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January 2009
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जाड़े की रात । हाड़फोड़ शीत लहर। सियारों की चिल्‍लाहट । रह रहकर कुत्‍तों का रोना भय पैदा करने को काफी था । ज्‍यों ज्‍यों रात बढ़ती जा रही थी जाड़े का असर और अधिक होता जा रहा था । रह रह कर रिमझिम बारिस उपर से उसर की गलन से हाड़ हाड़ कांप रहा था । गुदरीराम ओलाव पर हाथ सेंक रहा था । उससे यह ठण्‍ड बर्दाश्‍त नहीं हो रही थी जबकि वह इसी गांव में पैदा हुआ था। जब उसे ज्‍यादा ठण्‍ड लगने लगती तो वह सोनरी की मां को आवाज देने लगता । वह बेचारी कुछ लकड़ी कण्‍डा और लाकर ओलाव में झोंक देती । जलती आग को वो निहाल होकर तापता । सोनरी की मां मंगरी को बोलता तुम कहीं ना जाओ यहीं आग के पास बैठो । वह बोलती अरे आग तापने से ही काम चलेगा क्‍या ।रोटी भी तो बनानी होगी । बच्‍चों को भूख लग रही होगी । ये जाड़ा तो रात में ही ज्‍यादा हाड़ फोड़ती है । ….>

--- इसी उपन्यास से.

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और भी ढेर सारे हिन्दी ई-बुक डाउनलोड की सूची यहाँ देखें

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नौकरी मिलेगी नहीं छोकरी मिलेगी कहां

उफ हू उफ हूं-3

नौकरी मिलेगी नहीं छोकरी मिलेगी कहां

यार न मिलेगी प्यार होगी कहां

उफ हूं उफ हूं-2

ऐ मेरे खुदा तू सुनले जरा-2

बंगला गाड़ी दे और माल भी जरा

उफ हू उफ हूं-3

नौकरी मिलेगी नहीं छोकरी मिलेगी कहां

यार न मिलेगी प्यार होगी कहां उफ हूं-3

उसको घुमा लाउं, चांद पे ले जाउं-2

जो वो मांगे चांद, चांद धरती पे ले आउं

उफ हू उफ हूं-3

नौकरी मिलेगी नहीं छोकरी मिलेगी कहां

यार न मिलेगी प्यार होगी कहां उफ हूं-3

हर बाजी जीत जाऊंगा नई दुनिया बनाऊंगा-2

सब कुछ जो होगा पास में पर नौकरी मिलेगी कहां

उफ हू उफ हूं-3

नौकरी मिलेगी नहीं छोकरी मिलेगी कहां

यार न मिलेगी प्यार होगी कहां उफ हू-3

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जांबाजों की ढेर लगी

मोमबत्तियाँ जली आंसू बहें

एकता का बिगुल बजा

नेताओं पर गाज गिरी

निकम्मों को सजा मिली

सबूत ढूंढे गए

दोषी भी मिले

सजा देना मुकम्मल नहीं

लोहा गरम है

कहीं मार दे न हथौड़ा

पानी डालने के लिए

अब कूटनीति है चली

लेकिन जनता जाग चुकी है

सवाल पूछने आगे बढ़ी है

पर शायद जवाब

किसी के पास है ही नहीं

जिन्होंने देश को तोड़ा

जाति क्षेत्र मजहब के नाम पर

आज खामोश है वे सब

मौकापरस्ती और

तुष्टिकरण की बात पर

चुनाव आनी है

दो और दो से पांच बनानी है

खामोश रहना ही मुनासिब समझा

बह कह दिया, सुरक्षा घेरा

हटा दो मेरा!

कुछ दिनों तक तनातनी का

यहीं चलेगा खेल

फिर बढती आबादी की रेलमपेल

एक बुरा सपना समझकर

फिर सब भूल जायेंगे

याद आयेंगे तब

जब अगली बार फिर से

मौत का तांडव मचायेंगे।

------

छिपे-छिपाए चकमा देकर,

असला बारूद भरकर

आ गये फिल्मी नगरी के भीतर

देखा इंसानी चेहरों को

मासूम भी दिखें,

उम्र दराज जिंदगियां भी थी

पर शायद दरिंदगी छुपी थी सीने में

उनके जहन में था वहसियानापन

कुछ आग पीछे सोचे बगैर

मचा दिया कोहराम

बजा दी तड़-तड़ की आवाजें

बिछादी लाशें धरती पर

क्या बच्चें, बूढे और जवान

क्या देशी व विदेशी

चुन-चुन कर निशान बनाया

लाल स्याही से

पट गया धरती का आंगन

कुछ हौसले दिखे

दिलेरी का मंजर दिखा

जो निहत्थे थे पर जुनून था

टकरा गए राई मानो पहाड़ से

खुद की परवाह किए बगैर

शिकस्त दिया खुद भी खाई

वीरता से जान गवाई

बचे खुचे दहशतगर्द

आग बढ गए

ताज को कब्जे में किया

फिर जो दिखा

दुनिया भी देखी

आतंक का चेहरा

कत्ले आम किया।

कुछ बच गए

रहमत था उनपर

जो मारे गये

किस्मत थी उनकी

फिर यु( चला

पराजित भी हुए

-----

इस धरती पे, उस अंबर से

आते है सारे, बनने तारे

कुछ जगमगाते है, खिल जाते है

फूल बनके वो, महक जाते है

ये सारी किस्मत है,

अपनी मेहनत है

मेहनतों से वो जी न चुराते है

इस धरती पे, उस अंबर से...

अपनी भी एक, आशा है जो

छू लू इस धरती से आसमां को

तोड़ लाउं सारे वो तारे,

जगमगा दूं अपने सितारे

अपनी जो मंजिल हो,

अपना एक कारवां हो

हो एक रास्ता जिसमें ऐसा,

खूबसूरत सा एक जहां हो

इस धरती पे, उस अंबर से...

एक साथी भी, संग होती वो

प्यार देती वो, प्यार लेती वो

लड़खड़ाते कदम, रोक देती वो

गीर भी जाता तो, थाम लेती वो

वो होती ऐसी, चांद की जैसी

चमचमा दे वो किस्मत हमारा

इस धरती पे, उस अंबर से...

-----

मेरी हंसी उड़ा ले जाए मेरे गम को

एक हौसला एक भरोसा, और एक वादा लिया अपने से

वचन और सत्य के पथ पर बने रहना, विश्वास अंतहीन

मौका देखकर चौका लगाने की प्रवृत्ति

दूसरे के दुख को अपना समझने की आदत

जितना हो सके लोगों को खुशी देने की कोशिश

कभी ये आदत मन को तसल्ली देती

खुशी का लम्हा कदमों में बिखेर देती

तो कभी ये कोशिश हमारी लानत बन जाती

दोस्तों की नजरों में बेवकूफ बना देती

पर सबकुछ मैं भुला देता बस देखता संकरा सा रास्ता

कुछ लोग कहते ये आफत भरा रास्ता है

इसे बदल लो कुछ और ढूंढ लो चलने के लिए

जो तुम्हारी जिंदगी को हसीन बना देगी

लेकिन मैं बहुत हठी किस्म का इंसान था

मुझे अपने परवरदिगार पर पूरा विश्वास था

कि वह मेरा बुरा कभी नहीं कर सकता

लाख समझाने के बाद उसी रास्ते पर मै चल पड़ा

हाँ ठोकरें भी खा रहा हूं खुद को जला रहा हूं

आस की लौ हाथों पर थामें अपने शरीर को तपा रहा हूं

कई बार टूट भी जाता हू पर मेरे अंदर की हंसी

सारे गमों को मोम की तरह पिघला देती है

शायद ये हंसी मेरे प्रभु ने मुझे वरदान में दे रखी है

चेहरे और दिमाग को कह रखा है

मेरे जहन में गम के पहाड़ न आए

अगर आए तो उसे मेरी हंसी उड़ा ले जाए

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नरेन्द्र निर्मल

के- 10, द्वितीय तल, शकरपुर, दिल्ली

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'माटी की परी'

खेतों में माटी ढोती, इक अलहड़ सी बाला ने,
घर आ उतार कुदाल, माँ से कुछ ऐसे बोली ।
पेट क्षुधा के हाथों शोषित शैशव ने,
देख महल के ख्वाबों को, अपना मुंह कुछ ऐसे खोली ।

माँ वो कुंकुम, रोली, चूड़ी, कन्गन,
मुझको भी सारे श्रृंगार दिला दो ।
पायल की मीठी छम-छम बोली से,
मन मे भी मेरे, पलाश के टेशू सा इक बासंती शाम खिला दो ।
इन हाथों मे भी मेहँदी से कलियाँ और बूटे बनवा,
इक बार जरा महलों की गुड़िया सा माँ मुझको बनवा दो।

पहन जरा मैं भी परियों सी बन जाऊं,
माँ मुझको भी ऐसी इक चोली सिलवा दो ।
मै भी इन पलकों को, घटा गगन सी स्याह बना लूँ ,
मेरे नयनों मे भी अंजन भर माँ मुझको सजवा दो ।
अपनी जुल्फों को उन्मुक्त हवा मे, मै भी लहरा लूँ,
मेरे सांवल अधरों को भी माँ, इक बार जरा सिन्दूरी रन्ग पिलवा दो ।

मेरी भी थोड़ी रंगत निखरा दे,
ऐसी ख्वाब दिखाने वाली, जन्नत की परियों से माँ मुझको मिलवा दो।
अपनी काया देख जरा मै भी खुद को भरमा लूँ,
अब की बार हाट से माँ मुझको, कोई ऐसी एक दर्पण दिलवा दो।

सुन सब नम आँखों से, माँ ने बिटिया से कुछ ऐसे बोली,
घर का राज धीरे-धीरे, बातों ही बातों मे उसने यूं कह खोली ।
बिटिया पगार के पैसों से ,
कल काम को जा पायें, इतनी ही ताकत आ पाती है ।

तू बतला ना, चोली मैं कैसे सिलवाऊँ ?,
इस आँचल से तो, मेरी ही छाती पूरी ना ढक पाती है।
मजदूरी के इन तेरे पैसों से,
आँखें तेरी क्रंदन करते सूख ना जाये, बस इतनी ही नम हो पाती है।

तेरे ख़्वाबों को, दोष भला मैं क्या दूँ ? बिटिया,
शापित बचपन तेरा, मेरे ही हाथों शोषित होते जाती है ।

मेरे हाथों के ये चूडी कंगन ,
देखो ना इस माँस में कब से धँसे हुये हैं ।
विवाह के रस्मों को इसने देखे हैं ,
तेरे भ्रुण के साक्ष्य भी इसमे जब से बसे हुये हैं ।

नख से शिख तक सौन्दर्य का बिटिया मुझको,
विवाह के बाद का कोई एक पल याद नही ।
दर्पण मे प्रतिबिम्ब भला मैने भी बरसों से कहां देखी ?,
मै तो दोपहरी छाँवों मे केश सँवारती, चख ली जीवन का स्वाद वहीं ।
पायल बिछुआ बेच कुदाली से,
बिटिया हमने श्रृंगार किया है ।

बहते हुये माथे की बूंद पसीनों से,
हमने चंदन सा प्यार किया है ।
बिखरे केश, कुंकुम और अधरों की लाली का ,
रवि की रंग बदलती किरणों के संग हमने दीदार किया है ।

द्वंद लड़ा करने वाले, परियों सा ख्वाब ना देखा करते बिटिया,
हमने तो काँधे पर उठा बोझ,
पैगम्बर बन शिव सा जग का उद्धार किया है ।

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मजहब

मजहब की दीवारों को आज गिराने,

मैं मानवता का पुष्प पुंज लेकर आया हूं।

रूह इंसान को जो ईश्वर का रूप बताये,

ऐसे बाईबिल, कुरान, गीता और गुरूबाणी का सार चुराकर लाया हूं ।

 

मजहब की दीवारें अगर बांट दे,

आपस में इंसानों को,

मैं धर्म भला उसको कैसे कह दूं,

जो रक्त से पोषित करता हो प्रतिमानों को।

वह धर्म नहीं कायरता है,

जो खून से सने हाथ में पूजा की थाल सजाता हो।

वह मूरत नहीं मंदिर और मस्जिद का,

जो भाल पर निचोड़ रक्त नर का, तिलक लगाता हो।

 

जो भक्तों को सरहद की सीमाओं में बांधे,

वह मजहब कैसे हो सकता है ?

बंदिशे रख छोड़े खुद को पूजित होने,

वह धर्म सिवा कांटों के पुष्प भला कैसे बो सकता है?

जो विष बीजों के अंकुर बो,

भयदोहन से अपना अस्तित्व बचाती हो ।

 

नहीं चाहिये मुझको ऐसा मजहब,

जो पूजा को तब्दील मरघट में कर,

हिंसा का ऐसा तांडव नृत्य रचाती हो ।

 

यह कैसा मजहब है,

जो बांट रहा मन से मन को ।

खंजर बन विचलित करता,

पंथ यहां तन से तन को ।

सिंदूर सुहाग की लाली का प्यासा,

धर्म यहां बन जाता है ।

मां की आंखों का तारा भी,

वहशी उन्मादों में अपने प्राण गंवाता है ।

 

लानत है उन कट्टरपंथों को,

जो मानवता की हत्या कर

धर्मों को महिमामंडित करता हो ।

ऐसे मंदिर मस्जिद और गिरजा को दूर नमन मैं कर लूं,

जो स्नान मूल्यों के रक्तों से कर

पाखण्ड का स्वांग भरता हो ।

 

आओ इक बार बता ललकार सुना दें,

धर्मांधों और मजहब के ठेकेदारों को ।

जो हमको बांट सुख सत्ता का भोग रहे,

दिल्ली की गद्दी पर बैठे उन गद्दारों को ।

आवाज जरा हमारी उन तक भी पहुंचा दो,

मानवता के हत्यारे पाखण्डी और छिछोरों को ।

हम उनको भी नहीं बख्शेंगे,

जो मठ मंदिर मस्जिद पर युग से जमे हुये लुटेरों को ।

 

जो इंसानों की सेवा का पाठ पढ़ाये,

मैं ऐसे धर्म का दीप जलाने निकला हूं।

मैं आज पुरातन भारत के मूल्यों का रक्षक बन,

समाज के कातर नरभक्षियों को दण्ड दिलाने निकला हूं ।

आओ भाईचारे की बाती से प्रज्जवलित हृदय दिये को कर लें,

मैं तो घर-घर मानवता का अलख जगाने निकला हूं।

मुश्किल है वजूद वतन का सौहार्द्र यहां,

मैं तो हर देहरी में बस मुट्ठी भर प्यार बांटने निकला हूं।

 

मजहब की दीवारों को आज गिराने,

मैं मानवता का पुष्प पुंज लेकर आया हूं।

रूह इंसान को जो ईश्वर का रूप बताये,

ऐसे बाईबिल, कुरान, गीता और गुरूबाणी का सार चुराकर लाया हूं ।

 

पैगाम

ऐ कर्णधारों वतन के, कुछ ऐसा कर दो,

कि मातृभूमि को नित गर्वित पल और अभिमान मिले ।

न शोषित हो मानव-मानव से,

हर को उनके कामों का जितना संभव हो दाम मिले ।

लटका दो उन पूत कपूतों को शूली पर,

जो न करें बुजुर्गों की सेवा ।

संशोधन कर दो विधि में कुछ ऐसा,

कि उमर पैंसठ के बाद सबको आराम मिले ।

 

कानून बनाओ कुछ ऐसा,

कि सबको जग में कुछ काम मिले ।

फुटपाथ पर पलते बचपन को भी,

गलियों में कोई पहचान मिले ।

सबका अपना घर हो,

सबको रोटी और सम्मान मिले ।

सुख समृद्धि का हो जीवन सबका,

हर घर में पलते शैशव को मुस्कान मिले ।

 

न चोरी और चकारी का कोई डर हो,

न फिर से रक्त नर का बह जाये, ऐसा कोई रणसंग्राम मिले ।

हिंसा की छाया से मुक्त जीवन हो सबका,

सबको निष्कंटक जीने का वरदान मिले ।

 

प्रीति मिले सबको अपना,

हर तरूणाई को पितृपदों के प्रक्षालन का पान मिले ।

मां के आंचल का छांव मिले हर बचपन को,

हर घर में शिशु वनिता को अभयदान मिले ।

सबको पढ़ने का हक हो ,

सबको विधि के आगे संरक्षण सम प्रतिमान मिले ।

 

चंचल चपल सुलक्षण हो युव पग,

ऐसा कुछ मातृभूमि को शान मिले ।

गर्वित हों हम काज तुम्हारे नयन बटोरे,

ऐसे ही जिय को आन मिले ।

घुटता पलता न क्षण मिले किसी को ,

हर को जीने का नव अरमान मिले ।

 

न भूख से मौत किसी का हो,

न आत्महत्या करते किसान का कोई शाम मिले ।

कटोरे पर पलते भीख से न बड़ा हो कोई बचपन,

सबको थोड़ा-थोड़ा ही सही कुछ काम मिले ।

हर इक इंसान देश का अनमोल रतन हो,

ऐसा जन-जन को इक फरमान मिले ।

 

जब तक न पेट क्षुधा बुझती हो हर जन की,

तब तक न प्रधान को रात्रि का भोजन और आराम मिले ।

न्याय मिले बिन पैसों के,

भ्रष्ट आचरणों पर मृत्यु का हर को अंजाम मिले ।

कत्लों और बलात्कारों की सजा कुछ ऐसी हो,

चौराहे पर फांसी का सबको पैगाम मिले ।

 

राजा हो या रंक भिखारी,

सबको विधि के आगे सम मान मिले ।

आचरण प्रधान देश का ऐसा हो,

कि राजा के रूप में केवल राघव राम मिले ।

जो नेतृत्व न कर सके कुछ ऐसा उसको,

बरस चौदह का निर्वासित वनधाम मिले ।

 

भ्रष्ट नेताओं के खालों में भूंसे भरवाने का,

कुछ को ठेके पर यह काम मिले ।

ऐसा पल्लवित जन-जन के चरित्र को कर दो,

कि हर घर में कौशल्या और राम मिले ।

दिल्ली की गद्दी पर बैठे भ्रष्ट नेताओं और गद्दारों को,

इस अदने से कवि का यह छोटा सा पैगाम मिले ।

 

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राकेश कुमार पाण्डेय

हिर्री डोलोमाइट माइंस

भिलाई इस्पात संयंत्र

बिलासपुर, छ.ग.

100_9330 (WinCE)

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गीत २

कागा आया है

जयकार करो,

जीवन के हर दिन

सौ बार मरो...

राजहंस को

बगुले सिखा रहे

मानसरोवर तज

पोखर उतरो...

सेवा पर

मेवा को वरीयता

नित उपदेशो

मत आचरण करो...

तुलसी त्यागो

कैक्टस अपनाओ

बोनसाई बन

अपनी जड़ कुतरो...

स्वार्थ पूर्ति हित

कहो गधे को बाप

निज थूका चाटो

नेता चतुरों...

कंकर में शंकर

हमने देखा

शंकर को कंकर

कर दो ससुरों...

मात-पिता मांगे

प्रभु से लड़के

भूल फ़र्ज़, हक

लड़के लो पुत्रों...

*****

गीत ३

मगरमचछ सरपंच

मछलियाँ घेरे में

फंसे कबूतर आज

बाज के फेरे में...

सोनचिरैया विकल

न कोयल कूक रही

हिरनी नाहर देख

न भागी, मूक रही

जुड़े पाप ग्रह सभी

कुण्डली मेरे में...

गोली अमरीकी

बोली अंगरेजी है

ऊपर चढ़ क्यों

तोडी स्वयं नसेनी है?

सन्नाटा छाया

जनतंत्री डेरे में...

हँसिया फसलें

अपने घर में भरता है

घोड़ा-माली

हरी घास ख़ुद चरता है

शोले सुलगे हैं

कपास के डेरे में...

*****

गीत ४

सूरज ने भेजी है

वसुधा को पाती,

संदेसा लाई है

धूप गुनगुनाती...

आदम को समझा

इंसान बन सके

किसी नैन में बसे

मधु गान बन सके

हाथ में ले हाथ

सुबह सुना दे प्रभाती...

उषा की विमलता

निज आत्मा में धार

दुपहरी प्रखरता पर

जान सके वार

संध्या हो आशा के

दीप टिमटिमाती...

निशा से नवेली

स्वप्नावली उधार

मांग श्वास संगिनी से

आस दे संवार

दिवाली अमावस के

दीप हो जलाती...

आशा की किरण

करे मौन अर्चना

त्यागे पुरुषार्थ स्वार्थ

करे प्रार्थना

सुषमा-शालीनता हों

संग मुस्कुराती...

पावस में पुष्पाये

वंदना विनीता

सावन में साधना

गुंजाये दिव्य गीता

कल्पना ले अल्पना

हो नर्मदा बहाती...

********************

गीत ५

ओढ़ कुहासे की चादर,

धरती लगाती दादी.

ऊंघ रहा सतपुड़ा,

लपेटे मटमैली खादी...

सूर्य अंगारों की सिगड़ी है,

ठण्ड भगा ले भैया.

श्वास-आस संग उछल-कूदकर

नाचो ता-ता थैया.

तुहिन कणों को हरित दूब,

लगती कोमल गादी...

कुहरा छाया संबंधों पर,

रिश्तों की गरमी पर.

हुए कठोर आचरण अपने,

कुहरा है नरमी पर.

बेशरमी नेताओं ने,

पहनी-ओढ़ी-लादी...

नैतिकता की गाय कांपती,

संयम छत टपके.

हार गया श्रम कोशिश कर,

कर बार-बार अबके.

मूल्यों की ठठरी मरघट तक,

ख़ुद ही पहुँचा दी...

भावनाओं को कामनाओं ने,

हरदम ही कुचला.

संयम-पंकज लालसाओं के

पंक-फंसा- फिसला.

अपने घर की अपने हाथों

कर दी बर्बादी...

बसते-बसते उजड़ी बस्ती,

फ़िर-फ़िर बसना है.

बस न रहा ख़ुद पर तो,

परबस 'सलिल' तरसना है.

रसना रस ना ले, लालच ने

लज्जा बिकवा दी...

हर 'मावस पश्चात्

पूर्णिमा लाती उजियारा.

मृतिका दीप काटता तम् की,

युग-युग से कारा.

तिमिर पिया, दीवाली ने

जीवन जय गुंजा दी...

*****

somesh sekhar chandra

बस रूकती, इसके पहले ही वह उससे कूद, रेलवे स्टेशन के टिकट घर की तरफ लपक लिया था। उसकी ट्रेन के छूटने का समय हो चुका था इसलिए वह काफी जल्दी में था। टिकट घर के भीतर पहुँचकर, यह जानने के लिए कि, किस खिड़की पर उसके स्टेशन का टिकट मिलेगा, जल्दी जल्दी, खिड़कियों के ऊपर टंगे बोर्ड पढ़ा था। ’’यहाँ सभी जगहों के टिकट मिलते हैं’’ वाली खिड़की पर नजर पड़ते ही उसकी आँखे चमक उठी थी और वह उसी तरफ लपक लिया था।

टिकट घर की खिड़की के ऊपर टंगी घड़ी के मुताबिक, उसकी ट्रेन छूटने में, अब सिर्फ, तीन मिनट ही बाकी रह गए थे और इतने कम समय में टिकट कटवाना और दौड़कर ट्रेन पकड़ना, उसे बड़ा नामुमकिन सा लग रहा था जिसके चलते वह घबराया हुआ था और जल्दी से जल्दी टिकट कटवाकर, ट्रेन छूटने के पहले, उसे पकड़ लेने की उतावली में था। वैसे उसकी इस उतावली की एक वजह और भी थी वह यह कि, उसके घर की तरफ, दिन भर में सिर्फ यही एक ट्रेन जाती थी और इसके छूट जाने का मतलब था अगले चौबीस घंटे तक, बिना खाए पिए, खून जमा देने वाली ठंड में, स्टेशन पर ठिठुर ठिठुर कर अपनी जान देना। हालांकि ठंड से बचने के लिए वह, सभी मुमकिन उपाय कर रखा था, लेकिन जैसे जैसे शाम नजदीक आती जा रही थी, कोहरा और भी घना होता जा रहा था और इसी के साथ ठंड भी बढ़ती जा रही थी। अभी दिन के चार ही बजे थे और वह सिर से लेकर पांव तक जरूरत भरके गरम कपड़े भी पहन रखा था, बावजूद इसके उसे लगता था ठंड उसकी हड्डियों में घुसड़ती जा रही है। चिंता उसे इसी बात की हो रही थी कि, जब दिन के चार बजे, ठंड के चलते उसकी यह हाल है तो, रात में यह कैसी होगी इसी को सोचकर, वह बुरी तरह परेशान था।

खिड़की पर पहुँचकर, बड़ी बेसब्री से वह अंदर की तरफ झाँका था। यह देखकर कि, बाबू अपनी सीट पर बैठा हुआ है, उसे बड़ी राहत मिली थी। बाबू जी एक टिकट खंजनपुर, अपने स्टेशन का नाम बता, टिकट के पैसे निकालने के लिए, हाथ अपनी पैंट की जेब में डाला था तो एक दम से धक्क रह गया था। पैसे, उसकी पैंट की जेब में थे ही नहीं। कहीं मेरी जेब पर, किसी पाकिट मार ने, अपने हाथ तो साफ नहीं कर दिए? या इस हबड़ दबड़ में, मै उन्हे रास्ते में ही तो नहीं गिरा आया। दरअसल जब वह बस में था, उसी समय, टिकट के पैसे गिनकर, कमीज की ऊपरी जेब में सहेज लिया था जिससे कि पैसा निकालने और गिनने में, वेवजह की देरी न हो। लेकिन यह बात, इस समय उसके दिमाग से पूरी तरह उतर चुकी थी। खिड़की के पीछे बैठे बाबू को, उसने अपने गंतव्य स्टेशन का नाम, पैसा देने के पेश्तर, इसलिए बता दिया था कि, इस बीच, जितनी देर में वह अपनी जेब से पैसे निकालेगा, उतनी देर में, बाबू टिकट काटकर तैयार बैठा होगा, वह उसे पैसा पकड़ाएगा और उससे टिकट लेकर, गाड़ी पकड़ने के लिए दौड़ पड़ेगा।

कमीज की जेब में पैसा महफूज पाकर, उसकी जान में जान आ गई थी। चिल्लर सहित, टिकट के जितने पैसे बनते थे पाकिट से निकालकर, अपनी मुठ्ठी में लिया था और पूरा हाथ, खिड़की में घुसेड़, टिकट बाबू के सामने कर दिया था। बाबू जी एक टिकट खंजनपुर।

उसके हाथ से टिकट के पैसे थाम, बाबू बड़ी सुस्ती से आगे की तरफ झुक आया था और अपनी गर्दन, खिड़की के करीब तक खींच, उसे सूचित किया था गाड़ी अठारह घंटे लेट है।

अठारह घंटे ए ए ऽ ऽ लेट ऽ ऽ ट।

जी ई ऽ ऽ ऽ ऽ ।

टिकट काट दूँ ऊँ ऽ ऽ ?

