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व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – रवि कांत अनमोल का व्यंग्य : संता सिँह का नववर्ष संकल्प

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(प्रविष्टि क्रमांक - 51)स्कूल के दिनों में मेरा एक मित्र था-संता सिँह 'हट के'। नाम तो उसका संता सिँह ही था, 'हट के' तो हम मित्र उसे प्यार से बुलाते थे। वास्तव में उसे किसी ने समझा दिया था कि दुनिया में आगे निकलने के लिए ज़रा हट के सोचना पड़ता है, दुनिया में जो भी महान लोग हुए हैं, वे इसीलिए महान हैं कि वो ज़रा हट के थे। इसलिए उसे ज़रा हट के सोचने का भूत चढ़ गया। ऐसा भी नहीं कि वह हर बार हट के सोच ही पाता हो, लेकिन वह अपनी हर सोच को ज़रा हट के मानता ज़रूर था। हट के सोचने के कारण तो कई बार उसे समस्याओं का सामना भी करना पड़ता था। गणित के टीचर ने एक बार एक प्रश्न पूछा कि यदि एक हाथी एक बार में पाँच बच्चों को पार्क का चक्कर लगवाता है तो पच्चीस बच्चों को चक्कर लगवाने के लिए हाथी को कितने चक्कर लगाने पड़ेंगे? उत्तर में संता ने गणित की जगह दर्शन शास्त्र का सहारा लिया। लिखा- माना कि हाथी बहुत बलवान होता है, किन्तु उसके बल की भी एक सीमा है। पच्चीस बच्चों को एक ही साथ उठा पाना उसके बस की बात नहीं। अतः उसे एक से अधिक चक्कर लगाने पड़ेंगे। गुरुजी उसके इस अलग तरह के उत्तर से इतने प्रभावित हुए …

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – अतुल चतुर्वेदी का व्यंग्य : कोयले की दलाली में…

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(प्रविष्टि क्रमांक - 50)इस बार मैं फिर कटघरे में हूं , मालिक नाराज है । हमेशा की तरह वादी भी वही है और न्यायधीश भी वही । उसका कहना है कि तुम गंदगी ज्यादा फैलाते हो , प्रदूषण करते हो। तुम इसका जुर्माना भरो । मैंने कहा-“ माई-बाप मैं ठहरा गरीब आदमी ,दिन को मिल जाय तो रात का भरोसा नहीं । मैं भला क्या कचरा फैलाऊंगा । ” सेठ नहीं माना, कहने लगा –“ बकवास बंद करो । सिगड़ी नहीं कुकिंग गैस का इस्तेमाल करो । कब तक पिछड़े बने रहोगे ...पीजा- बर्गर से ही काम नही चलेगा । तुम्हें अभी बहुत कुछ सीखना है । ” मैंने कहा –“ साहब आपने तो पूरी धरती गर्मा रखी है मिसाइलें और बम दाग-दाग कर । आप तो आग लगा कर चैन से सो जाते हो और हम बरसों तक आपके खिलवाड़ का दंश भोगते रहते हैं । आपकी ऐय्याशी की लातें हम कब तक अपने पेट पर खाते रहें । ” सेठ का गुस्सा सातवें आसमान पर था । वो मुट्ठी भींचते हुए बोला – “हमने जो कुछ भी किया विश्व शांति के लिए किया ,उसमें हमारा कोई स्वार्थ नहीं था । हमारे मानवतावादी नजरिए की पुष्टि नोबेल प्राइज ने कर दी है । ” मैं भी बहसियाने के मूड में था । इसलिए तर्कों का असलाह ले पिल पड़ा-“ सही फरमा रहे…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – अतुल चतुर्वेदी का व्यंग्य : एक आयोग और सही….

