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अजन्ता शर्मा की कविताएँ




 
तुम ख्याल बन,
मेरी अधजगी रातों में उतरे हो।
मेरे मुस्काते लबों से लेकर...
उँगलियों की शरारत तक।
- अजन्ता शर्मा
 
मेरी कवितायें:
(२० कवितायें)


 



1. प्रवाह
     
         
 
बनकर नदी जब बहा करूँगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
अपनी आँखों से कहा करूँगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
हर कथा रचोगे एक सीमा तक
बनाओगे पात्र नचाओगे मुझे
मेरी कतार को काटकर तुम
एक भीड़ का हिस्सा बनाओगे मुझे
मेरी उड़ान को व्यर्थ बता
हँसोगे मुझपर, टोकोगे मुझे
एक तस्वीर बता, दीवार पर चिपकाओगे मुझे,
पर जब...
अपने ही जीवन से कुछ पल चुराकर
मैं चुपके से जी लूँ!
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
तुम्हें सोता देख,
मैं अपने सपने सी लूँ!
एक राख को साथ रखूँगी,
अपनी कविता के कान भरूँगी,
तब क्या मुझे रोक पाओगे?
जितना सको प्रयास कर लो इसे रोकने का,
इसके प्रवाह का अन्दाज़ा तो मुझे भी नहीं अभी!        

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2. व्यर्थ विषय
        
         
 
क्षणिक भ्रमित प्यार पाकर तुम क्या करोगे?
आकाशहीन-आधार पाकर तुम क्या करोगे?

तुम्हारे हीं कदमों से कुचली, रक्त-रंजित भयी,
सुर्ख फूलों का हार पाकर तुम क्या करोगे?

जिनके थिरकन पर न हो रोने हँसने का गुमां
ऐसी घुंघरु की झनकार पाकर तुम क्या करोगे?

अभिशप्त बोध करता हो जो देह तुम्हारे स्पर्श से,
उस लाश पर अधिकार पाकर तुम क्या करोगे?

तुम जो मूक हो, कहीं बधिर, तो कुछ अंध भी
मेरी कथा का सार पाकर तुम क्या करोगे?
         
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3. अनुरोध
       
 
हे बादल!
अब मेरे आँचल में तृणों की लहराई डार नहीं,
न है तुम्हारे स्वागत के लिये
ढेरों मुस्काते रंग
मेरा ज़िस्म
ईंट और पत्थरों के बोझ के तले
दबा है।
उस तमतमाये सूरज से भागकर
जो उबलते इंसान इन छतों के नीचे पका करते हैं
तुम नहीं जानते...
कि एक तुम ही हो
जिसके मृदु फुहार की आस रहती है इन्हें...
बादल! तुम बरस जाना...
अपनी ही बनाई कंक्रीट की दुनिया से ऊबे लोग
अपनी शर्म धोने अब कहाँ जायें?        

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4. अस्तित्व
      
         
 
मुझसे वो पूछता है कि अब तुम कहाँ हो?
घर के उस कोने से
तुम्हारा निशां धुल गया
है वो आसमां वीरां, जहाँ भटका करती थी तुम,
कहाँ गया वो हुनर खुद को उढ़ेलने का?
अपनी ज़िन्दगी का खाँचा बना
शतरंज की गोटियाँ चराती फिरती हो...
कहाँ राख भरोगी?
कहाँ भरोगी एक मुखौटा?
खा गयी शीत-लहर, तुम्हारे उबाल को..
अब
तुम्हें भी इशारों पर मुस्काने की आदत पड़ गयी है।
तुम भी
इस नाली का कीड़ा ही रही
भाती है जिसपर..
वही अदना सी ज़िन्दगी..
वही अदना सी मौत..
 
