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April 2009
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धुमक्खी, तितलियाँ और भँवरे जगह-जगह जाते हैं तरह-तरह के फूलों पर मँडराते हैं और रस संग्रह करके मधु बनाते हैं. इसी तरह कहा जाता है कि यदि ज्ञान इकट्ठा करना हो तो घाट-घाट का पानी पीना होगा. माना जाता है कि जो व्यक्ति जितना भ्रमण करता है उसका ज्ञान उतना बढ़ता है. चरन वई मधु बिंधते. घूमने से मधु मिलता है. चलते रहने से उद्देश्य की प्राप्ति होती है. एक समय था जब आज की तरह आवागमन की सुविधा और साधन उपलब्ध न थे तब घूमना इतना आसान न था. लोग अक्सर पैदल चलते थे और आवश्यकता पड़ने पर घोड़े अथवा बैलगाड़ी, नाव आदि का सहारा लेते थे. यूरोप में भ्रमण को खूब बढावा दिया जाता था. एक समय था जब यूरोप में माना जाता था कि जब तक व्यक्ति विश्व भ्रमण नहीं कर लेता था उसकी शिक्षा पूर्ण नहीं मानी जाती थी यह बात दीगर है कि उस समय शिक्षा सबको उपलब्ध न थी कुछ गिने चुने लोग ही शिक्षा हासिल कर सकते थे. कोलम्बस और वास्को डि गामा की यात्राओं का परिणाम आज सबको ज्ञात है. हमारे यहाँ समुद्र पार करना वर्जित था. माना जाता था समुद्र पार करने से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा. इसके बावजूद जो लोग इस नियम को तोड कर विदेश यात्रा करते थे उन्हें लौट कर प्रायश्चित करना पड़ता था. पर ऐसे भी लोग हुए जो जिन्दगी भर घूमते रहे. राहुल सांकृत्यायन जिन्दगी भर घूमते रहे और उन्होंने क्या कुछ पाया यह सर्वविदित है. उनका नाम ही पड़ गया घुमक्कड़ स्वामी. माना जाता है कि रचनाकार के लिए घूमना अत्यंत आवश्यक है जब वह विभिन्न स्थानों पर जाता है तो वहाँ के लोगों के जीवन, रहन-सहन, रीति-रिवाज, खान-पान, भाषा-बोली, सभ्यता-संस्कृति से से परिचित होता है जो उसके लेखन की प्रेरणा और सामग्री बनता है.

देखना यह है कि क्या यह नियम सर्वमान्य है या इसके अपवाद भी हैं. असल बात विस्तार की नहीं वरन

गहराई की है. लेखन के लिए संवेदनशील होना जीवन को उसकी समग्रता में जीना आवश्यक है. यह एक स्थान पर रहते हुए भी संभव है वरना लोग सारी जिन्दगी घूमते हुए जिन्दगी को इतने सतही तरीके से, इतना ऊपर-ऊपर जीते हैं कि जिन्दगी समाप्त हो जाती है और उन्हें पता ही नहीं चलता है कि यह क्या है. क्या जो लेखक अपने स्थान को नहीं छोड़ते हैं वे उच्च कोटि की रचनाएँ नहीं कर सकते हैं? नहीं करते हैं? या उनका साहित्य मानवता की संवेदनाओं से अछूता रहता है? क्या वे संकुचित विचार धारा को प्रस्तुत करते हैं? अथवा उनका साहित्य भी मानवता के हित की बात करता है? क्या वे अन्य लोगों के मन की बात नहीं कहते हैं? क्या ऐसे लेखक सम्मान के अधिकारी नहीं होते हैं? इस आलेख में ऐसे ही कुछ लेखकों को जानने-समझने का प्रयास हुआ है जिन्होंने अपना जन्म स्थान नहीं छोड़ा जो एक ही स्थान पर रहते हुए रचना कर्म करते रहे और जिन्होंने विश्व साहित्य में अपना स्थान बनाया. इतना ही नहीं इन लेखकों ने इतनी उच्च कोटि की रचनाएँ विश्व को दी कि उन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया.

लोगों की रूचि भिन्न-भिन्न होती है. कुछ लोगों को घूमना बहुत अच्छा लगता है वे हर समय घर से निकल पड़ने को तत्पर रहते हैं. दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं जिन्हें घर छोड़ने के नाम पर बुखार आता है. वे जब तक अत्यावश्यक न हो अपने घर से बाहर निकलना पसन्द नहीं करते हैं. कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें घूमने का बहुत शौक होता है परंतु किसी न किसी कारण से उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाती है. कभी निजी परेशानी, कभी अर्थिक कठिनाई, कभी कुछ और. कुछ और ऐसे भी लोग हैं जिनके साथ कोई परेशानी नहीं होती है वे साधन सम्पन्न भी होते हैं परंतु वे अपने स्थान से बाहर जाने की आवश्यकता महसूस नहीं करते हैं. ऐसे रचनाकार भी हुए हैं जिन्होंने अपना शहर कभी नहीं छोड़ा परंतु इससे उनके लेखन की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आई. उनका साहित्य उनका दृष्ठिकोण संकुचित नहीं हुआ है. बहुत सारे ऐसे रचनाकार हुए हैं जिन्होंने अपना शहर नहीं छोड़ा परंतु आलेख की सीमा को देखते हुए यहाँ मात्र कुछ रचनाकारों की ही चर्चा की जा रही है.

लेखकों के अपने स्थान से बाहर न जाने के बहुत कारण हो सकते हैं एक समय था जब यातायात के साधनों का अभाव था पर आज बात ऐसी नहीं है. तीव्रतम गति के वाहन उपलब्ध हैं, फिर भी कुछ लेखक यात्रा करना पसन्द नहीं करते हैं. कभी-कभी अर्थाभाव भी कारण बनता है पर कुछ लेखक ऐसे भी लेखक है जिन्हे ऐसी कोई दिक्कत नहीं है पर वे अपना शहर नहीं छोड़ते हैं, छोड़ना नहीं चाहते हैं, जैसे कि ओरहान पामुक. उनके साथ ऐसी कोई बन्दिश न थी. वे खूब समृद्ध परिवार से आते हैं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी बहुत भली-भाँति हुई परंतु एक दिन सब छोड़ कर उन्होंने लेखक बनने का निश्चय किया और स्वयं को एक कमरे में बन्द कर लिया. बरसों-बरस लिखते रहे. उनकी माँ अक्सर उनसे कहतीं ‘तुम थोडे वक्त के लिए बाहर क्यों नहीं निकलते, माहौल बदलने की थोड़ी कोशिश क्यों नहीं करते... सफर पर क्यों नहीं चले जाते.’ परंतु पामुक ने न केवल अपना शहर इस्ताम्बूल नहीं छोड़ा बल्कि अपनी इमारत ‘पामुक अपार्टमेंट्स’ को भी नहीं छोड़ा. उन्होंने न केवल अपना शहर और इमारत नहीं छोड़ी है वरन अपने कमरे को खिड़की से सदा एक ही दृश्य को घूरा और उच्च कोटि की रचनाएँ दीं.

ऐसे रचनाकार भी हुए हैं जिन्होंने अपना शहर कभी नहीं छोड़ा परंतु इससे उनके लेखन की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आई. उनका साहित्य उनका दृष्ठिकोण संकुचित नहीं हुआ है. बहुत सारे ऐसे रचनाकार हुए हैं जिन्होंने अपना शहर नहीं छोड़ा परंतु आलेख की सीमा को देखते हुए यहाँ मात्र कुछ रचनाकारों की ही चर्चा की जा रही है.

लेखकों के अपने स्थान से बाहर न जाने के बहुत कारण हो सकते हैं एक समय था जब यातायात के साधनों का अभाव था पर आज बात ऐसी नहीं है. तीव्रतम गति के वाहन उपलब्ध हैं, फिर भी कुछ लेखक यात्रा करना पसन्द नहीं करते हैं. कभी-कभी अर्थाभाव भी कारण बनता है पर कुछ लेखक ऐसे भी लेखक है जिन्हे ऐसी कोई दिक्कत नहीं है पर वे अपना शहर नहीं छोड़ते हैं, छोड़ना नहीं चाहते हैं, जैसे कि ओरहान पामुक. उनके साथ ऐसी कोई बन्दिश न थी. वे खूब समृद्ध परिवार से आते हैं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी बहुत भली-भाँति हुई परंतु एक दिन सब छोड़ कर उन्होंने लेखक बनने का निश्चय किया और स्वयं को एक कमरे में बन्द कर लिया. बरसों-बरस लिखते रहे. उनकी माँ अक्सर उनसे कहतीं ‘तुम थोडे वक्त के लिए बाहर क्यों नहीं निकलते, माहौल बदलने की थोडी कोशिश क्यों नहीं करते... सफर पर क्यों नहीं चले जाते.’ परंतु पामुक ने न केवल अपना शहर इस्ताम्बूल नहीं छोड़ा बल्कि अपनी इमारत ‘पामुक अपार्टमेंट्स’

को भी नहीं छोड़ा. उन्होंने न केवल अपना शहर और इमारत नहीं छोड़ी है वरन अपने कमरे को खिडकी से सदा एक ही दृश्य को घूरा और उच्च कोटी की रचनाएँ दीं.

पामुक का जन्म १९५२ में इस्ताम्बूल में हुआ. इस्ताम्बूल एक प्राचीन शहर है दो दुनियाओं की मिलन स्थली. यह स्थल पूर्व और पश्चिम की सभ्यताओं का संगम है. एक समय यह व्यापार की धड़कन हुआ करता था. खूब जीवंत शहर था. इसे ही पामुक ने अपने अधिकाँश कार्य व्यापार का केंद्र बनाया है. ओरहान पामुक २२ साल की उम्र तक एक कलाकार बनने का स्वप्न पाल रहे थे और ज्यादातर समय चित्रकारी करते रहते थे. इस समय तक वे अपने पिता के पुस्तकालय की सारी किताबों से परिचित हो चुके थे भले ही उन्होंने सबको पढ़ा नहीं था. लेकिन वे देख थे कि इन किताबों में वे या उनके लोग, उनकी सभ्यता-संस्कृति कहीं भी न थी. दुनिया का केंद्र तुर्की न था. यह बात उन्हें गहरे कचोटने लगी. जो साहित्य वे पढ़ रहे थे उसके केंद्र में ज्यादा समृद्ध, ज्यादा उत्तेजक जीवन था. कुछ बाद में उन्हें यह भी पता चला कि दुनिया के बहुत सारे अन्य देश और उनके लोगों का जीवन, उनकी सभ्यता-संस्कृति विश्व साहित्य का हिस्सा नहीं है. वे विश्व साहित्य के केंद्र में नहीं हैं. पामुक पश्चिमी और यूरोपीय साहित्य की बात कर रहे हैं. तब उनके लिए पढ़ने का अर्थ था एक दूसरी दूर की, भिन्न और अजनबी दुनिया में विचरण करना. तुर्की जो पूर्व और पश्चिम की मिलन स्थली है वह पश्चिमी साहित्य का केंद्र तो दूर उसका हिस्सा भी न था. उस साहित्य में उसका प्रवेश न था.

पामुक ने निश्चय किया कि वे तुर्की के भूगोल, इतिहास, समाज, सभ्यता, संस्कृति को साहित्य का केंद्र बनाएँगे. इसके लिए उन्होंने निरंतर प्रयास किया. स्वयं को एक कमरे में बन्द कर लिया और लिखना प्रारम्भ कर दिया. तब से लेकर आज तक उन्होंने लिखने के अलावा कोई और काम नहीं किया है. उनकी मेहनत और लगन का नतीजा हुआ ‘स्नो’, ‘माई नेम इज रेड’, ‘इस्ताम्बुलः मेमोरीज ऑफ ए सिटी’, ‘द ब्लैक बुक’, ‘केवेडेट बे एंड हिज संस’, ‘द ह्वाइट कैसेल’, ‘द साइलेंट हाउस’, ‘द न्यू लाइफ’. अपनी किताब ‘इस्ताम्बूल ः मेमोरीज ऑफ अ सिटी’ में पामुक स्वयं कहते हैं कि मैंने इस्ताम्बूल को कभी नहीं छोड़ा - अपने बचपन के घरों, गलियों और आस-पडोस को कभी नहीं छोड़ा. हालाँकि समय-समय पर मैं दूसरे जिलों में रहा हूँ पर फिर पामुक अपार्टमेंट्स में लौट आया हूँ जहाँ मेरे पहले फोटोग्राफ लिए गए थे और जहाँ मेरी माँ ने मुझे पहली बार बाँहों में उठाया था. इस्ताम्बूल का भाग्य उनका भाग्य है. वे शहर से बहुत गहरे जुडे हुए हैं क्योंकि आज जो वे हैं वैसा उन्हें इस शहर ने बनाया है. उन्होंने इस्ताम्बूल को साहित्य का केंद्र बना दिया और इस केंद्र में इतना आकर्षण था कि नोबेल समिति का ध्यान उनकी ओर गया और उन्हें २००६ का नोबेल पुरस्कार मिला. पामुक नोबेल पुरस्कार पाने वाले सबसे कम उम्र के साहित्यकार हैं. उनके साहित्य का विश्व की अधिकाँश भाषाओं में प्रकाशन हो चुका है. तुर्की में उनकी किताबों की रिकॉर्ड तोड बिक्री होती है. वे अपने साहित्य के साथ-साथ अपने साक्षात्कारों के लिए भी जाने जाते हैं.

फ्लॉबेयर जब इस्ताम्बूल शहर में आया था तो इसकी गलियाँ बहुत गुलजार थीं. इनमें तमाम क्रिया-कलाप चलते रहते थे. शहर में रौनक थी. गत्यात्मकता थी. इससे प्रभावित होकर उसने घोषणा कर दी कि जल्द ही इस्ताम्बूल विश्व की राजधानी बन जाएगा. पामुक को अफसोस है कि ऐसा न हुआ बल्कि इस शहर का इतना पतन हुआ कि यह दुनिया की तो दूर तुर्की की राजधानी भी न बन सका. ओटोमन साम्राज्य के पतन के साथ-साथ इस्ताम्बूल का भी पतन हो गया. दुनिया भूल ही गई कि इस्ताम्बूल का भी अस्तित्व है. जब १९५२ में ओरहान पामुक का जन्म हुआ यह शहर बहुत गरीब और दुनिया से बहुत कटा हुआ था. अपने दो हजार साल के इतिहास में यह शहर कभी भी इतना मुफलिस न था.

पामुक की दृष्टि में यह सदा से खंडहरों और साम्राज्य के अंत की उदासी का शहर रहा है. सारी जिन्दगी या तो वे इसकी उदासी में नहाते रहें हैं या फिर इसकी उदासी को अपनी बना कर जीते रहे हैं. जिन्दगी में कम-से-कम एक बार चिंतन करते हुए हम इस इस बात का निरीक्षण अवश्य करते हैं कि हमारा जन्म किन परिस्थितियों में हुआ है. हम दुनिया के इसी खास स्थान पर इसी खास तारीख को क्यों पैदा हुए? इन परिवारों जिनमें हम पैदा हुए, जिन देशों और जिन शहरों को जीवन की लॉटरी ने हमारे लिए चुना - वे हमसे प्रेम की उम्मीद करते हैं और अंत में हम उन्हें प्रेम करते भी हैं तहे दिल से - परंतु क्या हम इससे बेहतर के हकदार थे? एक बुढाते और जबरदस्ती उन्नत बनाए गए इस्ताम्बूल जैसे शहर में, शहर जो साम्राज्य के पतन की राख में दबा पड़ा है में, जनम लेने के कारण पामुक कभी-कभी स्वयं को अभागा मानते हैं, परंतु तभी उनके भीतर से एक आवाज उठती है जो प्रतिरोध करते हुए इस बात को उनका दुर्भाग्य नहीं वरन सौभाग्य कहती है.

पामुक का जन्म एक ऐसे समय में हुआ जब असल में शहर एक बहुत बुरे दौर से गुजर रहा था लेकिन उनका परिवार काफी प्रतिष्ठित था. कुछ लोग इस बात से सहमत न होंगे कि यह इस्ताम्बूल का उतार का काल था. अक्सर वे शिकायत नहीं करते हैं, उन्होंने अपने जनम के शहर को भी वैसे ही स्वीकार कर लिया है जैसे अपने शरीर को. कभी-कभी उन्हें लगता है काश वे और खूबसूरत होते और सुगठित होते (देखने में वे खासे खूबसूरत हैं). जैसे शारीरिक सौष्ठव को लेकर उनकी हसरत है वैसे ही जन्मस्थान को लेकार भी यह इच्छा जोर मारती है कि काश वे किसी बेहतर देश में जन्मे होते. इसी तरह उन्हें यह भी लगता है यदि वे एक औरत होते तो कैसा रहता? क्या अच्छा होता? लेकिन यह उनका भाग्य है और भाग्य से तर्क नहीं किया जाता है. उनकी किताब ‘इस्ताम्बूल ः मेमोरीज ऑफ अ सिटी’ भाग्य के विषय में है.

जब पामुक ने लिखना प्रारम्भ किया तो उनका जोर शोर से स्वागत हुआ कारण यह था कि उनके पहले जो लेखक लिख रहे थे वे साहित्य को सामाजिक दायित्व मान कर रचना कर रहे थे. उन लोगों के कार्य में राजनीति और नैतिकता की भरमार थी. वे सपाट और यथार्थवादी थे उनके यहाँ किसी प्रयोग की कोई गुंजाइश न थी. पामुक उन लोगों की भाँति नहीं लिखना चाहते थे क्योंकि उन्हें इससे बेहतर साहित्य का चस्का लग चुका था. उन्होंने अपने पाठकीय जीवन के प्रारम्भ से ही विश्व के बेहतरीन लेखकों का अध्ययन किया था, विलियम फॉक्नर, वर्जीनिया बुल्फ, प्रूस्त जैसे लेखकों को पढ़ा और पढ़ कर आनन्द लिया था. उनके साहित्य पर इन लेखकों का प्रभाव स्पष्ठ रूप से देखा जा सकता है. साठ और सत्तर के दशक में रचा गया साहित्य अपनी लोकप्रियता खो रहा था अतः इस दौर में जब पामुक अपना साहित्य ले कर आए तो पाठकों के लिए यह ताजी हवा के एक झोंके के समान था लोगों ने उनको हाथों-हाथ लिया. नई पीढी ने उनके साहित्य का स्वागत किया.