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(प्रविष्टि क्रमांक - 49)हमारा देश आयोग प्रधान देश है । कई आयोगों की रिपोर्टें पड़ी धूल खा रही हैं । यदि उन सब रिपोर्टों को इकट्ठा किया जाए तो लाल किले के प्राचीर तक की ऊंचाई हो जाएगी फिर वहां से एक और आयोग के गठन की घोषणा की जा सकती है । अमूमन देखा गया है कि अपने यहाँ आनन-फानन में आयोग गठित करने का फैशन है । भले ही उसके सुझाव कोने में पड़े दम तोड़ते रहे हों । आयोगों का कार्यकाल भी द्रौपदी के चीर सा लगातार बढ़ता रहता है । लोगों का बमुश्किल याद दिलाना पड़ता है कि ये फलां मामले में गठित आयोग था । आयोगों को सुझाव भी गोलमाल से होते हैं । उनकी व्याख्या स्वार्थानुसार होती है । उसमें नाम जुड़ते-घटते रहने पर शोर होता रहता है । कुछ लोग आयोग कि विश्वसनीयता पर सवाल उठाते रहते हैं ,कुछ उसके कार्य क्षेत्र को बढ़ाने की मांग करते रहते हैं । कुल मिलाकर आयोग एक चूं-चूं का मुरब्बा बन जाता है। इस मुरब्बे के सेवन से सरकार के कृपापात्र नौकरशाह स्वास्थ्य लाभ उठाते रहते हैं । जहां तक जनता का संबंध है उसे सिर्फ एक आयोग का पता है और वो है वेतन आयोग।वेतन आयोग की सिफारिशें जनता पर व्यापक असर डालती हैं ।उसकी रिपो…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – अपराजिता का व्यंग्य : हंस चला कौवे की चाल

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(प्रविष्टि क्रमांक - 48)विष्णुलोक में भगवान विष्णु माता लक्ष्मी के साथ बैठे विश्राम कर रहे थे कि तभी नारायण-नारायण की आवाज सुनाई देती है जिसे सुनकर भगवान विष्णु हर्षित हो पूछते हैं - कहो नारद इतने दिनों बाद इधर का रास्ता कैसे भूल गये ? न कोई चिट्ठी, न पत्री, न कोई फोन, कहो कैसे हो? आजकल मृत्युलोक के क्या समाचार हैं ? नारदजी ने वीणा के तार छेड़ते हुए कहा - नारायण-नारायण ! ये कैसे हो सकता है प्रभु, मैं आपको कैसे भूल सकता हूं ? वो तो मैं ट्रैफिक में फंस गया था प्रभु । आजकल उपर आने वालों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि घंटों लाइन में खड़ा होना पड़ता है । क्षमा करें प्रभु ! और चिट्ठी-पत्री का तो अब जमाना ही नहीं रहा आजकल तो डाकघरों में ताला लटकने वाला है । अब तो फोन, ईमेल और एसएमएस का जमाना आ गया है । आपका फोन भी मैंने कितनी बार किया हमेशा इंगेज ही आता है, मुझे क्षमा करें प्रभु ! आजकल तो मृत्युलोक की काया ही पलट गई है प्रभु ! आजकल वहां समानता की शहनाई बजने लगी है । गरीब क्या अमीर भी आजकल दाल रोटी खाकर फर्क महसूस करते हैं । लोगों को पानी तक खरीदकर पीना पड़ता है । सरकार भी इसके लिए नये-नये कानून बना …

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – रविकांत अनमोल का व्यंग्य : गद्यं कवीनां निकषं वदंति

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(प्रविष्टि क्रमांक - 47)“गद्यं कवीनां निकषं वदंति” महाकवि दण्डी की यह उक्ति मुझे विचित्र लगती रही है। ऐसे समय में जबकि पद्य छंदशास्त्र के जटिल नियमों में बंधा था, छंद और कथ्य दोनों को सामने रखते हुए उसमें अलंकार भी पैदा करना कोई सरल काम तो नहीं था। गद्य तो कोई भी लिख सकता है। सीधे-सीधे वाक्यों में बात कहना क्या मुश्क़िल है? इसमें कसौटी जैसी क्या चीज़ है? और दण्डी महोदय कहते हैं कि गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति। मैं तो मानने को तैयार ही नहीं था लेकिन फिर एक मित्र ने बताया कि छ्न्द में एक लय रहती है, एक संगीत उत्पन्न होता है और यह श्रोता को, पाठक को जल्दी से प्रभावित कर लेता है, लेकिन गद्य में पूरा प्रभाव साधारण वाक्यों और अपने भावों के द्वारा ही पैदा करना होता है। छ्न्द में तो अनुशासन में रहने से स्वतः संगीत पैदा हो जाता है और उसके लिए कवि को कई तरह की छूट भी होती है। गद्यकार बिना भाषा की कोई छूट लिए और बिना छ्न्द का सहारा लिए एक लय, एक संगीत पैदा करता है तभी श्रोता और पाठक को प्रभावित कर पाता है। यही कठिन कार्य है और इसी के कारण दण्डी ने गद्य को कवियों की कसौटी माना है। ख़ैर उक्ति कुछ भी रही…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – योगेन्द्र दत्त का व्यंग्य : तनाव से मुक्ति का तनाव

