5 अप्रैल 2009

अशोक गौतम का व्यंग्य - जा आत्मा, ऐश कर

धर कुछ दिनों से अपने मुहल्ले में ये कुछ आम हो गया है कि हम करते हैं कुछ और तो होकर आता है कुछ और! पता नहीं हमारे मुहल्ले के वाशिंदों के दिमाग में कौन पिशाच घर कर गया है? पिछले दो साल से मुहल्ला सुधार कमेटी यह सोचकर चंदा इकट्ठा करने में दिनरात जुटी थी कि चंदे से अबके मुहल्ले में जज घर बनावाया जाएगा। पिछले हफ्ते जब जज घर की आधार शिला रखी जानी थी तो मुहल्ले के सभी आदरणीय आधार शिला वाले स्थान पर खड़े के खड़े रह गए और उधर मुहल्ला सुधार समिति के प्रधान ने चंदे से इकट्ठी हुई धन राशि के दम पर अपने अपने दसवें कमरे की आधारशिला रख डाली।

इधर सरकार से मुहल्ले के रास्ते के निर्माण के लिए बीस हजार में से कट कटाकर दस ही हाथ लगे तो मुहल्ले में जश्न हुआ। जिस दिन रास्ते का काम शुरू होना था तो पता चला कि इस पैसे से तो रास्ता सुधार कमेटी के प्रधान अपने आंगन को पक्का करवाने में जुटे हैं।

इन प्रधान जी से तंग आकर हमने फिर एक और नया प्रधान चुना । इसने सबसे पहले मुहल्ले के प्रति सत्य निष्ठा और ईमानदारी की शपथ हमारे कहने से पहले खाई। लगा ये बंदा मुहल्ले के विकास में ईमानदारी बरतेगा । मुहल्ले वालों को लगा कि मुहल्ले में सरकार का एक सार्वजनिक नल लगवाया जाए। कारण, कुत्ते मुहल्ले वालों के बाहर रखे पानी के बरतनों को जूठा कर रहे थे और पता न लगने के कारण जब वही जूठा पानी मुहल्ले का शरीफजादा पी रहा था तो कुत्तों सा हो रहा था। प्रधान के दिशा निर्देशों का पालन करते हुए मुहल्ले वालों ने फिर चंदा इकट्ठा कर सरकारी दफ्तर में खिला पिला कर नल पाने के चक्कर लगाने शुरू किए। काफी मशक्कत के बाद मुहल्ले के लिए सार्वजनिक नल स्वीकृत हो गया। मुहल्ले में एक बार फिर नए प्रधान की अगुआई में जश्न मना।

महीने बाद जब विभाग के सार्वजनिक नल लगाने आने वाले बंदों ने सोम पान करने के बाद पानी के नलके की पाइप नए प्रधान के शौचालय की ओर मोड़ी तो मुहल्ले वालों के होश एक बार फिर उड़े। पर सब यह सोच कर चुप से रहे कि हो सकता है मुफ्त की ज्यादा पी ली हो इसलिए गलती से पाइप का मुंह दूसरी ओर को मुड़ गया हो । मुफ्त की शराब जब काजी को भी हजम होती रही है तो इन बंदों को पता नहीं क्यों हजम नहीं हो रही थी। इतनी सी पीकर ही बहक गए थे । तभी सरकारी बंधुओं से रोज का पाला पड़ने वाले एक सिद्ध पुरुष ने बताया कि ये विभाग में नए नए ज्वायन किए हैं अभी खाने पीने के इतने हैबीचुअल नहीं हुए हैं, कुछ दिन में रवां हो जाएंगे। डांट वरी, मैं इन्हें खुद हैंडिल कर लूंगा। जब पाइप नए प्रधान के शौचालय के दरवाजे तक पहुंच ही गई तो एक आयोडीन रहित नमक खाने वाले ने उन्हें रोकते हुए पूछाभैया! ये पाइप बिछा कहां को रहे हो? ज्यादा पी ली हो तो कल आ जाना।

जहां के लिए नलका सैंक्शन हुआ है वहीं के लिए पाइप बिछा रहे हैं। इतनी पिलाई ही कहां है आपने जो हम बहक जाएं।इनके हेड ने अपना हेड झटकते हुए कहा और पाइप कसने लग गया।

पर नलका तो मुहल्ले के मुहाने पर लगना था।

प्रधान जी का शौचालय क्या वहां भी है?’उसने चौड़े होकर पूछा तो साथ खड़े प्रधान जी सीना चौड़ा किए मंद मंद मुस्कराते रहे और मुहल्ले वाले....

कई दिनों से पेट में दर्द हो रहा था। सोच रहा था कि अजवायन खाकर ठीक हो जाएगा, पर नहीं हुआ तो नहीं हुआ । हारकर डाक्टर के पास गया तो उस समय वे एमआर से गिफ्ट लेने में मग्न थे। उनके कमरे के बाहर मरीजों की इतनी लंबी लाइन, इतनी तो यमराज के दरबार के आगे भी नहीं होती। अचानक अपनी जान पहचान का इस अस्पताल का बंदा कहीं से आ टपका, जान में जान आई।

क्या बात है?’

