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रावेंद्रकुमार रवि की कविता : प्यार बढ़ता ही रहेगा

Baagh_240109_By RK Ravi

रावेंद्रकुमार रवि

प्यार बढ़ता ही रहेगा

... ... ...

बहादुरसिंह के

सीढ़ीदार खेतों में

साल-भर में उगते हैं --

गोभी, मटर, टमाटर, बैंगन;

पालक, धनिया, मेथी, सरसों;

अदरक, मिर्च, गडेरी, आलू;

लहसुन, मूली, गाजर, शलजम;

कद्दू, लौकी, ककड़ी, खीरा;

भट्ट, तोरई, प्याज, पिनालू;

गेहूँ, मँडुआ, मक्का, धान;

गहत, अन्य दालों के साथ!

बागों में फल भी लगते हैं;

खूब दूध देती गाएँ!

 

उसके

बाखलीनुमा घर में

साल-भर में आते हैं --

बावन पक्षी, जिनमें होते

मुर्गे, तीतर, बत्तख, सारस;

कई अन्य चिड़ियों के साथ।

बारह पशु, जिनमें होते हैं

काँकड़, चीतल, घुरड़ व साँभर;

कई अन्य पशुओं के साथ।

जिनमें होती हैं कम-से-कम

पाँच-सात मादाएँ,

जिनके गर्भ भरे होते हैं

 

फूलों-जैसे नव शिशुओं से,

बहुत मुलायम और रसीले,

जो मुन्नी को भी भाते हैं!

भटक-भटककर जब जंगल में

थका एक दिन बाघ,

देखा उसने

गाँव की तरफ -

खेल रही है मुन्नी,

फुदक-फुदककर खेल रही है!

 

उसे हो गया

बहुत प्यार मुन्नी से!

सपने में भी उसने देखा

नहीं कहीं कुछ और।

वह तड़के ही

मुन्नी को देखने चल दिया।

रास्ते में

उसे कोई नहीं मिला।

दोपहर में भी

वह मुन्नी को देखने गया।

 

रास्ते में फिर

उसे कोई नहीं मिला।

बढ़ता ही जा रहा बहुत था

मुन्नी के प्रति उसका प्यार।

शाम को वह फिर

मुन्नी से मिलने चल दिया।

इस बार भी

उसे रास्ते में कोई नहीं मिला,

तब मिल गई मुन्नी!

फूल-सी मुन्नी!!

 

उसने उठा लिया मुन्नी को

और ले गया अपने साथ।

अब तक के अपने जीवन में

पहली बार उसे

कोई इंसान प्यारा लगा

और अब

औरों के लिए भी

उसका ऐसा प्यार

बढ़ता ही रहेगा,

बढ़ता ही रहेगा

... ... ... ... ... ...

रावेंद्रकुमार रवि की अन्य रचनाएँ यहाँ पढ़ें -

http://saraspaayas.blogspot.com/2008/12/blog-post.html

----

रावेंद्रकुमार रवि

राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, चारुबेटा,

खटीमा, ऊधमसिंहनगर, उत्तराखंड (भारत) - 262 308.

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टिप्पणियाँ

  1. नव शिशु पक्षी-पशुओं के भी,
    सबको लगते अच्छे।
    मुन्नी हो या मुन्ना, सबको-
    प्यारे लगते बच्चे ।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. नव शिशु पक्षी-पशुओं के भी,
    सबको लगते अच्छे।
    मुन्नी हो या मुन्ना, सबको-
    प्यारे लगते बच्चे ।।

    उत्तर देंहटाएं
  3. निश्चित रूप से हम एक असुरक्षित समय में जी रहे हैं। अब से सिर्फ हिंस्र पशुओं को ही अच्छी लगेंगी हमारी बच्चियाँ। वे अपने मजबूत जबड़ों में दबा उठा ले जाते रहेंगे उन्हें और हम हिंस्र-पशुओं के हृदय में छिपी सौन्दर्योपासना की भावना पर चर्चा कर उसकी तरफदारी करते रहेंगे, उसे ग्लैमराइज़ करते रहेंगे। इससे पहले कि हमारी बच्चियाँ उनकी निगाह में आएँ हमें सावधान क्यों नहीं हो जाना चाहिए?

