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November 2008
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सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष 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काश!

-डॉ. अनुज नरवाल रोहतकी

हिन्‍दुस्‍तान की आर्थिक राजधानी कहीं जाने वाली मुंबई को दहशतगर्दों से मुक्‍त करा दिया गया है। यह टिप्‍पणी मैं अपनी ओर से नहीं कर रहा हूं अपितु आला अधिकारियों ने इसकी पुष्‍टी कर दी है। ये खबर सच्‍ची है। एक सच से भी है कि हम चंद दहशतगर्दों से मुक्‍त हुए हैं न कि पूरी तरह आतंकवाद से मुक्‍त हुए।

हर घटना हमें बहुत कुछ सीखा जाती है। हर घटना हमें आईना दिखाती है। सो ये काम मुंबई में हुए इस घटना ने भी किया। इस घटना ने हमारे खुफिया तन्‍त्र की पोल खोल दी। जिसका नतीजा हमें 59 घंटे तक चले ऑपेरशन में 175 लोगों की मौत 20 पुलिसवालों व एनएसजी के जवान शहीद और सैकड़ों की तादाद में लोग घायलों के रूप में भुगतना पड़ा। दहशतगर्द समुद्र के रस्‍ते से आए और किसी को कानों-कान खबर भी नहीं लगी। यदि ऐसा ही है हमारा खुफिया तन्‍त्र,तो सरकार करोड़ों रूपये का ख़र्च क्‍यों करते हैं इस विभाग पर।

सरकार नेताओं के ऐशो-आराम पर करोड़ों खर्च कर देती है। लेकिन इस खर्च का कुछ हिस्‍सा पुलिस की बेहतर बुलेट प्रूफ जैकेटों के लिए लगा दिया जाता तो हमें मुंबई प्रकरण में एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे और एसीपी अशोक काम्‍ते जैसे जवानों की जान नहीं देनी पड़ती। दूसरी ओर इस घटना के जख्‍म अभी हरे ही हैं और जिसमें हुए शहीदों की चिंताओं की राख अभी ठन्‍डी भी नहीं हुई है। महाराष्‍ट्र्‌ के नेता आर.आर.पाटिल साहब ने एक प्रेस वार्ता में मुंबई की इस घटना के बारे में कहते है कि ऐसी छुटपुट घटनाएं तो बड़े शहरों में हो ही जाती हैं। कुछ तो शर्म करो पाटिल साहब इस घटना ने देश को हिलाकर रख दिया। और आप इसे छुटमुट घटना कह रहे हैं।.............शर्म करो नेता महोदय!

हिन्‍दुस्‍तान में ये नहीं कि आतंकी हमला पहली दफा हुआ है। इससे पहले लाल किले,संसद,अक्षरधाम मंदिर,आर.एस.एस.मुख्‍यालय,सीआरपीएफ के ग्रुप रेजिमेंट सेंटर पर हमला,मुंबई ट्र्‌नों में सिलसिले वार धमाके हो चुके हैं। याद हो अमेरिका पर एक बड़ा हुआ था, उसके बाद वहां ऐसे पुख्‍ता इन्‍तजाम कर दिए गए कि आज तक कोई घटना नहीं हुई। और तो और हमारे पड़ोसी राज्‍य बाग्‍लादेश जैसे देश में आतंकवाद विरोधी सख्‍त कानून लागू बनाए हुए हैं। वहां जो आतंकियों की किसी तरह की सहायता देने वाले को भी फांसी की सजा का कानून है। मगर हमारे देश में इतने हमलों के बावजूद भी एक कड़ा कानून नहीं बनाया गया है। अफजल जैसे आतंकियों के पीछे राजनीति की रोटियां तो हर राजनैतिक दल सेंकता है। मगर सरकार आने पर उनको फांसी कोई नहीं देना चाहता। चंद वोटों के लिए देश को बांटने में जुटे नेताओं से पूछना चाहते हैं क्‍या यूंही आतंकी आतंक फैलाते रहेंगे। क्‍या यूं ही आम आदमी मरते रहेंगे, क्‍या यूं हमारे जांबाज सिपाही अपनी जान पर खेलते रहेंगे। क्‍या नेता सिर्फ कुर्सी के चक्‍कर में भारत को गर्त में पहुंचाने का काम करते रहेंगे। नेताओं से प्रार्थना कभी देश के दर्द को अपना दर्द बनाकर तो देखो। देश को भाषणों की नहीं देशहित के कामों की जरूरत है।

अपने उपर के खर्चों को जरा कम करवाइए नेता जी

सेना को, खुफिया विभाग को अत्‍याधुनिक बनाइए नेता जी

देश को तोड़िए मत, देश को जोड़िए माननीय नेता जी

बस बड़ी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाइए नेता जी

आतंकवाद को मिटाना क्‍या बड़ी बात है नेता जी

अपने बेटों में से एक बेटा सेना में भर्ती करवाइए नेता जी।

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1-अधिकार

उठो वंचित,शोषित मजदूरों,
कब तक जीवन का सार गंवाओगे
कब तक ढोआगे रिसते जख्‍म का बोझ
कब तक व्‍यर्थ आंसू बहाओगे
तुम तो अब जान गये हो
सपने मार दिये गये है तुम्‍हारे साजिश रचकर
तुम्‍हारे पसीने ने सम्‍भावनाओं को सींचे रखा है
ललचायी आंखों से राह ताकना छोड़ दो
अब तो तनकर अधिकार की मांग कर दो....
बन्‍द नही खुली आंखों से देखो सपने
कब तक बन्‍द किये रहोगे आंखे भय से
बन्‍द आँखों के टूट जाते है सपने,
तुम यह भी जानते हो
बन्‍द आंखों का टूट जाता है सपना
याद है आंधियों से टिकोरे का गिरना
शोषित हो अब सबल कर दो मांग प्रबल
सब खोया वापस तुम पा सकते हो
अब तो तनकर अधिकार की मांग कर दो....
बेदखल हुए तो क्‍या है तो अपना
मांग पर अटल हो जाओ
देखो रोकता है राह कौन ?
अधिकार की जंग में शहीद हुए तो
अमर हुए अपनों के काम आये
बहुत पिये गम,सम्‍मान का मौका मत गंवाओ
अब तो तनकर अधिकार की मांग कर दो....
गुजरे दुख के दिन पर शोक मनाने से क्‍या होगा ?
भय भूख में जीने वालो,
कर दो न्‍यौछावर जीवन को
वक्‍त आ गया हिसाब मांगने
सम्‍मान से जीने का अधिकार मत मरने दो
अब तो तनकर अधिकार की मांग कर दो....
गम के आंसू में जिये,
अनगिनत बार चूल्‍हे से नही रूठा धुआं
अत्‍याचार की उम्र बढ़ाने वालों
दर्द का जहर पीने वालों
हर पल चौखट पर तुम्‍हारी गरजता पतझड़
उत्‍पीड़न,जुल्‍म,शोषण के वीरान में तपने वालों
अब तो तनकर अधिकार की मांग कर दो....
लूटा गया हक तुम्‍हारा जानता जहान सारा
फिजां में हक की गंध अभी बाकी है
अत्‍याचार की तूफ़ानों ने किया तुम्‍हारा मर्दन
अत्‍याचार शोषण के दलदल से बाहर आओ
लूटा हुआ हक वापस लेने की हिम्‍मत कर लो
बदले वक्‍त में समानता का नारा बुलन्‍द कर दो
अब तो तनकर अधिकार की मांग कर दो....
नफरत का बीज बोने वालों ने,
दर्द के सिवाय और क्‍या दिया है ?
अंगूठा काटने,धूल झोंकने के सिवाय किया क्‍या है ?
चेतो खुली आंख से सपने देखो
बहुत ढोया अत्‍याचार का बोझ
संविधान की छांव उपर उठ जाओ
विषमता का कर बहिष्कार,मानवीय समानता का हक ले लो
अब तो तनकर अधिकार की मांग कर दो....
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2-दीवार को ढहा दो

सूना सूना अंगना उदास है खलिहान,
प्‍यासी प्‍यासी निगाहें,करे विषपान
राह में बिछे कांटे, उखड़ा उखड़ा स्‍वाभिमान
कल से उम्‍मीदें
आज हर दीवारें ढहा दो.............
तरक्‍की से पड़ा भी है आदमी, तुम भी हो
आदमी को मान दो
रिसते जख्‍म का भार उतार दो
उजड़े हुए कल को आज संवार दें.............
माटी की काया माटी में मिल जायेगी
आज आसमान पर कल जमीं पर आना है
होगे विदा हो ओगे जहां से बहुत याद आओगे
बन्‍द हाथ आये खुले हाथ जाना है
थम गया जो उसे गतिमान कर दो
आदमी हो दीन वंचित को उबार दो........
जिन्‍दगी बस पानी का है बुलबुला
पल में जीवन पल में मरन
कभी दिन तो कभी डरावनी रात है
तनिक छांव तो दूसरे पल चिलचिलाती धूप है
ढो रहा बोझ जो मुश्किलों का, बोझ उतार दो
आदमी को बराबरी का अधिकार दो............
बुराइयों के दलदल फंसे आदमी की सांस है उखड़ रही,
उखड़ती सांस को प्‍यार की बयार दो
जुड़ सके तरक्‍की की राह,अवसर की बहार दो
संवर जाये दीन वंचित का कल आज तो दुलार दो.............
बवण्‍डरों के चक्रव्‍यूह में हुआ कंगाल
सम्‍मान से हाथ धोया ,
जख्‍म पर लगा भेदभाव का मिर्च लाल
टूटे पतवार से जीवन नइया खे रहे ,
आदमी के हाथ मजबूत कटार दो
छोड़कर श्रेष्ठता का स्‍वांग आदमी को गले लगा लो
आदमी हो आदमियत की आरती उतार लो
नीर से भरे नेत्र की बाढ़ थम जायेगी
आदमी की घोर स्‍याह रात कट जायेगी
पियेगा आंसू,कब तक कायम रहेगा अंगने का सूनापन
मजदूर वंचित को संभलने का हर औजार दो
आदमियत की कसम उठो
पीड़ित वंचित को भरपूर प्‍यार दो
विहस उठेगा कोना कोना
विकास की बयार द्वार जब पहुंच जायेगी
धनधान्‍य हो उठेगा उसका अंगना
वंचित भूलकर सारे दुखड़े झूम उठेगा
आदमी की पीर को समझो प्‍यारे
ऊंच-नीच अमीर-गरीब की दीवार को ढहा दो
उठो आदमी हो,
आदमी की ओर हाथ बढ़ा दो..........

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3-नयन बरस पड़े......


नयनों की याचना से नयन बरस पड़े
बिगड़ी तकदीर देख भौंहें तन उठी
दर्दनाक पल हर माथे मुसीबतों का बोझ
वंचितों की बस्‍ती में जख्‍म की टोह
चहुंओर धुआंधुआं दीनता के पांव जमें
नयनों की याचना से नयन बरस पड़े...........
अपवित्र बस्‍ती के कुयें का पानी
जख्‍म रिस रही आज भी पुरानी
लकीरों का जाल वंचित जी रहा बेहाल
गुलामी के दलदल भूख दे रही ताल
आजाद देश में वंचित पुराने हाल पर खडे़
नयनों की याचना से नयन बरस पड़े...........
आजाद हवा वंचितों का नही हुआ उद्धार
रूढ़िवादी समाज ठुकराया जाना संसार
छिन गया मान किस्‍मत पर बैठा नाग
बेदखल जड़ से दोषी बना है भाग्‍य
आज भी अरमान के  पर है उखड़े
नयनों की याचना से नयन बरस पड़े...........
भेद,भूख बीमारी से जा रहे नभ के पार
छोड़ वारिस के सिर कर्ज का भार
श्रेष्ठ बनाये दूरी वंचित के जनाजे से भरपूर
मानवता तड़पे देख आदमी की श्रेष्ठता का कसूर
वंचितों की बस्‍ती में दीनता और निम्‍नता के खूंट है गड़े
नयनों की याचना से नयन बरस पड़े...........
रूढ़िवादी समाज श्रेष्ठता की पीटे नगाड़ा
श्रेष्ठ छोटा मान वंचित को हरदम है दहाड़ा
अर्थ की तुला पर व्‍यर्थ शोषित समानता न पाया
कहने को आजादी आंसू पिया, गम है खाया
तरक्‍की और समानता के आंकड़े कागजों में भरे पड़े
नयनों की याचना से नयन बरस पड़े...........
बस्‍ती में कब आयेगी शोषित बाट जोह रहा
पेट की भूख खातिर हाड़ निचोड़ रहा
समाज और सत्ता के पहरेदारों सुन लो पुकार
वंचित करे सामाजिक समानता की गुहार
आक्रोश बने बवण्‍डर ,
उससे पहले समानता का थाम झण्‍डा निकल पड़े
नयनों की याचना से नयन बरस पड़े...........

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सम्पर्क:

नन्‍दलाल भारती

षिक्षा - एम.ए. । समाजशास्‍त्र । एल.एल.बी. । आनर्स ।

पोस्‍ट ग्रेजुएट डिप्‍लोमा इन ह्‌यूमन रिर्सोस डेवलपमेण्‍ट;

जन्‍म स्‍थान- - ग्र्राम चौकी। खैरा। तह.लालगंज जिला-आजमगढ ।उ.प्र।

स्‍थायी पता- आजाद दीप, 15-एम-वीणानगर ,इंदौर ।म.प्र.!452010

 

Email-nandlalram@yahoo.com/nl_bharti@bsnl.in / nlbharati_author@webdunia.com

Portal- http://nandlalbharati.mywebdunia.com

प्‍ा्रकाषित पुस्‍तकें उपन्‍यास-अमानत ,निमाड की माटी मालवा की छाव।प्रतिनिधि काव्‍य संग्रह।

प्रतिनिधि लघुकथा संग्रह- काली मांटी एवं अन्‍य कविता, लघु कथा एवं कहानी संग्रह ।

अप्रकाशित पुस्‍तके उपन्‍यास-दमन,चांदी की हंसुली एवं अभिशाप, कहानी संग्रह- 2

काव्‍य संग्रह-2 लघुकथा संग्रह- उखड़े पांव एवं अन्‍य

सम्‍मान भारती पुष्प मानद उपाधि,इलाहाबाद, भाषा रत्‍न, पानीपत ।

डां.अम्‍बेडकर फेलोशिप सम्‍मान,दिल्‍ली,काव्‍य साधना,भुसावल, महाराष्ट्र,

ज्‍योतिबा फुले शिक्षाविद्‌,इंदौर ।म.प्र.।

डां.बाबा साहेब अम्‍बेडकर विशेष समाज सेवा,इंदौर

कलम कलाधर मानद उपाधि ,उदयपुर ।राज.।

साहित्‍यकला रत्‍न ।मानद उपाधि। कुशीनगर ।उ.प्र.।

साहित्‍य प्रतिभा,इंदौर।म.प्र.।सूफी सन्‍त महाकवि जायसी,रायबरेली ।उ.प्र.।

विद्‌यावाचस्‍पति,परियावां।उ.प्र.।एवं अन्‍य

आकाशवाणी से काव्‍यपाठ का प्रसारण ।कहानी, लघु कहानी,कविता

और आलेखों का देश के समाचार पत्रों/पत्रिकओं में एवं http://www.swargvibha.tk/ http://www.swatantraawaz.com

http://rachanakar.blogspot.com/2008/09/blog-post_21.html  http://hindi.chakradeo.net / http://webdunia.com/ http://www.srijangatha.com http://esnips.com ,वं अन्‍य ई-पत्र पत्रिकाओं पर रचनायें प्रकाशित ।

॥ प्रकाशक पुस्‍तक प्रकाशनार्थ आमन्‍त्रित हैं ॥

नमस्कार प्यारे बच्चों ,
आपके लिए हमने एक अति लघु प्रयास किया है " हितोपदेश " की
कुछ कहानियोँ को अत्यन्त सहज -सरल भाषा में कथा-काव्य शैली में
लिखने का. यह कहानियाँ शायद आपने पहले भी पढी-सुनी होँगी
काव्य-कथा के रूप मे पढ़ कर आपको कैसा लगा, बताना जरूर
आपके अच्छे सुझावोँ का भी इन्तजार रहेगा तो यह सुनो पहली कहानी...........
1 साधु और चूहा
इक जञ्गल में था इक साधु clip_image002
जानता था वह पूरा जादू
करता रहता प्रभु की भक्ति
आ गई उसमें अदभुत शक्ति
इक दिन उसने लगाई समाधि
गिरा एक चूहा आ गोदी
साधु को आई बहुत दया
चूहे को उसने पाल लिया
पर इक दिन इक बिल्ली आई
देख के चूहे को ललचाई
चूहा तो मन में गया डर
clip_image004साधु का हृदय गया भर
उसने अपना जादू चलाया
और चूहे को बिल्ली बनाया
ता कि बिल्ली न खा पाए
और चूहा आजाद हो जाए
कुछ समय तो सुख से बिताया
इक दिन वहाँ पे कुत्ता आया
बिल्ली के पीछे वह भागा
फिर साधु का जादू जागा
बिल्ली से कुत्ता बन जाओ
और कुत्तों से न घबराओ
खुश था चूहा कुत्ता बनकर
घूमे वह जञ्गल में जाकर
clip_image006फिर इक दिन इक चीता आया
कुत्ते को उसने खूब भगाया
भागा कुत्ता साधु के पास
बोला मेरा करो विश्वास
खा जाएगा मुझको चीता
फिर कैसे मैं रहूँगा जीता
साधु को आ गया रहम
बोला !न पालो यह वहम
जाओ तुम चीता बन जाओ
सुख से अपना जीवन बिताओ
कुत्ते से चीता बन गया
नव-जीवन उसको मिल गया
clip_image007भले ही वो बन गया था चीता
पर दिल तो चूहे का ही था
चूहे से बढ़ कर नहीं कुछ अच्छा
यह साधु नहीं बिल्कुल सच्चा
लोगों की बातों में आया
चूहे को चीता क्योँ बनाया
सोचे ! मेरी खोई पहचान
माना न साधु का अहसान
गुस्से से गया वह भर
झपट पड़ा वह साधु पर
साधु को अब हुआ अहसास
नहीं करो किसी पर विश्वास
फिर से उसको चूहा बनाया
और फिर उसको यह समझाया
clip_image009दुष्ट नहीं बदले स्वभाव
अच्छों को देगा वह घाव
बातें करना लोगोँ का काम
केवल बिगड़े अपना दाम
....................
....................
बच्चों तुम भी रखना ध्यान
बडोँ का न करना अपमान
लोगोँ की बातोँ मे न आना
अपनी समझदारी अपनाना
*************************
2.दुष्ट आदमी
एक कौआ और एक थी बुलबुल
घर था उनका प्यारा जंगल clip_image010
बुलबुल बड़ी नरम दिल वाली
बैठी रहती वृक्ष की डाली
बड़ा चतुर था पर वह कौआ
इधर-उधर उड़ता था भैया
इक दिन एक शिकारी आया
देखी पेड़ की गहरी छाया
गया था गर्मी में थक-हार
आया मन में एक विचार
क्यों न थोड़ा करे आराम
फिर जाएगा अपने काम
सोच के वह छाया में लेटा
और निद्रा का आ गया झूठा
आ गई उसको निद्रा गहरी
पर छाया न वहाँ पे ठहरी
धूप लगी आने वहाँ पर
पड़ने लगी थी उसके मुख परclip_image011
देख रही थी यह सब बुलबुल
पिघल गया बुलबुल का दिल
उसने अपने पंख फैलाए
ताकि वहाँ छाया हो जाए
पर कौआ था बड़ा चालाक
उड़ गया वह वहाँ से तपाक
हो गई जब सब दूर थकावट
ली शिकारी ने तब करवट
जब उसकी आँखें गईं खुल
देखा टहनी पर थी बुलबुल
झट से उठाया तीर-कमान
ले ली उस बुलबुल की जान
गिरी वो अब धरती पर आकर
बैठी थी जो पंख फैलाकर
बच गया था कौआ चालाक
बच्चों, होना नहीं अवाक
दुष्टों पे एतबार न करना
न ही इतने भोले बनना
करनी दुष्ट के संग में भलाई
समझो नई मुसीबत आई
*************************

3.ब्राह्मण और तीन दुष्ट
एक बार था एक ब्राह्मण
मिला उसे इक भेड़ का मेमन
लेकर उसको कंधों पर clip_image012
जा रहा था वह मार्ग पर
तीन दुष्टों ने उसको देखा
और मिलकर सबने यह सोचा
किसी तरह से ले ले मेमन
बेच के उसको मिलेगा धन
तीनों ने तरकीब लगाई
मिलकर इक योजना बनाई
थोड़ी-थोड़ी दूरी पर
खड़े हो गए मार्ग पर
जब मार्ग पर ब्राह्मण आया
पहले दुष्ट को सामने पाया
हाथ जोड़कर बोला दुष्ट
ब्राह्मण देवता क्यों हो रुष्ट ?
कुत्ते को कंधे पर उठाया
किसने तुमको है भरमाया?clip_image013
कहने लगा वो सुनकर ब्राह्मण
यह तो है भेड़ों का मेमन
तुमने इसको नहीं पहचाना
इसलिए इसको कुत्ता माना
चल दिया ब्राह्मण यह कह कर
दूसरा दुष्ट था मार्ग पर
आकर ब्राह्मण को बुलाया
हाथ जोड़कर शीश नवाया
बोला कुत्ते को उठाए
इस मार्ग पर कैसे आए?
ब्राह्मण झिझक गया सुनकर
कुत्ता मेरे कंधे पर
नहीं, नहीं यह तो है मेमन
पर थोड़ा सा फिसला मन
मेमन नहीं कुत्ते का बच्चा
थोड़ी सी हुई मन में शंका
फिर उसने खुद को समझाया
आगे का मार्ग अपनाया
कुछ ही दूरी पर जब पहुँचा
तीसरे दुष्ट को मिल गया मौका
आया आगे वह बढ़कर
हाथ जोड़कर झुकाया सर
बोला दुष्ट हे ब्राह्मण देवा
करना चाहता हूँ कुछ सेवा
कुत्ता दो मेरे कंधों पर
पहुँचा दूँगा तेरे घर
कुत्ता सुनकर तो वह ब्राह्मण
खिन्न हो गया मन ही मन
मैंने समझा भेड़ का बच्चा
पर यह तो निकला है कुत्ता
केवल मैं ही हूँ भरमाया
कुत्ते के बच्चे को उठाया
कर दिया मैंने खुद को भ्रष्ट
खुश हो गए मन में दुष्ट
छोड़ के उसको भागा ब्राह्मण
बस बातों से खोया मेमन
........................................
........................................
बच्चों तुम सबने यह जाना
किसी की बातों में न आना
*******************************

हितोपदेश - 4.कौआ और साँप

clip_image0144.कौआ और साँप
कौवा-कौवी इक डाली पर
रहते थे अपने घर पर
उन दोनों के बच्चे चार
सुन्दर था उनका घर-बार
पर उस वृक्ष की छाया पर
साँप ने डाल लिया था घर
करता वह सबको परेशान
ले लेता बच्चों की जान
नन्हें बच्चों को खा जाता
फिर अपने बिल में छुप जाता
दुखी थे उससे पक्षी सारे
पर क्या करते वे बेचारे
इक दिन साँप गया तरु पर
कौवी- कौवा नही थे घर
खेल रहे थे उनके बच्चे clip_image015
पकड़ साँप ने खाए कच्चे
खाकर उनको भर गया पेट
गया वो जाकर बिल मे लेट
कौवी- कौवा घर वापिस आए
बच्चे उन्होंने गायब पाए
समझ गए वो सारी चाल
साँप ने खाए उनके लाल
दुखी बहुत था उनका दिल
पर वो रो सकते थे केवल
साँप तो कितना ताकतवर
उसके मुख में है जहर
दुखी हो कौआ मन में विचारे
बैठ गया जा नदी किनारे
देखा उसने नदी के पार
खड़े हुए है पहरेदार
अपने गहने वहाँ रखकर
गई रानी जल के अन्दर
आया कौए को एक ख्याल clip_image016
चली एक उसने भी चाल
एक हार उसने उठाया
जाके साँप के बिल में गिराया
भागे पीछे पहरेदार
देखा साँप के बिल में हार
जैसे ही लेने लगे वो हार
देख के साँप भी आया बाहर
पहरेदार ने साँप को मारा
खुश हो गया अब जंगल सारा
कौए की समझदारी रंग लाई
सबने मिलकर खुशी मनाई
---------------------------------------------------------------
बच्चों, समझदारी अपनाना
गुस्से में तो कभी न आना
सोच समझ के करना काम
होगा ऊँचा जग में नाम

*********************************

हितोपदेश- स्वार्थी शेर

इक जंगल में था इक शेर
देखा उसने आम का पेड़
घनी थी आम वृक्ष की छाया
देख के शेर के मन में आया clip_image017

क्यों न वह यहाँ रह जाए
अपना अच्छा समय बिताए
पास में था चूहे का बिल
आया देख के बाहर निकल
देखा उसने सोया शेर
नहीं लगाई जरा भी देर
चढ़ गया उसकी पीठ पर
लगा कूदने शेर के ऊपर
खुल गई इससे शेर की जाग
लग गई उसके बदन मे आग
छुप गया चूहा अब बिल में
जला शेर दिल ही दिल में
उसने बिल्ली को बुलाया
और चूहे का किस्सा सुनाया
जैसे भी चूहे को मारो
तब तक मेरे यहाँ पधारो
खाना तुमको मैं ही दूँगा
हर पल तेरी रक्षा करूँगा clip_image018
बिल्ली ने मानी शेर की बात
रहती बिल के पास दिन-रात
अच्छे-अच्छे खाने खाती
और बाकी सबको सुनाती
मैं तो हूँ तुम सबसे सयानी
समझने लगी वो खुद को रानी
बैठा चूहा बिल के अन्दर
नहीं निकला कुछ दिन तक बाहर
भूख से वह हो गया बेहाल
पर बाहर था उसका काल
कितने दिन वो भूख को जरता
भूखा मरता क्या न करता
कुछ दिन बाद वो बाहर निकला
और बिल्ली को मिल गया मौका
चूहे को उसने मार गिराया
जाकर शेर को सब बतलाया
शेर का मसला हो गया हल
बदल गई आँखें उसी पल clip_image019
बोला! जाओ तुम अपनी राह
नहीं रखो कोई मुझसे चाह
अब न तुमको मिलेगा खाना
मेरे पास कभी न आना
अब बिल्ली ने जाना राज
मतलब से मिलता है ताज़
मतलब से सब पास में आएँ
बिन मतलब न कोई बुलाए
*******************************

हितोपदेश-6.मूर्ख को सलाह मत दो / मूर्ख बन्दर


एक बार इक नदी किनारे
रहते पक्षी प्यारे-प्यारे
हरे-भरे थे पेड़ वहाँ पर
बनाए वहाँ पर सुन्दर घर
पास थी इक छोटी सी पहाड़ी
रहते बन्दर वहाँ अनाड़ी
एक बार सर्दी की रात
होने लगी बहुत बरसात
आ गई बहुत नदी में बाढ़
बन्दरों को न मिली कोई आड़
छुप गए पक्षी अपने घर
नहीं था उन्हें वर्षा का डर
ठण्डी में बन्दर कँपकँपाते
कभी इधर कभी उधर को जाते
देख के उनको पक्षी बोले
छोटे से प्यारे मुँह खोले
नहीं है पास हमारे कर
फिर भी हमने बनाए घर
तुम्हारे पास है दो-दो हाथ
फिर भी तुम न समझे बात
जो तुम अपना घर बनाते
तो ऐसे न कँपकँपाते
आया अब बन्दरों को क्रोध
भर गया मन में प्रतिशोध
चढ़ कर सारे वृक्षों पर
तोड़ दिए पक्षियों के घर
अब पक्षियों को समझ में आया
व्यर्थ में मूर्खों को समझाया
जो न हम उनको समझाते
तो न अपने घर तुड़वाते
मूर्ख मूर्खता न छोड़े
मौका पा वो घर को फोड़े

-----

श्रद्धांजलि विश्वनाथ प्रताप सिंह

clip_image002

एक कवि कलाकार राजनीतिज्ञ त्‍यागी राजऋषि

-वीरेन्‍द्र जैन

विश्वनाथ प्रतापसिंह को भले ही पूरा देश उनके राजनीतिक कद और पद के कारण जानता रहा हो पर वे मूलतः एक कवि चित्रकार और गहरी मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत व्‍यक्‍ति थे । उन्‍होंने राजनीतिक पद की कभी परवाह नहीं की तथा वे अपने मूल्‍यों से समझौता करके कभी भी पद पर बने नहीं रहना चाहते थे इसीलिए उन्‍होंने उन पदों को त्‍याग करने में एक क्षण का भी विलंब नहीं किया जिन पर जाने के लिए लोगों ने न केवल अपने कार्यक्रम और सिद्धांत ही दबा दिये अपितु ऐसे लोगों से दब कर समझौता किया जो जीवन भर उनके विरोधी रहे। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उत्‍तरप्रदेश के मुख्‍यमंत्री पद से स्‍तीफा दिया तो केन्‍द्र के वित्तमंत्री पद से स्‍तीफा देने में देर नहीं की। अगर वे समझौता करना चाहते तो भाजपा से समझौता करके प्रधानमंत्री पद पर बने रह सकते थे पर उन्‍होंने भाजपा से समझौता करने की जगह अपनी सरकार को गिरवा देना मंजूर किया तथा कांग्रेस व भाजपा को उनके खिलाफ लाये गये अविश्वास प्रस्‍ताव पर एक साथ वोटिंग करने के लिए विवश कर दिया।

विश्वनाथ प्रतापसिंह की सरकार ही ऐसी सरकार रही है जिसने अपने ग्‍यारह महीने के कार्यकाल में ही अपने अधिकतर चुनावी वादे निभाने में पूरे मन से प्रयास किये तथा सत्‍तर प्रतिशत से अधिक कामों का शुभारंभ कर दिया। ऐसा दूसरा कोई उदाहरण देखने में नहीं आता। यदि उनकी सरकार कुछ दिन और चल जाती तो देश के नौजवानों को रोजगार का अधिकार मिल गया होता। बिडंबना यह रही कि उनकी सरकार को नौकरियों में आरक्षण देने के सवाल का बहाना बना कर ही गिरा दिया गया जबकि रोजगार का अधिकार मिल जाने पर यह कारण स्‍वतः ही निर्मूल हो गया होता। मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करके उन्‍होंने जिस राजनीतिक सूझबूझ का परिचय दिया उसकी काट करने के लिए उनके विरोधियों ने आत्‍मदाह की अतिरंजित कथाओं के प्रचार का सहारा लिया। बाद में प्रसिद्ध पत्रकार मणिमाला ने इन कथाओं की पुनरीक्षण स्‍टोरी कर के सच को सब के सामने ला दिया था पर पक्षपाती प्रेस ने उसे उचित स्‍थान नहीं दिया था। बाद में जब संयुक्‍त मोर्चा सरकार का गठन हुआ तो उनसे प्रधानमंत्री पद स्‍वीकार करने का अनुरोध किया गया था किंतु अपने स्‍वार्थ के कारण उन्‍होंने विनम्रता पूर्वक इस प्रस्‍ताव को अस्‍वीकार कर दिया। ब्‍लड कैंसर जैसे रोग से लड़ते हुये वे गत सत्‍तरह वर्ष से अपना शेष जीवन चित्रकला और साहित्‍य को समर्पित किये हुये थे पर इस बीमारी की अवस्‍था में भी वे झुग्‍गी झोपड़ी वालों के अधिकारों की रक्षा और दादरी के किसानों की जमीन उद्योगों के लिए छीने जाने के विरूद्ध आगे आकर गिरफ्‌तारी देने से भी नहीं हिचकते थे।

आज जो पिछड़ी जातियां अपने को सत्‍ता में भागीदार पा रही हैं उसका श्रेय विश्वनाथ प्रताप सिंह को ही जाता है। राम जन्‍म भूमि मंदिर के नाम पर भाजपा ने जो घातक राजनीति की थी वह देश में भयानक साम्‍प्रदायिक हिंसा तो प्रारंभ करा ही चुकी थी तथा देश को एक और विभाजन की ओर धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी, उस समय मंडल कमीशन रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा करके उन्‍होंने एक बड़ी विभाजन की संभावना को रोक दिया था। इसे सही समय पर सही कदम माना गया था। बनारस के पंडितों ने उन्‍हें राजऋषि की उपाधि दी थी।

बाजारवाद के इस जमाने में उनकी ही एक कविता से उन्‍हें सच्‍ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है

तुम

मुझे क्‍या खरीदोगे

मैं तो मुफ्‌त हूँ

-------

संपर्क:

वीरेन्‍द्र जैन

2/1 शालीमार स्‍टर्लिंग रायसेन रोड

अप्‍सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.

suraj tiwari

बनना चाहता हूं

मैं भी, बारिश की

छोटी बूंद

ताकि बुझा सकूं

सूखी हो रही

धरती की प्‍यास

बुझा सकूं प्‍यास

उन किसानों की

जो आज भी आश्रित हैं

बारिश के मेघों पर ॥

बूंद बन बरसने की

चाहत है

बंजर मरूभूमि पर भी

ताकि उग आएं वहां भी

छोटे छोटे पौधे

बरसना चाहता हूं

बूंद बनकर

उन खेतों में

जहां किसानों की

गिरती हैं श्रम की बूंदें ।

जहां से उपजता है

अन्‍न, न सिर्फ अमीरों के लिए

बल्‍कि भारत के

उन गरीबों के लिए भी

जिनकी भूख मिट जाती है

सिर्फ रोटी और नमक खाकर ॥

काष मैं ऐसा कर पाता ॥

-----

सूरज तिवारी मलय

सहसचिव मनियारी साहित्‍य समिति , लोरमी

जिला-बिलासपुर छत्‍तीसगढ

E-mail - surajtiwarimalay@yahoo.com

surajtiwarimalay@gmail.com

surajtiwarimalay1@rediffmail.com

कविताएँ

 
- सीमा गुप्ता

 

"फर्जे-इश्क"

बेजुबानी को मिले कुछ अल्फाज भी अगर होते

पूछते कटती है क्यूँ आँखों ही आँखों मे सारी रात ..,

सनम-बावफा का क्या है अब तकाजा मुझसे ,

अपना ही साया है देखो लिए पत्थर दोनों हाथ ....

पेशे-नजर रहा महबूब-ऐ-ख्याल गोश-ऐ-तन्हाई मे,

आईना क्यूँ कर है लड़े फ़िर मुझसे ले के तेरी बात...

दिले-बेताब को बख्श दे अब तो सुकून-ऐ-सुबह,

दर्दे-फिराक ने अदा किया है फर्जे-इश्क सारी रात...

(सनम-बावफा - सच्चा-प्रेमी )

(पेशे-नजर - आँखों के सामने)

(गोश-ऐ-तन्हाई -एकांत)

(दर्दे-फिराक -विरह का दर्द)

(फर्जे-इश्क - प्रेम का कर्तव्य)

-----

'झूमती कविता'

बड़ी झूमती कविता मेरे आगोश में आयी है,

शायद तेरे साए से यह धूप चुरा लाई है..

हम तेरे तसव्वुर में दिन रात ही रहते हैं,

कातिल है अदाएं तेरी कातिल ये अंगडाई है..

सूरज जो उगा दिल का, दिन मुझमें उतर आया,

तुम साथ ही थे लेकिन देखा मेरी परछाईं है..

साथ मेरे रहने है कोई चला आया ,

तन्हा कहाँ अब हम पास दिलकश तन्हाई है..

खामोशी से सहना है तूफ़ान जो चला आया,

दिल टूटा अगर टूटा , कहने मे रुसवाई है..

अब रात का अंधियारा छाने को उभर आया,

एहसास हुआ पुरवा तुमेह वापस ले आयी है

-----

'तेरा आना और लौट जाना'

दो लफ्जों मे वो तेरा मुझे चाहना ,

गुजरते लम्हों मे मुझे ही दोहराना...

आँखों के कोरों मे दबा छुपा के जो रखे,

उन अश्कों मे अपनी पलकों को भिगो जाना...

रूह का एहसास था या सपने का भ्रम कोई ,

नीदों मे मुझे चुपके से अधरों से छु जाना...

सच के धरातल का मौन टुटा तो समझा...

शून्य था तेरा आना "और"

एक सवाल यूँ ही लौट जाना...

"दिल"

मुहब्बत से रहता है सरशार ये दिल,

सुबह शाम करता है बस प्यार ये दिल.

कहाँ खो गया ख़ुद को अब ढूँढता है,

कहीं भी नहीं उसके आसार-ऐ-दिल.

अजब कर दिया है मोहब्बत ने जादू,

सभी डाल बैठा है हथियार ये दिल.

यही कह रहा है हर बार ये दिल,

बस प्यार-ऐ-दिल बस प्यार-ये दिल.

युगों से तड़पता है उसके लिये ही,

मुहब्बत में जिसकी है बीमार ये दिल

उसकी है यादों में खोया हुआ वो,

ज़रा सोचो है कितना बेकरार ये दिल.

अब अपने खतों में यही लिख रहा है,

तुम्हारा बस तुम्हारा कर्जदार ये दिल

-----

"वीरानों में"

खामोश से वीरानो मे,

साया पनाह ढूंढा करे,

गुमसुम सी राह न जाने,

किन कदमो का निशां ढूंढा करे..........

लम्हा लम्हा परेशान,

दर्द की झनझनाहट से,

आसरा किसकी गर्म हथेली का,

रूह बेजां ढूंढा करे..........

सिमटी सकुचाई सी रात,

जख्म लिए दोनों हाथ,

दर्द-ऐ-जीगर सजाने को,

किसका मकां ढूंढा करें ...........

सहम के जर्द हुई जाती ,

गोया सिहरन की भी रगें ,

थरथराते जिस्म मे गुनगुनाहट,

सांसें बेजुबां ढूंढा करें................

----

"तुम्हारी बाट मे"

अंधियारे की चादर पे,

छिटकी कोरी चांदनी ..

सन्नाटे मे दिल की धडकन ,

मर्म मे डूबे सितारों का

न्रत्य और ग़ज़ल...

झुलसती ख्वाइशों की

मुंदती हुई पलक ..

मोहब्बत की सांसों की,

आखरी नाकाम हलचल..

पिघलते ह्रदय का

करुण खामोश रुदन..

ये सब तुम्हारी बाट मे,

इक हिचकी बन अटके हैं..

अगर एक पल को तुम आते

इन सब को सांसों के कर्ज से...

निज़ात दिला जाते...

----

"दर्द का वादा"

जिंदगी का ना जाने मुझसे और तकाजा क्या है ,

इसके दामन से मेरे दर्द का और वादा क्या है ?

एहसान तेरा है की दुःख दर्द का सैलाब दिया ,

मेरी आँखों को तुने आंसुओं से तार दिया..

एक बार भी न समझा मुझे भाता क्या है?

छीन कर बैठ गयी मेरी मोहब्बत को कभी,

जब भी मिली एक नयी चाल मेरे साथ चली,

मेरी तकदीर से अब तेरा इरादा क्या है?

जब भी मिलती है कहीं रूठ के चल देती है,

मेरे दिल को तू फिर एक बार मसल देती है

हैरान हूँ मुकदर को मेरे तराशा क्या है ?

कौन सी खताओं की मुझे रोज सजा देती है,

मुश्किलें डाल के बस मौत का पता देती है ...

तेरा अब मेरी वफाओं मे और इजाफा क्या है ?

जिंदगी का ना जाने मुझसे और तकाजा क्या है ,

इसके दामन से मेरे दर्द का और वादा क्या है?

----

"साथ"

बस एक तेरे "साथ" की प्यासी मेरे तन्हाई है,

मेरे इन निगाहों मे सिर्फ़ तेरे इंतजार की परछाई है.

चांदनी कहाँ मिलती है, वो भी अंधेरों मे समाई है,

रोशनी के लिए हमने ख़ुद अपनी ही ऑंखें जलाई हैं.

करवट- करवट रात ने हर तरफ उदासी फेलाई है,

ऐसे मे ना जिन्दगी करीब है, ना हमें मौत ही आयी है.

तेरे प्यार की तलब ही इस दिल के गहराई है,

मने आंसुओं के सैलाब मे अपनी हर आस बहाई है.

हवा की सरसराहट से भी लगे तेरी ही आहट आयी है,

इस एक उम्मीद मे हमने जाने कितनी सदीयाँ बिताई हैं.

----

"याद किया तुमने या नही "

यूँ ही बेवजह किसी से, करते हुए बातें,

यूँ ही पगडंडियो पर सुबह-शाम आते जाते

कभी चलते चलते रुकते, संभलते डगमगाते.

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..

सुलझाते हुए अपनी उलझी हुई लटों को

फैलाते हुए सुबह बिस्तर की सिलवटों को

सुनकर के स्थिर करतीं दरवाजी आहटों को

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..

बाहों कर करके घेरा,चौखट से सर टिकाके

और भूल करके दुनियाँ सांसों को भी भुलाके

खोकर कहीं क्षितिज में जलधार दो बुलाके

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ.

सीढ़ी से तुम उतरते , या चढ़ते हुए पलों में

देखुंगी छत से उसको,खोकर के अटकलों में

कभी दूर तक उड़ाकर नज़रों को जंगलों में

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..

बारिश में भीगते तो, कभी धूप गुनगुनाते

कभी आंसुओं का सागर कभी हँसते-खिलखिलाते

कभी खुद से शर्म करते कभी आइने से बातें

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..

तुमसे दूर मैने, ऐसे हैं पल गुजारे .

धारा बिना हों जैसे नदिया के बस किनारे..

बिन पत्तियों की साखा बिन चाँद के सितारे..

बेबसी के इन पलों में...

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ....

-----

"कभी आ कर रुला जाते"

दिल की उजड़ी हुई बस्ती,कभी आ कर बसा जाते

कुछ बेचैन मेरी हस्ती , कभी आ कर बहला जाते...

युगों का फासला झेला , ऐसे एक उम्मीद को लेकर ,

रात भर आँखें हैं जगती . कभी आ कर सुला जाते ....

दुनिया के सितम ऐसे , उस पर मंजिल नही कोई ,

ख़ुद की बेहाली पे तरसती , कभी आ कर सजा जाते ...

तेरी यादों की खामोशी , और ये बेजार मेरा दामन,

बेजुबानी है मुझको डसती , कभी आ कर बुला जाते...

वीराना, मीलों भर सुखा , मेरी पलकों मे बसता है ,

बनजर हो के राह तकती , कभी आ कर रुला जाते.........

----

"तलब"

ख़ुद को आजमाने की एक ललक है ,

एक ग़ज़ल तुझ पे बनाने की तलब है...

लफ्ज को फ़िर आसुओं मे भिगो कर,

तेरे दामन पे बिछाने की तलब है ...

आज फ़िर बन के लहू का एक कतरा,

तेरी रगों मे दौड़ जाने की तलब है ...

अपने दिल-ऐ-दीमाग से तुझ को भुलाकर,

दीवानावार तुझको याद आने की तलब है...

दम जो निकले तो वो मंजर तू भी देखे,

रुखसती मे तुझसे नजर मिलाने की तलब है...

-----

"खामोश सी रात"

सांवली कुछ खामोश सी रात,

सन्नाटे की चादर मे लिपटी,

उनींदी आँखों मे कुछ साये लिए,

ये कैसी शिरकत किए चली जाती है....

बिखरे पलों की सरगोशियाँ ,

तनहाई मे एक शोर की तरह,

करवट करवट दर्द दिए चली जाती है....

कुछ अधूरे लफ्जों की किरचें,

सूखे अधरों पे मचल कर,

लहू को भी जैसे सर्द किए चली जाती है...

सांवली कुछ खामोश सी रात अक्सर...

----

"तेरी याद में"

तेरी ग़ज़लों को पढ़ रहा हूँ मैं ,

और तेरी याद में शिद्दत है बहुत

जैसे तुझसे ही मिल रहा हूँ मैं,

और तेरे प्यार में राहत है बहुत

वो तेरे वस्ल का दिन याद आया,

मुझ पे अल्लाह की रहमत है बहुत

तुझसे मिलने को तरसता हूँ मैं,

मेरी जान तुझ से मुहब्बत है बहुत

तेरे अंदाज़ में ख़ुद को देखा,

हाँ तुझे मेरी ही चाहत है बहुत

----

" मैं ढूंढ लाता हूँ"

अगर उस पार हो तुम " मैं अभी कश्ती से आता हूँ .....

जहाँ हो तुम मुझे आवाज़ दो " मैं दूंढ लाता हूँ"

किसी बस्ती की गलियों में किसी सहरा के आँगन में ...

तुम्हारी खुशबुएँ फैली जहाँ भी हों मैं जाता हूँ

तुम्हारे प्यार की परछाइयों में रुक के जो ठहरे ............

सफर मैं जिंदिगी का ऐसे ख्वाबों से सजाता हूँ

तुम्हारी आरजू ने दर बदर भटका दिया मुझको ............

तुम्हारी जुस्तुजू से अपनी दुनिया को बसाता हूँ

कभी दरया के साहिल पे कभी मोजों की मंजिल पे........

तुम्हें मैं ढूँडने हर हर जगह अपने को पाता हूँ

हवा के दोष पर हो कि पानी की रवानी पे .............

तुम्हारी याद में मैं अपनी हस्ती को भुलाता हूँ

मुझे अब यूँ ने तड़पाओ चली आओ चली आओ ......

चली आओ चली आओ चली आओ चली आओ

अगर उस पार हो तुम " मैं अभी कश्ती से आता हूँ .....

जहाँ हो तुम मुझे आवाज़ दो " मैं दूंढ लाता हूँ"...........

----

'तुम्हारा है "

जो भी है वो तुम्हारा ...

यह दर्द कसक दीवानापन ...

यह रोज़ की बेचैनी उलझन ,

यह दुनिया से उकताया हुआ मन...

यह जागती आँखें रातों में,

तनहाई में मचलना और तड़पन ..........

ये आंसू और बेचैन सा तन ,

सीने की दुखन आँखों की जलन ,

विरह के गीत ग़ज़ल यह भजन,

सब कुछ तो मेरे जीने का सहारा है ........

जो भी है वो तुम्हारा है

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प्यार 'बेपनाह "

ज़िंदगी भर गुनाह करते रहे

हम जो उनसे निबाह करते रहे

बेवफाई की चोट खाई थी

जिन्दिगी को तबाह करते रहे

कौन था रास्ता जो दिखलाता

हम अंधेरों में राह करते रहे

तुमको दुल्हन बना के ख्वाबों में

रोज़ तुमसे निकाह करते रहे

जानी मालूम है की हम प्यार थे

तुमसे बेपनाह करते रहे.........

--

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कहानी

100_8145 (WinCE)

अपनी-अपनी उड़ान

- कमल

सदी के प्रारंभ में यानि कि पंद्रह नवंबर दो हज़ार पाँच के वर्ष भगवान बिरसा मुंडा का जन्‍मदिन मनाते हुए हमारे गणतंत्र में एक नये राज्‍य का उदय हुआ। उसके कुछ बरस बाद की बात है। अब तारीख तो ठीक-ठीक याद नहीं लेकिन जिस दिन उस राज्‍य की राजधानी (क्रिकेटिया भाषा में छोटे-से शहर) के द्दौनी ने चौके और छक्‍के लगाते हुए, अपने अकेले दम पर पाकिस्‍तान को एक दिनी क्रिकेट मैच में हराया था। अरे भई, पाकिस्‍तान को हराया था, जिम्‍बाबवे को नहीं! ठीक उसके अगले दिन मुख्‍यमंत्री के चुनाव क्षेत्र में सुगना की बतख-सेये अंडों को अपनी नन्‍हीं-नन्‍हीं, पीले रंग की चोंच से फोड़ कर वह बच्‍चा भी अपने भाई-बहनों के साथ बाहर आया था। बाकी सब बच्‍चों के शरीर पर कहीं न कहीं भूरे-कत्‍थे रंग के द्दब्‍बे थे, लेकिन उसका पूरा शरीर दूध की तरह उजला था। वह खासियत उसे सबसे अलग करती थी।

अपनी कक्षा नौ की पढ़ाई-लिखाई, यार-दोस्‍त के साथ खेल-कूद की मस्‍ती और खाने-सोने आदि के समय के बीच हंस-मुख सुगना उसके लिए भी काफी समय निकाल लेता। पांच-छः माह में ही वह बतख भी अपने भाई-बहनों के साथ पूरे रूप-यौवन में आ गई थी। कीट-पतंगे खाती, पें...पें करती, वह पूरे घर में कभी इद्दर तो कभी उधर डोलती रहती।

जब सुगना का हम-उम्र माधो मुंडा उसके बड़े भाई की शादी में शामिल होने खरसांवा से सिंगपुकुरिया उनके घर आया तो वह भी उस बतख पर मोहित हुए बिना न रहा। वह बतख भी जब उन दोनों को एक साथ देखती तो अपना झुंड छोड़ उनके पास आ जाती। उनके हाथों-पैरों पर अपनी पीली चोंच बड़ी मुलायमियत से रगड़ती, पें...पें करती रहती।

पूरे घर पर शादी का उल्‍लास छाया हुआ था। माधो के चाचा और सुगना के पिता उस जूसूकू (प्रेम विवाह) से हुई, शादी से काफी खुश थे। उन्‍हें अपने बड़े बेटे की शादी के लिए लड़की के बाप को गोनोंग (दहेज) में गाय, खस्‍सी, मुर्गा, बोरा भर आलू-धान और 40-50 दियांग (शराब भरी हांडियां) आदि नहीं देना पड़ा था।

जिस तरह झारखंड की राजधानी राँची के धौनी को उस दिन चौके-छक्‍के लगा कर पाकिस्‍तान को क्रिकेट-मैच हराते यह नहीं पता था कि सरकार उसे राँची में मकान बनाने के लिए कीमती जमीन मुफ्‍त में दे देगी। उसी तरह चचेरे भाई की शादी में आये माधो मुंडा को नहीं पता था, उसे वह प्‍यारी बतख शादी के बाद घर ले जाने को उपहार में मिल जाएगी। शादी का उत्‍सवपूर्ण माहौल खत्‍म होने के बाद जब वह लौटने लगा तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा,चाची ने वह बतख उसके हाथों में पकड़ा दी।

‘‘क्‍या यह बतख मेरी है?'' प्रसन्‍नता से उसका चेहरा खिल कर गुलाब हो रहा था। प्‍यारी बतख पा कर उसके चेहरे पर एक आकर्षक और सजीव खुशी फैल गई। घर पर भी सब लोग इस सौगात को बहुत पसंद करेंगे, उसने सोचा।

‘‘हां, अब यह तुम्‍हारी है। अपने साथ इसे भी ले जाओ।'' चाची ने मुस्‍कुराते हुए जवाब दिया था।

प्रसन्‍नचित्त माधो मुंडा पीली चोंच वाली नर्म-नाजुक सफेद बतख को अपनी बांहों में समेटे चल दिया। उसे स्‍टेशन तक छोड़ने के लिए सुगना भी उसके साथ हो लिया। स्‍टेशन पर भीड़ और उमस वाली गर्मी दोनों बहुत ज्‍यादा थे। तभी धड़धड़ाती हुई ‘गुवा-टाटा पैसेंजर' सिंगपुकुरिया के उस छोटे से प्‍लेटफॉर्म पर आ लगी। कुछ समय पहले तक प्‍लेटफॉर्म पर इधर-उधर फैले लोगों की भगदड़ टे्रन रुकते ही डिब्‍बों के दरवाजों पर सिमट गई। भीड़ के कारण हर कोई जल्‍दी से जल्‍दी भीतर घुस कर अपने बैठने का जुगाड़ कर लेना चाहता था। कभी ऐसा होता कि उतरने वाले और चढ़ने वाले यात्री दरवाजे में फंस जाते और तब, ‘...पीछे हटो, उतरने दोगे तब ही न चढ़ पाओगे।' ‘...हटो उतरने दो, पहले' जैसे वाक्‍य