कुछ सालों के बाद जब पामुक की किताबें बेशुमार संख्या में बिकने लगीं तुर्की की किताबों की बिक्री का रिकॉर्ड टूटने लगा तो उनकी प्रसिद्धि पर ग्रहण लगने लगा वे कहते हैं कि नौवें दशक के मध्य में उनकी किताबों की बिक्री लोगों की कल्पना से कई गुना ज्यादा हो गई तो तुर्की प्रेस और वहाँ के बौद्धिक समुदाय के साथ उनके हनीमून बरस समाप्त हो गए. उसके बाद से उनके देश में उनकी किताबों के कथानक विषय वस्तु की समीक्षा न हो कर उनके प्रचार प्रसार और बिक्री की आलोचना मुख्य हो गई. और दुर्भाग्य से आज वे अपने साहित्य से ज्यादा अपनी राजनीतिक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं. टिप्पणियाँ जो वे अंतरराष्ठ्रीय साक्षात्कारों के सन्दर्भ में करते हैं उन्हें उनके अपने देश में बिना सन्दर्भ के प्रस्तुत किया जाता है और उनकी आलोचना की जाती है. इस्ताम्बूल के शासन तंत्र पर की गई उनकी टिप्पणियों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है. वे अपने देश में लोगों की आँख की किरकिरी हैं. जितने विद्रोही वे हैं नहीं उससे ज्यादा विद्रोही उन्हें दिखाया जाता है. राष्ट्रीय हितों का दावा करने वाले उन्हें जबरदस्ती बदनाम करने पर तुले हैं कभी कभी उन्हें मूर्ख सिद्ध करने का भी प्रयास किया जाता है. स्वयं पामुक के अनुसार वे इतने मूर्ख नहीं हैं ऐसे लोगों के संकीर्ण नजरिए को भली भाँति जानते समझते हैं. इस्ताम्बूल भौगोलिक रूप से भ्रमित देश है, वैसे ही जैसे तुर्की राष्ठ्र. यहाँ साठ प्रतिशत लोग परम्परावादी हैं और चालीस प्रतिशत जनता पश्चिम के राष्ट्रों का मुँह जोहती रहती है. ये दोनों समूह पिछले दो सौ सालों से बहस कर रहे हैं. पूर्व और पश्चिम के बीच की यह स्थिति नारकीय है, तुर्की में यही जीवन शैली है. पामुक इसी जटिलता, इसी संकरता और इसके कारण आई जीवन की विभिन्नता और समृद्धि को अपने साहित्य का अंग बनाते हैं.

अपने उपन्यास ‘माई नेम इस रेड’ में वे एक पुल का कार्य करना चाहते हैं क्योंकि पुल किसी महादेश, किसी सभ्यता का प्रतिनिधित्व नहीं करता है किसी एक का नहीं होता है साथ ही वह दोनों सभ्यताओं का अवलोकन करने की अनोखी स्थिति में होता है और उनसे बाहर भी होता है. यह पुल की विशेषता और आश्चर्यजनक खासियत होती है. वे बार बार इसी बात को दोहराते हैं अपनी प्रत्येक किताब में दोहराते हैं यही उनके कार्य की स्वर लहरी है कि सभ्यताओं का टकराव, पार्टियों का टकराव, संस्कृतियों का टकराव महत्वपूर्ण नहीं है पिछले कई दशकों से वे तुर्की के पाठकों अपने सभी पाठकों से यही कह रहे हैं. वे सबसे कहते हैं कि दूसरों के बारे में सोचो, दूसरे महादेशों के विषय में सोचो. दूसरे महादेशों के लोग, दूसरी सभ्यताएँ, दूसरी संस्कृतियाँ तुम्हारी तरह ही हैं. वे जोर दे कर कहते हैं यह समानता की बात साहित्य भली-भाँति समझाता है. अच्छे साहित्य और उपन्यासों पर ध्यान देना चाहिए राजनीतिज्ञों पर विश्वास नहीं करना चाहिए पामुक का ऐसा दृढ विश्वास है.

ऐसे ही एक और लेखक १९८८ के नोबेल पुरस्कार विजेता हैं नजीब महफूज. उन्होंने भी कभी अपना शहर कैरो (काहिरा) नहीं छोड़ा. उनकी जान पर बन आई उन्हें सुरक्षा की दृष्टि से देश के बाहर ले जाने के प्रयत्न हुए परंतु उन्होंने अपना शहर, अपना घर नहीं छोड़ा और लगातार सृजन में संलग्न रहे. उन्होंने विपुल साहित्य रचा और अपनी रचनाओं में काहिरा को सदा के लिए अमर कर दिया. काहिरा पहले भी विख्यात था परंतु उन्होंने इस शहर को आधुनिक साहित्य का हिस्सा बना दिया. यहाँ तक कि जब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला तो उसे लेने भी वे स्वयं नहीं गए उनकी दो बेटियाँ गई थीं.

नजीब महफूज भी भाग्य पर विश्वास करते हैं उनके अधिकतर उपन्यासों में भाग्य की प्रबलता दीख पड़ती है परंतु इस कारण उनके पात्र संघर्ष करना, कर्म करना छोड़ नहीं देते हैं वे अंत तक अपने भाग्य को बदलने के लिए लड़ते हैं. भाग्य पौरत्व दर्शन का एक प्रमुख हिस्सा है. बड़े-से-बड़ा तार्किक भी कहीं-न-कहीं भाग्य को स्वीकार करता है. इससे कर्म की महत्ता कम नहीं हो जाती है. नजीब महफूज अपने जीवन के अंतिम दिनों तक सक्रिय रहे. उनका कहना था, ‘‘अगर लिखने की तलब कभी मुझे छोड़ गई तो उस दिन को मैं चाहता हूँ कि वह मेरा अंतिम दिन हो’’ ‘द चिल्ड्रेन ऑफ गेबेलावी’ ‘ऑटम क्वायल’ ‘द थीफ एंड द डॉग्स’ ‘ए हाउस ऑन द नाइल’ ‘मीरामार’ ‘ए विस्पर ऑफ मैडनेस’ ‘हिकमत कूफू’, ‘खान अल-खलीली’ ‘अमाम अल अर्श’ ‘टीचिंग ऑफ चेती’, ‘जकाक अल मिदक’ ‘इक्कोज ऑफ एन ऑटॉबाईग्राफी’ और ‘ड्रीम्स ऑफ रिक्युपरेशन’ ‘लैली अल्फ लैला’, ‘रदुबीस’ आदि उनकी रचनाएँ हैं. निरंतर लिख कर उन्होंने विपुल साहित्य रचा. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में उनका कहना है कि इसे पवित्र माना जाए. विचार केवल प्रति-विचार के रूप में ही सुधारे जा सकते हैं. उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हुए भी सामाजिक शांति को उससे ऊ पर स्थान दिया. लोग तर्क और विचार की रोशनी को बुझा देना चाहते हैं. अभिव्यक्ति की आजादी की हर हाल में रक्षा होनी चाहिए और किसी विचार को अगर परास्त या दुरुस्त करना है, तो बलपूर्वक नहीं बल्कि प्रतिरोधी विचारों के द्वारा ही ऐसा किया जा सकता है. अपने शहर काहिरा में रहते हुए उन्होंने अरबी उपन्यास को बुलन्दी पर पहुँचाया. उसे इतना प्रौढ़ बनाया कि वह नोबेल पुरस्कार का हकदार बना. उनके हर उपन्यास का प्रकाशन मिस्र में एक सांस्कृतिक घटना होती थी और गिब्राल्टर से लेकर खाड़ी तक कोई भी साहित्यिक चर्चा उनके नाम के बिना पूरी नहीं हो सकती है.

महफूज भी अपनी रचनाओं में अस्तित्व के प्रश्न से जूझ रहे हैं. अपने उपन्यास ‘जकाक अल मिदक’ (‘मिदक ऐली’) में गली को महफूज ने एक स्टेज की तरह सजाया है जिसमें रंगबिरंगे लोग हैं. मिदक ऐली का वर्णन प्यारा और पारदर्शी है. यह बहुरंगी भीड़ मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद को प्रस्तुत करती है. यह अपनी एक खास और अनोखी हलचल से भरी हुई है. इस उपन्यास में मिस्र की राजधानी काहिरा का परिवेश, वहाँ की गलियाँ, जीवन शैली, रिश्ते और संस्कृति सभी कुछ जीवंत हो कर सामने आ जाते हैं. इनमें उन्होंने परम्परावादी अरब शहरी जीवन का चित्रण किया है. मूल रूप से इसकी जडे सम्पूर्ण जीवन से जुडी हैं फिर भी एक ही साथ यह गए जमाने के बहुत सारे रहस्यों को भी सीने पर रखे हुए है.

महफूज इसे अपना भाग्य मानते हैं कि वे इन दो सभ्यताओं के मिलन से बनी सभ्यता में जन्मे और उन्होंने इसका दूध पीया और इसके साहित्य एवं कला से उनका पोषण हुआ. इसके साथ ही वे कहते हैं कि उन्होंने पश्चिमी जगत की समृद्ध और आकर्षक संस्कृति की सुधा को भी पिया है. इन्ही सबकी प्रेरणा और खुद अपनी उत्कंठा से शब्द उनसे निसृत होते रहते हैं. वे कहते हैं, ‘‘मैं दो सभ्यताओं के मिलन का पुत्र हूँ. इन सभ्यताओं का इतिहास के किसी मोड पर कभी मिलन हुआ था. इनमें से एक फराओ कालीन सभ्यता सात हजार साल पुरानी सभ्यता है और दूसरी इस्लामिक एक हजार चार सौ साल पुरानी सभ्यता.’’

उनका मानना है कि कला का हृदय बहुत विशाल होता है और यह बहुत सहानुभूति रखने वाली है. जैसे यह प्रसन्न रहने वालों पर कृपा करती है वैसे ही यह अभागों को छोड़ नहीं देती है. यह दोनों को ही जो उनके हृदय में उमड़-घुमड़ रहा होता है उसे अभिव्यक्त करने देती है. सभ्यता के इतिहास के इस निर्णायक क्षण में यह अविश्वसनीय और अस्वीकार्य है कि मानवता की सिसकियाँ शून्य में समाप्त हो जाएँ. इसमें शक नहीं कि मानवता प्रौढ़ हो गई है और हमारा युग महाशक्तियों से अपेक्षाओं के बीच प्रवेश कर रहा है. मनुष्य का मस्तिष्क अब नष्ट करने और सर्वनाश करने के सारे कारणों को समाप्त कर डालने में लगा है. जैसे वैज्ञानिक औद्योगिक पर्यावरण प्रदूषण को साफ करने में लगे हैं बौद्धिक लोगों को मानवता के नैतिक प्रदुषण की सफाई में लगना है. वे बौद्धिक लोगों का आह्वान करते हुए कहते हैं यह हमारा अधिकार और कर्तव्य दोनों है कि हम सभ्य देशों और उनके अर्थशास्त्रियों से वह कदम उठाने को कहें.

वे अपने नोबेल भाषण में यह भी कहते हैं कि प्राचीन काल में प्रत्येक राजा केवल अपने लोगों की भलाई के काम करता था. दूसरे शत्रु माने जाते थे या शोषण का वायस माने जाते थे, पहले राज्य बहुत संकीर्ण उद्देश्यों को लेकर चलते थे. अपनी सर्वोच्चता और निजी गौरव के अलावा किसी और बात की इज्जत न थी. केवल व्यक्तिगत ख्याति और उच्चता को मूल्य दिया जाता था. इस बात को सिद्ध करने के लिए बहुत सी नैतिक बातों, आदर्शों और मूल्यों को नष्ट कर दिया जाता था, अनेक अनैतिक साधन न्यायसंगत माने जाते थे, बहुत से लोगों को नष्ट होना पड़ता था. झूठ, मक्कारी, षडयंत्र, क्रूरता सब नकारात्मक बातें तब ज्ञान और महानता के लक्षण मानी जाती थीं. आज इस विचार को जड़ से ही बदलने की जरूरत है. आज एक सभ्य लीडर की महानता की माप उसके वैश्विक दृष्टिकोण और उसकी समस्त मानवता के प्रति उत्तरदायित्व की भावना से होनी चाहिए. आज के युग में विकसित देश और तीसरी दुनिया एक परिवार की तरह हैं. प्रत्येक मनुष्य ने जो ज्ञान, बुद्धि और सभ्यता पाई है उसके अनुसार उस पर इस बात की जिम्मेदारी है कि वह सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार माने. मैं अपने कर्तव्य की सीमा का उल्लंघन नहीं कर रहा होऊँ गा यदि मैं तीसरी दुनिया की ओर से कहूँ कि हमारी बदहाली के दर्शक मात्र न बने रहें. अपने स्तर के अनुकूल भूमिका निभाएं. दुनिया के चारों कोनों में मनुष्य की बात तो छोड़ ही दीजिए जानवर, पेड़-पौधे तक के प्रति कोई गलत काम न हो, आप यह देखें. विकसित राष्ट्र के रूप में यह आपका दायित्व है. देशों और नेताओं की बड़ी-बड़ी बातों, वायदों और योजनाओं के खोखलेपन की याद दिलाते हुए वे कहते हैं कि बातें बहुत हो लीं, अब काम करने का समय है. हमने बहुत कहा. अब काम करने का वक्त आ गया है.

वे कहते हैं कि यह समय है जब लुटेरेपन और अनाधिकार के युग को समाप्त किया जाए. हम उस युग में हैं जब नेता पूरे ग्लोब के लिए जिम्मेदार हैं. वे दक्षिण अफ्रीका के गुलामों, अफ्रीका के भूख से मरने वालों, पैलेस्तीन और इजराइल के लोगों को दमन से बचाने की गुजारिश कर रहे हैं. इजराइल के लोगों को उनके महान आध्यात्मिक विरासत को नापाक करने से बचाने की अपील कर रहे हैं. ऋ ण में दबे हुए लोगों को बचाने की बात कर रहे हैं. वे मनुष्यता के उत्थान के प्रति चिंतित हैं. अपने नोबेल भाषण वे न केवल मिस्र की नुमाइन्दगी करते हैं वरन पूरी तीसरी दुनिया के नुमाइन्दे बन कर उभरते हैं. इस बुजुर्ग रचनाकार का परिवार बहुत फैला हुआ, बड़ा विशाल है. इनका परिवार न केवल उनका अपना शहर, अपना देश है वरन पूरी मनुष्यता है. उनकी कहानियों में भी हमें अस्तित्ववाद की महत्वपूर्ण चिंतन धारा मिलती हैः तर्क बनाम ईश्वर पर आस्था बौद्धिक नजरिए की सीमाएँ और विकल्प, एक व्यक्ति का अस्तित्व संबंधी संघर्ष आदि, आदि. महफूज एक कमाल के कहानीकार हैं. उनके कहानी संग्रह ‘गॉड्स वल्र्ड’ की चुनिन्दा कहानियों में इसकी एक झलक मिलती है. अस्तित्व के प्रश्नों को उन्होंने किस तेवर के साथ रखा है और जो उत्तर प्रस्तुत किए हैं वे भी काबिले तारीफ हैं. महफूज के लेखन को स्पष्ट रूप से तीन भागों में बाँटा जाता है. मसलन ऐतिहासिक, यथार्थवादी तथा आध्यात्मिक-रहस्यवादी. उनके साहित्य में मनुष्य जीवन अंतःसलिला के रूप में चलता है और उसे रेखांकित भी किया जाता रहा है.

ऐसी ही एक कवयित्री हैं विस्लावा शिम्बोस्र्का. २ जुलाई १९२३ को पौलैंड के एक छोटे से शहर में जन्मी शिम्बोस्र्का १९३१ से क्राकोव शहर में रह रहीं हैं. वे न तो साक्षात्कार देने में विश्वास करती हैं न ही बाहर घूमने फिरने में. उनकी पढ़ाई द्वितीय महायुद्ध में बाधित हुई परंतु बाद में उन्होंने अपनी यूनिवर्सिटी की शिक्षा पूरी की. साहित्य तथा समाजशास्त्र में डिग्री ली. अपने कवि जीवन में उन्होंने बहुत थोक के भाव से कविताएँ नहीं लिखीं परंतु कविताओं की गुणवत्ता के आधार पर उन्हें १९९६ का साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला. पहले उन्हें अपने देश पोलैंड के बाहर बहुत कम लोग जानते थे, नजीब महफूज की भाँति वे भी केवल अपने देश में जानी जाती थीं परंतु पुरस्कार मिलते ही उनकी कविताओं का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ और उनकी कविता पाठकों तथा विद्वानों के बीच समान रूप से सराही गई. यूरोप की विभिन्न भाषाओं में तो उनके काव्य का अनुवाद हुआ ही साथ ही अरबी, हीब्रू, जापानी, चीनी के साथ-साथ हिन्दी में भी उनकी कविताएँ अनुवादित हुई हैं. शिम्बोस्र्का बचपन में अपने परिवार के साथ क्राकोव में आ बसीं तो फिर उसे छोड़ कर कभी नहीं गई. वे एक पुरानी इमारत की पाँचवीं मंजिल पर रहती हैं जिसमें लिफ्ट की सुविधा भी नहीं है. मगर उन्हें इस बात से कोई शिकायत नहीं है.

जहाँ ओरहान पामुक साक्षात्कार देने के लिए प्रसिद्ध हैं वहीं शिम्बोस्र्का साक्षात्कारों से दूर रहती हैं उन्होंने नोबेल पुरस्कार मिलने के बावजूद भी साक्षात्कार नहीं दिए और शोरशराबे से दूर अपने घर में काव्य सृजन में लगी हुई हैं. ‘साउंड्स, फीलिंग, ठॉट्स ः सेवेंटी पोयम्स’, ‘पीपुल ऑन द ब्रिज’, ‘व्यू विथ ए ग्रेन ऑफ सैंड ः सलेक्टेड पोयम्स’, ‘नथिंग ट्वाइस ः सलेक्टेड पोयम्स’, ‘पोयम्स, न्यू एंड कलेक्टेड’, ‘नथिंग्स अ गिफ्ट’, ‘मिरकल फेयर’, आदि उनके कविता संग्रह इंग्लिश में उपलब्ध हैं. कविता के साथ-साथ वे बहुत प्रौढ गद्य भी लिखती हैं, जिसके नमूने ‘नॉन्रक्वायर्ड रीडिंग ः प्रोज पीसेस’ में देखे जा सकते हैं. १९४५ में उनकी प्रथम कविता ‘आई सीक द वल्र्ड’ आई और उसके बाद से वे निरंतर सक्रिय हैं. वे बड़े बड़े सिद्धांतों की बातें नहीं करती हैं. हाँ उनके काव्य में मर्मस्पर्शी शब्द चित्र अवश्य मिलते हैं. उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका देखी है. इसीलिए जब ग्यारह सितम्बर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ तो वे इतनी विचलित हो गई कि उन्होंने उस भयंकर दृश्य को फोटोग्राफ की भाँति अपने शब्दों में बाँध दिया. ‘ग्यारह सितम्बर का फोटोग्राफ’ कविता की पंक्तियाँ हैं ः

वे कूद रहे थे धधकती इमारतों से

एक

दो

कुछ और

कुछ ऊपर थे, कुछ नीचे थे.

एक फोटोग्राफ ने उन्हें कैद किया था

जब वे जीते थे

धरा के ऊपर

धरा तक पहुँचते हुए.

हर आदमी पूरा साबुत

हर एक का अपना चेहरा

और हर एक का अच्छी तरह छिपा हुआ रक्त

अभी समय है उनके केशों के गड़मड हो जाने में

अभी समय है उनकी जेबों से.

कुंजियाँ और चिल्लर निकल कर गिरने में

वे अभी भी हैं हवा की सच्चाई के अन्दर

उन स्थानों में जहाँ अभी अभी

उनके लिए स्थान बना है

उनके लिए मैं सिर्फ दो काम कर सकती हूँ

उनकी उडान का वर्णन करूँ

और अपनी ओर से न दूँ कोई अंतिम शब्द.

