निशिचर, यामिनीचर, tदिनचर.

54.99. रात्रिभक्षी वि निशाद, रात्रिभोजी, lराक्षस.

54.1010. रात में क्रिवि अँधेरे में, रात, lदेर रात में, lसायंकाल में.

54.1111. जल्दी रात में क्रिवि दिन ढले, शाम, lसायंकाल में.

54.1212. देर रात में क्रिवि गई रात, गए वक़्त, देर में, देर रात, देरी से, रात बिरात, lसायंकाल में, tप्रातःकाल में.

ये उदाहरण मैं ने समांतर कोश का संकलन क्रम दरशाने के लिए पहले तो शीर्षक सूची से और बाद में संदर्भ खंड से लिए हैं. अंतिम उद्धरण कोश के डाटा की विशदता दिखाने के लिए ही लिखा है. इतना विशद न हो तो थिसारस आज के भारत के आधुनिक हिंदी भाषी की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता.

ऊपर के उद्धरण में आप ने देखा कि एक रात शब्द हमें किस तरह अमावस, पूर्णिमा, शरद ऋतु और मालवा की रातों के नए भाव देता है और काल रात्रि जैसी अप्रत्याशित सूचना भी देता है. कभी लोग सोचते थे कि उम्र के सत्ततरवें साल के सातवें महीने की रात काल की रात होती है. वह कट जाए तो आदमी अभी और जिएगा!

थिसारसकार हमेशा अपने सामाजिक परिदृश्य में काम करता है, और उस हर वर्ग और समाज के, शहर के और गाँव के सभी तरह के उपयोक्ताओं की माँग को पूरा करने के ख्याल से शब्द संकलित करने होते हैं.

समांतर कोश का उपयोग हिंदी शब्दावली को समृद्ध करने के लिए छात्र काम में लाते रहे हैं. लेखन में और अनुवाद में भी यह सहायक सिद्ध हुआ है.

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द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी

लेकिन लोगों का कहना था कि उन हिंदी भाषियों के लिए जो आज के समाज की इच्छाओं के अनुरूप अँगरेजी ज्ञान बढ़ाना चाहते हैं, और उन अहिंदी भाषियों के लिए जो हिंदी सीख रहे हैं समांतर कोश से आगे कुछ और होना चाहिए. जैसे कोई द्विभाषी इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस और डिक्शनरी होती तो अच्छा रहता. ऐसा कोई कोश हो तो अनुवादकों की और अधिक सहायता मिल जाएगी. वह न केवल अँगरेजी से हिंदी में अनुवाद करने में और भी ज्यादा मददगार साबित होगा, बल्कि हिंदी से अँगरेजी अनुवाद में भी काम आएगा.

मित्रो, अनुवाद को ले कर बहुत से चुटकुले बनाए गए हैं, चतुर उक्तियाँ कही गई हैं. मूल के प्रति किसी अनुवाद के सच्चा और निष्ठापूर्ण होने को ले कर सतरहवीं सदी के फ़्राँसीसी अनुवादक निकोलस पैरो दा'ब्लाँकोर (Nicolas Perrot d'Ablancourt) की पुरुषवादी उक्ति कुछ अधिक ही प्रसिद्ध है--

"les belles infidèles," to suggest that translations, like women, could be either faithful or beautiful, but not both at the same time.

इस निबंध को लिखते समय मैं ने इस उक्ति का पहला अनुवाद किया, "अनुवाद किसी स्त्री की तरह या तो निष्ठापूर्ण हो सकता है या सुंदर! एक साथ दोनों नहीं." मैं इसे सुधारना चाहता था. मुझे निष्ठापूर्ण शब्द इस जगह कुछ मैं कुछ जँचना नहीं रहा था, कुछ और रखना चाहता था.

मैं अपने नवप्रकाशित द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी की शरण में गया. मैं जाँचना चाहता था कि यह कोश अनुवाद में कितना सहायक है, किसी एक भाव के लिए मुझे कितने विकल्प, कितने शब्द, कैसे शब्द देता है!

तो मैं ने दूसरा खंड इंग्लिश-हिंदी डिक्शनरी ऐंड इंडैक्स खोला. उस में faithful फ़ेथफ़ुल के 23 विकल्प दिए थे.

मैं इन में से किसी पर भी जा सकता था. लेकिन मैं ने loyal (निष्ठावान) 759.11 चुना, क्योंकि निष्ठावान मेरे लिखे निष्ठापूर्ण के सब से निकट था. कोश के पहले खंड इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस के 759वें शीर्षक में 11वें उपशीर्षक से शुरू हो रहा था नीचे लिखे शब्दों और विकल्पों का ख़ज़ाना...

759.1111. loyal adj attached, authentic, bona fide, conscientious, consistent, constant, dedicated, dependable, devoted, dutiful, ethical, fair, faithful, fast, firm, genuine, good, heart-whole, honest, infallible, intrinsic, level, moral, pledged, principled, pukka, reliable, resolute, responsible, right, righteous, right-minded, sincere, single-hearted, solid, sound, steadfast, steady, tried, tried and true, true, truehearted, trustworthy, unchanging, unfailing, unfaltering, unflinching, unshrinking, unswerving, unwavering, veracious, lhonest, lsingle-minded, ltrustworthy, tdeceitful, tdishonest, tdisloyal, tdubitable, topportunistic, ttreacherous.

759.1111. निष्ठावान वि अनवसरवादी, अपरिवर्तनशील, अविचल, ऊँचा/ऊँची, खरा/खरी, छलहीन, नमकहलाल, -निष्ठ, निष्ठापूर्ण, नेकदिल, नेकनीयत, -पर, -परायण, पाबंद, फ़रमाबरदार, बामुरौवत, बावफ़ा, भरोसेमंद, -रक्त, -राता/-राती, वफ़ादार, विश्वसनीय, विश्वस्त, सच्चा/सच्ची, सच्चे दिल का, समर्पित, स्थिर, lएकनिष्ठ, lप्रतिबद्ध, lविश्वसनीय, lसंकल्पशील, lस्वामीभक्त, tनिष्ठाहीन, tविश्वासघाती.

759.1212. loyal (to the master) adj faithful, loyal, loyal (to the crown), sincere, slavish, toady, lloyal.

759.1212. स्वामीभक्त वि टोड़ी, फ़रमाबरदार, वफ़ादार, विश्वस्त, सत्तानिष्ठ, सत्ताभक्त, स्वामीभक्तिपूर्ण, lनिष्ठावान.

759.1313. single-minded adj die-hard, dogmatic, fixed, hard and fast, loyal to a single idea, loyal to a single person, loyal to a single purpose, staunch, with one aim, with one purpose, lloyal, lresolute, tdissolute.