गाड़ी के, अठारह घंटें लेट होने की बात सुनकर, वह एकदम से बेजान सा हो गया था। बाबू को टिकट काटने के लिए, हाँ कहे या नहीं, उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। थोड़ी देर तक बाबू, अपनी गर्दन आगे की तरफ खींच, उसके जबाब का इंतजार करता बैठा रहा था लेकिन जब उसे, उसकी तरफ से कोई जबाब नहीं मिला था तो वह, झुंझलाकर टिकट का पैसा, वापस उसकी हथेली में ठूंस, उठ खड़ा हुआ था और टिकट घर की खिड़की दडाम से बंद करके, कमरे से बाहर निकल लिया था।

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रामजनम से उसकी मुलाकात, अर्सा पहले, एक दिन ट्रेन मे, सफर के दौरान हुई थी। हुआ यह था कि उस दिन, रिजर्वेशन उसके पास था नहीं। ट्रेन के जिस जनरल डिब्बे में वह चढ़ा था उसमें इतनी भीड़ थी कि कहीं खड़ा होने तक की जगह नहीं थी। लोगों के साथ, काफी धक्का-मुक्की और गाली गलौज के बाद, उसे एक कोने में, थोड़ी सी जगह मिल गई थी और वह वहीं पर, अपने पाॅव टिकाकर खड़ा हो गया था। पहले तो वह सोचा था कि आगे चलकर, उसे कहीं न कहीं बैठने की जगह मिल जाएगी लेकिन जैसे जैसे ट्रेन बढ़ती गई थी, डिब्बे में और ज्यादा लोग ठुंसते चले गए थे इसलिए घंटो गुजर जाने के बाद भी, उसे बैठने की कोई जगह नहीं मिली थी और वह खड़े खड़े ही सफर करता रहा था। लेकिन घंटो गुजर जाने के बाद भी जब उसे बैठने की कोई जगह नहीं मिली थी तो उसका सिर चकराने लग गया था और टांगे खड़ा रहने से जबाब दे गई थी, और वह जहां खडा था वहीं, लोगों की टांगों के बीच धम्म से बैठ गया था।

क्या हुआ मेरे भाई, लगता है तुम्हें गश आ गया है तुम तो एकदम पसीने पसीने हो रहे हो। वह जहाँ बैठा था, रामजनम वहीं बगल की सीट पर बैठा हुआ था। उस समय उसकी जैसी हाल थी उसे देखकर उसे उस पर तरस आ गया था। उसे जमीन से उठाकर, वह, अपनी सीट पर बैठाया था, अपनी बैग से बोतल निकालकर, उसके पानी से, उसका मुंह धुलवाया था और अपनी रूमाल से, तब तक हवा करता रहा था जब तक वह पूरी तरह ठीक नहीं हो गया था। इस तरह रामजनम उसे अपनी सीट पर बैठाकर खुद खड़े खड़े सफर करता रहा था। काफी देर के बाद, सीट पर बैठे एक सज्जन का स्टेशन आने पर वे, उतरने के पहले, अपनी सीट, उसे दे दिए थे इसके बाद उनकी आगे की यात्रा काफी आसान हो गई थी।

राम जनम उस दिन, अपने साथ, दारू की एक बोतल लिए हुए था। रात हुई थी तो वह स्टेशन के प्लेटफार्म से दो पैकेट खाना खरीद लाया था और दोनो उस दिन साथ-साथ खाना खाये थे और छक कर दारू पिए थे। हॅसी ठठ्ठे के साथ, दोनो मे ऐसी-ऐसी बातें हुई थी उस दिन, जैसे वे दोनो बचपन के लंगोटिया और हमराज हों। सफर खत्म होने के पहले दोनो, एक दूसरे को, अपना-अपना पता दिये थे। राम जनम अपने घर का पता लिखने के साथ, उसकी डायरी में, स्टेशन से निकलकर, उसके घर कैसे पहुँचना है उस तक का एक नक्शा बना दिया था। मेरे घर की तरफ तुम्हारी रिश्तेदारी है इसलिए तुम सिर्फ मेरे दोस्त ही नहीं, रिश्तेदार भी हुये। भविष्य में, जब भी तुम अपनी रिश्तेदारी आओ, तो मेरे घर आना मत भूलना, मेरे दोस्त, सच कहता हूँ बडी मजा आएगी। बोलो आओगे ना?

आऊँगा मेरे दोस्त, जरूर आऊँगा। बिछुड़ने के पहले दोनों इस तरह एक दूसरे से गले मिले थे जैसे दोनों का जन्मों का साथ रहा हो।

ऐसा नहीं था कि, राम जनम उसकी याददाश्त से उतर चुका था। उसके साथ का उस दिन, का वह सफर, उसे अच्छी तरह याद था और जब कभी वह अपनी रिश्तेदारी जाने के लिए इस स्टेशन पर उतरा था या वापसी में ट्रेन पकडने के लिए स्टेशन पहुँचा था तो राम जनम उसे जरूर याद आया था। लेकिन उसकी याद, महज यादों तक ही सीमित रही थी। रामजनम के लिए उसके भीतर ऐसा कोई आकर्षण या खिंचाव कभी नहीं महसूस हुआ था कि वह उससे मिलने के लिए उसके घर तक खिंचा चला जाता। सफर के दौरान, कभी-कभी ऐसे हमसफर मिल जाते है जिनसे ऐसी घनिष्ठता हो जाती है कि, लगता है कि उनसे अपना जन्मों का साथ हो। लेकिन सफर के दौरान की घनिष्ठता, श्मशान वैराग्य की तरह, सिर्फ उस सफर तक या थोड़े समय बाद तक ही मौजूद रहती है। सफर खत्म होने के बाद, जब लोग अपने-अपने परिवेष में रम जाते है तो वह सफर, किसी सुखद सपने की तरह याद तो आता है लेकिन, उसकी बुनियाद पर, हम सफर के घर पहुँच कर उससे मिलने कि बात सोचना ही बेमानी सा लगता है। राम जनम को लेकर, इतने अर्से तक ठीक ऐसा ही कुछ, उसके साथ भी होता रहा था और वह राम जनम के यहाँ जाने की कभी सोचा तक नहीं था।

समूचे मुसाफिरखाने में, उसके सिवा दूसरा एक भी मुसाफिर नहीं था। स्टेशन का भी वह एक चक्कर लगा आया था लेकिन वहाँ भी उसे कोई मुसाफिर नहीं दिखा था और न ही कोई ऐसी जगह दिखी थी जहाँ वह सुकून से हाड़ कॅपाती इस ठंड में, अपनी रात काटता। ऐसे में रामजनम के घर जाने के सिवा, उसके पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं बचा था।

रामजनम का घर, स्टेशन से ज्यादा दूर नहीं था, और उसने उसकी डायरी में जिस तरह, अपने घर पहुँचने का पूरा नक्शा बना रखा था, उससे वह उसके पते तक, बड़ी आसानी से पहुँच भी लिया था। लेकिन उसके पते पर पहुँचने पर, जो दृश्य उसकी आँखो के सामने पेश आया था, उसे देखकर वह विचलित हो उठा था। रामजनम ने उसे बताया था कि वह बैंक में बाबू है और उसका अपना खुद का बड़ा मकान है। लेकिन जिस जगह वह, अपने मकान होने की बात बताया था वहाँ, दूर दूर तक मकान जैसा कुछ भी नहीं था। वहाँ थी तो, कोलियरी के काफी पुराने और जर्जर धौरों (छोटे-छोटे घरों) वाली एक बस्ती।

जिस जगह वह खड़ा था वहाँ से थोड़ी दूर पर, एक पुराना नीम का पेड़ था जिसके चारों तरफ, बड़ा चबूतरा बना हुआ था और उस चबूतरे पर मर्दो की दो गोल, गोलियां कर बैठी हुई थी और हर गोल के बीच, दो तीन दारू की बोतलें और एक बड़े पत्तल पर चिखना रखा हुआ था। सबके हाथ में काँच की छोटी गिलासें थी और वे बोतल से उड़ेल उड़ेल कर, चिखने के साथ दारू पीने में जुटे हुए थे। चबूतरे से सँटकर कोयले का एक बड़ा ढेर जल रहा था। जिस तरह नीम के पेड़ के चबूतरे पर शाराबियों की दो गोल, दारू पीने में मशगूल थी उसी तरह, जलते कोयले की ढेर को घेरकर, दो और गोल दारू की बोतलों के साथ जमी बैठी थी। उनसे थोड़ा हटकर कम, उम्र के बच्चे कंचे खेल रहे थे। नीम के चबूतरे से थोड़ा हटकर राख के तीन बड़े ढूहे थे। धौरों की तरफ से एक नाली इधर को ही आई हुई थी और कूड़े कताउर और राख के ढूहों के चलते उसका आगे का रास्ता बंद हो चुका था, जिसके चलते धौंरो का सारा पानी, एक जगह जमा होकर, कीचड़ से बजबजाती, छोटी गड़ही सरीखी बन गई थीऔर उसमें सुअरो का एक झुंड लोट पोट करने के साथ, आपस में लड़ भी रहे थे। जलते कोयले से अलकतरे की गंध का धुंआ, बजबजाते कीचड़ की सड़ांध और वैसे ही गंदे और दारू के नशे में चूर लोगों को देख उसका मन गिजगिजा उठा था।

राम जनम बैंक में बाबू हैं। वह इतनी गंदी जगह, और इन सुवरों और शराबियों की बस्ती में रह कैसे सकता है? उसने मुझे यह भी बताया था कि उसका अपना खुद का एक बड़ा मकान है, लेकिन यहाँ, इन धौरों के अलावा, दूर दूर तक कोई मकान भी कहीं नहीं दिख रहा है? कही मैं गलत जगह तो नहीं आ गया हूँ?

राम जनम के बारे में, लोगो से दरयाफ्त करके, पता करे या नहीं, वह अभी सोच ही रहा था कि, इसी बीच, शराबियों की गोल से, एक आदमी उठकर, उसके पास आया था और लड़खड़ाती जुबान में उससे पूछा था।

आप किसे खोज रहे है बाबू ऊ ऊ ?

यहाँ कोई रामजनम नाम का आदमी रहता है?

राम जनम, कौ औन रामजनम, दारू के नसे से झखियाया अपने दिमाग पर जोर लगाकर वह रामजनम के बारे में सोचा था।

रामजनम जो बैक में बाबू है।

बैक में बाबू ऊ हुँ ? थोड़ी देर सोचने के बाद भी रामजनम, जब उसके ध्यान में नहीं आया था तो वह, नीम के चबूतरे पर गोलिया कर बैठे लोगो से दरयाफ्त किया था, यहाँ बैक का बाबू, रामजनम कौन है रे भाई?

अरे बाकल, बाबू अपने रामजन्मा के बारे में पूछ रहा होगा, जवाब में चबूतरे पर बैठा एक आदमी उसे जोर से डांटा था।

ओ ओ ऽ ऽ ऽ तभी तो हम कहे ......राम जनम यहाँ कवन है रे भाई। इतनी देर में, जो आदमी चबूतरे से उसे डांटा था वह, वहाँ से उठ कर, उसके पास आ कर खड़ा हो गया था। हालाँकि वह भी काफी पिया हुआ था लेकिन, पहले वाले की तरह, न तो उसकी जुबान बेकाबू थी और न ही शरीर ही।

रामजनम जो बैक में काम करता है आप उसी को खोज रहे है न बाबू?

हाँ...हाँ...... मै उसे ही खोज रहा हूँ।

बाबू ऊ इस धौरे के पीछे जो धौरा है न, उसी लाइन में रामजन्मा का ड़ेरा हैं इधिर से आप चले जाओं, उसके ड़ेरे के सामने नीम का बड़ा पेड़ है।

राम जनम ने मुझे बताया था कि वह बैंक में बाबू है?

यह तो हम बता नहीं सकता बाबू, लेकिन वह बैंक में काम जरूर करता है।

क्या तुम मुझे, उसके ड़ेरे तक नहीं पहुँचा दोगे?

उसके आग्रह पर, वह उसे बड़ा खुशी मन से, रामजनम के डेरे पर पहुँचा आने के लिए राजी हो गया था।

रामजन्मा गे ए ऽ ऽ गे ए रामजन्मा आ ऽ ऽ। रामजनम के दरवाजे पर पहुँचकर वह उसे, जोर जोर से आवाज लगाने के साथ, उसके किवाड़ का सांकल भी खटखटाया था। दो तीन आवाज के बाद, राम जनम घर का दरवाजा खोल, अपने दोनों हाथों से, दरवाजे की दोनों तरफ की कवही थाम, सवालिया नजरों से आंगतुक को ताकता खड़ा था।

देख ई बाबू, तोहे खोजि रहलो छिए!

कौन? उसके चेहरे पर गहरे से ताक, रामजनम उसे पहचानने की कोशिश किया था लेकिन वह उसे नहीं पहचान सका था।

मुझे नहीं पहचाने न मेरे दोस्त?

नहीं। इनकार में अपना सिर हिला, रामजनम दरवाजे की कवही छोड़ उसके एकदम करीब आकर, उसे पहचानने की कोशिश किया था लेकिन फिर भी वह उसे नहीं पहचान सका था। सचमुच, मैं आपको नहीं पहचाना।

काफी अर्सा पहले हम दोनों ट्रेन में मिले थे। तुमने मेरी डायरी में अपना पता लिखकर मुझे दिया था यह देखो, और वह अपनी जेब से छोटी डायरी निकाल, जिस पन्ने पर रामजनम अपने घर का पता लिखा था, उसे खोलकर उसके सामने कर दिया था।

ओ ओ ऽ ऽ ऽ ओ ऽ ऽ तो आप हैं? डायरी में खुद के हाथ की लिखावट देख रामजनम को ट्रेन के सफर के दौरान, उसके साथ की मुलाकात, याद पड़ गई थी और वह उसे बड़ा धधाकर अपनी बाहों में भर लिया था। आओ मेरे दोस्त आओ, रामजनम के इस गरीब खाने में तुम्हारा स्वागत है। रामजनम उसे पाकर एकदम से निहाल हो उठा था। आओ मेरे दोस्त आओ। दरअसल तुमने अपना चेहरा पूरी तरह चद्दर से तोप रखा है न, इसीलिए मैं तुम्हें नहीं पहचान सका।

गुफानुमा रामजनम के एक कमरे वाले धौरे में, छोटा सा एक आँगन था। आगे करीब पाँच बाई दस फुट का एक बरामदा था जिसे राम जनम अपनी रसोई की मसरफ में लिया हुआ था। उसकी औरत उस समय, कोयले की अंगीठी पर रोटियाँ सेक रही थी। सुरंग नुमा उसकी कोठरी, पूरी तरह खुली हुई थी। भीतर उसके, ताखे पर एक ढिबरी जल रही थी। उसके पहुँचने के पहले, उसके चार बच्चे कोठरी में धमाचैकड़ी मचा रखे थे लेकिन उसे आया देख, सब अपनी धमाचैकड़ी बंद करके, किवाड़ की ओंट से, उसे बड़े कुतूहल से निहारते खड़े थे। उसकी पत्नी उसे देख, जमीन से पल्लू उठाकर अपने सिर पर डाल ली थी।

उसे बैठाने के लिए रामजनम, कोठरी के भीतर से दो प्लास्टिक की कुर्सियाँ निकाल बरामदे में डाल दिया था। कंधे से टंगा बैग, नीचे उतार कर, वह जमीन पर रखा था और कुर्सी पर बैठ, रामजनम के समूचे घर का सरसरी नजरों से फिर से मुआयना किया था। रामजनम के घर में इन दो कुर्सियों के अलावे कोई खटिया या पलंग नहीं थी। हालांकि रामजनम के कपड़े गंदे नहीं थे और न ही वही वैसा गंदा था जितना गंदा उसका घर, घर के सामान, बच्चे और उसकी औरत थी। इतने गंदे माहौल में और एक कोठरी वाले इस घर में, वह अपने रहने की जगह तलाशने के साथ साथ, वहाँ दस पन्द्रह घंटे कैसे गुजारेगा, इसके लिए खुद को तैयार करने लगा था।

रामजनम अपनी पत्नी को चाय बनाने को कहकर, दूसरी कुर्सी उसके एकदम करीब खींचकर बैठ गया था और उसका हाथ अपनी दोनों हथेलियों में दबाकर चहका था। दोस्त आज सुबह से ही रह रहकर मेरा मन प्रफुल्लित हो उठता था, लगता था आज मेरे घर जरूर, मेरा कोई अजीज, पहुँचने वाला है। और मेरी खुशनसीबी देखो कि तुम जैसा दोस्त, मेरे घर पहुँचा गया।

दरअसल मेरे एक रिश्तेदार की मृत्यु हो गई थी। उसी की तेरहवीं मे मैं, पेटरवार आया हुआ था। वापस लौटने के लिए स्टेशन पहुँचा, तो पता चला गाड़ी अठारह घंटे लेट है। मेरे पास प्रचुर समय था सोचा चलकर, तुमसे मिल आते है।

रामजनम अपने बारे में जितना उसे बताया था उसकी बुनियाद पर वह उसे किसी सभ्य घर परिवार और अच्छी हैसियत का आदमी समझ रखा था। लेकिन वहाँ वैसा कुछ भी नहीं था। इतनी देर में जो कुछ वह देख चुका था, उससे उसे लगने लगा था कि वह, बहुत ही बुरी जगह और बुरे लोगों के बीच आ फंसा है कि रामजनम बहुत बड़ा झुठ्ठा और ठग है और उसे जितनी जल्दी हो, यहाँ से भाग निकलना चाहिए। इसलिए वह रामजनम से कुछ इस तरह बतियाया था जैसे वह उसके साथ चाय पानी करके तुरंत, यहाँ से निकल जाएगा।

बहुत अच्छा किए मेरे दोस्त, मैं तुम्हें पाकर धन्य हुआ। हमारे पास अठारह घंटे का समय है, मौसम भी आज काफी अच्छा है दोनों मिलकर इसका खूब जश्न मनाएगें ठीक है न? रामजनम उसके कंधे दबा जोर से चहका था।

रामजनम की पत्नी कांच के दो गिलास में, लाल चाय उन्हें पकड़ा गई थी, चाय गरम थी इसलिए रामजनम अपना गिलास, जमीन पर रख, अपनी कुर्सी खींच उसके काफी करीब सँट कर, उससे शिकायत किया था मुद्दत बाद तुम्हें मेरा ख्याल आया, मेरे दोस्त, कहाँ थे इतने दिनों तक?

झुठ्ठा साला, देखो कैसे बन रहा है। इसकी बात से लगता है जैसे इतने दिनों तक यह मेरी ही राह निहारता बैठा हुआ था। लेकिन उसने उसे कोई जबाब नहीं दिया था।

तुम्हें मेरा घर ढूँढ़ने में कोई परेशानी तो नहीं हुई मेरे दोस्त?

नहीं, नहीं कोई परेशानी नहीं हुई, बड़ी आजिजी से उसने उसे जबाब दिया था।

रामजनम अपनी चाय खत्म करके उससे थोड़ी मोहलत लेकर अपनी कोठरी में घुस गया था और थोड़ी देर बाद, जब वह कोठरी से बाहर निकला था तो, उसकी हुलिया देख, उसकी आँखे फैली की फैली रह गई थी। सिर पर क्रोसिए से बुनी गोलौवा टोपी, टेरीकाट के सफेद कुर्ते के ऊपर काली जैकेट, नीचे चेकदार लुंगी और आँख में मोटा सुरमा डाल वह, खाटी मुसलमान का रूप धर रखा था।

चलो मेरे दोस्त चलते हैं, रामजनम आगे बढ़कर, जमीन पर पड़ा उसका बैग उठाया था और अपने कंधे पर टांग, दरवाजे की तरफ बढ़ गया था। विस्मय से कुछ देर, रामजनम की पीठ पर अपनी नजरे गड़ाए बैठा रहने के बाद, यह जानने के लिए कि वह उसे कहाँ ले जाना चाहता है, अंगीठी पर रोटियां सेंकती रामजनम की पत्नी की तरफ, सवालिया नजरों से देखा था। लेकिन रामजनम की पत्नी, अपने काम में कुछ इस तरह मशगूल थी, जैसे उसे, उन दोनों में से, किसी से कोई मतलब ही न हो। हारकर वह वहाँ से उठा था और रामजनम के पीछे पीछे चल पड़ा था।

रास्ते में एक कलाली (शराब घर) के पास पहुँचकर, रामजनम उसे थोड़ा रूकने के लिए कहकर, कलाली की तरफ गया था और जब वहाँ से वह लौटा था तो उसके एक हाथ में, देशी शराब की दो बोतलें और दूसरे में, पालीथीन की थैली में बकरे का गोश्त था। अब मजा आयेगा मेरे दोस्त, चलो चलते हैं।

लेकिन कहाँ, तुम मुझे कहाँ ले जाना चाहते हो राम जनम ? जब से वह राम जनम के साथ उसके घर से निकला था यह सोचकर, खुद को जव्त किए रखा था कि रामजनम चाहे कितना झुठ्ठा और फरेबी क्यों न हो, जिस आत्मीयता से उसके साथ पेश आ रहा था, वैसे में वह उसके साथ कुछ बुरा या उल्टा-पुल्टा तो नहीं ही करेगा। लेकिन जब वह उसे चलने को कहकर, आगे फुटुस की घनी झाड़ियों के बीच से गुजरती पगडंडी की तरफ बढ़ा था तो उस,े उसके इरादों पर शक हो उठा था और वह उस पर एकदम से चीख पड़ा था।

उसकी चीख पर, रामजनम रूक गया था और हैरान नजरों से, थोड़ी देर, उसके चेहरे का मुआयना करने के बाद, मुसकुराते हुए उससे कहा था। मैं तुम्हारी परेशानी समझ गया मेरे दोस्त, तुम राम जनम को बड़ा ही लुच्चा और शातिर दिमाग आदमी समझ रहे हो, सोच रहे हो कि राम जनम मुझे, जरूर किसी गढ्ढे में ढकेलने के लिए, लिए जा रहा है। लेकिन सच मानो मेरे दोस्त, जैसा तुम सोच रहे हो राम जनम वैसा आदमी नहीं है। फिर भी अगर तुम्हें मेरे ऊपर भरोसा नहीं है, तो अभी कोई देर नहीं हुई है, चलो मैं तुम्हें वापस स्टेशन छोड़ आता हूँ।

रामजनम, तुमने मुझे बताया था कि तुम बैंक में बाबू हो और तुम्हारा अपना खुद का बड़ा मकान है। लेकिन हकीकत में न तो तुम्हारा अपना कोई मकान है और न ही तुम बैंक में बाबू ही हो। जैसी गंदी बस्ती और घटिया लोगों के बीच तुम रहते हो उसमें चोर उचक्कों और उठाईगीरों को छोड़, कोई भला आदमी तो नहीं ही रहता होगा। यही नहीं, जब मैं तुम्हारे घर पहुँचा था तो मैं तुम्हें एक रूप में देखा था और अब मैं तुम्हें एकदम अलग ही रूप में देख रहा हूँ। और ऊपर से तुम मुझे इतनी कुबेला में, अपना घर छोड़कर फुटुस के जंगलों के बीच लिए जा रहे हो ऐसे में तुम्हीं बताओ कि तुम्हारी ए सब बातें, तुम्हारे प्रति, किसी के भी मन में अविश्वास और आतंक पैदा करने के लिए काफी नहीं है क्या ?

हैं, और पूरी तरह है मेरे दोस्त, लेकिन तुम मुझे एक बात बताओ, कि अगर मैं उस दिन, तुम्हें बता दिया होता कि मैं जाति का हाड़ी (स्वीपर) हूँ, हाड़ी बस्ती में रहता हूँ, और टट्टी मैला धोने का काम करता हूँ तो क्या उस दिन का हमारा ट्रेन का वह सफर, जितनी मौज मस्ती में कटा था, वह वैसा ही कटता? और आज जो तुम मेरे घर पहुँचकर, मुझे निहाल कर दिए हो, यदि तुम रामजनम की सारी असलियतों और हकीकतों से वाकिफ होते, तब भी उसके घर आते?

रामजनम मैं तुम्हारी बात से पूरी तरह कायल हूँ। सफर को खुशगवार बनाने के लिए, उस दिन की तुम्हारी झूठ, उस समय की एक बड़ी जरूरत थी लेकिन यह जो तुम, बहुरूपियों की तरह अपना वेष बदलते चलते हो यह क्या है? रामजनम से यह सवाल पूछते समय उसकी आवाज काफी तल्ख हो उठी थी।

उसकी बात सुनकर रामजनम बड़े जोर का ठहाका लगाया था। जानता हूँ मेरे दोस्त, कि तुम मेरे वेष बदलने को लेकर काफी परेशान हो। लेकिन सच मानों, मैं अपना वेश बदलता हूं तो किसी को ठगने और धोखा देने के लिए नहीं, बल्कि ऐसा करना मेरी मजबूरी के साथ साथ, एक बड़ी जरूरत भी है।

जरूरत.....?

हाँ जरूरत, दरअसल हुआ यह था कि मैं एक मुसलमान औरत को बैठा लिया था। मुसलमानों ने कहा कि जब तक तुम मुसलमान नहीं बन जाते, तुम उस औरत को अपने पास नहीं रख सकते, मैंने कहा ठीक है मैं मुसलमान बन जाता हूँ और मैं कलमा पढ़कर मुसलमान बन गया। रामजनम यह बात जिस तरह बिना किसी लाग लपेट के और बेलौस कहा था उसे सुनकर उसे बड़े जोर का धक्का लगा था।

लेकिन तुम्हारे पास तो पहले से ही अपनी औरत और बच्चे थे, फिर तुम्हें ऐसा करने की क्या जरूरत पड़ गई थी, कहीं तुम्हारा प्यार-व्यार वाला चक्कर तो नहीं था उससे?

नहीं ई ऽ ऽ या ऽ ऽ र.... प्यार व्यार जैसा कोई चक्कर नहीं था उससे।

तब ?

हुआ यूँ था कि उस औरत का मर्द, कोलियरी में काम करता था, चाल गिरने से वह उसके नीचे दबकर मर गया। उसके एवज में उसकी औरत को मोटा मुआबजा और नौकरी मिली थी। औरत अभी पूरा पठ्ठी थी और उसे मर्द की जरूरत भी थी, उससे शादी करने से मुआबजे के उसके पैसे, मेरे हाथ में आने के साथ साथ, एक कमासुत पठ्ठी मेरे कब्जे में आ गई थी बोलो मेरे लिए यह कोई घाटे का सौदा था क्या? अपनी इस चालाकी पर इतराता हुआ रामजनम, अपनी गर्दन ऐंठ, उससे पूछता, अपनी देह अकड़ा लिया था।

और सिर्फ इतने से फायदे के लिए तुम, अपना धर्म छोड़कर, दूसरा धर्म तक कबूल कर लिए रामजनम?

लेकिन ऐसा करके मैंने कोई गुनाह कर दिया क्या......... मेरे दोस्त?