हवा में उलझने लगते। थोड़ी धकम-पेल होती और उतरने वाला यात्री नीचे आ जाता। कुछ लोग खिड़कियों की राह अपना रूमाल, बैग व अखबार आदि अंदर फेंक कर अपनी सीटें आरक्षित करने में लगे हुए थे। उसी हलचल में किसी तरह माधो मुंडा भी अपने लिए जगह बना कर डब्‍बे में घुस आया। इस क्रम में एक-दो बार बतख ने भी पें...पें कर के अपनी उपस्‍थिति दर्ज करा दी।

भीतर घुसने पर माधो को एक जगह सीट मिल गई। वह निश्‍चिंतता से बैठ गया। इंजन ने सीटी बजायी। बाहर से खिड़की के पास आकर सुगना ने उसे देखते हुए अपने हाथ हिला कर विदा ली। अभी ट्रेन ने सरकना शुरु ही किया था कि एक व्‍यापारीनुमा मोटे व्‍यक्‍ति ने आकर उसे टहोका लगाया, ‘‘ऐ, ज़रा सीधा हो कर बैठो, मुझे भी जगह मिल जाएगी।''

उस सीट पर पहले ही पाँच लोग बैठे थे। एक और वह भी उस मोटे जैसे के लिए वहां कोई जगह निकलना असंभव-सा था। माधो ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, इतने मोटे आदमी को ज़रा-सी जगह से क्‍या होगा, उसने सोचा। मगर बोला कुछ नहीं और ज़रा-सा सरक गया। लोग-बाग धीरे-द्दीरे व्‍यवस्‍थित होने लगे थे। एक तरफ आमने-सामने बैठे चार यात्रियों ने अपनी जांघों में लपेट कर गमछा तान लिया था, जो अब उनके बीच एक टेबल जैसा लग रहा था और उस पर ताश की बाजी ‘ट्‌वेंटी नाईन' जम चुकी थी। जिस पर गिरते गुलाम, नहले, दहले और इक्‍के के पत्ते खेलने वालों के साथ-साथ देखने वालों की भी उत्तेजना बढ़ा रहे थे। मूंगफली वाला ‘टाइम-पास, टाइम-पास' बोल कर अपनी मूंगफली बेच रहा था।

मोटे के बैठने लायक जगह तो नहीं बनी थी, लेकिन उसने बैठते हुए माधो को कुछ ऐसा ठेला कि वह सीट और उसके मोटे शरीर के बीच दब-सा गया।

‘‘एं...एं कैसे बैठ रहे हैं। ज़रा देख कर नहीं बैठ सकते?'' वह बोल पड़ा।

लेकिन तब तक बैठ कर उसकी बात को नज़रअंदाज करते हुए उस आदमी ने कहा, ‘‘मैं तो ठीक से ही बैठा हूं, तुम ठीक से क्‍यों नहीं बैठते? अपना थैला सीट के नीचे रख दो जगह हो जाएगी।''

माधो ने प्रतिवाद किया, ‘‘थैला तो मैंने अपनी गोद में रखा है, इसे नीचे रख देने से जगह कैसे बन जाएगी? इसमें बतख है, इसे नीचे नहीं रख सकता।''

बतख की बात सुन कर उस आदमी का व्‍यापारी मन सजग हो गया। उसने बात-चीत का रुख सीट से बतख की ओर मोड़ते हुए कहा, ‘‘ज़रा दिखाओ तो कैसी है, तुम्‍हारी बतख?''

माधो मुंडा को वह आदमी अच्‍छा नहीं लगा था, लेकिन फिर उसके मन में आया कि उसे अपनी सुंदर बतख दिखा कर पछाड़ दे। उसने अपने थैले का मुंह खोल कर बतख दिखायी। वह बतख पहली ही नज़र में व्‍यापारी का मन मोह गयी। उसने अनुमान लगाया, वह आकर्षक और स्‍वस्‍थ बतख कम से कम सौ रुपयों की थी। उसकी व्‍यापारी बुद्धि जग गयी।

‘‘अपनी बतख मुझे बेच दो।'' उसने अपनी इच्‍छा जाहिर की।

‘‘नहीं यह मेरी है मैं इसे नहीं बेचूंगा।'' माधो ने उसे ठेंगा दिखाया। मन ही मन वह प्रसन्‍न हो रहा था कि उसने कैसे उस मोटे को ललचा दिया है। लेकिन तब तक व्‍यापारी भी ठान चुका था, वह बतख नहीं छोड़ेगा। उसने कहा, ‘‘यह तुम्‍हारे किसी काम नहीं आयेगी। इसे ले जा कर तुम क्‍या करोगे? जबकि मैं इसके अच्‍छे दाम दूंगा। दस, बीस, तीस कितने दूं बोलो?''

‘‘नहीं, मैंने नहीं बेचनी।'' माधो ने टका-सा जवाब दिया।

‘‘क्‍यों नहीं बेचोगे?'' वह व्‍यापारी उसके पीछे पड़ गया।

‘‘मेरी बतख है, मैं बेचूं या नहीं तुम्‍हें क्‍या? मैंने नहीं बेचनी! अगर बेचनी होगी तो बाज़ार में बेचूंगा, वहां इसके पचास से कम नहीं मिलेंगे।'' इसने मुझे क्‍या बुद्धू समझ रखा है, उसने मन ही मन सोचा।

लेकिन मोटा व्‍यापारी भी पीछे हटने को तैयार न था, ‘‘अच्‍छा पचास ही ले लो। लाओ बतख मेरी हुई।''

उसकी बात सुन कर माधो चकराया, ‘‘मैंने कहा न बतख बिक्री के लिए नहीं है।''

‘‘अरे, अभी तो तुमने कहा कि इसकी कीमत पचास रुपये है।'' व्‍यापारी ने अपना दांव चला।

‘‘आप झूठ बोल रहे हैं। मैंने कब कहा कि इसे बेचूंगा? मैं तो बस कह रहा था कि बाज़ार में इसकी कीमत पचास से कम नहीं होगी।'' माधो ने उसका प्रतिवाद किया।

तभी उधर से एक सिपाही गुजरा, जिसे देख कर व्‍यापारी की आँखों में अनायास ही चमक आ गयी। उसे रोकते हुए वह बोला, ‘‘देखिए इनस्‍पेक्‍टर साहब ये हमको बोलने के बाद भी अपना बतख नहीं बेच रहा है।''

अपने लिए इंस्‍पेक्‍टर का संबोधन सुन कर उस सिपाही का सीना जबरदस्‍त ढंग से फूल गया। वह उस व्‍यापारी के पास आ खड़ा हुआ, ‘‘काहे रे, काहे नहीं बेच रहा? लफड़ा काहे कर रहा है, तुमको बतख का पइसा तो मिलिये रहा है न।'' उसने माधो को झिड़क दिया।

माधो को लगा, मोटे व्‍यापारी और सिपाही के बीच वह बुरी तरह फंस गया है। व्‍यापारी तो बड़ा बदमाश है, पहले ज़बरदस्‍ती यहां बैठ गया और अब मेरी बतख के पीछे पड़ा है। कितनी चालाकी से इसने सिपाही को भी अपने साथ मिला लिया है। वह घबरा गया। अपनी बतख बचाने के लिए उसे वहां से हटना पड़ेगा, उसने सोचा। और कोई रास्‍ता न था,वह एक झटके से उठा और डब्‍बे में दूसरी ओर लपक लिया।

‘‘अरे...रे कहां चल दिये? अपनी बतख तो बेचते जाओ।'' पीछे से आ रही आवाज पर उसने कोई

ध्‍यान नहीं दिया। सिपाही ने भी उसे पीछे से आवाज लगायी। मगर माधो तेज-तेज कदमों से चलता रहा, उसे डर था कहीं सिपाही और व्‍यापारी पीछे से आ कर उसकी बतख छीन न लें।

‘‘जाने दीजिए!'' व्‍यापारी ने खैनी ठोंकते हुए कहा, ‘‘लीजिए खैनी खाइये।'' उसके चेहरे पर विजय के भाव थे।

‘‘मगर सेठ जी ऊ आपको बतख नहिए न दिया। अगर आप बोलिये तो...'' खैनी फांकते हुए सिपाही ने खुशामदी अंदाज में कहा।

‘‘छोड़िए बतख को। बतख न सही, अपनी जगह तो दे गया, बैठिये आराम से। आप और हम मिल कर कुछ भी कर सकते हैं। बतख क्‍या चीज़ है।'' मोटे आदमी ने भद्‌दे ढंग से मुस्‍कराते हुए कहा।

माधो मुंडा को डिब्‍बे में दूसरी तरफ बैठने की जगह नहीं मिली, वह दरवाजे के पास ही अपने लिए थोड़ी जगह बना कर खड़ा हो गया। लगभग आधे घंटे के प्रारुपिक भारतीय रेल-सफर के बाद ट्रेन ‘महालीमोरूप' स्‍टेशन पहुंच गयी। अब खरसावाँ तक का उसका सफर घंटे भर का ही बचा था। उतनी देर वह बिना किसी कठिनाई के खड़ा रह सकता है। वहां तो मोटा सेठ उसकी बतख ही हड़प लेने वाला था। कुछ देर रुक कर इंजन ने सीटी दी और ट्रेन चल पड़ी।

पहले जब पैसेंजर ट्रेनों में स्‍टीम इंजन लगते थे, तब उन्‍हें गति पकड़ने में समय लग जाता था। लेकिन अब पैसेंजर ट्रेन में भी डीजल इंजन लगने से वह तुरंत गति में आ जाती है। तेजी से आती हवा जब दरवाजे और खिड़कियों के रास्‍ते डिब्‍बे में घुसी, यात्रियों को तेज गर्मी से कुछ आराम मिला।

वहां के यात्रियों को उतारने-चढ़ाने के बाद जब ट्रेन चली थी, तब काला कोट पहने खिचड़ी बालों और आंखों पर मोटे लेंस वाला चश्‍मा पहने एक टी.टी. उस डब्‍बे में घुस आया। उस पर नजर पड़ते ही माद्दो ने अपनी जेब में रखे टिकट को ऊपर से टटोला, टिकट सुरक्षित था। टिकटें चेक करता टी.टी. उन यात्रियों के पास से तो चुपचाप गुजर जाता, जिनके पास सही टिकट थे। लेकिन डेली-पैसेन्‍जर, जो आमतौर पर व्‍यापारी थे और अपने साथ बिना उचित टिकट के काफी सामान भी ले कर चल रहे थे, उनसे टिकट की जगह चुपचाप रूपये ले लेता। अगर उनके बीच किसी तरह का वार्तालाप भी होता तो केवल रूपयों के कम या ज्‍यादा होने के बारे में।

‘‘टी.टी. साहब आज कम है, दस्‍से ले लीजिए। दस कल दे देंगे।'' एक ने कहा।

‘‘प्‌... प्‌ परसों भी तुम बीस की जगह दस दिया था। ऊ वाला दस और आज वाला ब्‌... ब्‌ बीस मिला कर पूरा त्‌... त्‌ तीस दो।'' टी.टी. ने हकलाते हुए उसे पिछला बकाया याद कराया।

टी.टी. का वैसा बोलने का ढंग देख माधो मुंडा के साथ-साथ और लोग भी मुस्‍कराये बिना न रहे। उस प्रकार के वार्तालाप में कभी टी.टी. मान जाता तो कभी उस व्‍यापारी को मानना पड़ता और फिर टी.टी. आगे बढ़ जाता। वे दोनों पक्ष अच्‍छी तरह जानते थे, एक दूसरे के बिना उनका काम नहीं चलने वाला। वैसे भी वह उनका रोज का धंधा था।

परन्‍तु उसने देखा एक यात्री के पास जब टिकट न मिला, तो टी.टी. ने उससे बीस-तीस रुपये नहीं लिये बल्‍कि उसको फाइन के साथ टिकट बना कर ही छोड़ा। माधो मुंडा को वह गोरखधंधा समझा न आता, अगर उसने अपने पास खड़े यात्रियों की बातें न सुनी होती।

‘‘यह गाड़ी तो बेटिकट यात्रियों के लिए बदनाम है। इसलिए जो भी नया आदमी पकड़ाता है उससे वे अपना फाइन का कोटा पूरा कर लेते हैं। इस प्रकार दोनों काम हो जाते हैं, डेली पैसेंजर से अपनी ऊपरी आमदनी और नये पैसेंजरों को फाईन कर अपनी ड्‌यूटी भी।''

‘‘अरे एक बार तो इन लोगों ने हद ही कर दी थी।'' दूसरे ने अपना अनुभव बांटा, ‘‘तब इन लोगों को अपना कोटा पूरा करना था। जिन लोगों के पास सही टिकट थे उनके टिकट भी ले कर फाड़ दिये और सबको डब्‍लू. टी. के आरोप में पकड़ लिया। किसी को भी इस बात का पता ना चलता। लेकिन इन लोगों की वैसी गुंडागर्दी देख एक पैसेंजर ने अपनी टिकट छिपा ली। जब उसे मजिस्‍ट्रेट के सामने ले जाया गया तब उसने वहां निकाल कर दिखा दी। मजिस्‍ट्रेट ने तब सब पैसेंजरों को छोड़ दिया और उन रेल्‍वे अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया।''

‘‘...लेकिन देख लीजिए, इतना सब होने के बाद भी यह गोरखधंधा नहीं रुक रहा है? सब कुछ तो वैसा ही चल रहा है।''

‘‘लगता है यह रोग अब सच में लाईलाज हो गया है।'' एक और यात्री ने अपनी बात कही।

तब तक टी.टी. उनके पास आ गया था, ‘‘ट्‌... ट्‌ टिकट ...टिकट?''

माधो मुंडा ने जल्‍दी से निकाल कर अपना टिकट दिखाया। बाकि लोगों के टिकट भी देख कर टी.टी. अभी आगे बढ़ा ही था कि माधो के थैले से बतख की आवाज आयी, पें....पें ।

टी.टी. ने चौकन्‍नेपन से मुड़ते हुए पूछा, ‘‘यह अ्‌... अ्‌ आवाज कहां से आयी?''

अब तक टी.टी. का वह रूप देख और अपने आस-पास खड़े लोगों की बातें सुनने के कारण माधो न जाने क्‍यों बतख के बोलने से घबरा चुका था। उसने अपने थैले को आहिस्‍ते से अपनी पीठ की ओर कर लिया।

‘‘बोलते क्‍यों नहीं? यह आवाज कहां से आयी?''

टी.टी. उसके पास तक आ चुका था, ‘‘ऐ लड़के क्‍या है, तुम्‍हारे झ्‌... झ्‌ झोले में? दिखाओ कोई बम-वम तो नहीं ले कर जा रहे?''

‘‘नहीं..नहीं, मेरे थैले में बम नहीं है।'' माधो ने लड़खड़ाते हुए जवाब दिया।

‘‘अरे कहीं उग्रवादी-फुग्रवादी तो नहीं हो? क्‍या है उसमें, दि...दि दिखाओ इधर?'' टी.टी. बिल्‍कुल उसके सर पर आ चुका था।

लेकिन इस बार माधो के जवाब देने से पहले ही फिर से बतख बोल उठी, पें...पें।

‘‘अच्‍छा तो ब्‌... ब्‌ बम नहीं, ब्‌... ब्‌ बतख है!'' टी.टी. ने हंसते हुए कहा साथ ही उसकी आंखों में एक चमक भी आ गई थी।

‘‘हां, देख लीजिए बतख ही है।'' कहते हुए माधो ने थैले से निकाल कर बतख दिखला दी। उसने सोचा टी.टी. बतख देख कर चला जाएगा, लेकिन वहां तो कुछ और ही होने वाला था।

‘‘इस बतख की ट्‌... ट्‌ टिकट कहां है?'' टी.टी. उसके सामने खड़ा हो गया।

बतख की टिकट? बतख की भी कहीं टिकट लगती है? माधो मुंडा सोच में पड़ गया।

‘‘बतख की टिकट तो मेरे पास नहीं है।'' उसने हकलाते हुए जवाब दिया।

‘‘ब्‌...ब्‌ बतख किसकी है?'' टी.टी. की निगाहें टेढ़ी हो गईं।

‘‘जी ...मेरी।'' माधो गड़बड़ाया।

‘‘तब ट्‌... ट्‌ टिकट भी तुम्‍हारे पास ही होनी चाहिए न!'' टी.टी. ने अपना जाल कसना शुरू कर दिया।

‘‘बतख की टिकट तो नहीं ली।'' माधो का गला सूखने लगा।

‘‘बतख ट्रेन में ले कर जाओगे तो ट्‌... ट्‌ टिकट लगेगी ही। ऐसा करो बिना टिकट ले जाना चाहते हो तो इसे बाहर उड़ा दो। तुम टिकट से ट्रेन में जाओ और यह तुम्‍हारे साथ उ्‌... उ्‌ उड़ते-उड़ते पहुंच जाएगी।'' टी.टी. ने व्‍यंग किया।

‘‘जी... मैं कुछ समझा नहीं।'' माधो के चेहरे पर हवाइयां थीं।

‘‘ब्‌...ब्‌ बतख डब्‍ल्‍यू टी ले कर जा रहे हो और कहते हो समझे नहीं?'' टी.टी. ने उसकी खिल्‍ली उड़ायी।

‘‘मेरी टिकट तो है न! यह तो मेरे साथ जा रही है।'' माधो ने भोलेपन से जवाब दिया।

‘‘तो क्‍या एक टिकट पर अपने साथ पूरा च्‌... च्‌ चिड़ियाघर ले जाओगे?''

