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कृष्ण कुमार यादव की कविता : हे! राम

हे राम

एक बार फिर

गाँधी जी खामोश थे

सत्‍य और अहिंसा के प्रणेता

की जन्‍मस्‍थली ही

सांप्रदायिकता की हिंसा में

धू-धू जल रही थी

क्‍या इसी दिन के लिए

हिन्‍दुस्‍तान व पाक के बंटवारे को

जी पर पत्‍थर रखकर स्‍वीकारा था!

अचानक उन्‍हें लगा

किसी ने उनकी आत्‍मा

को ही छलनी कर दिया

उन्‍होंने ‘हे राम' कहना चाहा

पर तभी उन्‍मादियों की एक भीड़

उन्‍हें रौंदती चली गई।

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कृष्‍ण कुमार यादव

भारतीय डाक सेवाएं

वरिष्‍ठ डाक अधीक्षक, कानपुर मण्‍डल, कानपुर-208001

kkyadav.y@rediffmail.com

कृष्ण कुमार यादव की अन्य रचनाएँ पढ़ें उनके ब्लॉग पर:

http://www.kkyadav.blogspot.com

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