         
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5. इस बार
      
         
 
अनगिनत आँगन
अनगिनत छत,
अनगिनत दिये
और उनके उजालों का कोलाहल..
इनके बीच
कहीं गुम सी मैं,
कहीं भागने की हठ करता हुआ
लौ सा मचलता मेरा मन...
वो एकाकी
जो तुम्हारे गले लग कर
मुझसे लिपटने आया है
उसकी तपिश में
हिम सी पिघलती मेरी नज़रें...
मुझसे निकलकर
मुझको ही डुबोती हुई...
इस शोर और रौशनी का हाथ पकड़कर,
छलक उठे हैं चाँद पर
मेरी भावनाओं के अक्स,
और उन्हें सहलाते हुए
चन्द प्रतिलक्षित तारे,

फिर कहीं
आच्छादित धुआँ,
असहनीय आवाज़ें,
आभासित अलसाई सुबह,
और उन जमी हुई मोमबत्ती की बूँदों के नीचे
दबी मैं व मेरा सहमा मन.
एक रात अवांछित सी आई है इस बार        

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6. ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
         
         
 
इस दिल में क्या क्या अरमां छुपे
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
कोई नेह नहीं कोई सेज नहीं
कोई चांदी की पाजेब नहीं
बेकरार रात का चाँद नहीं
कोई सपनों का सामान नहीं
इन पत्तों की झनकार तले
किस थाप-राग मे हृदय घुले
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
न भाषा कोई के कह दूँ मैं
न आग-आह जो सह लूँ मैं
विकल बड़ा यह श्वास सा
शब्दहीन विचलित आस सा
जहाँ इंद्रधनुष व क्षितिज मिले
कुछ ऐसी जगह वह पले बढ़े
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
इस दिल में क्या क्या अरमां छुपे
ऐ दोस्त क्या बताऊँ तुझे!
         
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7. ...और बातें हो जायेंगी
        
         
 
आओ
हम साथ बैठें..पास बैठें।
कभी खोलूँ
कभी पहनूँ मैं अपनी अँगूठी।
तुम्हारे चेहरे को टिकाए
तुम्हारी ही कसी हुई मुट्ठी।
चमका करे धुली हुई मेज़
हमारे नेत्रों के अपलक परावर्तन से।
और तब तक
अंत: मंडल डबडबाए
प्रश्न उत्तरों के प्रत्यारोपण से।
विद्युत बन बहे
हमारे साँसों के धन-ऋण का संगम
हाँ प्रिय!
नहीं चढ़ायेंगे हम
भावनाओं पर शब्द रूप आवरण।        

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8. जमाव
        
         
 
तमतमाये सूरज ने मेरे गालों से लिपटी बूंदें सुखा डालीं,
ज़िन्दगी तूने जो भी दिया...उसका ग़म अब क्यों हों?
मैं जो हूँ
कुछ दीवारों और काँच के टुकड़ों के बीच
जहाँ चन्द उजाले हैं
कुछ अंधेरे घंटे भी
कुछ खास भी नहीं
जिसमें सिमटी पड़ी रहूँ
खाली सड़क पर
न है किसी राहगीर का अंदेशा
फिर भी तारों से डरती हूँ
कि जाने
मेरे आँचल को क्या प्राप्त हो?
फिर भी
हवा तो है!
मेरी खिड़की के बाहर
उड़ती हुई नन्हीं चिड़ियों की कतार भी है।
मेरे लिये
ठहरी ज़मीं है
ढाँपता आसमां है
ऐ ज़िन्दगी
तेरे हर लिबास को अब ओढ़ना है
तो उनके रंगों में फ़र्क करने का क्या तात्पर्य?        

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9. तुम मेरे पास हो...
        
         
 
तुम ख्याल बन,
मेरी अधजगी रातों में उतरे हो।
मेरे मुस्काते लबों से लेकर...
उँगलियों की शरारत तक।
तुम सिमटे हो मेरी करवट की सरसराहट में,
कभी बिखरे हो खुशबू बनकर..
जिसे अपनी देह से लपेट, आभास लेती हूँ तुम्हारे आलिंगन का।
जाने कितने रूप छुपे हैं तुम्हारे, मेरी बन्द पलकों के कोनों में...
जाने कई घटनायें हैं और गढ़ी हुई कहानियाँ...
जिनके विभिन्न शुरुआत हैं
परंतु एक ही अंत
स्वप्न से लेकर ..उचटती नींद तक
मेरे सर्वस्व पर तुम्हारा एकाधिपत्य।
         
