रविवार, 12 जुलाई 2009

फारूक आफरीदी का व्यंग्य : तारे जमीं पर

farooq afradi

'तारे जमीं पर'-जी, मैं बेशक इस फिल्‍म की बात नहीं कर रहा लेकिन फ़िल्मवालों की बात जरूर कर रहा हूं। जन भावनाएं भुनाने में राजनैतिक दलों को जितनी महारत हासिल है उतनी और किसी वर्ग को नहीं है। दरअसल जन भावनाओं से खिलवाड़ करना इनका शगल और शौक है। इस तरह वे अपना शौक पूरा करने के साथ शोक की स्‍थिति से उभर जाते हैं। जाहिर है जहां मनोरंजन करने वाले लोग होते हैं वहां शोक मनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। राजनैतिक दलों ने ही यह कमाल दिखाया है कि जहां सच्‍चे जनप्रतिनिधियों को विराजमान होना चाहिए वहां गाने-बजाने-नाचने वालों को भर्ती कर दिया जाता है।

जनता की सबसे बड़ी पंचायत को मजाक बनाने का श्रेय अगर किसी को जाता है तो इन दलगत राजनीतिज्ञों को ही है। इन दलों द्वारा सितारों की फिल्‍मी लोकप्रियता तो अब तक आवश्‍यक भुना ली गई लेकिन यह बात भुला दी गई कि लाखों लोगों का प्रतिनिधित्‍व करने वाले फिल्‍मी सांसदों का आम-अवाम से कोई सरोकार नहीं होता। संसद फिल्‍मी अखाड़ा तो नहीं बन सकती लेकिन उन लोगों में आम-अवाम के अरमानों का कबाड़ा जरूर कर दिया।

जनता भी बड़ी कांइया किस्‍म की चीज है। सिर पर बिठाती है तो आसमान पर ले जाती है और गिराती है तो पाताल में पहुंचा देती है। अब देखिए ना कि बेचारे 'वीरु' भाई अपने मतदाताओं की सार-संभाल लेने नहीं आये तो उनकी गुमशुदगी की ही रिपोर्ट दर्ज करा दी गई। अरे भई वे नहीं आये तो नहीं आये। उनकी फिल्‍में देखो, उनके डॉयलॉग सुनो। फिर भी मन न भरे तो बसन्‍ती का डांस देखो। जनता तो जनता लेकिन परिसीमन ने भी कई फिल्‍मी हस्‍तियों का सत्‍यानाश कर दिया।

हमें तो भइया बहुत दुःख हो रहा है कि जिन बेचारों की बालीवुड में मार्केट वेल्‍यू खत्‍म हो गई थी उनका संसद में पुनर्वास तो हो रहा था। वीरू, हरक्‍यूलस दादा दारा, बसन्‍ती, बिहारी बाबू, विनोद खन्‍ना, गोविन्‍दा सब धमाधम कर रहे थे और दूसरे अदाकार भी लहरें गिनते हुए क्‍यू में खड़े अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। बेचारों के सपने ही बिखर कर रह गये जब जनता ने पलक पांवड़े बिछाने की बजाय घास ही नहीं डाला। महानायक चिरंजीवी तो बड़ी पंचायत में कदम ही नहीं रख पाये। सुसरी जनता भी ऊंटनी साबित हुई कि पता ही नहीं चला कि वह किस करवट बैठ गई।

भाई हमारा तो यह मानना है कि संसद में बालीवुड, टॉलीवुड, जॉलीवुड, कॉलीवुड या और भी जो वुड-वुड हैं उनका एक कोटा फिक्‍स कर दिया जाना चाहिए। आजकल तो फिक्‍सिंग का जमाना है फिर सितारे ही बेचारे क्‍यों कुंआरे डोले। फिक्‍सिंग करने वाले सितारे भी बड़ी पंचायत में पहुंच सकते तो धकियाए गए सितारे जमीं पर अच्‍छे लगते हैं क्‍या! सितारे संसद से बाहर हो जाएं- यह तो उनके साथ सरासर नाइंसाफी है। देश की जनता को भी इस बारे में थोड़ा बहुत विचार करना चाहिए। यहां ज्ञानवर्द्धन के लिये बता दें कि ब्रिटेन और अमेरिका में कई फिल्‍मी सितारे राष्‍ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे ऊंचे पदों पर पहुंचे है और बड़ा नाम कमाया है। मौका मिले तो हमारे सितारे भी आसमान के तारे तोड़ सकते हैं। अभी तक नहीं तोड़ पाये तो इसके लिए वे नहीं उनकी पार्टियां कसूरवार हैं। इसके लिए बेचारों को दोष देना कहां तक उचित होगा।

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(फारूक आफरीदी)

ई-916, न्‍याय पथ,

गांधी नगर, जयपुर-302015

ईमेल - farooq.afridy@gmail.com

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