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सुधा भार्गव की लघुकथाएँ

१. एक घर

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लतिका प्रतिभा के बल पर समन्दर की लहरों की भांति गतिमान होकर अपने पंथ का खुद निर्माण करना चाहती थी। अपनी शादी के घर में चर्चे सुनकर घायल शेरनी की तरह घुर्रा उठी -यदि मेरे विवाह के  लिए जोर जबर्दस्ती की तो मैं आत्महत्या कर लूंगी। डैडी रमेश के पास चुपचाप बैठने के अलावा कोई चारा न था। यह उसकी कोरी धमकी नहीं थी। उसने एक तरह से उन लोगों को ललकारा था जो विवाह को पवित्र संस्कार मानते हैं।

लतिका कंप्यूटर इंजीनियर बनकर आत्मसम्मान के साथ अपने पैरों पर खड़े होने का सपना देखने लगी। उसने माँ के सम्मान की अनेक बार धज्जियाँ बिखरते देखीं थीं। बाप की कमाई पर पलने वाली माँ की हैसियत घर में नौकरानी से ज्यादा नहीं थी! लतिका नहीं चाहती थी कि विवाह की आड़ में यह अत्याचार पीढ़ी दर पीढ़ी चले।

एक दिन साहस जुटाते उसके डैडी बोले --बेटा 'अब तेरा क्या इरादा है ?विवाह तो सम्पूर्णता ,सृष्टि और नवजीवन का प्रतीक है। तू इससे कतराती क्यों है ?

'ओह डैडी। ऐसी जल्दी भी क्या है। मैंने इतनी मेहनत की है। दो एक साल कैरियर तो बना लेने दीजिये। '

एक बाप चट्टान सी दृढ़ इरादों वाली बेटी को हिला न सका। भगवान् भरोसे सब कुछ छोड़कर उसको प्यारा हो गया। बेटी के रवैये से असंतुष्ट माँ भी उस दिन झुंझला उठी -लगता है तू जन्म भर क्वांरी ही रहेगी। कौन तुझे व्याह कर ले जायेगा। '

न ले जाय ना सही, मैं ब्याह कर ले आउंगी। देख माँ, मैंने अखबार में अपनी शादी का विज्ञापन भी निकलवा दिया है। '

माँ ने लपककर लतिका के हाथ से अख़बार चीन लिया। लिखा था --३० वर्षीय युवती के लिए गृह कार्य में दक्ष २५ वर्ष के एक ऐसे नवयुवक की तलाश है जो घर जमाई बनाने को तैयार हो। मुंशी या कैमिस्ट चलेगा। चार अंकों का वेतन स्वीकार है। विवाह के इच्छुक तुंरत संपर्क करें। !'

'यह क्या अनाप शनाप लिखा है। '

'माँ मुझे शादी नहीं करनी ,तुम्हारे कहने पर कर रही हूँ। लेकिन मुझको अपनी सहूलियत तो देखनी ही पड़ेगी। मैं तो सारे दिन बाहर रहूँगी, मेरे पीछे से तुम्हारी कौन देखभाल करेगा .घर कौन संभालेगा। तुमने अपना हाड मांस गलाकर इस घर को बनाया लेकिन डैडी को कितनी बार कहते सुना है --तुम्हें काम न धाम ,ज्यादा बकबक की तो निकाल दूंगा इस घर से। बताओ माँ, तुम्हारा घर कहाँ है ?'' अरे, मियां बीबी में तो खटपट होती ही रहती है। आखिर तू चाहती क्या है ?'

'एक  घर जो मेरे श्रम की ईटों पर टिका हो न कि विवाह की बलि बेदी पर।   '

२ क्या चाहिए ?

छज्जू ने सुबह होते ही घर का द्वार खोला। सीढ़ियों पर बूढ़ी कम्मो को देख चौंक पड़ा। '

'मौसी ,यहाँ ठण्ड में कब से बैठी हो ?'

'आधी रात से। '

'क्यों ?क्या फिर से बहू से झगड़ा हो गया। तुम्हारा बेटा कैसा है जो अपनी बहू को कुछ नहीं समझाता नहीं।

'उसे दोष न दे। वह तो कहने सुनने लायक नहीं। भगवान् ने उसकी दोनों आँखें छीन ली हैं।

'लेकिन पैसे की तो कोई कमी नहीं। उसका इलाज तो हो सकता है। तुमने अपनी सारी सम्पदा जीते जी बेटे के नाम कर दी। अब बहू को क्या चाहिए ?'

'मेरी एक आँख। '

                                                     -------------------

परिचय --सुधा भार्गव

जन्मस्थल --अनुपशहर ,जिला --बुलंदशहर--भारत

शिक्षा --बी ,ए.बी टी ,रेकी हीलर

शिक्षण --बिरला हाई स्कूल कलकत्ता में २२ वर्षों तक हिन्दी भाषा का शैक्षिक कार्य |अ

साहित्य सृजन ---

विभिन्न विधाओं पर रचना संसार

साहित्य संबन्धी संकलनों में तथा पत्रिकाओं में रचना प्रकाशन

प्रकाशित पुस्तकें

रोशनी की तलाश में --काव्य संग्रह

बालकथा पुस्तकें---

१ अंगूठा चूस

२ अहंकारी राजा

३ जितनी चादर उतने पैर ---सम्मानित

आकाश वाणी दिल्ली से कहानी कविताओ. का प्रसारण

सम्मानित कृति--रोशनी की तलाश में

सम्मान --डा .कमला रत्नम सम्मान

पुरस्कार --राष्ट्र निर्माता पुरस्कार (प. बंगाल -१९९६)

अभिरुचि --देश विदेश भ्रमण ,पेंटिंग .योगा

वर्तमान लेखन का स्वरूप

संस्मरण --कनाडा के १५१ दिन ..,बाल साहित्य

---------

संपर्क --जे =७०३ स्प्रिंग फील्डस

#१७/२० अम्बालिपुरा विलेज

बेलंदुरगेट

सरजापुरा रोड

बैंगलोर -५६०१०२

कर्नाटक (भारत

टिप्पणियाँ

  1. sudaji
    marmsparshi laghukathayen likh leti hai.bahut bahut badhai.
    ravindrakhare akela
    united bank.278,zone2,m.p.nagar,bhopal09893683285

    उत्तर देंहटाएं

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