    उत्तर देंहटाएं
  4. यह रचना मनु व्याघ्रों पर है या पशु व्याघ्रों पर -थोडा घालमेल सा है ! बहरहाल आज की ताजा खबर है कि एक मादा भालू जो बुरी तरह घायल थी सोनभद्र के एक गाव ( घोरावल ब्लाक कडिया गाँव ) में मानवीय सेवा से भली चंगी होने और जंगल में छोड जाने के महीने बाद फिर वापस आ धमकी है मानव प्यार पाने ! पशु प्यार तो मानवीय और निश्चल ही होता है मगर मानव प्यार पशुवत भी हो सकता है ! एक निठारी का ही जिक्र काफी है !

    उत्तर देंहटाएं
  5. कविता के ऊपर जो ख़बर लगी है, उसे पढ़कर तो यह बात अच्छी तरह से समझ में आ जानी चाहिए कि कविता क्या संदेश दे रही है। टिप्पणी करने से पहले थोड़ा-सा सोचने की आवश्सकता थी।

    पशु प्यार तो मानवीय और निश्छल ही होता है - यह बात भी बिना विचारे लिख दी गई प्रतीत होती है।

    मानव प्यार पशुवत भी हो सकता है! - यह बात एकदम सही है।

    भालू के बारे में आपको बताना चाहता हूँ कि नर भालू ज़्यादातर स्त्री पर और मादा भालू पुरुष पर हमला करके उसे अपने साथ रखने का प्रयास मात्र इसलिए ही करती है कि वह उसका यौन शोषण कर सके।

    इस कविता में जो कुछ भी कहा गया है, वह वास्तविकता के धरातल पर खड़े होकर कहा गया है, भावुकता की रेत पर नहीं।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बलराम जी वरिष्‍ठ लघुकथाकार/साहित्‍यकार हैं। उनकी अपनी सोच है जो बहुतायत की सोच भी हो सकती है।
    बलराम जी पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश में ही बीते सप्‍ताह करीब दस मामले ऐसे हुए हैं जिसमें बच्चियों के साथ जानवरों जैसा सुलूक हुआ है। क्‍या हम मानव जाति के ऐसे जानवरों के साथ वह सुलूक कर पाने की हैसियत में हैं जो हम वन्‍य जीवों के लिए सोचते हैं।
    अगर मेरी मुन्‍नी पर बाघ झपटा तो उस पीड़ा को समझा जा सकता है लेकिन सवाल उस मूल प्रश्‍न का है कि आखिर इतनी बड़ी संख्‍या में बाघ या दूसरे वन्‍य जीव शहरों की तरफ क्‍यों आ रहे हैं। क्‍या उसके लिए हम जिम्‍मेदार नहीं हैं। प्रकृति में हर प्राणी का एक खास महत्‍व और उपयोगिता है। आज देखिए कि गिद्ध जैसा पक्षी कहीं दिखाई नहीं देता जो हमारी फैलाई हुई गंदगी को साफ करता था। हमारा मुफ्त वाला स्‍वीपर था। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं...हमें प्रकृति का संतुलन बनाए रखना है तो सोच को विस्‍तार देना होगा। बाघ यदि आदमखोर हो जाए तो उसे पहले पकड़ने का प्रयास करना चाहिए और मारना अंतिम उपाय होना चाहिए।...ये क्‍या जरूरी है कि जिस जीव को आदमखोर बताकर आपने धराशायी किया हो वह वही हो जिससे मानव त्रस्‍त हो।

    उत्तर देंहटाएं
  7. अब क्या कहे, अगर मेरे ऊपर भी कोई जंगली जानवर हमला करता , ओर मै बच जाता तो उसे मारने से पहले हजार बार सोचता जरुर, उस ने हमला किया क्यो.... की इस हमले के पीछे इंसान की गलतिया तो नही......
    ओर इंसान को क्या हक है कि वो अपना पेट भरने के लिये, या मुहं के स्वाद के लिये रोजाना एक नही दो नही करोडो जानवरो को मार कर अपनी मनपसंद तरीखे से पका कर खाता है....
    आप की कविता बहुत सुंदर ओर भावुक लगी,धन्यवाद,

