बुधवार, 8 जुलाई 2009

अशोक गौतम का व्यंग्य : रे! मानसून, कम सून

Image225 (WinCE)

हे मानसून! तुम्‍हें परदेस गए बड़े दिन हो गए। अब तो आ जाओ। सरकार ने तो कहा था कि तुम समय पर आ जाओगे। पर तुमने तो आते आते बहुत दिन लगा दिए। पहले तुम आते थे तो काली घटाओं को देख कर अपने दूसरी पिया के बिना प्रेमिका की आंखों में आंसू भर आते थे। पर अबके तुम नहीं आ रहे तो मेघों से रहित आसमान को देख कर विवाहित पतियों की प्रेमिकाओं की आंखों में आंसू भी नहीं आ रहे।

हे राहगीर लू के झोंके! तुम किस देश से आए हो? मैं तुम्‍हारे पांव पड़ता हूं, मेरा एक काम कर दो। तुम तो देश विदेश घूमते रहते हो। अतः एक चिट्‌ठी मेरी वहां ले जाओ जहां मानसून रूका हुआ है। न जाने किस वेश्‍या ने उसे अपनी जुल्‍फों में बांध रखा है। हे लू के झोंके! तुम मानसून से जाकर कहो कि तुम्‍हारे बिना नदियां तो नदियां, नलकों को पानी भी सूख गया है।

हे मानसून! तुम्‍हारे न आने के कारण शहर में पानी बेचने वालों के चांदी हो गई है।

हे सरकार! हमारी आंखें तो बस मानसून दर्शन की भूखी हैं। अगर अब बस एक बार मानसून के दर्शन हो जाएं तो कुछ बात बनें। सरकार आपने हमें बहुत बताया कि मानसून जी अब आ रहें हैं कि अब आ रहे हैं। मानसून के आने की बाट जोहते जोहते हमारी आंखें इतनी थक गईं कि इतनी तो फिजा की आंखें भी चांद का इंतजार करत करते नहीं थकीं । हे सरकार! मानसून को लेकर आपके नारे हमारी बेचैनी और भी बढ़ा रहे हैं। हमें अपना मुंह दिखाओ या न दिखाओ पर मानसून का मुंह एक बार जरूर दिखाओ सरकार ! कि जब वह आते ही बारिश से आकाश पाताल एक कर देता था। सड़कें, नालियां तोड़ देता था। हे सरकार! रेत में नाव चलाना बंद करो।

आप काहे के सरकार हो सरकार! एक मानसून तो जनता को दे नहीं पाए। आपको क्‍या सरकार! मानसून आए या न आए। आपका तो मानसून सत्र हो ही लेगा।

हे सरकार! हमें तो बस मानसून की कथा सुनाओ और अपनी इन उपलब्‍धियों की कथा को दिल्‍ली ले जाओ। हम तो बस कृषि प्रधान देश के होने के कारण मानसून अनुरागी है। हमें मानसून की बातों के अतिरिक्‍त और किन्‍हीं बातों में कोई रस नहीं आता। हां, हो सकता है संसद में आपकी इन बातों को सुनने वाले मिल जाएं। यदि देशवासियों के लिए आपके मन में जरा भी सहानुभूति का भाव है तो बस इतना भर कर दीजिए कि हमें एक बार, बस एक बार मानसून के दर्शन करवा दीजिए। सरकार! कोई कुछ भी कहे, पर हम किसानों को मानसून के अलावा और कुछ भी अच्‍छा नहीं लगता। किसान तभी खुश हो सकता है जब मानसून उसे मिल जाए। वह रोटी के बिना जी सकता है, वह लंगोटी के बिना जी सकता है, पर मानसून के बिना नहीं।