759.1313. एकनिष्ठ वि अटल, अडिग, अनन्य, अनन्यपरायण, एकाश्रयी, चट्टानी, दृढ़, lनिष्ठावान, lलगनशील, lसंकल्पशील, tविचलनशील.

759.1414. committed adj bent, bent on, dedicated, determined, devoted, eager, faithful, hard-line, intent, intent on, -minded, pledged, plighted, set on, sincere, single-minded, ldogmatic, lfull of striving, lhardworking, lloyal, lpersevering, lresolute, tirresponsible, tuncommitted.

759.1414. प्रतिबद्ध वि आमादा, उतारू, उद्धत, कटिबद्ध, कट्टर, कृतसंकल्प, गंभीर, जाँनिसार, तत्पर, तैयार, दृढ़, नधा/नधी, -निष्ठ, पक्का/पक्की, स्थिर, lधीर, lपरिश्रमी, lलगनशील, lसंकल्पशील, lसन्नद्ध, tअप्रतिबद्ध, tदायित्वहीन.

759.1515. deceitless adj aboveboard, all right, artless, candid, childlike, clean, cleanhanded, conscientious, correct, deceptionless, fair, fair and square, forthright, fraudless, genuine, guileless, harmless, honest, innocent, just, level, moral, on the level, open, openhearted, pretenceless, reliable, right, righteous, scrupulous, sincere, transparent, true, uncalculating, undesigning, veracious, wileless, lhonest, ljust, lrighteous, ltransparent, ltrue, ltrustworthy, tdishonest, thypocritical, ttraitorous, tunfair, twicked.

759.1515. छलहीन वि अकुटिल, अछल, ईमानदार, कपटहीन, खुला/खुली, खुले दिल वाला, छलकपटहीन, निशठ, निश्छल, निष्कपट, नेकदिल, भद्र, भला/भली, मासूम, विश्वसनीय, शुद्ध, शुद्धहृदय, शुद्धाशय, सच्चा/सच्ची, सच्चे दिल का, सरल, साँचा/साँची, साफ़, साफ़दिल, सिद्दीक़, सीधा/सीधी, सीधा सादा/सीधी सादी, हानिहीन, lपारदर्शी, lविश्वसनीय, lसत्यप्रेमी, tकुटिल, tछलपूर्ण, tपाखंडपूर्ण, tबनावटी.

759.1616. impartial adj detached, disinterested, egalitarian, equable, equidistant, equitable, evenhanded, fair, fair and square, fair-minded, honest, indiscriminative, judicious, just, level, neutral, nonpartisan, objective, on the fence, open-minded, reasonable, right, straight, unbiased, uncommitted, uninterested, uninvolved, unprejudiced, upright, legalitarian, lfair-minded, ljust, lnonaligned, tfactionalist, thaving vested interest, tinequitable, tpartial, tselfish, tunjust.

759.1616. निष्पक्ष वि अनपेक्ष, अपक्षपाती, अलगथलग, उदासीन, तटस्थ, तुल्यदर्शी, निरपेक्ष, न्यायपूर्ण, पक्षपातहीन, भेदभावहीन, समचेता, समदर्शी, lगुटहीन, lन्यायप्रिय, lभेदभावहीन, lसमव्यवहारी, tगुटबाज़, tपक्षपातपूर्ण, tस्वार्थी.

759.1717. loyally adv conscientiously, constantly, devotedly, earnestly, faithfully, from the bottom of one's heart, genuinely, sincerely, staunchly, steadfastly, steadily, unfalteringly, with allegiance, with constancy, with fidelity, lregularly, lreligiously, lresponsibly.

759.1717. निष्ठापूर्वक क्रिवि अडिगतः, अविचलतः, एकनिष्ठतः, एकभावतः, दिल से, निष्ठतः, निष्ठा से, लगातार, वफ़ादारी से, हार्दिकतः, lदायित्वपूर्वक, lधार्मिकतः, lनियमिततः.

उपशीर्षक 11 में ही मुझे बावफ़ा शब्द मिला. शायरी में वफ़ा, बेवफ़ाई आदि बहुत चलते हैं. पिछले अनुवाद को सुधार कर मैं ने अब लिखा--अनुवाद किसी स्त्री की तरह या तो बावफ़ा हो सकता है या सुंदर! एक साथ दोनों नहीं.

बावफ़ा लिख दिया तो इसे और भी सुधारने का मन किया. मैं ने उक्ति को फिर से लिखा--अनुवाद माशूक़ा की तरह या तो बावफ़ा होगा या ख़ूबसूरत... एक साथ दोनों नहीं. ब्लांकोर की छोटी सी उक्ति के पीछे जो अकथित भाव था, वह यही था कि वफ़ा और ख़ूबसूरती एक साथ देखे नहीं मिलतीं.

यह एक छोटा सा उदाहरण है इस बात का कि द्विभाषी थिसारस को कारगर होना है तो विशद और विस्तृत होने के साथ साथ उस की शब्दावली की विविधता भी उतनी ही ज़रूरी है. अगर हर तरह की शब्दावली को शामिल नहीं किया गया तो वह पूरा काम नहीं कर पाएगा. न तो वह लेखक को संबद्ध विचारों तक ले जा सकेगा, न नए से नया शब्द सुझा सकेगा. अनुवाद सुधारने में भी यह तभी समर्थ उपकरण सिद्ध होगा, जब इन शर्तों को पूरा करे.

मुझे इस कोश से कई भावी संभावनाएँ नज़र आती हैं. कुछ देर के लिए हम इसे रा मैटीरियल मान लें. और सोचें कि अब हमारे पास एक कामचलाऊ ढाँचा है, नीवँ है. इस के अँगरेजी डाटा के सहारे हम हिंदी को एक तरफ़ सभी अहिंदी भाषाओं से जैसे जापानी, फ़्राँसीसी, जरमन, रूसी से जोड़ सकते हैं, दूसरी तरफ़ हिंदी डाटा के सहारे भारत की सभी भाषाओं से जोड़ सकते हैं.

जब यूनिकोड ने कंप्यूटर पर जापान, चीन से ले कर सुदूर पश्चिम की हवाई लिपियों को जोड़ दिया तो सब भाषाएँ क्यों नहीं जोड़ी जा सकतीं? यह सवाल मुझे खाए जा रहा है. यह काम कोई दस बीस साल में पूरा होने वाला नहीं है. हमारे सामने डच भाषा के कोश हेत वूर्डनबीक डेर नीडरलांड्ष ताल (संक्षेप में डब्लूऐनटी) (het Woordenboek der Nederlandsche Taal (WNT)). का उदाहरण है. इस पर काम शुरू हुआ 1864 में और 134 साल बाद पूरा हुआ 1998 में. तो कहीं कोई इच्छा हो, कहीं से कई पीढ़ियों तक अच्छे आर्थिक अनुदान की संभावना हो, जैसे यूऐनओ से, तो मानव जाति यह कर दिखा सकती है. क्यों नहीं?