रामजनम को उसने कोई जबाब नहीं दिया था। हैरान सा वह सिर्फ उसे हिकारत भरी नजरों से घूरता खड़ा रहा था।

फुटुस (छोटे झाड़ीदार पौधे) का जंगल पार कर, रामजनम उसे जिस बस्ती में लेकर पहुँचा था उसमें, अस्वेस्टस सीट से छाए, एक एक कमरे के घरों वाली कई कतारें थीं। उन्हीं कतारों में से एक घर के पास पहुँचकर, वह उसके दरवाजे की कुंडी खटखटाने के साथ आवाज भी दिया था, बेगम दरवाजा खोलो।

राम जनम के बेगम कहकर पुकारने से वह समझ गया था कि, यहाँ उसकी, दूसरी बीबी रहती है।

यह कालोनी भी रामजनम के पहले वाली कालोनी की तरह ही गंदी थी। जगह जगह राख के ढूहे, कूड़े कताउर के ढेर और नालियाँ, यहाँ भी वैसे ही बजबजा रही थी जैसा वह इसके पहले देखकर आया था।

थोड़े इंतजार के बाद दरवाजा खुला था, तो रामजनम की बीबी के रूप में जो औरत उसकी आँखो के सामने प्रकट हुई थी, वह उसे, देखता ही रह गया था। कमसिन और बेहद खूबसूरत चेहरा, गुदाज और ठॅसी हुईर देह, बड़ी बड़ी आँखें, उम्र उसकी मुश्किल से अठारह साल की रही होगी। सलवार कुर्ते में वह उसे, औरत नहीं, बल्कि कालेज में पढ़ती कोई लड़की लगी थी।

बेगम इससे मिलो, यह है मेरा जिगरी दोस्त शिवा। बचपन में हम दोनों साथ साथ खेले खाए हैं। आज यह बैंक में बहुत बड़ा साहेब है। लेकिन इसका बड़प्पन देखो कि, इतना बड़ा आदमी बन जाने के बाद भी, यह मुझे, आज तक नहीं भूला। रामजनम एक ही सांस में अपनी बीबी के सामने उसकी झूठी तारीफ में इतना लम्बा चौड़ा पुल बांध दिया था कि उसे, उसका मुह पकड़ लेने का मन हुआ था। लेकिन बोलने के लिए वह अपना मुंह खोलता, इसके पहले ही रामजनम, अपनी बीबी का उससे परिचय करवाने लग गया था।

और मेरे दोस्त आप हैं मेरी बेगम अजरा। आप लोगों जैसे ही रईस घर की बेटी है आप। इन्हें पाकर मेरा तो, जीवन ही धन्य हो गया है। अपनी बीबी का परिचय करवाने के बाद रामजनम अपने हाथ में पकड़ी दारू की बोतल और मीट का थैला उसकी तरफ बढ़ा दिया था। बेगम यह पकड़ो मीट और यह दारू की बोतल। आज, आप मेरे दोस्त की ऐसी खातिर करें कि यह बार बार हमारे गरीब खाने पर दौड़ा चला आता रहे।

रामजनम के घर के बाहर जैसी भी गंदगी रही हो, लेकिन भीतर उसका घर, पूरी तरह रंगा पुता और साफ था। उसके इस घर में भी, वैसी ही छोटी सी एक कोठरी और बाहर वैसा ही छोटा खुला बरामदा था। यहाँ भी, बरामदे को उन लोगों ने, अपनी रसोई के मसरफ ले रखा था। बरामदे में अंगीठी में कोयला दहक रहा था और उसके पास एक मोढ़ा रखा हुआ था। उनके आने के पहले, रामजनम का इंतजार करती, उसकी बीबी, अंगीठी की आग तापती बैठी हुई थी। बाहर काफी ठंड थी लेकिन बरामदा, अंगीठी की दहकती आग से, गरम था। आओ मेरे दोस्त, हम लोग चलकर भीतर बैठते है। रामजनम उसकी पीठ पर हाथ रख, बड़े आग्रह से उसे अपनी कोठरी में ले आया था।

छोटी सी उसकी कोठरी, काफी साफ सुथरी और सजी हुई थी। उनके सोने के लिए एक पलंग थी जिसके बिस्तरे पर साफ चद्दर बिछी हुई थी। रामजनम उसे विस्तरे पर बैठा, खुद उसकी बगल बैठ गया था।

थोड़ी देर में रामजनम की बीबी दो प्याली चाय, एक ट्रे में रखकर, कोठरी में पहुँचा आई थी। उनकी चाय खत्म होते होते वह, गरम गरम आमलेट, भुने मूंगफली के दाने, गिलास और दारू की एक बोतल, उनके पास रख आई थी।

मान गया मेरे दोस्त, तुम हो बड़े ऊँचे दर्जे के शिकारी। दारू की कुछ घूँट हलक के नीचे उतरने के बाद, उसके भीतर की तमाम झिझक और संकोच गायब होकर, कई बातें, जो उसके भीतर हलचल मचा रखी थी, वे उभरकर ऊपर आ गई थी। बड़े ऊँचे दर्जे के शिकारी हो मेरे दोस्त, मुझे तुमसे बड़ी ईर्ष्या हो रही है। उसकी बात से रामजनम समझ गया था कि दारू की नशा उस पर चढ़ गई है और उसी के सुरूर में वह ऐसी बात, जिसे उसे यहाँ नहीं करनी चाहिए, करने लगा है।

इस्सस ऽ ऽ, राम जनम अपने होंठ पर हाथ रख, बाहर बैठी अपनी बीबी की तरफ इशारा करके, उसे ऐसी बात यहाँ न करने के लिए मना कर दिया था।

मेरे दोस्त, वह सब कुछ तो ठीक है लेकिन एक बात मैं तुमसे पूँछू, तुम्हे बुरा तो नहीं लगेगा? रामजनम के मना करने पर वह कुछ देर मूंगफली के दाने चबाता और दारू की घूँटें भरता चुप मारे बैठा रहने के बाद, एक बड़ा ही अहम सवाल, जो उसे राम जनम की दोनों गृहस्थियाँ देखने के बाद, बुरी तरह परेशान कर रखी थी, उसके विषय में वह उससे जानना चाहा था। पूँछू, तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा मेरे दोस्त?

तुम मेरे दोस्त हो। तुम्हारी कोई भी बात मुझे बुरी नहीं लगेगी, बेझिझक होकर पूछो मेरे दोस्त, रामजनम, तुम्हें सब बतायेगा। इतनी देर में रामजनम पर भी दारू अपना असर कर चुकी थी और इसके चलते वह भी खुद पर अपना नियंत्रण खोने लग गया था।

तुम कुछ समय पहले हिंदू थे मेरे दोस्त और अब तुम मुसलमान हो, हो न? एकदम हूँ मेरे दोस्त और पूरी तरह हूँ।

इसका मतलब तुम एक ही समय में दो अलग-अलग तरह की और एक दूसरे के एकदम विपरीत जिंदगियाँ जीते हो। बोलो जीते हो ना?

हाँ जीता हूँ।

ऐसे में, एक बात जो मेरी समझ में नहीं आयी वह यह है कि, तुम अपनी इन दोनों जिन्दगियों के साथ तालमेल कैसे बिठाते हो?

सच कहूँ मेरे दोस्त, तो मुझे अपनी दोनों जिन्दगियों में तालमेल बिठाने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ती। थोड़ी देर सोचने के बाद, रामजनम हॅसते हुए उसे जबाब दिया था।

अच्छा? वह कैसे?

वह इस तरह कि जब मैं रामजनम होता हूं तो मन्दिर जाता हूँ पूजा पाठ करता हूँ, होली दशहरा और दीवाली ठीक वैसे ही मानता हूँ जैसा एक हिन्दू मनाता है और जब मैं रमजानी होता हूँ तो मस्जिद जाता हूँ नमाज पढ़ता हूँ, ईद, बकरीद मानता हूँ, और वैसा ही मैं, अपनी दोनों बीबियों के साथ भी निभाता हूँ।

कमाल है...... आश्चर्य से उसकी आँखे थोड़ी देर तक फैली रही थी और फिर एक बड़ी गहरी शरारत, उसके चेहरे पर तिर आई थी। कर लेते होंगे मेरे दोस्त, जरूर कर लेते होंगे क्योंकि बनने की कला में तुम बड़े ऊँचे दर्जे के कलाकार जो ठहरें। उसकी यह कटूक्ति और उसके कहने का अंदाज काफी चुभने वाला था और वह रामजनम को चुभा भी था लेकिन अपने स्वभाव के अनुरूप, राम जनम उसकी इस कटूक्ति को कोई तवज्जो नहीं दिया था, और उसे हंसकर उड़ा दिया था।

इसके बाद दोनों में कोई बात नहीं हुई थी, जिसकी भी गिलास की दारू खत्म होती, दूसरा, बोतल से उड़ेलकर कर उसे भर देता और इस तरह दोनों दारू की चुस्कियाँ लेते बड़ी देर तक शराब पीते बैठे रहे थे।

मीट पककर तैयार हो गया था तो रामजनम की बीबी, अंगीठी के पास चटाई डाल, दोनों को खाने पर बैठा, खुद रोटियाँ सेंकने बैठ गई थी और तवे से गरम गरम रोटियाँ उतारकर उनकी थालियों में परोस-परोस कर उन्हें खिलाने लग गई थी। उसने गोश्त बड़ा लजीज बनाया हुआ था, और वह और रामजनम, दोनों उसे, बड़े आग्रह और सत्कार से, ज्यादा से ज्यादा खिला देने पर जुटे हुए थे। लेकिन रामजनम की, अब तक की, जिन कारगुजारियों से वह रूबरू हो चुका था, उसे लेकर, उसकी तरफ से, उसका मन, किसी बड़े षंड़यंत्र की आशंका से घिरा हुआ था। हालांकि दिखाने के लिए वह, रामजनम से बड़ा हंस हंसकर बातें कर रहा था और खाने की तारीफ कर करके, बड़ा चटखारे ले लेकर खाना भी खा रहा था, लेकिन उसकी चोर नजरें, रामजनम और उसकी बीबी के चेहरों और हाव भाव से लेकर, उसके घर के कोने-कोने में छुपे, संभावित खतरों की टोह लेने में जुटी हुई थी। इस आदमी से मेरी, महज कुछ घंटों की मुलाकात है और वह भी चलती ट्रेन के डिब्बे में। ऐसी मुलाकाते लोग याद रखने तक की जहमत नहीं करते। सफर खत्म हुआ और वे उसे भूल जाते हैं लेकिन यह शख्स, मेरे साथ ऐसा गुड़ चिउँटा हो रहा है जैसे, इसकी और मेरी जन्मों की दोस्ती रही हों। और इसकी बीबी, यह साली तो उससे भी ज्यादा, छँटीं हुई लगती है। इस तरह हंस हंस कर मुझे खिला रही है-जैसे मैं इसका कोई पुराना यार होऊँ। इन दोनों के मन में जरूर कोई बड़ी खोट है नहीं तो भला, किसी अनजान और अपरिचित की, कोई इतनी आवभगत कभी करता है क्या?

खाना पीना खत्म होते होते तक काफी रात बीत चुकी थी। रसोई का सारा काम समेट कर अपना हाथ सेंकने के लिए, रामजनम की बीबी अंगीठी के पास आकर बैठी थी तो, राम जनम ने उससे कहा था, ऐसा है बेगम कि रात काफी हो चुकी है और ठंड भी आज बहुत ज्यादा है तुम ऐसा करो कि एक गोंदरी लाकर यहीं अंगीठी के पास डाल दोण्

खट...खट....खट... घर के बाहरी दरवाजे की साँकल के बजने की आवाज थी यह। आवाज कान में पड़ते ही वह घबराकर विस्तरे पर बैठ गया था। रात के इस पहर में, और बजाने वाले ने, जिस दबे हाथ और आहिस्ती आवाज में, साँकल खटखटाया था उसे सुन, डर से उसका कलेजा मुंह को आने लग गया था।

खट्ट, खट्ट, खट्ट इस दफा, सांकल के बजने की आवाज ज्यादा वजनी थी और बजाने वाले ने सांकल बजाने के साथ सांसो के जोर से रामजनम को आवाज भी दिया था। रामजन्मा गे ए ऽ ऽ ऽ । दरवाजे की खटर खटर और पुकारने वाले की आवाज पर, रामजनम तो नहीं, लेकिन उसकी बीबी उठी थी और दबे पांव कोठरी से निकलकर, बाहरी दरवाजे की सिटकिनी खोल देखी थी तो बाहर उसे शंकर और राम अवतार खड़े मिले थे।

क्या हुआ, इतनी रात में? रामजनम की औरत, उन दोनों को अच्छी तरह जानती थी, दोनों रामजनम केधौरों की लाइन में रहते थे। वे, उसके अच्छे दोस्त थे और दोनों कोलियरी में काम भी करते थे।

रामजन्मा नहीं है क्या? राम औतार ने उससे पूछा था।

हैं तो..... लेकिन बात क्या है? यह जान कर कि रामजनम घर में ही है, वे दोनों बिना और रूके या उसे कुछ बताए, घर के अन्दर आ गए थे और अंगीठी की धधकती आंच में अपना हाथ सेकने लग गए थे।

रामजनम गहरी नींद में था। बीबी के काफी हिलाने, झकझोरने के बाद वह उठा था तो बीबी पर गुस्सा गया था। लेकिन राम औतार और शंकर पर नजर पड़ते ही उसका गुस्सा एकदम से ठंडा पड़ गया था। आज की रात उसे मुर्दा खोदने जाना था इसी के लिए वह, उन दोनों को बुलाया हुआ था लेकिन यह बात, उसके खुद के दिमाग से, पूरी तरह उतर ही गई थी।

चलना नहीं है क्या? राम औतार ने उससे पूछा था तो वह, झट उठकर खड़ा हो गया था। दिन में ही रामजनम, व्यापारी से मुर्दे के लिए पाँच हजार रूपए की पेशगी थाम चुका था। सुबह होने के पहले, उसे कब्र से मुर्दा निकालकर, उसके हवाले कर देना था। शर्त के हिसाब से बाकी के दस हजार उसे, काम पूरा होने के बाद मिलने को था। धंधे की बात है यह और धंधे में पैसा उतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि किसी को दी हुई बात पर कायम रहना और वादे के मुताबिक काम करके दे देना। व्यापारी को कल ही यहाँ से कूच भी कर जाना था इसलिए किसी भी हाल में, उसे यह काम आज ही निपटा देना था। अगर यह काम आज रात नहीं हो गया तो इससे न सिर्फ उसकी बतकटी होगी बल्कि उसकी साख को भी बट्टा लगेगा। रामजनम की, यही सबसे बड़ी खासियत है कि वह जितना किसी से वादा करता है उतना और ठीक वैसे ही उसे पूरा भी करता है। इसी के चलते मार्किट में उसकी अच्छी शाख है और उसकी इसी साख के चलते, उसे सब पूछते भी है वर्ना यह काम करने वाले तो यहाँ अनेकों घूम रहे हैं।

बिस्तरे पर अपना दम साधे बैठा वह, कोठरी के बाहर चलती खुसुर पुसुर पर, अपने कान लगाए, उन लोगों के भीतर क्या बात हो रही है उसे सुनने की कोशिश में जुटा हुआ था। लेकिन वे लोग इतने आहिस्ते और दबी जुबान मे बतिया रहे थे कि उन्हें सुन पाना मुश्किल था।

बिस्तरे पर बैठे बैठे, इन सालो का आसान शिकार बनने से तो अच्छा कि, इनसे भिड़कर अपनी जान बचाऊं सोचा था उसने। अगर इन लोगों ने मिलकर, मुझे कोठरी के भीतर दबोच लिया या बाहर से सांकल चढ़ाकर कोठरी में कैद कर दिया तो गुहार लगाने पर भी, कोई नहीं सुनेगा इसलिए यहाँ से भाग लेना ही अच्छा है, यही सोचकर वह बिस्तरे से उतरकर, जल्दी जल्दी अपने कपड़े पहना था और कोठरी के बाहर आकर खड़ा हो गया था।

उसे बाहर खड़ा देख, शंकर और राम औतार एकदम से सकड़ से गए थे। दोनों ने पहले तो एक दूसरे को सवालिया नजरों से देखा था फिर वे रामजनम की बीबी को देखने लग गए थे। रामजनम उस समय आंगन में एक किनारे खड़ा, गिलास के पानी से अपना मुह धो रहा था। मुँह धोकर, जब वह पीछे मुड़ा था तो उसे बरामदे में खड़ा देख, वह भी क्षण भर के लिए असहज हो उठा था। लेकिन तुरंत ही, खुद पर काबू करके, बड़े आत्मविश्वास के साथ, वह उसके पास आया था और उसके कंधे पर हाथ रख, हल्की झिड़की पिलाते हुए उससे कहा था, तुम क्यों उठ गये मेरे दोस्त, जाकर आराम से सोओ। दरअसल हम लोगों को अभी और इसी समय, एक बहुत ही जरूरी काम निपटाना है इसलिए हम लोग बाहर निकल रहे हैं। इसके बाद, उसकी अचानक की उपस्थिति से हैरान परेशान शंकर और राम औतार को उसने बताया था अरे घबराओ नहीं यह मेरा पुराना लंगोटिया है अपना बहुत ही गहरा दोस्त।

इतनी नियाई रात में और कड़ाके की इस ठंड में इन तीनों को, ऐसा कौन सा जरूरी काम आन पड़ा है जो इन्हें, अभी और इसी वक्त बाहर जाने की जरूरत पड़ गई? रामजनम की तुरंत बाहर निकलने की बात सुन, वह बुरी तरह घबरा उठा था और इतनी ठंड में भी उसे पसीने छूट गए थे। हीलते कांपते, वह राम जनम के पास आया था और बड़ा मिमियाते हुए उससे पूछा था, क्या मैं भी, तुम्हारे साथ नहीं चल सकता राम जनम?

अगर तुम चलना चाहो तो चल सकते हो मेरे दोस्त, लेकिन इतनी ठंड में तुम परेशान हो जाओगे।

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राम अवतार अपने साथ, दो बोतल दारू की ले आया था। चारों बैठकर, बिना किसी चिखना के, शराब की बोतल खाली किए थे और बाहर निकल पड़े थे। राम औतार के हाथ में एक फावड़ा और शंकर के हाथ में एक गैंता था। रामजनम छोटा सा सावेल, प्लास्टिक की बोरी, अपने एक हाथ में और दूसरे में छोटी टार्च ले रखा था। तीनों आगे आगे एक लाइन में चल रहे थे, सबसे पीछे वह था।

हम लोग कहाँ और क्या करने जा रहें हैं? बस्ती से निकलकर, चारों निचाट में पहुँचे थे तो उसने राम जनम से पूछा था। लेकिन रामजनम कुछ बताने की बजाय, इस्स की आवाज निकाल, उसे बोलने के लिए मना कर दिया था।

थोड़ी देर में चारों, एक निहायत ही वीरान जगह में पहुँचे थे। रामजनम, राम औतार और शंकर को काम पर लगाकर, उसे अपने साथ लिया था और दोनो एक चबूतरनुमा जगह पर जाकर बैठ गए थे। जहाँ वे बैठे थे, उससे थोड़ी ही दूर पर, राम औतार और शंकर भुकुर भुकुर कुछ खोद रहे थे लेकिन क्या खोद रहे थे, अंधेरे में, उसे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। जिस चबूतरे पर वह बैठा था, हाथ से टटोलकर, जगह का अंदाजा लगाया था, तो उसे लगा कि वह किसी कबर पर बैठा हुआ है, और कबर का ख्याल आते ही, वह डरकर, बगल बैठे रामजनम से एक दम से लिपट गया था। उसे लगा था कबर के भीतर गड़ा आदमी वहाँ से निकलकर, अपना कंकालनुमा पंजा, उसकी गर्दन पर रख दिया है। वह बड़े जोर से चीख पड़ता, यदि रामजनम उसे, अपनी बांह में भरकर, जोर से भींच नहीं लिया होता।

क्या हुआ मेरे दोस्त, तुम इतना डर क्यों गये? सांस के जोर से रामजनम, डांटते हुए उससे पूछा था।

हम लोग किसी की कबर पर बैठे हुए हैं क्या ?

हाँ यह कबर ही है।

वे लोग क्या खोद रहे हैं?

वे लोग, कबर खोद रहे हैं लेकिन इस समय हमें कुछ बोलना नहीं है हमारी जान काफी खतरे में हैं। रामजनम की हिदायत पर एकदम से चुप्पी साध लिया था उसने।

काम हो गया बास। कबर खोदकर, उसका मुर्दा बाहर निकाल लेने के बाद राम औतार, उसके पास आकर, बड़ा फुसफुसाते हुए उसे बताया था।

इतनी जल्दी?

उसकी बात सुन, रामजनम के मन में गहरी शंका उठ खड़ी हुई थी। इतनी जल्दी इन दोनों ने, कबर खोद कैसे लिया? इत्मीनान करने के लिए वह, कबर के पास जाकर टार्च की रोशनी में मुर्दे को देखा था तो उसे सारी गड़बड़ समझ में आ गई थी। दरअसल, दिन की रोशनी में, वे लोग जिस कबर को खोदना तय किये थे, नशे में धुत्त होने की वजह से, दोनो उसे न खोदकर, बगल की एक ताजा तरीन कबर, जिसमें कल ही मुर्दा दफन किया गया था, उसे खोदकर, उसका मुर्दा बाहर निकाल लिये थे।

यह क्या कर दिया तुम दोनो ने? साबुत और ताजा मुर्दा देख रामजनम बुरी तरह झल्ला उठा था।

हाँ बास, यह तो बहुत बड़ा भूल हो गिया, दरअसल झोंक में कुछ पता ही नहीं चला। शंकर बड़ा गिड़गिड़ाते हुए राम जनम से अफसोस प्रकट किया था।

अच्छा छोड़ उसे, चल इसे खोदते हैं, कल उसे देने का वादा कर लिये हैं। नहीं मिलने पर वह गुस्सा करेगा, इसके बाद वे तीनों, बगल की एक काफी पुरानी कबर खोदने में जुट गये थे।

साबुत मुर्दे को कबर के भीतर, वापस दफनाने में काफी वक्त लगता और ज्यादा देर तक वहाँ रूकने में काफी जोखिम भी था, इसलिए रामजनम, पुरानी कबर का कंकाल, बोरी में भरकर अपने कंधे पर लादा था, और राम औतार और शंकर साबुत मुर्दे को, अपने कंधों पर लाद, चल पड़े थे। थोड़ी देर चलने के बाद, चारों एक छोटी पुलिया के पास पहुंच कर रूक गए थे। रामजनम कुछ बोला नहीं था। इशारे से उन दोनों को आगे बढ़ने के लिए कहकर, टार्च की रोशनी फेंक, उनका रास्ता दिखाने लग गया था। पुलिया के नीचे से, एक जोहड़ बहता था। ताजा मुर्दे को कंधे पर लादे लादे रामऔवतार और शंकर पुलिया के नीचे गये थे और मुर्दे को पानी में उतार, दो, तीन बड़े पत्थरों से उसे दबाकर, रामजनम के पास वापस आ गये थे।

ठीक से दबा दिया है न?

हाँ दबा दिया बास।

लेकिन रामजनम को, उनकी बात का भरोसा नहीं हुआ था। वह खुद जोहड़ के पास जाकर, टार्च की रोशनी में पानी में दबे मुर्दे को देखा था और मुर्दा ठीक से दबाकर रखा गया है इस बात का इत्मीनान हो लेने के बाद वापस आ गया था।

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शंकर और राम औतार को, वहीं से विदा करके, रामजनम, बोरी का कंकाल अपने कंधे पर लाद, चल पड़ा था। थोड़ी देर चलने के बाद, फुटुस का एक छोटा जंगल पड़ा था। जंगल पार करने के बाद, एक बंगला आया था। बंगला, बड़ी एकान्त और सुनसान जगह में था लेकिन वह काफी विशाल था और उसके चारों तरफ काफी लंबी और ऊँची बाउण्ड्री थी और बाउण्ड्री पर, चारों तरफ वैपर लाइटें दगदगा रही थीं।

जैसे ही वे दोनों, बंगले के गेट पर पहुँचे थे, भीतर से दो अल्सेसियन कुत्ते शेरों की तरह दहाड़ते, गेट की तरफ दौड़ पड़े थे। कुत्तों के गेट पर पहुँचने के थोड़ी ही देर बाद, एक आदमी हाथ में राइफल लिये, गेट पर आया था। वह खुद को सिर से लेकर पाँव तक, मोटे ऊनी कम्बल से ढाप रखा था लेकिन चेहरा उसका खुला हुआ था। उसका चेहरा बाघ की तरह बड़ा था और उसी की तरह खूँखार भी था।

यह कौन है? राम जनम के साथ, दूसरे आदमी को खड़ा देख, गुर्राती आवाज में उसने उससे पूॅछा था।

य य....... यह मेरा दोस्त है हुजूर, उसके पूछने पर रामजनम बुरी तरह सिकुड सा गया था। अपनी सफाई में, करीब करीब हकलाते हुए उसने उसे बताया था, इस बेवकूफ को मैं अपने साथ आने से मना किया था हुजूर, लेकिन यह नहीं माना।

हऊ ऊम ऽ ऽ ऽ रामजनम को, इस तरह की गलती दोबारा नहीं करने के लिए, वह उस पर गुर्राकर, रूपयों की एक गड्डी, उसकी तरफ उछाल, वापस लौट गया था। रूपयों की गड्डी, हवा में फड़फड़ाती, रामजनम के ठीक सामने आकर गिरी थी। वह दौड़कर उसे जमीन से उठा लिया था और अपने माथे से लगा, बिना गिने ही अपनी भीतरी जेब में डाल, बोरी का कंकाल वहीं गेट पर छोड़, अपने घर आ गया था।

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रामजनम के साथ, वह जिस डरावनी और हैरत अंगेज दुनिया से गुजर कर वापस लौटा था, उसे लेकर उसका दिमाग उड़ सा गया था। घर पहुँचकर रामजनम तो, पहले की तरह ही बरामदे के अपने बिस्तरे पर लेट गया था और थोड़ी ही देर में खर्राटे भरने लग गया था, लेकिन वह, बदहवास सा, अपनी आँखे फाड़े, चारों तरफ ताकता बिस्तरे पर बैठा रहा था।

सुबह पता नहीं वह और कितनी देर सोया रहता, यदि राम जनम के दरवाजे के पिटने की आवाज से, उसकी नींद, टूट न गई होती। दर असल हुआ यह था कि रात में वे लोग, जिस आदमी की ताजी, लाश, कबर से खोद लाए थे, उसके घर वाले सुबह, जब अगरबत्ती जलाने और फूल चढ़ने के लिए, कबर पर पहुंचे थे तो यह देख कर हैरान रह गए थे कि उनकी कबर न सिर्फ खुदी हुई है बल्कि उसमें दफनाई लाश भी नदारद है। और जब लोगों ने देखा कि उस कबर से सटी, एक दूसरी काफी पुरानी कबर, और भी खुदी हुई है और उसका भी कंकाल नदारत है, तो उन्हें यह समझते देर नहीं लगी थी कि कोई आदमी, रात में कबर खोद कर, उसमें दफन उनके अजीज की लाश निकाल ले गया है।

कबर में दफन आदमी, यदि जिंदा रहते, कही भाग परा गया होता या नदी तालाब में कूद कर, अपनी जान दे दिया होता तो शायद, इस घटना से, उसके घर वालों के दिल को उतना आघात नहीं पहुंचता, जितना आघात उन्हे, कबर के खुदने और उसमे से उनके अजीज की लाश निकाल लिए जाने से पहुंचा था। उन्हे लगा था जैसे कि खोदने वाला, कबर खोदकर, उनके अजीज की लाश नहीं उठा ले गया है बल्कि, जिस अभेद्य और स्थाई दुर्ग में वे उसे, पृथ्वी के रहने तक, निश्चिंत और सुरक्षित रहने के लिए, पहुंचा आए थे उसे ढहाकर, उसने उसे दरबदर करके हमेशा-हमेशा के लिए भटकने के लिए छोड़ दिया है। अपने अजीज की दुर्गति का यह खयाल, उन्हे बुरी तरह परेशान करके रख दिया था। इसे लेकर जहाँ एक तरफ लोग गहरे सदमे में थे वही दूसरी तरफ वे बुरी तरह उत्तेजित थे और उनमें गहरा रोष था।

घर के लोग, कबरिस्तान से लौटकर, इस हौलनाक घटना की जानकारी किसी को देते, इसके पहले ही यह खबर उड़कर उनकी बस्ती में पहुँच गई थी। और इसके बाद, इस तरह की तमाम खबरों के मिलने पर जैसा होता है वैसा ही सब कुछ, इस खबर के बस्ती में पहुंचने के बाद भी हुआ था। खबर सुनकर पहले तो लोगो को जैसे हजार वोल्ट के करेंट का झटका सा लगा था और जो जहाँ और जिस हाल में था एक दम से सुन्न रह गया था कुछ इस तरह, जैसे उनकी शरीर की सारी चेतना ही खींच ली गई हो। अपनी इस हाल से, किसी तरह उबर कर, जब लोग, अपनी चेतना में लौटे थे तो, उनके सिर पर, अजीब तरह का पागलपन सवार हो गया था और वे हा हा करते, अपने घरों से निकल कर, जिस घर के आदमी की लाश गायब हुई थी, उसके घर की तरफ दौड़ पड़े थे। और देखते ही देखते उस घर के दरवाजे पर, लोगो की भारी भीड़ जमा हो गई थी। यह एक ऐसी भीड़ थी जो, पहले से ही बुरी स्तब्ध, उत्तेजित और गुस्से से भरी हुई थी। लेकिन जब वहां मौजूद कुछ शातिर दिमाग लोग इस घटना को, उनके अस्तित्व और अस्मिता का सवाल बताकर, उन्हें ललकारना शुरू कर दिए थे तो फिर भीड़, अपना आपा खो बैठी थी और अररते घहरते, रेल रोकने, रोड़ जाम करने और बसे तोड़ने, जलाने के लिए बस्ती से निकल कर सड़कों पर आ गई थी।

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धाड़, धाड़, धाड़ राम जनम के घर के दरवाजे के पिटने की आवाज थी यह। आवाज इतनी तेज और कर्कश थी कि गहरी नींद में होने पर भी उसे लगा था जैसे कोई उसके कान के पास नगाड़ा पीट रहा है। इसे सुनकर उसकी नींद टूट गई थी और वह हड़बड़ाकर बिस्तरे पर बैठ गया था।

अरे कुछ सुना तैने? दरवाजा भड़भड़ाकर खुला था तो कोई दौड़कर भीतर आया था और घबराई आवाज में राम जनम से पूछा था।

क्या हुआ तू इतना घबराया क्यों है?