शिम्बोस्र्का भी अपने शहर यहाँ तक कि अपनी इमारत से बाहर जाना भी पसन्द नहीं करती हैं परंतु उनकी दुनिया संकुचित नहीं है, उनका नजरिया विस्तृत है. उन्होंने जीवन का उत्सव, प्रेम, मृत्यु, अस्तित्व जैसे विभिन्न विषयों केा अपने काव्य का विषय बनाया है. जब उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला तो समिति की एक सदस्य ब्रिजिटा ट्रोटजंग ने अपनी प्रस्तुति में कहा कि ‘शिम्बोस्र्का के रूप में स्वीडिश अकादमी एक प्रतिनिधि - काव्य के एक असामान्य और अनम्य शुचिता और मजबूत प्रतिनिधि को सम्मानित करना चाहती है. कविता जो जीवन के प्रत्योत्तर में है, जीवन की एक राह

है, विचारों और उत्तरदायित्व का कार्य है - अकादमी उसे सम्मानित करना चाहती है.’

नोबेल पुरस्कार ग्रहण करने के लिए उन्हें आमंत्रित करते हुए उन्हीं की कविता ‘अंवेषण’ (डिस्कवरी) की पंक्तियाँ उदृत की उधृत की गई,

मैं शामिल होने से इंकार करने में विश्वास करती हूँ.

मैं बर्बाद जीवन में विश्वस करती हूँ.

मैं कार्य के नष्ठ हुए वर्षों में विश्वास करती हूँ.

विश्वास करती हूँ रहस्यों को कब्र तक ले जाने में.

ये शब्द नियमों के परे ऊँचे जाते हैं

बगैर नजीरों की सहायता खोजे,

मेरी आस्था अडिग है, अंध और बिना नींव के.

इमरे कर्टीज, गाओ जिंग्जियांग जैसे कई अन्य रचनाकारों की भाँति ही प्रारम्भ में शिम्बोस्र्का की कविताओं को उनके अपने देश में प्रकाशित होने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. अपने काव्य में वे बड़ी-बड़ी बातें न करके सामान्य मनुष्य की दुनिया को प्रस्तुत करती हैं, उनकी कविताएँ प्रश्न उठती हैं. वे सीधे-सरल तरीके से अपनी बात कहती हैं. शिम्बोस्र्का की कविताओं में एक सादगी मिलती है साथ ही आंतरिक संघर्ष की झलक भी. वे मानती हैं कि जो व्यक्ति कहता है कि वह नहीं जानता है वही पूर्णता की तलाश कर सकता है दुनिया के तानाशाह और अत्याचारी व्यक्ति बहुत भयावह रूप से आत्मा विश्वास से भरे हुए हैं जो मानवता के लिए खतरनाक है. पूर्ण आत्मविशाव्स भयानक होता है. वे सदा तलाश, एक तरह की बेचैनी को कवि धर्म मानती हैं. अपनी अज्ञानता को स्वीकार करके ही कवि आगे बढ़ सकता है. उनकी कविता को उनके ही शब्दों में समेटा जा सकता है. वे अपनी कविता ‘अंडर वन स्मॉल स्टार’ में कहती हैं,

‘नाराज न हो मुझसे, जबान,

कि लिए तुझसे उधार भारी भरकम शब्द,

फिर की मेहनत जमकर सो वे बन जाएँ फूल से हल्के.’

कविताएँ रचने के साथ-साथ उन्होंने अनुवाद और पुस्तक समीक्षा का कार्य भी किया. वे फ्रेंच साहित्य से पॉलिश में अनुवाद करती हैं. जब वे एक पत्रिका के संपादन विभाग की सदस्य थीं उन्होंने पर्यटन, बागवानी, इतिहास, पाकशास्त्र विभिन्न विषयों की किताबों की समीक्षा लिखी.

शिम्बोस्र्का लिखने का उत्सव मनाती हैं उनकी एक कविता का शीर्षक है ‘जॉय ऑफ राइटिंग’. जीवन को सूक्ष्मता से देखने और अनुभव करने वाली यह रचनाकार अपना परिचय देने के लिए ‘मेरी पहचान की विशेषता/हर्षोंमाद और हताशा’ जैसे शब्दों का प्रयोग करती है. वे अपने काव्य में विभिन्न मानवीय संवेदनाओं को स्पर्श करती हैं और स्थान और भाषा की सीमाओं के पार जाकर सार्वजनिक तथा सार्वभौमिक हो जाती हैं. उनमें गम्भीरता, हास्य, हर्ष-उल्लास, हताशा, प्रेम, मृत्यु, यथार्थ, कल्पना, विश्वास, संशय, आदि तमाम विपरीत भाव मिलते हैं परंतु वे विरोधाभासी नहीं हैं. उनके संग्रह ‘व्यू विथ ए ग्रेन ऑफ सैंड’ का फलक काफी विस्तृत है इसमें एक ओर ‘कॉलिंग आउट टू यति’ है तो दूसरे छोर पर ‘दि एंड एंड द बिग्निंग’ है. स्टालिन जिसके सिद्धांतों से वे भ्रमित हैं उस पर कविता है तो अपने परिचय की कविताएँ भी हैं. उन्हें काव्य का मोजार्ट कहा जाता है परंतु उनके काव्य में बीथोवन की तीव्र उत्तेजना भी मिलती है. उनकी कुछ चुनी हुई कविताओं का संग्रह स्वीडिश भाषा में ‘यूटोपिया’ नाम से आया है स्वीडिश अकादमी ने उसी के आधार पर उनका चुनाव पुरस्कार के लिए किया था इस संग्रह की एक कविता है ‘पोसीबिलिटीज’ इसमें वे कहती हैं,

‘मैं असल में सम्भावनाओं पर ध्यान लगाऊँगी/

ताकि अस्तित्व को न्यायोचित ठहराया जा सके.’

पामुक, शिम्बोस्र्का, महफूज जैसे लेखकों ने अपना एकांत स्वेच्छा से चुना है. और इस एकांत का चुनाव उन्होंने अपने सृजन की अनिवार्यता माना है. वे इसमें प्रसन्न हैं. भले ही ये रचनाकार अपने घर, अपने शहर, अपने घर की दुनिया में शारीरिक रूप से रह रहें हों परंतु उनकी मानसिक दुनिया बहुत विस्तृत है बहुत फैली हुई है उनकी पहुँच भौतिकता के पार समस्त विश्व को स्पर्श करती है. उनका साहित्य मानवता की पीड़ा, हर्षोल्लास, सुख-दुःख, इतिहास, वर्तमान, भविष्य का उत्सव मनाता है. कमरे में रहते हुए भी ये लेखक अपने सृजन के द्वारा काल और स्थान की सीमा को तोड़ कर सार्वभौमिक और सार्वजनीन हो गए हैं. ये रचनाकार एक ओर जीवन का उत्सव मनाते हैं वहीं मानवता की रक्षा के लिए चिंतित भी हैं. अपनी रचनाओं में वे तानाशाहों, अत्याचारियों, सत्ता के लोलुप व्यक्तियों का नकाब उघाड़ते हैं. लोगों को इन निरंकुश लोगों से सावधान करते हैं और विश्व कल्याण की कामना करते हैं. ये अपनी रचनाओं में जीवन के उद्देश्य और अस्तित्व के प्रश्नों से अपने-अपने अनोखे तरीकों से जूझ रहे हैं.

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( विजय शर्मा, १५१, न्यू बाराद्वारी, जमशेद्पुर ८३१००१. - ई-मेलः vijshain@yahoo.com

(कवयित्री अजन्‍ता शर्मा के जन्‍म दिन 30 अप्रैल को उन्‍हें सादर समर्पित)

पारस पत्‍थर

रसात का महीना था, रिमझिम गिरते सावन की मस्‍त फुहारें मन को अपनी हल्‍की हल्‍की ठण्‍डक से आह्‌लादित कर रही थी, यदा कदा चमकती बिजली के साथ बादलों की गड़गड़ाहट से समूचा वातावरण क्षण भर को भयाक्रांत होकर स्‍तब्‍ध सा हो जा रहा था, धरती का प्रकृति के साथ प्रणय के बीच बदलों की क्रूरता के इन अद्‌भुत क्षणों को निहारने की मन की उत्‍कंठा को मैं रोक नहीं पा रहा था। दिन भर की ऑफिस की थकान मिटाने के लिये मैं झरोखों से इस अनुपम दृश्‍य का आनंद ले रहा था और साथ ही स्‍वयं को तरोताजा करने के लिये इण्‍टरनेट के सामने बैठा किसी मनोरंजक साइट की तलाश में हर पन्‍नों को खंगाल रहा था ।

वैसे भी जब कभी मैं इण्‍टरनेट के सामने बैठता तो प्रायः उस साइट की तलाश में भटकता जहां से मैं अपने साहित्‍य की भूख मिटा सकूं या फिर ऐसे लोगों तक अपनी साहित्‍यिक उपलब्‍धियों को पहुंचा सकूं जो मेरे प्रयासों की कद्र कर सके। एक साहित्‍यकार की सबसे बड़ी कमजोरी शायद यही होती है कि वह अपने कठिन प्रयासों से उकेरे शब्‍दों के अंर्तजाल से रचित अपने सृजन का एक छोटा सा प्रतिफल पाठकों की शाबाशी के रूप में चाहता है। साहित्‍य को अपने शौक से पूजा और साधना की चरम सीमा तक पहुंचाने वाला साहित्‍यकार किसी धन और ऐश्‍वर्य का कदाचित कभी भूखा नहीं होता वह तो एक योगी की भांति अपने प्रयासों को समाज को समर्पित कर अपनी रचना को एक प्रेरणास्‍त्रोत और संदेश के रूप में प्रस्‍तुत करना चाहता है। इस संदर्भ में कवियित्री अजंता शर्मा का वह कथन अनायास याद हो आता है कि एक कवि की रचना तब सार्थक हो जाती है, जब पाठक उसे अपने आसपास की घटनाओं से संबंधित करने में सफल हो जाते हैं..।

खैर ... पर मैं वास्‍तव में आज तो इण्‍टरनेट पर अपनी चंद रचनाओं की प्रविष्‍टि की तलाश में भटक रहा था। यद्यपि बीच-बीच में कभी-कभी मन होता कि स्‍तरीय साहित्‍यिक पत्रिकाओं को अपनी रचनाएं प्रेषित कर एक वृहद पाठक वर्ग समूह के बीच अपनी बातों को कविता अथवा कहानी के रूप में प्रस्‍तुत करूं लेकिन मन में एक भय सा पैदा हो जाता । वैसे भी जब मैंने नब्‍बे के दशक के प्रारंभिक वर्षों में स्‍नातक की परीक्षा पास की थी और कुछ रचनाएं स्‍तरीय पत्रिकाओं को प्रेषित करने का जोखिम उठाया था तब मैंने गहरे जख्‍म खाये थे, अब फिर से इन स्‍तरीय पत्रिकाओं के संपादकों को अपनी कहानियां प्रेषित करना मेरे लिये किसी खर्चीले शौक से कम नहीं था और फिर इसके अलावा अपनी रचनाओं के साथ वापसी का पता लिखा लिफाफा डालना तो जैसे इस उम्र में हदय रोग की नींव के लिये सुंदर नर्सरी तैयार करने के बराबर था । वैसे भी कहा जाता है कि 30 से 45 वर्ष की उम्र बीमारियों के अंकुरण के लिये सर्वाधिक मुफीद उम्र होती है। तमाम तरह की बीमारियां अपने प्रणय प्रसंगों के लिये इस उम्र को सर्वाधिक उपयुक्‍त पाती हैं और मैं इस उम्र में किसी भी तरह की बीमारियों को निमंत्रित करने का रिस्‍क नहीं लेना चाहता था ।

वैसे तो पुरातन हिंदू ग्रंथों में मनुष्‍य के उम्र को 25-25 वर्षो के साथ ब्रहमचर्य, गृहस्‍थ, वानप्रस्‍थ और सन्‍यास आश्रम में बांटा गया है पर मैं आज के संदर्भ में प्रणय प्रसंगों के आधार पर इसका वर्गीकरण कुछ अलग रूप में करता हूं । हो सकता है मेरी बात से बहुत से साहित्‍यकार एव विद्वान इत्‍तफाक न रखते हों लेकिन मुझे अपनी बात बेबाकी से रखने में कभी संकोच नहीं होता।

मै मनुष्‍य के उम्र को 60 वर्ष की परिधीय सीमाओं में समेटता हूं और 60 के पश्‍चात के उम्र को ईश्‍वर द्वारा खुद के साथ प्रणय प्रसंगों के लिये दिये गये उपहार के रूप में देखता हूं । मेरा यह मानना है कि 0-15 वर्ष की उम्र एक ऐसी अवस्‍था होती हैं जिसमें प्‍यार और प्रणय अपने वात्‍सल्‍य के अद्‌भुत रूप में मनुष्‍य को अपने पावन और निर्मल रूप का अहसास कराती है, इस उम्र में मनुष्‍य लिंग के आधार पर भेदभाव से कदाचित्‌ काफी दूर होता है। 15-30 वर्ष की उम्र किसी कमसीन युवती एवं युवक के बीच आकर्षण का उम्र होता है, व्‍यक्‍ति के जीवन का सर्वाधिक संवेदनशील एवं सुखद कहा जाने वाला यह उम्र ही सभी रूपों में व्‍यक्‍ति के विकास की दशा और दिशा तय करता है। 30 -45 वर्ष की उम्र जैसा कि मैंने पहले भी उल्‍लेख किया कि यह अवस्‍था बीमारियों के अंकुरण के लिये सर्वाधिक उपयुक्‍त एवं अनुकूल समय होता है। इस उम्र में अंकुरित हुई बीमारियां ही साठ वर्ष की उम्र के पहले ही सेवानिवृत्‍ति के अवसर प्रदान किये बिना घर को संपन्‍न बनाने में मदद करती है । और 45 - 60 वर्ष की उम्र मृत्‍यु को जीवन संगिनी के रूप में स्‍वीकार करने, उससे परिणय करने एवं अंततः आलिंगनबद्ध हो जाने के लिये अवसर प्रदान करती है ।

बहरहाल ! मैं इण्‍टरनेट के सामने बैठा हुआ उन कवियों की तलाश में भटकने लगा जो मेरी तरह साहित्‍य की भूख मिटाने साधना में जुटे होते हैं और ऐसे ही कवियों के संकलन को अंतरजाल में समेटे एक साहित्‍यिक पत्रिका में पाकर मन प्रफुल्‍लित हो उठा । मन में एकाएक खयाल सा आया कि इन कवियों की सूची में अपना नाम संकलित कराने के लिये जो भी तरीके होते होंगे वे आज कर ही लिये जायें। कहते हैं अवसर सफलता का संदेश लेकर दबे पांव आती है और जिंदगी भर की असफलता ने शायद मुझे यही सिखाया था कि मैं कहीं न कहीं थोड़ा सा चूक गया था, पर आज मैं किसी भी हाल में चूकना नहीं चाहता था, लेकिन घड़ी की सुईयां शाम के साढ़े पांच बजा रही थी आफिस से सभी लोग जा चुके थे, बाई जैसे मेरे आफिस से निकलने की प्रतीक्षा में बाहर खड़ी अपने सहकर्मी साथी के साथ कुछ बुदबुदा रही थी, वह जैसे कहना चाह रही हो कि सारे लोग आफिस से जा चुके हैं। लेकिन मेरे अंदर का जुनून आज तो किसी प्रकार की बुदबुदाहट और अटकलों पर कोई ध्‍यान नहीं देना चाहता था । मैं तो संपादक के पते तलाशने में जुटा था और आज उसे किसी भी कीमत पर पा ही लेना चाहता था ।

कहते हैं जहां चाह वहां राह, थोड़ी ही देर में मुझे संपादक का ई-मेल पता मिल गया, अभी संपादक के पते तक पहुंच ही पाया था कि बाई के धैर्य की सीमाएं समाप्‍त हो गयी और उसने साहस जुटाकर कह ही डाला - सर शाम के छः बजे रहे हैं, आपकी बस चली गयी होगी। बाई ने ऐसा कहकर मेरी सारी एकाग्रता भंग कर दी। वह मेरी दिनचर्या के बारे में सब कुछ जानती थी ।

मैंने कहा - बस थोड़ी देर और मैं एक बहुत जरूरी काम कर रहा हूं । वैसे भी हम एक सरकारी कंपनी में काम करते हैं जहां काम की सारी वरीयताएं ए बी सी के फार्मूले के आधार पर निर्धारित होती हैं । ए अर्थात -पहले अपना काम, फिर बी-यानि उसके बाद बीबी का काम और फिर सी यानि शेष समय बच गया तो कंपनी का काम उस समय मैं अपना काम कर रहा था जो मेरे लिये किसी टॉप प्रायरिटी से कम नहीं था ।वैसे सरकारी कंपनियों में काम करने वाली बाईयों के सेंस बहुत तेज होते हैं - बाई एक समय के बाद ऑफिस में लोगों के रूकने के वक्‍त से किसी के घर की सारी बातें जान लेती हैं, वे समझ जाती है कि साब की बीबी मायके गयी है या फिर घर में कुछ झगड़ा हुआ है या फिर वे समझ जाती है कि साब अपना खुद का काम कर रहे हैं ।

खैर मैं इस तरह के किसी संभावनाओं अथवा आशंकाओं के पचड़ों में आज पड़ना नहीं चाहता था। मैंने आनन फानन में संपादक को ई मेल करते हुये लिखा कि मैं आपकी अंतरजाल पर प्रदर्शित साहित्‍यिक पत्रिका में अपनी रचनाओं की प्रविष्‍टि चाहता हूं, कृपया मेरा मार्गदर्शन करें ।और इस तरह उन्‍हें अपना ईमेल प्रेषित कर घर चला आया। मुझे अनुमान था कि मेरा ईमेल मिलते ही संपादक महोदय अपनी त्‍वरित प्रतिक्रिया देंगे । पर यह मेरा भ्रम था और भ्रम की सांसें दीर्घजीवी नहीं होती हैं। हर एक घण्‍टे में अपने एकाउंट को खोलकर देखते हुये मेरी आंखों की तरलता सूख गयी और उबासी आने लगी। रात्रि के 11 बज रहे थे, पत्‍नी ने अपने धैर्य को विराम देते हुये कहा - क्‍या बात है? कुछ परेशान हैं, चलिये लाईट ऑफ करिये और सो जाईये, सुबह जल्‍दी उठना होता है। मैं चाहकर भी कुछ बोल न सका, मैं अपनी पत्‍नी से किसी भी हाल में पंगा नहीं लेना चाहता था, मैं तो दूसरों की गलतियों से सीखकर कदम बढ़ाने वालों में से रहा हूं और पत्‍नी से पंगा करने वालों का बुरा हश्र मैंने लोगों को अपनी जिंदगी में भुगतते बहुत बार देखा था । वैसे भी जल में रहकर मगर से भला क्‍या दुश्‍मनी? पत्‍नी से पंगा लेने का अर्थ ही होता है, मधुमक्‍खी के छत्‍ते में हाथ डालना, बेवजह तमाम तरह की परेशानियों को बिन बुलाए मेहमान की तरह आमंत्रण देना, तनावों से मुहब्‍बत करना और अपनी जिंदगी को बाढ़ में हिचकोले खाती किसी लकड़ी के टुकड़े की तरह फेंक देना और मैं ऐसा कोई रिस्‍क हरगिज नहीं लेना चाहता था। मैं करवटें बदलता रात गुजारता हुआ भोर के आगमन की प्रतीक्षा में सो गया ।