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संपर्क:

--अरविंद कुमार, सी-18 चंद्र नगर, गाज़ियाबाद 201011

samantarkosh एट gmail.com

परिचय:

अरविंद कुमार

जन्म: 17 जनवरी 1930. मेरठ, उत्तर प्रदेश

शिक्षा: ऐम.ए. (अँगरेजी साहित्य)

हिंदी भाषा को संस्कृत के अमर कोश और रोजट के अँगरेजी थिसारस जैसा बृहद् समांतर कोशहिंदी थिसारस और अब द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी/हिंदी-इंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी देने वाले और आजकल हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना के अवैतनिक प्रधान संपादक अरविंद कुमार लेखक, कवि, समीक्षक, अनुवादक, पत्रकार रहे हैं.

मिडिल क्लास तक की शिक्षा मेरठ में हुई. 1943 में उन के समाज सुधारक और स्वतंत्रता सैनिक पिता श्री लक्ष्मण स्वरूप काम की तलाश में सपत्नीक दिल्ली चले आए. कुछ दिन बाद अरविंद कुमार ने दिल्ली से 1945 में मैट्रिक पास किया. चार विषयों मेंहिंदी, संस्कृत, गणित, इतिहास और अँगरेजीमें डिस्टिंक्शन प्राप्त किया. उन्हें इस बात का गर्व है कि मैट्रिक में उन के हिंदी शिक्षक थे पंजाबी के शीर्ष कवि स्वर्गीय डाक्टर हरभजन सिंह, जिन्हों ने तब करोल बाग़ के खालसा हाई स्कूल में अध्यापन आरंभ ही किया था.

अरविंद ने अपना कार्य जीवन मैट्रिक का परीक्षा फल आने से पहले ही 1 अप्रैल 1945 से पंदरह वर्ष की उमर में एक बाल श्रमिक के रूप में दिल्ली के प्रसिद्ध मुद्रणालय (दिल्ली प्रैस) में डिस्ट्रब्यूटिंग कंपोज़िंग सीखने से आरंभ किया. कुछ ही महीनों में दिल्ली प्रैस से हिंदी की पारिवारिक पत्रिका सरिता का प्रकाशन आरंभ हुआ. संपादन विभाग तक पहुँचने के लिए अरविंद ने छः साल तक कंपोज़ीटर, मशीनमैन, कैशियर, टाइपिस्ट और प्रूफ़रीडर के तौर पर काम किया. साथ साथ वे सायंकालीन संस्थानों में पढ़ भी रहे थे. सरिता में उप संपादक से सहायक संपादक और फिर दिल्ली प्रैस की ही प्रसिद्ध अँगरेजी पत्रिका कैरेवान में सहायक संपादक पद पर वे सन 1963 के मध्य तक रहे. उन की देखरेख में उर्दू सरिता और हिंदी मुक्ता का प्रकाशन भी आरंभ हुआ.

कैरेवान के बाद अरविंद मुंबई के टाइम्स आफ़ इंडिया से हिंदी की फ़िल्म पत्रिका माधुरी का संपादन आरंभ करने चले गए. समकालीन हिंदी संपादकों के संपर्क से तो बहुत कुछ सीखा ही, फ़िल्म उद्योग के गुणी निर्देशकों, कलाकारों और संगीतकारों की रचना प्रक्रिया को नज़दीक से देखा. कला फ़िल्मों के आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े रहे. उसे समांतर सिनेमा नाम उन्हों ने ही दिया था.

1978 में समांतर कोश की रचना को पूरा समय देने के लिए वे माधुरी का संपादन त्याग कर सपरिवार दिल्ली चले गए. समांतर कोश के लिए कहीं से कोई आर्थिक अनुदान या सहायता नहीं मिल रही थी. दिल्ली की बाढ़ में फँसने के बाद घर बदल कर ग़ाज़ियाबाद चले गए. बिगड़ती आर्थिक स्थिति को सँभालने के लिए एक बार फिर 1980 से कुछ बरसों के लिए पत्रकारिता की ओर रुख़ किया. रीडर्स डाइजेस्ट का हिंदी संस्करण सर्वोत्तम आरंभ किया. 1985 से एक बार फिर से समांतर कोश को पूरा समय देना शुरू किया.

आजकल केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा, की हिंदी लोक शब्दकोश परियोजना के अवैतनिक प्रधान संपादक हैं. योजना के अंतर्गत हिंदी परिवार की ब्रजभाषा, भोजपुरी, राजस्थानी, बुंदेली, अवधी, छत्तीसगढ़ी, गढ़वाली जैसी 48 भाषाओं के कोश बन रहे हैं. अभी पहली चार भाषाओं के लिए कोशकर्मी क्षेत्र में जा कर शब्दों का संकलन कर रहे हैं. अरविंद अपने घर चंद्रनगर ग़ाज़ियाबाद से ही काम करते हैं, और जब तब आगरा मुख्यालय जाते रहते हैं.

कोश कर्म में अरविंद को शुरू से ही अपने परिवार का पूरा समर्थन और सहयोग मिलता रहा. पहले ही दिन से पत्नी कुसुम सहकर्मी बनीं. बाद में बेटे सुमीत (ऐमबीबीऐस, ऐमऐस) ने कोश के डाटा के कंप्यूटरन का ज़िम्मा ले लिया. बेटी मीता (ऐमए, न्यूट्रीशन, और पोषण विशेषज्ञ) ने समांतर कोश के हिंदी मुख शब्दों के अँगरेजी समकक्ष लिख कर द्विभाषी थिसारस की नीवँ डाली और पुस्तक के प्रकाशन के लिए पेंगुइन इंडिया से लेखकों की ओर से संपर्ककार की भूमिका निभाई.

कुसुम कुमार

जन्म: 8 दिसंबर 1936. मेरठ, उत्तर प्रदेश

शिक्षा: बीए, ऐलटी

कुसुम ने मेरठ के रघुनाथ गर्ल्स कालिज से आगरा विश्व विद्यालय से बी.ए. और ऐल.टी. किया. दिल्ली प्रशासन के सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षक रहीं. 1964 में वे अरविंद कुमार के पास मुंबई चली गईं. समांतर कोश की परिकल्पना के समय से ही वे सभी कोश ग्रंथों से पूरी तरह जुड़ी हैं.