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(प्रविष्टि क्रमांक - 46)
सब आंखें बंद किए बैठे थे।
”आप सभी ध्यान लगाएं अपनी सांसों पर।
काउंट योर बै्रथ (सांसें गिनें अपनी)। आंखें न खोलें।“
सबकी आंखें बंद थीं। कुछ समय हो चुका था लोगों को ध्यान रमाए हुए। गुरुजी का एकालाप जारी था।
”आंखें खोलने से बड़ी हानि हो जाएगी। सांसें गिनने से आपके विचारों का क्रम टूटेगा। इससे आपको
नई ऊर्जा मिलेगी। आंखें खोलते ही सारी ऊर्जा बह जाएगी।“

सबको अपनी ऊर्जा की फ्रिक थी। किसी ने आंखें नहीं खोलीं। पर मेरे लिए यह मात्रा अनुमान का विषय था। केवल गुरुजी थे जो सबको देख सकते थे।
भक्त एक-दूसरे को नहीं देख सकते थे। उन्हें इसकी अनुमति नहीं थी। पर मेरा अनुमान है कि किसी ने आंखें नहीं खोलीं होंगी। सभी पराजय भाव से नत थे।

यह सत्ताहीनों का विमर्श था। एक ने यह घोषणा करके सत्ता प्राप्त कर ली थी कि उसे अब सत्ता की चाह नहीं रही। दूसरों ने यह सोचकर सशक्त महसूस करना सीख लिया था कि वे एक सत्ताशाली के निकट हैं। सारा खेल भावनाओं में ही चल रहा था और वहीं उसका फैसला भी हो जा रहा था।
पर मेरे लिए तनाव मुक्ति की चाह में यह परतंत्रता, यह अनुशासन अंसभव था। मेरी आंखें लगातार बंद नहीं रह…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – दीनदयाल शर्मा का व्यंग्य : गुरू जी का टाइम पास

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(प्रविष्टि क्रमांक - 45)एक सरकारी स्कूल का दृश्य। स्कूल परिसर में दरी पर पांच गुरुजन और तीन मैडमें हैं। दो गुरुजन लेटे-लेटे बातों में मशगूल हैं। एक अख़बार पढ़ रहे हैं। एक खर्राटे ले रहे हैं। एक गुरुजी मैडमों की नज़रें बचाकर जर्दा लगा रहे हैं। तीनों मैडमें बातें कम और हँस ज्यादा रही हैं।-घण्टा लगे आठ मिनट बीत चुके हैं। जर्दा लगाने वाले गुरुजी धीरे-धीरे कदमों से पेशाबघर की ओर बढ़ रहे हैं। एक गुरुजी पेशाबघर में पहले से ही खड़े हैं। कुछ देर बाद भीतर वाले गुरुजी बाहर आ गए।-पेशाब करना है?-पेशाब क्या करना है यार? फिर वे मुस्कराते हुए बोले-हम तो बस टाइम पास कर रहे हैं।-सब टाइम पास ही तो करते हैं।-आजकल टाइम पास भी तो नहीं होता। पेशाब भी कितनी बार करें। मैं तीसरी बार आ रहा हूं। अख़बार भी दो बार पढ़ लिया। दो बार चाय पी ली। घड़ी है कि चलने का नाम ही नहीं लेती। और जब स्कूल आना होता है तो घड़ी के मानो पंख ही लग जाते हैं। मैं तो रोज लेट हो जाता हूं।-तुम क्या एक-दो को छोड़कर दुनिया लेट आती है। तुम मानते तो हो कि लेट आते हो। कुछ ऐसे भी हैं जो लेट भी आएं और रौब भी जमाएं। ‘यथा राजा तथा प्रजा’ वाली बात यहां…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन - कुमारेन्द्र सिंह सेंगर का व्यंग्य : स्वर्ग नर्क के बंटवारे की समस्या

