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यशवन्त कोठारी का आलेख : व्यंग्य – दशा और दिशा

व्यंग्य - दशा और दिशा

हिन्दी साहित्य में लम्बे समय से व्यंग्य लिखा जा रहा है, मगर आज भी व्यंग्य का दर्जा अछूत का ही है इधर कुछ समय से व्यंग्य के बारे में चला आ रहा मौन टूटा है, और कुछ स्वस्थ किस्म की बहसों की शुरूआत हुई हैं। आज व्यंग्य मनोरंजन से ऊपर उठकर सार्थक और समर्थ हो गया हैं। आज व्यंग्य-लेखक को अपने नाम के साथ किसी अजीबो-गरीब विशेषण की आवश्यकता नहीं रह गई हैं।

मगर स्थिति अभी इतनी सुखद नहीं है, आज भी कई बार लगता है, व्यंग्यकार छुरी से पानी काट रहा हैं। आवश्यकता व्यंग्य को समझने की हैं। बदली हुई परिस्थितियों में साहित्य की अन्य विधाओं की तुलना में व्यंग्य को शायद प्राथमिकता मिले, ऐसी स्थिति में व्यंग्य, और व्यंग्यकारों से यह मुलाकात वातावरण पर छाये कुहरे को दूर करने में मदद देगी। प्रश्नों की झोली में निम्न प्रश्न रखे गये।

1. व्यंग्य-एक विधा के रूप में कहां तक प्रतिष्ठित हो पाया हैं ?

2. हिन्दी आलोचक, व्यंग्यकार और पाठक के बीच का त्रिकोण ?

3. व्यंग्य की सार्थकता क्या हैं ?

4. व्यंग्य-लेखन अपेक्षाकृत जोखिम का कार्य है, क्या आप सहमत हैं ?

5. यदि हैं तो आप के अनुभव कैसे हैं ?

6. व्यंग्य की शैली, कथानक तथा भविष्य के बारे में आपके विचार ?

के. पी. सक्सेना

व्यंग्य को मूल रूप से मैं अलग विधा नहीं मानता। इसे अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम कह सकते हैं। इस माध्यम से कविता, कहानी, निबन्ध नाटक किसी का भी सृजन हो सकता हैं।

व्यंग्य के लेखक और पाठक के बीच एक सीधा रिश्ता होता हैं। कोई त्रिकोण नहीं। आलोचक इन दोनों से अलग चीज हैं।

व्यंग्य की सार्थकता कहानी-कविता आदि से कहीं अधिक हैं। इसका पैनापन शब्दों और कथानक के मोहजाल में न फंसकर सीधा दिलो दिमाग से टकराता है और पाठक के अन्दर एक लहर सी पैदा करके सोचने पर मजबूर कर देता हैं।

मैं व्यंग्य में कोई जोखिम नहीं मानता। यदि व्यंग्य के साथ हास्य की हल्की सी चाशनी हो और किसी व्यक्ति विशेष पर सीधा प्रहार न किया जाये, तो व्यंग्य सर्वप्रिय हैं। मुझे आज तक व्यंग्य से कोई जोखिम नहीं मिला। उल्टे मैं तो यह कहूंगा कि एक कहानीकार तथा नाटककार से भी अधिक मेरे पाठकों ने मुझे व्यंग्यकार के रूप में ग्रहण किया है और अपना स्नेह दिया हैं। व्यंग्य जोखिम तभी बनता है जब यह किसी व्यक्ति विशेष या सम्प्रदाय पर सीधा कटु प्रहार हो।

व्यंग्य की शैली सीधी सरल हो और कथानक आज के परिवेश का आईना हो यही उत्तम हैं। ठेठ और ठोस भाषा में लिखे गए व्यंग्य एक वर्ग विशेष भले ही ग्रहण कर ले, पर जन साधारण की अच्छी प्रतिक्रिया नहीं अतः हम अपने आसपास जो जिन्दगी जी रहे है और जिन अभावों से त्रस्त हैं उन्हें सीधे सरल शब्दों में लपेट कर पेश करें, यही जरूरी हैं।

निशिकांत

इस बात से, साहित्य से जरा भी परिचित व्यक्ति, इन्कार नहीं कर सकता कि व्यंग्य एक स्वतन्त्र विधा है, मात्र विधा ही नहीं, साहित्य की सबसे सशक्त विधा हैं। एक व्यंग्यकार होने के नाते मैं यह बात पूरे दावे के साथ कह सकता हूं व्यंग्य पूरी तरह से प्रतिष्ठित हो चुका हैं। कोई जरूरी नहीं कि जब तक कोई नामवर समीक्षक बांग न दे, तब तक व्यंग्य को विधा के रूप में प्रतिष्ठित माना ही न जाए। वैसे परिष्कार तो हर विधा का चलता रहता हैं।