सुबह आफिस आने की जल्‍दबाजी में मेरे पास वक्‍त की प्रायः कमी होती है, जैसे- तैसे तैयार होकर ऑफिस पहुंचा और उस साहित्‍यिक पत्रिका के साईट को खोलकर बैठ गया। मैं कवियों की सूची को अपलक निहारता हुआ बैठा ही था कि मेरे माउस ने पहले ही क्रम पर अंकित एक कवयित्री को क्‍लिक कर दिया । मैं थोड़ी देर के लिये तो जैसे अचरज में पड़ गया कि उस कवयित्री का बाहर के पृष्‍ठों एवं अंदर के पृष्‍ठों में नाम में काफी असमानता थी, लेकिन भला मुझे उस कवयित्री के नाम से आखिर क्‍या लेना देना हो सकता था ? मैं तो उसकी रचनाओं का रसास्‍वादन मात्र करना चाहता था । एक दबी कुचली नारी की व्‍यथा एवं साथ ही अपनी महत्‍वाकांक्षाओं को मूर्त रूप देने के लिये उद्यत उस स्‍त्री के हठ, इन दोनो विरोधाभासी परिस्‍थितियों को एक ही साथ रेखांकित करती उस कवयित्री की रचना को पढ़कर मन गद्‌गद हो गया । वैसे भी मैं उन संस्‍कारों में पला बढ़ा था जहां बचपन से यह सिखाया जाता है कि - जिस घर में स्‍त्री की कद्र नहीं होती उस घर में देवताओं का वास नहीं होता । उस कवयित्री की रचना ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया और मै उसकी प्रतिक्रिया दिये बिना न रह सका।

दूसरे दिन सुबह जब अपना मेल अकाउंट खोला तब उस कवयित्री की अत्‍यंत शालीन प्रतिक्रिया ने मेरे हृदय के तारों को झंकृत कर दिया। अभी तक केवल साहित्‍य की किताबों में यह अवश्‍य पढ़ा था कि स्‍त्रियां पुष्‍प की तरह कोमल, गंगा की तरह पावन, किसी घने वृक्ष की तरह शीतल छांव प्रदान करने वाली एवं सरिता की तरह अविरल प्रवाहमान होती है । उसकी दो पंक्तियों की प्रतिक्रिया ने ही मुझे अंदर तक अभिभूत कर दिया ।

मैं एक बार फिर से उसकी तस्‍वीरों को झांककर देखना चाहता था कि कम शब्‍दों में अपने पाण्‍डित्‍यपूर्ण प्रतिक्रिया से मेरे अंतर्मन को छू लेने वाली उस महिला के शब्‍दों एवं रूपलावण्‍य में कहीं कोई समानता है भी या फिर महज यह एक संयोग है ।

मैंने तुरंत उसकी दूसरी रचना पढ़ी और अपना दूसरा ई मेल किया। कुछ घण्‍टों बाद मेरे दूसरे मेल पर उसकी प्रतिक्रिया पाकर तो जैसे मैं स्‍तब्‍घ सा रह गया । अत्‍यंत संक्षेप और सधी हुई प्रतिक्रियाओं के साथ इस मेल में उसने लिखा - लगता है आपको मेरी पहली चिट्‌ठी मिली, आपकी प्रतिक्रिया पाकर मैं धन्‍य हुई, आखिर आपने किस साईट पर अपनी कृपादृष्‍टि डाली है ।

एक विदुषी स्‍त्री की इन पंक्‍तियों को मैं जैसे कई बार पढ़ लेना चाहता था । वैसे भी मेरे मन में किसी साहित्‍यकार, कवि अथवा कवयित्री के प्रति बचपन से काफी इज्‍जत होती । मेरा प्रायः आज भी मानना होता है कि बिना मां सरस्‍वती की कृपा के कोई भी अपने भावों को रचनाओं के रूप में सृजन नहीं कर सकता । दुनिया में सारी विधाएं हासिल करने के लिये प्रशिक्षण संस्‍थान होते होंगे पर साहित्‍य सृजन के लिये किसी कोचिंग संस्‍थान को अस्‍तित्‍व में आते मैंने आज तक नहीं देखा है। यह तो ईश्‍वर की कृपा होती है और ईश्‍वर उसे इसी निमित्‍त धरती पर कदाचित भेजता भी है।

तीसरे दिन मुझे उसका तीसरा ई मेल मिला। इस ई मेल में उन्‍होने हिंदी में थोड़े शब्‍दों में पत्र लिखते हुये कहा - मित्रों मैं अपनी साहित्‍यिक पत्रिका में छपी कुछ रचनाएं आपके रसास्‍वादन हेतु प्रेषित कर रही हूं, अपनी प्रतिक्रिया अवश्‍य दीजियेगा। साथ ही उन्‍होने नीचे अपना मोबाइल नं. भी बड़ी बेबाकी व साहस से दे दिया । मैं उसका ई मेल पाकर प्रसन्‍नता से फूला नहीं समा रहा था, साथ ही इस बात पर अचरज भी हो रहा था कि मुझ जैसे एक अंजान व्‍यक्‍ति को जिससे परिचय हुये मात्र दो ही दिन हुये थे, मोबाइल नं. देना क्‍या उस युवा कवयित्री का दुस्‍साहस था या फिर मेरे प्रति उसका अटूट विश्‍वास । मैं अपने पुराने ई मेल को पुनरावलोकन कर आखिर यह देख ही लेना चाहता था, कि मैंने उन चिटि्‌ठयों में ऐसी क्‍या बात लिखी थी, जिससे उस कवयित्री ने मुझ पर अपना विश्‍वास व्‍यक्‍त करते हुये अपना मोबाइल नं. बिना मांगे दे दिया वरना किसी लड़की के मोबाइल नं. पाने के लिये न जाने कितने सालों तक उसका विश्‍वास अर्जित करना पड़ता है।

किसी अन्‍जान व्‍यक्‍ति के प्रति ऐसा अटूट विश्वास भारत की धरती पर जन्‍मी स्‍त्री के सिवा दुनिया में मेरे विचार से कहीं और देखने को नहीं मिलती । यह भारत की धरती का ही विश्‍वास है कि महज बहती हुई एक नदी की धाराओं की चंद बूंदों से लोग मोक्ष का अहसास पा लेते हैं, पत्‍थर के एक टुकड़े को पूजकर न जाने आज तक कितने हिंदुओं ने गिरिजाघर की प्रार्थना और मस्‍जिद की नमाज सा प्रतिफल प्राप्‍त किया है। यह वही भारतीय स्‍त्री का प्रतीक थी, जिसके आगे सारी दुनिया आज भी नतमस्‍तक होती है ।

बहरहाल मैं स्‍वयं को उससे बातें करने की लालसा से रोक नहीं पा रहा था, मेरा मन बार- बार यह सोच उद्वेलित होने लगा कि कम शब्‍दों में अपनी बात कहने की विद्वता को समेटी उस विदुषी के स्‍वरों एवं शब्‍दों में कितना शहद और पाण्‍डित्‍य होगा, लेकिन मन में सहसा विचार आने लगा कि कहीं वह अन्‍यथा न सोच ले, वह यह न समझ बैठे कि मैं भी उन्‍हीं सामान्‍य लड़कों की तरह हूं, जो लड़कियों से बातें करने की लालसा अधिक देर तक रोक नहीं पाते । मेरी ऐसी छबि किशोरावस्‍था से लेकर युवावस्‍था तक कभी नहीं रही और मैं ऐसी छबि से नितांत गुरेज करता रहा, जिसके कारण लड़कियों से दूर रहना मेरी फितरत में रहा, कभी मन में विचार आये भी तो उसे अपने संस्‍कारों से दबाने में कामयाब भी रहा ।

मैं आखिर अपने मन की उत्‍कंठा को बहुत देर तक दबाये न रख सका और थोड़ी ही देर में मेरे मोबाइल ने उसके सेलफोन में घण्‍टी बजा दी । मोबाइल के प्रत्‍येक रिंग के साथ मेरे दिल की धड़कने किसी अन्‍जाने भय से तेज घड़कनें लगी, दो पल को ही सही मेरा मन उन आशंकाओं में खो गया कि कहीं वह ओवर रियेक्‍ट कर बैठी तब मेरे पास क्‍या जवाब होगा ? कहीं यह मेरा प्रथम और आखिरी वार्तालाप तो नहीं होगा ? मैं अधीर होकर बहुत जल्‍दी तो नहीं कर रहा ? इन्‍ही सवालों की कल्‍पना में उलझा ही था कि उधर से आयी एक मधुर आवाज ने मेरे मन के तारों को झंकृत कर दिया। मैंने उनसे फोन करने के लिये क्षमा मांगते हुये अपनी बात प्रारंभ की और अपना परिचय दिया । मुझे पहचानने में उन्‍हें बहुत देर नहीं लगी, उन्‍होने अपनी लेखनी में प्रयुक्‍त सारगर्भित शब्‍दों की तरह अपनी वाक्‌पटुता का परिचय देते हुये कहा - इसमें क्षमा मांगने वाली कौन सी बात है ? आप मुझे जब चाहें फोन कर सकते हैं ।

क्षण भर को मुझे ऐसा लगा कि इस महिला को तो जैसे मैं बरसों से जानता हूं , उसकी मधुर वाणी में एक स्‍त्री की सहृदयता, कोमलता, सहजता और एक विदुषी कवयित्री का पावन चरित्र स्‍पष्‍ट परिलक्षित हो रह थी । यद्यपि उससे वार्तालाप की अवधि नितांत ही अत्‍यल्‍प थी, तथापि उन क्षणों में मैंने उसके बड़प्‍पन और उदारता को काफी करीब से महसूस किया। हिमगिरी के शिखरों की भांति उसके उज्‍जवल चरित्र और रवि की देदीप्‍यमान किरणों की भांति उसकी प्रखरता ने मुझे अंदर तक अभिभूत कर दिया ।

आज मैं उसकी मित्रता का कायल था, और ईश्‍वर को लाख-लाख शुक्रिया अदा कर रहा था । मैं जीवन भर ऐसे ही किसी मित्र की तलाश में अपने उम्र के मित्रता के पन्‍नों को रंगने के लिये कोरा छोड़ रखा था। कहते हैं, बहुत अच्‍छा मित्र बड़े भाग्‍य से मिलता है और शायद आज वही दिन था, जब मेरे भाग्‍य ने भी मेरी सुधी ली थी, वैसे भी कहा जाता है कि व्‍यक्‍ति के पास कोई कमी न भी हो, तो भी उसे मित्र अवश्‍य बनाना चाहिये, सागर यद्यपि परिपूर्ण होता है फिर भी चंद्रमा की राह देखते रहता है ।

एक बहुत अच्‍छा मित्र, एक श्रेष्‍ठ इंसान, विदुषी व्‍यक्‍तित्‍व और उस पर कवयित्री की प्रखरता। ईश्‍वर ने जैसे मुझे आज छप्‍पर फाड़ कर दिया था, वैसे भी इंतजार का फल बहुत मीठा होता है, और मैंने भी अवसर आने पर जीवन में एक अच्‍छे मित्र देने का जिम्‍मा ईश्‍वर के उपर छोड़ दिया था।

इस बीच मैं उनसे कंप्‍यूटर के बारे में ईमेल के जरिये कुछ कुछ सीखने लगा था ।

हम दोनो के बीच ईमेल से बस कुछ ही पत्राचार हुये थे कि उन्‍होंने अचानक लिखना बंद कर दिया। इन दिनों में मुझे उसके ईमेल प्राप्‍त करने की आदत हो गयी थी, उनका कोई पत्र न मिलने से मन व्‍यथित हो गया, मन ही मन खुद को कोसने लगा कि किसी अन्‍जान व्‍यक्‍ति से समीपता की भला इतनी क्‍या जरूरत थी ? किसी को अपनी कमजोरी बनाना क्‍या अच्‍छा था ? लेकिन मन और भावनाएं तर्कों पर यकीन नहीं करती । मैं अपने पुराने प्रेषित पत्रों को उलटपलट कर देखने लगा और आखिर इस निष्‍कर्ष पर पहुचने का प्रयास करने लगा कि आखिर शब्‍दों के प्रयोग में मैंने कहां त्रुटि की है ? तमाम तरह के विश्‍लेषणों के पश्‍चात मैंने जो निष्‍कर्ष निकाला उससे सार रूप में यही छनकर बाहर आ सका कि मैंने उन्‍हें एक पत्र में लिखा था - मैं एक सच्‍चे मित्र के रूप में जीवन भर अपनी भूमिका का निर्वाह करूंगा।

मुझे लगा शायद वह मेरी मित्रता स्‍वीकार करने की इच्‍छुक नहीं थी और मैंने उन्‍हें मित्र कहने में जल्‍द बाजी कर दी । मैंने उनके दिये हुये सेलफोन पर फोन करना चाहा लेकिन अब की बार उन्‍होने मेरा फोन काट दिया। अब तो मैं यह पूरी तरह मान बैठा कि जिंदगी के हसीन पल मेरी किस्‍मत में ज्‍यादा दिनो तक के लिये नहीं होते हैं । वैसे भी मैं उन लोगों में सा जो जर्मन दार्शनिक डील्‍थे के इस कथन पर यकीन करते हैं कि - जीवन एक रंगमंच है जहां कष्‍टों के सामान्‍य नाटक में प्रसन्‍नता एक संयोगिक घटना है ।

मैं काफी उदास रहने लगा, मेरी उदासी पर मेरे घर के लोग भी परेशान रहने लगे, किंतु मैं किसी को यह बताने की हिम्‍मत नहीं जुटा पा रहा था कि एक अच्‍छे इंसान के रूप में मिली एक शालीन महिला की मित्रता को चंद दिनों में ही मैंने खो दी है। मित्रता खोने का अहसास मुझे जीवन में पहली बार हुआ था । वैसे तो सफलता के नजदीक पहुंचकर असफल होने अथवा हाथ में आयी उपलब्‍धियों के हाथ से फिसल जाने का अनुभव मुझे जीवन में कई बार हुआ था लेकिन मित्रता के वियोग का मेरा यह नितांत नया अनुभव था। मन को अनेक तरह की सांत्‍वनाओं से तसल्‍ली देने का प्रयास करने लगा। अब तो आंखों में जहां एक ओर पश्‍चाताप के आंसू थे तो मन गुस्‍से से भरा हुआ था, मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि मुझे आखिर किस अपराध की इतनी बड़ी सजा दी गयी है ।

मैंने उन्‍हें एक पत्र लिखा जिसमे उनसे यह जानना चाहा कि आखिर मैंने ऐसा कौन सा अपराध किया है, जिसकी सजा के रूप में मित्रता के संबंध विच्‍छेद का उपहार दिया गया है । मैं उनकी सत्‍यनिष्‍ठा से लेकर सहृदयता पर कई तरह के सवाल उठाये। आज तो जैसे मैं अंतिम रूप से अपने हृदय के सारे गुबार निकाल ही लेना चाहता था ।मैंने अंत में यह भी कह दिया कि आज के बाद अपने मेल एकाउंट और उसके फोन नं. सदा के लिये डिलीट कर दे रहा हूं ।

वह क्षण मेरे जीवन के कठिन क्षणों में से एक था और मैं ऑफिस में बैठा उस बेरहम वक्‍त को बड़ी जिल्लत के साथ पलों को घण्‍टों में गिनता हुआ बिता रहा था। मुझे कुछ पलों के लिये ऐसा लगा जैसे मेरा वजूद ही संकट में है। एक अंजान व्‍यक्‍ति से जिसे मैंने कभी देखा नहीं, जाना नहीं के प्रति इतना गहरा लगाव, क्‍या यह मेरे अति भावुकता का प्रतीक थी जो आज मेरी कमजोरी के रूप में उभर कर सामने आ रही थी या फिर मेरा बचपना था जो शायद अभी तक गया नहीं था, जैसा कि मेरे घर के लोग मुझे हमेशा कहा करते । बस इसी उधेड़बुन में तमाम तरह के विश्‍लेषण करता सिर औंधाए बैठा हुआ था कि अचानक मेरे सेलफोन की घण्‍टी घनघना उठी । एक अंजान एस.टी.डी. नं. को देखकर क्षण भर को तो जैसे मैं गद्‌गद सा हो गया कि हो न हो उन्‍होने ही फोन किया हो लेकिन मैंने सोचा कि आखिर उसे मेरा नं. कहां से मिलेगा और वह इतनी संवेदनशील तो हो नहीं सकती कि मेरे एक बार फोन करने पर मेरे नं. सहेज कर रख ले ।

मैंने तमाम तरह की आशंकाओं को मन में समेटे फोन उठा ही लिया, जैसे ही फोन उठाया उधर से एक मधुर आवाज ने मेरे अंदर की आशंकाओं को सिरे से खारिज कर दिया । एक ही सांस में बोलते हुये जैसे कहने लगी - आपने यह सब क्‍या लिखा है ? आप जरा सी बात पर इतने उद्वेलित हो जाते हैं ? क्‍या आप मेरी परेशानी समझने को बिल्‍कुल तैयार नहीं ? मैं किन संकटों से गुजर रही हूं, क्‍या आपने कभी सोचा है ? आप ही बताइये कि क्‍या आपका इतना उद्वेग ठीक है ?