‘‘नहीं..नहीं... चिड़ियाघर कैसे ले जा सकता हूं?''

‘‘चलो अब बहस मत करो। बतख की टिकट नहीं है तो इसकी ट्‌... ट्‌ टिकट बनवाओ। पंद्रह रूपये टिकट के और ढाई सौ फाईन कुल मिला कर हुए दो सौ पैंसठ। जल्‍दी निकालो।'' टी.टी. ने उसे हिसाब समझाया।

दो सौ पैंसठ सुन कर माधो को अपना दिमाग हवा में तैरता महसूस हुआ। पचास रुपये की बतख के लिए दो सौ पैंसठ रुपये? उसकी जेब में कुल बीस रुपये थे। अब क्‍या होगा?

‘‘देखिए मेरे पास तो उतने रुपये नहीं हैं। मैं तो अपने घर लौट रहा हूं। वैसे भी मुझे पता नहीं था कि बतख की टिकट लेनी पड़ती है और ना ही स्‍टेशन पर किसी ने बताया।''

‘‘तो... तो क्‍या बतख को बेटिकट ले जाते हैं, यह पता था हैं? देखो मिस्‍टर पता था या नहीं, यह प्‌... प्‌ प्रौब्‍लम आपका है। ट्रेन में जिन्‍दा या मुर्दा जो भी सफर करता है, उसकी टिकट लगती है। पैसे निकाल कर टिकट बनवाओ या फिर मैं च्‌...च्‌ चलान काटता हूं, जेल जाने के लिए तैयार हो जाओ।'' टी.टी. ने मानो उसे उठा कर ज़ोर से चट्टान पर दे मारा हो।

जेल का नाम सुन कर उसके हाथ-पैर फूलने लगे। माधो मुंडा ने अपनी पॉकेट से बीस रुपये निकाल कर अपनी कुल जमा पूंजी टी.टी. को देनी चाही, ‘‘देखिए मेरे पास बस इतने ही रुपये हैं। वैसे भी पंद्रह रुपये तो पूरी टिकट के बनते हैं। बतख के तो साढ़े सात रुपये ही होने चाहिए।''

‘‘अरे वाह, तुम्‍हारा ह्‌...ह्‌ हिसाब तो काफी अच्‍छा है।'' टी.टी. ने व्‍यंग किया, ‘‘लेकिन रेल तुम्‍हारे हिसाब से नहीं अपने नियम से चलती है।''

‘‘तब तो मैंने टिकट ली है नियम से मुझे सीट भी मिलनी चाहिए। दीजिए मुझे बैठने की सीट। तब मैं दूंगा बतख के लिए दो सौ पैंसठ रुपये।''

‘‘त्‌...त्‌ तो अब तुम मुझे न्‌... न्‌ नियम सिखाओगे?'' टी.टी. को गुस्‍सा आ गया, ‘‘अगर ट्रेन में सीट नहीं थी, तब चढ़े क्‍यों? पैदल चले जाते। रेल विभाग क्‍या तुमको बुलाने घर गया था?''

.4.

अजीब खब्‍ती आदमी है, टी.टी.। उसके कुतर्क सुन कर माधो मुंडा का मन कैसा-कैसा हो रहा था।

फिर भी उसने अंतिम प्रयास करते हुए कहा, ‘‘देखिए सर आप गुस्‍सा मत होइये। अब तो आप ही मदद करें, मुझे कुछ नहीं सूझ रहा।''

‘‘अब आये न रास्‍ते पर। अभी तक तो बड़ा नियम कानून झाड़ रहे थे।'' टी.टी. ने शांत होते हुए कहा, ‘‘चलो, एक उपाय बता देता हूं। अपनी बतख मुझे बेच दो। मैं तुम्‍हें इसके बीस रुपये दूंगा। इससे तुम्‍हें टिकट नहीं लेनी पड़ेगी और बीस रुपये भी कमा लोगे।'' समाधान सुझाते टी.टी. की आंखें चमक रही थीं।

क्‍या!! पचास रुपये की बतख के बीस रुपये? माधो ने एक नजर अपने हाथ में पकड़ी रूई-सी सफेद-सफेद, नर्मो-नाजुक और प्‍यारी बतख पर डाली। उसे टी.टी. का समाधान बिल्‍कुल बकवास लगा।

‘‘बीस रुपये तो मेरे पास भी हैं, आप ही ले लीजिए।'' उसकी आवाज में निवेदन था।

‘‘ले लीजिए टी.टी. साहब। जाने भी दीजिए। अगर इसके पास पैसे होते तो आपको दे देता।'' पास खड़े एक यात्री ने माधो का पक्ष लेते हुए कहा। लेकिन माधो के इंकार के बाद टी.टी. किसी भी तरह पिघलता न दिखा, उल्‍टे वह उस यात्री पर खीझ गया।

‘‘यदि आपको इतनी ही द्‌... द्‌ दया आ रही है तो आप ही बनवा दीजिए न इसको ट्‌... ट्‌ टिकट।'' टी.टी. का उत्तर सुन कर बोलने वाला यात्री चुप हो कर पीछे खिसक गया।

‘‘कितने लोगों से तो पैसा ले कर आपने छोड़ दिया हैं। उन सबका फाइन वाला टिकट काहे नहीं बनाये?'' माधो को भी अब टी.टी. पर गुस्‍सा आने लगा था।

‘‘तुम हमको हमारा काम सिखाएगा। दो सौ पैंसठ रुपया निकालो या फिर ज्‌... ज्‌ जेल जाओ।'' टी.टी. उस पर चिल्‍लाया।

माधो मुंडा ने मदद के लिए चारों तरफ देखा, लेकिन उसे निराश ही होना पड़ा। उसकी नजर बाहर गुजर रहे स्‍टेशन के नाम पर पड़ी ‘पान्‍ड्रासाली'। बस और दो स्‍टेशनों के बाद ही तो उसे उतरना है। फिर उसने मन ही मन कुछ सोचते हुए अनुमान लगाया और एक इत्‍मिनान-सा उसके चेहरे पर आ गया। उसने अपनी कमीज की भीतरी जेब टटोलते हुए कहा, ‘‘ठीक है टी.टी. साहब आप बतख की टिकट बना ही दीजिए।''

उसे यूं हथियार डालता देख टी.टी. प्रसन्‍न हो गया। उसका फाईन का एक कोटा पूरा हो रहा था। उसने अपने हाथ में थमी टिकट बुक का कार्बन ठीक किया और मोटे लेंसवाले चश्‍में से झांकते हुए बतख की टिकट बनाने लगा। उसने सब को सुनाते हुए कहा, ‘‘अब पैसा कहां से आ गया? हमको पता है, पैसा रख कर भी तुम लोग हुज्‍जत करते हो।''

आस-पास खड़े यात्रियों के लिए तमाशा खत्‍म हो चुका था। टी.टी. ने टिकट बना कर माधो मुंडा की ओर बढ़ाई। बाहर से डिब्‍बे में आती तेज हवा से टी.टी. के हाथों में फाइन वाली टिकट फड़फड़ा रही थी। लेकिन माधो मुंडा ने टिकट लेने की जगह अपने हाथ में थमी बतख को पुचकार कर एक बार प्‍यार किया और दरवाजे से बाहर उछाल दिया। उसका अनुमान बिल्‍कुल सही था, वहां बाहर ‘सोना नाला' अपनी पूरी मस्‍ती में बहा जा रहा था। पंख फड़फड़ाती बतख उसमें जा उतरी।

‘‘अरे ये क्‌... क्‌ क्‍या किया ...?'' टी.टी. के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। अंगुलियों में फड़फड़ाती दो सौ पैंसठ रुपये के फाइन वाली टिकट उसका मुंह चिढ़ा रही थी।

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संपर्क:

(कमल)

संपर्कः- डी-1/1, मेघदूत अपार्टमेंट्‌स, मरीन ड्राइव रोड, पो.- कदमा, जमशेदपुर-831005(झारखंड). दूरभाष-09431172954.

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(चित्र – लोककलाकृति – साभार बनवासी सम्मेलन)

कहानी

100_8163 (WinCE)

अकबर का घर

- कमल

असमतल, चिकनी सतह पर इधर-उधर फिसलते पारे-सा, अकबर का मन भी किसी एक जगह नहीं टिक पा रहा था। कभी तो उसे लगता तुषार की बात मान अपना मकान बेच दे और सारे झंझट से मुक्‍ति पाये, तो दूसरे ही पल लगता कि चंद लोगों के वैसे नाजायज दबाव में भला वह अपना मकान क्‍यों बेचे? इसी पारे-सी फिसलन का परिणाम था कि वे दोनों आमने-सामने बैठे अपनी-अपनी बातों पर अड़े हुए थे। उनके बीच टेबल पर अछूत-सी चाय प्‍यालियों में सुलग रही थी।

“तो तुम अपना मकान नहीं बेचोगे?” इधर से तुषार पूछता।

“नहीं, कभी नहीं!” उधर से अकबर का जवाब आता।

हालाँकि लंगोटिया यार होने के कारण तुषार भी नहीं चाहता था कि अकबर अपना मकान बेच कर बेघर हो जाए। इसलिए भीतर से उसे अकबर का वह उत्तर अच्‍छा लग रहा था। लेकिन उन दिनों मुहल्‍ले की परिस्‍थितियां कुछ इस कदर बिगड़ चुकी थीं कि अकबर के मकान से ज्‍यादा उसे अकबर के जीवन की चिन्‍ता हो रही थी।

‘चपंडुक हो तुम, पूरे के पूरे चपंडुक!' तुषार बोला.

‘और तुम ढक हो। वह भी स्‍मॉल नहीं कैपिटल डी से शुरू होने वाला ढक!' अकबर ने जवाब दिया।

‘‘ठीक है।...तुम मरोगे एक दिन।'' वह झुंझलाया।

मगर उधर से अकबर की लाहौरी-पंजाबी हँस कर जवाब लायी, “ओय जाण दे परां, मेरा वाल वी विंगा नईं होणा (जाने दो यार मेरा बाल भी बांका नहीं होगा)।”

....और हर बार की तरह उस बार भी तुषार अचानक आयी अकबर की पंजाबी से गड़बड़ा गया। ऐसे मौकों पर वह कभी न समझ पाता कि क्‍यों अकबर अनायास ही पंजाबी बोलने लगता है? शायद उसके अब्‍बा का असर उस पर पर छा जाता है और वह इस तरह पंजाबी बोलने के बहाने अपने पुराने दिनों को याद कर लेता है।

लेकिन तुषार की गड़बड़ाहट देख जल्‍द ही अपनी आज की भाषा पर लौटते हुए अकबर ने बात जारी रखी, “मियां, तुम्‍हारे जनाजे को कँधा दिये बिना मैं नहीं मरने वाला। समझे...हो..हो...हो...।”

उसकी हंसी तुषार की झुंझलाहट की आग में घी का काम कर गई, “ज्‍यादा स्‍मार्ट मत बनो। ...तुम कबीर के नहीं कंसों के जमाने में रह रहे हो समझे, किसी भुलावे में ना रहना।”

“...तो कबीर क्‍या अच्‍छे समय में हुए थे?” उसकी बात पर मुस्‍कराते हुए वह पलट वार करता और तुषार लाजवाब हो कर रह जाता। सच, बातों में वह अकबर से कभी जीत नहीं पाता था।

‘आप लोग चाय तो पी लिया कीजिए।' अकबर की पत्‍नी नज़मा टेबल पर ताजा चाय की प्‍यालियां रख ठंढी चाय की प्‍यालियां उठा लेती।

पिछले कई दिनों से तुषार के इस प्रश्‍न कि ‘मकान बेचोगे या नहीं?' के उत्तर में अकबर की ‘नहीं!' के अलावा उनकी उस अंतहीन बहस का कहीं अंत न होता था। इस तरफ तुषार की झल्‍लाहट और उस तरफ अकबर की मुस्‍कराहट दोनों अपनी-अपनी जगह पर डटे रहते।

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दुनियाँ के हर आम आदमी की तरह अकबर और तुषार के घरों के भी अपने खटराग...पटराग...चटराग बने रहते और उनकी साप्‍ताहिक लंबी बैठकी का रविवार आ पहुंचता, जिस एक दिन दोनों दोस्‍त आराम से बैठने बतियाने की स्‍थिति में होते थे। वर्ना तो सारा हफ्‍ता कभी दफ्‍तर से लौटने में देर तो कभी घरों का सौदा-सुलफ, कभी कुछ तो कभी कुछ लगा ही रहता...। इस बीच की मुलाकातें ‘हेलो हाय टाइप' की होती थीं। पिछली बार बैठक अकबर के घर थी तो इस बार तुषार के घर।

भीतर से चाय, पकौड़ियां, मिक्‍सचर आदि अपने सामान्‍य अंतरालों पर टेबल हथिया रहे थे। उनकी गप्‍पबाजी का चक्‍का सारे दुनिया जहान की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, खेल और फिल्‍म आदि की बातों से घूम-घाम कर फिर से अकबर के घर बेचने पर आ अटका था।

गुजरते हुए दिनों के साथ ही उनके बीच उस विषय पर हो रही बात-चीत और तल्‍ख होती जा रही थी, लेकिन हर बार ही बे-नतीजा रह जाती।

“समझ में नहीं आता, तुम किस दुनियाँ में रहते हो?” तुषार धुं-धुंआ रहा था।

“मैं तो इसी दुनियाँ में रहता हूँ, तुम अपनी दुनियाँ से जरा बाहर निकला करो। आज की दुनियाँ बहुत आगे निकल गयी है। हमारे पूर्वजों का मंदिर-मस्‍जिद और धर्म के नाम पर लड़ने वाला जमाना अब बदल चुका है। अब वैसा कुछ नहीं होगा समझे।”

“तुम मूर्ख हो, कुछ भी नहीं बदला!” तुषार उसे समझाने का प्रयत्‍न करता, “जिस देश में मंदिर-मस्‍जिद नहीं हैं, वहां दंगे नहीं होते क्‍या? इतना भी नहीं जानते, प्रश्‍न मंदिर-मस्‍जिद का नहीं, लड़ाई और दंगे-फसाद का है। दरअसल सबसे सीधा और सटीक होने के कारण हमारे देश में धर्म को एक बहाना बनाया जाता है। यदि ये न होता तो कोई और बहाना ढूंढ लिया जाता क्‍योंकि मूल प्रवृति तो हड़पना है और दंगों की आड़ में हड़पना बहुत आसान होता है, समझे। अमां यार, कभी तो अपनी कहानी-कविता और शेरो-शायरी की काल्‍पनिक दुनियाँ से बाहर निकल कर अखबार भी पढ़ लिया करो। तुम्‍हारे उस साहित्‍य में खूबसूरत अतीत होता है या खूबसूरत भविष्‍य के जवान मगर हवाई सपने, या फिर होते हैं केवल काल्‍पनिक और सुंदर जीवन के कभी भी न सच होने वाले भुरभुरे सपने। जबकि अखबारों में होता है, वर्तमान का असल और कुरूप चेहरा। तुम अपने समाज का केवल खूबसूरत अक्‍श ही मत देखा करो, साक्षात्‌ समाज को देखो जिसकी सूरत आज के समय में बहुत ही भद्‌दी और डरावनी हो चुकी है।”

“बिल्‍कुल ठीक। अच्‍छा, तुम तो साहित्‍य की दुनिया में नहीं रहते, तो फिर इतना चिंतित क्‍यों हो। बेफिक्र रहो और ऐश करो।”

“मैं अपने लिए नहीं तुम्‍हारे लिए चिंतित हूं।”

“मुझे कुछ नहीं होगा। तुम परेशान मत रहो।” अकबर हंसता और उठते हुए कहता, “अच्‍छा फिर मिलेंगे! ...हो...हो...!”