रही बात आलोचक, व्यंग्यकार पाठक के बीच त्रिकोण की तो यही कहा, जा सकता है कि व्यंग्यकार के निकट आलोचक से ज्यादा पाठक हैं। पाठक अब व्यंग्य ज्यादा पसन्द करते हैं, ज्यादा समझते हैं, और चाहते हैं कि व्यंग्य अधिक से अधिक लिखा जाए। मुझे शिकायत पाठकों से नहीं आलोचकों से है। लिखने की बात तो दूर, अगर कभी लिखना ही पड़ा तो लिख देते हैं - "लोग व्यंग्य भी लिखते हैं।"

लेकिन इधर यह उदासीनता टूट रहीं हैं। कुछ एक शोध ग्रन्थ व्यंग्य पर आए हैं, कुछ अच्छी पत्रिकाओं ने भी बहस शुरू की हैं। देर आयद, दुरूस्त आयद। चलिए बहस शुरू तो हुई। इससे व्यंग्यकार और आलोचक के बीच की दूरी कम होगी आज नहंी तो कल।

व्यंग्य की सार्थकता इसी में है कि वह समाज के अंदर की विसंगतियों पर चोट करे, मुखौटों को बेनकाब करे, और लोगों के अंदर तिलमिलाहट पैदा करे। बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। व्यंग्य सुधार की ओर भी प्रेरित करता हैं। जिस रचना में ऊपर वाले गुण न हों, उसे व्यंग्य की कोटि में नहीं रखा जा सकता। वैसे व्यंग्य सीधा-सादा, सरल और छोटा होना चाहिए, तभी वह असरदार होता हैं-यानी कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक मीठी मार। और यह सब व्यंग्यकार पर निर्भर करता हैं। जितना ही वह समाज के प्रति सजग रहेगा, उसका व्यंग्य उतना ही सजग होगा।

मैं आपकी इस बात से पूरी तरह से सहमत हूं कि व्यंग्य लेखन जोखिम का काम है-क्योंकि व्यंग्यकार किसी का लिहाज नहीं करता। यही लिहाज न करना उसके व्यक्तित्व के लिए नुकसानदायक हो सकता हैं। वैसे अगर वह लिहाज करे तो व्यंग्य क्या लिखेगा ? अमुक अगर मेरे निकट हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं उनके दोहरेपन पर चोट न करूं ? जोखिम तो है ही। फिर जोखिम के बिना मजा ही क्या हैं दो चार लोग गालियां दे, कुढ़ें और कहें कि यह क्या लिख डाला तो मुझे खुशी होती है कि मैं जो कुछ कहना चाहता था, ठीक से कह पाया हूं।

अपना व्यक्तिगत अनुभव बस यही है कि कुछेक लोगों की नाराजगी जबानी सहनी पड़ी हैं।

व्यंग्य की शैली, कथानक तथा शिल्प में विविधता हैं। हर व्यंग्यकार की शैली अगल होती हैं। एक ही कथानक पर कई लोग, कई ढंग से लिखेंगे और कई बातें कह जायेंगे। आज का व्यंग्यकार नए से नए कथ्य को लेकर चल रहा हैं, वह पुराने प्रतीकों के माध्यम से नई विद्रूपताएं पर चोट कर रहा हैं। कहानी, कविता में इतने प्रयोग नहीं हुए हैं, जितने कि व्यंग्य में। वैसे यह प्रश्न आचार्यों के लिए हैं। मैं तो मात्र एक अदना-सा व्यंग्यकार हूं, क्या कहूं ? छोटी मुंह बड़ी बात करने का इस समय मूड नहीं हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मैं आचार्यों के आचार्ययत्व से त्रस्त हूं।

श्रीकांत चौधरी

व्यंग्य एक विधा के रूप में कहां तक प्रतिष्ठित हो पाया है, इसका निर्णायक उत्तर कम से कम एक व्यंग्यकार का देना मुश्किल है क्योंकि बगैर इसकी चिन्ता किये कि मूर्धन्य समीक्षक, संपादक और लेखक इसे विधा मान रहे हैंं या नहीं, अपने लेखन की ईमानदारी निभाते जाना ही नये लेखक का धर्म है और उसके लिये श्रेयस्कर भी है, अन्यथा आज कल लेखक ही समीक्षक होने लगे हैं, शेष समीक्षक उपन्यासों, कहानियों, नाटकों और कविताओं के लिए टेंडर भरे बैठे हैं बकौल परसाईंजी, व्यंग्य में समीक्षकों के पास समीक्षा की भाषा का अभाव है, और यह कथन सच है क्योंकि व्यंग्य के वजनदार हस्ताक्षरों की उपेक्षा कठिन जान पड़ने की त्रासदी ढोने से बचने के लिए कुछ समीक्षकों ने व्यंग्य को कहानी मानकर बाकायदा समीक्षा की हैं। मेरी विनम्र राय में व्यंग्य-विधा के रास्ते पर है, व्यंग्य की उपेक्षा, व्यंग्य पर तत्संबंधी विवाद इसका प्रमाण है- और वैसे भी समीक्षा के नये मापदंडों पर ही इस विधा का निर्धारण होगा इस बारे में व्यंग्यकारों (बड़े लोग खासकर) की स्वयं की लापरवाही भी-नजर अन्दाज नहीं की जा सकती। मैं तो नहीं कर रहा।

