शनिवार, 28 फ़रवरी 2009

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य उपन्यास : असत्यम् अशिवम् असुन्दरम् (5)

“…आप कहेंगे ये सामान कहां से आये हैं। प्रयोगशाला कहां से आती है। तो इसका सीधा सपाट जवाब ये है कि क्यों नहीं आपको एक झापड़ मार दिया जाये ताकि...

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य उपन्यास : असत्यम् अशिवम् असुन्दरम् (4)

“..उसने पढ़ रखा था कि सपने बुनने से कभी-कभी चादर, शाल, रजाई, अंगोछा आदि बन जाते हैं। वैसे भी सपने देखना-बुनना इस देश में बिल्कुल निःशुल्क...

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