दूर जाती उसकी हंसी बड़ी देर तक तुषार के कानों में घुलती रहती, जो सारी आशंकाओं तथा झुंझलाहट के बावजूद गरम गुड़-सी मीठी और जलतरंग के संगीत-सी मोहक लगती। तुषार चाहे जो भी कहता रहे, लेकिन अकबर अपने उन विश्‍वासों से कभी भी बाहर न निकल पाता, जिनकी नींव कभी उसके अब्‍बा हुजूर ने डाली थी।

‘क्‍या अकबर भाई साहब को सच में अपना घर बेच देना पड़ेगा?' सरला अपनी बोझिल आवाज़ और उदास आंखों से तुषार के पास आ बैठी। उसकी आंखें इस बात पर आकर उदास हो जाती हैं वर्ना तो वे खूबसूरत आंखें हमेशा ही चमकती, मुस्‍कराती रहती हैं। इन्‍हीं आंखें में झांक कर तो अकबर की बीवी नजमा ने पहली बार उसे आपा कहा था और तब से वह रिश्‍ता आज तक निभ रहा है। उस दिन भले ही सरला ने प्रतिवाद किया था, ‘मैं तुम्‍हारी आपा नहीं सहेली बनूंगी! सहेलियों में हर तरह की बातें होती हैं। आपा बना दोगी तो मुझे ‘ग्रेविटी मेंटेन' करनी पड़ेगी। केवल ढेड़ माह का ही तो फर्क है हम दोनों की शादियों में।'

‘बातें तो हम अब भी हर तरह की किया करेंगी, बिल्‍कुल सहेलियों की तरह। लेकिन आप इस मुहल्‍ले में मुझसे पहले आयी हैं, इस नाते बड़ी हैं।' सरला को निरुत्तर करती नजमा के चेहरे पर शोख मुस्‍कान थी।

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अकबर के मरने की भविष्‍यवाणी तो तुषार ने झल्‍लाहट की सहज प्रक्रिया स्‍वरूप की थी, लेकिन

इधर के दिनों में तेजी से बदलती राजनीतिक और सामाजिक परिस्‍थितियों से वह भविष्‍यवाणी सच होने के मुहाने पर पहुुंच गई थी। होना तो यह चाहिए था कि वह भविष्‍यवक्‍ता बनने की खुशी मनाता लेकिन वह है कि केवल रोता रहता है। बल्‍कि वह तो बिल्‍कुल नहीं चाहता कि उसकी भविष्‍यवाणी सच हो। कई लोगों के लिए यह बात अजीब होगी और एक हद तक पीढ़ादायक भी कि हिन्‍दू हो कर वह क्‍यों एक मुसलमान के लिए रोता रहता है...क्‍यों वह अकबर की जिन्‍दगी के लिए चिंतित है? खैर वैसे लोग भी अब इस बात से प्रसन्‍न हो रहे हैं कि अंततः तुषार पर तुषारापात होने वाला है और अब अकबर का अंत बहुत ही निकट है।

...लेकिन जरा ठहर जाएं,, इस तरह बताने से सब कुछ बहुत सरलीकृत होता जा रहा है और बेमजा भी। बेमजा कहानी भला कैसी कहानी? क्‍योंकि कहानी कितनी भी सच क्‍यों न हो अगर उसे कहानी बनना है तो मजा देना ही होगा।

फ्‍लैशबैक की मदद लें तो इस कहानी का प्रारंभ उसी दिन हो गया था, जिस दिन अंग्रेजों के किस्‍से का अंत हुआ था। अर्थात्‌ दो सौ सालों तक लूटने और राज करने के बाद उस दिन, जब आधा अगस्‍त गये और आधी रात बीते, सन्‌ सैंतालिस में अंग्रेज अपना बोरिया-बिस्‍तर समेट ‘शान से' ब्रितानिया को लौट रहे थे।

उधर लाहौर में अकबर के अब्‍बा, कट्टर कांग्रेसी और गाँधी जी के सच्‍चे भक्‍त, रहते थे।

क्‍या कहा कौन वाले गाँधी जी? अरे भाई, हमारे वही लंगोट वाले गाँधी जी, जिनके सारे सत्‍याग्रहों के बावजूद अंग्रेजों ने ब्रिटेन जाते-जाते, गधों को भी मात करती ऐसी दुलत्ती झाड़ी कि हमारा देश दो टुकड़ों में बंट गया और देश की आजादी के लिए हुए सारे संघर्ष, सारी मानवता बंटवारे की सांप्रदायिक हिंसा में लहुलुहान हो कर छटपटाने लगी। खैर और लोग तो तत्‍काल संभल कर दोनों तरफ लूट-मार में लग गये। लेकिन उस कट्टर कांग्रेसी यानि अकबर के अब्‍बा हुजूर को भला कोई कैसे समझाता? उसका मन तो बंटवारे को स्‍वीकारने के लिए कतई तैयार न था। आम जन के शब्‍दों में, ‘देश आजाद होने के उस समय उसका दिमाग उलटी बातें कह रहा था। यानि उलटा चल रहा था।'

लाहौर में अपने घर के बाहर खड़े वे जोर-जोर से कह रहे थे, “ओए जाण दे, मैं नईं मानदा फिरंगियां दी इस वाँड्‌ड नूं (मैं फिरंगियों का यह बंटवारा नहीं मानता हूँ)।”

उनका चेहरा तप रहा था। जवान, गदराया बदन गुस्‍से से कांप रहा था और मुंह से झाग निकल रही थी।

लोगों ने उसे समझाना चाहा था, “तेरे मणण, ना मणण न की हुंदा ए। तक्‍सीम हो चुक्‍की ए, पाकस्‍तान बण चुक्‍कया ए। (तुम्‍हारे मानने ना मानने से क्‍या होता हैं। बंटवारा हो चुका है, पाकिस्‍तान बन चुका है)?”

मगर वे तो किसी भी तरह मानने को तैयार न थे, “ओय कैसा पाकस्‍तान? कित्‍थों दा पाकस्‍तान?”

उन्‍होंने अपनी चादर (लुंगी) की गांठ कसते हुए कहा, “इंज होया ए, तां संबालो आप्‍पणा पाकस्‍तान, मैं तां हिन्‍दोस्‍तान विच ही रैणा ए (अरे कैसा और कहां का पाकिस्‍तान? ऐसा है तो संभालो अपना पाकिस्‍तान मैं तो हिन्‍दुस्‍तान में ही रहूंगा)।”

घर-परिवार तथा मुहल्‍ले वालों ने उन्‍हें बड़ा समझाया लेकिन समझाने वालों के सभी तर्क दर किनार कर, उन्‍होंने चटपट अपने मन में ठान लिया। बस फिर क्‍या था, निकले पड़े अंग्रेजों को धत्ता बताने के लिए भारत की ओर। अपनी तरफ से वे बिल्‍कुल सही काम कर रहे थे परन्‍तु तब और उन हालातों में लाहौर छोड़ कर भारत आने का मंसूबा रखने वाले उस मुसलमान को सारे लोग पागल ही तो कहते! और सभी लोग उसे पागल कह भी रहे थे! चढ़ती जवानी का उबाल और पंजाबियत की खासियत वाला वह तथाकथित पागल किसी के भी कहने से नहीं रुका। उसका कहना था, भारत आ कर वह अंग्रेजों को धत्ता बताएगा और कि वह आजाद मुल्‍क का नागरिक होने के नाते अंग्रेजों के बंटवारे वाले फॉर्मूले को पूरी तरह खारिज करता है। उसका तो यह भी कहना था कि सारे मुसलमानों

को हिन्‍दुस्‍तान और हिन्‍दुओं को पाकिस्‍तान जा कर बस जाना चाहिए। अंग्रेजों ने जाते-जाते हम भारतवासियों को जो उल्‍लू बनाया था, उसका बदला लेने का यही एकमात्र रास्‍ता है। लेकिन उसकी बात किसी ने नहीं सुनी! साथ ही उसे बताया गया कि वह पागल है और पागलों की तरह चुपचाप एक तरफ बैठ जाए। अब पागलों की भी बात भला कोई सुनता है? वैसे भी देश से प्रेम करने वाले पागल ही तो होते है? तभी तो शहीदे आजम भगत सिंह, बिस्‍मिल और खुदीराम बोस जैसे पागल हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमते हैं। चंद्रशेखर ‘आजाद' जैसे पागल अंग्रेजों के हत्‍थे चढ़ने की जगह स्‍वयं को गोली मार, आजाद मौत लेते हैं, तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे विदेश जा कर हिन्‍द के लिए फौज रचते हैं। अगर वे सब देश-प्रेम में पागल न होते तो क्‍या पड़ी थी, उन्‍हें वह सब करने की? आज के नेताओं की तरह वे भी चुपचाप माल काटते और चैन की बंशी बजाते।

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ख्‍़ौर...अकबर के अब्‍बा के सर पर बंधी पगड़ी, खुली दाढ़ी, और उसकी फर्राटेदार लाहौरी-पंजाबी सुन कर सन्‌ सैंतालिस में अटारी-बॉर्डर पार करने पर सब ने उन्‍हें सिक्‍ख ही समझा था। जब वह कहते कि वो मुसलमान है और अंग्रेजों को उल्‍लू बनाने के लिए भारत आ गया है, तब लोग उस पर तरस खाते हुए कहते, ‘पाकिस्‍तान में अपना सब कुछ गंवाने के कारण सरदार जी का दिमाग चल गया है।'

उस समय के लोग निश्‍चय ही पुरुषार्थ में ज़रा कमज़ोर रहे होंगे जो नीचे से चादर (लुंगी) उठा कर अकबर के अब्‍बा का ‘धर्म-चेक' न कर सके! वर्ना आज के दौर में तो गर्भ से भी अजन्‍मे बच्‍चे निकाल कर सहजता से ‘धर्म-चेक अनुष्‍ठान' संपन्‍न किये जाते हैं। फलतः वे एक लंबे समय तक लोगों की नजरों में पागल-सिक्‍ख ही बने रहे थे।

वह बेइमान दिनों और धोखेबाज रातों का दौर था। कभी भरी दोपहर में हैवानियत का अंधेरा छा जाता तो कभी काली रात में भी इंसानियत की रोशनी कौंध जाती। तेज आंधी के थपेड़ों में दिशाहीन उड़ते सूखे पत्ते की तरह अपनी उन बातों के साथ न जाने वे कहां-कहां भटकते रहे। उन्‍हीं भटकते दिनों की एक डूबती शाम उन्‍हें नूर मिली थी। पाकिस्‍तान जाने के लिए निकले अपने परिवार से बिछड़ कर भटकती दुखी, हैरान और परेशान अकेली नूर! जिसकी खौफज़दा आंखों में सब कुछ था, नही था तो बस जीवन। सामने पड़ते ही, पहली नजर में वह भी उन्‍हें सिक्‍ख समझी थी और जान गई कि अब उसका अंत निकट है। लेकिन डर के मारे बेहोश होने से पहले अपने कानों में पड़े शब्‍द, “डर मत, अल्‍लाह पर भरोसा रख।” उसे राहत दे गये थे। होश में आने के बाद जब उन दोनों ने एक दूसरे की सच्‍चाई जानी तो लगा कि उन्‍हें एक दूसरे कि सख्‍त जरूरत है। फिर नूर को उनकी जिन्‍दगी का नूर बनते देर न लगी।

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जीवन भले थम जाए, समय नहीं रुकता। दिन बीतते गये। तारीखें बदलती गईं। नये देश...नये हुक्‍मरान...नई समस्‍याएं। अलग हुए उन दोनों देशों में न जाने क्‍या-क्‍या होता रहा? नहीं हुआ तो बस वह सब, जिसके लिए आजादी के दीवानों ने अपने जीवन होम किये थे और देशवासियों ने उम्‍मीदें पाल रखी थीं।

...फिर धीरे-धीरे अकबर के अब्‍बा ने उस तरह की बातें करनी स्‍वयं ही बंद कर दीं। लेकिन यह कभी न माना कि पाकिस्‍तान छोड़ हिन्‍दुस्‍तान आ कर उसने कोई गलती की थी। और ना ही कभी पाकिस्‍तान लौट जाने के बारे में सोचा, जैसा कि उन दिनों उनके पाकिस्‍तान वाले रिश्‍तेदार चाहते रहे थे। उनकी दुनियां यहीं थी और वह दुनियां रफ्‍ता-रफ्‍ता यहीं गहरी होती जा रही थी। जब उनके घर पहली संतान के रूप में अकबर का जन्‍म हुआ तो वे बड़े प्रसन्‍न हुए।

“इसका नाम अकबर रखेंगे!” अकबर के अब्‍बा ने नूर के बालों में प्‍यार से अंगुलियां फिराते हुए

कहा था। तब तक उसकी लाहौरी-पंजाबी जाने कहां खो चुकी थी।

“अकबर क्‍यों?” नूर ने अपनी कजरारी आँखें उनके चेहरे पर टिका दीं।

“हिन्‍दू-मुसलमान को एक करने के लिए उस अकबर ने ‘दीन-ए-इलाही' चलाया था। हमारा अकबर भी इंसानों के बीच खड़ी नफरतों की दीवारें गिराएगा।” बोलते-बोलते उनकी आँखों में चमक भर गयी थी। न जाने क्‍यों उन्‍हें इस बात का हमेशा ही भरोसा रहता कि एक दिन सभी लोग मिल जाएंगे और हिन्‍दुस्‍तान, पाकिस्‍तान मिल कर फिर से एक भारत बन जाएंगे...वही महान जगत्‌गुरू की प्रतिष्‍ठा वाला भारत। भले ही आज हालात अच्‍छे न हों, लेकिन एक दिन जरूर सब कुछ ठीक-ठाक हो जाएगा। इंसान हमेशा के लिए जानवर बना नहीं रह सकता। ये धर्म और जात-पात के नाम पर होने वाले झगड़े बंद हो कर ही रहेंगे। जब तक वे जिन्‍दा रहे अमन और खुशहाली के वे सपने हमेशा उनके दिल में जीवित रहे।

पता नहीं अब्‍बा हुजूर के विश्‍वासों का असर था या अपने नाम का, अकबर अपने अन्‍य भाइयों-बहनों से स्‍वभाव में काफी अलग था। अब्‍बा का वह भरोसा जो अणुवांशिकता के माध्‍यम से सबसे ज्‍यादा अकबर में बह आया था, काफी दिनों तक बना रहा।....लेकिन फिर हालात तेजी से बदलते चले गये थे। हालाँकि वैसा होना ‘जेनेटिक्‍स' के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है क्‍योंकि जीवों में वे गुण-दोष तो पीढ़ियों तक अक्षुण बने साथ-साथ चलते रहते हैं। लेकिन यहां वैसा नहीं हो रहा था।

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तो हुआ यूँ कि बीसवीं सदी की अंतिम चौथाई में तब से, जब से कुछ लोगों ने इसे मुहल्‍ले को बलपूर्वक ‘हिन्‍दु-मुहल्‍ला' बनाना शुरू किया था, उस मुहल्‍ले में कुछ लोग तथाकथित रूप से ‘असल हिन्‍दू' बन गये और गर्व से कहने लगे थे कि भारत, भारत नहीं असल में हिन्‍दुस्‍तान है और हम भारतीय नहीं हैं, ‘गर्व वाले' हिन्‍दू हैं। अगर यहां कोई गैर-हिन्‍दू रहना चाहता है तो वह हिन्‍दू बन कर ही रह सकता है। अर्थात्‌ यदि वह मस्‍जिद, गुरूद्वारा, गिरजा आदि जगहों पर जाता है तो कोई बात नहीं, लेकिन इबादत उसे हिन्‍दू रीतियों से ही करनी पड़ेगी! यथा अजान, अरदास और प्रेयर की जगह आरती करनी होगी घंटे बजाने पड़ेंगे। अगर वैसा न किया, तब बिना किसी किन्‍तु-परन्‍तु (इफ्‍स और बट्‌स) के ‘के.बी.के.बी.' अर्थात्‌ कहीं भी, कभी भी मरने के लिए तैयार रहना होगा।

वैसे मोटे तौर पर देखा जाए तो पूजा आदि वाली इन बातों में ऐसी कठिनाइयां न थीं कि वे मानी न जा सकें। लेकिन सभ्‍यताओं का इतिहास उठा कर देख लें, बातें मनवाना तो कभी भी कहीं भी ‘गर्व वालों' का उद्‌देश्‍य भी नहीं रहा है। उनकी ‘अर्जुन-दृष्‍टि' आम आदमी पर नहीं हर काल में सत्ता की गद्‌देदारी कुर्सियों पर रहती है। वह सत्ता, जो मान मनौव्‍वल से नहीं, सर फुटौव्‍वल से ही मिलती है। वैसे भी लड़ने-मारने के गुण गुफा-युग से ही मनुष्‍यों के गुणसूत्रों में चिपक-चिपक कर लिपटे हुए हैं। उन पर ‘पोजिटिव क्रोमोजोमल म्‍यूटेशन'(रचनात्‍मक गुणसूत्रीय बदलाव) के लिए किसी भी रेडियेशन का असर नहीं पड़ता। वैसे भी मान-मनौव्‍वल से ज्‍यादा जब लड़ने के बहाने ढूंढना उद्‌देश्‍य हो तो क्‍या किया जा सकता है? क्‍योंकि ‘मान-जाना' मतलब सुलह-सफाई यानि कि शांति!

‘शांति' शब्‍द के उच्‍चारण से ही अचानक चारों तरफ अजीब सी तिलस्‍मी हवाएं बहने लगतीं जिनकी सरसराहट मजाक उड़ाने के से अंदाज में कानों में फुसफुसातीं, ‘ओम्‌...शांति...ओम्‌! ओम्‌...शांति...ओम्‌!'

तिलस्‍मी हवाओं का पहला झोंका पूछता, ‘ए! क्‍या बोलता तू?'

दूसरा कहता, ‘शांति?...येड़ा है क्‍या!'

तीसरा तेजी से झपटता आता, ‘मूर्खां! युद्धों और महाभारतों की परंपरा वाले हमारे देश में शांति?'

चौथा भला क्‍यों पीछे रहता, ‘शांति यहां चाहता कौन है? गुफा-युग से निकल आये उन मानवों का दिमाग अभी भी उन पथरीली गुफाओं के उजाड़ अंधेरों में भटक रहा है।'

और तब पांचवां झोंका के.एल. सहगल की आवाज में फैसला सुनाता, ‘....तो हासिल ये कि जब

तक मार-पीट, और खून-खराबा न हो जाय, हम जी के क्‍या करेंगे?'

और तिलस्‍मी हवाएं कोरस करने लगतीं, ‘नहीं, नहीं! शांति बहन जी नहीं चलेगी, अशांति भाभी जी चाहिए। अशांति...अशांति!'