चारो तरफ बहुत बड़ा हंगामा मचा हुआ है। पुलिस जगह-जगह छापा मारी करके, लोगो की धर पकड़ कर रही है, कही वह इधिर......। राम औतार था यह जो घबराया, राम जनम को यह बुरी खबर सुना रहा था।

बे हू ऊ ऊ दा आ ऽ ऽ कही वह आ ऽ ऽ, बस इतनी सी बात के लिए तू सबेरे-सबेरे, मेरी नींद हराम करने पहुंच गया ऽ ऽ। नींद में खलल पड़ने से राम जनम, राम औतार पर बुरी तरह झल्ला उठा था। पुलिस छापा मारती है तो मारने दे इसमे इतना घबराने का क्या है?

लेकिन चारों तरफ मचे हंगामे और पुलिस की छापा मारी की खबर सुन, इतनी ठंड़ में भी वह पसीने पसीने हो उठा था। इसके बाद कोठरी में उसका रूका रहना मुश्किल हो गया था और वह वहाँ से भागकर बरामदे में आकर खड़ा हो गया था। राम जनम, राम औतार को जिस बुरी तरह डाँट रहा था उसे देख कर वह भौचक था। इन लोगो ने इतना बड़ा कांड़ कर दिया है और इसे लेकर, सारे शहर मे, हंगामा मचा हुआ है और पुलिस चारो तरफ छापामारी करके लोगो की धर पकड़ कर रही है लेकिन इस शख्स को न तो अपने किए का कोई पश्चाताप है और न ही पुलिस या और किसी की जरा सी डर ही है।

राम जनम से डांट खाकर, राम औतार वहाँ से चला गया था तो वह बड़ा डरते डरते, राम जनम की बगल आकर बैठ गया था और उसका कंधा पकड़, बडी घिघियानी आवाज में उससे पूछा था, राम जनम मेरे दोस्त, मै अपने घर सुरक्षित पहुंच जाऊँगा तो?

तुम एकदम निश्चिंत रहो मेरे दोस्त, इसमे न तो तुम्हें कुछ होगा, न ही मुझे, और न ही किसी और को। तुम एकदम सकुशल और खुशी-खुशी, अपने घर पहुंचोगे। जब तक राम जनम है तुम्हें जरा सा भी ड़रने की जरूरत नहीं है-- अंय।

लेकिन राम जनम तुम यह बात, इतने दावे के साथ कैसे कह रहे हो। कहीं तुम मुझे छल तो नहीं रहे हो? बड़ा अधीर हो वह मिमियाकर, राम जनम के सामने, अपना चेहरा रोप दिया था।

इतने दावे के साथ, ऐसा मै इसलिए कह रहा हूं मेरे दोस्त, कि अगर यह बात राम जनम की होती तो पुलिस मेरे घर कब की पहुंच चुकी होती। लेकिन जिन लोगो ने इसे करवाया है न, वे बड़ी ऊंची पहुंच वाले आदमी है इसलिए पुलिस या और कोई हम लोगों पर हाथ, कभी नहीं डालेगा। राम जनम जितने विश्वास और निडरता के साथ, उसकी पीठ थपथपाकर उससे यह बात कहा था उससे उसे बड़ी आश्वस्ति और सुकून मिला था।

नित्यक्रिया से निपटने के बाद, हाथ मुंह धोकर, जब राम जनम और वह, धधकती अंगीठी के पास मूढ़े ड़ाल, चाय पीने बैठे थे तो एक बात, जो उसे लगातार मथे डाल रही थी, उसे उसने राम जनम से पूछ लिया था। राम जनम, तुम लोगो ने कबर से मुर्दा उखाडने के बाद उसे जोहड के पानी में क्यों दबा दिया था?

दर असल वह मुर्दा ताजा था। व्यापारी को सिर्फ कंकाल की जरूरत होती है इसलिए उसे सड़ने के लिए, हम लोगो ने वहां दबा दिया है। जब वह पूरी तरह सड़ जाएगा तो उसे निकाल धोकर हम लोग साफ कर लेंगे और उसका कंकाल व्यापारी को सौंप देंगे।

व्यापारी को ओ ऽ ऽ?

हाॅ आँ ऽ ऽ ऽ।

इसका मतलब तुम लोग यह काम व्यापार की तौर पर करते हो?

हाॅ आ ऽ ऽ ऽ।

लेकिन व्यापार के लिए तो काफी कंकाल की जरूरत होती होगी। तुम लोगों को इतना कंकाल भला मिलता कहाँ से है यही कबर खोद कर?

नहीं यार, कंकालों की जितनी डिमांड है अगर हम लोग उसे, कबरें खोद कर पूरी करने लगें, तो सारी कबरें, मुर्दों से खाली हो जाऐगी। दर असल अस्पतालों और सड़कों से हमे, बडी तादात में लावारिस मुर्दे मिल जाते हैं। हम लोग सड़ने के लिए उन्हें पानी में दबा देते है। जब वे पूरी तरह सड़ जाते है तो उन्हें निकिया धोकर साफ कर लेते है। हाँ, कभी कभार, कंकालों की मांग जब बहुत बढ़ जाती है और लावारिस मुर्दों से, उसे, पूरी करना मुश्किल हो जाता है तो, उस सूरत में हम लोग कबरें खोदकर उसे पूरा करते है।

लेकिन राम जनम, तुम इतना घटिया और नीच काम, भला करते ही क्यो हो?

राम जनम उसकी इस बात पर बड़े जोर से हँसा था और देर तक हँसता रहा था। इस काम को तुम घटिया और नीच कैसे कहते हो मेरे दोस्त?

यह काम घटिया नहीं है राम जनम? जैसा बेहिचक होकर और जिस दृढ़ता के साथ रामजनम उससे यह बात कहा था उसे सुनकर उसे बड़ी हैरानी हुई थी। कतई नहीं.....। देखो मेरे दोस्त, मेरे खयाल से, घटिया और नीच, वह काम होता है जिससे किसी का नुकसान होता हो या किसी का कुछ बिगड़ता हो। मेरा अपना असूल है कि मै अगर अपने हाथ से, किसी का कुछ भला नहीं कर सका तो उसका बुरा तो कतई नहीं करूँगा। किसी का बुरा करना ही मैं घटिया काम समझता हूँ।

लेकिन तुम्हारा यह काम भी तो बुरा ही है राम जनम, किसी मुर्दे को पानी में सड़ाना और फिर उसे निकिया धो कर उसका कंकाल बेचना.....छिः।

इसमें ऐसा बुरा क्या है मेरे दोस्त, मुझे तो इसमे कोई बुराई नहीं दिखती। और अगर, यह बुरा है भी तो वह, सिर्फ तुम्हारे मन के भीतर है। तुम्हीं बताओ, मेरे ऐसा करने से, कहाँ किसी का कोई बुरा होता है। अरे मुर्दा तो मुर्दा, वह हर हाल में मुर्दा है। मुर्दे को गाड़ दो, जला दो उसे बाहर चील कौओं के खाने के लिए छोड़ दो या सड़ाकर उसका कंकाल बेच दो, इससे कहीं किसी का, कोई नुकसान हुआ क्या?

चाय के दो तीन घूँट, हलक के नीचे उतारने के बाद ही, वह मुर्दे की बाबत, राम जनम से पूछ लिया था। इसके पहले वह, यह सोचकर अपने मन को तसल्ली दे लिया था कि जाने दो साले को, मुझे कौन इसके घर की बगल छान्ही ड़लना है या इसके साथ रिश्तेदारी जोड़ना है कि उसकी इन घिनौनी कततूतों की सोच-सोच कर, हलाकान होता रहूँ। वह तो मेरे सामने ऐसे हालत पैदा हो गए थे कि मुझे, इसके घर आना पड़ गया नहीं तो, ऐसे अधम के घर मैं आता कभी? जो करता है करे साला, मुझे इससे क्या लेना देना। अब तो बस नाश्ता करना है मिले तो दो कौर खाकर, अपने घर का रास्ता पकड़ लेना है। लेकिन जब राम जनम उसे यह बताया था कि वह, मुर्दों को सड़ाने और उन्हें निकिया धोकर, उसके कंकाल बेचने जैसा अधम और घिनौना काम करता है तो इसे सुनकर, उसके प्रति उसका मन घृणा से भर गया था और वह जल्दी से जल्दी उसके घर से निकल भागने के लिए उतावला हो उठा था।

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सोमेश शेखर चन्द्र

आर ए मिश्र,

2284/4 शास्त्री नगर,

सुलतानपुर,

उप्र 228001

हे राम

एक बार फिर

गाँधी जी खामोश थे

सत्‍य और अहिंसा के प्रणेता

की जन्‍मस्‍थली ही

सांप्रदायिकता की हिंसा में

धू-धू जल रही थी

क्‍या इसी दिन के लिए

हिन्‍दुस्‍तान व पाक के बंटवारे को

जी पर पत्‍थर रखकर स्‍वीकारा था!

अचानक उन्‍हें लगा

किसी ने उनकी आत्‍मा

को ही छलनी कर दिया

उन्‍होंने ‘हे राम' कहना चाहा

पर तभी उन्‍मादियों की एक भीड़

उन्‍हें रौंदती चली गई।

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कृष्‍ण कुमार यादव

भारतीय डाक सेवाएं

वरिष्‍ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्‍डल, कानपुर-208001

kkyadav.y@rediffmail.com

कृष्ण कुमार यादव की अन्य रचनाएँ पढ़ें उनके ब्लॉग पर:

http://www.kkyadav.blogspot.com

 

पाखी के दिसम्बर 2008 अंक में श्री रत्नकुमार साम्भरिया का एक लेख पूस की रात और प्रेमचंद की अज्ञानता प्रकाशित हुआ है। उसी संदर्भ में मेरा ये आलेख है।

पूस की रात कहानी के माध्यम से रत्न कुमार सांभरिया द्वारा प्रेमचंद का बुद्वि-परीक्षण करना, निष्कर्ष स्वरुप उन्हें अज्ञान कथाकार घोषित करना तथा स्वयं की सर्वज्ञता प्रकट करना बहुत अच्छा लगा। जो लोग प्रेमचंद को महान कथाकार और उपन्यास सम्राट के नाम से जानते हैं इस लेख को पढ़कर उनकी आंखें जरुर खुल चुकी होगी कि प्रेमचंद इतने अज्ञान कथाकार थे जो ऋतुओं का चक्र भी नहीं जानते थे। लेकिन लगता है सम्पादक महोदय लेखक के विचारों से सहमत नहीं हैं। प्रकाशित लेख के पूर्व ही उन्होने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर दिया है। प्रेमचंद को हिंदी साहित्य का महान लेखक ही नहीं माना बल्कि उन्हे विश्व के सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों के समकक्ष खड़ा कर दिया है।

लेख के शीर्षक मा़त्र को पढ़कर कोई भी अनुमान लगा सकता है कि ये कितना विद्वेषतापूर्ण है। कहानी की कुछ तथ्यगत त्रुटियों को अज्ञानता कहना कहां की बुद्विमानी है। हंस के नियमित स्तंभ अक्षरशः में अभिनव ओझा विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं की त्रुटियों को व्यंग्यात्मक रुप से इंगित करते हैं तो क्या वे सभी रचनाकार अज्ञानी हैं। एक कहानी की आलोचना के माघ्यम से प्रेमचंद के सारे साहित्य को कठघरे में खड़ा कर दिया है। शीर्षक आधार पर ही लेख का विस्तार होता तो ज्यादा सार्थक होता। दो पन्नों के लेख में आपने प्रेमचंद का विशद विवेचन कर डाला।

लेखक का यह कहना कि कहानी में कर्तव्यच्युत का संदेश है ,ये संदेश सही मायने में नहीं गलत मायने में हैं। दिन रात मर खपकर काम करने के बाद जो कुछ प्राप्त हो उसे सेठ-साहूकार ले जायें और खुद भूखों मरते रहें, उस खेती को करने से आखिर लाभ ही क्या है। मरे हुए बच्चे को कब तक सीने से चिपकायें रखें। क्या किसान का कर्त्तव्य मात्र खेती करना ही है, व्यवसाय@रोजगार परिवर्तन का उसे अघिकार नहीं हैं। कहानीकार का तर्क ये है कि अनुत्पादक कृषि कार्य की अपेक्षा मजदूरी अधिक लाभप्रद है। क्या मजदूरी करना अकर्मण्यता है। जिन परिस्थितियों का कहानी में चित्रण हुआ है उनमें किसान के पास एकमात्र रास्ता बचता है - आत्महत्या का। लेकिन प्रेमचंद ने कहानी में इस विचार को कहीं भी स्थान नहीं दिया है। क्या आज कर्ज के बोझ के मारे सैकडों किसान आत्महत्या नहीं कर रहे हैं। क्या गांवो से ‘शहरों की ओर पलायन नहीं हो रहा हैं। आज भी वही परिस्थितियां हैं जो कहानी लेखन के समय थी। इसलिए कहानी ओर भी सार्थक हो जाती है।

लेखक का दूसरा आरोप कि प्रेमचंद ताजिंदगी वैचारिक अस्थिरता की धुरी पर घूमते रहे। रंगभूमि उपन्यास जो लेखक के अनुसार किसानों अकर्मण्यता की सीख देता है ,पूरी तरह गांधी को समर्पित है। क्या नायक अंधा सूरदास महात्मा गांधी का प्रतिनिधित्व नहीं करता । प्रेमचंद ने कितनी कहानियां देश प्रेम और देश भक्ति से ओत-प्रोत लिखी। प्रेमचंद ने कभी कृषि कार्य का बहिष्कार नहीं किया। अपितु उस समय के ग्रामीण अंचल की वास्तविकता को हमारे सामने रखा , जिससे हम जान पायें कि हमारे गांवों का सामाजिक ताना बाना कैसा था।

प्रेमचंद को मानसिक रुप से अंग्रेजों के पक्ष में खडा करना , एक साजिश के तहत उन्हे देशद्रोही साबित करना है। गांधी के साथी और अनुयायी होकर भी प्रेमचंद का जेल नहीं जाना , ये तर्क नहीं कुतर्क हैं। जेल कोई टकसाल नहीं जहां देशभक्त सिक्कों की तरह ढाले जाते हो। या वहां किसी के सिर पर मोहर लग कर नहीं आती कि इसे हमने देशभक्ति का सर्टिफिकेट दे दिया है। और जो उस दौरान जेल गये क्या सभी देशभक्त थे। और ये जरुरी नहीं कि एक साहित्यकार राजनैतिक व सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहे। प्रेमचंद ही नहीं बहुत से साहित्कार जेल नहीं गये। इस आधार पर किसी का चरित्र- चित्रण करना कहां जक ठीक है।

प्रेमचंद के पास मेजेटिक भाषा और मुहावरेदार शैली थी , बिल्कुल सच है किंतु साथ ही सुगठित कथानक , सार्थक कथोपकथन और उचित देशकाल व वातावरण भी था। और अज्ञानता तो बिल्कुल ही नहीं थी। यदि कथ्य का अभाव होता तो गबन,गोदान, ‘शतरंत के खिलाडी आदि रचनाओं पर फिल्में नहीं बनतीं और न ही इतर भाषाओं में इनका अनुवाद होता।

नील गायें ईख की फसल को नष्ट भले ही न कर सके , मगर आग से नुकसान तो जरुर पहुंचता हैं। ये अनुभवजन्य सच है कि आग में जले गन्ने का रस किसी काम नहीं रह जाता। ग्वाला प्रेमचंद अपनी कलम रुपी लकड़ी की टो से साहित्य- मार्ग में पडे आप जैसे पत्थर-भाटों को ठेलता हुआ आगे बढ़ता हैं और बुलंदी तक पहुंचता है। शरद ऋतु के पश्चात् बसंत ऋतु का आगमन होता है , पतझड़ का नही ये बात सच है , मगर नीम अंधेरे में हाथ को हाथ दिखाई नहीं देता । क्या ये भी सच है । नीम का अर्थ क्या होता है । नीम का पेड़ या नीम हकीम का नीम यानी आधा हकीम , आधा अंधेरा। व्यक्ति अपरिचित राह में उजाले में भी नही चल सकता और परिचित मार्ग में गहन अंधकार में निर्विघ्न चल लेता है। जब गहन अंधेरे में खेत की रखवाली हो सकती है तो पत्तों का पहाड़ क्यूं नहीं बन सकता ।

कहानी में मात्र दो त्रुटियां ’लेखकीय चूक’ दृष्टिगोचर होती है । एक ईख की पकी फसल को नील गायें चौपट कर गई , दूसरी शीत ऋतु में पेडों से पत्ते गिर गये। मगर इन लेखकीय चूकों के उपरान्त भी कहानी की बोधगम्यता और नीहितार्थ में कोई अंतर नहीं पड़ता। कहानी प्रभावशली हैं और रहेगी।

प्रेमचंद कर कहानियों में सिर घुसा घुसा कर मीन- मेख निकालने वालों को अपनी कहानियों में गलतियां नजर नहीं आती। किसी व्यक्ति को अज्ञानता का तमगा पहनाने से पहले खुद के ज्ञान पर आश्वस्त हो जाना चाहिए।  जिन लेखकीय चूकों की ओर संकेत किया गया है वो वास्तव में इतनी प्रभावशाली गलतियां नहीं हैं जिनसे किसी लेखक के ज्ञान पर ही प्रश्न चिह्न लग जाएं। पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर यदि इस तरह से मीन- मेख निकाली जाएं तो दुनिया का कोई भी लेखक सुरक्षित नहीं है । बिपर सूदर एक कीनों ;‘शायद यहीं नाम था कहानी में जब आपने ब्राहमणों और चमारों को एक कर दिया जो कि भूत ,भविष्य और वर्तमान में नितान्त अकल्पनीय ,अविश्वसनीय और दुनिया का महानतम झूठ है तो किस मुंह से प्रेमचंद की कहानी कला पर सवालिया निशान लगाते है। प्रेमचंद ने तो अज्ञानता दर्शाई है , यह तो महामूर्खता है। और जिस पत्रिका में ये कहानी प्रकाशित हुई है , उसके संस्थापक भी प्रमचंद ही हैं ।

पूस की रात कहानी में नायक दलित है । इसलिए यह दलित खेमे चली जाती है और दलित साहित्यकार ये पचा नहीं पा रहा है कि किसी सवर्ण ने दलित कहानी क्यूं लिख दी। क्योंकि आज उन्हीं रचनाओं को दलित साहित्य माना जा रहा है जो दलित साहित्यकारों द्वारा लिखा जा रहा है।

आज प्रेमचंद की महानता उनकी रचनाओं के वैशिष्ट्य के कारण है बनिस्बत आलोचकों के रहमो-करम के। हिंदी में आज भी किसी व्यक्ति के साहित्य का प्रथम साक्षात्कार प्रेमचंद की रचनाओं के माध्यम से ही होता है । हिंदी कथा साहित्य में प्रेमचंद एक मील का पत्थर हैं।

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......................... पुरु मालव

मूल नाम-पुरुषोत्तम प्रसाद ढ़ोडरिया

शिक्षा-एम.ए.,बी.एड़,

सम्प्रति-शिक्षा विभाग राजस्थान में कार्यरत

पता-ग्राम व पोस्ट- दीगोद खालसा

तह. छीपाबड़ौद, जिला- बारां

पिन-325221 राजस्थान

मोबाईल-9928426490

100_9558 (WinCE)

मंगल करने वाली मां,

कहलाती है मंगला माँ !!

एक निवेदन करुँ मैं तुमसे

खड़ा हो कर दरबार में .

मुझ पर थोड़ी करना कृपा

खड़ा मैं भी कतार में .

मैं देश रहूँ , परदेश रहूँ ,

पर रहे तुम्हारा साथ माँ .

अनजान डगर पे बिन तेरे

रह जाऊंगा अनाथ माँ .

सबको सफल करने वाली

कहलाती सुसफला माँ !!

---- * ----

तू मंगला माँ कल्याणी

जगतमातु महारानी .

हर्ष का एक द्वीप तो दो

चहुदिशी पानी पानी .

---- * ----

माँ पर मुझे भरोसा है

और स्वयं पर है विश्वास .

एक दिन मुठ्ठी में होगा

सफलता का ये आकाश

---- * ----

बस इतनी कृपा करना माँ .

अपने चरणों में रखना माँ .

मेरे हृदय, मेरी आत्मा,

रोम-रोम में बसना माँ .

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1

जीवन है एक सतत धारा

चलना मानव की नियति है .

मोह के रेशमी शिविरों में

मत उलझाओ हृदय को .

माया के मादक गंध से

मत बहकाओ हृदय को .

पग-पग पर दस सहयात्री

मिलेंगे तुमको राहों में .

कितनों का चेहरा कैद करोगे

छोटी-सी निगाहों में ?

अतीत बिसार भविष्य देखना

वर्तमान की वही प्रगति है .

पल-पल जो निचोड़ के जीता

जीवन का वही रस लेता है .

स्मृति अरण्य वासी को

जीवन सर्प बन डस लेता है .

कहो गर्व से तुम मानव हो

इस जगत की तुम रौनक हो .

फिर अंधेरा अंतरतम क्यों

तुम तो दिवा के ऐनक हो .

तम को मन में बसने देना

स्वयं उर दीपक की क्षति है .

---- * ----

2

कदम-कदम पर है संग्राम

कब मेरे दिन फिरेंगे राम ?

किसको अपनी व्यथा सुनाऊँ ?

दर्द में भीगी कथा सुनाऊँ

कौन मेरा है, किसका मैं हूँ ?

हाथ-हाथ का सिक्का मैं हूँ .

मैं सागर एक फेन भरा हूँ

कल्प से ही बेचैन बड़ा हूँ .

ना जाने कब मिलेगा मेरी

उन्मत लहरों को विराम ?

कब मेरे दिन फिरेंगे राम ?

गम के गलियारे में मेरा

दर्दों का शीशमहल है .

छत पे जैसे छुरी चली हो

दीवारें बेचैन विकल हैं .

घाव के मुख के दरवाजे पे

टीस-अतिथि का दस्तक है .

झाड़ झंझाड़ आजू-बाजू

लहूलुहान मस्तक है .

काशी-काबा भाग्य में कहाँ ?

मेरा तो है यही दुःखधाम .

कब मेरे दिन फिरेंगे राम ?

कर्क है या मकर है ये ?

सीधी किरणों से दहकी

गुजरी हुई रेखाएँ बाजू

कोई नहीं मुझसे मिल पाया

मेरा दिल सबके लिये तड़पे

कोई नहीं मुझसा दिल पाया

त्रिभुज, चतुर्भुज या वृत्त

क्या है इस अस्तित्व का नाम ?

कब मेरे दिन फिरेंगे राम ?

3 ---- * ----

दिल ने खाए इतने धोखे,

अब कोई धोखा नया नहीं .

जख्मों का इलाज है लेकिन

टूटे दिल की दवा नहीं .

चाँदनी की गोद में था मैं

चाँद को लेकिन छुआ नहीं .

समंदर हैं मेरी आँखें

बरसातों का कुआँ नहीं .

जलता है तो सूरज भी

लेकिन उठता धुआँ नहीं .

क्या कहूँ मैं थानेदार से ?

क्या-क्या लूटा पता नहीं .

इश्क किया मैं खता है मेरी

जफाएँ तेरी खता नहीं .

---- * ----

4

गले में अपनी प्यास दबाए

जाम माँगते फिरते हैं .

ये दर ना तो अगला दर

काम माँगते फिरते हैं .

बडी अजीब है ये दुनिया

देना कुछ भी ना चाहे .

कल तक जो मेरे अपने थे,

आज बने हैं पराये .

दरवाजे पे दस्तक दी,

लेकिन खुली खिड़कियाँ .

मैंने कुछ कहा भी नहीं

उन्होंने दे दी झिड़कियाँ .

और नहीं कुछ अपने चीज का

दाम माँगते फिरते हैं .

गले में अपनी प्यास दबाए

जाम माँगते फिरते हैं .

आग ठंडी पड जाती है

लू के गर्म नजारों से .

सूरज चंदा की बात क्या

चुंधियाई आँखें तारों से .

बड़ी उम्मीद लिये सुबह से

शाम माँगते फिरते हैं .

गले में अपनी प्यास दबाए

जाम माँगते फिरते हैं .

---- * ----

5

साँस आती रही, साँस जाती रही .

धड़कनें मेरी शोर मचाती रही .

आओगे तुम, आओगे तुम

हर आहट ये उम्मीद बंधाती रही .

मैं रो रहा हूँ किस बेवफा के लिये ?

सोच-सोच मुझको हंसी आती रही .

मेरे ढलते आँसू बेनकाब हो गए

शमा शब भर चादर फैलाती रही .

मैं दबे होंठ से कुछ गाता रहा .

खामोशी उसे दोहराती रही .

किरणें आई वहाँ छुप गई रात

शबनम में जो नंगी नहाती रही .

---- * ----

6

जाने कैसे-कैसे लोग इस दुनिया में बसते हैं ?

दूजे की बेबसी पर दिल खोल कर हंसते हैं .

जिसको सिखाया हमने धनुष पकड़ने का हुनर,

चुप-चुप निशाना हम ही पे अब वो कसते हैं .

दिल का कोई ढूँढे इस शहर-ए-बेदिली में .

पैसों के प्यार यहाँ है दौलत के सब रिश्ते हैं .

फन से डसनेवालों से इतना डर नहीं सागर

जितना उन नागों से हैं जो पूँछ से डंसते हैं .

मरहम की साधी पट्टी रंगीली-सी हो जाती

जख्म-ए-जिंदगी हरदम सुर्खी ले कर रिसते हैं .

---- * ----

7

सागर का पानी क्या बोले

लहरों की जुबान समझ .

होंठ तो सबकुछ कह नहीं पाता

नजरों की जुबान समझ .

क्या बोल नहीं रही कुछ पायल

पैरों की जुबान समझ .

उसकी बेबसी नचा रही है

मुजरों की जुबान समझ .

मंजिल का पता इन में है .

ठोकरों की जुबान समझ .

पहाड़ में भी एक दिल है .

पत्थरों की जुबान समझ .

जीवन के शतरंजी दाँव में

मोहरों की जुबान समझ .

छोड गाँव में कूकना कोयल

शहरों की जुबान समझ .

---- * ----

8

जिसने हार न मानी है

धन्य वही जवानी है .

इतिहास के पन्नों पर

रहती है छाप अमर

जो न पीठ दिखाकर भागे,

झेले वार सीने पर.

हल्दी घाटी के रण में

जिसका बिस्तर सजता है .

रहते हैं बस मृत्यु अमर

जीवन तो बहता पानी है

जिसने हार न मानी है,

धन्य वही जवानी है .

---- * ----

9

काश !

मेरी तुमसे नजदीकियाँ बढती .

काश !

हम दोनों की बेबसियाँ बढती .

काश !

थोड़ी तेरी शैतानियाँ बढती .

काश !

थोड़ी मेरी नादानियाँ बढती .

काश !

ढलते हुए दिनों की बेचैनियाँ बढती .

काश !

पशेमाँ शब की परेशानियाँ बढती .