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(प्रविष्टि क्रमांक - 44)
स्वर्ग-नर्क के बँटवारे की समस्या
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    महाराज कुछ चिन्ता की मुद्रा में बैठे थे। सिर हाथ के हवाले था और हाथ कोहनी के सहारे पैर पर टिका था। दूसरे हाथ से सिर को रह-रह कर सहलाने का उपक्रम भी किया जा रहा था। तभी महाराज के एकान्त और चिन्तनीय अवस्था में ऋषि कुमार ने अपनी पसंदीदा ‘नारायण, नारायण’ की रिंगटोन को गाते हुए प्रवेश किया।

    ऋषि कुमार के आगमन पर महाराज ने ज्यादा गौर नहीं फरमाया। अपने चेहरे का कोण थोड़ा सा घुमा कर ऋषि कुमार के चेहरे पर मोड़ा और पूर्ववत अपनी पुरानी मुद्रा में लौट आये। ऋषि कुमार कुछ समझ ही नहीं सके कि ये हुआ क्या? अपने माथे पर उभर आई सिलवटों को महाराज के माथे की सिलवटों से से मिलाने का प्रयास करते हुए अपने मोबाइल पर बज रहे गीत को बन्द कर परेशानी के भावों को अपने स्वर में घोल कर पूछा-‘‘क्या हुआ महाराज? किसी चिन्ता में हैं अथवा चिन्तन कर रहे हैं?
    महाराज ने अपने सिर को हाथ की पकड़ से मुक्त किया और फिर दोनों हाथों की उँगलियाँ बालों में फिरा कर बालों को बिना कंघे के सवारने का उपक्रम किया।…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : सीताराम गुप्त का व्यंग्य - मैं तुम्हें एमओ भिजवाता हूँ तुम मुझे सम्मान-पत्र भिजवाओ

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(प्रविष्टि क्रमांक - 43)पुरस्कृत और सम्मानित होना नेताओं का ही नहीं लेखकों और कवियों का भी जन्मसिद्ध अधिकार है और उनके इसी जन्मसिद्ध अधिकार के कारण बेचारे साहित्य के विद्यार्थियों को उन सभी पुरस्कारों और सम्मानों तथा पुरस्कृत और सम्मानित कृतियों और कृतिकारों का लेखा-जोखा रखना पड़ता है, उन्हें रटना होता है तथा याद रखना होता है। पहले यह काम थोड़ा सरल था क्योंकि कुल मिलाकर पाँच-सात पुरस्कार थे। गिने-चुने लेखक-कवि होते थे जिन्हें ये पुरस्कार मिलते थे। कई बार स्तरीय रचना के अभाव में किसी साल कोई पुरस्कार दिया ही नहीं जाता था तो कई बार साल-साल दो-दो साल प्रतीक्षा कराने के बाद पुरस्कार की घोषणा होती थी। इतनी अधिक उत्सुकता और प्रतीक्षा के बाद पुरस्कृत कृति और कृतिकार को भला कैसे भुलाया जा सकता है? पुरस्कार के नाम से रचनाकार का नाम और रचनाकार या रचना के नाम से पुरस्कार का नाम झट से याद आ जाता था पर आज वो बात कहाँ? दर्जनों, सैकड़ों में नहीं हज़ारों में है आज पुरस्कारों की संख्या। एक रचनाकार को ही नहीं एक कृति या एक कविता को भी कई-कई दर्जन पुरस्कार मिल जाते हैं आजकल। कल एक पत्रिका में एक कहानी पढ़ रह…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – श्याम गुप्त का व्यंग्य : अंधी दुनिया

