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आकांक्षा यादव की कविता : एक लड़की

akansha yadav

एक लड़की

न जाने कितनी बार

टूटी है वो टुकड़ों-टुकड़ों में

हर किसी को देखती

याचना की निगाहों से

एक बार तो हाँ कहकर देखो

कोई कोर कसर नहीं रखूँगी

तुम्‍हारी जिन्‍दगी संवारने में

पर सब बेकार

 

कोई उसके रंग को निहारता

तो कोई लम्‍बाई मापता

कोई उसे चलकर दिखाने को कहता

कोई साड़ी और सूट पहनकर बुलाता

पर कोई नहीं देखता

उसकी आँखों में

जहाँ प्‍यार है, अनुराग है

लज्‍जा है, विश्‍वास है।

 

21वीं सदी की बेटी

जवानी की दहलीज पर

कदम रख चुकी बेटी को

माँ ने सिखाये उसके कर्तव्‍य

ठीक वैसे ही

जैसे सिखाया था उनकी माँ ने

पर उन्‍हें क्‍या पता

ये इक्‍कीसवीं सदी की बेटी है

जो कर्तव्‍यों की गठरी ढोते-ढोते

अपने आँसुओं को

चुपचाप पीना नहीं जानती है

वह उतनी ही सचेत है

अपने अधिकारों को लेकर

जानती है

स्‍वयं अपनी राह बनाना

और उस पर चलने के

मानदण्‍ड निर्धारित करना।

---

आकांक्षा यादव

प्रवक्‍ता, राजकीय बालिका इण्‍टर कॉलेज

नरवल, कानपुर-209401

kk_akanksha@yahoo.com

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एक लड़की की कविता ज़्यादा अच्छी लगी

आकांक्षा जी!
आपने नारि के विभिन्न स्वरूपों की सुन्दर विवेचना की है। नर की खान नारि के दिन जल्दी ही सँवर जायेंगे। क्योंकि वो दिन जल्दी ही आने वाले हैं। जब पुरुषों की संख्या दुनिया में अधिक होगी और स्त्रियाँ कम हो जायेंगी।
बधाई।

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