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10. तुम्हारे फूल
      
         
 
तुम्हारे फूलों ने जब
मेरी सुबह की पहली साँसें महकायीं
मैंने चाहा था,
उसी वक्त तितली बन जाऊँ
मंडराऊँ खूब
उन ख़ुशबू भरे खिलखिलाते रंगों पर
बहकूँ सारा दिन उसी की महक से
महकूँ सारी रात उसी की लहक से
खुद को बटोरकर
उस गुलदस्ते का हिस्सा बन जाऊँ
अपने घर को महकाऊँ
पड़ी रहूँ दिन रात उसे लपेटे
बिखेरूँ
या सहेजूँ उसकी पंखुड़ियाँ
सजा लूँ उससे अपने अस्तित्व को
या सज लूँ मैं
कि वो हो
या ये
मैं चाह रही हूँ अब भी
अपनी पंक्तियों की शुरुआत
जो हो अंत से अनजान।        

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11. आओ जन्मदिन मनाएँ ...
     
         
 
हैपी बर्थ डे स्वतंत्र भारत.
यादों और वादों के छिछले मंच पर
स्वागत है तुम्हारा।
देखो न !
तुम्हारे स्वागत में
इस कोने से उस कोने तक
किस करीने से उल्टी लटकी हैं
हरी नीली नारंगी रंगी हुई
हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं की झंडियाँ
सुनों!
इन बैलूनों का विस्फोट
इन गिफ्ट पैकेटों में कुलबुलाती
नारों की प्रतिध्वनियाँ।
आओ!
मुँह फुलाओ,
फूँक की औपचारिकता निभाओ।
ये साठों मोमबत्तियाँ
पहले से ही फुंकी हुई हैं।
अब,
केक काटो।
देखो न!
सब के सब
इसी इन्तज़ार मे मुँह बाए खड़े हैं
निगलने के लिये।
ध्यान रखना!
केक पर सजे अपेक्षाओं के थक्के
जैसे सबके हिस्से मे जायें।
कोई डर नहीं
ये आँतें सब पचा लेती हैं...
     इतिहास
           जन्म
               नाम
                  कवितायें
                        संघर्ष
                            रक्त
                               त्याग
                                   अरमान
                                         ... सब।        

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12. मेरी दुनियाँ
   
         
 
ये ख़्वाबों ख्यालों विचारों की दुनियाँ
मन को दुखाते कुछ सवालों की दुनियाँ
उस कोने पड़ी एक शराब की बोतल
इस कोने पड़ी खाली थालों की दुनियाँ
दौड़ते औ भागते रास्तों का फन्दा
या तन्हा सिसकती राहों की दुनियाँ
तू कौन क्या तेरा क्या उसका क्या मेरा
कुछ बनते बिगड़ते सहारॊं की दुनियाँ
एक कमरे में पलते सपनों की दुनियाँ
एक कमरे में ख़्वाब के मज़ारों की दुनियाँ        

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13. ढूँढती हूँ...
       
         
 
उनको बिसारकर ढूँढती हूँ।
पहर-दर-पहर ढूँढती हूँ।

खाकर ज़हर ज़िन्दगी का,
शाम को, सहर ढूँढती हूँ।

अपने लफ्जों का गला घोंट,
उनमें असर ढूँढती हूँ।

अन्तिम पड़ाव पर आज,
अगला सफ़र ढूँढती हूँ।

बर्दाश्त की हद देखने को,
एक और कहर ढूँढती हूँ।

दीवारें न हों घरों के सिवा,
ऐसा एक शहर ढूँढती हूँ।

रंग बागों का जीवन में भरे,
फूलों का वो मंजर ढूँढती हूँ।

इश्क की रूह ज़िन्दा हो जहाँ,
ऐसी इक नज़र ढूँढती हूँ।

दिल को खुश करना चाहूँ,
वादों का नगर ढूँढती हूँ।

रौशनी आते आते टकरा गई,
सीधी - सी डगर ढूँढती हूँ।

छोड़ जाय मेरे आस का मोती,
किनारे खड़ी वो लहर ढूँढती हूँ।

जो मुझे डसता है छूटते ही,
उसी के लिये ज़हर ढूँढती हूँ।

जानती हूँ कोई साथ नहीं देता।
क्या हुआ ! अगर ढूँढती हूँ।

कौन कहता है कि मै ज़िन्दा हूँ?
ज़िन्दगी ठहर ! ढूँढती हूँ!

