रविवार, 19 जुलाई 2009

दो कविताएँ

ज़िन्‍दगी और मौत

आफरीन खान

ज़िन्‍दगी और मौत में फक़त

एक पल का फासला होता है

हर सांस आखिरी हो सकती है

इन्‍सां कुछ भी नहीं कर सकता है

हर बात का वक़्‍त मुकर्रर होता है

हर काम अपने वक़्‍त पर होता है

इंसान क्‍या कुछ नहीं सोचता है

न जाने कितने ख्‍़वाब सजाता है

नादां नहीं जानता कि होता वही है

जो उसकी तक़दीर में लिखा होता है

मौत ऐसा एक तूफान है जो संग

अपने सब कुछ बहा ले जाता है

ज़िन्‍दगी कफ़न में मुँह छुपाती है

हरसू एक सन्‍नाटा पसर जाता है

 

आफरीन खान

राजनीति विज्ञान विभाग

बनारस हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय

वाराणसी-221005

Email- khan_vns@yahoo.com

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जिज्ञासा

विवेक उपाध्‍याय

जाने क्‍यों रो बैठी दुल्‍हिन!

क्‍यों तोड़ दीं उसने चूड़ियाँ!

मांग पोंछ क्‍यों डाली!

अरे होंठ पर कल ही चढ़ी थी

कहाँ गयी वह लाली!

फूट फूट क्‍यों रोती है

क्‍या हुई किसी से अनबन!

जाने क्‍यों...

अरे अरे दिन चढ़े सो रहा

यह किसका बेटा है!

सब रोते हैं

चीख रहे हैं

फिर भी यह लेटा है।

हुँह

यह कब कर सकता झंडा-वंदन।

जाने क्‍यों...

देखो

इसकी छाती से तो

खून बहा आता है

लेकिन इसको हुआ क्‍या

कुछ समझ नहीं आता है

चलो देखते हैं ।

जग आया अपनापन

जाने क्‍यों...

सुना

आज गुड़िया का पापा आतंकी ने मारा

कान कान से कहते हैं

सुन चुका मुहल्‍ला सारा।

क्‍यों मारा गुड़िया का पापा

समझ न पाया नन्‍हा सा मन।

जाने क्‍यों...

- विवेक उपाध्‍याय

                          vivekjoura@yahoo.in

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