निर्गुण प्रार्थना

नमन करुँ मैं तुच्छ सा सेवक, हे परमेश्वर हे सरकार ।

चर-अचरों के तुम हो स्वामी, तुम ही सबके पालनहार॥

हे परमेश्वर हे सरकार ॥

 

तुम से विनय, तुम्हीं से क्रीड़ा, तुम से हास, तुम्हीं से रुदन ।

जन्म - मरण सब कुछ तुम ही हो, तुम ही तो जीवन संसार ॥

हे परमेश्वर हे सरकार ॥

 

तुम ही एक अमर- सब नश्वर, जल, स्थल, नभ तुम ही देवेश्वर।

देह, प्राण सब कुछ तुम ही हो, कालचक्र गति के आधार॥

हे परमेश्वर हे सरकार॥

 

प्रेम में तुम, शान्ति में तुम हो, योग, भोग और श्रम में तुम हो

विश्व रचयिता, मधु के सूदन, तुम ही हो नदियों की धार ॥

हे परमेश्वर हे सरकार ॥

 

इस प्रकृति के कण-कण में तुम, कालचक्र के क्षण-क्षण में तुम

भक्तजनों के लिए पद्म तुम, पर दुष्टों पर तुम हो असिधार ॥

हे परमेश्वर हे सरकार ॥

 

ज्ञान में तुम, वस्त्र में तुम हो, तुम हो धर्म, तुम ही तो धन हो

मसि में तुम, वस्त्र में तुम हो, तुम 'चतुरानन' के निराकार ॥

हे परमेश्वर हे सरकार ॥

 

: चतुरानन झा 'मनोज',

सिलिगुड़ी, ( दार्जीलिंग ),

पश्चिम बंगाल

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1.
धन तेरस
नमस्कार बच्चों ,
अभी त्यौहारों का मौसम चल रहा है दुर्गा पूजा, दशहरा, करवा चौथ, धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज.....खूब मजे ले रहे है आप लोग। क्यों न ले आखिर हम भारत वासी हैं और हर त्योहार को उत्साह-उल्लास से मनाना तो हमारी परम्परा है। दीपावली के लिए तो आप सब ने सुन रखा होगा कि हम क्यों मनाने है?
दीपावली से दो दिन पहले "धनतेरस " का त्यौहार भी मनाया जाता है धन का अर्थ है लक्ष्मी और तेरस का अर्थ है तेरहवाँ दिन अर्थात् यह त्योहार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को मनाया जाता है इसको धन-त्रयोदशी भी कहा जाता है आपको पता है इस दिन लोग कुछ न कुछ खरीददारी अवश्य करते हैं। मुख्य रूप से बर्तन। आजकल तो सोने और चाँदी के गहने /बर्तन खरीदने का प्रचलन बढ़ रहा है और लोग इस
दिन एक-दूसरे को उपहार भी बाँटने लगे हैं। चलो आज मैं आपको वो कहानी सुनाती हूँ जिसके साथ यह त्योहार जुड़ा है :-

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समुद्र मंथन धनतेरस की सुनो कहानी
कथा बड़ी ही जानी-मानी
इन्द्र था देवलोक का भूप
अति-सुन्दर था उसका रूप
धन-धान्य था अति अपार
स्वर्ग में सजता था दरबार
हो गया उसको बहुत अभिमान
भूल गया सबका सम्मान
अहम ने उसको कर दिया अन्धा
भूल गया वो सब मर्यादा
आए इक दिन ऋषि दुर्वासा
इन्द्र से मिलने की थी आशा
पर न इन्द्र ने दिया सम्मान
हुआ ऋषि का घोर अपमान
दे दिया देवराज को श्राप
जाओ लगेगा तुमको पाप
कुछ न रहेगा तेरे पास
यह मेरा है अटल अभिशाप
अब तो इन्द्र लगा पछताने
भूल पे अपनी आँसू बहाने
दानवों को अब मिल गया मौका
दे दिया देवराज को धोखा
लिया उन्होंने स्वर्ग को जीत
इन्द्र का सुख बन गया अतीत
हो गया उसका चेहरा मलिन
बन गया वो राजा से दीन

धनवंतरि गए यूँ बीत बहुत से साल
आया वृहस्पति को ख्याल
क्यों न वह कोई करे उपाय
देवराज का कष्ट मिटाए
गया ब्रह्म विष्णु के पास
बोला मैं हूँ बहुत उदास
दुखी बड़ा है मेरा शिष्य
उज्ज्वल कर दो उसका भविष्य
सोचा उन्होंने एक उपाय
जो सागर मन्थन किया जाए
अमृत उसमें से निकलेगा
जो कोई उसका पान करेगा
हो जाएगा वह अमर
नहीं रहेगा फिर कोई डर
फिर से इन्द्र को मिलेगा राज
पर अति कठिन है यह सब काज
जो असुरों का मिल जाए साथ
तो बन जाए बिगड़ी बात
वृहस्पति ने दानवों को बुलाया
और अमृत का राज बताया

लालच में दानव आ गए
देवों के संग में मिल गए
मन्दराचल पर्वत को लाए
वासुकि नाग को रस्सी बनाए
मन्दराचल की बनी मथानी
मथने लगे सागर का पानी
सर्व-प्रथम निकला कालकुट
पी गए उसको जटा जुट
गले में अपने विष को दबाए
तभी शिव नील-कण्ठ कहलाए
उच्चश्रवा घोड़ा फिर आया
कल्पवृक्ष देवों ने पाया
कामधेनु गाय भी आई
उनके साथ फिर लक्ष्मी आई
आखिर में धनवन्तरि आया
अमृत कलश हाथों में उठाया
देव-दानवों का मन ललचाया
विष्णु ने मोहनी रूप बनाया
अमृत देवों को पिलाया
स्वर्ग उन्हें वापिस दिलवाया
तेज इन्द्र ने फिर से पाया
दुर्वासा का श्राप मिटाया
***************************************
प्यारे बच्चों, "धनवन्तरि " को देवों का वैद्य भी कहा जाता है क्योंकि उसी के दिए अमृत
से देवों को अमरता और इन्द्र को अपना खोया तेज़ वापिस मिला था

***************************************
धनतेरस की सभी को हार्दिक बधाई एवम शुभ-कामनाएँ---सीमा सचदेव
********************************************************************************
2.नरक चतुर्दशी
नरक चतुर्दशी / छोटी दीवाली

नमस्कार बच्चों ,
आज फिर मैं आई हूँ आपके सम्मुख एक नई कहानी और जानकारी के साथ
आप तो जानते ही है कि दीवाली पाँच दिन का उत्सव है कल मैने आपको
पहले दिन "धनतेरस" की कहानी सुनाई थी आज बताऊँगी दीवाली के दूसरे
दिन का रहस्य ,जिसको "छोटी दीवाली" भी कहा जाता है इसके साथ बहुत सी
बातें जुड़ी हैं मुख्य कथा है- नरकासुर वध की इस लिए इस त्योहार को
नरक चतुर्दशी कहा जाता है इस दिन भी लोगो द्वारा दीपक जला कर घरों
को रोशन किया जाता है ,इस लिए इसे "छोटी दीवाली" भी कहते है