काश !

दिलों की पहल से पहेलियाँ बढती .

काश !

संगम पे दिलों की किश्तियाँ बढती .

काश !

शांत लहरों की मस्तियाँ बढती .

लेकिन सारे ’काश’ काश रह गये .

तुमसे दूर जा कर तेरे पास रह गये .

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10

इतनी हलचल

इतनी सिलवटें

मेरी रुह की चादर पे

क्यों ?

मेरा रोम-रोम

सिहर रहा है

आँखों के रंग-ए-गुलाबी में

तब्दिलियाँ आ रही है

क्यों ?

मेरे मन की खिड़कियाँ

फटाक-फटाक

खुल-बंद हो रही है .

क्यों ?

जवानी की जलती

हुई ज्योति

ज्वाला बनने पर तुली है

क्यों ?

मेरे अतीत के मखमल पे

कोई धप-धप काँप कर,

मेरी ओर बढ़ा आ रहा है

क्यों ?

. . . . . कहीं दिल के

किसी निर्जन टापू पर

अतीत के ताजमहल में दबा

कोई सपना

करवट तो नहीं बदल रहा ?

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11

मेरे कमरे में सूरज उतरा नहीं .

रोशनी सुरागों में एक कतरा नहीं .

दरीजे खोलूँ, या दर बंद करुँ ?

छुप रहा कमरे का अंधेरा नहीं .

अंधेरे से लड़ने जल रही बाती

दीपक में तेल का एक कतरा नहीं .

अंधेरे की बेड़ियाँ कसती गयीं

उजाला दो गज तक भी बिखरा नहीं .

झील पूछती है क्या माजरा

चाँद मेरे दर्पण में आज संवरा नहीं .

कुत्ते ने झुक कर उठाया मुर्गे को

सुबह तक वो क्यों जागा नहीं .

बार-बार दर अपना खोल रहा हूँ मैं

ये जान कर भी कि दस्तक कोई दे रहा नहीं .

तकिये की गर्मी कह रही है कि

शब भर वो सीने से हटा नहीं .

12

साक्षी मान कर तुम्हें विधाता

एक प्रण आज लेता हूँ .

टिका रहूँगा कर्तव्यों पर

डिगूंगा नहीं अपने पथ से .

अपने यौवन के पहियों को

लगा दूँगा प्राण लक्ष्य के रथ से .

सबकी तरह जग में आया

था मैं भी अकेला ही

आँख खोली तो पाया मैंने

रिश्तों का एक मेला भी .

पला, बढ़ा मैं इसी चमन में

आज इसका चहेता हूँ .

विस्मृत कैसे करुँ वो आँचल

जिस में कभी मैं खेला था ?

कैसे भूल जाऊँ जिनकी

उँगलियाँ पकड़ कर चला था .

ऋण है मुझ पर उस आँगन का

जिस पर दौड़ा करता था .

उन बागों का कर्जदार हूँ

तितली जहाँ पकड़ा करता था .

पतादोप तक संकल्पित मैं

किस मंच का अभिनेता हूँ ?

13

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साहित्यकार आस्था विश्वास,सामाजिक न्याय एवं दर्शन को सदियों से हस्तानान्तरित करते एवं समय के संवाद को शब्द का अमृतपान कराकर मानव कल्याण हेतु लिपिबध्द करते आ रहे है । साहित्यकार कभी भी अपनी भूमिका से नहीं विचलित हुआ है । वर्तमान पीढ़ी के साहित्यकार समाज एवं राष्ट्र को सच्चे एवं अच्छे विचारों से सुदृढ कर रहे हैं। वर्तमान समय में साहित्यकारों की भूमिका और विस्तृत हुई है । साहित्यकार राष्ट्र एवं समाजोपयोगी चिन्तन के मुद्दे अपनी रचनाओं के माध्यम से सहज ही उपलब्ध करवाते जो समाज सुदृढ में मील के पत्थर साबित होते हैं ।

साहित्यकार अपनी भूमिका पर तटस्थ है । आजादी के दिनों में साहित्यकारों ने जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका निभायी । साहित्यकारों की कलमें जातीय-धार्मिक उन्माद,श्रेष्ठता-निम्नता, गरीबी -अमीरी से उपजी सामाजिक पीड़ा के आक्रोश को कम करने के मुद्दे पर खूब चली है और आज भी थमी नहीं है । संकट के दौर में साहित्यकार समय की नब्ज को पहचान कर लेखन कर रहे हैं । साहित्यकार सर्वमंगलकारी विचार के इतिहास रचते हैं । साहित्यकार महज रचनाकार ही नहीं होता । वह सद्भावना सभ्यता संस्कृति लोककथाओं और नेक परम्पराओं को लिपिबद्ध कर हस्तान्तरित करता है। समाज राष्ट्र को दिशा निर्देशित करता है ।यही वजह है कि जनसामान्य साहित्यकार के व्यक्तित्व को उसकी रचनाओं में ढूंढता है जो साहित्यकार के तटस्थ भूमिका का द्योतक है ।

साहित्यकार वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध होता है । वैचारिक प्रतिबद्धता लेखकीय स्वतन्त्रता को बाधित नही करती है । यदि विचार कट्टरवादिता @ रूढिवादिता के शिकार हो जाते है तो लेखकीय स्वतन्त्रता पर प्रतिघात होता है । ऐसे विचार मानवता के प्रति न्याय नही कर पाते । साहित्यकार भी विवाद के घेरे में आ जाता है । साहित्यकार अपनी भूमिका के साथ न्याय करता है तो ऐसे विचार सभ्य समाज के बीच जरूर मान्य होंगे । यदि साहित्यकार अपनी भूमिका के प्रति प्रतिबद्ध है, उनके विचार कल्याणकारी है ,बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का मन्तव्य रखते हैं तो कबीर की भांति उसके विचार अवश्य प्रातः स्मरणीय होंगे ।

वर्तमान दौर साहित्यकारों के लिये संकट का समय है परन्तु वह संघर्षरत् रहकर भी सक्रीय है परन्तु कुछ सौभाग्यशाली साहित्यकारों को छोड़कर, दूसरे साहित्यकारों के विचार पाठकों तक नही पहुंच पा रहे है भला हो कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं को जो साहित्यकारों नवोदित साहित्यकारों को आक्सीजन दे रहे हैं । ये पत्र-पत्रिकायें भीं संकट के दौर से पीड़ित है अतः रचनाकारों को पारिश्रमिक देने में अस्मर्थ है ।हां हौशला जरूर बढा रहे है । हौसले और सम्भावनाओं के उड़नखटोले पर साहित्यकार अपनी भूमिका के प्रति तटस्थ है ,जबकि न तो रायल्टी का सहारा है और नही कोई सरकारी सहयोग । साहित्यकार जरूरतों में कटौती कर अथवा रीन-कर्ज करके किताब छपवाने की हिम्मत जुटा भी लेता है तो उसके लिये बाजार उपलब्ध नही हो पाती, क्योंकि वह पुस्तक बेचने का कार्य नही कर सकता । परिणाम स्वरूप किताबें सन्दूकों में बन्द होकर रह जाती है ।

आज चिन्तन का विषय है कि रचनायें @ कृतियां पाठकों तक पहुंचे कैसे । साहित्यकारों को चाहिये साहित्यिक संस्थाओं के माध्यम से स्वयंसेवी संस्थाओं का निर्माण कर सरकार से अनुदान प्राप्त कर पुस्तक प्रकाशन एवं विक्रय खुद करें । सरकार दूसरी अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं को अनुदान दे रहीं हैं ।साहित्यिक-स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद सरकार अनुदान दे कर कर सकती है। संकट के दौर से गुजर रहे साहित्यकारों एवं साहित्यिक संस्थाओं की मदद के लिये सरकार को आगे आना चाहिये । साहित्यकारों के संघर्ष को स्वीकार कर ,उचित मूल्यांकन कर और उचित सहयोग देने की जरूरत है । आज का पाठक जो किताबों से दूर जा रहे है, उन पाठकों को भी साहित्य के महायज्ञ में आहुति देनी होगी । दुनिया जानती है साहित्यिक एवं किताबी ज्ञान अन्य माध्यमों की तुलना में कही ज्यादा बेहतर और जीवनोपयोगी होता है ।

वर्तमान समय में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता के क्षेत्र में अच्छे साहित्य का सृजन हो रहा है । सामाजिक न्याय के क्षेत्र में दिये गये योगदान को प्रेमचन्द को कभी नहीं भुलाया जा सकता है । सामाजिक कुरीतियों और नारी शोषण पर आधारित उनकी रचनायें कर्तव्य बोध, समाज को जोड़ने एवं सद्भावनापूर्ण वातावरण निर्मित करने में अहम् भूमिका निभायी हैं । परिवर्तन तो वैचारिक क्रान्ति से आता है। वर्तमान दौर में अन्य साधनों की घुसपैठ की वजह से जनमानस किताबों से दूर होता जा रहा है । ऐसे दौर में आवश्यक हो गया है कि लेखकों के विचार उनकी रचनायें गांव एवं शहर तक के पाठकों तक पहुंचे और आवाम के बीच चर्चा का विषय बनेे। यथार्थ के धरातल पर भारतीय अस्मिता जो हमारे देश के धर्म आघ्यात्म, योग विज्ञान और साहित्य के रूप में विराजमान है वह दुनिया के लिये गर्व का विषय है । आज भी उम्मीदों का सोता सूखा नही है, रोजागरोन्मुखी शिक्षा @नैतिक शिक्षा ,सामाजिक समानता एवं न्याय,सामाजिक बुराईयों ,गरीबी उन्मूलन राष्ट्र हित, देश-जोड़ो आदि मुद्दों पर साहित्यकार कलम चलाने के लिये प्रतिबद्ध हैं । देश और समाज हित में यह जरूरी भी है परन्तु आज साहित्यकार संकट के दौर से गुजर रहे हैं। कब तक वे अपनी जरूरतों की होली जलाकर जहां रोशन करेगा। साहित्यकारों के बारे में भी सरकार को सोचना चाहिये। उनके हितार्थ कदम उठाने चाहिये। सरकारी तौर पर परिचय पत्र जारी करने चाहिये । उनके आवागमन के लिये न्यूनतम् दरों पर टिकट उपलब्ध कराया जाना चाहिये एवं अन्य आवश्यक सुविधायें भी । साहित्यकार की प्रतिबद्धता पर सरकार को ईमानदारी से विचार कर संरक्षण प्रदान करना चाहिये । पाठकों तक साहित्य आसानी से पहुंच सके इसके लिये भी मदद करना चाहिये । पाठकों तक जब ये साहित्य पहुंचेंगे तभी पहुंचेंगे तभी साहित्यकार को सुकून मिलेगा और ऐसी पूरी सम्भावना भी है । सच, अंधियारा चाहे जितना भी गहरा क्यों न हो वह सुबह तो जरूर आयेगी जब संकट के दौर खत्म होगे । गर्व की बात है कि साहित्यकार अपनी भूमिका जिम्मेदारी के साथ निभा रहे हैं, यही दायित्वबोध साहित्यकार को समय का पुत्र बनाता है ।

साहित्यकार के विचार रूके हुए नही होते समय के साथ आगे बढते रहते हैं। साहित्यकार का उद्देश्य होता है कि उसके लेखनकर्म से समाज एवं राष्ट्र का हित सधे ,सामाजिक बुराईयों के खिलाफ लामबन्द स्थिति बने । सामाजिक सद्भावना एवं समरसता का वातावरण निर्मित हो । साहित्यकार की प्रतिबध्ता ही उसके विचार की गतिशीलता का परिचायक है । बहुजन हिताय बहुजन सुखाय को केन्द्र बिन्दु में रखकर लेखन करने वाले साहित्यकार के विचार तो थमे नहीं हैं । सच्चे और अच्छे विचार समाज को दिशा देते हैं । सामाजिक स्तर पर साहित्यकार मूल्यों का सजग प्रहरी है। व्यक्ति के स्तर पर साहित्यकार पीड़ा सहने की शक्ति देता है और सम्भावनाओं के साथ जीने की ललक पैदा करता है । आतंक, शोषण,उत्पीड़न बर्बरता और बुराईयों के खिलाफ साहित्यकार की भूमिका और अधिक तटस्थ हो जाती है । यही तटस्थता लेखन को अमरता प्रदान करती है । वर्तमान समय में साहित्यकार मुश्किलों के दौर से गुजरते हुए भी अपनी भूमिका बड़ी जिम्मेदारी के साथ निभा रहे हैं । देखना है क्या सरकारें और आज के पाठक अपनी भूमिका जिम्मेदारी के साथ निभा पाते हैं ?

वक्त गवाह है साहित्यकार तटस्थ है अपनी भूमिका पर संकटकाल में भी । वह अपनी भूमिका को नैतिक दायित्व एवं कर्तव्यबोध की तराजू पर तौल कर सृजन कार्य कर रहा है क्योंकि वह भौतिकवाद,पाश्चात्य संस्कृति के कुप्रभाव और नैतिक मूल्यों में आ रही गिरावट से बेचैन है । वह नैतिक मूल्यों की पुर्नस्थापना के लिये व्यग्र है। वह समय के साथ सामंजस्य बिठाकर स्वामी विवेकानन्द के पद चिन्हों पर चलते हुए गर्जना कर रहा है। समाज एवं राष्ट्र के उत्थान के लिये ,युवाशक्ति को जागृत करने के लिये । बुराईयों पर कुठराघात करने के लिये । सद्भावनापूर्ण एवं सभ्य समाज के लिये । कर्तव्यबोध एवं नैतिक मूल्यों की पुर्नस्थापना के लिये । अमन शान्ति के लिये और सुरक्षित कल के लिये । यही वक्त की मांग है और वर्तमान समय में साहित्यकार की भूमिका भी ।

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नन्दलाल भारती

शिक्षा - एम.ए. । समाजशास्त्र । एल.एल.बी. । आनर्स ।

पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन ह्यूमन रिर्सोस डेवलपमेण्ट

 

जन्म स्थान- - ग्र्राम चौकी। खैरा। तह.लालगंज जिला-आजमगढ ।उ.प्र।

प्रकाशित पुस्तकें

म.पुस्तक प्रकाशन उपन्यास-अमानत ,निमाड की माटी मालवा की छाव।प्रतिनिधि काव्य संग्रह।

प्रतिनिधि लघुकथा संग्रह- काली मांटी एवं अन्य कविता, लघु कथा एवं कहानी संग्रह ।

उपन्यास दमन और अभिशाप- उखड़े पांव ।लघुकथासंग्रह।

अप्रकाशित पुस्तके उपन्यास-दमन,चांदी की हंसुली एवं अभिशाप, कहानी संग्रह- 2

काव्य संग्रह-2 लघुकथा संग्रह-1 एवं अन्य

सम्मान लेखक मित्र ।मानद उपाधि।देहरदून।उत्तराखण्ड।

भारती पुष्प। मानद उपाधि।इलाहाबाद,

भाषा रत्न, पानीपत ।

डां.अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान,दिल्ली,

काव्य साधना,भुसावल, महाराष्ट्र,

ज्योतिबा फुले शिक्षाविद्,इंदौर ।म.प्र.।

डां.बाबा साहेब अम्बेडकर विशेष समाज सेवा,इंदौर

कलम कलाधर मानद उपाधि ,उदयपुर ।राज.।

साहित्यकला रत्न ।मानद उपाधि। कुशीनगर ।उ.प्र.।

साहित्य प्रतिभा,इंदौर।म.प्र.।

सूफी सन्ज महाकवि जायसी,रायबरेली ।उ.प्र.।

विद्यावाचस्पति,परियावां।उ.प्र.। एवं अन्य

आकाशवाणी से काव्यपाठ का प्रसारण ।कहानी, लघु कहानी,कविता

और आलेखों का देश के समाचार पत्रों@पत्रिकओं

में एवं www.swargvibha.tk/

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एवं अन्य ई-पत्र पत्रिकाओं पर रचनायें प्रकाशित ।

आजीवन सदस्य इण्डियन सोसायटी आफ आथर्स।इंसा।नई दिल्ली

हिन्दी परिवार,इंदौर ।मध्य प्रदेश।

आशा मेमोरियल मित्रलोक पब्लिक पुस्तकालय,देहरादून ।उत्तराखण्ड। एवं अन्य

स्थायी पता आजाद दीप, 15-एम-वीणानगर ,इंदौर ।म.प्र.!

 

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उदयपुर। पारम्परिकता रेत के शिल्प को शिथिल नहीं कर सकी और जरायमपेशा समाज पर लिखे जाने के बावजूद यह अतिरंजना से बचता है। सुपरिचित आलोचक एवं मीडिया विश्लेषक डॉ. माधव हाड़ा ने भगवानदास मोरवाल के चर्चित उपन्यास रेत के संबंध में कहा कि समाजशास्त्रीयता इस उपन्यास का साहित्येतर मूल्य है। उन्होंने कहा कि अस्मितावादी आग्रहों से परे होने पर भी रेत की संवेदना हाशिये के समाज से इस तरह संपृक्त है कि उसे अनदेखा करना अनुचित होगा। डॉ. हाड़ा ने किस्सा गोई को उपन्यास के शैल्पिक विन्यास की बड़ी सफलता बताया।
    साहित्य संस्कृति की विशिष्ट पत्रिका बनास द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में सुखाड़िया विश्वविद्यालय के डॉ. आशुतोष मोहन ने मोरवाल के तीनों उपन्यासों की चर्चा करते हुए कहा कि हिन्दी उपन्यास अपनी पारम्परिक रूढ़ियों को तोड़कर नया रूप और अर्थवत्ता ग्रहण कर रहा है। डॉ. मोहन ने रेत की तुलना दूसरे अस्मितावादी उपन्यासों से किए जाने को गैर जरूरी बताते हुए इसकी नायिका रुक्मिणी को एक यादगार चरित्र बताया।
     संगोष्ठी में जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के सह-आचार्य डॉ. मलय पानेरी ने रेत पर पत्र वाचन किया। डॉ. पानेरी ने मोरवाल की लेखन शैली को प्रेमचन्द की कथा धारा का सबाल्टर्न विस्तार बताते हुए कहा कि यह उपन्यास अपने प्रवाह और सन्देश में विशिष्ट है। बनास के सम्पादक डॉ. पल्लव ने कहा कि चटखारा लेने की प्रवृत्ति उपन्यास को कमजोर बनाती है, मोरवाल की प्रशंसा इस बात के लिए भी की जानी चाहिए कि वे ऐसे आकर्षण में नहीं पड़ते।  
      इससे पूर्व संयोजन कर रहे शोध छात्र गजेन्द्र मीणा ने उपन्यास के कुछ महत्त्वपूर्ण अंशों का वाचन किया। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवलकिशोर ने कहा कि रेत हमारे बीच रहने वाले एक कलंकित समुदाय को मानवीय दृष्टि से समझने की संवेदना हमें देता है। उन्होंने रेत की पठनीयता का कारण उसकी कथावस्तु की नवीनता को बताते हुए कहा कि यह हाशिये के बाहर के एक समाज की जन्मना अभिशापित औरत की जीवनचर्या को सामने लाती है। प्रो. नवल किशोर ने उपन्यास और स्त्री विमर्श के दैहिक पक्ष पर भी विस्तृत टिप्पणी की। चर्चा में जन संस्कृति मंच के संयोजक हिमांशु पण्ड्या, आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण व्यास, शोध छात्र नन्दलाल जोशी सहित अन्य पाठकों ने भी भागीदारी की। अन्त में गणेश लाल मीणा ने सभी का आभार व्यक्त किया।

                              गणेशलाल मीणा
                         152, टैगोर नगर, हिरण मगरी से.4,
                            उदयपुर - 313 002 

भूमिका:- भाषा भावों की वाहिका होती है | मेरी आवाज़ भाग-२ उन भावों का संग्रह है जो समय-समय पर कहीं अंतरमन में उमड़े और लेखनी का रूप ले लिया |उसी लेखनी को आवाज़ देने के लिए प्रस्तुत है- मेरी आवाज़ भाग-२ |

 

मेरी आवाज मेरे माता-पिता को एक छोटा सा उपहार है जिन्होंने मुझे आवाज़ दी |

 

आशा है पाठकों को मेरा यह अति लघु प्रयास पसंद आएगा |

(प्रस्तुत कविता संग्रह पीडीएफ़ ईबुक के रूप में यहाँ से डाउनलोड कर पढ़ें)

सीमा सचदेव

 

मेरी आवाज़ ६० कविताओं का संग्रह है

१.प्रणाम करूं तुझको माता

२.प्यारे पापा

३.प्रणाम तुझे भारत माता

४.हे कान्हा अब फिर से आओ

५.कविता के लिए वध

६.प्यास

७.भूख की अर्थी

८.टीस

९.असली-नकली चेहरा

१०.माँ

११आतंकवाद और आतंकवादी की माँ

१२.पीड़ पराई

१३.कलाकार

१४.घर

१५.नारी परीक्षा

१६.पापी पेट

१७.माँ का कर्ज़

१८.माँ का सौदा

१९.कठपुतली

२०.अंधेरे से उजाले तक

२१.सूर्य की इन्तजार में

२२.अज्ञात कन्या

२३.मुखौटा (क्षणिकाएँ )

२४.लोकल ट्रेन

२५.कसम से वो दर्द हम...

२६.पापा (क्षणिकाएँ )

२७.उधार की जिन्दगी

२८.कचरे वाली

२९.हम जलाने वाले नहीं

३०.मकडी

३१.गाय

३२.हाय-हाय

३३.मँहगाई

३४.सिम्बोलिक लेन्गुएज

३५.जब चेहरे से नकाब हटाया मैने

३६.जिन्दगी है तो जियो

३७.भाषा का जन्म

३८.तुकबन्दी

३९.कौन है वो....?

४०.मुझे समझ नहीं आता

४१.जेनरेशन गैप

४२.आधुनिक बच्चे

४३.आम आदमी

४४.छुअन

४५.माँ की आँखें

४६.हिन्दी दिवस का नारा(क्षणिकाएँ)

४७.माँ की परिभाषा

४८.आँखें (क्षणिकाएँ )

४९.चॉक

५०.रिश्ते

५१.रिश्ते

५२.दुश्मन को सर न उठाने देंगे

५३.आजाद भारत की समस्याएं

५४.न जाने क्यों....?

५५.जान की होली

५६.जीवन एक कैनवस

५७.जूतो की नियति

५८.भरी महफिल में नंगे पांव

५९.शहीदो के घर

६०.मृगतृष्णा

****************************************

 

1.प्रणाम करूँ तुझको माता

हे जननी जीवन दाता

प्रणाम करूँ तुझको माता

तू सुख समृद्धि से संपन्न

निर्मलपावन है तेरा मन

तुझसे ही तो है ये जीवन

तुझसे ही भाग्य लिखा जाता

प्रणाम करूँ तुझको माता

माँ की गोदीपावनआसन

हम वार दें जिस पर तन मन धन

तू देती है शीतल छाया

जब थक कर पास तेरे आता

प्रणाम करूँ तुझको माता

इस विशाल भू मंडल पर

माँ ही तो दिखलाती है डगर

माँ एसी माँ होती न अगर

तो मानव थक कर ढह जाता

प्रणाम करूँ तुझको माता

हर जगह नहीं आ सकता था

भगवान हमारे दुख हरने

इस लिए तो माँ को बना दिया

जगजननीजग की सुख दाता

प्रणाम करूँ तुझको माता

धरती का स्वर्ग तो माँ ही है

इस माँ की ममता के आगे

बेकूंधाम , शिव लोक तो क्या

ब्रह्म लोक भी छोटा पड़ जाता

प्रणाम करूँ तुझको माता

ऐसी पावनसरला माँ का

इक पल भी नहीं चुका सकते

माँ की ह्र्दयासीस बिना

मानव मानव नहीं रह पाता

प्रणाम करूँ तुझको माता

क्यों मातृ दिवस इस माँ के लिए

इक दिन ही नाम किया हमने

इक दिन तो क्या इस जीवन में

इक पल भी न उसका दिया जाता

प्रणाम करूँ तुझको माता

माँ बचों की बच्चे माँ के

भूषण होते हैं सदा के लिए

न कोई अलग कर सकता है

ऐसा अटूट है ये नाता

प्रणाम करूँ तुझको माता

माँ को केवल इक दिन ही दें

भारत की ये सभ्यता न थी

माँ तो देवी मन मंदिर की

हर पल उसको पूजा जाता

प्रणाम करूँ तुझको माता

बच्चों के दर्द से रोता है

इतना कोमल माँ का दिल है

बच्चों की क्षुधा शांत करके

खाती है वही जो बच जाता

प्रणाम करूँ तुझको माता

सच्चे दिल से इस माता को

इक बार नमन करके देखो

माँ के आशीष से जीवन भी

सुख समृद्धि से भर जाता

प्रणाम करूँ तुझको माता

*******************************************

2.प्यारे पापा

प्यारे पापा सच्चे पापा ,

बच्चों के संग बच्चे पापा |

करते हैं पूरी हर इच्छा ,

मेरे सबसे अच्छे पापा |

पापा ने ही तो सिखलाया,

हर मुश्किल में बन कर साया |

जीवन जीना क्या होता है,

जब दुनिया में कोई आया |

उंगली को पकड़ कर सिखलाता,

जब पहला क़दम भी नहीं आता |

नन्हे प्यारे बच्चे के लिए ,

पापा ही सहारा बन जाता |

जीवन के सुख-दुख को सह कर,

पापा की छाया में रह कर |

बच्चे कब हो जाते हैं बड़े,

यह भेद नहीं कोई कह पाया |

दिन रात जो पापा करते हैं,

बच्चे के लिए जीते मरते हैं |

बस बच्चों की ख़ुशियों के लिए,

अपने सुखों को हरते हैं |

पापा हर फ़र्ज़ निभाते हैं,

जीवन भर क़र्ज़ चुकाते हैं |

बच्चे की एक ख़ुशी के लिए,

अपने सुख भूल ही जाते हैं |

फिर क्यों ऐसे पापा के लिए,

बच्चे कुछ कर ही नहीं पाते |

ऐसे सच्चे पापा को क्यों,

पापा कहने में भी सकुचाते |

पापा का आशीष बनाता है,

बच्चे का जीवन सुखदाइ ,

पर बच्चे भूल ही जाते हैं ,

यह कैसी आँधी है आई |

जिससे सब कुछ पाया है,

जिसने सब कुछ सिखलाया है |

कोटि नम्न ऐसे पापा को,

जो हर पल साथ निभाया है |

प्यारे पापा के प्यार भरे'

सीने से जो लग जाते हैं |

सच्च कहती हूँ विश्वास करो,

जीवन में सदा सुख पाते हैं |

**********************************

3.प्रणाम तुझे भारत माता

प्रणाम तुझे भारत माता

प्रणाम तुझे भारत माता

तेरे गुण सारा जग गाता

अनुपम तेरी जीवन गाथा

संघर्षरत रह कर तुमने

अपना यह नाम कमाया है

अपने ही भुजबल से तुमने

अपने को उँचा उठाया है

हम नमन् तुम्हें करते-करते

इतिहास तेरा पढ़ते-पढ़ते

मस्तक श्रद्धा से झुकता है

बस याद तुम्हें करते-करते

वैदिक युग की महारानी तुम

युग परम्परा की परवक्ता

सभय-संस्कृति का मेल तुम्हीं

स्वराज्य यहाँ राज्य करता

लौकिक युग की शहज़ादी को

पलकों पे बिठाया जाता था

दे कर सुनदर रूप तुम्हें

जब भाग्य जगाया जाता था

मध्य युग में अर्धांगिनी का

रूप तुम्हें जब दे ही दिया

तो भी तुमने चुपचाप रह

अपने उस रूप को वरण किया

पैरों की दासी बना दिया

जब भारत की महारानी को

तब कौन सहन कर सकता है

माँ की ऐसी कुर्बानी को

कोई बेटा नहीँ यह सह सकता

माँ को दासी नहीँ कह सकता

फिर तेरे बेटों ने ठान ली

माँ की ममता पहचान ली

निकले फिर माँ के रखवाले

सचमुच ही थे वो दिलवाले

बाँध लिया था कफ़न सिर पर

और उठा लिया माँ को मरकर

उन वीरों ने जो खून दिया

और इतना बड़ा बलिदान दिया

कितना वो माँ को चाहते हैं

मर करके यही सबूत दिया

माँ को आज़ाद करा ही दिया

दुश्मन को घर से भगा ही दिया

रक्षा की माँ के ताज़ की

बनी रानी भारत राज की

देश आज़ाद हुआ अपना

वर्षों से था जो इक सपना

माँ ने कितने बेटे खोए

बिन स्वारथ के जो जा सोए

अच्छे- बुरे हम जैसे भी हैं

क्या कम? हम भारतवासी हैं

सर उँचा रहता है अपना आज

क्योंकि अपना है देश आज़ाद

भारत माता है महारानी

हमें स्मरण है वीरों की कुर्बानी

जो इस पर नज़र उठाएगा

वो हमसे नहीँ बच पाएगा

************************

4. हे कान्हा अब फिर से आओ

हे कान्हा अब फिर से आओ

आकर भारत भू बचाओ

अपना दिया हुआ वचन निभा दो

आकर दुनिया को दिखला दो

आज तुम्हें हर आँख निहारे

हर जन की आत्मा पुकारे

एक कन्स के हेतु गिरधर

आए थे तुम भारत भू पर

राक्षसों का करके सफाया

तुमने अपना धर्म निभाया

देखो यह आतंकी रूप

कितना उसका चेहरा कुरूप

फैला रहे आतंकवाद

करने भारत भू बर्बाद

मारें निहत्थे लोग नादान

नहीं सुरक्षित किसी की जान

जिस धरती पर तुम खुद आए

गीता के उपदेश सुनाए

जिस भूमि का हर कण पावन

आ रहे वहाँ आतंकी रावण्

भरे हुए अब सबके नैन

नहीं किसी के मन में चैन

हे दाऊ के भैया आओ

दाऊद के भाई समझाओ

नहीं तो समझाओ हर अर्जुन

मार मुकाएँ हर दुर्योधन

भेजे बहुत ही शान्ति दूत

पर न माने कोई कपूत

अहंकार वश मर जाएँगे

खत्म वो कुनबा कर जाएँगे

पर न समझेंगे यह बात

सत्य तो है हमारे साथ

सच्चाई की होगी जीत

नहीं फलेगी बुरी कोई नीत

दुश्मन के घर हम जाएँगे

अपना झण्डा फहराएँगे

हम भारत माँ की सन्तान

माँ के लिए दे देंगे जान

करना कान्हा बस इतना करम

नहीं खत्म हो मानव धर्म

तुम सत्य के रथ पर रहना

हर अर्जुन को बस यह कहना

अपना सच्चा करम निभाओ

मन में आशंका न लाओ

बस तुम इतना करो उपकार

न हों हमारे बुरे विचार

बुरा नहीं कोई इन्सान

सबमें बसता है भगवान

बुराई को हम जड़ से मिटाएँ

फर्ज़ की खातिर हम मिट जाएँ

तुम बस सत्य रथ को चलाना

अपना दिया हुआ वचन निभाना

देता है इतिहास गवाही

जब भी कोई हुई तबाही

सत्यवादी तब-तब कोई आया

आकर अत्याचार मिटाया

फिर से अत्याचार मिटाओ

हे कान्हा अब फिर से आओ

*******************************

5.कविता के लिए वध

कहते हैं....?

