हे मेरे देशवासियों! हे मेरे देश में चोरी छिपे रहने वाले घुसपैठियों! हे मेरे दोस्तों! हे मरे आस्तीन के सांपों! हे देश को बेचने वाले थोक विक्रताओं! आप सभी को नव वर्ष के शुभागमन पर ढेरों शुभकामनाएं। भगवान करे आप सभी का यह साल खूब मौज मस्ती में गुजरे। जिन के घरों में दूध नहीं वे दूधो नहाएं, दूध भले ही सिंथेटिक हो, कोई गम नहीं। मेरी कामना है कि सभी के नलकों में साल भर पानी आए, चाहे सड़ा हुआ ही आए। मेरी कामना है कि बिजली का कट न लगे, सभी के घरों में साल भर बेरोकटोक बिजली आती रहे, पर बिल न आए। अर्थ व्यवस्था से रुठी लक्ष्मी का अर्थव्यवस्था से समझौता हो जाए। अर्थव्यवस्था पर लक्ष्मी की अपार कृपा बने। वित्त मंत्री के घर लक्ष्मी का वास हो। देश मंदी की मार से और न पिटे। शेयर मार्किट ने जिन बंधुओं की सांसें उखाड़ कर रख दी हैं उनकी सांसें फिर लौट आएं। सभी को भर पेट रोटी मिले। आटा परात की पकड़ में आए। सब्जी कड़ाही की पकड़ में आए। जो पतीले पिछले कई बरसों से चूल्हे पर चढ़ने के लिए बेताब हैं उन्हें इस साल चूल्हे पर चढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हो। सबकी महीनों से चारपाई के नीचे फेंकी थालियां चावल से लबालब भर जाएं। पढ़े लिखों को इस वर्ष डटकर इंटरव्यू आएं। वे इंटरव्यू देते देते थक जाएं, उनका इंटरव्यू देने से मन भर जाए। और इंटरव्युओं से तंग आकर वे अपना काम धंधा शुरू करें। भगवान करे उनको अपने काम में खूब सफलता मिले। नौकरी पेशा लोगों को डीए की किश्तों पर किश्तें मिलें। वे सारा दिन दफ्तर में ताश खेलते रहें या अपना कोट कुर्सी की पीठ पर टांगे चार चार दिन तक दफ्तर से गायब रहें। भगवान करे इस पर भी कोई उन्हें न पूछे। महिला कर्मचारी गर्मियों में भी दफ्तर के सारे कामों को ठेंगा बता सारा दिन हीटर के आगे बैठ इतमीनान से स्वैटर बुनती रहें। सभी सारा दिन पेट पर हाथ फेरते हुए गाते रहें। देश में काम करने की कोई जहमत न करे। सभी साल भर हाथों पर हाथ धरे बैठे रहें। नेता आश्वासन की पत्तलों पर जनता को खूब वादे परोसते रहें और जनता दोनों हाथों से दनादन खाती रहे,
बतियाती रहे ,गुर्राती रहे,मुस्कुराती रहे। फिल्मों की नायिकाओं को छोड़ सभी को पूरा तन ढकने के लिए कपड़े मिलें।
मेरी कामना है कि चोर को चोरी करने के, ईमानदार को पूरी ईमानदारी से जीने के, नेता को डटकर खाने के,रिश्वतखोर को रिश्वत लेने के, रिश्वत देने वालों को रिश्वत देने के इस साल भरपूर अवसर मिलें। हे भगवान! इस साल न कोई रिश्वत लेता पकड़ जाए न कोई रिश्वत देने से शरमाए। यदि पकड़ा जाए तो उसे अपमानित न किया जाए। यदि उसे गलती से हम अपमानित कर ही दें तो वह इस अपमान को अन्यथा ले। क्या हुआ जो वह रिश्वतखोर है। है तो वह इसी समाज का अमूल्य अंग ही न! है तो उसमें भी वही आत्मा जो एक साध में है।
संसद में मार पीट को जब भगवान ही नहीं रोक सकते तो उस मारपीट को रोकने की भगवान से कामना करने वाला मैं कौन होता हूं?सांसद का संसद में जाने पर कोई कर्तव्य बनता हो या न, मारपीट और गालीगलौच उसकी नैतिक जिम्मेदारी बनती है। अतः संसद में मारपीट,गालीगलौच तो हो पर इतनी हो कि किसी को कोई चोट न लगे, अबके भी गालियों को कोई भी सांसद मन से न लगाए। गलती से कहीं चोट लग ही जाए तो कोई भी परमादरणीय सांसद अस्पताल जाने लायक न हो, ताकि जनता के थोड़े बहुत इलाज में कोई व्यवधान न हो। संसद में जब मुद्दों पर बहस के बदले गप्पों पर बहस चल रही हो तो बिजली गुल हो जाए ताकि संसद की गरिमा जनता की नजरों में बनी रहे।
देश में जैसे तैसे इस वर्ष भी एकता बनी रहे। आपस में डटकर भिड़ने के बाद भी हममें भाईचारा बना रहे। इस साल भी हम अपनी नाकामियों को घड़ा पड़ोसी के सिर फोड़ते रहें। अपनी हर नाकामी के पीछे पड़ोसी का हाथ बताते रहें, और अपने हाथों में मेंहंदी लगाए बैठे रहें।
भगवान से यही कामना है कि इस वर्ष हमारे हाथों में लगी मेंहंदी सूख जाए।
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अशोक गौतम
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जोर दार व्यंग्य है।बधाई।
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