तो यह सुनो छोटी दीवाली की कहानी:-

छोटी दीवाली की कहानी
सुनाती थी मुझे मेरी नानी
आज मैं तुम सबको सुनाऊँ
एक नया इतिहास बताऊँ
दानव था इक नरकासुर
था वो बड़ा ही ताकतवर
राज्य उसका था विशाल
पर देवों के लिए था काल
देवों पर पा ली विजय
बन गया नरकासुर अजय
देव-माता का किया अपमान
खाली कर दिए उसके कान
अदिती माँ के कुण्डल लिए छीन
किए कार्य उसने हीन

पुत्री उसकी सोलह हजार
रखा उनको अपने दरबार
उनको अपना गुलाम बनाया
साधु सन्तों को सताया
पर बच्चों यह रखना ध्यान
ज्यादा नही चलता अभिमान
इक दिन टूट गया अहँकार
हो गया श्री कृष्ण अवतार
नरकासुर को मार गिराया
देव-कन्याओ को बचाया
सब के सन्ग में ब्याह रचाया
सबको अपनी रानी बनाया
देव-माता के ले लिए कुण्डल
स्वर्ग में फिर से हो गया मङ्गल
सबने मिलकर खुशी मनाई
छोटी दीवाली यह कहलाई

**************************************
नरकासुर, प्रज्योतिश्पुर (जो आजकल दक्षिण नेपाल में है) का राजा था
देवों की माता का नाम अदिति था
**************************************
२. बच्चों इस दिन के साथ और भी कथाएँ जुड़ी है आपको याद है ना
कुछ दिन पहले मैने आपको "ओणम" की कहानी सुनाई थी देखे लिन्क:-
वह कहानी भी इसी दिन के साथ जुडी है मै जानती हूँ आपके मन में बहुत
से प्रश्न उठ रहे होँगे कि ओणम का त्योहार तो बहुत दिन पहले था और
"छोटी दीवाली" अब आ रही है ,तो यह कहानी उससे सबन्धित कैसे ?
यही सोच रहे है न आप चलो मैं आपको बताती हूँ
इस दिन श्री विष्णु भगवान ने वामन अवतार लेकर " राजा बलि "
का वध किया था कहानी तो आप जानते ही है लेकिन फिर दया
करके "राजा बलि " को वर्ष में एक बार वापिस आने का वरदान भी
दिया था उसी वरदान के कारण राजा बलि वर्ष में एक बार जब
वापिस आते है तो "ओणम " का त्योहार मनाया जाता है
और राजा बलि का वध क्योंकि कार्तिक मास की चौदहवीं तिथि को
हुआ था ,इस लिए यह त्योहार दीपावली से एक दिन पहले
छोटी दीवाली के रूप में मनाया जाता है
*****************************************
३. इस दिन के साथ एक और कथा भी सम्बन्धित है आपने श्री राम जी
की कहानी तो सुनी ही होगी कि दीपावली के दिन वह चौदह वर्ष का वनवास
काट कर अयोध्या वापिस आए थे पर क्या आपको पता है श्री राम जी ने
अपने वापिस आने से पहले हनुमान जी को अयोध्या अपने वापिस आने
का समाचार देने हेतु भेजा था और इस दिन श्री हनुमान जी ने अयोध्या
वासियों को श्री रामजी के वापिस आने का समाचार सुनाया था और लोगो
ने खुशी में घरों में दीपमाला की थी तभी इसको छोटी दीवाली कहा जाता है
*********************************************
४. एक और बात इस दिन श्री हनुमान जी का जन्मोत्सव
( श्री हनुमान ज्यन्ती)भी मनाया जाता है
**********************************************
५.बन्गाल में इसको " काली चौदस " कहा जाता है और
देवी माँ काली का जन्मोत्सव मनाया जाता है बडे से पण्डाल
मे माँ काली की मूर्ति प्रतिष्ठित कर धूमधाम से पूजा की जाती है

**************************************************

तो बच्चो कैसी लगी आपको यह जानकारी ,बताना जरूर
आप सबको छोटी दीवाली की हार्दिक बधाई एवम शुभकामनाएँ ......सीमा सचदेव
*************************************************
3.दीपावली की शुभकामनाएँ

आई दिवाली आई दिवाली
ढेरों खुशियाँ लाई दिवाली
मिलकर खाएँगे मिठाई
लड्डू पेडे बर्फी भाई
सजेंगें घर में वन्दनवार
मिलेंगें ढेरों उपहार
महालक्ष्मी का होगा पूजन
लड्डू खाएँगे गजनन्दन
नए-नए कपड़े हम पहनेगे
घूम-घाम कर मजे करेंगें
जगमग-जगमग दीप जलेंगें
फुलझडियाँ और पटाखे चलेंगें
होगी रौशन काली रात
तम में भी होगा प्रकाश
महालक्ष्मी घर में आएगी
ढेरों खुशियाँ दे जाएगी
********************************

भोला का सपना

आया दीपों का त्योहार
सज रहा था सारा घर-बार
देख रहा था सबकुछ भोला
जाकर वो पापा से बोला
क्यों हो रहे सब इतने तैयार
सज रहा क्यों सबका घर-बार
खूब पटाखे और मिठाई
क्यों बाज़ार में सबने सजाई
भोले भोला की भोली बात
पापा को जैसे मिली सौगात
प्यार से फिर उसको समझाया
साज-सज्जा का राज बताया
बताई राम-लखन की कहानी
कथा बडी है जानी मानी
चौदह वर्ष काटा वनवास
फिर आया था दिन यह खास
जिस दिन वो घर वापिस आए
लोगों ने घर-बार सजाए
खुशी में इसकी दीप जलाए
तो यह दीपावली कहलाए

करते महालक्ष्मी का पूजन
ताकि हो जाए माँ प्रसन्न
हो धन -धान्य की बरसात
मिट जाए अँधियारी रात
चलाएँगे फुलझडियाँ और पटाखे
सोएँगे खूब मिठाई खा के
आएगी लक्ष्मी अपने घर
देगी हमे मन चाहा वर
खुश था भोला सुन के बात
दीपावली की आएगी रात
महालक्ष्मी को वो देखेगा
जो चाहेगा वो माँगेगा
सोचते ही भोला सो गया
सुन्दर सपनो में खो गया
देखा उसने सपना अजीब
हो गए सारे लोग गरीब
लक्ष्मी नही कहीं भी आई
न ही देखी कोई मिठाई
रोने लगा यह देख के भोला
लक्ष्मी ने आ दरवाजा खोला