कविता कवि की मजबूरी है

उसके लिए वध जरूरी है

जब भी होगा कोई वध

तभी मुँह से फूटेंगे शब्द

दिमाग में था बालपन से ही

कविता पढने का कीड़ा

न जाने क्यूँ उठाया

कविता लिखने का बीड़ा

किए बहुत ही प्रयास

पर न जागी ऐसी प्यास

कि हम लिख दे कोई कविता

बहा दे हम भी भावो की सरिता

कहने लगे कुछ दोस्त

कविता ए लिए तो होता है वध

कितने ही मच्छर मारे

ताकि हम भी कुछ विचारे

देखे वधिक भी जाने-माने

पर नहीं आए जजबात सामने

नहीं उठा मन में कोई ब्वाल

छोड़ा कविता लिखने का ख्याल

पर अचानक देख लिया एक नेता

बेशर्मी से गरीब के हाथों धन लेता

तो फूट पड़े जजबात

निकली मुँह से ऐसी बात

जो बन गई कविता

बह गई भावों की सरिता

सुना था जरूरी है

कविता के लिए वध

फिर आज क्यो

निकले ऐसे शब्द ?

फिर दोस्तों ने ही समझाया

कविता फूटने का राज बताया

नेता जी वधिक है साक्षात

वध किए है उसने अपने जजबात

जिनको तुम देख नहीं पाए

और वो शब्द बनकर कविता में आए

*********************

6..प्यास

चौराहे पर खडा विचारे

बन्द मार्ग सारे के सारे

मुड जाता है उसी दिशा में

जिधर से भी कोई उसे पुकारे

न कोई समझ न सोच रही है

बन गई दिनचर्या ही यही है

जिम्मेदारी सिर पर भारी

चलता है जैसे कोई लारी

दूध के कर्ज़ की सुने दुहाई

कभी जीवन सन्गिनी भरमाई

माँगे रखते हैं कभी बच्चे

बॉस के भी है नौकर सच्चे

हाँ में हाँ मिलाता रहता

बस खुद को समझाता रहता

करता है उनसे समझौते

जो राहों के पत्थर होते

किसे देखे किसे करे अनदेखा?

कौन से करमों का देना लेखा?

बचपन से ही यही सिखाया

जिस माँ-बाप ने तुमको जाया

उनका कर्ज़ न दे पाओगे

भले जीवन में मिट जाओगे

पत्नी सँग लिए जब फेरे

कस्मे-वादों ने डाले डेरे

दफतर में बैठा है बॉस

दिखाता रहता अपनी धौंस

चाहकर भी न करे विरोध

अन्दर ही पी जाता क्रोध

समझे कोई न उसकी बात

न दिन देखे न वो रात

अपनी इच्छाओं के त्याग

नहीं है कोई जीवन अनुराग

पिसता है चक्की में ऐसे

दो पाटों में गेहूँ जैसे

सबकी इच्छा ही के कारण

कितने रूप कर लेता धारण

फिर भी खुश न माँ न बीवी

क्या करे यह बुद्धिजीवी ?

माँ तो अपना रौब दिखाए

और बीवी अधिकार जताए

एक अकेला किधर को जाए?

किसको छोड़े किसको पाए ?

साँप के मुँह ज्यों छिपकली आई

यह् कैसी दुविधा है भाई

छोड़े तो अन्धा हो जाए

खाए तो दुनिया से जाए

हर पल ही है पानी भरता

और अन्दर ही अन्दर डरता

पुरुष है नहीं वो रो सकता है

अपना दुख न धो सकता है

आँसू आँखो में जो दिखेगा

तो समाज भी पीछे पड़ेगा

....................

पुरुष है पर नहीं है पुरुषत्व

नहीं अच्छा आँसुओं से अपनत्व

बहा नहीं सकता अश्रु अपने

न देखे कोई कोमल सपने

दूसरों की प्यास बुझाता रहता

खुद को ही भरमाता रहता

स्वयम तो रहता हरदम प्यासा

जीवन में बस मिली निरासा

पाला बस झूठा विश्वास

नहीं बुझी कभी उसकी प्यास

**************************

7.भूख की अर्थी

सफेद कपड़े से सजी अर्थी पर

पुष्प वर्षा ,ढोल नगाड़े

फिल्मी गानों की

धुन पर नाचते लोग

जा रहे मरघट की ओर

अनहोनी

सचमुच अचम्भित

करने वाली घटना

मरघट और नाच गाना

जहां होता है बस रोना-रुलाना

???????????????

होगा कोई अमीरजादा

पी होगी ज्यादा

मर गया

परिवार को आज़ाद कर गया

या फिर होगा कोई सठियाया

मरते-मरते होगा

अपना फरमान सुनाया

या फिर होगा कोई अत्याचारी

फैलाई होगी सामाजिक बीमारी

आज मर गया

लोगो को खुश कर गया

चलो जो भी था???????

धरती का बोझ कम कर गया

कौन था ?जान लेते हैं....

जिज्ञासा , शान्त कर लेते हैं

पता चला

कोई नामी किसान था

कभी उसका भी नाम था

बेटे को पढाना

उसका अरमान था

इसी चक्कर में

बन गया मजदूर

रोका था उसे

न करो यह कार्य क्रूर

पढ-लिख कर बेटा क्या कमाएगा

नहीं पढ़ेगा , तो तेरा हाथ बँटाएगा

कोई बात न मानी

बस अपनी ही जिद्द ठानी

पूरी भी की

और बेटे ने डिग्री भी ली

सारी उम्र पढाई में गाली

बाप किसान से बन गया माली

और बेटा

कागज का टुकड़ा

हाथ में थामे

दर-दर भटकता था

माँ-बाप को भी अटकता था

पेट में भूख करती थी नर्तन

बजते थे घर में खाली बर्तन

लान्घी तो थी उसने चारदीवारी

पर आगे पसरी थी बेरोजगारी

नहीं जानता था जेब काटना

और न अपना दुख बाँटना

स्वाभिमानी था

पढाई में उसका न कोई सानी था

पर न तो बची थी दौलत

न थी इतनी शौहरत

कि उसे कोई काम मिल जाता

भूखे मरते थे

बस पानी ही पीते थे

बेटा खुदकुशी कर गया

बाप भूख से मर गया

माँ , बाप के साथ होगी सती

मिल जाएगी तीनों को गति

बेटा जवान था

माँ -बाप का अरमान था

उसका ब्याह रचाएँगे

बैण्ड बाजा बजाएँगे

जीते जी तो इच्छा रही अधूरी

अब कर देते हैं पूरी

उसने मौत को गले लगाया है

उसी को दुल्हन बनाया है

अब भूखे न रहेंगे

कोई दर्द न सहेंगे

मर कर समस्या हल कर दी

यह निकल रही है भूख की अर्थी

************************

8.टीस

हृदयासागर पर

भावनाओं के चक्रवात को

चीरती निकलती है

विनाशकारी लहर

बह जाती

अनजान पथ पर

तेज नुकीली धार बन कर

मापती अनन्त गहराई

बिना किनारे और

मन्जिल के

चलती बेप्रवाह

कही भी तो

नहीं मिलती थाह

या फिर

चीरती है

काँटे की भांति

मन-मत्सय के सीने को

निकलती है बस

आह भरी चीस

भर जाती हृदय में टीस

*********************

9. असली नकली चेहरा

चेहरे पे चेहरा लगाते हैं लोग

सुना था

पर आज अपना ही चेहरा

नहीं पहचान पाती मैं

जब भी जाओ

आईने के सामने

ढूँढ़ना पड़ता है अपना चेहरा

न जाने कितने चेहरों

का नकाब ओढ़ रखा है

एक-एक कर जब सम्मुख

आते हैं

अपना परिचय करवाते हैं

तो सच में ऐसे खूँखार चेहरों से

मुझे डर लगता है

कभी चाहती हूँ

मिटा दूँ इन सभी को

और ओढ़ लूँ केवल अपना

वास्त्विक चेहरा

न जाने क्यों उसी क्षण लगते हैं

सभी के सभी चेहरे अपने से

मुझे इनसे प्यार नहीं

ये सुन्दर भी नहीं

असह हैं मेरे लिए

फिर भी सहती हूँ

क्योंकि

यह मेरी कमजोरी नहीं

मजबूरी हैं

घूमने लगते हैं मेरे सम्मुख

वो सभी चेहरे

जिनको मैं जी-जान से चाहती हूँ

जिनके लिए मैंने अपनाए है

इतने सारे चेहरे

वो चेहरे, जिनकी एक मुस्कान

की खातिर

हर बार लगाया मैंने नया चेहरा

और भूलती गई

अपने चेहरे की पहचान भी

आज उस मोड़ पर हूँ

कि यह चेहरे हटा भी दूँ

असली चेहरे को अपना भी लूँ

तो वो चेहरा सबको

नकली ही लगेगा

मैं खुश तो नहीं

सन्तुष्ट हूँ

कि नकली चेहरा देखकर

मुस्कुरा देता है कोई

******************************

10.माँ

नि:शब्द है

वो सुकून

जो मिलता है

माँ की गोद में

सर रख कर सोने में

वो अश्रु

जो बहते हैं

माँ के सीने से

चिपक कर रोने में

वो भाव

जो बह जाते हैं अपने ही आप

वो शान्ति

जब होता है ममता से मिलाप

वो सुख

जो हर लेता है

सारी पीड़ा और उलझन

वो आनन्द

जिसमे स्वच्छ

हो जाता है मन

......................................................

.......................................................

माँ

रास्तों की दूरियाँ

फिर भी तुम हरदम पास

जब भी

मैं कभी हुई उदास

न जाने कैसे?

समझे तुमने मेरे जजबात

करवाया

हर पल अपना अहसास

और

याद हर वो बात दिलाई

जब

मुझे दी थी घर से विदाई

तेरा

हर शब्द गूँजता है

कानों में सन्गीत बनकर

जब हुई

जरा सी भी दुविधा

दिया साथ तुमने मीत बनकर

दुनिया

तो बहुत देखी

पर तुम जैसा कोई न देखा

तुम

माँ हो मेरी

कितनी अच्छी मेरी भाग्य-रेखा

पर

तरस गई हूँ

तेरी

उँगलियों के स्पर्श को

जो चलती थी मेरे बालों में

तेरा

वो चुम्बन

जो अकसर करती थी

तुम मेरे गालों पे

वो

स्वादिष्ट पकवान

जिसका स्वाद

नहीं पहचाना मैने इतने सालो में

वो मीठी सी झिड़की

वो प्यारी सी लोरी

वो रूठना - मनाना

और कभी - कभी

तेरा सजा सुनाना

वो चेहरे पे झूठा गुस्सा

वो दूध का गिलास

जो लेकर आती तुम मेरे पास

मैने पिया कभी आँखें बन्द कर

कभी गिराया तेरी आँखें चुराकर

आज कोई नहीं पूछता ऐसे

???????????????????

तुम मुझे कभी प्यार से

कभी डाँट कर खिलाती थी जैसे

******************************************

11. आतंकवाद और आतंकवादी की माँ

चाँद सा सुत जन्मा

माँ खुश

गोदी में लाल की किलकारी

लगी बड़ी प्यारी

दिख गए सूनी आँखों में

न जाने कितने ही सपने

बड़ा होगा तो

सहारा बन जाएगा

उसकी सौतन भूख को भगाएगा

मेरा नाम भी चमकाएगा

पर सौतन थी कि

बदले की आग में भड़की थी

उसने भी अपनी जिद्द पकड़ी थी

सौतेली ही सही

मैं इसकी माँ कहलाऊँगी

और दुनिया को दिखाऊँगी

इसकी माँ के साथ मेरा नाम भी आएगा

सौतेला ही सही

मेरा सुत भी कहलाएगा

मेरे लिए यह खून पिएगा

दूसरों को मार के जिएगा

माँ का दूध नहीं इसके सर

खून चढ़ के बोलेगा

खुद रुलेगा दूसरों को रोलेगा

जननी की लाचारी थी

सौतन जो अत्याचारी थी

चाह कर न बचा पाई अपना ही जाया

सौतेली माँ ने ऐसा भरमाया

हाथ में हथियार थमा दिया

और सौतेले सुत को

आतंकवादी बना दिया

खुद आतंकवाद की माँ बन बैठी

न जाने कितनी ही लाशें

उसके सम्मुख लेटीं

सौतेले सुत ने नाम चमका दिया

स्वंय को आतंकवादी बना दिया

जननी का कर्ज़ ऐसा चुकाया कि

उसकी कोख पर कलंक लगा दिया

सौतेली माँ को जिता दिया

और अपनी माँ को

आतंकवादी की माँ बना दिया

****************************

12.पीड पराई

गम की लू से

सूखे पत्ते के समान

पतझड़ में डाली से टूटकर

गिरते किसी फूल की कली सी

जिसकी खुशबू नदारद

सहमी सिमटी

पहाड़ सी जिन्दगी

कुरलाती है

अपने आप में

एक व्यथा बताती है

क्या.......?

यही है जीवन

कि ........

स्वयम् को करदो अर्पण

केवल

किसी की कुछ पल की

तस्सली के लिए

जीवन भर जिल्लत का

बोझ उठा कर जिए

नहीं जाने कोई

उस पीड़ा और जिल्लत

की गहराई

जिसने बना दिया सबसे पराई

न घर मिला न चाहत

न ही मन में मिली कभी राहत

*************************************

13.कलाकार

ईश्वर से

बिछुडी आत्मा का

सुखद सँयोग ,सम्भोग

प्रकृति के सन्ग

भरता नई उमन्ग

हुआ

कोमल भावनाओं का जन्म

जो

मिल गई

हृदयासागर में बन कर तरन्ग

बहे भाव

सरिता की भांति

एकाकार ,निश्चल,निश्कपट

निरन्तर प्रवाहित सुविचार

चक्षुओं पर प्रहार

सोच पर अत्याचार

और बन गया कलाकार

****************************

14.घर

कभी

नन्हे हाथों से

बनाते थे रेत के घर

देख के उनको लगता था

जैसे हम है कोई जादूगर

सजाते

सँवारते

थपथपाते

मर्जी के मालिक

रखते थे

हर सुख-सुविधा का ध्यान

अनजाने में ही सही

कही न कही छुपा तो था

मन में

सुन्दर घर का अरमान

बनाते

बिगाड़ते

अपनी जगह नापते

छूट गया कब

उस बालु का साथ

अब हम बच्चे नहीं

हमारे हाथ भी नन्हे नहीं

समय भी खिसका

मुट्ठी से बालु की भांति

और ले ली जगह

पत्थरों नें

फिर से जगा एक बार

उसी सुन्दर घर का सपना

प्यारा सा घर हो अपना

जिसकी कभी छत पर

तो कभी आँगन में

खेले हमारे भी नन्हे बच्चे

बिल्कुल वैसे ही नन्हे हाथों से

बनाएँ वैसे ही रेत के घरौन्दे

और हमारी तरह पाले

मन में सुन्दर घर का सपना

घर मिला

बिना जमीन और छत के

न धरती न आसमान

कुछ भी तो नहीं अपना

एक बड़ी सी बिल्डिन्ग के

फिफ्थ फ्लोर पर

न जाने नीचे कौन और ऊपर कौन

कितनी बेबसी है

हम फिर भी रहते हैं मौन

********************

15.नारी-परीक्षा

मत लेना कोई परीक्षा अब

मेरे सब्र की

बहुत सह लिया

अब न सहेंगे

हम अपने आप को

सीता न कहेंगे

न ही तुम राम हो

जो तोड़ सको शिव-धनुष

या फिर डाल सको पत्थरों में जान

नहीं बन्धना अब मुझे

किसी लक्ष्मण रेखा मे

यह रेखाएँ पार कर ली थी सीता ने

भले ही गुजरी वो

अग्नि परीक्षा की ज्वाला से

भले ही भटकी वो जन्गल-जन्गल

भले ही मिला सब का तिरस्कार

पर कर दिया उसने नारी को आगाह

कि तोड़ दो सब सीमाएँ

अब नहीं देना कोई परीक्षा

अपनी पावनता की

नहीं सहना कोई अत्याचार

बदल दो अब अपने विचार

नारी नहीं है बेचारी

न ही किस्मत की मारी

वह तो आधार है इस जगत का

वह तो शक्ति है नर की

आधुनिक नारी हूँ मैं

नहीं शर्म की मारी हूँ मैं

बना ली है अब मैने अपनी सीमाएँ

जिसकी रेखा पर

कदम रखने से

हो सकता है तुम्हारा भी अपहरण

या फिर मैं भी दे सकती हूँ

तुम्हें देश-निकाला

कर सकती हूँ तुम्हारा बहिष्कार

या फिर तुम्हें भी देनी पड सकती है

कोई अग्नि परीक्षा

******************************************

पहली बार नारी की आजादी की पहल की थी तो जानकी सीता ने लक्षमण-रेखा को लाँघ कर

और कर दिया आज की नारी को आगाह कि नहीं देना कोई परीक्षा |प्रणाम है उस नारी को

जिसने आधुनिक नारी को राह दिखाई

******************************************

16.पापी पेट

अल्ला के नाम पर एक रुपैया

बच्चे की खातिर देदे बाबू

भगवान तुम्हें लाखों देगा

जैसे शब्द गूँज जाते हैं

राह चलते

कभी किसी मन्दिर ,अस्पताल के द्वार

या फिर किसी ट्रेन में सफर करते

छोटे बच्चे को पीठ पर पिट्ठु की तरह बाँधे

कोई माँ आती है हाथ फैलाती है

दो-चार दुआएँ सुनाती है

न मिलने पर मुँह में ही बुदबुदाती है

अन्दर की आग को बद-दुयाओ से दबाती है

और पीठ के पीछे बन्दरिया के बच्चे की भांति

चिपका हुआ बच्चा अभी से समझता है

माँ की जुबान , सीख रहा है उसी की भाषा

है तो अभी दीन-दुनिया से बेखबर

पर सीख गया है वो करना सब्र

दुनिया की भीड़ में भी चिल्लाता नहीं है

माँ को सताता नहीं है

नहीं माँगता कभी चॉक्लेट, आईस-क्रीम

या फिर चटपटे चिप्स

कभी- कभी सूँघ कर खुशबू

फेरता है जीभ अपने सूखे अधरों पर

और हो जाता है सन्तुष्ट

बेस्वाद जीभ का स्वाद चखकर

घूमता है माँ के साथ सारा दिन

नहीं थकता पर , यही तो कमाल है

क्या करे ? पापी पेट का सवाल है

******************************

17.माँ का कर्ज़

सुन-सुन कर पक गए थे कान

कि इतिहास अपने आप को दोहराता है

हमारा इतिहास से गहरा नाता है

अब देखा है मैने ,उस बीते कल को वापिस आते

सच में समय का पहिया घूमते-घूमते

फिर से आ खड़ा हुआ है उसी बिन्दु पर

जहां से चला था

और फिर से चल पडा है इतिहास दोहराने

मैने देखा था अपनी माँ को

मेरे इन्त्जार में आँखें गडाए

आज मैं भी तो गडाती हूँ

सुनती थी माँ की लोरी

आज मैं भी तो सुनाती हूँ

कभी मेरा गुस्सा माँ चुप-चाप पी जाती थी

आज मैं भी पी जाती हूँ

देखा था माँ का सबको खिला कर खाना

आज मैं भी तो सबको खिला कर खाती हूँ

कभी हँसती थी माँ की भोली सी बातों पर

आज वही बातें मैं भी तो दोहराती हूँ

कभी न समझा था माँ की उस सहन शक्ति को

जिसको आज मैं सह जाती हूँ

मैं माँ से कितना मिलती-जुलती हूँ

अब लगता है मैं माँ की माँ बन जाऊँ

और माँ के हर जख्म पर मरहम लगाऊँ

फिर से लौट जाना चाहती हूँ

माँ की उसी छाया में

सच्च कहती हूँ माँ

वो समय फिर आ जाए

तो तुम्हारी यह बेटी

तुम्हें कभी न सताएगी

पर भली-भांति जानती हूँ

गया समय न आएगा

बस इतिहास अपने आप को दोहराएगा

तुमने सब सहा माँ

मैं भी सब सह जाऊँगी

तुमने हर फर्ज़ निभाया

मै भी निभाऊँगी

तुम कुछ नहीं बोली

मै भी चुप रहुँगी

शायद तभी माँ होने के

कर्ज़ से मुक्ति पाऊँगी

**************************************************

18.माँ का सौदा

आज देखा लोगो को

बुढ़िया की अर्थी को कन्धा देते

और उस पर आँसू बहाते

तो रहा न गया

मन उत्सुकता से भर गया

कौन थी यह बुढ़िया

जिसकी अर्थी लोग लिए जा रहे है

और फूट-फूट कर आँसू बहा रहे है

पूछा तो पता चला.......

यह बुढ़िया बहुत महान थी

अभी तो जवान थी

बहुत इसने नाम कमाया था

पुत्रों को देश-विदेश में

सम्मान भी दिलवाया था

पालन-पोषण में....

कोई कमी न छोड़ी थी

पर पुत्रों की बुद्धि थोड़ी थी

लालच उनमे समाया था

माया-मोह ने उन्हें भरमाया था

पैसे ने उनको अन्धा कर दिया

और इसी अन्धेपन में....

माँ का सौदा कर दिया

माँ को जवानी में ही बुढ़िया बना दिया

अमीरजादों का गुलाम बना दिया

यह बुढ़िया स्वाभिमानी थी

गुलामी सह न पाई और मर गई

......................

......................

पर वो कौन थी.....?

जिसका इतन नाम था

जिसके पुत्रों को.....

पैसों से काम था

उसका नाम......

उसका नाम हॉकी था

**************************************

19.कठपुतली

न जाने कहाँ से आती है

कम्बख्त मुझे बड़ा सताती है

हर बात में पहले अपनी टाँग अड़ाती है

जब इसकी मान लो तो ठीक

नहीं तो सपनों में भी आ के डराती है

मेरे दिमाग की इसके आगे कभी न चली

है यह बड़ी ही मनचली

दबा लेती थी मुझे जब मैं बच्ची थी

मेरी उम्र भी तो कच्ची थी

मान लेती मैं इसकी हर बात

पर कभी न मिली कोई सौगात

थोड़ा होश सँभाला तो

मैं दबाने लगी उसको

डर जाती थी सपनों में देख कर जिसको

पर मैं अब उसे वश में करने लगी थी

मन मर्जी से जीने लगी थी

बहुत बार अनसुनी की मैने उसकी बकबक

फिर भी वो हटती नहीं मारने से झक

नहीं सुनती मैं ,फिर भी बोलती

मेरे अपने ही राज मेरे ही सम्मुख खोलती

पर मैने सीख लिया था उससे लड़ना

उसकी बेतुकी बातों की परवाह न करना

कैसे कर सकती थी मैं....?

उसी की बकबक सुनती

तो कैसे जी सकती थी मैं...?

कोई भी तो नहीं करता

फिर मैं भला क्यूँ करूँ उसकी परवाह ?

क्या दुनिया में मिलेगी मुझे पनाह ?

मैने उसको मार दिया

मन का बोझ उतार दिया

फिर मुझे उसकी बातें सुनाई नहीं दी

सच्च तो यह है कि

वो फिर सपने में भी दिखाई नहीं दी

क्यो दिखती......?

मैने उसे मार जो दिया

अपने आप को आज़ाद कर लिया

पर बहुत बेशर्म है यह

मर कर भी जाग पड़ी

आज फिर मेरे सामने

आकर हो गई खड़ी

रह गई मेरी आँखें फटी की फटी

और वो फिर से रही अपनी बकबक पे डटी

और मैने फिर से पाया अपने आप को

मजबूर ,लाचार , बेबस , कमजोर

बस उसी के हाथों की कठपुतली

कोई और नहीं ,

यह है मेरी आत्मा

जो लेती है हर पल मेरी इच्छाओं की बलि

***********************************************

20.अन्धेरे से उजाले तक

अन्धेरे से उजाले की ओर

दूर से दिखती

एक नन्हीं सी किरण

की तरफ बढते कदम

न जाने क्यो

बढते ही जाते हैं

क्या सोच कर ,बढते हैं.....?

