गुरुवार, 5 मार्च 2009

पुरु मालव की कविताएँ

100_8637 (WinCE)

मैं कुछ नहीं कहता

 

मैं रो नही सकता

क्योंकि मेरे आंसुओं की कोई कीमत नहीं है

मैं अपना दुःख किसी को बता नहीं सकता

चूंकि यह लोगों को मामूली लगता है

मैं शिकायत नहीं कर सकता

चूंकि मुझ पर अहसान लदे हैं

मैं अपने ज़ज़्बात बयां नहीं कर सकता

चूंकि लोग इन्हें तर्क देकर अमान्य कर देते हैं

मैं अपनी इच्छा से कोई कार्य नहीं कर सकता

चूंकि उनकी इच्छा सर्वोपरि है

मैं अपनी तुच्छ ख़ुशियां प्रकट नहीं कर सकता

चूंकि जानने के पूर्व ही उनके चेहरे पे खिंच आती हैं

अज़ीब सी लक़ीरें

मैं खुल कर अपनी बात कह नहीं सकता

चूंकि उन्हे फ़िज़ूल बातें सुनने का वक़्त नहीं हैं

मुझे उनके इशारे समझ कर

काम करना पड़ता है

न चाहते हुए भी मुझे

हंसना पड़ता है उनकी ख़ातिर

उनके हर अच्छे-बुरे काम की

तारीफ़ करनी पड़ती है

उनकी हर राय को समर्थन देना होता है

उनके दिखावटी ग़म में

आंसू बहाने पड़ते हैं

उनकी उदासी में उदास होना पड़ता है

उनके ग़ुस्से को दयनीय बन कर

सहना पड़ता है

मेरा अपना कोई वज़ूद नहीं

मेरी कोई इच्छा नहीं

मेरा कोई सपना नहीं

मैं ख़ामोश रहता हूं

बिल्कुल ख़ामोश

कुछ नहीं कहता

सब कुछ सुनता हूं

..........

कपड़े झड़ रहे हैं

 

कपड़े झड़ रहें हैं दोनों के बदन से

दोनों नंगे हुए जाते हैं

मैं चिथड़ा-चिथड़ा जोड़कर

नाकाम कोशिशें करता हूं

बदन ढांकने की

और तुमने कर दी चिथडे-चिथड़े

अपनी़ शर्मो-हया

मेरे तार-तार कपड़ों से

झांक रही है मुफ़लिसी

मेरी नीली शिराएं ,

उभरी हड्डियां ,

मटमेली रुखी चमड़ी ,

मेरा चिपका हुआ पेट ,

डगमगाती असमर्थ टांगें ,

कंपकंपाती भुजाएं ,

कमान की तरह झुकी पीठ

और तुमने कर दी तार-तार

सारी मर्यादाएं

कपड़ा तुम्हें नहीं

तुम ढंक रही हो कपड़े को

अपने बदन से

कपड़ा सिमट कर रह गया है

तुम्हारे चुनिंदा अंगों तक

तुम दिखा रही हो बदन

फ़ैशन-शो में

सुडौल बांहें ,

नंगी टांगें ,

कसे हुए कूल्हे ,

उभरे हुए स्तन ,

निर्लज्ज हंसी ,

कामुक नज़रें टटोल रही हैं

तुम्हारे हर अंग को

और तुम्हारी आंखों में

पल रहा है इक अंधा सपना

कपड़े झड़ रहे हैं

दोनों लाचार है

दोनों बेबस

..........

तुम और मैं

 

तुम किसी शुतुरमुर्ग़ की तरह

लम्बे-लम्बे डग भरते

दौड़े चले जाते हो

और मैं चींटियों से सने केंचुएँ की भांति

रेंगता चला आता हूँ ,तुम्हारे पीछे-पीछे

तुम ऊँचे नभ में

किसी गिद्ध की तरह तैरते हो

पर फैलाए ,

सारी दुनिया पर नज़र गड़ाए

और मैं अँधे कुएँ में

किसी चमगादड़ की तरह

दीवारों पर पंख फड़फड़ाता रहता हूं

तुम ख़ून से सने दाँत दिखाते

दहाड़ते हुए

बस्तियों से ग़ुज़रते हो

और मैं टाँगों में दुम दबाए

किसी गीदड़ की भाँति

खिसियाता हुआ

तुम्हारे पीछे-पीछे चला आता हूँ

तुम किसी ग्वाले की तरह

काँधे पर लाठी लिए

जूतियाँ चरमराते हुए

आगे-आगे चले जाते हो

और मैं भेड़ों के रेवड की तरह

तुम्हारी किलकारी सुनकर

उछलता चला आता हूँ

तुम किसी वहशी की तरह

मेरे बदन से

एक-इक कपड़ा खींचकर

मुझे नंगा किए जाते हो

और मैं किसी नपुंसक की भाँति

तुम्हारी हरक़तों पर

तालियां पीट-पीट कर हँसता रहता हूँ

.........

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------