पूछा भोला ने क्यों नही आई ?
न ही हमको मिली मिठाई
बोली लक्ष्मी,कैसे आऊँ ?
क्या-क्या मै तुमको बतलाऊँ ?
करते सब मेरा अपमान
कितना करते है नुकसान
देती हूँ मैं इसलिए धन
ताकि सुखमय हो सबका जीवन
पर न करे अच्छा उपयोग
फैलाएँ कितने ही रोग
छोड़े सब इतने पटाखे
फैले धुआँ सब नभ में जा के
दूषित हो जाए शुद्ध वायु
हो जाए कम जीवों की आयु
ऐसी वायु में ले जो साँस
बिमारियाँ उसमे पनपे खास
होता है कितना ही शोर
सुनने में भी लगता जोर
व्यर्थ में लक्ष्मी को जलाएँ
फिर घर में पूजा करवाएँ
मै तो बसती हूँ कण-कण में
खुश होती शुद्ध पर्यावरण में

पर्यावरण जो न हो शुद्ध
तो मैं हो जाती हूँ क्रुद्ध
वहाँ पे मैं फिर नही रह पाऊँ
कभी भी फिर वापिस न आऊँ
जो मुझे बुलाना चाहते हो घर
करो सदा लक्ष्मी का आदर
न फैलाओ कोई प्रदूषण
शुद्ध रखो अपना पर्यावरण
जो सब मिलकर वृक्ष लगाओ
तो मुझे अपने घर पर पाओ
होगी जो चहुँ ओर हरियाली
तो होगी हर दिन दिवाली
मानोगे जो मेरी बात
तो मैं आऊँगी हर रात
कुछ बच्चे ऐसे भी यहाँ पर
कपड़े नही है जिनके तन पर
जिनको नही मिलता है खाना
उनके साथ त्योहार मनाना

एक बात का रखना ध्यान
खतरे में न हो किसी की जान
नही लेना कोई सस्ती मिठाई
जिसमे घटिया चीजें मिलाई
खाकर जिसको हो बीमार
करना पड़ेगा फिर उपचार
फिर मैं आऊँगी घर पर
दूँगी तुम्हें मन चाहा वर
कह कर लक्ष्मी माँ हुई ओझल
भोला की आँखें गई खुल
जाकर उसने सबको बताया
लक्ष्मी का सन्देश सुनाया
सबकी बात समझ में आई
मिलकर इक योजना बनाई
खूब लगाए पौधे मिलकर
फिर सबने अपने घर जाकर
कई सारे पकवान बनाए
भूखे बच्चों को खिलाए
दिए उनको कपड़े उपहार
मनाया दिवाली का त्योहार
.................
..................
बच्चों तुम भी रखना ध्यान
पर्यावरण न हो नुकसान
खुशी-खुशी त्योहार मनाना
अपना वातावरण बचाना

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दीपावली के पावन अवसर पर
सभी हिन्दवासियोँ को हार्दिक बधाई एवम् ढेरोँ शुभ-कामनाएँ........सीमा सचदेव

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sachdeva.shubham एट yahoo.com

 

(सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’)

करुणोदात्तशील ’निराला‘

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-हिमांशु कुमार पाण्डेय

 

करुणोदात्त शील एक ऐसी सुन्दर डायरी होता है जिसमें तीन सौ पैंसठ दुःख होते हैं किन्तु उसके प्रारब्ध की कार्य-कारण व्याख्या उसके कर्मों से नहीं हो सकती । प्रारब्ध उसके कर्मों से अतिरिक्त पड़ता है । उसकी गाथा हमारे मन में वीर तथा करुण रस की प्रपानक अनुभूति कराती है । उसमें भाव-द्वैत नहीं भाव का गुण-कल्प होता है । करुणोदात्तशील की उदात्तता दूसरों के विध्वंस या पराजय करने की क्षमता में नहीं, अपितु सामरिक उत्साह तथा पीड़ा सह सकने की, स्वाभिमान को अक्षुण्ण बनाये रखने की निस्सीम शक्ति में, संकल्प की वज्र कठोरता में होती है ।

निराला जी हिन्दी साहित्याकाश के ऐसे कवि वीर जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं जो प्रारब्ध से पराजित होकर भी हार न माने, दस हजार तीर एक साथ झेलकर भी अपना तीर छोड़ता जाय, तन चला जाय, धन चला जाय, लेकिन मन न माने । निराला जिन शक्तियों से संघर्ष करते हैं वे अखिल मानवता से, शिव मूल्यों से या स्वभावधर्म से विरोध या उनपर व्यंग करती-सी प्रतीत होती हैं; किन्तु निराला का करुणोदात्त शील सबका बंधुत्व प्राप्त कर लेता है । इतनी दुर्धर्ष शक्तियों से संघर्ष करने वाले निराला संकल्प, साहस, शक्ति तथा मर्यादा की असाधारण विभूति हैं ।उनकी यह असाधारण विभूति हमें विस्मय से, गौरव से भर देती है । निराला हमें अद्भुत वीर-से लगते हैं । उनमें आत्मबल की, मनोबल की अतिशय पूंजी दीख पड़ती है । सबको हटा कर, अहं के कारण सबका निषेध कर, करुणोदात्तशील निराला अकेले हो जाते हैं । अपनी वर्द्धमान परिधि के वे स्वयं बन्दी हो जाते हैं । इसीलिये सूनेपन अथवा एकान्त की उदासी जितना उन्हें सताती है, उतना किसी को नहीं ।

सापेक्षताओं पर सर पटक-पटक कर मर जाना अच्छा, पर मुड़ना ठीक नहीं, यही निराला के करुणोदात्तशील की भोक्तृत्व पद्धति है ।

निराला में करुणोदात्त नायकत्व की पीड़ा प्रगाढ़ है । प्रगाढ़ इसलिये कि वे स्वाभिमानी हैं । चूंकि स्वाभिमानी हैं, इसलिये उनका विरोध रुकने का नाम नहीं लेता । विरोध बढ़ने से उनकी पीड़ा बढ़ती है, क्योंकि नियति उनके साथ परिहास करती है । वे कभीं उल्लास के उत्तरी ध्रुव को छूते हैं तो कभी नैराश्य के दक्षिणी ध्रुव को ।लेकिन चकि वे करुणोदात्त व्यक्तित्व के गगनचुम्बी हिमालय हैं इसलिये उनके बीज संकल्प का अध्यवसाय स्वाभिमान के बल पर अन्त तक चलता रहता है । अन्तस्थल की मर्यादा-भावना कठोर अनुशासन, साधना, एकान्त और गंभीरता की ओर उन्हें बलात् खींच ले जाती है । तमाम अंतर्जीवन मिल कर उनके भीतर एक भयानक अन्तर्विरोध पैदा करते हैं, और वही अंतर्विरोध उनकी कविताओं में जटिल संसार के रूप में व्यक्त होता है ।