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(प्रविष्टि क्रमांक - 42)
क्या कहा ! अंधी दुनिया ! जी हाँ , आपके कर्ण पल्लवों ने ठीक ही सुना। वास्तव में बात यही है , सही है और कुछ भी नहीं है। आपने यूं तो बहुत से अंधे देखे होंगे पर आज हम आपको ऐसे 'ढाई घड़ी के अंधों ' की दुनिया से अवगत कराना चाहते हैं जो आपने देखते सुनते हुए भी नहीं देखी होगी।हो सकता है आप सोच रहे हों यह कलम तोड़ महामूर्ख 'बात का बतंगड़' ,'तिल का ताड़' बनाकर आपकी गणना भी अंधों में न कार दे।कहीं आप लेख को पढ़कर आपे से बाहर हो जायं तो इन पन्नों को सिगरेट सुलगाने में कदापि प्रयोग न लायें क्यूंकि ये शब्द सूक्ष्म -भाव होकर चाय या सिगरेट के धुएं के साथ समाहित होकर अंतर्मन में लीन हो जायेंगे। और यदि आप इन्हें अपने कम्प्यूटर मॉनीटर पर पढ़ रहे हैं तो और भी धैर्य रखें नहीं तो... वैसे भी, शब्द ब्रह्म है और अविनाशी ....| खैर आपतो स्वयं ही समझदार हैं ( अधिकतर लोगों के तो रिश्ते-नातेदार ही समझदार होते हैं) अतः आशा है आप ऐसा नहीं करेंगे।
हाँ, तो हमने कहा, अंधी दुनिया ! यह दुनिया वास्तव में ही अंधी है। आप कहेंगे वाह ! हम तो हैं ही नहीं। हमारे तो दो आँखें हें , बड़ी …

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – देवेन्द्र कुमार पाण्डेय का व्यंग्य : स्कूल चलें हम

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(प्रविष्टि क्रमांक - 41)
"स्कूल चलें हम"चिड़ा, बार-बार चिड़िया की पीठ पर कूदता, बार-बार फिसल कर गिर जाता।"चिड़-पिड़, चिड़-पिड़, चिड़-पिड़, चिड़-पिड़" ---चिड़ा चिड़चिड़ाया।"चूँ चूँ- चूँ चूँ, चूँ चूँ-चूँ चूँ"-- -चिड़िया कुनमुनाई। "क्या बात है? आज तुम्हारा मन कहीं और गुम है?  किसी खेल में तुम्हारा मन नहीं लग रहा? " चिड़े ने चिड़िया को डांट पिलाई।"हाँ बात ही कुछ ऐसी है कि आज सुबह से मेरा मन परेशान है। देखो, मध्यान्ह होने को आया अभी तक मैने दाल का एक दाना भी मुंह में नहीं डाला‍‍"--- चिड़िया झल्लाई।"बात क्या है ?""बात यह है कि आज सुबह-सुबह मैं रेडियो स्टेशन के पीछे बने एक दो पाए के घर में भूल से घुस गई थी। अरे, वहीऽऽ  जहाँ युकेलिप्टस के लम्बे-लम्बे वृक्ष हुआ करते थे, याद आया ?हाँ-हाँ याद है। तो क्या हुआ?वहीं मैने देखा कि कमरे के एक कोने में एक बड़ा सा डिब्बा रखा हुआ था उसमें तरह-तरह के चित्र आ जा रहे थे गाना बजाना चल रहा था।"हाँ-हाँ, दो पाए उसे टी०वी० कहते हैं चिड़ा हंसने लगा। इत्ती सी बात पर तुम इतनी परेशान हो !"&quo…

