आचार संहिता लग चुका था। मंत्री ने अपने खास चमचे से निवेदन किया कि मैं तो पांच साल तक कुर्सी से चिपके रहने के कारण जनता को अपना मुंह दिखाने लायक नहीं हूं अतः वह चमचे का रूप छोड़ जनता का रूप धारण कर जनता के बीच जाए और मंत्री के आने की सूचना जनता को दे। साथ ही यह समाचार भी लाए कि चुनाव जीतने के बाद से लेकर आज तक जनता से न मिलने के कारण उसकी मनोदशा क्या है ,किचन दशा क्या है ?
आदेश मिलते ही कबूतरबाज मंत्री के चुनाव क्षेत्र में । उसने वहां आकर देखा कि मंत्री को अब वोटर भूल चुके हैं । उनकी फसलें बंदरों के कारण खत्म हो चुकी हैं । खेत बंजर पड़े हुए हैं । उसके खासमखास ठेकेदार ने किसानों के खेतों के लिए जो कूहल बनाई थी ,वह गांव के रास्तों के साथ ही उतर -चढ़ रही है। राशन की दुकान का आटा-दाल- चावल सब मंत्री के खासमखास की दुकान पर मजे से दुगने दाम पर बिक रहा है। मंत्री की राजनीति ने वहां के स्कूलों को खाली कर दिया है। मास्टरों की जगह पानी पिलाने वाले बच्चों को पढ़ा रहे हैं। स्कूलों में अधपकी खिचड़ी पका रहे हैं । बची खिचड़ी के चावल घर में खीर बनाने के काम आ रहे हैं। चारों ओर मंत्री के मुसटंडों का डण्डा घूम रहा है। जनता भूख -प्यास से बिलख रही है। पिछले चुनाव में मंत्री ने जनता से जो वादे किए थे वे सब मिट्टी में मिल चुके हैं।
मंत्री के विपक्षी को यह सब पता था। उसकी दायीं आंख और दायीं टांग कई दिनों से फड़क रही थी । उसे अब मतदान के दिन का इंतजार करना करना मुश्किल हो रहा था। वह अपने दोंनों पाटों को बजा -बजा अधमरा कर चुका था कि वह अबके हर हाल में मंत्री को हरा कर खुद मंत्री होकर रहेगा ।
मंत्री का खास चमचा जनता के वेश में मंत्री के विपक्षी के पास आ जा धमका। विपक्षी का जोश देख मंत्री का चमचा परेशान हो उठा। उसे लगा कि अब खरेचणी भी गई। विपक्षी की भूखी हडि्डयां आग उगल रही थीं । उसका उत्साह बरसाती नाले की तरह हिल्लोरें मार रहा था। वह बस चुनाव-चुनाव दहाड़ रहा था। मंत्री के चमचे को पूरा विश्वास हो गया कि अबके उसका मंत्री गया । जहाज डूबता देख जो भाग न ले वह चमचा नहीं । वह विपक्षी के चरणों में लोटने लगा। उसने विपक्षी के चरणों में लोटते हुए उसके जीतने की घोषणा भी कर डाली। तब विपक्षी ने उसे गले लगाते हुए कहा,‘ हे अवसरवादी के बाप! मैं यह तो नहीं जानता कि तुम किसके चमचे हो? पर जिसके भी हो तुम आदरणीय हो ।'
तब सिर झुका चमचे ने कहा ,‘ हे मेरे प्रिय लीडर ! मैं तुम्हारा घोर प्रशंसक हूं। मैं तुम्हारे चरणों में जगह पा कृतार्थ होना चाहता हूं। मैं अकेला ही तुम्हारी पालकी उठाना चाहता हूं। तुम्हें अपने सिर पर उठाना चाहता हूं।' मंत्री के चमचे के मुख से यह सुन विपक्षी पागल हो गया। उसने चमचे को सिर -आंखों पर लिया, यह जानते हुए भी कि जो चमचा अपने बाप का नहीं हुआ वह उसका क्या होगा। चमचा और लक्ष्मी दोनों तो चंचल हैं। विपक्षी ने जोश में आकर अपनी प्लानिंग उगल डाली ,‘मैंने अबके जनता को पटाने में जी जान लगा दी है । मंत्री के आने के सारे दरवाजे सील कर दिए हैं , घोर जातिवाद फैला दिया है। पिलाकर अभी से सारे टुन्न कर दिए हैं । मंत्री यहां पर भी नहीं मार सकता। ' यह सुन चमचे ने पड़ाव बदलने का पूरा मन बना लिया । उसने विपक्षी के चरणों में सिर धर कहा,‘हे! प्रदेश के भावी उत्पाती! आपके विरोधी की हिम्मत आपके सामने आने की हो ही नहीं सकती। आपका विरोधी आपके सामने मुझे लंगर डालता साफ नजर आ रहा है। जीत की चुनाव से पहले ही आप मेरी बधाई स्वीकारें । ' यह सुन विपक्षी ने चमचे को और भी जोर से बाहों में जकड़ लिया।
मंत्री का चमचा वापस नहीं लौटा तो उसने अकेले ही चुनाव -क्षेत्र जाने की सोची। राजधानी से सबो पहले सीधे अपनी जाति के प्रधान के पास गया । पूरी जाति के बदले उसी से माफी मांगी । देखते ही देखते मंत्री के आने का समाचार पूरी जाति में फैल गया । पीपल की छांव तले जात -बिरादरी की नाक बचाने की कसमें खाई गईं । मंत्री पांच साल बाद ही सही ,लौट तो आया। राम तो चौदह साल बाद आए थे । ये राम से ज्यादा ईमानदार है। देखते ही देखते यह प्रचार पूरे चुनाव क्षेत्र में फैल गया। विपक्षी की नींद हराम !
पांच साल बाद ही सही ,जनता मंत्री के आने पर खुश थी । मंत्री जहां भी जाता उसका अभूतपूर्व स्वागत होता । घरों में पूजा के स्थानों पर उसीके पोस्टर ! जिनको उसके पांच साल तक न मिलने का मलाल था वही उसके जलसे के लिए भीड़ जुटाने में मस्त थे। मंत्री का चमचा फिर जहाज पर वापस लौटा । जनता फिर उल्लू बनी । बोलो प्रिय नेता की, जय! बोलो धरती पुत्र की, जय!!
लोकतंत्र का,नाश हो!
सांप्रदायिता का, विकास हो!
जातीय अंह, और पनपे!
आचार संहिता, ठेंगे पर!!
अहा! कितना मजेदार है यह चुनाव का खेल खेल! खोये की बर्फी में पचासों सड़ी मिठाइयों को मेल!!
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डॉ.अशोक गौतम
गौतम निवास ,अपर सेरी रोड
नजदीक मेन वाटर टैंक,सोलन-173212 हि.प्र.
ये हिन्दुस्तान है मेरी जान
प्रत्युत्तर देंहटाएंजात और पात का खेल वर्षों से चला आ रहा है
और लोग कहते हैं जात पात ख़त्म हो रहा है :) :)
इसी लिए मेरा भारत महान कहलाता है.........और अब तो यह विश्वगुरु बनने के लिए अग्रसर है जी:)))
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