करुणोदात्त शील की यह एक विरल विशेषता है कि वह अपने समस्त अंतर्विरोध को व्यक्त करना चाहता है -अपने टूट जाने की लगातार बढ़ती आशंका के बावजूद । अपनी कविताओं के भीतर के संसार को तय करने की प्रक्रिया में निराला ने भी अपने को नष्ट कर दिया पर अदम्य जिजीविषा से ललकारा कि समाज का वर्तमान ढाँचा टूटे, इतिहास बदले और यथास्थिति नष्ट हो ।

उन्होंने ’पीलिया साहित्य‘ नहीं रचा । निराला अपने आन्तरिक सत्य और उसकी अस्मिता (आइडेन्टिटी) के सक्रिय, क्रियाशील अन्वेषक हैं । दर्द का निर्वाह, कठिनतर ताप का विस्तार, दुःख, असफलता, निराशा सब उन्हीं में है । इसीलिये वे शक्ति, धृति या शांति को पहचानते हैं । निराला की कोटि के करुणोदात्त शील महापुरुष कभी व्यक्ति मात्र नहीं रहते, वे प्रतीक बन जाते हैं ।

गंगा प्रसाद पाण्डेय के संग गंगातट पर निराला के जन्मदिन वसंत पंचमी को भेट करने पहुंचे धर्मवीर भारती । उन्हें वसंत का गणित समझाते हुये निराला ने कहा था - ’’देखो, पहले तत्व लो, फिर उसमें गुण जोड़ दो । हो गया । अब ऋषियों को बुलाकर स्थापित कर दो और उनमें से सूर्यका्न्त त्रिपाठी को घटा दो - बस हो गयी पंचमी । फिर अपने गणित का अर्थ बताते हुये बोले - ’’देखो, तत्व होते हैं पाँच.....अब इसमें जोड़ो गुण । गुण कै होते ह ? तीन- सत्, रज और तम । तो पाँच और तीन हुये आठ ।ऋषि बुलाये तो सप्तऋषि आ गये ।यानी सात और आठ हुये पन्द्रह । अब इस पन्द्रह में से सूर्यकान्त त्रिपाठी को घटा दो । कितने बचे ? चौदह । चौदह में दो अंक हैं - एक और चार । दोनों को जोड़ दो तो सारतत्व बच गया पाँच । यानी पंचमी । समझे पंचमी का गणित ।‘‘ फिर उन्होंने समझाया - ’’सूर्यकान्त त्रिपाठी तो एक व्यक्ति है । उसमे राग है, द्वेष है, अहंकार है, लोभ है, मोह है, काम है, क्रोध है । वह सब उसका अपना व्यक्तिगत है । सरस्वती आयीं तो उन्होंने उसका ममत्व छुड़ा कर उसे सबका बना दिया । तब कवि पैदा हुआ, तब निराला पैदा हुआ ।‘‘ ऐसा बहुआयामी व्यक्तित्व, ऐसी विस्तार दृष्टि, ऐसी गहरी संवेदना निराला के उदात्तशील के अतिरिक्त दीपक लेकर खोजने पर भी क्या कहीं मिलेगी ?

’अज्ञेय‘ जी शिवमंगल सिंह ’सुमन‘ के साथ निराला से मिलने गये । सुमन जी के यह पूछने पर कि ’’निराला जी, आजकल आप क्या लिख रहे हैं ‘‘, निराला ने एकाएक कहा - ’’निराला, कौन निराला ?....नहीं, नहीं, निराला तो मर गया । There is no Nirala. Nirala is dead.क्क्‘‘ व्यक्तिगत कष्ट को मानव मात्र की पीड़ा में आत्मसात करने की, दलित, पतित, पीडत मानव के कष्टों को वाणी देने की ललक में प्राण-विसर्जन की संकल्पित अंजलि उठी तो निराला की ही । ऐसे उदात्त कवि शिरोमणि की थाती पुनः प्राप्त करने के लिये हिन्दी काव्य-धारा को अभी बहुत दिनों तक तपस्या करनी पड़ेगी । श्री श्रीनारायण चतुर्वेदी ने कहा - ’’उनके समान तेजस्वी मेधा और मौलिक और ऊंची उड़ान लेने वाला कवि तथा ’शब्दों का बादशाह‘ यदा-कदा ही जन्म लेता है ।‘‘

कवि रामेश्वर शुक्ल ’अंचल‘ की निम्न पंक्तियाँ जैसे निराला के विरल व्यक्तित्व को ही प्रतिबिम्बित करती प्रतीत होती हैं -

’’देख ही लोगे क्षितिज तट तक तरसते प्रश्न को

अश्रु ने थमकर घडी भर भी नहीं सोखा जिसे ।

थी अमिट विधि-अंक सी जिसकी अबूझी गूढ़ता

आंधियों ने, बिजलियों ने भी नहीं पोंछा जिसे ।‘‘

सन् १९५४ में कोलकाता में निराला का अभिनन्दन किया गया था । अचानक गले में पड़े पुष्पहार को उतार कर मंच से द्रुत गति से नीचे आये और जैसे अपने आप से ही बोले -

’’ Mr. One ! you cannot make us wooden headed, Mr. Second ! you cannot catch us with gold.‘‘ ’मिस्टर वन‘ से निराला की घृणा थी जो साहित्य, कला और संस्कृति से अनभिज्ञ साधारण जनता थी, और जो तब निराला को नहीं पढ़ती थी । ब्लेक सिरीज के हल्के जासूसी उपन्यासों और पारसी थियेटर की औरतों के ’खेमटा‘ नाच देखती थी । ’मिस्टर सेकन्ड‘ को भी निराला घृणा का उपादान मानते थे जो साहित्य और साहित्यकार की ईमानदारी को स्वर्ण-श्रृंखला में आबद्ध कर लेना चाहता है ताकि ’वह तोड़ती पत्थर, इलाहाबाद के पथ पर‘ और ’वह आता/ दो टूक कलेजे के करता/ पछताता पथ पर आता‘, और ’राम की शक्तिपूजा‘ और ’बादल राग‘ जैसी कवितायें न लिखी जाँय न गायी जाँय ; बल्कि ’गीत गोविन्द‘ ’भामिनी विलास‘, अमरू शतक‘ आदि के ढंग की कवितायें लिखी जाँय या आधुनिक युगीन रघुवंशगाथा लिखी जाय ।