मैं उसकी मधुर शीतल आवाज को पाकर गद्‌गद हो चुका था, मेरी सारी शिकायतें जैसे एक ही क्षण में फुर्र हो चुकी थी । मैं उसकी हर बात पर केवल जी-जी करता उसके बड़प्‍पन के आगे नतमस्‍तक हुआ कुछ भी बोलने की स्‍थिति में नहीं था । मैं तो बस उसे केवल जी भरकर सुनना चाहता था। अपने 10 मिनट के एकतरफा वार्तालाप में यह कहकर उसने फोन समाप्‍त की कि अब आपको कोई शिकायत तो नहीं है? मैं अभी व्‍यस्‍त हूं, समय मिलने पर जरूर लिखूंगी । आपको कभी कोई दिक्‍कत हो तो कहियेगा ।

आज एक बार फिर से मैंने उसके विराट एवं विशाल व्‍यक्‍त्‍त्‍वि, आचरण की पवित्रता एवं जीवंत स्‍नेह के दिग्‍दर्शन किये थे । अब तो उसने मेरे मन में पूजा की जगह ले ली थी, उसके लौह व्‍यक्‍त्‍त्‍वि के आगे मैं शून्‍य था, उसके अद्‌भुत एवं अंबर तक उंचे कद के आगे मैं खुद को बौना महसूस कर रहा था । सोच रहा था कि मुझ जैसे एक अपरिचित व्‍यक्‍ति के साथ इस विदुषी महिला का अपार स्‍नेह क्‍या सचमुच उसकी उदारता थी या फिर मुझ पर किन्‍हीं साधु संतो की कृपा। उसके इस क्षणिक स्‍नेह ने मेरे अंदर अपूर्व साहस का संचार किया और जैसे मेरे अंदर का अहिल्‍या की भांति श्रापित साहित्‍यकार प्रभुराम के चरणों का स्‍पर्श पाकर जीवित हो उठा था । मेरे अंदर का जज्‍बा आज मुझे ललकार रहा था और अंदर तक यह अनुभूति हो रही थी कि एक स्‍त्री के चंद शहद से लब्‍जों में अद्वितीय ताकत होती है ।

मेरे अंदर के जज्‍बे ने जैसे संकल्‍प ले डाला कि इण्‍टरनेट और दूरभाष के जरिये की यह छोटी सी मुलाकात मेरे अंदर एक साहित्‍यकार को जन्‍म देगी ।मैंने अगले मेल में उन्‍हें लिखा कि मुझ पर भरोसा रखें मेरे व्‍यक्‍तित्‍व और मेरी दोस्‍ती पर सदैव आपको गर्व होगा ।

इस तरह चंद गलतफहमियों के बादल छंटते हुये हम दोनों एक दूसरे के बहुत निकट आ गये, वह अब केवल मित्र ही नहीं पथप्रदर्शक और हर मुश्‍किलों में परछाईं की तरह साथ खड़ी रहने वाली दोस्‍त बन चुकी थी । उसके बडप्‍पन का मैं कायल हो चुका था ।

अब तो जैसे मेरे अंदर का एक गद्य विधा के रूप में जन्‍मा साहित्‍यकार कुछ लिखने को बुदबुदा रहा था और इस अवसर पर मेरे अंदर इस विधा को जन्‍म देने वाली उस विराट व्‍यक्‍तित्‍व की मलिका से मैं केवल शुभकामनाएं चाहता था, वैसे भी हर अच्‍छे कार्यो में अब मैं उसकी शुभकामनाएं अवश्‍य लेने लगा था ।

मैंने उन्‍हें मेल में एक दिन लिखा - मैं एक नोवेल लिखना चाहता हूं, मुझे आपके शुभकामनाओं की निहायत जरूरत है ।

उन्‍होने तुरंत लौटते हुये ई-मेल से लिखा - आपके हर सृजनात्‍मक कदम पर मेरी शुभकामनाएं सदैव आपके साथ रहेंगी, भरोसा रखें ।

और इस तरह मैं नोवेल लिखने में जुट गया । उपन्‍यास की इस नयी विधा के रूप में साहित्‍य सृजन करते हुये मैं पन्‍नों को रंगने लगा, जब कभी कहीं दिक्‍कतें होती उसकी तस्‍वीरों के आगे शीश झुका उसी एकलव्‍य की भांति प्रेरणा पाता जिस तरह कभी एक विश्‍वास ने उसकी सहायता द्रोणाचार्य के रूप में की थी ।

मैं लिखते लिखते एक दिन थक गया, मेरे अंदर की ताकत जवाब देने लगी थी, मैंने उन्‍हें एक दिन पत्र लिखा - मैं इस विधा में कहीं भटक सागया हूं, मुझे लगने लगा है कि मैं बहुत ज्‍यादा निबंधात्‍मक होते जा रहा हूं ।क्‍या आप मेरे साथ संयुक्‍त रूप से नहीं लिख सकतीं ?

उन्‍होने एक प्‍यारा सा ईमेल करते हुये लिखा - आप कहां तक आगे बढ़ पाये हैं, मैं देखना चाहूंगी, जहां तक संयुक्‍त लेखन का प्रश्‍न है, तो आप जानते हैं कि मेरे पास वक्‍त की बहुत कमी होती है और फिर मेरी गद्य में रूचि भी नहीं हैं, आप लिखिये जहां पर दिक्‍कतें होंगी मैं आपके साथ खड़ी हूं, चिंता न करें ।

और इस तरह हर कदम पर उसकी सहायता प्राप्‍त करते मेरा नोवेल समापन की ओर बढ़ने लगा। एक दिन फोन पर मैंने उनसे कहा- आप जानती हैं, इस उपन्‍यास में आपका बहुत बड़ा योगदान है, मैं इसे आपको समर्पित करना चाहता हूं ।

आप ऐसा न कहें, यह आपका बड़प्‍पन है। मैंने तो सिर्फ आपको कहीं- कहीं प्रेरित किया है ।

मैंने कहा - आप ऐसा कहकर मेरी नजरों में देवता बनना चाहती हैं? जो मैं होने नहीं देना चाहता।

आप ऐसा क्‍यों सोचते हैं ?

इसीलिए कि देवता सिर्फ देता है, लेता नहीं - देयते इति देवता । और आप मुझे भगवान के रूप में तो स्‍वीकार हैं, लेकिन देवता के रूप में कतई नहीं ।मैं आपसे जो पाया उसे ही आपको समर्पित कर रहा हूं, मेरा इसमें कुछ भी नहीं है । त्‍वदियं वस्‍तु गोविदं, त्‍वयमेव समर्पये ।

ठीक है जैसा आपको उचित लगे करें, परंतु कहीं पर भी ओवेर रियेक्‍ट मत करियेगा, मुझे दिखावे से सख्‍त चिढ़ है । वैसे भी प्‍यार और सम्‍मान, मन में हो तो ज्‍यादा अच्‍छा लगता है, इसे प्रदर्शन के बैशाखी की जरूरत नहीं होनी चाहिये और मैं जानती हूं कि आप मुझे बहुत प्‍यार करते हैं और शायद सम्‍मान भी, इसे बताने की जरूरत नहीं है ।

मैंने कहा - ठीक है मैं पहले पन्‍ने पर आपके नाम का उल्‍लेख करते हुये इसे आपको सादर समर्पित कर रहा हूं।

तीन चार महीने बाद अचानक मुझे किसी जरूरी काम से दिल्‍ली जाना हुआ, जैसे ही ट्रेन मथुरा से आगे बढ़ी मैंने उन्‍हें फोन से यह सूचना दी कि कुछ जरूरी काम से मैं दिल्‍ली आ रहा हूं ।

उन्‍होंने मुझसे कौतुहल से पूछा - घर आओगे ?

मैंने कहा - मैंने तो आपका घर नहीं देखा, फिर दिल्‍ली मेरे लिये नया शहर है और वैसे भी शाम की गाड़ी से मेरा वापसी का रिजर्वेशन है। मुझे दिल्‍ली में सिर्फ दो घण्‍टे का एक छोटा सा काम है। मुझे तुरंत वापस होना है, फिर कभी आना हुआ तो जरूर आऊंगा ।

उन्‍होने मुझे कहा - मैं आउंगी आपसे मिलने, आप निजामुद्‌दीन स्‍टेशन पर उतरियेगा।

मैं उसके अनुरोध को ठुकरा न सका । ट्रेन निजामुद्‌दीन स्‍टेशन पर आते ही धीमी हो गयी, मैं खिड़की से झांककर बाहर देखने लगा, शायद वह एक नजर में दिख जाये । मैंने जैसे ही प्‍लेटफार्म पर कदम रखे ,उसे मेरी नजरें तलाशने लगी । मैंने इसके पहले उसे कभी नहीं देखा था, सिर्फ एक साहित्‍यिक पत्रिका के एक अंक में प्रकाशित उसकी कविताओं के साथ उसकी सफेद काली तस्‍वीरे देखी थी जिससे उसके रंग एवं वर्ण का आकलन काफी कठिन था । उसे पहचानने में मुझे जो मददगार हो सकती थी वह केवल यही था कि वह पावर के चश्‍मे लगाती थी ।

अब तो प्‍लेटफार्म पर मैं उन महिलाओं को तलाशने लगा जो पावर के चश्‍मे लगाये हुये प्‍लेटफार्म पर खड़ी थी । मैंने अपने मोबाइल पर नजर डाली तो बैटरी खत्म होने से पावर ऑफ हो चुका था। मेरे पास अब उनसे संपर्क हेतु कोई साधन नहीं था और न ही उनका मोबाइल नं. मेरे पास कहीं लिखा हुआ था।

मुझे अब लगने लगा कि मैं उन्‍हें अब तलाश नहीं पाउंगा, इसी बीच मेरी नजर एक गौर वर्ण कमल की तरह नेत्र, और बार-बार सामने को आती अपनी घनेरी जुल्‍फों को पीछे की ओर सरकाती एक महिला पर पड़ गयी। नारंगी साड़ी में लिपटी वह अत्‍यंत शालीन एवं भद्र महिला एक ओर जहां अपनी विद्वत आभा को समेटे सभ्‍यता की साक्षात्‌ प्रतिमूर्ति लग रही थी तो दूसरी ओर किसी प्‍याले में भरे नारंगी जाम से कम भी नहीं। एक पी.सी.ओ. के बगल में खड़ी हल्‍के पावर के चश्‍में लगायी वह महिला एकदम परिपक्‍व लग रही थी, उनका ध्‍यान सिर्फ उस आगंतुक की तलाश में था जिनसे वह मिलने आयी थी। मैं भी उसी के बगल में खड़े होकर पी.सी.ओ. वाले से कहा - भाई साहब जरा मेरा सेलफोन चार्ज कर दोगे ?

उसने मुझे उपर से नीचे तक देखा फिर एहसान जताते हुये कहा -अरे भाई साहब, सुबह का वक्‍त है, ग्राहकी का टाईम हैं, आप लोग भी... , लाईये दीजीये ।

मेरा सेलफोन चार्ज होने लगा, इस बीच कई बार वह महिला मुझे पलटकर देखती फिर अपने मोबाइल से रिंग करती हुई धीमी आवाज में गुस्‍से से कहती- शट्‌ट यार ! गजब आदमी है, मोबाइल बंद करके रखा है ।

थोड़ी ही देर में मेरा सेलफोन काम चलाने लायक चार्ज हो गया ।मैंने उन्‍हें जैसे ही रिंग किया,पास ही खड़ी महिला का सेलफोन घनघना उठा । मैं फोन से बात करने के पहले ही खुशी से उछल पड़ा - अरे आप ...।

ओह आप ... । मैं कब से खड़ी आपकी राह देख रही हूं ।

मुझे क्‍या मालूम था कि मेरे बगल में खड़ी हुई आप ही हैं ।

मैं खुशी से फूला नहीं समा रहा था। मेरी आंखों से खुशी के आंसू निकलने को जैसे बेताब थे, दिलों की धड़कने इस कौतुहल भरे क्षणों में अनायास ही बढ़ गयी थी ।

मेरी आंखों में आंखे डालकर वह देख ही रही थी कि मेरी आंसू की एक बूंद ने उसके पंकज की भांति पुष्‍प से पदों का प्रक्षालन कर दिया ।

उन्‍होंने मेरी आंखों के आंसू पोंछते हुये कहा - अरे आप तो बच्‍चे की तरह हो, रोने लगे ।

नहीं खुशी ज्‍यादा हो गयी थी, इसलिये छलक पड़े ।

उन्‍होंने मेरे गालों में फैले आंसुओं पर उड़कर चिपके अपने लंबे झड़े हुये एक बाल को अपने हाथ से निकालते हुये कहा- दिल्‍ली में पानी ठीक नहीं है, बाल बहुत झड़ते हैं ।

घर नहीं जाओगे ? उन्‍होंने लंबी सांस भरते हुये कहा ।

मैं तो आपको पहले ही बता ही चुका हूं कि मुझे शाम की गाड़ी से वापस जाना है। आपसे मिलने की इच्‍छा थी वह भी आपके दर्शन पाकर पूरी हो गयी ।

वैसे भी मैं आपसे कहा करता था ना, कि अन्‍जान आदमी पर ज्‍यादा भरोसा नहीं करना चाहिये। मैं तो अभी भी आपके लिये अन्‍जान हूं ।

हां, इस अंजान शब्‍द ने ही मेरे जीवन की परिभाषा बदल दी । आप कहा करते थे ना कि एक अच्‍छा दोस्‍त मिलना जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्‍धि होती है और ईश्‍वर की कृपा भी। मुझ पर भी आपसा दोस्‍त देकर ईश्‍वर ने असीम कृपा की है ।

पर आपने तो मुझे अपने सबसे बेहतर दोस्‍त के रूप में कभी स्‍वीकार ही नहीं किया। पत्र में तो आपने कभी नहीं लिखा ।

आपमें और मुझमें यही फर्क है, आप सब कुछ कहकर भी वह नहीं कह पाते जो मैं अपनी खामोशी से कह जाती हूं। आपको पता है खामोशी हम जैसे विद्वानों की सशक्‍त भाषा होती है, और ऐसा कहकर वह खिलखिला पड़ी।

चलिये घर चलते हैं, बेटे से मिल लीजीयेगा, जल्‍दी छोड़ दूंगी प्रामिस ।

थोड़ी ही देर में हम घर पहुंच गये । बेटे को पाकर मैं उसे गोद में उठा लाड़ करने लगा। उससे बातें करते हुये स्‍कूल के बारे में पूछने लगा ।

आप चाय पीयेंगे या कॉफी ?

आप जानती हैं मैं कुछ नहीं पीता ।

कुछ तो लेना होगा ।

जी पानी पिला दीजीये ।

ठीक है आपको जल्‍दी है इसलिये मैं नहीं रोकूंगी, अब की बार परिवार को लेकर दिल्‍ली आना हुआ तो घर जरूर आईयेगा ।

नहीं मैं तो आ चुका - हमारी देहरी को पवित्र करने के लिये अब हम आपकी प्रतीक्षा करेंगे ।

देखिये अगले साल तक कोशिश करूंगी, पति की छुटि्‌टयां रही तो अब की बार हम उधर ही घूमने का प्‍लान करेंगे ।

उन्‍होने जाते-जाते कहा - यह एक लिफाफा है, घर जाकर खोलियेगा ।

मैं टैक्‍सी में बैठकर निकलने लगा और वह हाथ हिलाकर अभिवादन करती हुई दूर तक देखती रही जब तक कि मैं उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गया ।

एक अंजान व्‍यक्‍ति के प्रति किसी महिला का अटूट विश्‍वास, स्‍नेह और हर कदम पर अपूर्व सहयोग। क्‍या सचमुच यही तस्‍वीर भारत का वास्‍तविक प्रतिनिधित्‍व करती है या फिर वह जो प्रतिदिन समाचार पत्रों में हिंसा, आतंक और अपराध के रूप में समाचार पत्रों में दिखाया जाता है ।

मैं सोच रहा था कि उस महिला का बड़प्‍पन मेरे लिये क्‍या किसी दैवीय प्रसाद की तरह था या फिर अन्‍जानों के प्रति भी सहदयता दिखाने की भारतीय स्‍त्री का वह नमन करने योग्‍य मिसाल, जिसके आगे आज भी भारत की धरती पर देवता नतमस्‍तक होते हैं ।

मैं ट्रेन में बैठे हुये उस लिफाफे को खोलकर देखने की इच्‍छा को रोक नहीं पा रहा था, और अंततः खोल ही बैठा - उसमें एक चेक और छोटा सा हाथों से लिखा पत्र था, पत्र में उन्‍होने लिखा था - मैं आपके प्रकाशक द्वारा मुझे आपको देने के लिये दी गयी रायल्‍टी राशि भेज रही हूं, यद्यपि यह अमाउण्‍ट काफी कम है लेकिन उम्‍मीद करती हूं कि इसे आप खर्च नहीं करेंगे। आप ही कहा करते थे ना, कि यह हमारे संयुक्‍त प्रयासों का प्रतिफल है, मैं चेक के पीछे अपना ऑटोग्राफ दे रही हूं, इसे सम्‍हाल कर रखियेगा, मै जब कभी आपके घर आयी तो ड्राइंग रूम में सजी तस्‍वीरों के बीच इसे देखना चाहूंगी ।

शुभकामनाओं सहित ।

आपकी

पत्र को पढ़ने के बाद अब न तो मेरे पास कहने के लिये कुछ शब्‍द थे और न ही सोचने को कोई विचार ।

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विश्वविख्यात चित्रकार राजा रवि वर्मा आदरांजली स्वरूप चित्र प्रदर्शनी में प्रदर्शित कुछ कलाकृतियाँ.

 

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प्रदर्शनी में राजा रवि वर्मा की कुछ चुनिंदा कलाकृतियों समेत निम्न कलाकारों की कृतियों को प्रदर्शित किया गया -

सचिदा नागदेव

विनय सप्रे

सुषमा श्रीवास्तव

देवीलाल पाटीदार

चंदन सिंह भट्टी

आनन्द टहनगुरिया

दुर्गेश साहू

अजय शुक्ला

श्रीकांत आप्टे

कैलाश तिवारी

देवेन्द्र सिंह

डॉ. प्रमोद राय

सुचिता राऊत

संतोष रायकवार

स्वाति राजोरिया

शांति कुमार तिर्की

एन. के. भोगल

संगीता पाठक

जितेन्द्र बेगड़

शिखा मेहरा

प्रियंका शर्मा

‘चिम्बोराजो से तीन सौ मील से ज्यादा दूर, कोटोपाक्सी से सौ मील दूर इक्वाडोर एंडीज के विशाल वीराने में, मनुष्यों की दुनिया से कटी हुई एक रहस्यमय पहाड़ी घाटी में अंधों का प्रदेश है.’ इस घाटी प्रदेश में जितने लोग हैं सब अंधे हैं. बच्चे, बूढे जवान सबके सब. यदि इस प्रदेश को हम पृथ्वी के नक्शे पर खोजने निकले तो खोजते रह जाएँगे. परंतु यह एक साहित्यिक वास्तविकता है. एक साहित्यकार की कल्पना का प्रदेश है. एच जी वेल्स ने अपनी कहानी ‘द कंट्री ऑफ द ब्लाइंड’ के लिए इस प्रदेश की सृष्ठि की है. इस कहानी की शुरुआत इसी वाक्य से होती है. इस कहानी के सारे क्रिया कलाप इसी अनोखी दुनिया में चलते हैं.

मनुष्य एक असंतुष्ट प्राणी है. उसका मन कभी तृप्त नहीं होता है सदा और और की माँग करता रहता है. एक माँग की पूर्ति हो नहीं पाती है कि दिल और माँगने लगता है. यह बात भी सही है कि जिस दिन वह संतुष्ट हो जाएगा उसी क्षण सारा विकास, सारी प्रगति रुक जाएगी. सारे अन्वेषण, सारी शोधें, सारी खोजें इसी असंतोष का नतीजा हैं. अगर ऐसा न होता तो नए नए दर्शनों का निर्माण न होता, वैज्ञानिक उपलब्धियाँ न होतीं, संस्कृति सभ्यता न पनपती. कभी खुशी के लिए, कभी गम में, , कभी हताशा-निराशा में, कभी क्रोध से भर कर मनुष्य इस दुनिया से अलग एक और नई दुनिया बसाना चाहता है. प्राचीन काल से आज तक हर दार्शनिक एक नए समाज की रूपरेखा प्रस्तुत करता आया है चाहे वह प्लेटो हो अथवा कार्ल मार्क्स. आगे भविष्य में भी यह सिलसिला जारी रहेगा. सारा साहित्य मनुष्य की इस अतृप्ति का हासिल है. उन्हीं शाश्वत विषयों प्रेम, भय, काम, रति, मृत्यु, जिजीविषा, प्रतिकार पर युगों युगों से कहानियाँ न लिखी जाती रही होतीं. आदमी के पास जो है उससे उसकी जरूरतें कभी पूरी नहीं होती है उस पर सदा कुछ नया करने की धुन सवार रहती है. कुछ लोग इस पूरी दुनिया से खुश नहीं हैं और आगे बढ़कर एक अलग, एक निराली दुनिया बसाना चाहते हैं. नया करने की ललक ने स्वर्ग की कल्पना को साकार किया कुछ लोग वहीं नहीं रुके उन्होंने नरक बना डाला. अधिकाँश धर्म एक नरक की कल्पना पर रुक गए हिन्दू धर्म एक नरक से संतुष्ट न रह कर असंख्य नरक की बात करता है. कोई मानता है कि स्वर्ग ऊ पर है और मरने के बाद ही प्राप्त होगा और नरक पृथ्वी के नीचे पाताल में है और बुरा कर्म करने वालों को उसमें जलना सड़ना होगा. कुछ लोग मानते हैं कि स्वर्ग नरक यहीं है उसको कहीं और कभी और जाकर खोजने की आवश्यकता नहीं है. त्रिशंकु सशरीर स्वर्ग जाना चाहता था यह सम्भव नहीं था. एक समय उसने अकाल के दौरान विश्वामित्र की सहायता की थी इसलिए विश्वामित्र ने त्रिशंकु के लिए अलग स्वर्ग की ही रचना कर दी.