फिर जैसे अचानक बिजली चली जाए, अचानक ही छा जाने वाला सन्‍नाटा बतलाता कि वहां बातें करती तिलस्‍मी हवाएं चली गई हैं।

तो इसी तरह के कई ऊट-पटांग आदेशों के अंतर्गत हिन्‍दुओं के मुहल्‍ले में स्‍थित अकबर का तथाकथित मुसलमान-घर अड़ गया था। दरअसल घर का हिन्‍दू-मुसलमान होना नहीं, इसका असल कारण उस घर का मुख्‍य बाजार में मेन रोड पर स्‍थित होना था। कुछ गर्व वाले हिन्‍दुओं का सोचना था, अगर उस घर को झटक लिया जाए तो वहां एक अच्‍छा खासा मार्केटिंग कांप्‍लेक्‍स बन जाएगा। जहां देसी से ज्‍यादा विदेशी कपड़ों, टी.वी., फ्रिज, मोबाइल आदि इलेक्‍ट्रोनिक्‍स सामानों, पिज्‍जा-बर्गर और भी न जाने क्‍या-क्‍या चीजों की रिंग-बिरंगी, जलती-बुझती, मचलती-चमकती दुकानें होंगी। जिनसे होने वाली आमदनी उन्‍हें देखते ही देखते फर्श से अर्श तक ले जाएगी। उन्‍हें अकबर का घर बुरी तरह ललचाने लगा था। उन लोगों को अपने तथा सुनहरी बाजार के बीच एक अकेला अकबर खड़ा नजर आ रहा था।

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...तो जिस तरह आधा अगस्‍त गये और आधी रात बीते सन्‌ सैंतालिस वाले उन दिनों अकबर के अब्‍बा हुजूर हिन्‍दुस्‍तान आने के लिए अड़ गये थे उसी तरह इक्‍कीसवीं सदी बीतने वाले इन दिनों में अकबर हिन्‍दुओं के मुहल्‍ले वाले अपने पैतृक घर को ले कर अड़ गया है। ...कि वर्षों से वह अपने परिवार के साथ वहां रहता आया है, उसे बेच कर कैसे और क्‍यों कहीं और चला जाए? उन दिनों उसके अब्‍बा हुजूर नहीं माने थे तो आज भला वह कैसे मान जाता?

उसके अब्‍बा को जानने वाले बातें करते हैं, ‘अजीब अहमकों का खानदान है! न जाने क्‍यों हमेशा मरने पर लगे रहते हैं। अरे भई, अगर बहुत उम्र हुई तो भी 70-80 साल की ही जिन्‍दगी होगी न, जरा इधर-उधर कर के काट लो। भला क्‍या बिगड़ जाएगा? हिन्‍दू बनने कहा जाए हिन्‍दू बन जाओ, मुसलमान बनने कहा जाए मुसलमान बन जाओ। इसमें क्‍या हर्ज है? वैसे भी पूजा करो या इबादत कोई फर्क नहीं पड़ने वाला! जिन्‍दगी ऐसे ही रहेगी, हमारी कठिनाइयों का हल कहीं ऊपर से कभी नहीं टपकेगा। अपनी कठिनाइयों के हल हमें स्‍वयं ही ढूंढने पड़ेंगे, वह भी नीचे और इसी जमीन पर। लेकिन अकबर जैसे लोग ऐसे मूर्ख हैं कि मानते ही नहीं। क्‍या कहते हैं, जिन्‍दगी को सुंदर बनाएंगे, समाज को सुंदर बनाएंगे, सभ्‍यता-संस्‍कृति बचाएंगे, आने-वाली नस्‍लों को सुंदर देश दे कर जाना है....न जाने क्‍या-क्‍या ऊल-जलूल बकते रहते हैं। ...क्‍या कर लिया देश पर मर-मिटने वालों ने? क्‍या कर पाये अकबर के अब्‍बा हुजूर? अब तैयार रहिए कुछ वैसा ही होगा इस अकबर का! ऐसे लोग बस झूलते रह जाते हैं। अकबर चाहे जितनी उछल-कूद मचा ले होगा इससे भी बस वो होगा... हां, नहीं तो!'

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अकबर को प्रारंभ में इशारों-इशारों में बताया जाता रहा था। लेकिन ‘आंखों ही आंखों में इशारा हो गया' वाला इशारा समझ जाए, अपना अकबर ऐसा न था। वैसे समझ कर भी उसने मटिया दिया होगा, इसी का चांस ज्‍यादा है।

फिर सुना गया कि एक रात कुछ लोग उसके घर जा चढ़े। वहां उनके बीच कुछ निम्‍नलिखित प्रकार की बात-चीत हुई थीः-

-“मियां तुम यह मुहल्‍ला छोड़ दो।” पहला ही वाक्‍य अकबर के सर पर आण्‍विक बम-सा फटा, उसके चारों तरफ हिरोशिमा और नागासाकी बनते चले गये थे।

-“क...क...क्‍यों? हम वर्षों से यहां रहते आये हैं। यहां की मिट्टी में...।” अपनी गुम होती सिट्टी-पिट्टी में उसे सबसे पहले अपनी मिट्टी ही याद आयी।

-“...चोप्‍प स्‍साले, तुम्‍हारी मिट्टी गई तेल लेने!” अगले ने उसे जोर से झिड़क दिया।

-“दे...दे...देखिए, आप लोग गालियों पर न उतरें...” उसे लगा मानों नंगा करके बाजार में चौराहे पर खड़ा कर दिया गया हो।

-“क्‍यों बे? तू क्‍या कर लेगा? गालियां न दें तो क्‍या तेरी आरती उतारें, हैं?”

-“देखिए मैंने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा। आप लोग मुझे मुहल्‍ला छोड़ने के लिए क्‍यों कह रहे हैं?” उसने बात संभालने का प्रयत्‍न किया।

-“देख बे, मुहल्‍ला छोड़ने को बोल दिया सो बोल दिया। अब तुझे मुहल्‍ला छोड़ने की कैफियत भी बतानी होगी क्‍या?” एक और खूंखार आवाज आयी।

-“...जी...वो...।” वह कुँकियाया।

-“अकबर के बच्‍चे, क्‍या कहा तुमने कुछ नहीं बिगाड़ा?” उसकी कुंकियाहट को बीच में ही काट कर एक और आवाज उठी, “तुम तो पूरा मुहल्‍ला ही बिगाड़ रहे हो।”

-“नहीं...नहीं, मैं अकेला पूरा मुहल्‍ला कैसे बिगाड़ सकता हूं? आ ...आप लोगों को जरूर कोई गलत-फहमी हुई है।”

-“अरे अकबरवा, हम बताते हैं तुमको कि कइसे बिगाड़ रहे हो। सीधी सी बात है, तुम ‘बड़ा' बनाते हो कि नहीं? बोलो।” तब तक पीछे खड़ा एक ‘गर्व वाला' हिन्‍दू आगे निकल आया।

-“वो...वो...तो...”

-“जब तुम ‘जिबह' बनाते हो, तब उसकी गंध हवा में उड़ती है। वह गंध उड़-उड़ कर पूरे मुहल्‍ले में फैलती हुई हमारे घरों में घुस आती है। फिर सांस के साथ हमारे शरीर के भीतर घुस जाती है, समझे। अब हमारा धर्म भ्रष्‍ट हुआ कि नहीं? बोलो!” उस व्‍याख्‍या से अकबर अवाक्‌ और किंकर्त्तव्‍यविमूढ़ रह गया। एक पल को उसके ज़ेहन में बचपन में सुनी ‘बाघ और मेमने' वाली कहानी कौंध गई। जहां बाघ ने मेमने को नदी की धार के उलटी तरफ वाला पानी जूठा करने के आरोप में मार कर खा लिया था। उसने हकला कर कुछ कहना चाहा, लेकिन उसके गले से जो आवाज निकली, वह मरियल कुत्ते की कूं...कूं..जैसी थी।

-“...तो इसीलिए तुम्‍हें मुहल्‍ला छोड़ना होगा, समझे!” गर्व वालों ने उसे फैसला सुनाया।

-“और ऊ जो तुम्‍हारा चमचा है न तुषरवा, उसको भी तो तुम जिबह खिलाते हो!”

-“नहीं...नहीं यह सच नहीं है। तुषार बाबू तो शुद्ध शाकाहारी हैं।” अकबर का गला सूख गया था।

-“तो क्‍या हुआ? तुम्‍हारे घर का शाकाहार भी तो उसी चूल्‍हे पर बनती हैं न, जिस पर अपना ‘जिबह' बनते हो। अब बताओ शाकाहार भी हुआ कि नहीं भ्रष्‍ट?”

-“आज तक तुमने जो किया, सो किया। अब हम तुम्‍हें अपना मुहल्‍ला और भ्रष्‍ट करने नहीं देंगे।”

-“अब कान खोल कर सुनो, मकान के लिए ग्राहक की चिन्‍ता मत करो। अपना सेठ तैयार है उसी ने हमें तुम्‍हारे घर भेजा है। दाम अच्‍छा मिल जाएगा। उसे बेच कर चुपचाप कहीं सटक लो समझे कि नहीं! ऐसा ‘‘गोल्‍डेन शेक हैन्‍ड चांस'' फिर नहीं मिलेगा?”

- अकबर उनके सेठ को जानता था। वह सेठ अपने मटके के अड्डे और जमीनों पर अवैध कब्‍जे के लिए शहर भर में जाना जाता था। उसने सूख आये गले में थूक घोंटते हुए किसी तरह जवाब दिया, “नहीं, मैं यह मकान नहीं बेचूंगा।”

-“देखो अभी तो हम समझाने आये हैं अगर समझ गये तो ठीक है। न समझे तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना।” उस सारगर्भित वार्तालाप के बाद वे सभी लोग जिधर से आये थे, उधर को ही लौट गये।

...लेकिन उस दिन के बाद से अकबर के जीवन में सारी चीजें कठिन होती चली गई थीं। अपने ही मुहल्‍ले में उसे मानसिक तौर पर धीरे-धीरे कर के मारा जाने लगा था। कभी उसके घर पर

तथाकथित भूतों द्वारा पत्‍थर फेंके जाते, कभी उसके घर की महिलाओं के साथ युद्ध में जीती गई महिलाओं की भाँति व्‍यवहार करने के प्रयत्‍न किये जाते। पड़ोसी देश का नागरिक तो उन्‍हें हर पल ही घोषित किया जाने लगा था। हर वो कोशिश की जातीं, जिससे अकबर का जीना मुहाल होने लगा।

00

एक शाम अकबर का छोटा बेटा नजीर बाजार से मछली ले कर लौट रहा था। बारह-चौदह साल का नजीर जल्‍द से जल्‍द घर का काम निपटा कर खेल के मैदान में अपने दोस्‍तों के पास पहुंचना चाहता था इसलिए उसकी चाल तेज थी। मछली बाजार से निकल कर चौक पर पहुंचते उसे जिन युवकों ने देखा, उनमें से कुछ उस रात अकबर को धमकाने वालों में शामिल थे।

एक बोल उठा, ‘देख बे अकबरवा का बेट्‌टा।'

‘ठहरो तुम सबको तमाशा दिखाता हूं। वह भी फोकट में।' दूसरे ने कहा और नजीर की ओर बढ़ गया।

जब वह नजीर के पास पहुंचा तो नजीर को पता ही नहीं चला कब उसे बगल से निकलते उस युवक ने लंग्‍घी मारी। नजीर दूर जा गिरा उसकी बांहों और घुटनों पर छिल जाने से खून बहने लगा था। मछली वाला पोलीथीन उसके हाथ से छिटक कर दूर जा गिरा। मछली के टुकड़े सड़क पर द्दूल, गोबर आदि में बिखर गये। उनमें से एक टुकड़ा उठा कर बिल्‍ली भाग चुकी थी और बाकी के लिए आस-पास से कुत्ते आ जुटे थे। नजीर ने वह दृश्‍य देखा तो घर में मार पड़ने की आशंका से जोर-जोर से रोने लगा।

‘चुप बे, देख कर नहीं चलता और अब रो रहा है!' गिराने वाला उसे झिड़क रहा था।

तब तक नजीर अपने गिराये जाने का मामला पूरी तरह समझ चुका था। वह जोर से चीखा, ‘नहीं अंकल आप झूठ बोल रहे हैं। मैं खुद नहीं गिरा, आपने मुझे गिराया है।'

‘चुप रहो! खुद गिरे हो और हम पर इल्‍जाम लगा रहे हो? झूठ बोल रहे हो, शर्म नहीं आती।' गिराने वाला उसे डांटने लगा। तब तक उसके बाकी साथी भी वहां आ, हो...हो...कर हंसने लगे।

संयोगवश उधर से गुजर रहे तुषार ने नजीर को देख लिया। वह तेजी से उसकी ओर लपका उसके वहां पहुंचते ही हंसने वाले लड़के इधर-उधर खिसक गये। तुषार ने सारा मामला जान कर पहले नजीर को चुप कराया फिर अपने पास से उसे मछली खरीद कर दी और साथ ही यह निर्देश भी कि घर पर किसी को कुछ ना बताये।

उसके कुछ दिनों बाद की घटना तो और भी उद्दंडता से घटी थी। अकबर नजमा के साथ रिक्‍शे पर घर को लौट रहा था। न जाने किधर से फेंका गया बांस का डंडा आ कर रिक्‍शे के चक्‍के में फंस गया। गति में अचानक आये अवरोध के कारण रिक्‍शा उलट गया। बचते-बचाते भी दोनों सड़क से जा टकराये। नजमा का सर फूट गया। न जाने कहां से आकर कुछ लड़के उनके पास खड़े हो गये लेकिन उन्‍हें सहारा दे कर उठाने की जगह उन पर हंसने लगे। एक ने बढ़ कर इत्‍मीनान से रिक्‍शे के चक्‍के में फंसा अपना बांस निकाला।

अकबर ने उसे पहचान लिया था वह गुस्‍से से चीखा, ‘तुम लोग...!'

उसने अपने कंधे झटकाते हुए बेफिक्री से कहा, ‘हुंह... हम तो अपना प्रेक्‍टिस कर रहे थे। न जाने कैसे हाथ से फिसल गया।'

‘मुझे पता है, तुमने जान-बूझ कर बांस फेंका है। सब तुम लोगों की बदमाशी है।' अकबर बोला।

‘देखिए आप जबरदस्‍ती झगड़ना चाह रहे हैं। इट वॉज एन एक्‍सीडेंट। शुक्र कीजिये बांस रिक्‍शे के चक्‍के में फंसा, आपके सर पर नहीं पड़ा। वर्ना आपका मुंह नहीं खुलता, अब तक आपकी खोपड़ी खुल जाती!'

...हा..हा..हा.. वे लड़के जिधर से आये थे, हंसते हुए उधर को ही निकल गये। अकबर को लगने लगा, मानों सन्‌ सैंतालिस की पाशविकता एक बार फिर से उसके अब्‍बा की रूह की आंखों में आंखें

डाले अट्टहास करने लगी हो। ...और वैसी पाशविकता के खिलाफ अड़ जाने की हिम्‍मत रखने वाले उसके जीनों में इस बार ‘क्रोमोजोमल म्‍यूटेशन' हो ही गया था। लेकिन इस इरादे के साथ कि अपना मकान उस सेठ को नहीं, किसी अन्‍य खरीददार को बेचेगा।

मगर ज़रा ठहरिए, ऐसे तो यह कहानी एक बार फिर से सरलीकृत होती जा रही है। लगता है यहां पर कहानी में एक और पेंच आना जरूरी है, तो बचना ऐ प्रेमियों लो वह आ गया। अब पेंच आ गया तो इसमें कोई क्‍या कर सकता है? वैसे भी जब सारे लोग बच निकलने वाला और आसान रास्‍ता ढूंढने लग जायें तब तो पेंच ही आयेंगे?

तो हुआ यूं कि जब भी कोई ग्राहक अकबर का शानदार मकान देखने आता लौटने के क्रम में सेठ के लोग, जो उस रात अकबर को धमकाने गये थे, उस संभावित ग्राहक से कहते कि खरीदने के बाद ‘मुस्‍लिम-मकान' का शुद्धिकरण करवाना पड़ेगा। जिसके लिए पांच लाख का खर्च पहले उन लोगों के पास जमा करवा दे। उसके बाद मकान खरीदने की सोचे। यह सुन कर वह खरीददार जो जाता फिर लौट कर कभी न आता। परिणाम यह हुआ कि देखते ही देखते उसके शानदार मकान की कीमत बीस लाख से घट कर आठ-दस लाख तक पहुंच गई। ...और घटती कीमत देख कर ‘मकान शुद्धिकरण' वाले लोग अपनी चाल के प्रति आश्‍वस्‍त हो रहे थे। जब खरीददार नहीं आयेंगे और मकान की कीमत भी बुरी तरह टूट चुकेगी, तब सेठ अकबर का मकान बड़ी आसानी से कौड़ियों के मोल खरीद कर वहां अपना चमचमाता बाजार खड़ा कर लेगा।

00

...मकान की घटती कीमत के उन्‍हीं दिनों में एक बार फिर से उसी मकान में बैठे चाय पी रहे अकबर तथा तुषार बाबू आपस में बहस कर रहे हैं। पिछले हफ्‍ते गर्व वालों की तरफ से अकबर को आठ लाख का ऑफर मिला था।

तुषार की आवाज कांप रही थी, “ठीक है कि क़ीमत कम है, लेकिन अब भी कुछ नहीं बिगड़ा, यह मकान बेच दो। पता नहीं आगे क्‍या-क्‍या होने वाला है।”

“नहीं, तुषार बाबू, हमसे नहीं होगा। कीमत कम हो या ज्‍यादा, पर घर नहीं बेचेंगे।” अकबर ने दृढ़ता से अपना निर्णय सुनाया। उसका उत्तर तुषार को हैरान करने वाला था।

“क्‍यों अब क्‍या हुआ? रात को सपने में अब्‍बा हुजूर आये और मना कर गये, जो तुम फिर से अपना नहीं बेचने वाला पुराना राग अलाप रहे हो?”