किन्तु निराला का करुणोदात्त शील इस ’मिस्टर वन‘ और इस ’मिस्टर सेकण्ड‘ का मुखापेक्षी नहीं रहा । उन्हें इनकी श्रद्धा और श्रद्धांजलि की आवश्यकता नही थी । जिसकी उस महानायक को आवश्यकता थी, वह भी उसको कहाँ मिला । इसीलिये हमने निराला के शील को करुणोदात्त शील कहा । उनके विलक्षण व्यक्तित्व का अहं उन्हें दया, सहानुभूति और दान स्वीकारने से रोकता था । शायद वे शारीरिक आवश्यकताओं से ऊर्ध्वगामी हो चुके थे, और बीमारियों और अभावों की अनवरत आवृत्ति झेलते हुये भी यह कहने का साहस रखते थे -

’’मेरे जीवन का यह जब प्रथम चरण

इसमें कहाँ मृत्यु, है जीवन ही जीवन

अभी पड़ा है मेरे आगे सारा यौवन

स्वर्ण-किरण-कल्लोलों पर बहता रे यह बालक-मन ।‘‘

और यह साहस ही निराला क हर प्रकार की यातनाओं में जीवंत और आत्म-सम्पूर्ण रखता था । अविराम आत्म-सम्पूर्ण और आत्मतुष्ट और अपराजित उदात्तता का नाम ही निराला है ।

निराला की उदात्तता - करुणोदात्तता - तब और हमें मथती है जब उनके भाव और अभाव का द्वंद्व समास घटित होता है । निराला को मिली थी मनोरमा देवी के रूप में ऐसी जीवन संगिनी, जिसने उन्हें हिन्दी से परिचित कराया और प्राणप्रण से प्रेरित किया कि हिन्दी को एक नया तुलसीदास, हिन्दी को एक रवीन्द्रनाथ मिल जाय । चन्द्रज्योत्सना में पति-पत्नी गंगा-तट की विमल बालुका राशि में समीपस्थित होते थे और बिखरे पाषाण-खंडों को मृदुल अंगुलियों में उठा मनोहरा देवी सीधी-टेढी लकीरें खींच-खींच कर अपने कवि-स्वामी को देवनागरी के अक्षर और शब्द सिखातीं थीं । अभिराम बरसती चाँदनी --कलकल निनादिनी गंगा की शान्त एकान्त उर्मियाँ -- वेदकालीन आर्यब्राह्मण की तरह व्यक्तित्व वाला पति -- उपनिषदकालीन आर्यऋषि-पत्नी की सी दर्शिता मनोहरा देवी । ऐसे में निराला ने कितने गीत लिखे --

’’शब्द के कलिदल खुलें

गति-पवन-भर काँप थर-थर भीड़ भ्रमरावलि ढुलें

गीत-परिमल बहे निर्मल फिर बहार बहार हो

स्वप्न ज्यों सज जाय

यह तरी, यह सरित, यह तट, यह गगन समुदाय

कमल-वलयित सरल दृग-जल हार का उपहार हो ।‘‘

उस औपनिषदिक ऋषिकल्प कवि ने - ’आयत-दृग, पुष्ट-देह ,गतमय / अपने प्रकाश में निःसंशय / प्रतिभा का मंदस्मित परिचय, संस्मारक निराला ने कलियों के, पवन के, वसंत के स्वप्नों के, गगन के, नदी तट के अमोलक स्नेह गीत लिखे । पर समय और परिस्थिति सब कुछ सह सकती है, स्नेही मन के भावुक गीत नहीं । मनोहरा देवी चलीं गयीं । सन् १९१८ में इन्फलुएंजा के भयावह रोग से ग्रसित हुये । और निराला पागल हो गये । जिस गंगा तट पर स्वप्नों की भीड़ उमड़ आती थी, वह श्मशान बन गया, और निराला पागल हो गये । गंगा में बहती जाती लाशें खींचकर बाहर लाने लगे कि शायद यह लाश उनकी मनोहरा की हो, उस प्रियतमा की हो । अपनी खोयी हुयी पत्नी का नाम ले लेकर चीखते थे, प्रत्येक शवदाह की ज्वाला में खड़े होकर अपनी ज्वालामुखी को शान्त करना चाहते थे, किन्तु ’’अब नहीं आती पुलिन पर प्रियतमा, श्यामतृण पर बैठने को निरुपमा ।‘‘

फिर, निराला के पूज्य पिता पं० रामसहाय त्रिपाठी का देहान्त हुआ । सद्यःविवाहिता दृगपुतरी सरोज क्षयरोग से चल बसी । सरोज की मृत्यु ने निराला को तोड़ दिया । साहित्य को ’सरोज-स्मृति‘ की महान कविता तो मिली, लेकिन निराला को क्या मिला ? विक्षिप्तता और आत्मदाह । विक्षिप्तता इसलिये कि समवर्ती समाज ने निराला को नहीं समझा; उसके काव्य को, और उसके अहं को, और उसके व्यक्तित्व को नहीं समझा । आत्मदाह इसलिये कि कवि के पास, स्रष्टा के पास आत्मदाह के सिवा होता ही क्या है ?

किन्तु अद्भुत थे निराला । उस करुणोदात्त नायक के शील को विधाता ने बड़े मन से गढा था । उनके पास अपरजिय अहं था जिसने उन्हें टूटने को मजबूर किया, लेकिन कभी किसी क्षण झुकने नहीं दिया । निराला ने पाठ्य-पुस्तकों के लिये कवितायें नहीं लिखीं, न तो साहित्य की अकादमियों और सरकार का सम्मान पाने के उद्देश्य से साहित्य रचा । निराला विक्षिप्त होकर सड़कों पर घूमते थे, पर रुपये-पैस की उन्होंने कभीं चिन्ता नहीं की । निराला अपनी विक्षिप्तता की स्थिति में बार-बार एक पंक्ति दुहराते थे “ I am not subject to the limitations of my audience….. I am making an example of playing the same card in life and literature.” और जीवन और साहित्य में ताश के एक ही पत्ते खेलने से पागलपन न मिले, पीड़ायें न मिलें तो और क्या मिलेगा ?

इस धीरोद्धत उदात्त नायक को मृत्यु मिल गयी, किन्तु सतत प्रयत्न करके भी क्या निराला के साहित्य को मृत्युमुख किया जा सकेगा ? क्या उग्र समय-धारा के चपेट में, रज-रज बिखेर देने वाली सांपातिक घूर्णिकाओं में बुदबुद की तरह वह विलीन हो जायेगा “Never ! Never ! Never !” निराला हमेशा गाते मिलेंगे -

’’पुष्प-पुष्प से तन्द्रालस लालसा खींच लगा मैं

अपने नवजीवन का अमृत

सहर्ष सींच दगा मैं

द्वार दिखा दगा फिर उनको हैं मेरे वे जहाँ अनंत

अभी न होगा मेरा अंत ।‘‘

..................

संपर्क:

हिमांशु कुमार पाण्डेय

हिन्दी विभाग

सकलडीहा पी०जी०कालेज,

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