साहित्यकार एक ऐसा ही प्राणी है जिसका मन इस समाज, इस दुनिया से खुश नहीं है वह अपनी रचनाओं में एक दूसरी दुनिया बसाना चाहता है. साहित्यकार की अपना जहाँ बसानी की इच्छा नई नहीं है न ही यह बात किसी खास स्थान के साहित्यकार के लिए लागू होती है. यह स्थान से बँधी नहीं है. प्राचीन, नवीन, पूरब, पश्चिम सब साहित्य में काल्पनिक स्थानों की झाँकी मिलती है. पहले रचनाकार अपनी कल्पना से एक स्थान का सृजन करते है फिर उस स्थान को इतना महत्व प्राप्त हो जाता है, उस पर लोग इस कदर विश्वास करने लगते हैं कि उसको वास्तविक स्थान से जोड़ कर देखने का प्रयास प्रारम्भ हो जाता है उसकी भौगोलिक, ऐतिहासिक खोज शुरु हो जाती है. ‘एटलांटिस’ जैसे स्थान की खोज में ऊ नेस्को के वैज्ञानिकों और पुरातत्वेत्ताओं की टीम भिड़ी हुई है.

मलयालम लेखक ओ. वी. विजयन ने अपना इतिहास लिखने के लिए ‘खसाक’ का सृजन किया. भारतीय इंग्लिश लेखक आर. के. नारायण ने ‘मालगुडी’ रच डाला. आज बच्चा-बच्चा मालगुडी से परिचित है. ‘अल्फिस्टिया’ एक ऐसा स्थान है जिसका अस्तित्व मात्र इंटरनेट, मात्र वेब पर है. बीटल्स ने अपना ‘पेपरलैंड’ बसा लिया तो काफ्का ने अपना ‘कैसल’ बना लिया. जे. आर. आर. टोलकिएन को आधुनिक फंतासी का जनक माना जाता है. उन्होंने छोटा मोटा शहर या कोई प्रदेश न बना कर ‘मिडिल अर्थ’ (मध्य दुनिया ) ही बसा दिया. मार्शेल प्राउस्ट का ‘कॉम्ब्रे’, और स्टेफन लीकॉक का ‘मारीपोसा’ ऐसे ही काल्पनिक स्थान हैं.

तार्किक, गणितज्ञ, इंग्लिश लेखक लुई कैरोल ने १८६५ में एलिस के साथ साथ पाठकों को ‘वंडरलैंड’ में खूब घुमाया. बहुत कम लोग जानते हैं कि इस लेखक का वास्तविक नाम चार्ल्स लुटविग डॉगसन था. इस वंडरलैंड को कार्टूनिस्ट सर टेनियल जॉन ने अपने रेखांकन के द्वारा अमर कर दिया. अमेरिकन लेखक फ्रैंक बाउम क्यों पीछे रहते उन्होंने विजर्ड ऑफ ओज नामक १४ किताबें लिख डालीं किताबों की पाठकों के बीच लोकप्रियता का नतीजा यह हुआ कि उनके बाद कई और लेखक इसी नाम की किताबें लिखते रहे और लोगों को एक अनोखी दुनिया की सैर कराते रहे. मूल किताब १९०० में लिखी गई थी और इस में वर्णित ‘एमेराल्ड सिटी’ (पन्ना या हरित प्रदेश) को १९३९ में एक म्यूजिकल फिल्म बना कर परदे पर उतारा गया जिसे आज भी एक क्लासिक का दर्जा प्राप्त है. इस फिल्म ने जूडी गारलैंड को सिने जगत में सदा के लिए स्थापित कर दिया. दूसरे ओर एक भयंकर स्थान ‘जुरासिक पार्क’ का सृजन किया माइकेल क्रिचटोन ने जुरासिक पार्क नामक उपन्यास में. स्टीवन स्पीयलबर्ग ने इसी उपन्यास के आधार पर जुरासिक पार्क और लॉस्ट वर्ल्ड नाम से दो बहुचर्चित फिल्में बना दी, जिनमें रिचर्ड एटेनबरो काफी दिनों के बाद पुनः अभिनय करते दीखे. बच्चों के लिए लिखने वाली और आज की सर्वाधिक धनी लेखिका जे. के. रॉउलिंग के हैरी पोर्टर की निराली दुनिया बडों को भी खूब भाई. ‘हॉगवार्ट’ की अनोखी, जादूई दुनिया की रिकॉर्ड तोड बिक्री ने लेखिका को क्वीन एलीजाबेथ से भी ज्यादा धनी बना दिया. द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात कागज की कमी के फलस्वरूप इंग्लैंड में किताबों का उत्पादन प्रभावित हुआ था. इस मन्दी के दौर में एनिड ब्लाइटन कुछ गिने चुने लेखकों में से थीं जिनकी किताबों का उत्पादन न केवल जारी रहा वरन बढा. उन्होंने १९४९ से ‘नोडी’ श्रृंखला निकाली. अमेरिका में भले ही वे अनजानी हों परंतु उनके नोडी के ‘ट्वाय टाउन’ की सैर दुनिया के प्रायः सब देशों के बच्चे और बड़े बूढे शौक से करते हैं. मेरे संग नोडी से जुड़ा एक वाकया है. बहुत दिनों तक मैं नोडी शब्द को न मालूम क्यों नोबड़ी कहती और पढ़ती रही.

मालगुडी, गुलिवर, वंडरलैंड, एमराल्ड सिटी, हॉगवार्ट, टॉय टाउन जैसे स्थानों की रचना बच्चों के लिए की गई, वैसे बड़े इनका आनन्द कम नहीं उठाते हैं. परंतु कुछ लेखकों ने ऐसी दुनिया बसाई जिस जहाँ में केवल बड़ों की रसाई हो सकती है. ये जहाँ ज्यादा जटिल हैं. ज्यादा उलझनों से भरे हुए हैं. इनके निर्माण के पीछे एक भिन्न दर्शन काम करता है. ये जहाँ वयस्कों की ललक, उनकी लालसा का परिणाम हैं. मजा यह है कि इन काल्पनिक स्थानों में लोग विश्वास करते हैं और इनकी भौतिक खोज में आकाश पाताल एक किए रहते हैं.

इलियड और ओडिसी के रचयिता होमर के व्यक्तित्व की वास्तविकता को लेकर विवाद होता रहे पर उसके रचे ‘आइया’ को नकारना कठिन है. इस अंधे यूनानी कवि ने अपने बाद आने वाले बहुतेरे रचनाकारों को प्रभावित किया. दाँते, जॉन मिल्टन, मिग्युअल ड सर्वांटिस, एलैक्जेंडर पोप, जॉर्ज चैपमैन, रॉबर्ट फिटजराल्ड और जेम्स जॉयस सब होमर के ऋ णी हैं. इंग्लिश काव्य में रोमांटिक काव्य के प्रणेताओं में से एक सैमुअल टेलर कॉलरिज की प्रसिद्ध कविता कुबलाई खान के काल्पनिक स्थान जानाडू को कौन भूल सकता है? ऐसा ही एक काल्पनिक स्थान है ‘शांग्री ला’. कुनलुम पर्वतों के पश्चिम में स्थित यह एक रहस्यमयी आध्यात्मिक घाटी है जिसका निर्देशन एक लामासारी (बौद्ध विहार) से होता है. यह स्थाई यूटोपिया का पर्याय बन गया है जिस धरा पर प्रसन्नता शाश्वत है और जो बाह्य जगत से पूर्णरूपेण कटा हुआ है. १९३३ में ब्रिटिश लेखक जेम्स हिल्टन ने अपने उपन्यास ‘लोस्ट होराइजन‘ में शांग्री ला की कल्पना तिब्बत बौद्ध धर्म की परम्परा में वर्णित रहस्यमय शहर शाम्भाला के आधार पर की है. विलियम फॉक्नर का रहस्यमय ‘योक्नापटाफा’ मिसिसिपी के लाफेट काउंटी पर आधारित है जिसमें उन्होंने अपने पूर्वजों के साथ-साथ अमेरिकन आदिवासियों, अश्वेतों और गरीब श्वेतों तथा अन्य कई लोगों को बसाया है.

‘एल डोराडो’ एक ऐसा ही स्थान है जिसकी खोज में न मालूम कितने लोग भटके और भविष्य में कितने और लोग भटकेंगे. एल डोराडो का अर्थ स्पैनिश भाषा में स्वर्णिम होता है. दक्षिण अमेरिका में सोना आध्यात्मिक महत्व रखता है यह जीवन शक्ति और सूर्य का प्रतीक है. सोना प्राप्त करना मनुष्य की एक प्रारम्भिक ख्वाइश रही है. सारे रसायन शास्त्र की जड़ में सोना प्राप्ति की ख्वाइश ही रही है. यदि भारत सोने की चिडया न कहलाता तो भला इतने आक्रमणकारियों को आमंत्रित करता? एल डोराडो के सोने की खोज में अकेले और समूह में बहुत सारे लोग न मालूम कितनी कठिनाइयाँ उठाकर कुछ लोग हाथ मलते हुए वापस लौटे और कुछ कभी न लौट सके. फ्रांसिस्को ड ओरेलाना और वाल्टर राली ऐसे ही खोजी थे जिन्होंने एल डोराडो से सोना लने के लिए अनेक जोखिम उठए और अंत में जान गँवाई. वॉल्टर राली ने १५९५ में त्रिनीदाद पर चढाई की थी और जिनको भी वह मार सकता था उन सारे स्पेंनवासियों को उसने मार डाला था. वह एल डोराडो की खोज में ओरीनोको तक गया. उसे कुछ नहीं मिला लेकिन जब वह इंग्लैंड वापस गया तो उसने सबसे कहा कि उसे खजाना मिला गया है. उसके पास लोगों को दिखाने के लिए एक टुकड़ा सोना और थोड़ी सी बालू थी. उसने लोगों से कहा कि उसने ओरीनोको के तट पर एक चट्टान की चोटी से सोना खोद निकाला है. परंतु उसने जिस बालू को परीक्षण के लिए रॉयल मिंट को दिया था वह बेकार थी

उसमें सोने का नामोनिशान न था. और बाद में कई दूसरे लोगों ने बताया कि उसने उत्तरी अमेरिका से पहले ही सोना खरीद कर रख लिया था.

जब सब ओर से निराशा हाथ लगी तो तब उसने अपनी बात सिद्ध करने के लिए एक किताब लिखी जिस पर चार सदी तक लोग विश्वास करते रहे कि राली को सोना अवश्य मिला था. हालांकि उसकी किताब पढ़ना काफी कठिन है परंतु उस किताब का जादू जो सदियों तक लोगों के सिर चढ़ कर बोलता रहा उसके लम्बे शीर्षक में है. ‘द डिस्कवरी ऑफ द लार्ज, रिच अन्द ब्यूटीफुल एम्पायर ऑफ गुयाना, विथ अ रिलेशन ऑफ द ग्रेट एंड गोल्डन सिटी ऑफ मनोआ (विच स स्पेनियार्ड्स कॉल एल डोराडो) एंड द प्रोविंसेस ऑफ एमीरिया, एरोमाइया एंड अदर कंट्रीज विथ देयर रिवर्स एडज्वाइनिंग’. शीर्षक ही तीन लाइन में चलता है. सुनने में वास्तविक लगता है जबकि वह मुश्किल से मुख्य ओरीनोको तक ही गया था. और जैसा कि बहुत आत्मविश्वास वालों के संग होता है राली अपनी ही कल्पना के मकड़जाल में फँस गया. अधिकारियों ने इक्कीस साल बाद बूढे और बीमार राली को लन्दन की जेल से निकाल कर वह सोना लाने के लिए गुयाना भेजा गया जो उसके अनुसार उसने पाया था. इस चक्कर में उसका बेटा मारा गया. पिता ने अपनी प्रतिष्ठा, अपने झूठ, अपने दम्भ के लिए अपने बेटे को मौत के मुँह में ढकेल दिया. और तब राली के पास दुःख के अलावा कुछ न बचा. इतना ही नहीं उसे फाँसी के लिए लन्दन वापस आना पड़ा, जहाँ उसे फाँसी दे दी गई. इस तरह एल डोराडो के चक्कर में पड़ कर उसने अपनी और अपने बेटे की जान गँवाई. वाल्टर राली ने अपनी साहसिक यात्रा को एक रोमांटिक यात्रा वृतांत का रूप दे दिया. उनकी वर्णित परिमा नहर पर स्थित मानोआ टापू इतना भरोसे मन्द था कि दो सदी तक परिमा नहर नक्शे में भी दिखाई जाती रही. आज अनेक समृद्ध स्थान साहित्य में एल डोराडो के नाम से वर्णित हैं. इस पर गीत संगीत और फिल्म भी बनती रही हैं.

लेखक अपनी कल्पना से यथार्थ खडा करता है और यथार्थ में अपनी कल्पना का रंग भरता है. कई लेखकों ने अपनी कल्पना के बल पर नए देशों नए स्थानों का निर्माण किया है और ये स्थान साहित्य में अमर हो गए हैं. मार्केस ने एक ऐसे ही काल्पनिक स्थान ‘मकोंडो’ की रचना की है. मार्केस का वन हंड्रेड इयर्स पढ़ना अपने आप में एक जादुई अनुभव है. यह किताब एक उपन्यास मात्र नहीं है इसमें प्रवेश करते ही पाठक एक विचित्र लोक में पहुँच जाता है. यह स्थान एक विशाल समृद्ध सम्पदा की खान है यहाँ की संस्कति यहाँ की सामाजिक संरचना सब अनोखी है. जितने भी काल्पनिक स्थानों का निर्माण आज तक हुआ है उनमें से यह स्थान सर्वाधिक रोचक, जटिल और लुभावना है. इसमें एक ओर दैनन्दिन जीवन के सारे सामान्य कार्यकलाप चलते हैं दूसरी ओर असम्भव, अलौकिक, अविश्वसनीय घटनाएँ घटती रहती हैं. यह एक बेशकीमती साहित्यिक विरासत है. मकोंडो में एक परिवार के पीढ़ी दर पीढ़ी के लोगों और उपनिवैशिक रोमांस की झलकियाँ वर्णित हैं. यदि यूटोपिया मार्क्सवादियों को भला लगता है तो मकोंडो का जन जीवन सब तरह के नजरिए के पाठकों को पसन्द आता है क्योंकि सामाजिक संघर्ष के कारण इसे वाम दृष्टिकोण से देखा जा सकता है साथ ही इसे साम्राज्यवादी नजरिए से भी व्याख्याइत किया जा सकता है. परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका से परम्परावादी खुश हो सकते हैं. निराशावादियों के लिए आशा का मसाला इसमें मिलता है तो यहाँ के लोगों का दम्भी व्यवहार सुखभोगियों को सांत्वना प्रदान करता है. यह एक ऐसा स्थान है जो सब मिजाज के लोगों के लिए उपयुक्त है.

क्या कुछ नहीं घटता है मकोंडो में ? यहाँ जितनी निजी जीवन की चिंता है उतनी ही जनजीवन सार्वजनिक जीवन की चिंता नजर आती है. रोजमर्रा के क्रियाकलाप जैसे बच्चों की देखभाल, भाई बहनों के बीच ऊधमधाड़, उछलकूद, स्त्रियों की आपसी कलह, पति पत्नी की चुहल, दाम्पत्य का सुख सब पाठक की आँखों के समक्ष चलचित्र की भाँति चलते रहते हैं. वह उनमें शामिल रहता है, डूबता जाता है. क्या कुछ नहीं होता है मकांडो में जादुई अतियथार्थवाद का सटीक नमूना है यह प्रदेश. यदि वर्षा होती है तो होती चली जाती है, कुछ लोग जहाँ भी जाते हैं उनके सर पर तितलियाँ मंडराती रहती हैं, कुछ लोग कभी नहीं मरते हैं उनकी आयु का पता पाना मुश्किल है वह न घटती है न बढ़ती है, आकाश से पुष्प वर्षा होती है. सूखा पड़ता है बाढ़ आती है जो भी होता है अति होता है. सरकारी दमन का दृश्य आज के दृश्य से भिन्न नहीं है. खेतिहर मजदूर पर कहर टूटना मकोंडो की नियति है. गरीबी वहाँ भी अपने पैर जमाए हुए है लेकिन जीवन की मस्ती को पछाड़ नहीं पाती है. पारिवारिक जीवन, यौनेच्छा का विस्फोट, विद्रोह, रीति रिवाज, संस्कार, युद्ध, दमन, शर्णार्थियों की कतारें, भगोड़े तमाम बातें घटित होती हैं यहाँ. सबसे ज्यादा ध्यानाकर्षित करने वाली बात है मकोंडो में स्त्रियों का प्रभुत्व होना. मार्केस के जीवन में स्त्रियों की प्रमुखता और महत्व को वे स्वयं स्वीकार करते हैं फिर उनके बसाए प्रदेश में स्त्रियों की भूमिका प्रमुख क्यों न हो? इन सारे सूक्ष्म विवरण के लिए मार्केस ने खूब अध्ययन मनन और शोध किया है. इसके लिए मार्केस ने रसायन तंत्र, विष-औषध, बीमारियों, पाकशास्त्र, घरेलू दवाओं, कृषि शास्त्र खासकर केले की खेती, यौन विज्ञान का गम्भीर अध्ययन किया है. असल में मकोंडो महान अमेरिकी उपन्यास की क्रीड़ा भूमि है, समस्त मानव सभ्यता के उत्थान पतन की कहानी यहाँ घटित होती है. यह मानवता के उत्थान पतन की कहानी है. मकोंडो के निवासी धीरे-धीरे धनी और बुद्धिमान होते जाते हैं लेकिन इसके साथ ही वे अपनी जड़ों को, अपनी बेहतर परम्परा को खोते जाते हैं. एक समय आता है जब वे पतन की राह पर चलने लगते हैं.