शायद यही

कि पकड़ लेन्गे

उस छोटी सी किरण को

भर लेन्गे

अपने आँचल में

समेट लेन्गे पहलू में

जो कही

दूर से करती है

अपनी तरफ आने का इशारा

और

चल देते हैं

सभी उसी दिशा में

आदि से

लेकर आधुनिक तक

बेपरदा से

परदा फिर नन्गेज तक

घास-फूस से

स्वादिष्ट पकवान तक

अज्ञानी से

विज्ञान तक

जन्गलों से

महलों तक

पत्थर की अग्नि से

अग्नि, पृथ्वी मिसाईल तक

असभ्य से

विदेशी सभ्यता अपनाने तक

समूह से

एकल रहने तक

वेदों से

आधुनिक शिक्षा तक

रामराज्य से

लोकतन्त्र तक

रजवाड़ों से

गुलामी ,फिर आजादी

और फिर स्वच्छन्दता तक

तीसरे

विनाशकारी युद्ध

की ओर अग्रसर होने तक

घास-फूस की

झोपड़ी से निकल कर

चाँद -तारों के पार पहुँचने तक

बन्दर से

आधुनिक इन्सान तक

वास्तविकता से

कृत्रिम तक

......

न जाने

कितने मील पत्थर तय कर डाले

इन बढते हुए कदमों ने

कितना

बदल डाला अपने-आप को

कहाँ से

कहाँ पहुँच गया मानव

लकीर के

फकीर बन कर हम भी तो

चल रहे है

उसी एक किरण की ओर

हर दिन

बढ़ाते हैं कुछ कदम

अपने आगे देखकर

और

हमारे पीछे

भी तो लम्बी पन्क्ति है

जो

देख रही है

हमारे कदमों के निशान

मृगतृष्णा

की भांति बढ़ रहे है आगे

आँखो में

पाले हुए अनन्त सपने

कही न कही

हो रहा है अनजाना बदलाव

कदम तो

अभी भी अन्धेरे में ही है

परन्तु

दिख रहा है सामने उजाला

उजाला

अपने विचारों में

उजाला

अपनी सोच में

उजाला

अपनी दृष्टि में

उजाला

अपने अधिकारों में

उजाला

जागरूकता में

और उजाला

भविष्य के सुन्दर सपनों में

शायद

पहुँचेंगे

कभी उस उजाले तक

यह बढते हुए कदम

अन्धकार को चीर कर

***************************

21.सूर्य की इन्तज़ार मे....

सुबह का सूर्य

नई ताज़गी

नई उमन्ग

हँसती कलियाँ

ओस की बूँदों से लदे

खुशबूदार रँगदार फूल

शीतल सुनहरी

मन को लुभाती किरणें

उषा की लाली

आहिस्ता-आहिस्ता गर्माने लगी

शीतलता जाने लगी

कोमलता कठोरता दिखाने लगी

ताजगी से सुस्ती

और

उमन्ग से ख्वाहिशें टकराने लगी

ओस की बूँदे सूख गई

फूलों में खुशबू न रही

लूट लिया तेज धूप ने सबकुछ

गर्मी में सब गर्माने लगा

उसका अपना अलग ही मजा

आते ही जाने की तैयारी

फैला दी हो जैसे इसने कोई बीमारी

जाते-जाते समझाने लगी

कई रहस्य बताने लगी

फिर से दे तो गई शीतलता

परन्तु वो ताजगी न रही

फूलों से खुशबू नदारद

न ओस की बूँदें

न कोई उमन्ग

देखते ही देखते धूप छँट गई ऐसे

जैसे उठी थी कलकल करती

सरिता में कोई तरँग

महसूस किया

देखा भी

पर पकड़ न पाए

ढल गया सूरज

और फिर स्याह रात

अँधकार का राज्य

चारों तरफ पसरा सन्नाटा

चमकते हुए चाँद की चाँदनी

फिर नए सूर्य की इन्तज़ार में....

***********************************

22.अज्ञात कन्या

भिनभिनाती मक्खियाँ

कुलबुलाते कीड़े

सूँघते कुत्ते

कचरादान के गर्भ में

कीचड़ से लथपथ

फिर से पनपी

एक नासमझ जिन्दा लाश

छोटे-छोटे हाथों से

मृत्यु देवी को धकेलती

न जाने कहाँ से आया

दुबले-पतले हाथों में इतना बल

कि हो गए इतने सबल

जो रखते हैं साहस

मौत से भी जूझने का

शायद यह बल

वह अहसास है

माँ के पहले स्पर्श का

वह अहसास है

माँ की उस धड़कन का

जो कोख में सुनी थी

चीख-चीख कर कहती है

नन्हीं सी कोमल काया....

मैं जानती हूँ माँ

मैं पहचानती हूँ

तुम्हारी ममता की गहराई को

तुम्हारे स्नेह को

तुम्हारे उस अनकहे प्यार को

महसूस कर सकती हूँ मैं

भले यह दुनिया कुछ भी कहे

मै इस काबिल नहीं कि

सब को समझा सकूँ

तुम्हारी वो दर्द भरी आह बता सकूँ

जो निकली थी तेरे सीने की

अपार गहराई से

मुझे कूडादान में सबसे छुप-छुपा कर

अर्पण करते समय

यह तो सदियों से चलता आ रहा सिलसिला है

कभी कुन्ती भी रोई थी

बिल्कुल तुम्हारे ही तरह

मैं जानती हूँ माँ

तुम भी ममतामयी माँ हो

न होती

तो कैसे मिलता मुझे तुम्हारा स्पर्श

तुम तो मुझे कोख में ही मार देती

नहीं माँ ! तुम मुझे मार न सकी

और आभारी हूँ माँ

जो एक बार तो

नसीब हुआ मुझे तुम्हारा स्पर्श

उसी स्पर्श को ढाल बना कर

मैं जी लूँगी

माथे पर लगे लाँछन का

जहर भी पी लूँगी

तुम्हारे आँचल की

शीतल छाया न सही

तुम्हारे सीने से निकली

ठण्डी आह का तो अहसास है मुझे

धन्य हूँ मैं माँ

जो तुमने मुझे इतना सबल बना दिया

आँख खुलने से पहले

दुनियादारी सिखा दिया

इतना क्या कम है माँ

कि तूने मुझे जन्मा

हे जननी!

अवश्य ही तुम्हारी लाचारी रही होगी

नहीं तो कौन चाहेगी

अपनी कोख में नौ माह तक पालना

कुत्तों के लिए भोजन

इसीलिए तो दर्द नहीं सहा तुमने

कि दानवीर बन कर

कुलबुलाते कीड़ों के भोजन का

प्रबन्ध कर सको

नहीं! माँ ऐसी नहीं होती

मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं

मैं ही अभागी

तुम्हारी कोख में न आती

आई थी तो

तुम्हें देखने की चाहत न करती

बस इसी स्वार्थ से

कि माँ का स्नेह मिलेगा

जीती रही , आँसू पीती रही

एक आस लिए मन में...

स्वार्थ न होता

तो गर्भ में ही मर जाती

तुम्हें लाँछन मुक्त कर जाती

किसी का भोजन भी बन जाती

पर यह तो मेरे ही स्वार्थ का परिणाम है

कि बोझ बन गई मैं दुनिया पर

कलन्क बन गई तेरे माथे पर

कुत्तों,कीडों या चीलों का

भोजन न बन सकी

और एक अज्ञात कन्या बन गई

अज्ञात कन्या

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23.मुखौटा(चन्द क्षणिकाएँ)

१.मै जब बहुत छोटी थी

देखती थी बहुत बार

लड़कियों का विदाई समय रोना

देख कर

भर जाती थी गुस्से में

मैं न रोऊँगी

हँसते-हँसते अपने घर जाऊँगी

मैं सच्च में नहीं रोई

न ही किसी की आँखें नम देखी

देखा उस दिन

सबके चेहरे पर मुखौटा

२. रोई थी उस दिन

अन्दर से पापा की आँखें

उठी थी टीस दिल की गहराई से

किया था मैने यह सब महसूस

जब पापा ने लिया था मुझे

अपनी बाहों में

उनके होंठों पर नकली हँसी

का मुखौटा उठा दिया था

उनकी ही आँखो ने

३.अनजाने में पी जाते हैं

हम कितने ही आँसू

नहीं जानते कि यह

जल बन जाएगा ऐसी चट्टान

जिन्हे लहरों का बवण्डर भी

पिघला न सकेगा

ताउम्र हमे ओढ़ना पड़ेगा मुखौटा

४.झगडती है मेरी बहन

अब भी मुझसे

कोई न कोई शिकायत

उसकी बातों में रहती है अब भी

रो देती है फिर खुद ही

शायद मेरी जुदाई

सह नहीं पाती

और ओढ़ लेती है

गुस्से का मुखौटा

५. माँ भी तो

अपनी बात नहीं करती

सबके लिए बोलेगी

पर अपने राज न खोलेगी

समझा लेती है वो अपने दिल को

ऐसी ही बातों से

ओढ़े रखती है

दिल दिमाग और चेहरे पे मुखौटा

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24.लोकल ट्रेन

लोकल ट्रेन आती है

आ के चली जाती है

छोड़ जाती है पीछे कुछ मुसाफिर

और ले चलती है साथ में

कुछ नए मेहमान

बढती जाती है अपनी गति से

न किसी से बिछुड़ने का गम

न साथ पाने की खुशी

केवल उन्ही का साथ निभाती है

जो करते हैं इन्तजार

कुछ लेट लतीफ

भागते हैं पीछे

और कुछ

देखते रह जाते हैं

आगे बढती ट्रेन को

नहीं करती मगर यह किसी का इन्तजार

बढते हुए समय की भांति....

बढ़ जाती है आगे लोकल ट्रेन

*****************************************

25.कसम से .....वो दर्द हम....

दर्द में पनपते हैं गीत ऐसा ही कुछ लोग कहते हैं

सीने में कुछ दर्द कसम से जिन्दा दफन रहते हैं

छोटे से तयखाने में उमड़ते हैं विशाल सागर

कातिल लहरों में कसम से उसकी कफन बहते हैं

कहाँ मिलता है ऐसी पीड़ा को शब्दों का सम्बल

हर पल जिसके कसम से किले बनते औ ढहते हैं

ना वक़्त ना हालात लगा सकते हैं उस पर मरहम

वो दिल सीने में कसम से कितना दर्द सहते हैं

सच्च कहते हैं दर्द की कोई सीमा नहीं होती

वो दर्द हम कसम से सीने में समेटे रहते हैं

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26. पापा

तुम्हीं तो सिखाते थे मुझे

अपने पैरो से चलना

गुस्सा होते थे माँ से

मुझे कभी रसोईघर में देखकर

मुझे कभी बेटी क्यो न समझा?

माँगती थी मैं हर चीज

आपसे माँ से चोरी

लाते थे तुम न जाने

कितने खर्चे बचाकर

या फिर अपनी जरूरतों के साथ

समझौता करके

मुझे कभी रोका क्यो नहीं ?

३.

मेरी हर बात में

हाँ में हाँ मिला देते

माँ के समझाने पर भी

केवल माँ पर ही हँस देते

क्या मैं कभी गलत न थी

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27. उधार की जिन्दगी

कांप जाती है रूह

दहल जाता है दिल

छलकते हैं आँसू

ठहर सा जाता है वक़्त

रुक जाती है साँसे

बढ़ जाती है धड़कन

उठती है टीस

किसी अनन्त गहराई से

नष्ट हो जाता है विश्वास

किसी अनश्वर सत्ता से

जब देखते हैं

मौत से भी भयानक मञ्जर

लहू-लुहान लाशें

कुरलाते बच्चे

उजड़े सुहाग

सूनी गोदयाँ

बूढे कन्धों पर

जवान अर्थी का बोझ

मौत को भी कम्पकम्पाता दृश्य

तरसती आँखें

बिन माँ के लाल

आसमान को

चीरता हुआ धमाका

और पलों में उड़ते हुए

निर्दोष हड्डियों के परखचे

तो एक बार फिर से

कराह उठता है यह मन

हे वसुधे! फिर से एक

बार इतिहास दोहराओ

और आज फिर से फट जाओ

ले लो अपनी सन्तान को

फिर से अपनी गोद में

तुम्हारे आँचल की छाया में

शायद मिल सके उधार की जिन्दगी

************************

28.कचरे वाली

सुबह सवेरे कचरा गाड़ी आती है

घर के बाहर पडा कूड़ेदान का

सारा कचरा उठाती है

और आगे निकल जाती है

अन्दर का कचरा पर नहीं उठाती

न ही उसे अन्दर आने की अनुमति है

क्योंकि..........

क्योंकि वो है कचरा उठाने वाली

साफ नहीं है वो

उसको कचरे से प्यार है

जिन हाथों से कचरा उठाती है

उन्ही हाथों से खाना भी खाती है

नहीं है उसे कचरे से नफरत

सुहाती है उसे कचरे की बदबू

नहीं होता उसे कोई इन्फैक्शन

न ही पनपते हैं उसके शरीर में

बीमारियों के भयानक किटाणु

जिनके डर से बुहारते हैं हम

अपने घर आँगन का द्वार

कीटाणुओं से मुक्ति हेतु

लगाते हैं फिनायल का पोंछा

लेकिन फिर भी नहीं कर पाते हम

अन्दर की साफ-सफाई

पनपते रहते हैं अन्दर ही अन्दर कीटाणु

जिस पर बेअसर होता है

फिनायल का जहर भी

और हम हो जाते हैं

अह्म ,स्वार्थ ,नफरत,क्रोध जैसी

लाइलाज बीमारियो के शिकार

यह कीटाणु कचरे उठाने वाली को

नहीं करते प्रभावित

और साफ सुथरे मन से

घर के बाहर पडा

सारा कचरा उठाती है

और आगे निकल जाती है

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29.हम जलाने वाले नहीं.......

१.हम जलाने नहीं ए दोस्त लगी बुझाने वाले है

नमक नहीं हम जख्मों पे मरहम लगाने वाले है

२.जल जाए अगर कोई तरु की शीतल छाया में

उस आग को हम सीने से लिपटाने वाले है

३.नहीं जलेगा दिल किसी को समझो जो अपना

खुशी के राज हम तो सबको ही बताने वाले है

४.उन लोगो के क्या कहने जो होते हैं बस अपने

हम तो गैरों को भी दिल में बसाने वाले है

५.नफरत नहीं हम प्यार में करते हैं बस यकीं

हम तो दुश्मन की भी हर खता भुलाने वाले है

६.कभी आओ हमारे घर मिटा कर अहम को अपने

चुनकर राह के काँटे हम फूल बिछाने वाले है

७.जो तुम इतना करो वादा करोगे मन अपना पावन

तो हम आकाश से गंगा जमी पर लाने वाले है

८.क्या करना हमे ए दोस्त दिलो में पाल कर नफरत

कल आए थे इस जहां में कल को जाने वाले है

९.सच्च है किसी सीमा में बन्धकर जी नहीं सकते

और हम नफरत की दीवारों को गिराने वाले है

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30.मकडी

बुनती है जाला

बड़ी आशा ,विश्वास के साथ

कि वह बना लेगी

एक प्यारा सा घर सन्सार

देखती है सुन्दर से सपने और

बुनती चली जाती है अपने ही गिर्द

एक ऐसा चक्रव्यूह

बन्द करती जाती है

बाहर निकलने के हर रास्ते

नहीं छोड़ती कोई भी खिड़की खुली

ताकि जमाने की बुरी निगाहें

देख न पाएँ

पर नहीं जानती कि वह खुद ही

अपने बुने हुए जाल में

फँस कर रह जाती है

नहीं निकल पाती

अपने ही बुने हुए जाल से बाहर

और उड़ जाते हैं उसके प्राण पखेरु

**********************

31.गाय

चौराहे पर बैठी गाय

घुमाती है नज़रें इधर-उधर

आने-जाने वाले पर

ललचाई नज़रों से

देखती है

चारे की आशा में

लोग आते हैं

देखते हैं

बतियाते हैं

और आगे निकल जाते हैं

कोई भी चारा नहीं डालता

सूर्य की डूबती किरणों के साथ ही

भूखी-प्यासी गाय की

आँखो से गायब होने

आशा की किरण

इतने में ही कोई दयावान

आता है

चारा डालता है

और

गाय को दुह कर ले जाता है

और गाय शान्त मन से उठ जाती है

अगले दिन फिर से

चौराहे पर आके बैठने के लिए

ताकि कल फिर

कोई दयावान आए

उसे दुह कर ले जाए

और उसके भूखे बच्चों के

चारे का प्रबन्ध कर जाए

***************************

32.हाय हाय

हाय हाय हर कोई पुकारे

जब भी किसी को हाय बोलो

खुश हो जाएँ मन में सारे

नहीं पूछे ,तुम कैसे हो ?

जो दिखते क्या वैसे हो ?

फिर क्यो हाय-हाय लगाई

हाय की क्यो देते हो दुहाई

नमस्कार अब हुआ पुराना

बन गया है बिल्कुल अन्जाना

जब भी हाथ जोडं कर बोलो

नमस्कार से जब मुँह खोलो

तो आदिवासी कहलाओ

अनपढ़ की उपाधि पाओ

हाय हाय कर हाय मचाई

जब भी मिले तो हाय सुनाई

हाय हाय सुन के पक गई हूँ

सच्च कहुँ तो थक गई हूँ

बन्द करो अब सब हाय-हाय

सु-विचार ही बने सहाय

हाय हाय से बस हाय ही होगी

हाय हाय तो भले रोगी

स्वस्थ तन और सुन्दर मन में

कभी न होती हाय

हाय हाय को छोड के भाई

मीठे वचन सुनाय

****************************

33.मँहगाई..........

दिनो दिन बढती जाती है

किसी नॉन स्टॉप ट्रेन की भांति

छूती जा रही है ऊँचाई

किसी उड़ान भरते विमान की भांति

खोलती है अपना मुँह

सुरसा की भांति

नहीं है अब किसी हनुमान की हिम्मत

कि कलयुगी सुरसा के मुँह में

घुसकर सुरक्षित वापिस आ सके

रह जाता है साधारण जन लटक कर

त्रिशन्कु की भांति

एक ऐसा चक्रव्यूह जिसमे

कोई अभिमन्यु घुसता है

पर वापसी के सारे मार्ग बन्द

कर जाता है अपने आप ही

बुन लेता है जाल

अपने चारों ओर

मकड़ी की भांति और

जीवन पर्यन्त खोजता है

बाहर का रास्ता

लाख प्रयत्न भी नहीं निकाल पाते

उसे इस मकड़जाल से बाहर

घेर लेती है एक अदृश्य परछाई

न जाने कब ,कैसे

और पता भी नहीं चलता

फँस जाता है

आगे कुँआ पीछे खाई

के दोराहे पर

ज्यों पेट भरने की चाहत में

निगल जाता है साँप छिपकली को

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----------------------

सिर पर कर्ज़ का बोझ लिए

ताउम्र सहता है आम जन

मँहगाई के कोड़े

और लिख जाता है वसीयत

मेँ मँहगाई..........

अपने वारिसों के नाम भी

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34.सिम्बोलिक लेन्गुएज

दुनिया बदली जमाना बदला

सन्सकृति बदली ,सभ्याचार बदला

लोग बदले सोच बदली

रहन सहन बदला

मानव का स्वभाव भी बदला

बढ़ी जनसन्ख्या

कम हुई जगह

हवेली की जगह छोटा घर

और घर की जगह फ्लैट

बहुमन्जिला इमारत में छोटे-छोटे फ्लैट

तन्ग होती जगह की साथ कम हुआ

वस्तओं का साइज भी

छोटी हुई सोच और

छोटा हुआ मानव का कद भी

बडे नाम की चाहत मे

छोटा किया नाम भी

कैसा जमाना आया

मानव ने अपना नाम भी

कोड वर्ड में बनाया

शायद सिम्बोलिक लैन्गुएज

फिर से अपना सर उठाने लगी है

समाज में अपनी जगह बनाने लगी है

निक नेम के प्रचलन से याद आती है

चित्र लिपी या फिर सूत्र लिपी

फिर से हर कोई अपने ही अर्थ निकालेगा

इन चिन्हों के प्रचलन से फिर

न जाने कितने भ्रम पालेगा

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35. जब चेहरे से नकाब हटाया मैंने

कहते हैं चेहरा दिल की जुबान होता है

दिख जाता है चेहरे पर

जो दिल में तूफान होता है

एक तूफान के बवंडर को छुपा लिया मैंने

अपने चेहरे पे एक नया चेहरा लगा लिया मैंने

फिर तूफान पे तूफान आए

मैंने भी चेहरे पे चेहरे लगाए

दिखने में खूबसूरत थे

किसी की खातिर मेरी जरूरत थे

बाहरी खूबसूरती के सम्मुख

असली खूबसूरती बेमानी थी

किसी ने भी वो खूबसूरती

नहीं पहचानी थी

मैं घिरती गई

चेहरों के चक्रवात में

जो दिखाए थे मैने

किसी को सौगात में

पर भूला नहीं मुझे

अपना असली रूप

जो सबके लिए खूबसूरत थे

वही चेहरे मुझे लगते थे कुरूप

पर क्या करती मजबूरी थी

चेहरे पे मुस्कान जो जरूरी थी

जिनको हालात की खातिर ओढा था मैंने

जिनके कारण वास्तविकता को छोड़ा था मैंने

जिनको मैंने अपनी शक्ति बनाया था

अपनों की मुस्कान हेतु जिनको अपनाया था

वही चेहरे बन बैठे मेरी कमजोरी

और दिखाने लगे सीना जोरी

हर पल मेरे सम्मुख आते

बात-बात पर

मेरी मजबूरी का अहसास कराते

रह जाती मैं आंसू पीकर

क्या करना इन चेहरों संग जीकर

डरती थी , चेहरे हटाऊंगी

तो किसी अपने को ही रुलाऊंगी

अपनों की नम आँखें

नहीं देख पाऊंगी

पर आज सहनशीलता छूट गई

चेहरों की दीवार से

एक ईंट टूट गई

हृदय में एक झरोखा बन आया

मैंने एक नकाब हटाया

जो पर्दे में कैद थीं

वो आँखें खोल दी

मानस पटल पर दबी हुई

कुछ बातें बोल दीं

थोड़ा ही सही

पर अजीब सा सुकून पाया मैंने

जब एक चेहरे से नकाब हटाया मैंने

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36.जिन्दगी है तो जियो

थक गई हूँ सुनते-सुनते

मुक्ति की परिभाषा

मुक्ति दुखोँ से ,सँसार से

जिम्मेदारियोँ से , घर-बार से

परन्तु

नहीं चाहिए मुझे मुक्ति

नहीं चाहत है मुझे

मिलने की

किसी अज्ञात से

नहीं चाहत है मुझे

बूँद की भांति

सागर में समा जाने की

चाहत है मुझे

अपने अस्तित्व की

नए रूप धरने की

सब कुछ जानने की

भले ही बनूँ मरणोपरान्त्

गली का कुत्ता

भले ही भौंकूं

राहगीरों पर

परन्तु होगा मेरा अपना अस्तित्व

होगी अपनी सोच

जिन्दगी है तो जियो

अपने लिए

अपनों के लिए

*******************************

37.भाषा का जन्म

सर्वप्रथम कैसे हुआ होगा

हमारी भाषा का जन्म

जब अनन्त एकान्त था

जब केवल शून्य था

जब केवल एक ही

सर्वसत्ता विद्यमान थी

और जब चहुँ ओर पसरा था

केवल सन्नाटा

कही न कही हुई होगी हलचल

सुना है हमारी धरती माता भी

आग का गोला थी

करोड़ो अरबों वर्षों में पाई है

इसने शीतलता

मन नहीं मानता कि सबको

सुखद अहसास कराने वाली

अपनी गोद में खिलाने वाली

धरती माता के सीने में होगी

धधकती हुई ज्वाला

और उस ज्वाला ने बदले हैं

न जाने अपने कितने रूप

सच्च है आग में जलकर ही तो

सोना खरा होता है

प्रकृति की हलचल भी तो

कारण रही होगी

किसी न किसी विकास का

शायद उस हलचल से

निकली होगी कोई ध्वनि

कही न कही पनपा होगा

कोई जीव

फूटा होगा कोई अन्कुर

और

उसकी हलचल से उत्पन्न ध्वनि

बन गई होगी

आदान-प्रदान का माध्यम

और उसी हलचल का ही

विकसित रूप होगा

हमारे सम्मुख

भाषा के माध्यम में

********************************

38.तुकबन्दी

जिसकी चाहत में हमने गुजारा जमाना

जमाने ने हमको बताया दीवाना

दीवानों की महफिल में गाए तराने

तरानों पे बजते थे साज सुहाने

सुहाना था मौसम सुहाने नजारे

नजारे क्यो लगते थे जाने प्यारे

प्यारा था साथी प्यारी सी बातें

बातें थी लम्बी छोटी थी रातें

रातों में यादों ने हमको सताया

सताने में हमको बड़ा मजा आया

आया जो सावन तो आई बहार

बहार क्या थी वो तो रही दिन चार

चार दिन क्या बीते तो पड़ने लगा सूखा

सूखे में सूखने लगा था जो भूखा

भूखे न होए भजन सब जाने

जाने तो जाने पर कोई न माने

माने जो कोई तो कैसी हो उलझन

उलझन न होती ,तो होती न सुलझन

सुलझन जो हुई तो नया रूप आया

आया जो सम्मुख तो सबको भरमाया

भरम हमने पाले मन में हजार

हजार बार उस पर किए विचार

विचारों से कभी कोई मिली जो राहत

राहत वही फिर से बनने लगी चाहत

**************************

39.कौन है वो......?

वो जो बैठी है चौराहे पर

वो जो ताकती है इधर-उधर

वो जिसकी भूखी है निगाहें

वो जो पी रही पीड़ा के आँसू

वो जो मिटा रही हवस की भूख

वो जो खुद हरदम भूखी

वो जिसकी मर चुकी सारी चाहते

वो जो जीती है दूसरो की खातिर

वो जिसका कोई मूल्य नहीं

वो जो अर्धनग्न है ...

शौक से नहीं मजबूरी से

वो जो देती है अल्ला का वास्ता

वो जिसकी आदत है हाथ फैलाना

वो जो बनाती है हर दिन नया बहाना

वो जो पेट के लिए पेट दिखाती है

और किसी की

भूख का शिकार हो जाती है

खुद भूखी ही सो जाती है

वो जो सडक किनारे सो जाती है

वो जो बिना बात बतियाती है

वो जो मुँह में बुदबुदाती है

वो जो भाव हीन है

वो जिसका जीवन रसहीन है

वो जो फटे कपड़े से तन ढाँपती है

वो जिससे मृत्यु भी काँपती है

वो जिसने बस में किया है अपना मन

जो नहीं कर सकता साधारण जन

वो जिसने सुखा दिया है

अपने आसुँओं का पानी

वो जिसके लिए कोई ऋतु नहीं सुहानी

सर्दी ,गर्मी,बरसात

सबमें एक सी रहती है

धूप को छाँव और सर्दी को गर्मी कहती है

कौन है वो.............?

कोई माँ ,पत्नी ,बहु या किसी की बेटी

या फिर

पता नहीं कौन .....?

*************************

40 . मुझे समझ नहीं आता

मुझे

समझ नहीं आता

कि इन्सान

अपने पापों से

इतना डरता क्यों है ?

अगर

डरना है

तो पाप करता क्यों है ?