आलोचक, खासकर व्यंग्य का, है ही कहां ? व्यंग्यकार का सीधा रिश्ता और सबसे गहरा भी - पाठक से ही है, उस सामान्य पाठक से जो अपने समय के सारे आर्थिक, नैतिक सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक घात-प्रतिघात को झेलता हैं। आलोचक का काम तो अभी हाल में, व्यंग्य को ललित निबंध और निजी कुंठा से उपजा विस्फोट सिद्ध करना भर हैं। आगे शूद्र-व्यंग्य के दिन फिरे।

व्यंग्य की सार्थकता का सवाल तो ऐसा ही है कि मरीजों की दुनियां में सर्जन की सार्थकता का सवाल तो ऐसा ही है कि मरीजों की दुनियां में सर्जन की सार्थकता क्या है ? अब तो व्यंग्यमात्र ही ऐसी कड़वी औषधी है जो व्यवस्था और व्यक्ति की सडांध और और आडंबर को अपने तेजाब से गलाने में सीधे प्रयुक्त होती है कई लोगों को तो इस बात का बड़ा सदमा है कि व्यंग्य में गीता और बाईबल के से शाश्वत् मूल्यों को अभाव हैं।

अन्य विधाओं के मुकाबले तो व्यंग्य लेखन निश्चय ही जोखिम का काम हैं। गत गतवर्षों में परसाईं जी, तेदुलंकर जी आदि पर अधकचरी, फासिस्ट मनोवृत्ति के लोगों द्वारा किए गए हमले इसका बहुत बड़ा प्रमाण हैं। इस युग में सच बोलने से अधिक जोखिम भरा कार्य दूसरा है भी कौन सा ? गनीमत है कि यहां के लोग साहित्य के मामले में अभी भी नौसिखिये है और मोटी चमड़ी से लैस हैं फिर भी कुछ गैरत वाले निकल ही आते हैं, पर वे इतने भले मानुष हैं कि मुझे पीटकर मेरा व्यंग्य लेखन अथवा मुझे 'आफ बीट' नहीं होने देना चाहते।

व्यंग्य की शैली, कथानक या शिल्प पर भला मैं नया खिलाड़ी क्या कहूं ? हां इतना जरूर है कि व्यंग्य में शैली के कारण लेखक अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हो जाता है श्री परसाईं, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल, रवीन्द्रनाथ त्यागी, राधाकृष्ण, फ्रिक तौंसवी आदि अनेक व्यंग्यकार इसके अच्छे उदाहरण हैं कहानी या कविता की तरह व्यंग्य में भी नये प्रयोगों की काफी गुन्जाइश हैं ? लेकिन कार्य और कारण की परख और वैज्ञानिक बुद्धि से सम्पन्न दृष्टि और सामर्थ्य मेरे ख्याल से अच्छे ऊंचे व्यंग्य की पहली शर्त हैं। सच बात तो यह कि इन सब बातों के लिए अभी कुछ और समय अपेक्षित हैं।

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यशवन्त कोठारी

86, लक्ष्मीनगर, ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर - 302002

फोन - 2670596

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main vyang likhana sikh raha hun. lekhakon ki ray achchhi lagi.

गौर से पढ़ा ..इतनाही कहूँगी ,कि , व्यक्तिगत रूपसे , किसी पे गुस्सा खाके व्यंग कस देना ठीक नही ...

R.K. Laxman जैसे व्यंग चित्रकार जब व्यंग कसते हैं , तो उसे नकारा नही जा सकता ..राजनितिक व्यंग, जो देशहित सोचके किया जाता है, वो स्वीकार्य होता है..लेकिन,उसके अलावा, किए गए व्यंग, कई बार दिल dukhaate हैं...

http://shamasansmaran.blogspot.com

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http://shama-kahanee.blogspot.com

Vicharonko chalna dene wala aalekh..

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vyangy stithiyon men se futta hai ,saayaas nahin likhaa jataa .jivan jagat ki upekshaayen ,nissangtaa ,rajnitik vidruptaa svayam hi vyangy vinod men tabdil ho jaati hai ,gaanthen kholtaa hai vyangy ,virechan bhi kartaa hai ,fir jo ho so ho ,vyangykaar ko chintaa nahin rahti ,rahti to ...veerubhai

व्यंग्य के साथ हास्य रचना में सरसता भर देता है. व्यंग लेखन की खासियत यह हो की,जिस पर व्यंग किया गया हो वह भी मुस्कुरा उठे ..!!

चनाकार पहलीवारपढ़ा ,प्रभावित किया.संपादक रविरतलामी जी को बहुत बधाई अविनाश जी को भेजने के लिए धन्यवाद.व्यंग पर बहस ठीक है चिंताvyarth.

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