    उत्तर देंहटाएं
  8. बाल साहित्यकार रावेंद्रकुमार रवि की फूलों सी बिखरे मुस्कान बाल कविता तो रचनाकार पर बहुत पहले ही पढ़ ली थी। अपनी काव्यात्मक टिप्पणी भी दे दी थी।
    आज फिर अनायास ही रचनाकार खुल गया। इसमें हरि जोशी और राज भाटिया की टिप्पणी पढ़कर मैं बहुत प्रभावित हुआ। यदि हम वास्तव में प्रकृति प्रेमी और जीवों से प्रेम करते है तो हमें अपनी सोच बदलनी ही होगी।

    जंगली जानवर यूँ ही किसी पर आक्रमण नही करता। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। मेरे विचार से सबसे बड़ा कारण यह है कि वन सिमटते जा रहे है। ऐसे में वन्य जानवरों को ठीक से रहने का न तो स्थान ही मिलता है और नही परिवेश।

    यदि वन्य जन्तु आदम खोर हो जाता है तो उसे पकड़ने भरसक प्रयत्न करना चाहिए तथा उसे गोली मारना तो उसकी हत्या करना जैसा है। इस कार्य को तो कभी भी किया जा सकता है। यह तो अन्तिम उपाय है।
    कहने का तात्पर्य यह है कि हमें वन्य जीवों की रक्षा करनी चाहिए। ताकि उनका वजूद ही न मिट जाये।

    उत्तर देंहटाएं
  9. जोशीजी,
    आपसे तो मूल प्रश्‍न तक पहुँचने की आशा थी ही । लेकिन बाघ को पकड़ने या मारने की आवश्यकता तो तभी पड़ती है, जब वह आदमख़ोर हो जाता है और उसे आदमख़ोर बनाने के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार मनुष्य है।
    सबसे पहले यह उपाय करना होगा कि वह आदमख़ोर न बनने पाए।
    यह संदेश इस कविता में निहित है और वह कारण भी, जिसकी वजह से बाघ आदमख़ोर बनता है।
    सारगर्भित और प्रेरक टिप्पणी के लिए धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  10. बाल साहित्यकार रावेंद्रकुमार रवि की फूलों सी बिखरे मुस्कान बाल कविता तो रचनाकार पर बहुत पहले ही पढ़ ली थी। अपनी काव्यात्मक टिप्पणी भी दे दी थी। आज फिर अनायास ही रचनाकार खुल गया। इसमें हरि जोशी और राज भाटिया की टिप्पणी पढ़कर मैं बहुत प्रभावित हुआ।
    यदि हम वास्तव में प्रकृति प्रेमी और जीवों से प्रेम करते है तो हमें अपनी सोच बदलनी ही होगी। जंगली जानवर यूँ ही किसी पर आक्रमण नही करता। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। मेरे विचार से सबसे बड़ा कारण यह है कि वन सिमटते जा रहे है। ऐसे में वन्य जानवरों को ठीक से रहने का न तो स्थान ही मिलता है और नही परिवेश। यदि वन्य जन्तु आदम खोर हो जाता है तो उसे पकड़ने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए तथा उसे गोली मारना तो उसकी हत्या करना जैसा है। इस कार्य को तो कभी भी किया जा सकता है। यह तो अन्तिम उपाय है।
    कहने का तात्पर्य यह है कि हमें वन्य जीवों की रक्षा करनी चाहिए। ताकि उनका वजूद ही न मिट जाये।

