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फारूक आफरीदी का व्यंग्य : भारी लिफाफा-हल्का लिफाफा

farooq afradi

आज लिफाफे का युग है भले ही एस.एम.एस., एम.एम.एस. और इन्‍टरनेट या मोबाइल पर बड़ी-बड़ी ‘डील' फाइनल होती हों। स्‍मार्ट मनी का युग जोर पकड़ता जा रहा है लेकिन लिफाफा अभी भी अपनी स्‍थिति मजबूत बनाए हुए है।

बात लिफाफे की चली तो इसका संदर्भ बताता चलूं कि मेरे मोहल्‍ले में दो कवि बिल्‍कुल एक दूसरे के पड़ोस में रहते थे। रहते थे क्‍या, यूं समझो कि रहते ही हैं। समझने में क्‍या जाता है? हम भी इत्तफाक से इनके ही पड़ोसी हैं, कवि न हुए तो क्‍या काव्‍यरस में तो गहरी रूचि है ही। कभी-कभार दोनों के घर बारी-बारी चले जाया करते हैं।

एक कवि का नाम है ‘कुल्‍हड़' तो दूसरे कवि का नाम है ‘फूहड़'। यों दोनों ही एक दूसरे के पड़ोसी होने के नाते दुःख-सुख के भी साथी हैं। कहते भी हैं कि रिश्‍तेदारों से तो पड़ोसी ही भले होते है जो रात-बिरात दुःख-सुख में काम आते हैं। इस नाते दोनों ही अपना पड़ोसी धर्म भी खूब निभाते हैं लेकिन इनकी धर्मपत्‍नियों में पता क्‍यों घमासान मचा रहता है।

दरअसल दोनों की धर्मपत्‍नियों में लिफाफा ही झगड़े की जड़ है। जर, जोरू और जमीन तो झगड़े की जड़ होती ही है लेकिन लिफाफे को झगड़े की जड़ होना मैंने पहली बार सुना और देखा। मैं इस नये अनुभव से थोड़ा खिन्‍न हुआ तो धन्‍य भी हुआ।

बात यूं हुई कि कवि ‘कुल्‍हड़' की धर्मपत्‍नी राम प्‍यारी जी ने अपनी पड़ोसन और कवि ‘फूहड़' की धर्मपत्‍नी के सामने शेखी बघारते हुए अपने पतिदेव को सबसे अधिक लोकप्रिय कवि बताया। कवि ‘फूहड़' की धर्मपत्‍नी को यह बात हजम नहीं हुई और उलाहना देने लगी कि तुम्‍हारा पति तो कुल्‍हड़ में रहता है जबकि उसका पति पब्‍लिक का कवि है। रात-रात भर झूम झूमकर कविताएं गाता है। जब वह घर लौटता है तो नई साड़ियां, दुपट्टे और हरी-हरी चूड़ियों के साथ हरे नोटों का ‘भारी लिफाफा' लेकर आता है। इससे हमारा घर बीहड़ जंगल से बदल कर हरा-भरा हो जाता है।

कवि ‘कुल्‍हड़' की धर्मपत्‍नी राधादेवी भला यह सुनकर कहां चुप रह पाती? बोली, ‘मेरा पति भाण्‍ड नहीं प्रकाण्‍ड पंडित है। उसकी कविताओं में लालित्‍य है, पांडित्‍य है, पौरोहित्‍य है, साहित्‍य है। मेरा पति एकेडमिक है और अकादमी से सम्‍मानित है। अकादमी के सभी आयोजनों में सम्‍मान पाता है। उसका लिफाफा भले ही हल्‍का हो लेकिन समाज में उसका बड़ा वजन है इसके साथ ही वह कवि भी शानदार हैं।

कवि ‘फूहड़' की धर्मपत्‍नी ने मोर्चा सम्‍भालते हुए गोला दागा, मेरा पति हाई रेट वाला है तो ‘कुल्‍हड़' की धर्मपत्‍नी भी उचक कर बोली, मेरा पति रेसकोर्स का घोड़ा नहीं जिस पर कोई दांव लगाये, वह कोई प्रॉडक्‍ट नहीं जिसकी बाजार में कीमत लगाई जाये। वह अनमोल हीरा है हीरा।

दोनों की तू-तू मैं-मैं सुनकर मैं हलकान हुआ जा रहा था। मैं सोच नहीं पा रहा था कि इन्‍हें कैसे चुप कराऊं। संयोगवश इसी बीच दोनों कविगण एक दूसरे से हाथ मिलाते हुए वहां आ धमके। दोनों की धर्मपत्‍नियां यह मंजर देख कर भौंचक रह गई कि ये तो दोनों अपने-अपने हाल में मस्‍त है। फिर हम लड़-लड़कर क्‍यों पस्‍त हो रहीं हैं। मैंने देखा कि वे दोनों चुप-चाप अपने-अपने घरों में घुस गई और परवान पर चढ़ी लड़ाई एकदम फुस्‍स हो गई। मैं यह भी देख रहा था कि कविगण अपने-अपने लिहाफ और लिफाफे में खुश थे।

------.

(फारूक आफरीदी)

ई-916, न्‍याय पथ,

गांधी नगर, जयपुर-302015

ईमेल - farooq.afridy@gmail.com
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