पत्थर में भगवान बसते हैं,
मिलते नहीं, मगर ढूँढती हूँ।
         


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14. उत्तर        


मरिचिका से भ्रमित होकर
वो प्रश्न कर बैठे हैं
थोडा पास आकर देखें
जीवन बिल्कुल सपाट है

अपने निष्टुर आंखों से
जो आग उगलते रहते हैं
उनपर बर्फ सा गिरता
मेरा निश्छल अट्ठास है

जीवन ने फल जो दिया
वह अन्तकाल मे नीम हुआ
उसे निगल भी मुस्काती
हमारे रिश्ते की मिठास है

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15. सूत सी इच्छाएं...          

रोते रोते
जी चाहता है
मोम की तरह गलती जाऊं
दीवार से चिपककर
उसमें समा जाऊं.

पर क्या करुं!
हाड-मांस की हूं जो!
जलने पर बू आती है
और
सामने खडा वो
दूर भागता है.

मेरी सूत सी इच्छाओं को
कोई
उस आग से
खींचकर
बाहर नहीं निकालता.

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16. कुछ यूं ही...          

जिन्दगी चल ! तुझे बांटती हूँ
उनसे कट कर, खुद को काटती हूँ

कितनों में जिया, कितनों ने मारा मुझे
लम्हों को कुछ इस तरह छांटती हूँ

ठूंठ मे बची हरी टहनियां चुनकर
नाम उनका ले, ज़मीं में गाडती हूँ

जिन्दगी चल ! तुझे बांटती हूँ...

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17. एकाकार        

एक आकार बन
मेरे मानस में तुम्हारा स्थापन
मुझे ठहरा गया .

न अब कोई प्रतीक्षा है
न भय है तुम्हारे जाने का.

मेरी दीवारें भी
अब तुम्हें खूब पहचानती हैं
महका करती हैं वो
तुम्हारी खुश्बू की भांति और मुझे नहलाती है

मेरी बन्द पलकों पर
वायू का सा एक थक्का
जब
तुम – सा  स्पर्श करने को
मांगता है मेरी अनुमति
मैं सहज हीं सर हिला देती हूँ

मेरे सार में विलीन हो जाता है
तुम्हारे अहसास और आवश्यकता का अनुपात

अब तुम सदा मेरे पास हो
उदभव से लेकर
समाहित होने तक.

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18. तुम्हारी याद


तुम्हारी याद आते आते कहीं उलझ जाती है,
जैसे चाँद बिल्डिंगों में अंटक गया हो कहीं,
मेरे रास्ते तनहा तय होते हैं,
सपाट रोड और उजाड़ आसमान के बीच.
कुहासों की कुनकुनाहट,
भौंकते कुत्ते सुनने नही देते.
हवा गुम गई है.
पत्थर जम गए हैं.
रातें सर्द हैं.
सिर्फ़ बर्फ हैं.
अब तुम्हारे हथेलियों की गरमाहट कहाँ?
जिससे उन्हें पिघलाऊँ?
और बूँद-बूँद पी जाऊं!
नशे मे,
रंगीन रात की प्रत्यंचा पर तीर चढाऊँ, बौराऊँ !
अब तो
सिर्फ़ बिंधा हुआ आँचल है,
जिसकी छेद से जो दिखता है,
वही गंतव्य है, दिशा है,
मैं उसी ओर चलती हूँ,
अंटके हुए चाँद को,
कंक्रीटों में ढूँढती हूँ.

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19. कुछ यूं हीं...