हालाँकि घर बेचने के निर्णय से लौट कर घर न बेचने का अकबर का वह निर्णय उसे भी अच्‍छा लग रहा था। लेकिन अकबर को हो रहे कष्‍टों के बारे में सोच कर वह विचलित भी था। इसलिए उसने समझाया, “अब फिर से वही राग मत अलापो। मेरी मानो तो जल्‍द से जल्‍द इसे बेच दो। क्‍या पता अभी मिल रहे आठ लाख से भी बाद में हाथ धोना पड़ जाए और इसकी कीमत घट कर दो-चार लाख न रह जाएं। जैसा समय आ गया है उसमें अच्‍छाई के नहीं कटु यथार्थ के डरावने सपने ही देखने पड़ेंगे।”

“नहीं तुषार बाबू, अब तो अब्‍बा हुजूर आके कहें, तब भी अपना घर नहीं बेचूंगा।” अकबर के चेहरे पर दृढ़ता थी, “सपना तो वह था जो मैंने देखा और सोचा लिया कि मकान बेच कर अपनी मुश्‍किलों का हल पा लूंगा। मकान बेच देने से सारी समस्‍याएं हल हो जाएंगी क्‍या? अगर मकान बेच देने से समस्‍याएं हल होने लगें, तो दुनिया के नब्‍बे फीसदी लोग अपना-अपना मकान बेच देना चाहेंगे। नहीं....वो मेरी भूल थी। अब मैं उस बुरे सपने की सच्‍चाई जान चुका हूँ। हर काल में ताकतवरों ने कमज़ोरों पर झूठे दोष मढ़ कर उनकी निर्भरताएं छीनी हैं। कहीं कोई जंगल हड़पना चाहता है तो कहीं कोई रेगिस्‍तान। कहीं कोई मकान हड़पना चाहता है तो कहीं कोई जमीन। कहीं कोई गाँव हड़पना चाहता है तो कहीं कोई पूरा देश। कहीं कोई पानी हड़पना चाहता है को कहीं कोई तेल। ...और उस पर तुर्रा यह कि अपनी लूट को सही साबित करने के लिए वे झूठ-मूठ का कोई भी तर्क जड़

देते हैं। जब तक आप उस तर्क के झूठ की दुहाई देते हैं, तब तक तो लूट पूरी हो चुकी होती है। इस दुनिया में जो ज्‍यादा ताकतवर है वो उतना ही बड़ा लुटेरा है।

...और यहां इस मुहल्‍ले के लुटेरे मेरे घर की जगह बाज़ार बनाना चाहते हैं। कभी जान से मारने की बात बताते हैं तो कभी मकान की कीमत घटाने की कोशिशें करते हैं। नहीं तुषार बाबू, नहीं! मैं अपने घर को बाज़ार नहीं बनने दूंगा। भले ही कोई चालीस लाख ले कर क्‍यों न आ जाए! मैं लात मारता हूँ, ऐसे लाखों पर। ये मकान नहीं घर है, हमारा घर! हमारे कई जिन्‍दा और सच्‍चे ख्‍़वाब यहां सरगोशियां करते हैं। मैं अब समझ गया हूं, मेरी लड़ाई मुहल्‍ले वालों से नहीं हड़पने वाले लालच से है। मेरा घर अब हड़पने वाले लुटेरों के खिलाफ यूं ही और यहीं पर खड़ा रहेगा। मैं इसे नहीं बेचूँगा....कभी नहीं!....किसी भी कीमत पर नहीं!!”

तुषार ने अकबर का हाथ कसकर पकड़ लिया उसकी आंखों में चमक थी, “ये की न तुमने असल बात। मैं तुम्‍हारे साथ हूं।”

--0-0--

संपर्क:

(कमल)

डी-1/1 मेघदूत अपार्टमेंट, मरीन ड्राइव रोड कदमा; पो.-कदमा; जमशेदपुर-831005(झारखंड)।

दूरभाषः- 09431172954- 0657-2310149

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(चित्र – लोक कलाकृति, साभार बनवासी सम्मेलन)

100_8133 (WinCE)

गाड़ी

कल खलाओं से एक सदा आई कि ,
तुम आ रही हो...
सुबह उस समय , जब जहांवाले ,
नींद की आगोश में हो; और
सिर्फ़ मोहब्बत जाग रही हो..
मुझे बड़ी खुशी हुई ...
कई सदियाँ बीत चुकी थीं, तुम्हें देखे हुए !!!

मैंने आज सुबह जब घर से बाहर कदम रखा,
तो देखा ....
चारों ओर एक खुशबू थी ,
आसमां में चाँद सितारों की मोहब्बत थी ,
एक तन्हाई थी,
एक खामोशी थी,
एक अजीब सा समां था !!!
शायद ये मोहब्बत का जादू था !!!

मैं स्टेशन पहुँचा , दिल में तेरी तस्वीर को याद करते हुए...
वहां चारों ओर सन्नाटा था.. कोई नही था..

अचानक बर्फ पड़ने लगी ,
यूँ  लगा ,
जैसे खुदा ....
प्यार के सफ़ेद फूल बरसा रहा हो ...
चारों तरफ़ मोहब्बत का आलम था !!!

मैं आगे बढ़ा तो ,
एक दरवेश मिला ,
सफ़ेद कपड़े, सफ़ेद दाढ़ी , सब कुछ सफ़ेद था ...
उस बर्फ की तरह , जो आसमां से गिर रही थी ...
उसने मुझे कुछ निशिगंधा के फूल दिए ,
तुम्हें देने के लिए ,
और मेरी ओर देखकर मुस्करा दिया .....
एक अजीब सी मुस्कराहट जो फकीरों के पास नही होती ..
उसने मुझे उस प्लेटफॉर्म पर छोड़ा ,
जहाँ वो गाड़ी आनेवाली थी ,
जिसमे तुम आ रही थी !!
पता नही उसे कैसे पता चला...

मैं बहुत खुश था
सारा समां खुश था
बर्फ अब रुई के फाहों की तरह पड़ रही थी
चारों तरफ़ उड़ रही थी
मैं बहुत खुश था

मैंने देखा तो , पूरा प्लेटफोर्म खाली था ,
सिर्फ़ मैं अकेला था ...
सन्नाटे का प्रेत बनकर !!!

गाड़ी अब तक नही आई थी ,
मुझे घबराहट होने लगी ..
चाँद सितारों की मोहब्बत पर दाग लग चुका था
वो समां मेरी आँखों से ओझल हो चुके था
मैंने देखा तो ,पाया की दरवेश भी कहीं खो गया था
बर्फ की जगह अब आग गिर रही थी ,आसमां से...
मोहब्बत अब नज़र नही आ रही थी ...

फिर मैंने देखा !!
दूर से एक गाड़ी आ रही थी ..
पटरियों पर जैसे मेरा दिल धड़क रहा हो..
गाड़ी धीरे धीरे , सिसकती सी ..
मेरे पास आकर रुक गई !!
मैंने हर डिब्बे में देखा ,
सारे के सारे डब्बे खाली थे..
मैं परेशान ,हैरान ढूंढते  रहा !!
गाड़ी बड़ी लम्बी थी ..
कुछ मेरी उम्र की तरह ..
कुछ तेरी यादों की तरह ..

फिर सबसे आख़िर में एक डिब्बा दिखा ,
सुर्ख लाल रंग से रंगा था ..
मैंने उसमे झाँका तो,
तुम नज़र आई ......
तुम्हारे साथ एक अजनबी भी था .
वो तुम्हारा था !!!

मैंने तुम्हें देखा,
तुम्हारे होंठ पत्थर के बने हुए थे.
तुम मुझे देख कर न तो मुस्कराई
न ही तुमने अपनी बाहें फैलाई !!!
एक मरघट की उदासी तुम्हारे चेहरे पर थी !!!!!!

मैंने तुम्हें फूल देना चाहा,
पर देखा..
तो ,सारे फूल पिघल गए थे..
आसमां से गिरते हुए आग में
जल गए थे मेरे दिल की तरह ..

फिर ..
गाड़ी चली गई ..
मैं अकेला रह गया .
हमेशा के लिए !!!
फिर इंतजार करते हुए ...
अबकी बार
तेरा नहीं
मौत का इंतजार करते हुए.........

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sitaram gupta

असतो मा सद्‌गमय' में निहित है स्‍वयं को जानने की इच्‍छा

‘‘असतो मा सद्‌गमय'' वेदों से उद्धृत की गई इस पंक्‍ति को हम प्रायः दोहराते हैं। ये पंक्‍ति क्‍या एक प्रार्थना है, याचना है अथवा हमारे मन की इच्‍छा है? यदि ये एक प्रार्थना है तो प्रार्थना क्‍या है और प्रार्थना का प्रयोजन तथा आदर्श स्‍वरूप क्‍या हो सकता है? क्‍या ‘‘असतो मा सद्‌गमय'' में मनुष्‍य की तामसिक वृत्तियों का परिष्‍कार करने की याचना निहित है? और एक सबसे बड़ा प्रश्‍न कि ‘‘असतो मा सद्‌गमय'' की बार-बार व्‍याख्‍या करने की आवश्‍यकता क्‍यों पड़ती है?

एक घटना याद आ रही है। एक बच्‍चा बड़े ध्‍यान से एक पुस्‍तक पढ़ रहा था। पुस्‍तक का शीर्षक था ‘‘बच्‍चों का सही लालन-पालन कैसे करें?'' किसी व्‍यक्‍ति ने ये देखा तो उस बच्‍चे से पूछा कि भई तुम ये पुस्‍तक क्‍यों पढ़ रहे हो? ये पुस्‍तक तो तुम्‍हारे माता-पिता को पढ़नी चाहिए। बच्‍चे ने उत्तर दिया कि मैं यह जानना चाहता हूँ कि मेरा लालन-पालन ठीक से हो रहा है अथवा नहीं। वस्‍तुतः इस चर्चा का उद्देश्‍य भी कहीं न कहीं मूल्‍यांकन तथा पुनर्व्‍याख्‍या के बहाने प्रार्थना तथा ‘‘असतो मा सद्‌गमय'' के औचित्‍य तथा प्रासंगिकता को सिद्ध करना ही है।

सभी धर्मों में स्‍वयं को जानने की प्रक्रिया पर बल दिया गया है इसलिए आत्‍मस्‍वरूप की जिज्ञासा ही उत्तम प्रार्थना हो सकती है। तुम कौन हो? कहाँ से आए हो? तुम्‍हारे आगमन का क्‍या प्रयोजन है? इस प्रकार की जिज्ञासाएँ सभी धर्मों, मतों तथा संप्रदायों में व्‍याप्‍त हैं और अपने-अपने तरीक़े से इनके समाधन के प्रयास भी किए जाते रहे हैं और जो इन प्रश्‍नों का उत्तर पा सके या इन प्रश्‍नों का उत्तर खोजने में दूसरों की मदद कर सके उनकी एक पूरी परंपरा हमारे सामने उपलब्‍ध है।

सुकरात कहते हैं, ‘‘मैंने अपनी सारी जिन्‍दगी अपने आपको ही जानने का प्रयत्‍न किया है। अपनी आत्‍मा की पूर्णता के लिए सर्वाधिक प्रयत्‍न किया और ईश्‍वर से प्रार्थना करता रहा कि प्रभो! तुम मेरी अंतरात्‍मा को सौंदर्य से भर दो, मेरे बाह्य और अंतर को एक कर दो, मन और वाणी का भेद मिटा दो।'' उन्‍होंने लोगों को कोई नया ज्ञान नहीं दिया बल्‍कि प्रत्‍येक मनुष्‍य में निहित उनके ज्ञान को अनुभव करने में उनकी मदद की। उन्‍होंने कहा कि सबसे बड़ी बुराई है ईश्‍वर की बात न मानना, उस ईश्‍वर की जो हम सभी के अंदर विद्यमान है। अंदर के ईश्‍वर को कैसे जानें? कैसे समझें? इसी के लिए तो स्‍वयं को जानना है। स्‍वयं को जानना अथवा सेल्‍फ रियलाइज़्‍ोशन ही वास्‍तविक ज्ञान है, सत्‍य है। इस प्रकार स्‍वयं को जानने की इच्‍छा ही ‘‘असतो मा सद्‌गमय'' के मूल में निहित है जो एक अच्‍छी प्रार्थना का मूल तत्त्व है।

हम चाहे अमृत की इच्‍छा करें अथवा प्रकाश की (मृत्‍योर्माऽअमृतंगमय/तमसो मा ज्‍योतिर्गमय) ये सभी एकमात्र सत्‍य को जानने की इच्‍छा है और स्‍वयं को जानने के प्रयास के बिना अथवा आत्‍मावलोकन के अभाव में यह संभव ही नहीं है। असत्‍य के रूप में मृत्‍यु, अंधकार अथवा अज्ञान से मुक्‍ति के लिए स्‍वयं को पूर्ण रूप से जानना अनिवार्य है। बिना भावना के उद्देश्‍य प्राप्‍ति संभव नहीं। अतः हमारी भावना भी शब्‍दों के अनुरूप हो। जो बोलें वही चाहें। यदि न बोलें तो भी कोई बात नहीं क्‍योंकि भावना मात्र से उद्देश्‍य पूर्ति संभव है। अपने मन के भावों को प्रार्थना के अनुरूप रखें। भावना का पोषण करना आ गया तो प्रार्थना के शब्‍दों की भी आवश्‍यकता नहीं। यही प्रार्थना की सफलता का मूल है।कई बार हम नहीं जानते कि क्‍या प्रार्थना करें। हम शब्‍दों के जाल से भ्रमित हो जाते हैं। भाव शब्‍दों का साथ नहीं दे पाते। भाव और शब्‍दों में साम्‍य बना रहे इसके लिए सरल से सरल प्रार्थना का चयन करना अनिवार्य हैं। सरल से सरल प्रार्थना और उसके भाव मन में लाने के लिए ‘‘असतो मा सद्‌गमय'' से सरल, आदर्श और उत्तम प्रार्थना क्‍या होगी?

साभार ः ‘‘द स्‍पीकिंग ट्री'' नवभारत टाइम्‍स, नई दिल्‍ली, दिनाँक ः 19ः11ः2008

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सीताराम गुप्‍ता,

ए.डी. 106-सी, पीतमपुरा,

दिल्‍ली-110034

100_8139 (WinCE) (2)

अलब

पुलिस के सिपाही, टी० वी पर,संगीत का प्रोग्राम देख रहे थे

कार्यक्रम देखते समय, डायरी में, कुछ नाम नोट कर रहे थे

रात में ही कुलोगों के घर पर दस्तक दी

दरवाज़ा खोलते ही, हाथ में हथकड़ी डाल दी

हमारा दोष क्या है, दोष तो थाने में बतायेंगे

ज़्यादा हैंकड़ी की तो, अभी से डन्डे बरसायेंगे

थाने में एक एफ़ आई आर दर्ज़ की

दूसरे दिन उनकी अदालत में पेशी की

हूज़ूर ये लोग बहुत आतंक फैला रहे हैं

देश में तरह तरह के बना रहे हैं

इन्होंने अपना ज़ुर्म, टी०वी पर कबूल किया है

सबके सामने स्वंय बनाना मान लिया है

प्रोग्राम के समय, ये महाशय बहुत खुश हुए

जोर से ताली बजाते बजाते, कुर्सी से खड़े हुए

सार्वजनिक रूप से नए का उदघाटन किया

लोगों ने खुशी से, माला पहनाकर स्वागत किया

घोषणा की, जब मैं नया बनाऊंगा

उभरते कलाकार को इस में रखूंगा

तात्पर्य है, ये लोग बनाते रहे हैं

काफ़ी समय से आतंक फैलाते रहे हैं

प्रार्थना है,पुलिस हिरासत में रखने की इज़ातत दी जाए

हथियार और ठिकाने मालूम करने का समय दिया जाए

इनका कबूल किया ज़ुर्म,इस वीडियो में बंद है

परसों फिर पेश करेंगे, कल अदालत बंद है

संगीत निर्देशक ने हाथ जोड़ कर कहा

हूज़ूर मैंने नहीं ,अलबबनाया है

पुलिस को जब कोई नहीं मिला

तो हमें ही बेमतलब फंसाया है

हूज़ूर अलबम में तो फ़ोटो लगाते हैं

ये लोग आपको ,यूं ही उल्लू बनाते हैं

जैसे अलकायदा,एक संगठन का नाम है

वैसे ही अलबम भी एक बम का नाम है

डा० कान्ति प्रकाश त्यागी

सम्पर्क:

Dr.K.P.Tyagi
Prof.& HOD. Mech.Engg.Dept.
Krishna institute of Engineering and Technology
13 KM. Stone, Ghaziabad-Meerut Road, 201206, Ghaziabad, UP
cell number 09999351269

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चित्र – लोक-कलाकृति, साभार बनवासी सम्मेलन, भोपाल

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