सरकार! इस बदन को जलाने वाली गर्मी में हम आपके द्वारा वर्णित मानसून की कल्‍पना कैसे करें ? सरकार आप जब मानसून मानसून की रट लगाते हो तो हम मानसून लिखे अखबार को अपनी छाती से लगा लेते हैं। ऐसे में यह अखबार में लिखा मानसून ही हमें कुछ सुख दे देता है। तब अखबार को सीने से लगाते ही हमारे मन में मानसून के असंख्‍य चित्र उभरने लगते हैं। हम तुमसे बीते मानसून की क्‍या क्‍या बातें कहें सरकार! पिछले मानसून में आपके बंदों ने मानसून के नाम पर डट कर बटोरा। पर छोड़ो सरकार! बीते मानसून की क्‍या क्‍या बातें आपसे कहें सरकार, और खासकर जब पीडब्‍लूडी विभाग वाले गिरी सड़क के डंगों में सीमेंट की जगह रेता ही लगा रहे होते थे। तब मानसून ने भी रूलाया था और आपके बंदों ने भी।

हे मानसून! हम तुम्‍हारा इंतजार करते करते थक गए हैं। कहीं तुम भी वैश्‍विक मंदी का शिकार तो नहीं हो गए? तुम्‍हारे न आने पर ठेकेदार सिर में हाथ दे कर रो रहा है। हमने तुम्‍हारे आने के लिए मेंढक का विवाह भी करवाया कि तुम उस विवाह में बतौर बाराती शरीक होओगे, पर तुम नहीं आए। हमने तुम्‍हारे आने के लिए नाना भांति के यत्‍न किए और अब हम ऐसे यत्‍न करते करते थक गए हैं, पसीना पसीना हो गए हैं, घर में नहाने को आधी बाल्‍टी तक पानी नहीं, पर हे मानसून! तुम पता नहीं कहां रमे रह गए हो। पड़ोसी कहता है कि मेरे घर कुछ भी मांगने आओगे तो सबकुछ दूंगा पर अगर पानी मांगने आओगे तो मुझसे बुरा कोई न होगा।

पर हम भी हठी हैं मानसून! मानसून के दिनों में हम मानसून के सिवाय और कुछ भी देखना नहीं चाहते। देखो न! होरी की जिह्‌वा पर दिन रात मानसून मानसून की रट लगी हुई है। वह आजकल भगवान का नाम लेना भी भूल गई है। वह भगवान का नाम लेकर नहीं,तेरा ही नाम लेकर मरना चाहती है।

हे सरकार ! मानसून के बहाने आप हमसे जो कहना चाहो कह लो पर हम इन दिनों मानसून के गर्जन के अतिरिक्‍त और कुछ भी सुनना नहीं चाहते। चाहे डीडी पर ही मानसून की गर्जना सुना दो।

हे सरकार ! आप के बार बार ये कहने से कि मानसून आ रहा है, मानसून आ रहा है हम बहुत दुखी हो रहे हैं। आम आदमी के पास जी भर नहाने के लिए मानसून के ही तो दिन होते हैं। हे सरकार ! हम आपसे और कुछ नहीं चाहिए, बस! एक बार मानसून का मुंह दिखा दो, हम मरने के बाद भी वोट आपको ही पाते रहेंगे।

हे मानसून! तुम्‍हारे न आने से हर जगह मच्‍छर ही मच्‍छर हो गए हैं। गर्मी ने तोड़ कर रख दिया है। घंटों घटों बिजली गुल रहती है। मोर नाचने के लिए अपने पंखों को नायिका के बालों की तरह संवारे बैठा है। इस गर्मी में पानी भी प्‍यास से आहत हो पानी ढूंढ रहा है। जंगलों में आग ही आग लगी हुई है। हवा भी हवा के एक झोंके के लिए तड़प रही है। सभी पशु पक्षी परेशान दिख रहे हैं। नलकों के पास खून खराबा हो रहा है। कुटज, कदंब,कचनार, कर्णिकार,कमल, केतकी,कनेर आदि के सब सूख गए हैं। घने घने पेड़ों की कलियां जल रही हैं। इन सबका ऐसा हाल होते देख तुझसे मिलने की बहुत इच्‍छा हो रही है। इसलिए हे मानसून! तू आ जा। भले ही यह कहने आ कि मैं अबके नहीं आऊंगा।

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अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्‍पर सेरी रोड, नजदीक वाटर टैंक,

सोलन, 173212 हि.प्र.

मो. 9418070089

a_gautamindia@rediffmail.com

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