    उत्तर देंहटाएं
  11. बाल साहित्यकार रावेंद्रकुमार रवि की फूलों सी बिखरे मुस्कान बाल कविता तो रचनाकार पर बहुत पहले ही पढ़ ली थी। अपनी काव्यात्मक टिप्पणी भी दे दी थी। आज फिर अनायास ही रचनाकार खुल गया। इसमें हरि जोशी और राज भाटिया की टिप्पणी पढ़कर मैं बहुत प्रभावित हुआ। यदि हम वास्तव में प्रकृति प्रेमी और जीवों से प्रेम करते है तो हमें अपनी सोच बदलनी ही होगी। जंगली जानवर यूँ ही किसी पर आक्रमण नही करता। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। मेरे विचार से सबसे बड़ा कारण यह है कि वन सिमटते जा रहे है। ऐसे में वन्य जानवरों को ठीक से रहने का न तो स्थान ही मिलता है और नही परिवेश। यदि वन्य जन्तु आदम खोर हो जाता है तो उसे पकड़ने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए तथा उसे गोली मारना तो उसकी हत्या करना जैसा है। इस कार्य को तो कभी भी किया जा सकता है। यह तो अन्तिम उपाय है।
    कहने का तात्पर्य यह है कि हमें वन्य जीवों की रक्षा करनी चाहिए। ताकि उनका वजूद ही न मिट जाये।

    उत्तर देंहटाएं
  12. आदरणीय बलराम अग्रवाल जी के इस कथन से सहमत नहीं हूँ कि ........
    "हम हिंस्र-पशुओं के हृदय में छिपी सौन्दर्योपासना की भावना पर चर्चा कर उसकी तरफदारी करते रहेंगे, उसे ग्लैमराइज़ करते रहेंगे।"
    इन्होने वन्य प्राणियों के बारे में गलत धारणा पाल रखी है। कृपया आप वय प्रणियों के बारे अपना मत बदलने के लिए http://vanprani.blogspot.com पर पधारें। भालू के बारे बहुत सारी भ्रांतियाँ है, मैं भालू पर विशेष लेख जल्द हीं प्रकाशित कर रहा हूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  13. प्रेमसागरजी,
    उक्त टिप्पणी पढ़कर मुझे भी ऐसा लगा था कि अग्रवाल साहब कुछ भ्रमित-से हो गए हैं।
    आपके भालू पर आलेख की प्रतीक्षा रहेगी। मैंने अपनी टिप्पणी में भालू के विषय में जो कहा है, उसे अवश्य स्पष्ट कीजिएगा।

    उत्तर देंहटाएं
  14. सहज शब्दों की हल्की-फुल्की कविता जो सीधे मन से मन तक पहुंचती हैं। बहुत सार्थक और सुन्दर प्रयास है आपका।

    उत्तर देंहटाएं
  15. रवि जी गधे की खिंचाई करने के लिए बधाई.....

    उत्तर देंहटाएं
  16. इरशाद भाई, आपकी सहज टिप्पणी मेरी मेहनत सफल करती दिखाई दे रही है।

    उत्तर देंहटाएं
  17. जब मैंने श्री हरि जोशी
    और श्री प्रेमसागर सिंह की टिप्पणियाँ
    श्री बलराम अग्रवाल को पठनार्थ प्रेषित कीं,
    तो उन्होंने वन्य-प्राणी
    और हिंस्र-पशु में जो भेद है,
    उस पर ध्यान देने की बात कही।
    क्या ऐसा नहीं लगता कि
    वन्य-प्राणी और हिंस्र-पशु में जो भेद
    वे देख रहे हैं,
    वह केवल मनुष्य को ध्यान में रखकर
    देख रहे हैं। यदि ऐसा है,
    तो वह वन्य-प्राणी ही है,
    जो उनकी दृष्टि में हिंस्र-पशु बन रहा है।
    यहाँ जिस मूल समस्या के बारे में
    चर्चा की जा रही है,
    वह यह भी है कि एक वन्य-प्राणी मनुष्य के
    प्रति हिंस्र-पशु में क्यों तब्दील हो रहा है!
    वन्य प्राणी जब किसी पशु को मारता है,
    तब उनकी दृष्टि में वह हिंस्र-पशु
    है अथवा नहीं?
    यह बात वे सबके सामने बताएँ,
    तो ज़्यादा अच्छा लगेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  18. मुझे तो कविता बहुत अछी लगी पूरे जीव जन्तु फल सब्जियाँ सब के नाम बच्छों को रट जायेंगे आभार्

    उत्तर देंहटाएं

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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