शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

अजन्ता शर्मा की कविता : मल्हार

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मल्हार


अचानक
किसी बसंती सुबह
तुम गरज बरस
मुझे खींच लेते हो
अंगना में .
मैं तुममें
नहा लेने को आतुर
बाहें पसारे
ढलक जाती हूँ .
मेरा रोम रोम
तुम चूमते हो असंख्य बार .
अपने आलिंगन में
भिगो देते हो
मेरा पोर पोर.
मेरी अलसाई पलकों पर
शीत बन पसर जाते हो.
माटी के बुलबुलों में छुपकर
मेरी पायल का
उन्माद थामते हो.
मेरा हाथ पकड़
जिस डार तले
तुम खींचते हो,
उसकी कनखियों से
मैं लजा जाती हूँ.
नाखूनों से खुरचती हूँ
जमीन.
और हाथ पसार
कुछ मुक्ता जुटाती हूँ.
शिख नख
तुम हृदय बन झरते हो.
मुझे हरते हो .
बारिश संग
जब
तुम बरसते हो.
-अजन्ता

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कलाकृति – अजंता शर्मा

5 blogger-facebook:

  1. अद्भुत रचना...शब्द शब्द भिगोती हुई...वाह...आभार इसे पढ़वाने का रवि जी...
    नीरज

    उत्तर देंहटाएं
  2. शायद कहीं पढ चुकी हूं .. अच्‍छी रचना !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. खूबसूरत कविता के लिए,
    अजन्ता शर्मा को बहुत बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर रचना, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. aap ki kavita padhi mausam ke anuroop hai.baarish nahi ho rahi to kya kavita me he bheeg lete hai

    उत्तर देंहटाएं

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