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अशोक गौतम का व्‍यंग्‍य : दरबारी रागी, सरकारी रागी

मैंने चौकड़ी मार बैठे गुरूदेव के चरणों में रोज की तरह दो नकली खुशबू सने कागज के फूल धरे तो गुरूदेव की मूंछें तनी, उनका सीना अपने शिष्‍य की गुरू भक्‍ति को देख गद गद हो उठा। उन्‍होंने उनके चरणों में धरे कागजी फूलों को उठाया और एक्‍स महाराजा की तरह उन फूलों की खुशबू को सूंघते उवाचे,‘ कहो हे मेरे प्रिय शिष्‍य! आज तुम्‍हें कौन सा राग पढ़ाऊं?'

‘ हे गुरू देव! आज तक आपने मुझे इतने प्राचीन से प्राचीन राग बता दिए कि मैं तानसेन का भी बाप हो गया। अब मुझे आप की अनुकंपा हो तो आधुनिक रागों के बारे में बताइए ताकि मैं उन रागों को गाता हुआ गुलछर्रे उड़ा सकूं। .'

‘ हे शिष्‍य! जिन राग गाने वालों ने आज तक दिमाग से राग गाए हैं उन्‍होंने जीते जी तो जीते जी मरने के बाद भी गुलछर्रे ही उड़ाए हैं। ऐसे रागियों ने एक एक नहीं औरों के घर उजाड़ कर भी अपने जायज सौ सौ घर बसाए हैं। इतिहास साक्षी है।' कह उन्‍होंने पास रखे थूकदान में से एक पान का बीड़ा उठाया और मगरमच्‍छी दांतों के नीचे बड़ी बेरहमी से दबा दिया। ठीक ऐसे ही कई बार उन्‍होंने अपनी कई शिष्‍यों को भी दबाया था।

काफी देर तक पान की जुगाली करने के बाद वे बोले,' हे शिष्‍य! आज के युग के दो प्रमुख राग हैं एक राग दरबारी तो दूसरा राग सरकारी। पहले राग दरबारी आना जरूरी है। जो राग दरबारी में पारंगत हो जाते हैं वे ही राग सरकारी के लिए इलिजिबल होते हैं। जिस तरह गायकी, बजायकी में कई घराने हैं उसी तरह लोकतंत्र में कई राजनीतिक दरबार हैं। इन दरबारों में दरबारी रागी, सरकारी रागी पड़े रहते हैं।

इन दोनों रागों को गाने के लिए संगत की जरूरत नहीं होती, रंगत की जरूरत होती है। ये दरबारी रागी हर समय दरबार में दरबार की प्रशंसा में गला फाड़े अखंड राग गाया करते हैं। और इनके अखाड़े की सरकार बनती है तो ये दरबारी रागी सरकारी रागी बन जाते हैं। दरबार सरकार को जब लगता है कि दरबारी रागी पक गया तो उसे सहर्ष सरकारी रागी घोषित कर देती है। अखाड़े का जब कोई रागी राग दरबारी में निष्‍णात हो जाता है तो वह बिना चुनाव लड़े भी राग सरकारियों की श्रेणी में आ खड़ा होता है। हमारी सरकार के दरबार में बहुत से ऐसे गाने वाले सरकारी रागिए हैं। इन्‍होंने पहले दरबार में गाया,उनके किचन में खाना बनाया और बिना किसी परीक्षा को पास किए राग सरकारी गाने के पात्र हो गए। राग सरकारी गाने वालों के चांदी ही चांदी होती है। वे जो कुछ गाते हैं अखबारें उनकी गायकी को छाप कृतार्थ होती हैं। टीवी उनकी गायकी का सीधा प्रसारण करने को लालायित रहते हैं। वे जो कुछ गाते हैं उनका गाया प्रामाणिक राग बन जाता है।'

‘तो गुरूदेव, आपकी आज्ञा हो तो अब मैं भी....'

‘मेरे घर में बरतन धो धो तो तुम आधे दरबारी रागी हो ही गए हो...सुर में सुर मिलाने के भी तुम उस्‍ताद हो ...अब...'

‘ तो मुझे आशीर्वाद देकर कृतार्थ करें ताकि मैं....' कह मैं गुरूदेव का मुंह ताकने लगा तो गुरूदेव ने आशीर्वाद देते कहा,‘ जा, तेरे गुरू का आशीर्वाद है राग सरकारी में सिद्धहस्‍त हो जा। पर गुरूदक्षिणा में मेरे छद्‌म श्री का ख्‍याल रखना।'

‘ प्रामिज रहा गुरूदेव।'

बंधुओ! ये जो आप इधर उधर सर्वत्र सुन रहे हैं न, ये मेरे ही राग हैं। अब गुरूदेव के छद्‌म श्री का जुगाड़ कर रहा हूं बस!

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अशोक गौतम

गांव म्‍याणा, डा. धुंधन, तहसील ,अर्की जिला सोलन हि.प्र.

a_gautamindia@rediffmail.com

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