सोज़ - ओ - साज़ बिन कैसे तराने सुनते
आमों के मंजर, कोयल के गाने सुनते

न टूटता दम, न दिल, न यकीं, न अज़ां
चटकती कली की खिलखिलाहट ग़र वीराने सुनते

हारकर छोड़ हीं दी तेरे आने की उम्मीद
आखिर कब तलक तुम्हारे बहाने सुनते

क़ैस की ज़िन्दगी थी लैला की धड़कन
पत्थर की बुतों में अब क्या दीवाने सुनते

मेरी फ़ुगां तो मेरे अश्कों मे निहां थी
अनकही फ़र्याद को कैसे ज़माने सुनते

बयान-ए-हकीक़त भी कब हसीं होता है
और आप भी कब तक मेरे अफ़साने सुनते

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20- ज़िंदगी


जो सुलगता है उसे चुपचाप बुझाना है,
जिंदगी तेरे रंग मे रंग जाना है.

गर पढ़कर कोई सहर का दिलासा दे,
जला के हाथ लकीरों को मिटाना है.

पोछ्ना है धुंधले क्वाबों की तस्वीर,
कोरी सही, हकीकत से दीवार सजाना है.

गर लड़ना हीं है तो खाली क्यों उतरें?
अपनी तरकश को ज़ख्मों का खजाना है.
--------------------------------------------------------- 


अजन्ता शर्मा
निवास : नॉएडा, यू पी
शिक्षा : कंप्यूटर साइंस में स्नातकोत्तर
संप्रति : प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी)
साहित्य के अतिरिक्त गायन व चित्रकला में रुचि। कविताएँ देश-विदेश के विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, जालघरों और रेडियो स्टेशन में प्रकाशित-प्रसारित।
सम्पर्क :  sharma_ajanta@yahoo.com
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सभी रचनाएं बहुत अच्छी है।धन्यवाद।

भाई रविरतलामी जी,
अजंता की कविताएं यहां पढ़ कर मजा आ गया। अगर मैं सही पहचान पा रहा हूं तो यह वही अजंता हैं, जो रांची में रहती थीं और एक मंच पर कविता पाठ के दौरान हमारी मुलाकात हुई थी। फिर इन्हें हमने आकाशवाणी रांची के यूथ सेक्शन में आमंत्रित किया था। इनकी दो कविताएं मुझे बेहद अच्छी लगी थीं। टूटी फूटी पंक्तियां अब भी याद हैं :
बस की किसी सीट पर
या उसके किसी कोने में दुबकी होती है लड़की
और उससे चिपके होते हैं
कई-कई जोंक
दूसरी कविता थी :
मेरे साथ सोता है एक कुत्ता (शायद यही पंक्ति थी)
अपनी नंगी जांघें दिखाता हुआ
बेशर्मी से हंसता है
अपने पोपले जबड़े की
सड़ी हुई दांतों के बीच
आधी चॉकलेट दबा
आधी काट लेने को कहता है...

- अगर यह वही अजंता शर्मा हैं तो इनका मोबाइल नंबर मैं चाहूंगा। क्या आप मेरा मेसेज उन तक पहुंचा सकते हैं? या उनका फोन नंबर दे सकते हैं।
मेरा नंबर है 9999572266
आपका
अनुराग अन्वेषी

ajanta ji mujhe aapki sabhi kavitayen bahut pasand aayee lekin zindagi sabse padhiaya lagi. mubarkbad. kabhi waqt mile to mere blog par aayen.
www.salaamzindadili.blogspot.com

तमाम मुश्किलों के बीच जिंदगी को आसान बनाने की की कोशिश और निरंतर आगे बढ़ने का दुस्साहस ही इंसान को भीड़ से हटकर कुछ कर गुजरने की अदम्य साहस से भर देता है..
आपकी रचनाएँ जिंदगी के तमाम पहलुओं से गुजरकर निरंतर आगे बढ़ते रहने की शिक्षा से भरपूर हैं..
रचनाएँ पढ़कर मन में हलचल से मची है, जो अपने मन में उतरने को आतुर लगी..
हार्दिक शुभकामनायें!.

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