रविवार, 5 जुलाई 2009

कुछ कविताएँ कुछ ग़ज़लें

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ग़ज़ल

- फारूक आफरीदी

दिलो जान से चाहने वाले ही

कत्‍ल करने की बात करते हैं।

 

परिंदों की मानिंद उड़ने वाले

जमीं तलाशने की बात करते हैं।

 

नीलाम होती इज्‍जत पर रहते थे मौन

वे ही अपनी आन की बात करते हैं।

 

घुप अंधेरा चीन्‍हा करते थे जो

मिली रोशनी तो घात करते हैं।

 

लूटते रहे ताजिन्‍दगी सबको

वे ही चौकसी की बात करते हैं।

 

चलो, किसी पहाड़ पर चल चलें

खुशबू बिखेरने की बात करते हैं।

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(फारूक आफरीदी)

ई-916, न्‍याय पथ, गांधी नगर,

जयपुर-302015

ई-मेलः farooq.afridy@gmail.com

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तिरूपति बालाजी

करोड़ों श्रद्वालुओं का गंतव्य

करोड़ों जनों की आस्था का प्रतीक

देश - दुनिया के भक्तों का संगम स्थल

हो तुम तिरूपति बालाजी ।

 

दूर - पास से आए बेताव जन

एक झलक तुम्हारा पाने को

उन के जीने का आधार

हो तुम लक्ष्मीपति बालाजी ।

 

उमंगित मन से तुम्हारे द्वारे आते

होठों पर तुम्हारा नाम लिए

बाल, युवा, वृद्व जनों के धाम

हो तुम नारायण बालाजी ।

 

आत्मिक शांति हेतु मानव मन को

चाहिए केवल तुम्हारा नाम, ध्यान

सब के हृदय स्थल

हो तुम तिरूमला तिरूपति बालाजी ।

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- शेर सिह

अनिकेत भवन, प्लॉट २२

गिट्टीखदान लेआउट, प्रतापनगर

नागपुर- 440 022.

E-Mail: shersingh52@gmail.com

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मेरा खुदा मेरा ईश्वर

शिवा अग्रवाल

खुदा ने दिल की आवाज में इतना असर कर दिया

शिद्‌दत से चाहा जो पल में मयस्‍सर कर दिया

कल रात हमने खुदा से एक दुआ मांगी

दुआ में मुल्‍क की तरक्‍की मांगी

मेरी इबादत पर खुदा मेहरबान था

पर मेरी अरदास पर वो परेशान था

मैने कहा खुदा तुम परेशान क्‍यों हो?

 

गर हुई मुझसे खता तो ज्ञान दो

मेरी गुजारिश पर खुदा मुस्‍कुराये

हाल मेरा देख सबकुछ पहचान पाए

बोल, किस मुल्‍क की बात कर रहा है

इस देश में तो आदमी आदमी से लड़ रहा है

मोहब्‍बत का यहां नामों निशान नहीं

किसी के दिल में किसी के लिए भी प्‍यार नहीं

औरत का यहां हर रोज तमाशा होता है

 

नेताओं द्वारा भारत माता का चीरहरण होता है

भगवा पहन ए.सी. की हवा खाते हैं

नेता यहां चारा तक पचा जाते हैं

धर्म का यहां कारोबार हो रहा है

नादान है तू, क्‍यों परेशान हो रहा है

शादी के बंधन को तेल से जलाते हैं

अपनी ही अपनों को मिट्‌टी में मिलाते हैं

संस्‍कृति के रक्षक होने का अजीब तमाशा करते हैं

पाश्‍चात्‍य की चाशनी में खुद को डुबोकर रखते हैं

 

प्रकृति का हर रोज उपहास यहां होता है

नदियों, पेड़ों का सर्वनाश रोज होता है

खुदा की सच्‍चाई से अब मैं हैरान था

क्‍या होगा हल इसके लिए परेशान था

खुदा बोले, क्‍या यूं ही भारत को विश्‍व गुरू बनाओगे

अब भगत सिंह, विवेकानंद, बोस, आजाद कहां से लाओगे

मेरी परेशानी बढ़ चुकी थी

समाधान न पाकर धड़कन थम सी गई थी

 

खुदा बोले, मेरा कहा एक काम कर दो

मस्‍जिद, मठ-मंदिरों से मुझे आजाद कर दो

धरा का दुःख मुझसे सहा नहीं जाता

लोगों का आडम्‍बर देखा नहीं जाता

अब तो प्रकृति प्रलय मचाएगी

इस सभ्‍यता को मिट्‌टी में मिलाएगी

अब वक्‍त गुजर चुका है

संभलने का वक्‍त निकल चुका है

इस बात ने मेरे भीतर घर कर लिया

आखिर हमने ईश्‍वर को भी तो बेबस कर दिया।

……

/ शिवा अग्रवाल;पत्रकार

नक्षत्रम निकट रामऔषधलय

मोहल्‍ला होली, कनखल हरिद्वार

4 blogger-facebook:

  1. आज तो आपने तीन बेहतरीन रचनाएँ एक साथ पेल दीं। अब किस पर क्या कहा जाए। आफरीदी की ग़ज़ल बहुत सुन्दर है और बात में भी दम है। शेर सिंह जी की बालाजी से की जाने वाली गुजारिश सही है। इधर उज्जैन और औंकारेश्वर में अभिषेक कराने वालों की इतनी भीड़ है कि भोलेनाथ परेशान हैं। हर कोई भक्त अब ज्योतिर्लिंग का ही अभिषेक करना चाहता है। इधर खुदा से बातचीत कर रहे शिवा अग्रवाल को खुदा पता नहीं कहाँ मिल गया? और वह मुस्कुराया भी। यानी मुस्कुराने के लिए उस के पास एक अदद मुख भी जरूर रहा होगा। खुदा के बंदे नाराज न होंगे कि खुदा के तो मुख हो ही नहीं सकता वह तो निराकार होगा? ऐसी चीजें संप्रेषणीयता को प्रभावित करती हैं। वे खुदा की जगह भगवान जी को भी कष्ट दे सकते थे।

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  2. aap ki kavitayen padhi bahut acchee lagee

    उत्तर देंहटाएं
  3. aap ki kavitayen padhi bahut dilchsp he

    उत्तर देंहटाएं

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