शनिवार, 25 जुलाई 2009

अवनीश एस तिवारी का आलेख : मैथिली शरण गुप्त की भारत भारती

Bharat_Bharati

"भारत - भारती ", मैथिलीशरण  गुप्तजी द्वारा स्वदेश प्रेम को दर्शाते हुए वर्तमान और भावी दुर्दशा से उबरने के लिए समाधान खोजने  का एक सफल प्रयोग है | भारतवर्ष के  संक्षिप्त  दर्शन की काव्यात्मक प्रस्तुति "भारत - भारती " निश्चित  रूप से किसी शोध कार्य से  कम नहीं है |  गुप्तजी की सृजनता की दक्षता का परिचय देनेवाली  यह पुस्तक कई सामाजिक आयामों पर विचार करने को विवश करती  है|  यह सामग्री तीन भागों में बाँटीं गयी है |


अतीत - खंड   -


यह भाग भारतवर्ष के इतिहास पर गर्व करने को पूर्णत: विवश करता है |  उस समय के दर्शन, धर्म - काल , प्राकृतिक संपदा, कला-कौशल , ज्ञान - विज्ञान, सामाजिक - व्यवस्था जैसे तत्त्वों को संक्षिप्त रूप से स्मरण करवाया गया है |  अतिशयोक्ति से दूर इसकी सामग्री संलग्न दी गयी टीका - टिप्पणियों के प्रमाण के कारण सरलता से ग्राह्य हो जाती हैं |  मेगास्थनीज से लेकर आर. सी. दत्त. तक के कथनों को प्रासंगिक ढंग से पाठकों के समक्ष रखना एक कुशल नियोजन का सूचक है |  निरपेक्षता का ध्यान रखते हुए निन्दा और प्रशंसा के प्रदर्शन हुए है , जैसे मुग़ल काल के कुछ क्रूर शासकों की निंदा हुयी है तो अकबर जैसे मुग़ल शासक का बखान भी हुया है | अंग्रेजों की उनके आविष्कार और आधुनिकीकरण के प्रचार के कारण प्रशंसा भी हुयी है |


भारतवर्ष  के दर्शन  पर वे कहते हैं -
पाये प्रथम जिनसे जगत ने दार्शनिक संवाद हैं -
गौतम , कपिल , जैमिनी , पतंजली, व्यास और कणाद है |
नीति पर उनके द्विपद ऐसे हैं  -
सामान्य नीति समेत ऐसे राजनीतिक ग्रन्थ हैं -
संसार के हित जो प्रथम पुण्याचरण के पंथ हैं |
सूत्रग्रंथ के सन्दर्भ  में ऋषियों के विद्वता पर वे  लिखते हैं -
उन ऋषि - गणों ने सूक्ष्मता से काम कितना है लिया ,
आश्चर्य है, घट में उन्होंने सिन्धु को है भर दिया |

 

वर्तमान खंड -


दारिद्रय, नैतिक पतन, अव्यवस्था और आपसी भेदभाव से जूझते उस समय के  देश की दुर्दशा को दर्शाते हुए, सामाजिक नूतनता की मांग रखी  गयी है |
अपनी हुयी आत्म - विस्मृति पर वे कहते हैं -
हम आज क्या से क्या हुए, भूले हुए हैं हम इसे ,
है ध्यान अपने मान का, हममें बताओ अब किसे !
पूर्वज हमारे कौन थे , हमको नहीं यह  ज्ञान भी ,
है भार उनके नाम पर दो अंजली जल - दान भी | 

नैतिक और धार्मिक पतन  के लिए गुप्तजी ने उपदेशकों , संत - महंतों और ब्राहमणों की निष्क्रियता और मिथ्या - व्यवहार को दोषी मान शब्द बाण चलाये हैं|  इसतरह कविवर की लेखनी सामाजिक दुर्दशा के मुख्य कारणों को खोज उनके सुधार की मांग करती है |  हमारे सामाजिक उत्तरदायित्त्व की निष्क्रियता को उजागर करते हुए भी " वर्तमान खंड " आशा की गाँठ को बांधे रखती है |

भविष्यत् खंड -


अपने ज्ञान, विवेक और विचारों की सीमा को छूते हुए राष्ट्कवि ने समस्या समाधान के हल खोजने और लोगों से उसके के लिए आव्हान करने का भरसक प्रयास किया है | आर्य वंशज हिन्दुओं  को देश पुनर्स्थापना के लिए प्रेरित करते हुए वे कहते हैं -

हम हिन्दुओं के सामने आदर्श जैसे प्राप्त हैं -
संसार में किस जाती को, किस ठौर वैसे प्राप्त हैं ,
भव - सिन्धु में निज पूर्वजों के रीति से ही हम तरें ,
यदि हो सकें वैसे न हम तो अनुकरण तो भी करें |

पुस्तक की अंत की दो रचनाएं "शुभकामाना" और "विनय"  कविवर की देशभक्ति की परिचायक है|  तन  में देश सद्भावना की ऊर्जा का संचार करनेवाली यह दो रचनाएं किसी प्रार्थना से कम नहीं लगती |  वह  अमर लेखनी ईश्वर से प्रार्थना करती है  -

इस   देश को हे दीनबन्धो ! आप फिर अपनाइए ,
भगवान् ! भारतवर्ष को फिर पुण्य - भूमि बनाइये ,
जड़ -  तुल्य जीवन आज इसका विघ्न - बाधा  पूर्ण है ,
हेरम्ब ! अब अवलंब देकर विघ्नहर  कहलाइए |  

मैथिलीशरण  गुप्तजी की रचना " भारत - भारती " को मैं अपने इन शब्दों से प्रणाम करता हूँ  - 

निज संस्कृति का विस्मरण हो कभी ,
हो रहा स्वदेश - गर्व लुप्त भी ,
कोई प्रेरणा न मन में हो जागती ,
पढ़ लेना लेकर,  " भारत - भारती " |
देश व्यवस्था हो रही जब लुंज सी,
बिखरे जब स्व-ज्ञान का पुंज भी ,
कराने आत्म - ज्ञान की तब जागृती ,
मनन  कर लेना, ले  " भारत - भारती " |
नव - वंश, नव - युग को देशाभिमान हो ,
समाज ,संस्कृति , देश का ज्ञान हो ,
सदा से  धरा यह पुकारती ,
चिंतन हो पढ़ - सुन,  " भारत - भारती " |         

--- 
अवनीश एस. तिवारी
मुम्बई    

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