सुरेन्द्र अग्निहोत्री की कविताएँ

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लम्पटअरे ये लम्पट!क्यों तू गा रहा है अग्निपथ-अग्निपथ!अपने स्वार्थ के लिएकिसी का भी पाता सान्निध्यजिसने दी जड़ों को खाद और पानीउसी के साथ कर ली बेईमानीमैं और मेरे बच्चों के लिए करता रहा मेल-जोलधन के लिए ही करता हैनाप तोल कर गोलमंगल के अमंगल से बचनेबकरी के बच्चे साहोने वाली बहू का कान पकड़करता मन्दिरों की नाप जोखकाल के ताण्डव काहो न अपने परिवार पर प्रकोपदेश, समाज, शहर के लिएक्या किया बता सके यह सवाल?अपने को कृषक बताकर लूटना चाहतागरीबों का मालकब चलाया है हल?फिर क्यों लेना चाहते झूठा प्रतिफल!छूटजो जहां काबिज हउसे खुली छूट हैमर्यादाओं का खूब उल्लंघन करेभावनाओं को जमके छलेलीपापोती की हास्यास्पद हरकत करेआपकी असुविधा पर सुचिंतित दिखेमतलब सिद्ध हुए बिन एक न सुनेजिस पर किसी का अंकुश नहींन किसी का चाबुक कर सके काबूआजाद भारत का है वह बाबू!इंतजारद्वार पर दर्द की यादें हैदिखने और होने के बीचघुंघलका छंटने का इंतजार हैबिगुल फूंकने के लिए जुगत जारीसंकेतों में कर ली पूरी तैयारीअपने-अपने दर्द और समस्याओं की फेहरिस्त लेकरअपने सामने आते-जाते रहते हैंउपेक्षित क्या यह समझ नहीं पाते हैंभीनी-भीनी खुशबू में उलझ…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – घुघूती बासूती का व्यंग्य : विट्ठल

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(प्रविष्टि क्रमांक - 40)
(महत्वपूर्ण सूचना : पुरस्कारों में इजाफ़ा – अब रु. 10,000/- से अधिक के पुरस्कार! प्रतियोगिता की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2009 निकट ही है. अत: अपने व्यंग्य जल्द से जल्द प्रतियोगिता के लिए भेजें. व्यंग्य हेतु नियम व अधिक जानकारी के लिए यहाँhttp://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html देखें)विट्ठल ! महाराष्ट्र में कष्ट में, दुःखी होने पर लोग प्रायः विट्ठल की ही पुकार करते हैं। मुझे भी इस नाम से कोई कष्ट न था, बल्कि राह चलते यदि इनका मन्दिर दिखता तो हाथ जोड़ देती थी। यह बस तब तक था जब तक विट्ठल नामक ड्राइवर हमें नहीं मिला था। जब से वह मिला तब से इस नाम के साथ अपनी असहायता ही याद आती है। अब तो यह व्यक्ति दिखते ही असली विट्ठल को याद कर लेती हूँ, पुकारती हूँ उसे कि हे प्रभु, रक्षा करना। मुझे पूर्ण विश्वास है कि प्रभु रक्षा करना भी चाहता होगा परन्तु यह विट्ठल, हमारा विट्ठल उनके नेक इरादों पर पानी फेर ही देता है।हम बहुत ही भयंकर गर्म जगह पर रहते हैं। आस पास जहाँ भी दृष्टि जाए केवल पत्थर, चट्टानें, बंजर जमीन, हरियाली का कहीं नामो निशान ही नहीं है। उस पर वर्ष में …

यशवन्‍त कोठारी का आलेख - गुजराती-अंग्रेजी-हिन्‍दी के प्रसिद्ध साहित्‍यकार जयन्‍ती एम. दलाल की 75 वीं जयन्‍ती पर चर्चा

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अँग़ेज़ी हिन्‍दी व गुजराती के प्रसिद्ध साहित्‍यकार जयन्‍ती एम. दलाल से परिचय अनायास ही ई-मेल के माध्‍यम से हो गया। इन्‍टरनेट पर उनके उपन्‍यासों से पूर्व परिचय था। पिछले दिनों वे जयपुर में अन्‍तरराष्ट्रीय साहित्‍यकार सम्‍मेलन में भाग लेने आये थ्‍ो, तो उनसे व्‍यक्‍तिगत परिचय हुआ। विचारों, जानकारियों का आदान-प्रदान हुआ। वे बुजुर्ग साहित्‍यकार है मगर तन और मन से युवा लेखक है। देशी-विदेशी साहित्‍यकारों को उन्‍होनें खूब पढ़ रखा है। गुजराती में उनकी 22 पुस्‍तकें छप चुकी है। जिनमें 14 उपन्‍यास तीन लघु कहानियों के संग्रह व अन्‍य पुस्‍तकें हैं। वे गुजराती के पहले साहित्‍यकार है जिनका उपन्‍यास आखं सगपन आंसूना का अंग्रेजी अनुवाद अमेरिका में 2005 में छपा। इस रचना के प्रमोशन हेतु उन्‍होने अमेरिका, केनाडा, यू.के. की यात्रा की। बाद में यहीं उपन्‍यास भारत में भी छपा इन्‍टरनेट पर भी प्रकाशित हुआ और चर्चित हुआ। उनका दूसरा उपन्‍यास स्‍पेशल इकोज भी अमेरिका तथा भारत में छपा। इन्‍टरनेट पर हजारों पाठकों ने इसे पढ़ा और सराहा।
जयन्‍ती एम. दलाल का एक बेटा लगभग पचास वर्ष से सेरेब्रल पालिसी से पीड़ित है, उसकी स…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : गिरीश पंकज का व्यंग्य – भ्रष्टाचार के खिलाफ अपुन