माना जाता है कि यह मार्केस के बचपन के स्थान अराकटाका के नमूने पर निर्मित है. मकांडो कोलम्बिया के उत्तर के जंगल में स्थित है और यहाँ केले की खेती होती है. बांटु भाषा में मकांडो का अर्थ केला होता है. मकांडो नाम पहले-पहल मार्केस की कहानी लीफ स्टोर्म में आता है बाद में यह वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सोलीट्यूड तथा अन्य कई कहानियों में आता है. यह नाम इतना प्रसिद्ध हो गया कि अराकटाका के लोग अपने शहर का नाम अराकाटाका मकांडो रखना चाहते थे. अपने उपन्यासों और कहानियों में वे पाठक को इस विचित्र स्थान मकांडो पर ले जाते हैं. जहाँ बहुत सी मायावी, जादुई बातें और घटनाएँ होती हैं यहाँ यथार्थ और स्वप्न, कल्पना सब घुलमिल जाते हैं उन्हें अलग करना कठिन है. इस उड़ान में फंतासी के साथ-साथ पारम्परिक दंत कथाएँ, वास्तविकता ऐसे गूँथी गई हैं कि जहाँ उन्हें स्पर्श किया जा सकता है साथ ही वे पहुँच के बाहर भी हैं. कभी लगता है लेखक रिपोर्टिंग कर रहा है, कभी लगता है वह एक स्वप्निल संसार की सृष्टि कर रहा है.

ऐसी ही एक दुनिया टोनी मारीसन ने रची है बल्कि उन्होंने एक साथ दो दुनिया रची है. एक स्थान मात्र पुरुषों के लिए निश्चित है जबकि दूसरे का सारा संचालन मात्र स्त्रियाँ करती हैं. नोबेल पुरस्कार प्राप्त के बाद १९९८ में मॉरीसन ने पैरडाइज लिखा. यह कहानी ओक्लाहोमा के ‘रूबी’ नामक स्थान काल्पनिक में ३६० जनसंख्या वाले एक छोटे से समुदाय की है. जिसका इतिहास बड़ा जटिल है गुलामी, शिकार, पूर्वाग्रह आदि से भरा हुआ. पूर्व गुलाम स्वयं शिकार में जुटे हैं. यह उन वास्तविक शहरों की कहानी है जहाँ केवल और केवल अश्वेत लोग रहते हैं पिछली सदी के आठवें दशक तक ऐसे शहर अमेरिका में अस्तित्व में थे. शायद आज भी हैं. एक समय का ‘द कॉन्वेंट’ के नाम से जाना जाने वाला लड़कियों का स्कूल अब अत्याचारी पतियों, प्रेमियों तथा सताए गए विगत से भागी हुई स्त्रियों की शरणस्थली है. इस शरणगाह पर नौ पुरुष आक्रमण करते हैं. इसमें मॉरीसन अश्वेत की पृष्ठभूमि, उनकी आपसी लड़ाई, आर्थिक झगड़ों, पूर्वजों की शत्रुता आदि का अन्वेषण करते हुए केवल अश्वेत के नगर ‘रूबी’ और मात्र औरतों के कॉन्वेंट का विश्लेषण करती हैं वे जानना चाहती हैं कि पुरुष क्यों अपने पितृसत्तात्मक स्वर्ग से डायनों को जड़ से समाप्त कर देना चाहते हैं. स्वर्ग कहाँ है और कौन इसका निवासी होता है आदि बातों के उत्तर खोजता यह पूरा उपन्यास इसी विचार के इर्द-गिर्द बुना गया है.

द न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में उनका कहना है कि ‘सभी स्वर्गों का वर्णन पुरुष परिक्षेत्र के रूप में होता है स्त्री बिना सुरक्षा के होती है और उसे खतरा तथा हस्तक्षेप करने वाली दखलन्दाजी करने वाली के रूप में जाना जाता है. जब यही स्त्री एक जुट हो कर शक्तिशाली होती हैं तब उस पर आक्रमण होता है.’ उन्होंने यह खूब रिसर्च करके, इतिहास का अध्ययन करके लिखा है. इस कथा में कोई भी पात्र कहानी के अंत तक कोई नहीं मरता है. मॉरीसन मानती हैं कि सारे स्वर्ग सारे यूटोपिया उन लोगों के द्वारा निर्मित होते हैं जो वहाँ रहते नहीं हैं लोग जिन्हें वहाँ प्रवेश की इजाजत नहीं होती है. एकाकीपन अलगाव सदा से यूटोपिया का हिस्सा रहा है. यह मॉरीसन का अपना विशिष्ठ तरीका है स्वर्ग के विचार को जानने समझने का, सुरक्षित स्थान, जहाँ सब कुछ इफरात में है, जहाँ कोई आपको हानि नहीं पहुँचा सकता है, स्वर्ग की खोजबीन करने का. इसे वे अपना तप मानती हैं. पर इन सबके साथ यह स्थान सबसे विलग है सबसे अलग थलग होता है. वे यह भी मानती हैं कि पृथकता में स्वयं को नष्ट करने के बीज भी छुपे होते हैं. वे समय के साथ बदलने से इंकार कर देते हैं. वे सब चीजों को दूर रखना चाहते हैं और इसी कारण स्वर्ग का नाश होता है.

रूबी एक ऐसा स्वर्ग है जिसे प्रवास के लिए केवल अमेरिकन - केवल अफ्रीकन अमेरिकन ही नहीं खोज रहें हैं. जिन्होंने अपना देश, अपना घर छोड़ा है वे दूसरा घर खोज रहे हैं. दूसरे भी यही कर रहे हैं मगर दूसरों ने अपना घर छोड़ा है. अब वे वहाँ नहीं रहना चाहते हैं या वहाँ अब वे रह नहीं पा रहे हैं इसलिए रूबी खोज रहे हैं. अफ्रीकन अमेरिकन के घर खोजने में फर्क है वे ऐसा स्थान खोज रहे हैं जहाँ उनके अपने लोग हों अपनी आदतें अपनी सभ्यता संस्कृति हो जहाँ वे अपने आप में परिपूर्ण हों. इस दृष्टि से उनका स्वर्ग खोजने का उद्देश्य तनिक अलग है. रूबी के बाहर का कॉन्वेंट एक अलग स्वर्ग है. रूबी का पूरा शासन पुरुषों द्वारा चलाया जाता है जबकि कॉन्वेंट का शासन स्त्रियाँ चलाती हैं, पुरुषों द्वारा सताई गई स्त्रियों के द्वारा शासित है. मॉरीसन ने रूबी की पूरी व्यवस्था ओल्ड टेस्टामेंट के आधार पर की है. जो पितृसत्तात्मक है. जहाँ पुरुष अपनी स्त्रियों की सुरक्षा के प्रति बड़े सतर्क हैं. कॉन्वेंट की स्त्रियाँ पुरुषों का साथ नहीं चाहती हैं. यहाँ वे आपस में लड़ती झगड़ती हैं पर उन्हें भय नहीं है कि कोई उनका शिकार करेगा. रूबी में प्रोटेस्टेंट धर्म है जबकि कॉन्वेंट में धर्म संगठन पर आधारित नहीं है वह तकरीबन जादू के कगार पर है. दोनों के मूल्यों में आधारभूत भिन्नता है. यहाँ स्त्रियाँ सातवें दशक की हैं जिन्हें परम्परावादी अश्वेत भयंकर मानते थे. इस उपन्यास का एक पात्र रेवरेंड मैस्नर मॉरीसन के लिए बहुत विशिष्ठ है, बहुत अपना है, क्योंकि वह अपने धर्म के सिद्धांतों, नागरिकों के अधिकारों, नागरिकों के अधिकारों के विलय को लेकर बड़े धर्म संकट में है. वह युवाओं के सब कुछ से कट जाने को लेकर भी बड़ा परेशान है. वह काफी कुछ अन्ना केरेनीना के लेव की तरह है नैतिकता से उलझता हुआ. रेवरेंड मैस्नर बहस के लिए तैयार है. वह बच्चों की बात सुनने को राजी है. वाशिंगटन पोस्ट में १९९८ में मॉरीसन ने कहा, ‘‘केवल हम (मनुष्य) स्वर्ग की कल्पना कर सकते हैं, अतः चलो इसकी सटीक कल्पना करें, यह केवल मेरा तरीका, मेरा स्वामी, मेरी सीमाएँ, मेरे मूल्य, और आपको, आपको, आपको दूर रखना नहीं है. केवल हमीं यह कर सकते हैं. अतः इसके बारे में सोचें ... हाँ, स्वर्ग का अवसर बहुत क्षीण है. तो क्या?’’

पैरडाइज में दिखाए गए स्थल कुछ मायनों में बहुत खूबसूरत हैं और कुछ मायनों में बहुत खतरनाक. पैराडाइज की कथावस्तु १९७० में ओक्लाहोमा में काले लोगों के समूह द्वारा बहुत सारी अपनी औरतों को अपने सम्मान को बचाने के लिए मार देने की घटना पर आधारित है. वे सोचते थे कि ये स्त्रियाँ बुरी हैं और इसका असर उनकी नैतिकता पर पड़ता है. यह एक भीतर तक हिला देने वाली मार्मिक कथा है. निसन्देह मॉरीसन की रचनाओं में यह एक विशिष्ठ स्थान रखती है.

इंग्लिश राजनीतिज्ञ, कानूनविद, आदर्शवादी धार्मिक तथा लेखक थॉमस मूर अपने समय में एक ख्याति प्राप्त व्यक्ति था. १५२९ से १५३२ तक वह लॉर्ड चांसलर था. उसने एक काल्पनिक राज्य स्थापित किया जिसे उसने ‘यूटोपिया’ की संज्ञा दी. इस काल्पनिक राज्य की कीमत उसे अपनी जिन्दगी से चुकानी पड़ी. यह एक ऐसा राज्य है जहाँ किसी एक व्यक्ति की सत्ता नहीं है. १५१६ में उसने किताब यूटोपिया लिख कर इंग्लैंड के राजा हेनरी अष्टम को नकार दिया. सम्राट जो इंग्लैंड के चर्च का प्रमुख होता था उसे थॉमस मूर ने नकार दिया. उस पर राजद्रोह का मुकदमा चला और अंत में उसे फाँसी दे दी गई. उसकी मृत्यु के सात सौ वर्ष बाद कैथोलिक चर्च ने उसे संत की उपाधि प्रदान की और आज वह पूजा जाता है. यूटोपिया साहित्य का एक नया मुहावरा बन गया. एक ऐसा आदर्श और पूर्ण समाज जिसकी कल्पना तो की जा सकती है परंतु जिसका होना कठिन ही नहीं असम्भव है. इसके नाम में ही यह शामिल है.

अपने इस आदर्श राज्य में मूर एक यात्री को लाता है इस यात्री का नाम आर्कएंजेल की तर्ज पर राफेल हिथलोडे है. आर्कएंजेल सत्य का पर्याय है और हिथलोडे का अर्थ यूनानी भाषा में ‘बकवास करने वाला’ होता है. यूटोपिया शब्द को यदि अलग अलग हिस्सों तो यूनानी भाषा में उसका एक अर्थ ‘कोई स्थान नहीं’ तथा दूसरा अर्थ ‘अच्छा स्थान’ होता है. यह यात्री राफेल अपने लिए और गिल्स के लिए यूटोपिया की राजनीतिक व्यवस्था का वर्णन करता है. यहाँ का सामाजिक जीवन सटीक, उत्तम, तर्कपूर्ण और पूर्णरूपेण व्यवस्थित है. यूटोपिया में किसी के पास निजी सम्पत्ति नहीं है और धार्मिक सहिष्णुता का पालन होता है. किताब प्रमुख रूप से अनुशासन और व्यवस्था की बात करती है.

इसमें वर्णित समाज सर्वसत्तावाद का उदाहरण है आज के स्वतंत्रता के आदर्शों से सर्वथा भिन्न. इस दुनिया में बिना अधिकारियों की अनुमति के जन नीतियों पर बात नहीं की जा सकती है ऐसा करने पर मृत्यु दंड का प्रावधान है. निजी सम्पत्ति का प्रावधान न होने के कारण कार्ल मार्क्स के सिद्धान की तुलना इससे की जाती है. मार्क्स ईश्वर में विश्वास नहीं रखते थे जबकि यूटोपिया में धर्म है. यह धार्मिक सहनशीलता की बात करता है परंतु अनीश्वरवादी के लिए इस दुनिया में कोई स्थान नही है. मूर का सिद्धांत है कि यदि मनुष्य ईश्वर में आस्था नहीं रखता है या मृत्यु के बाद के जीवन में विश्वास नहीं करता है तो उस पर कदापि विश्वास नहीं किया जा सकता है. आज के समाजवादी यूटोपिया के प्रशंसक हैं. मूर का समुदाय बाइबिल के समुदाय पर आधारित है. बाद में बहुत सारे लेखकों ने यूटोपिया की अपने अपने साहित्य में नकल की. नाटककार रोबर्ट बोल्ट ने मूर के जीवन पर आधारित ‘अ मैन फॉर आल सीजन’ एक नाटक लिखा जिस पर बाद में इसी नाम से एक सफल फिल्म बनी. जिसे कई पुरस्कार प्राप्त हुए.

मध्य यूरोप में ‘रूरीटानिया’ एक ऐसा काल्पनिक राज्य है जिसमें एक लेखक ने अपनी तीन रचनाओं को स्थापित किया है. जी हाँ एंथॉनी होप ने १८९४ में ‘द प्रिजनर ऑफ जेंडा’, १८९६ में ‘द हार्ट ऑफ प्रिंसेस ओसरा’ तथा १८९८ में ‘रूपर्ट ऑफ हेंटजाऊ’ इसी काल्पनिक स्थान की भूमि पर रचा. बाद में आने वाले कई लेखकों ने इसी जमीन पर इन उपन्यासों के अगले क्रमिक भाग रचे. विज्ञान कथाकार साइमन हॉक्स ने ‘जेंडा वेनडेटा’ तथा जॉन स्पर्लिंग ने ‘आफ्टर जेंडा’ लिखा.

रूरीटानिया यूटोपिया से बिलकुल भिन्न, उसकी विरोधी दुनिया है यहाँ पूर्ण रूप से राजतंत्र है इस देश में जर्मन भाषा भाषी रोमन कैथोलिक लोगों का निवास है जिन पर तानाशाह राजा का शासन है और जनता जहाँ निरंतर पुलिस की निगरानी में रहती है, किसी को भी शक की बिना अपर गिरफ्तार किया जा सकता है. पूरा समाज अमीर और गरीब दो वर्ग में बँटा हुआ है. शर्तिया तौर पर यह रहने के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है. लेकिन जब होप की इसी दुनिया को नाटक और फिल्म में प्रस्तुत किया गया तो उसे परि देश के सुन्दर रूप में दिखाया गया.

प्लेटो ने जिस विख्यात ‘एटलांटिस’ की चर्चा अपने डॉयलॉग में कितने युगों पहले की लोग आज भी उसकी खोज में आकाश पाताल एक किए हुए हैं. यूनानी भाषा में एटलांटिस का अर्थ होता है ‘एटलस का टापू’. एथेंस पर आक्रमण करते समय पराजित एटलांटिस एक दुर्भाग्यपूर्ण दिन समुद्र में डूब गया. प्लेटो ने अपने राजनीतिक सिद्धांतों के वर्णन के लिए इस टापू का सृजन किया था. प्लेटो का मकसद क्या था इस पर विद्वानों में मतभेद है कुछ का मानना है कि थेरा इरप्शन या फिर ट्रोजन युद्ध की पुरा स्मृति को उसने पुनर्जीवित किया है जबकि कुछ और लोग मानते हैं कि यह प्रेरणा उसने अपने समय की घटनाओं मसलन ३७३ ई पू के हेलिक के नष्ट होने या फिर सिसली के एथेंस पर आक्रमण से ग्रहण की है. बाद के बहुत से लेखक प्लेटो के एटलांटिस से प्रभावित रहे हैं फ्रांसिस बेकन ने ‘न्यू एटलांटिस’ रच डाला. आज भी यह कई फिल्मों , विज्ञान कथाओं और कॉमिक किताबों की प्रेरणा है. यह ऐतिहासिक परंतु उन्नत सभ्यता जो आज खो चुकी है का पर्याय है. बाद के बहुत से लेखक प्लेटो के एटलांटिस से प्रभावित रहे हैं फ्रांसिस बेकन ने ‘न्यू एटलांटिस’ रच डाला. आज भी यह कई फिल्मों, विज्ञान कथाओं और कॉमिक किताबों की प्रेरणा है. यह प्राक ऐतिहासिक परंतु उन्नत सभ्यता जो आज खो चुकी है का पर्याय है.

देश समाज की जर्जर स्थिति, कुरीतियाँ रचनाकारों के लिए बड़ी उर्वरक सिद्ध होती हैं. लेकिन अपने राजा, उसकी शासन प्रणाली, उसके दरबारियों के क्रियाकलापों की खामियों का वर्णन करने के लिए अत्यंत साहस की आवश्यकता होते है, भले ही यह वर्णन छद्म रूप में हास्य व्यंग्य की चासनी में डुबो कर किया जाए. यह साहस किया है जोनाथन स्विफ्ट ने. इसके लिए जिस मेधा की आवश्यकता है वह स्विफ्ट में है. जोनाथन स्विफ्ट ने १७२६ में आज से करीब तीन सौ साल पहले चार छोटे-छोटे ‘गुलिवर प्रदेशों’ का निर्माण कर दिया. वे तत्कालीन समाज की खासकर शासक समाज की कुरीतियों को मृदु फुहार से कठोर फटकार लगाते हैं. वे उस युग की अराजकता, दमन, अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार का भंडाफोड़ करते हैं , उस युग के लोगों विशेष तौर पर राजसी लोगों के अनैतिक व्यवहार, महत्वाकांक्षा, आडम्बर, भाई भतीजावाद, लिप्सा, षडयंत्र, खोखली बहसों से ऊब कर गुलीवर की यात्राओं पर निकल जाते हैं. वे पाठकों को चार द्वीपों की सैर कराते हैं पहला द्वीप नन्हें नन्हें लिलिपुट लोगों का है, इसके ठीक विपरीत दूसरे द्वीप के निवासी इतने बड़े हैं कि वहाँ आम ऊँचाई के आदमी लिलिपुट नजर आते हैं इस ब्रोवडि न्गनैन के दरबार में गुलिवर का खूब अपमान होता है. उस काल में विज्ञान का उद्भव हो रहा था परंतु स्विफ्ट को विज्ञान में न रूचि थी न विश्वास. इसीलिए जन उनका गुलिवर तीसरे द्वीप, वैज्ञानिकों के द्वीप में पहुँचता है तो इस द्वीप में वैज्ञानिक उड़ते रहते हैं और वे बेकार की बहस में सिर खपाते रहते हैं यहाँ भी गुलिवर की रसाई नहीं होते है तो वह तरह तरह के मनुष्यों से परेशान हो कर चौथे द्वीप में जाता है यह द्वीप बोलने वाले घोड़ों का है जो काफी बुद्धिमान हैं. स्विफ्ट में हास्य के लिए गजब की जीवंतता है. वह अपने समय और समाज की बुराइयों को, अपने मन की कडुआहट को हास्य की चासनी में डुबो कर परोसता है. वैसे इन द्वीपों को रचकर उसे काफी नुकसान उठाना पड़ा. यह रचना उसे बहुत मँहगी पड़ी. उसे राज कोप का भाजक बनना पड़ा, इनकी कीमत चुकाने के लिए अपना मानसिक स्वास्थ्य गँवाना पड़ा. बहुत कम लोग जामते हैं कि स्विफ्ट ने अपनी रचना का नाम ‘ट्रेवल्स इन टू सेवरल रिमोट नेशंस ऑफ द वर्ल्ड ः इन फोर पाट्र्स’ रखा था परंतु पाठकों ने उसे ‘गुलीवर ट्रेवल्स’ नाम से अमर कर दिया. अब प्रकाशक भी इसी नाम का उपयोग करते हैं.