क्यो

चाहता है

दबा कर रखना

अमिट सच्चाई को

नहीं

समझता शायद

भड़ास भी दबती है भला कभी

वो तो निकलेगी

नहीं निकली

तो पनपेगी

अन्दर ही अन्दर

और फिर

फटेगी किसी

बारूदी सुरंग की भांति

कर देगी

बहुत कुछ जलाकर राख

एक

छोटी सी चिन्गारी

शोला बन जाए

उससे भला

क्यो न

बुझा दिया जाए

*********************

41.जेनेरैशन गैप

नया जमाना नई सोच

नई खोज नए विचार

के साथ आया नया सभ्याचार

भुला दिया हमने

अपने पुरातत्व चिन्हों को

पूर्वजोँ की गहरी सोच को

नवीनता के मोह में बहे जा रहे हैं

घोर तम क ओर

रोशनी के नाम पर

रख रहे है कदम अँधकार में

आगे न जाने कितनी गहरी खाई

नवीनता के मोह में

हमे नज़र नहीं आई

फिर भी खुश है उस खाई में जाकर

सोने के बदले में पीतल पाकर

न जाने क्योँ हमें

पूर्वजोँ के विचार नहीं भाते

क्योँ हम उनको ज्योँ का त्योँ

अपना नहीं पाते

यही क्रम हर पीढी दोहराती है

तभी तो न्यू जेनरेशन कहलाती है

नहीं मिलते थे

मेरे पापा के विचार

अपने पापा के विचारों से

तँग थे वे अपने पापा के

सभ्याचारों से

बहुत बार मैं न सहमत थी

अपने पापा से

विरोध करता है मेरा बेटा

मेरे विचारों का

यही सिलसिला चलता रहता है

सभ्याचारों का

शायद यही जेनेरैशन गैब

नई सोच कहलाता है

और शायद यही बेटे को बाप से

दूर भगाता है

***************************

42.आधुनिक बच्चे

मॉड्रन लुक ,ब्राण्डेड जीँस

गोग्लस ,कन्धे पर पर्स लटकाए

काम पर जाती ,

फर्राटेदार इँग्लिश बोल

बॉस को लुभाती

काम के लिए पापा पर गुर्राती

माँ को बच्चे पसन्द करते हैं

सभ्याचारक साड़ी ,आदर्श पालक माँ को

बच्चे कडवी निगाह से देखते हैं

माँ के बनाए खाने को

घास बताते हैं

सास -ससुर के पैर छूने वाली माँ पर

बच्चे गुर्राते हैं

चोटी बान्धे माँ के साथ बच्चे

बाहर जाने से शर्माते हैं

मैचिन्ग सैन्डिल ,पर्स ,ज्वैलरी पहनी

माँ पर बच्चे गर्वाते हैं

काम-काजी माँ

बच्चों की पहली चाहत है

माँ की तनख्वाह को बच्चे

एशो-इशरत में उड़ाते हैं

माँ बच्चों को नहीं बल्कि

बच्चे तैयार करते हैं माँ को

माँ की साज-सज्जा का

सामान जुटाने में

बच्चे माँ का हाथ बँटाते हैं

माँ के लिए मैचिंग ड्रैस और

कॉस्ट्यूम सुझाते हैं

आजकल के बच्चे अपनी माँ को

बड़ी बहन बताते हैं

और आधुनिक बच्चे माँ को

माँ नहीं मॉडल बनाते हैं

***********************

43.आम आदमी

कौन सी है परिभाषा ....?

आम आदमी की

या फिर

कौन सी दी जाए सँज्ञा

आम आदमी को

....................................

....................................

बीड़ी के

लम्बे-लम्बे कश खीँचता

रिक्शा चलाता

बोझा ढोता

बैलोँ को हाँकता

बीच चौराहे भीख माँगता

बच्चोँ को खेल दिखाता

साइकिल चलाता

पेट की आग

बुझाने की खातिर

जीवन को

आग में झोँकता

या फिर

ए.सी. गाड़ी में

मजे से बैठ दुनिया ताकता

होटल के बन्द कमरे में

गुलछर्रे उड़ाता

बीयर बार में

रँग-रलियाँ मनाता

डेटिन्ग पर जाता

बीच पर बैठ

अर्ध-नग्न सुन्दरियाँ ताकता

या फिर

सुबह सवेरे ऑफिस को जाता

घर परिवार समाज ऑफिस की

जिम्मेदारियाँ निभाता

बॉस की झिड़की खाता

नीचे वालो को दोषी ठहराता

जूतों को घिसा कर चलता

या फिर............

.................

.................

कौन है आम आदमी .......?

*******************************************************

44.छुअन

माँ बार-बार देखती थी छूकर

जब भी कभी जरा सा गर्म होता

मेरा माथा

चिढ़ जाती थी मैं माँ की

ऐसी हरकत पर

गुस्सा भी करती

पर माँ

टिकती ही न थी

बार-बार छूने से

गुस्से और चिड़-चिडाहट की

प्रवाह न करती

तब तक न हटती

जब तक मेरे मस्तक को

ठण्डक न पहुँच जाती

न जाने बार-बार छुअन से

क्या तसल्ली मिलती उसे

उस छुअन का तब

कोई मूल्य न था

और

उस अमूल्य छुअन को

महसूस करती हूँ अब

जब तन क्या मन भी जलता है

मिलता है केवल

व्यवहारिक शब्दोँ का सम्बल

बहुत कुछ दिलो-दिमाग को

छू जाता है

महसूस होती है अब भी

कोई छुअन

जो देती है केवल चुभन

और भर जाती है

अन्तर्मन तक टीस

छेड़ जाती है आत्मा के सब तार

और वो कम्पन

जला जाता है सब कुछ

बिजली के झटके की भांति

अन्दर ही अन्दर

किसी को बाहर

खबर तक नहीं होती

तभी माँ की वो बचपन की छुअन

पहुँचा जाती है ठण्डक

और करवा देती है

जिम्मेदारियोँ का अहसास

कि आज जरूरत है किसी को

मेरी छुअन की

*************************

45.माँ की आँखें

आज रोई थी उस माँ की आँखें

जो पी जाती थी हर जहर

देख कर अपने सुत की सूरत

जिनको गरूर था अपने

वात्सल्यपूर्ण अश्रुओँ पर

एक उम्मीद के सहारे

छुपा लेती थी जो

अपने सीने में

उठते हर उफान को

कर जाती थी न जाने

कितने ही तूफानों का सामना

लड़ जाती थी अपनी तकदीर से भी

देती थी पहरा जाग कर रातों को

मूक रहती ,जुबान तक न खोलती

कि कही जरा सी आहट

बाधा न बन जाए

लाड़ले के आराम में

लेकिन खुश थी

कि उसके त्याग से

सो रहा है वो सुख की नींद

न जाने वो जगती आँखों में

कितने ही सपने समेट लेती

मुस्करा देती मन ही मन

हालात और वक़्त के आगे बेबस माँ

बस सही समय के इन्तजार मे

समय आया

हालात बदले, वक़्त बदला

लेकिन माँ की आँखों ने

फिर भी निद्रा का

रसास्वादन नहीं किया

आज सोया है सुत सदा की नींद

और वही माँ

रोती है चिल्लाती है

आवाजें लगाती है

झिँझोड़ कर जगाती है

आज वह सुत से

बतियाना चाहती है

उसको हर दर्द बताना चाहती है

आज वह उसे सुलाना नहीं

जगाना चाहती है

पर वह मूक खामोश सोया है

और...........

माँ .......की सूनी आँखो में सपना

......?

लाड़ले को जगाना ............

***************************

46.

1.

हिन्दी मेरा ईमान है

हिन्दी मेरी पहचान है

हिन्दी हूँ मैं वतन भी मेरा

प्यारा हिन्दुस्तान है

2.

हिन्दी की बिन्दी को

मस्तक पे सजा के रखना है

सर आँखो पे बिठाएँगे

यह भारत माँ का गहना है

3.

बढ़े चलो हिन्दी की डगर

हो अकेले फिर भी मगर

मार्ग की काँटे भी देखना

फूल बन जाएँगे पथ पर

4.

हिन्दी को आगे बढ़ाना है

उन्नति की राह ले जाना है

केवल इक दिन ही नहीं हमने

नित हिन्दी दिवस मनाना है

5.

हिन्दी से हिन्दुस्तान है

तभी तो यह देश महान है

निज भाषा की उन्नति के लिए

अपना सब कुछ कुर्बान है

6.

निज भाषा का नहीं गर्व जिसे

क्या प्रेम देश से होगा उसे

वही वीर देश का प्यारा है

हिन्दी ही जिसका नारा है

7.

राष्ट्र की पहचान है जो

भाषाओं में महान है जो

जो सरल सहज समझी जाए

उस हिन्दी को सम्मान दो

8.

अंग्रेजी का प्रसार भले

हम अपनी भाषा भूल चले

तिरस्कार माँ भाषा का

जिसकी ही गोद में हैं पले

9.

भाषा नहीं होती बुरी कोई

क्यों हमने मर्यादा खोई

क्यों जागृति के नाम पर

हमने स्व-भाषा ही डुबोई

10.

अच्छा बहु भाषा का ज्ञान

इससे ही बनते हैं महान

सीखो जी भर भाषा अनेक

पर राष्ट्र भाषा न भूलो एक

11.

इक दिन ऐसा भी आएगा

हिन्दी परचम लहराएगा

इस राष्ट्र भाषा का हर ज्ञाता

भारतवासी कहलाएगा

12.

निज भाषा का ज्ञान ही

उन्नति का आधार है

बिन निज भाषा ज्ञान के

नहीं होता सद-व्यवहार है

13.

आओ हम हिन्दी अपनाएँ

गैरों को परिचय करवाएँ

हिन्दी वैज्ञानिक भाषा है

यह बात सभी को समझाएँ

14.

नहीं छोड़ो अपना मूल कभी

होगी अपनी भी उन्नति तभी

सच्च में ज्ञानी कहलाओगे

अपनाओगे निज भाषा जभी

15.

हिन्दी ही हिन्द का नारा है

प्रवाहित हिन्दी धारा है

लाखों बाधाएँ हो फिर भी

नहीं रुकना काम हमारा है

16.

हम हिन्दी ही अपनाएँगे

इसको ऊँचा ले जाएँगे

हिन्दी भारत की भाषा है

हम दुनिया को दिखाएँगे

47. माँ की परिभाषा

माँ जो ममता की मूर्ति है

माँ जो सन्स्कारों की पूर्ति है

माँ जो धरती का स्वर्ग है

माँ जो साक्षात ईश्वर है

माँ जो मीठी मिठाई है

माँ हर दर्द की दवाई है

माँ बुराई के लिए जहर है

माँ जिसका स्पर्श ही अमृत है

माँ जिसके हाथों में शक्ति है

माँ जो प्रेम की भक्ति है

माँ जो खुली किताब है

माँ जिसके पास हर जवाब है

माँ जो सागर से भी गहरी है

माँ सूर की साहित्य लहरी है

माँ राम चरित मानस है

माँ जो सूखे में पावस है

माँ जो वेदों की वाणी है

माँ गन्गा ,यमुना,सरस्वती

की त्रिवेणी है

माँ लक्ष्मी गौरी वाग्देवी है

माँ जो स्वयम सेवी है

माँ ही सभ्याचार है

माँ ही उच्च विचार है

माँ ब्रह्मा , विष्णु ,महेश है

माँ के बाद कुछ न शेष है

माँ धरती ,माँ आकाश है

माँ फैला हुआ प्रकाश है

माँ सत्य ,शिव ,सुन्दर है

माँ ही मन मन्दिर है

माँ श्रद्धा है ,माँ विश्वास है

माँ ही एकमात्र आस है

माँ ही सबसे बड़ी आशा है

माँ की नहीं कोई परिभाषा है

माँ तुम्हारी नहीं कोई परिभाषा है

***********************************

48. १.

यह नहाई हुई गीली पलकें

कराती है अहसास कि

इनके पीछे है

विशाल सिन्धु

खारा जल

जो नहीं कर सकता तृप्त

नहीं बुझती इससे प्यास

यह तो बस बहता है

धार बन कर बेपरवाह

२.

आज तृप्त है चक्षु

पिघला कर

उस चट्टान सरीखी ग्रन्थि को

जो न जाने कब से

पड़ी थी बोझ बन कर मन पर

३.

आज जुबान बन्द है

बस बोलते हैं नयन

सारे के सारे शब्द बह गए

अश्रु बन कर

कर गए प्रदान अपार शान्ति

४.

आज से पहले आँखों में

इतनी चमक न थी

इससे पहले यह ऐसे नहाई न थी

५.

आज पहली बार

अपना स्वाद बदला है

नमकीन अश्रुजल पीने की आदत थी

इनको बहा कर अमृत रस चखा है

६.

नेत्रों में चमकते

सीप में मोती सरीखे आँसू

ओस की बूँद की भांति

गिरते सूने आँचल में

उद् जाते खुले गगन में

कर जाते कितना ही बोझ हल्का

49. चॉक

चॉक लिखता जाता है

श्यामपट्ट पर

और बढाता है उस काले स्याह रँग की

सुन्दरता को

अपने रँग से

और अपने सुन्दर ढँग से

बढ़ जाती है सुन्दरता

उस स्याह रँग की

जो कर देते हैं हम

अपनी जिन्दगी से दूर

या फिर जिसको समझते हैं

अकसर अपावन

वही जब ओढ़ लेता है

सफेद चॉक का मुलम्मा

तो करता है

न केवल ज्ञान-वर्धन

बल्कि देता है

उत्तम सोच को बढावा भी

होती है जिससे शुरुआत

किसी न किसी

सृजनात्मक शक्ति की

वह शक्ति जो

बनती है एक दिन अद्भुत शक्ति

चॉक तो चॉक है

सफेद बिल्कुल सफेद

कही ये मन भी चॉक होता

तो हम कर सकते

काले कारनामों को बेनकाब

या फिर चमका सकते

उस स्याह रँग के पीछे

छुपी सुन्दरता को

*******************************

50. रिश्ते

बनते बिगड़ते रिश्तों की कहानी

सुनते थे कभी दूसरों की जुबानी

क्या था क्या हो गया है

रिश्तों का बन्धन कही खो गया है

खून का रिश्ता भी हो गया है सफेद

आने लगा है अपने ही दिलों में भेद

लालच के मारे हम भूले सारा प्यार

बिक रह है आज तो पैसे में संसार

नहीं पलता अब दिलों में कोई रिश्ता

रिश्ते बनाना भी हुआ कितना सस्ता

मतलब से बन जाते हैं रिश्ते अनेक

स्वार्थ में बँध जाता है सारा विवेक

मतलब से बना लेते गधे को भी बाप

खुद के माँ-बाप से नहीं कोई मिलाप

झूठी भावनाएँ और झूठे बन्धन

स्वार्थ वश बँधा है हर एक जन

खून का रिश्ता भी नहीं रहा पावन

क्यों गन्दा हो गया है मानव का मन

नहीं सुरक्षित अपनों के बीच भी कोई

पर दुख में नहीं कोई आँख रोई

हर जग धोखा,फरेब ,झूठ का है डेरा

रिश्तों के नाम पर लूट का घेरा

आसानी से बन जाते हैं सारे रिश्ते

महँगाई के दौर में रिश्ते हुए कितने सस्ते

51. रिश्ते 2

जितनी जल्दी बिगड़ते हैं

उतनी ही जल्दी

बनते भी है रिश्ते आज

स्वार्थ के रिश्ते में

बँध गया है समाज

काँच की अँगूठी से

बन जाता है कोई भी रिश्ता

और मतलब निकला तो

टूट्ता है काँच की भांति ही

मोल का रिश्ता

भावनाहीन रिश्ता

बन्धन रहित रिश्ता

मँहगाई के दौर में

बहुत ही सस्ता

बिकते हैं बेटे और

बिकती है बेटी

रिश्तों की नींव भी

हो गई है खोटी

समझौते के रिश्ते

पनपने लगे है

दिखावे के रिश्तों में

आज सारे ठगे हैं

अन्दर से नफरत

और बाहर से प्यार

दिखाने का है

सबका विचार

खत्म हो गई भावनाएँ

रिश्ता बनाने से पहले

चलो आजमाएँ

कितना है पैसा

कितनी है जायदाद

बाद में नहीं चाहिए कोई विवाद

नहीं है ऐसा

तो रिश्ता कैसा....?

52. दुश्मन को सर न उठाने देंगे

आतंकी हमलों जैसे

कटु सत्य का जहर हमे पीना ही होगा

मौत के साए में भी जीना ही होगा

तभी तो यह सत्य शिव कहलाएगा

और महान भारत को सुन्दर बनाएगा

हम न हारेंगे हिम्मत

और न सर झुकाएँगे

अपने घर न किसी को घुसने देंगे

स्वयम मर जाएँगे

हमे स्मरण हैं दशम पिता के वचन

कोई भी नहीं साधारण जन

वारे जिन्होंने सुत चार

सहा कितना ही अत्याचार

दी अपने पिता की कुर्बानी

झोंक दी आग में अपनी जवानी

लेकिन छोड़ी नहीं हिम्मत

रहे करम में रत

हम उन पद-चिन्हों को अपनाएँगे

दुश्मन को सर न उठाने देंगे

स्वयम मर जाएँगे

************************

53 आज़ाद भारत की समस्याएँ

भारत की आज़ादी को वीरों ,

ने दिया है लाल रंग

वह लाल रंग क्यों बन रहा है ,

मानवता का काल रंग

आज़ादी हमने ली थी,

समस्याएँ मिटाने के लिए

सब ख़ुश रहें जी भर जियें,

जीवन है जीने के लिए

पर आज सुरसा की तरह ,

मुँह खोले समस्याएँ खड़ी

और हर तरफ़ चट्टान बन कर,

मार्ग में हैं ये अड़ी

अब कहाँ हनु शक्ति,

जो इस सुरसा का मुँह बंद करे

और वीरों की शहीदी ,

में नये वह रंग भरे

भुखमरी ,बीमारी, बेकारी ,

यहाँ घर कर रही

ये वही भारत भूमि है,

जो चिड़िया सोने की रही

विद्या की देवी भारती,

जो ज्ञान का भंडार है

अब उसी भारत धरा पर,

अनपढ़ता का प्रसार है

ज्ञान औ विज्ञान जग में,

भारत ने ही है दिया

वेदों की वाणी अमर वाणी,

को लुटा हमने दिया

वचन की खातिर जहाँ पर,

राज्य छोड़े जाते थे

प्राण बेशक त्याग दें,

पर प्रण न तोड़े जाते थे

वहीं झूठ ,लालच ,स्वार्थ का है,

राज्य फैला जा रहा

और लालची बन आदमी ,

बस वहशी बनता जा रहा

थोड़े से पैसे के लिए,

बहू को जलाया जाता है

माँ के द्वारा आज सुत का,

मोल लगाया जाता है

जहाँ बेटियों को देवियों के,

सद्रश पूजा जाता था

पुत्री धन पा कर मनुज ,

बस धन्य -धन्य हो जाता था

वहीं पुत्री को अब जन्म से,

पहले ही मारा जाता है

माँ -बाप से बेटी का वध,

कैसे सहारा जाता है ?

राजनीति भी जहाँ की,

विश्व में आदर्श थी

राम राज्य में जहाँ

जनता सदा ही हर्ष थी

ऐसा राम राज्य जिसमें,

सबसे उचित व्यवहार था

न कोई छोटा न बड़ा ,

न कोई आत्याचार था

न जाति -पांति न किसी,

कुप्रथा का बोलबाला था,

न चोरी -लाचारी , जहां पर,

रात भी उजाला था

आज उसी भारत में ,

भ्रष्टाचार का बोलबाला है

रात्रि तो क्या अब यहाँ पर,

दिन भी काला काला है

हो गई वह राजनीति ,

भी भ्रष्ट इस देश में

राज्य था जिसने किया ,

बस सत्य के ही वेश में

मज़हब ,धर्म के नाम पर,

अब सिर भी फोड़े जाते हैं

मस्जिद कहीं टूटी ,कहीं,

मंदिर ही तोड़े जाते हैं

अब धर्म के नाम पर,

आतंक फैला देश में

स्वार्थी कुछ तत्व ऐसे,

घूमते हर वेश में

आदमी ही आदमी का,

ख़ून पीता जा रहा

प्यार का बंधन यहाँ पर,

तनिक भी तो न रहा

कुदरत की संपदा का भारत,

वह अपार भंडार था

कण-कण में सुंदरता का ,

चहुँ ओर ही प्रसार था

बख़्शा नहीं है उसको भी,

हम नष्ट उसको कर रहे

स्वार्थ वश हो आज हम,

नियम प्रकृति के तोड़ते

कुदरत भी अपनी लीला अब,

दिखला रही विनाश की

ऐसा लगे ज्यों धरती पर,

चद्दर बिछी हो लाश की

कहीं बाढ़ तो कहीं पानी को भी,

तरसते फिरते हैं लोग

भूकंप,सूनामी कहीं वर्षा है,

मानवता के रोग

ये समस्याएँ तो इतनी,

कि ख़त्म होती नहीं

पर दुख तो है इस बात का,

इक आँख भी रोती नहीं

हम ढूंढते उस शक्ति को,

जो भारत का उधार करे

और भारतीय ख़ुशहाल हों,

भारत के बन कर ही रहें

भारत के बन कर ही रहें

*******************************************

54. न जाने क्यों......?

मन आहत है

आँखें नम

कितना पिया जाए गम

नहीं देखा जाता

बिछी हुईं लाशों का ढेर

नहीं सहन होती माँ की चीख

नहीं देखा जाता

छन-छनाती चूड़ियों का टूटना

नहीं देखा जाता

बच्चों के सर से उठता

माँ-बाप का साया

नहीं देखी जाती

माँ की सूनी गोद

नहीं देखी जाती

किसी बहन की कुरलाहट

न जाने कब थमेगा

यह मृत्यु का नर्तन

यह भयंकर विनाशकारी ताण्डव

न जाने कितनी

मासूम जाने लील लेगा

और भर जाएगा

पीछे वालों की जिन्दगी में अन्धेरा

मजबूर कर देगा जिन्दा लाश बनकर

साँस लेने को

न जाने क्यों......

*********************************************************

55. जान की होली

बम धमाकों की आवाज को

मुनिया

दीवाली के पटाखों का

शोर समझी

और

जिज्ञासु भाव से माँ के

गिर्द मँडराते हुए बोली....

यह कौन सा त्योहार है माँ

दीवाली तो नहीं.....?

माँ , खामोश निरुत्तर

आँचल में छुपाती मुनिया की

जिज्ञासा नहीं शान्त कर पाई

बस

गमगीन हो आँसू पी गई

और मुनिया

माँ के भाव तो नहीं समझी

बस दुबक गई

माँ के आँचल में

और फिर बाल-स्वभाव वश

बोलो न माँ.....

यह किसका धर्म है

जो हमारा नहीं....?

माँ खामोश

एक्टक देखती नन्हीं मुनिया को

चिपका लेती है सीने से

पर मुनिया है कि मानती ही नहीं

बोलो न माँ

इन पटाखों से

सब डरते क्यों हैं...?

माँ खामोश....

झर-झर झरते आँसू

खामोश इन्तजार में

मुनिया के प्रश्न तीर की भांति चुभ गए

सीने की अनन्त गहराई में

................

................

और अब

इन्तजार खत्म

सदा-सदा के लिए खत्म

तीन रँगों में लिपटा

चार जवानों के कन्धे पर ताबूज

और माँ

जो अब तक खामोश थी

बरस पड़ी नन्हीं मुनिया पर

मिल गई तुम्हें शान्ति

हो गई तसल्ली....

देख....

देख इसको

और पूछ इससे....

कौन सा त्योहार मनाया इसने

अब मुनिया खामोश

जैसे समझ गई बिन बताए

सारी ही बातें

कि

यह मौत का त्योहार है

आतंकवाद का धर्म है

हम नहीं मनाते यह त्योहार

क्योंकि......

यह दीवाली नहीं....

होली है .....

जान की होली

****************************************************************

56. जीवन एक कैनवस

दिन -रात,सुख-दुख ,खुशी -गम

निरन्तर

भरते रहते अपने रंग

बनती -बिगड़ती

उभरती-मिटती तस्वीरों में

समय के साथ

परिपक्व होती लकीरो में

स्याह बालों मे

गहराई आँखो में

अनुभव से

परिपूर्ण विचारो में

बदलते

वक़्त के साथ

कभी निखरते

जिसमे

स्माए हो

रंग बिरंगे फूल

कभी

धुँधला जाते

जिस पर

जमी हो हालात की धूल

यही

उभरते -मिटते

चित्रों का स्वरूप

देता है सन्देश

कि

जीवन है एक कैनवस

*************************************************************

57.जूतों की नियति

जूतों की नियति है

पैर तले रहना

अच्छे से अच्छा ब्राण्ड भी

पैरों की शोभा तो बढ़ाता है

पर जूते की नियति

नहीं बदल पाता है

कहते हैं जब बाप का जूता

बेटे के पैरों में आ जाए

तो वो बेटा नहीं रहता

दोस्त बन जाता है

और किसी गुलाम का जूता

अपनी सीमाओं को तोड़

मालिक के सर पर पड़े

तो वो गुलाम नहीं रहता

इतिहास बन जाता है

**************************************

58.भरी महफिल में नंगे पांव

अब देखना नया कानून बनाया जाएगा

भरी महफिल में नंगे पांव जाया जाएगा

भारत का इतिहास पुराना है

अब जाकर उसको पहिचाना है

भारत में कितने बडे विद्वान थे

अरे वो तो पहले से ही सावधान थे

जूते अन्दर ले जाने की मनाही थी

पर बात हमने यूँ ही उड़ाई थी

अब फिर हमारी सभ्यता को अपनाया जाएगा

देखना भरी महफिल में नंगे पांव जाया जाएगा

**********************************************************

59. शहीदों के घर..............?

शहीदों के घर कुत्ते नहीं जाते

क्योंकि वहां पावन भावनाओं की

गंगा बहती है

और बहती गंगा मे

अगर हाथ धोने जाएँ भी

तो उन्हें कोई घुसने नहीं देता

******************************************

60. मृग-तृष्णा

एक दिन

पडी थी

माँ की कोख में

अँधेरे मे

सिमटी सोई

चाह कर भी कभी न रोई

एक आशा

थी मन में

कि आगे उजाला है जीवन में

एक दिन

मिटेगा तम काला

होगा जीवन में उजाला

मिल गई

एक दिन मंजिल

धड़का उसका भी दुनिया में दिल

फिर हुआ

दुनिया से सामना

पडा फिर से स्वयं को थामना

तरसी

स्वादिष्ट खाने को भी

मर्जी से

इधर-उधर जाने को भी

मिला

पीने को केवल दूध

मिटाई

उसी से अपनी भूख

सोचा ,

एक दिन

वो भी दाँत दिखाएगी

और

मर्जी से खाएगी

जहाँ चाहेगी

वहीं पर जाएगी

दाँत भी आए

और पैरो पर भी हुई खड़ी

पर

यह दुनिया

चाबुक लेकर बढ़ी

लड़की हो

तो समझो अपनी सीमाएँ

नहीं

खुली है

तुम्हारे लिए सब राहें

फिर भी

बढती गई आगे

यह सोचकर

कि भविष्य में

रहेगी स्वयं को खोज कर

आगे भी बढ़ी

सीढ़ी पे सीढ़ी भी चढ़ी

पर

लड़की पे ही

नहीं होता किसी को विश्वास

पत्नी बनकर

लेगी सुख की साँस

एक दिन

बन भी गई पत्नी

किसी के हाथ

सौप दी जिन्दगी अपनी

पर

पत्नी बनकर भी

सुख तो नहीं पाया

जिम्मेदारियों के

बोझ ने पहरा लगाया

फिर भी

मन में यही आया

माँ बनकर

पायेगी सम्मान

और

पूरे होंगें

उसके भी अरमान

माँ बनी

और खुद को भूली

अपनी

हर इच्छा की

दे ही दी बलि

पाली

बस एक ही

चाहत मन में

कि बच्चे

सुख देंगे जीवन में

बढती गई

आगे ही आगे

वक़्त

और हालात

भी साथ ही भागे

सबने

चुन लिए

अपने-अपने रास्ते

वे भी

छोड़ गए साथ

स्वयं को छोड़ा जिनके वास्ते

और अब

आ गया वह पड़ाव

जब

फिर से हुआ

स्वयं से लगाव

पूरी जिन्दगी

उम्मीद के सहारे

आगे ही आगे रही चलती

स्वयं को

खोजने की चिन्गारी

अन्दर ही अन्दर रही जलती

भागती रही

फिर भी रही प्यासी

वक़्त ने

बना दिया

हालात की दासी

उम्मीदों से

कभी न मिली राहत

और न ही

पूरी हुई कभी चाहत

यही चाहत

मन में पाले

इक दिन दुनिया छूटी

केवल एक

मृग-तृष्णा ने

सारी ही जिन्दगी लूटी

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