मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

कृष्ण कुमार यादव की विश्व पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल) पर 2 कविताएँ

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प्रकृति की लड़ाई

नहीं लड़े जाते अब लम्‍बे-लम्‍बे युद्ध

लड़ती है प्रकृति अब खुद ही लड़ाई

जनसंख्‍या, पर्यावरण असंतुलन, भ्रष्टाचार

और न जाने क्‍या-क्‍या

लो भुगतो इन सबका कहर

कभी सुनामी लहरें

कभी कैटरीना और रीटा

इन सबके बीच

नष्ट होती सभ्‍यताएँ

शायद प्रलय का संकेत है।

 

 

मिट्‌टी का घर

दीवारों पर चढे़ प्‍लास्‍टर को

कुरेदने लगा हूँ

उसके आँचल में छिपी

मिट्‌टी की तलाश में

जिसके साथ बुने थ्‍ो मैंने सपने

जिन पर लिखी थी

आडी़-तिरछी लाइनों से

भविष्य की ताबीर

जिन पर सर टकरा-टकरा कर

मनवाई थी जिदें

न जाने वो मिट्‌टी

कहाँ खो गयी

अब किसे बनाऊँ अपना हमराज

तभी नजर पड़ती है

मिट्‌टी के लोंदे से घर बना

ख्‍ोलते बच्‍चों पर

कदम बढ़ जाते हैं उधर ही

और खो जाते हैं

सोंधी खुशबू में।

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2 और कविताएँ -

 

टहनियाँ

बाथरूम की खिड़कियों के सहारे

टहनियों का एक गुच्‍छा

सामने आकर छा गया है

नई-नई कोपलों के साथ

अल्‍हड़ अंगड़ाईयाँ लेते हुये

कुछ ही दिनों में वे

बाथरूम की खिड़कियों को

छुपा लेते हैं अपने में

व्‍ही खिड़कियाँ जिन्‍होंने उन्‍हें राह दिखाई

अन्‍दर आने की

विलीन कर देती है

उन्‍हीं के अस्‍तित्‍व को

ऐसा लगता है जैसे

बड़ी-बड़ी पत्‍तियों के छापों वाला

एक खूबसूरत पर्दा

खिड़की पर लहरा रहा है।

---

आईना

आईना

जिसमें हम देखते हैं

अपनी भौतिकता को

पर भौतिकता ही

सत्‍य नहीं

इस भौतिकता से परे भी

मानव कुछ है

लेकिन वह डरता है

इसे देखने से

काश कोई ऐसा

आईना होता

जिसे सामने रख

मानव अपने

आन्‍तरिक सत्‍य को देख पाता

और शायद तब

अपनी सुन्‍दरता-असुन्‍दरता के पैमाने की

खोज कर पाता।

 

 kkyadav (WinCE)

कृष्ण कुमार यादव

भारतीय डाक सेवा

वरिष्ठ डाक अधीक्षक,

कानपुर मण्‍डल,कानपुर-208001

kkyadav.y@rediffmail.com

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