पेट में कई दिनों से दर्द हो रहा है।

तो पहले क्यों नहीं आए?’

सोचा यों ही ठीक हो जाऊंगा।

थोड़ा यों मुड़िए, तुम्हारे साथ ही नहीं ,पूरे देश के साथ यही प्राब्लम है, जब बीमारी हद से आगे निकल जाती है तो इलाज करवाने चलते हैं। समय रहते अगर इलाज करवा लिया जाए तो यह हाल न हो। और हां थोड़ा अपने खाने की आदत को सुधारिए।

पर जब साथ वाला खाता ही रहता है तो डाक्टर साहब मुझसे भी नहीं रहा जाता।मैंने अपनी व्यथा कही।

उसकी उम्र कितनी है?’

यही कोई तीस बत्तीस साल।

उसे तो अभी जिंदगी में बहुत कुछ करना है। आप बस अब अपने आगे की सोचिए।

घर आकर दवाई ली तो पेट दर्द तो ठीक नहीं हुई पर मुझे लगा जैसे मेरी मरी हुई आत्मा जिंदा हो उठी। एकाएक मुझमें मानसिक परिवर्तन आने लगा। और घंटे बाद ही पूरा का पूरा परिवार परेशान। में तो पहले ही शर्म से पानी पानी हुआ जा रहा था। घर वालों ने आनन फानन में गाड़ी की और मुझे अस्पताल ले गए। शुक्र भगवान का! वहां वही डाक्टर मिल गए जिन्होंने मुझे पहले देखा था।

अब क्या हो गया? कहीं और दर्द हो गई क्या?’

नहीं।

तो??’

साहब, खाई तो आपकी लिखी पेट दर्द की दवाई ही थी, पेट दर्द तो ठीक नहीं हुआ पर मरी हुई आत्मा जाग उठी। पत्नी ने मेरा दर्द से पीड़ित पेट पकड़े रखा।

देखिए भाई साहब! हम तो केवल दवाई ही लिख सकते हैं। बाकी दवाई में क्या है,यह तो दवाई बनाने वाला ही जाने।डाक्टर साहब भी परेशान हो उठे।

पर दवाई खाकर आज तक मरते ही अधिक देखे। यह पहला केस है जिसमें दवाई खाकर मरा हुआ कुछ जिंदा हुआ हो।करुणामूलक आधार पर मेरी जगह लगने की आस लगाए बेटे ने चिंता में डूबे हुए कहा तो डाक्टर ने उसके कंधे पर हाथ रखते कहा,‘यार! किस्मत अपनी- अपनी।

मरी हुई आत्मा के जिंदा होने वाले दिन से लेकर आज तक मेरा परिवार ही नहीं मैं भी सच्ची को बहुत परेशान हूं। घर की सारी शान शौकत को ग्रहण लगा गया है। केवल और केवल पगार पर जी रहा हूं। आत्मा से रोज की तरह कल सांझ फिर निवेदन किया,‘हे आत्मा! प्लीज तू मर जा और मुझे जिंदा रहने दे। या मैं तुझसे तंग आकर आत्महत्या कर लेता हूं। फिर न रहेगा बांस और न रहेगी बांसुरी।तो आत्मा ने विनम्र हो पूछा,‘एक बात पूछूं?’

तो मर जाओगी?’

हां।

तो पूछो।मेरा मन मल्हार गाने लगा।

तुम मुझे मारकर कितने साल जिए?’

जबसे दिमाग की भूख से परेशान हुआ।

ये भूख कम हुई क्या?’उसने पूछा तो पहली बार मैं सोचने को विवश हुआ। काफी देर तक सोचने के बाद मैंने सिर खुजलाते कहा,‘नहीं।

तो जिस देश में लोकतंत्र हो वहां कुछ जीने का हक तो गरीबों को भी होता होगा न? आत्मा से सबकुछ छीन लो मित्र, पर थोड़ा सा हक तो उसे भी जीने का दो।

बंधुओं! मैंने आज तक पत्नी को उसके नाजायज हक दिए। बच्चों को उनके नाजायज हक दिए तो मेरे मन में आया कि जिसने अपने मरने के बाद मुझे इतने हक दिए आज मैं भी इसे कुछ जीने का हक दे ही दूं। तो जा आत्मा! तू भी क्या याद रखेगी कि तेरा भी किसी शरीफ से पाला पड़ा था। मैंने आज से तुझे जीने का हक दिया।

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डॉ. अशोक गौतम

द्वाराः- संतोष गौतम, निर्माण शाखा,

डा. वाय. एस. परमार विश्वविद्यालय,नौणी

सोलन-1732230 हि.प्र.

1 प्रतिक्रियाएँ.:

  1. आत्माएँ तो ऐश ही करती हैं।
    चाहे धरती की हो या आसमान की।
    व्यंग्य प्रकाशित करने के लिए
    रवि भाई आपका धन्यवाद।

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

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