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श्याम गुप्त का एक गीत : कितने इन्द्रधनुष

कारण, कार्य व प्रभाव गीत : गीत की एक नवीन धारा

यह गीत की एक नवीन धारा है, इसमें प्रत्येक काव्य-खन्ड में- विषय विशेष की क्रिया,उसके कारण,व होने वाले प्रभाव का समुचित वर्णन किया जाता है, इसे मैने कारण,कार्य व प्रभाव गीत का नाम दिया है,एक गीत देखिये। शीर्षक है--"कितने इन्द्रधनुष"

पत्थर पर सिर पटक-पटक कर,
धुन्ध धुन्ध जल होजाता है  ।

      जब रवि रश्मि विविध रंगों के,
     ताने-बाने बुन देतीं हैं ।
     किसी जलपरी के आंचल सा,
     इन्द्रधनुष शोभा बिखराता॥ १।
        


पंख लगा उड़ता शीतल जल,
आसमान पर छा जाता है।

     स्वर्ण परी सी रवि की किरणें,
     देह-दीप्ति जब बिखरातीं हैं;
     सप्त वर्ण घूंघट से छन कर,
     इन्द्रधनुष नभ पर छाजाता॥२।


दीपशिखा सम्मुख प्रेयसी का,
कर्णफ़ूल शोभा पाता है।

     दीप रश्मियां झिलमिल-झिलमिल,
     कर्णफ़ूल  संग नर्तन करतीं।
     विविध रंग के रत्नहार सा,
     इन्द्रधनुष आनन महकाता॥३।


कानों में आकर के प्रियतम,
वह सुमधुर स्वर कह जाता है।

     प्रेम-प्रीति ओ विरह अनल सी,
     तन-मन में दीपित हो जाती।
     नयनों मे सुन्दर सपनों का,
     इन्द्रधनुष आकर बस जाता॥४।


मादक नयनों का आकर्षण,
तन-मन बेवश कर जाता है।

     कितने रूप-रंग के पंछी,
     मन बगिया में कुन्जन करते।
     हर्षित हृदय-पटल पर अनुपम-
     मादक इन्द्र- धनुष सज जाता॥५।


भक्ति-प्रीति का नाद अनाहत,
ह्रद-तन्त्री में रच जाता है।

     सकल ज्योति की ज्योतिदीप्ति, वह,
     परमतत्व मन- ज्योति जलाता ।
     आत्म-तत्व में परम-सुरभि का,
     इन्द्र धनुष झंकृत हो जाता ॥६।

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                   --------डा. श्याम गुप्त ,के-३४८,आशियाना, लख्ननऊ

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