ये कुछ नमूने हैं साहित्यकारों की अपनी दुनिया के. उन लोगों की दुनिया के जो इस समाज, इस दुनिया से राजी नहीं हैं, इस दुनिया को बदल डालना चाहते हैं जो कठिन (असम्भव नहीं ?) है. इन लोगों ने अपना एक अलग एक अनोखा जहाँ बसाया. यह सिलसिला यहीं नहीं थमता है कभी नहीं रुकेगा. अभी न मालूम कितने और रचनाकार अपनी विचित्र दुनिया का सृजन करेंगे. कवि (रचनाकार) को यूँ ही ब्रह्मा के समकक्ष नहीं माना जाता है.

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( विजय शर्मा, १५१, न्यू बाराद्वारी, जमशेद्पुर ८३१००१. ई-मेलः vijshain@yahoo.com

 

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 अरविंद कुमार का नज़रिया कई धाराओं से बना है. उन में से एक है -- चार्ल्स डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत. जब वे लंदन गए तो डार्विन का घर देखने जाना नहीं भूले. (चित्र राकेश माथुर)

आधुनिक भारत के आंतरिक द्वंद्व

हमारे टकराते बढ़ते क़दम

अरविंद कुमार

द्वंद्व, संघर्ष, टकराव... शब्द कोई भी इस्तेमाल करें, द्वंद्व जीवन की और प्रगति की पहली शर्त है। जब से सृष्टि बनी है, प्रकृति हर दम आपस में टकराव की स्थिति में रही है। जीवन का उदय कब हुआ, कहाँ हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ... ये बहसें चलती रहेंगी। सच यह है कि हर जीवजाति, वनस्पति, समूह, इकाई आपस में टकराते, लड़ते भिड़ते, हारते जीतते कमज़ोर के विध्वंस और मज़बूत के उत्कर्ष के रूप में संश्लेषण के साथ आगे बढ़ते रहे हैं।

ये तो हुईं बड़ी बड़ी वैज्ञानिक सिद्धांत की बातें--ये सब बातें वैज्ञानिकों विचारकों के पल्ले डाल कर हम आज के भारत के टकरावों पर नज़र डालें। आज के भारत की शुरूआत मैं सन '47 से मान कर चलता हूँ। तब से देश और समाज लगातार टकराव की हालत में रहे हैं। सैंतालीस में मैं 17 साल का था...देशभक्ति से भरपूर, दिल्ली कांग्रेस में छोटे से स्वयंसेवक के तौर पर सक्रिय... उस साल की 14-15 अगस्त की रात मैं कभी भूल नहीं जा सकता... हम लोगों की टोली ट्रक में लद कर करोलबाग़ की सड़कों पर मस्ती में झूमती नारे लगाती चक्कर लगाती रही--मानो हम शोर नहीं मचाते तो देश को पता ही नहीं चलता कि आज़ादी आ गई है। सुबह हुई तो लाल क़िले जा पहुँचे... पंडितजी का भाषण सुनने... हज़ारों लाखों सुनने वाले थे। पंडितजी के भाषण की ख़ूबी थी कि पूरे इतिहास का कम शब्दों में जायज़ा लेते हुए सीधी सादे शब्दों में बता दिया कि हम कौन हैं, कितने पुराने हैं और अब जाना कहाँ है।

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1947 की 15 अगस्त को लाल क़िले से भाषण देते पंडित नेहरू... उस भीड़ में चाँदनी चौक की तरफ़ हम लोगों की टोली भी थी.

पिछली आधी रात, जब हम सड़कों पर नारे लगा रहे थे, संसद भवन में पंडित जी ने ऐतिहासिक भाषण में कहा था- हमारी मुलाक़ात तक़दीर से हो रही है, नियति से अभिसार के इस क्षण के लिए हम कब से बेताब थे! अब बाग़डोर हमारे हाथ में है।

 

देश में जगह जगह दंगे हो रहे थे.... दिल्ली जल रही थी... मैं ने दिल्ली की सड़कों पर सड़ती लाशें देखी हैं... वे दृश्य आँखों के परदे पर अभी तक हैं...

 

ट्रेनों में लद कर भारत से पाकिस्तान और पाकिस्तान से शरणार्थी आ रहे थे. एगर कोई ट्रेन समय पर पहुँच जाए ता मतलब था वह 24 या 48 घंटे लेट है... हमारी टोली का काम था दिन में मुसलमानों द्वारा ख़ीलि किए गए मकानों की सूची बनाना, और रात में दिल्ली स्टेशन से पंजाब से आए शरणार्थियों को उन में बसा देना...

सरकार के पास ख़ुशियों में खो जाने के लिए एक भी क्षण नहीं था। पहले ही दिन 14 को पाकिस्तान बना था। देश इतिहास के सब से भारी टकराव से जूझ रहा था। हर तरफ़ दंगा, मारपीट, ख़ूनखच्चर से निपटना सब से बड़ी चुनौती थी। इस से पार हो जाने पर ही देश बच सकता था। और हम ने देखा कि देश न सिर्फ़ बचा बल्कि आज दुनिया के सब से बड़े स्वतंत्र प्रजातंत्र के रूप में सब की आँखों का तारा है।

विभाजन हिंदु-मुस्लिम टकराव का परिणाम था। आज़ादी से पहले मुसलमान नेता कहते थे कि हिंदु-बहुल भारत में मुसलमान पिच जाएँगे, हिंदु नेता हिंदुत्व ख़तरे में है का नारा लगाते रहते थे। कमाल की बात यह है कि वह टकराव आज तक चल रहा है। कुछ नेताओं की रोज़ी रोटी इस बात पर चलती है कि समूहों के टकराव को जितना बढ़ाएँगे चढ़ाएँगे, जितने उत्तेजक नारे लगाएँगे, जितने भ्रामक तर्क पेश करेंगे, उतना ही दोनों कमाएँगे, सत्ता के क़रीब आएँगे... कई बार लगता है दोनों में मिलीभगत है...

इसी से जु़ड़ा टकराव है आतंकवाद का। आज जिस आतंकवाद से देश और दुनिया जूझ रहे हैं वह इसलामी आतंकवाद के नाम से जाना जाता है। इतिहास में हर धर्म कई लहरों से आंदोलित होते हैं। कभी उग्रवाद ज़ोर पर होता है, कभी उदारतावाद। आज इसलाम उग्रवाद के भीषण दौर में है। यह लड़ाई भारत में ही नहीं, पाकिस्तान में, मिस्र में, सूडान में...कई देशों में चल रही है। इस का हल किसी एक देश के पास नहीं है। इस से निपटने का रास्ता मात्र हथियार नहीं हैं। यह लड़ाई वैचारिक स्तर पर बहुत देर तक चलने वाली है। 

बात धर्म की ही है ही नहीं। धर्म का असली मतलब आध्यात्मिकता होता है। बात है अहम की। अहम की आड़ में ज़र की, ज़मीन की। सही है कि पुराने ज़माने में मंदिर ढहाए गए थे। सवाल यह है कि हम कब तक गड़े मुरदे उखाड़ते रहेंगे। कब पुरातन को भूल कर भविष्य का रुख़ करेंगे। अयोध्या में मंदिर था या नहीं? यह बात नहीं है। सब जानते हैं कि वाल्मीकि में लिखा है: राम की अयोध्या उन के साथ साथ पानी में डूब गई थी। सदियों बाद चीनी यात्रियों ने वहाँ साकेत नाम का बौद्ध नगर देखा था, जहाँ हज़ारों संघाराम थे। वर्तमान अयोध्या की धरती में जो कुछ दबा होगा वह कोई बौद्ध अवशेष होगा। इस लिए बात तथ्य की तो है ही नही है। कहा जा रहा है कि बात विश्वास की, आस्था की, मान्यता की है। बात है किसी भी बहाने किसी समूह को उकसाने की, या उस के तथाकथित निहित स्वार्थ-हित के नाम पर नेतागिरी की। हिंदु मुसलमान, सिख ईसाई से आगे बढ़ जाएँ तो इन सब टकरावों का आधार है आर्थिक भागीदारी। हमारे पास जितनी भी रोटी है उस में से किस को कितना हिस्सा मिलेगा।

 

देश के नेताओं ने इन टकरावों की संभावना 1930 में ही देख ली थी। पंडित नेहरू ने तब कहा था कि आज़ादी के लिए लड़ने के साथ साथ हमें यह भी तय करना चाहिए कि आज़ादी किस के लिए होगी। देश--मतलब क्या? गाँव, शहर, किसान, व्यापारी, उद्योगपति, दिल्ली, पंजाब, बंगाल... हिंदु, मुसलमान, ईसाई, सिख, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र... अहीर, यादव... नागा, गोरखा... आदिवासी... भील, संथाल... टाटा बिरला, किसान, मज़दूर... ? आख़िर देश इन में कोई एक है या सब कुछ मिला कर? तरह तरह के सवालों और टकरावों की पूरी संभावना थी। इसी लिए जब योजना आयोग बने तो सब से पहले तय किया गया कि उद्योग किसी एक इलाक़े में नहीं लगाए जाएँगे। उन्हें हर हिस्से में फैलाया जाएगा। विकास का मतलब होगा -- सब का विकास।

पर देखा गया कि अधिकांश मलाई उच्च वर्गों के मुँह में जा रही है। पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की माँग उठना स्वाभाविक, अवश्यंभावी, अपरिहार्य था। (अगर हिंदुओं का ही देश मान लिया जाता तो भी हिंदु का मतलब द्विज जातियाँ तो नहीं ही रह सकता था। शूद्र भी हिंदु हैं, दलित भी। हिंदु देश में भी पिछड़ी जातियाँ पिछड़ी रहें यह देर तक नहीं चल सकता था।) आरक्षण की ज़रूरत न भी पड़ती अगर समाज, सरकार, व्यापारी, कलकारख़ाने सब वर्गों के लोगों को काम मुहैया करने के लिए सक्रिय क़दम उठा रहे होते। हम जानते हैं कि कितने उच्च वर्गीय युवकों को नौकरियाँ क्षमता या क्वालिफ़िकेशन के आधार पर मिलती हैं और कितनों को सिफ़ारिश से। हम कहते कुछ भी रहें, सिफ़ारिश ही नौकरियों का मुख्य स्रोत रही हैं। क्वालिफ़िकेशन की बात केवल तब आती है जह कोई सिफ़ारिशी सामने न हो।

और क्वालिफ़िकेशन की बात तब आएगी जब सभी उँची नीची जातियों के लोगों का पढ़ाई का समान अवसर मिले। ग़रीबों को कम फ़ीस पर बड़े कालिजों में दाख़िला मिल सके। मैं अपनी बात कहता हूँ। मैं वैश्य वंश से हूँ पर निर्धन घर से हूँ। मेरी पढ़ाई मेरठ में मुफ़्त के म्यूनिसपलटी के स्कूल में हुई। मैट्रिक की पढ़ाई भी लगभग मुफ़्त सी, बेहद कम फ़ीस वाले स्कूल में हुई। चार विषयों में डिस्टिंक्शन पाने के बाद भी पारिवारिक क्षमता नहीं थी कि मुझे कालिज भेजा जा सके। बाल श्रमिक के रूप में मैं ने 1945 में काम करना शुरू किया। कुछ मित्रों की प्रेरणा से शाम के समय सस्ते प्राइवेट स्कूलों में पढ़ना शुरू किया। भला हो पंजाब विश्वविद्यालय का कि पचासादि दशक में दिल्ली में उन्हों ने शाम के समय उच्च शिक्षा का सस्ता कालिज कैंप कालिज खोल दिया। नाममात्र की फ़ीस पर मैं वहाँ से अच्छे नंबरों इंग्लिश साहित्य में ऐमए कर पाया। और बाद में हिंदी-इंग्लिश को समांतर कोश और द पेंगुइन इंग्लिशहिंदी/हिंदीइंग्लिश थिसारस ऐंड डिक्शनरी जैसे कोश दे पाया। तो जो टकराव हैं उन में से मुख्य टकराव सभी वर्गों अमीर ग़रीब के लिए तरक्की के अवसर खोलने के हैं। मैं देखता हूँ कि आजकल उच्च तकनीकी शिक्षा की फ़ीस कई गुना बढ़ाई जा रही है। यह एक और तरीक़ा है धनी वर्गों को मिलने वाले प्रश्रय बनाए रखने का। उच्च तकनीक को उन तक सीमित रखने का। आईईटी जैसे संस्थानों नाममात्र की फ़ीस और आरक्षण ही निम्न वर्ग को सत्ता में भागीदारी देने का कारगर तरीक़ा है।

 

पेंगुइन कोश के विमोचन पर बोलते अरविंद कुमार

 

भाषा के टकराव भी देश में उपलब्ध कम दूध में से मलाई पाने की कोशिशों के टकराव हैं। चाहे कभी आंध्र प्रदेश के मुल्की-ग़ैरमुल्की के टकराव हों, बंबई में कभी मराठी-बनाम-मद्रासी या आज हिंदी-मराठी के नाम पर टकराव हों, मलाई के और नेतागिरी के टकराव हैं। भाषा के सवालों में इंग्लिश भाषा के पुनरुत्थान का सवाल भी है। आज़ादी से पहले हम लोग अँगरेजी को अंगरेजों द्वारा हम पर लादी गई भाषा के तौर पर देखते थे। आज़ादी के नारों में एक नारा अँगरेजी के विरोध का भी था। बाद में यह नारा कई पार्टियाँ साठ सत्तर वाले दशक में भी लगाती रहीं। पर जनता ने इस नारे को सिरे से रीजैक्ट कर दिया है। 47 के बाद हम ने देखा कि अँगरेजी हमारे पास एक ऐसी खिड़की या महापथ है जिस से हम संसार से संपर्क तो कर ही सकते हैं, नौकरी और धन दौलत भी बटोर सकते हैं। आज अँगरेजी सामाजिक और निजी तरक़्क़ी की सीढी के तौर पर हर अगड़े पिछड़े वर्ग के मन में बस गया है। बहुतेरे हिंदी वाले अब भी हिंदी ख़तरे में का नारा लगा रहे हैं। जब कि मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हिंदी तेज़ी से बढ़ रही है। वह हिंदी नहीं जो सरकारी संस्थानों करोड़ों रुपए बरबाद कर के बनाने की काशिश की गई थी, बल्कि वह हिंदी जो जनता, लेखक, पत्रकार और टीवी वाले बना रहे हैं--एक जीतीजागती हिंदी।

 

भाषा की बात यहीं पर ख़त्म नहीं हो जाती। सवाल उठ रहे हैं ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, हरियाणवी, गढ़वाली के... अगर बच्चों को मातृभाषा में पढ़ाया जाना है तो आज की हिंदी तो उन की मातृभाषा नहीं ही है। जब भोजपुरी बिहार की भाषा बनेगी तो भोजपुरी स्थानीय स्तर पर शिक्षा का माध्यम भी बनेगी। उस का विकास भी करना होगा। आज भी आंचलिक भाषाओं में पत्रपत्रिकाएँ निकल रही हैं। संसाधन कम होने के कारण उन का स्तर अच्छा नहीं है। जब वहाँ आम आदमी के पास पैसा आएगा, ख़रीदने की ताक़त बढ़ेगी तो उन की स्तर भी ऊँचा उठेगा। उन भाषाओं में फ़िल्में बन रही हैं। टीवी पर चैनल शुरू हो रहे हैं। ऐफ़ऐम रेडियो भी आएँगे।

 

जैसा कि हम ने देखा कि टकरावों के मूल में रोटी रोज़ी है। एक नारा रहा है जो कुछ भी सब में बराबर बाँट दो। पिछले दो सौ सालों से यह संसार के सब से मोहक नारों में रहा है। इस के पीछे भावना बिल्कुल सही है। मैं स्वयं इस नारे के साथ कई दशक रहा हूँ। पर हमेशा यह सवाल मन को सालता था कि बँटवारा किस का? धन का न! धन होगा तब बँटेगा न! परिणाम क्या होगा? हम ग़रीबी का वितरण ही करेंगे। सन 47 का किसान भूखा नंगा था। उसे ग़रीब देश की दौलत का बराबरी का हिस्सा मिले तो पल्ले क्या पड़ेगा। सोवियत संघ में तरह तरह के प्रयोग कर के देखा गया कि केंद्रीय स्तर पर आयोजन कर के उपज नहीं बढ़ पाती। चीन में भी आर्थिक व्यवस्था में परिवर्तन करने पड़े। भारत ही पीछे क्यों रहे?

 

हम लोग बल, बुद्धि और शौर्य में किसी से कम नहीं हैं। हमें अपनी शक्ति आपसी झगड़ों के सम्यक् समाधान कर के सारी की ताक़त प्रकृति से टकराने की ओर लगानी होगी। पूजा पाठ ज़रूरी तो है, लेकिन धर्म के साथ साथ अर्थ का महत्त्व कम नहीं है। कहा गया है भूखे भजन न होत गुपाला। आतंकवाद से लड़ने के लिए भी भूख मिटाना ज़रूरी है।

खेती के लिए चाहिए उन्नत बीज, समय पर पानी। बड़े बड़े बाँधों के अगर हम गाँव गाँव जल संकलन के लिए स्थानीय जल क्षेत्र बना सकें, तो गाँवों की हालत सुधर सकती है। वहाँ ऊर्जा भी पहुँचा सकें, तो एक नई हरित क्रांति हो सकती है। गाँव गाँव में कृषि आधारित उद्योग लगाए जा सकते हैं। गाँव में काम मिलेगा तो पूरे देश की आर्थिक हालत सुधरेगी। तनाव टकराव कम होंगे। गाँव की ख़ुशहाली से उद्योग धंधों की उपज के लिए नए बाज़ार खुलेंगे।

आतंकवाद से जूझने के लिए हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने चार बातें बताईं--1. नागरिक सचेत रहें, 2. देश में एकीकृत इंटैलिजेस विभाग हो, 3. अदालतों में मुक़दमों का निपटारा जल्द से जल्द हो, और 4. आर्थिक प्रगति के माध्यम से ग़रीबी का सफ़ाया हो। हर तरह के आर्थिक विकास के सब से पहली ज़रूरत आजकल है ऊर्जा उत्पादन में तेज़ी से बढोतरी।

 

मैं समझता हूँ कि यह चौथी बात सब से महत्त्वपूर्ण है। ग़रीबी हटाए बिना हम गहरे दलदल में धँसते चले जाएँगे। यही कारण है कि परमाणु समझौते के समर्थन में डाक्टर कलाम ने आवाज़ बुलंद की थी। इस के लिए आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हमारे प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने सरकार दाँव पर लगा दी थी। ख़ुशी के बात है कि अब यह समझौता हो चुका है। आर्थिक क्षमता बढ़ने से देश की ताक़त बढ़ेगी। ताक़तवर देशकी तरफ़ टेढ़ी नज़र से देखने की हिम्मत बड़े से बड़ा देश नहीं कर सकता, चाहे वह पाकिस्तान हो, अमरीका हो, रूस हो, चीन हो। आज सन 47 वाला भुखा नंगा भारत नहीं है। कल वह दुनिया के सब से धनी देशों में होगा। तब के टकराव कुछ अलग तरह के होंगे।

--अरविंद कुमार, सी-18 चंद्रनगर, ग़ाज़ियाबाद 201011

 

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