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(प्रविष्टि क्रमांक - 39)
(महत्वपूर्ण सूचना : पुरस्कारों में इजाफ़ा – अब रु. 10,000/- से अधिक के पुरस्कार! प्रतियोगिता की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2009 निकट ही है. अत: अपने व्यंग्य जल्द से जल्द प्रतियोगिता के लिए भेजें. व्यंग्य हेतु नियम व अधिक जानकारी के लिए यहाँhttp://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html देखें)
सुबह-सुबहअखबार देखा तो अपने मूड का स्विच ऑफ हो गया। नहीं-नहीं, फिर से वही महँगाई बढऩे वाली खबर नहीं थी। खबर थी- 'देश में भ्रष्टाचार का तेजी से विकास..। भारत विश्व के टॉप-टेन भ्रष्ट देशों में एक''।
''छी-छी, स्साले...भ्रष्टाचार की इतनी हिम्मत! इसको तो मिटाकर ही दम लूँगा।''
मैंने चाय की चुस्कियों के साथ कसम खाई कि 'भ्रष्टाचार के खिलाफ जोरदार संघर्ष करूँगा और तब तक चैन से नहीं बैठूंगा और...और जब तक भ्रष्टाचार का खात्मा न हो जाए, एक पैग से ज्यादा शराब नहीं पीऊँगा। जब तक हमारे जैसे पलन्टू जिंदा हैं, भ्रष्टाचार की खैर नहीं। अबे भ्रष्टाचार, तुझे जलाकर राख कर दूंगा।''
मुझमें नाना पाटेकर टाइप का हौसला आ गया। मेरी चिल्लाहट सुन कर पत्नी दौड…

व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : अनीता मिश्रा का व्यंग्य - ठंडी हवा भी खिलाफ ससुरी

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(प्रविष्टि क्रमांक - 38)
(महत्वपूर्ण सूचना : पुरस्कारों में इजाफ़ा – अब रु. 10,000/- से अधिक के पुरस्कार! प्रतियोगिता की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2009 निकट ही है. अत: अपने व्यंग्य जल्द से जल्द प्रतियोगिता के लिए भेजें. व्यंग्य हेतु नियम व अधिक जानकारी के लिए यहाँhttp://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html देखें)अनीता मिश्रादोस्तों ये कोई हंसी-ठट्ठा नहीं है। ये कानपुर के राम नारायण बाजार में रहने वाले राधेश्याम जी के जीवन का दर्द है.. मुझे तो बड़ी तकलीफ हुई उनकी कहानी जानकार, सोच रही हूँ आपको भी सुना दूं....... यद्यपि राधेश्याम उर्फ चब्बन भइया (बकौल उनकी माता जी .... चने चबाते-चबाते कब राधे हुई गए पता ही नहीं चला तबसे उनका नाम राधेश्याम उर्फ चब्बन भइया है।)हालांकि राधे भइया ने कहा है कि मैं भले ही लेखिका हूँ पर उनकी कहानी किसी को न बताऊँ क्योंकि ''सुनि इठिलैहैं लोग सबै, बांट लहै न कोय....... लेकिन सिर्फ लेखिका होती तो न बताती, स्त्री भी तो हूँ कैसे हजम कर जाऊँ अकेले, बिन बताए मुझे चैन कहाँ ..... पर आपको कसम हैं जो राधेश्याम जी की दस्तान आपने किसी को बताई।तो ............…

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तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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