रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

फारूक आफरीदी का व्यंग्य : कहाँ घूम रहे हो इन्द्र!

farooq afradi इन दिनों मामूलीराम बहुत चिंता में डूबा हुआ है। साहित्‍यिक भाषा में आप इसे चिंतन कह सकते हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही उससे मेरी मुलाकात हुई।

वह मुझे देखते ही बोला, आज कल तुम इन्‍द्र देवता बने कहां घूम रहे हो? अपने बारे में इन्‍द्र की उपमा सुनकर मुझे आश्‍चर्य हुआ। मामूलीराम चाहता तो मुझे ईद का चांद भी कह सकता था जो ईद के मौकों पर ही नजर आता है, लेकिन मैं उसके मन की बात भांप गया। आजकल इन्‍द्र देवता मौसम के बावजूद कहीं आस-पास टहलते नजर नहीं आ रहे हैं तो मामूलीराम का परेशान होना स्‍वाभाविक है।

मामूलीराम का दर्द मैं जानता हूं। उसे दुनिया का दर्द लेकर घूमने की आदत है। यह भी सही है कि हमारे यहां सारा खेल महाराज इन्‍द्र का ही रचा-रचाया है। तालाब, पोखर, सागर, सरोवर, नदियां सबके सब महाराज इन्‍द्र की अगवानी के लिए राम-नाम का जप कर रही हैं। धरती से आकाश तक तपिश है। इस कारण जगत के सभी जीव जन्‍तु तपस्‍या में लीन हैं। इन्‍द्र देव के इन्‍तजार में पलक पांवडे़ बिछाये बैठे हैं।

मामूलीराम ने मुझसे बड़ा अजीब सवाल किया, क्‍या आप लोगों को लहलहाते खेत-खलिहान, कलकल करती नदियां, उफनते सागर, मदमस्‍त करती सावन की बौछारें, आसमान से बरसती रजत बूंदे नापसन्‍द हैं? मैं यह सुनकर सन्‍न रह गया। मैंने कहा, मामूलीराम! क्‍या मैं तुम्‍हें ऐसा लगता हूं जो इतनी खटकती बात मुझसे कही। वह बोला, आज दुनिया की रीति-नीति देखते हुए शायद ऐसा लगता है कि पेड़ लगाना गंवारों का काम रह गया है। आप लोग सोचते होंगे कि जब हम उसके फल नहीं खा सकते और उसकी छाया में नहीं बैठ सकते तो फिजूल की माथा पच्‍ची क्‍यों करें।

घने जंगल भी इसलिए पसन्‍द न हों कि अब कंक्रीट के जंगलों में आपकी अधिक दिलचस्‍पी है।

मैंने कहा, नहीं ऐसी तो कोई बात नहीं है। दादाजी ने तो मेरे जन्‍म पर जामुन का एक पेड़ लगाया था जिसकी छाया में मुझे सबसे ज्‍यादा सुकून मिलता है। मैंने भी अपने हर बेटे के जन्‍म पर पेड़ लगाये हैं। मैं तो उस धरती का पुत्र हूं जहां यह कहा जाता है 'सिर सांटे रुंख बचे तो भी सस्‍तौ जाण।'

मामूलीराम ने रुंआसे होकर कहा, भाईजी! धरती की असली संतान तो पेड़ पौधे ही हैं। वृक्ष ही नंगी धरती मां की लाज रखते हैं। यह धरती आज अपने वृक्ष संतानों के लिए वैसे ही तड़प रही है जैसे किसी मां की कोख में कन्‍या तो पल रही है लेकिन उसका जन्‍म रोकने का अपराध किया जा रहा हो। धरती कभी बांझ नहीं होती, बांझ तो मन होता है। मन का बांझपन दूर हो तो महाराज इन्‍द्र भी धरती पर रास रचाने आयें। मामूलीराम ने ठीक ही कहा है और मैं भी इसे ठीक मानता हूं लेकिन सवाल यह है कि राजाजी कहे जाने वाली सारी जनता भी इसे ठीक समझे।

-------

(फारूक आफरीदी)

ई-916, न्‍याय पथ,

गांधी नगर, जयपुर-302015

ईमेल - farooq.afridy@gmail.com
विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget