रविवार, 19 जुलाई 2009

अशोक गौतम का व्यंग्य : चमचा नेता दोउ अड़े.....

इधर कई दिनों से मैं बराबर सुबह जब सैर को निकल रहा था तो बराबर देख रहा था कि पड़ोसी कुत्‍तों की तरह कभी यहां तो कभी वहां अंधेरे में शौच कर रहा होता, कभी इस मोड़ पर तो कभी उस मोड़ पर, सिर शान से नीचा किए हुए । यार हद हो गई। माना हममें कामन सेंस न के बराबर है पर फिर भी आदमी और कुत्‍ते में तो कुछ आधारभूत फर्क होना ही चाहिए, कम से कम मेरे हिसाब से। बाकी आप जानिए जनाब!

आज फिर मुंह अंधेरे वह सामने के पड़ोसी की दीवार के साथ सट कर बैठा था। मैं खांसा तो इकट्‌ठा हुआ। सोचा, हो सकता है इसके शौचालय का सेप्‍टिक टैंक भर गया होगा, या फिर पानी छोड़ने वाले को महीना नहीं दिया होगा सो उसने पानी छोड़ना बंद कर दिया हो। और हो सकता है कि मकान मालिक उसे भगाना चाहता हो , सो शौचालय में ताला जड़ दिया हो। आज की डेट में किराएदार को भगाने को सबसे सरल तरीका ये है कि उसके शौचालय को ताला लगा दो। बस, काम हो गया। उसे वहां बैठा देख कुत्‍ते भौंकने लगे थे। वे भी बेचारे सच्‍चे थे। उनकी शौच जाने की जगह पर जब महाशय ने कब्‍जा जमा लिया तो वे बेचारे शौच करते तो कहां करते? मैंने उसे बचाने के लिए वहां से कुत्‍तों को भगाया तो वह पेट पकड़े पकड़े उठा, ‘यार शर्मा! बहुत बहुत थैंक्‍स! कुत्‍तों से काटने से बचा लिया तूने।'

‘ यार , मैं तुझे कई दिनों से देख रहा हूं कि तू.....'

‘मत पूछ यार!' कह वह रोने को हो गया। साठ पार कर चुका आदमी इश्‍क करता हुआ अच्‍छा लगता है, साठ पार कर चुका आदमी झूठ बोलता हुआ अच्‍छा लगता है, साठ पार कर चुका आदमी मोह माया के पाश में बंधा हुआ अच्‍छा लगता है, पर मेरे हिसाब से मुंह अंधेरे बाहर शौच जाता हुआ कतई अच्‍छा नहीं लगता।

‘मैं तुझे कई दिनों से नोट कर रहा हूं कि तू... क्‍या बात है?'

‘ क्‍या बताऊं यार! नगर निगम के चुनाव के नतीजे आने से ही मकान मालिक ने लैटरिन बंद कर दी है।'

‘क्‍यों?'

‘जहां वह कह रह था उसे लगता है कि वहां मैंने वोट नहीं पाई।'

‘ तो हां तो कह देता उसका मन रखने के लिए कि जहां वह कह रहा था तूने वहां ही वोट डाली है। उसका मन भी रह जाता और तेरी लैटरिन भी खुली रहती। क्‍या तुझे इतना भी याद नहीं कि साठ के बाद आदमी चैन से अगर कहीं बैठ सकता है तो वह केवल और केवल लैटरिन में। जबसे तू बाहर जा रहा है न तबसे मेरी तो छोड़, तुझे कुत्‍ते भी गालियां दे रहे हैं।'

‘ कहा तो था।' उसने ऐसे पेट पकड़ा, लगा जैसे फिर ओट चाह रहा हो।

‘तो??'

‘ तय होता है कि वोटर वोट चाहे किसी को पाए पर चुनाव के बाद सिकुड़ा हुआ सीना भी चौड़ा करके कहता यही है कि उसने तो वोट उसी को पाई है जो जीता है।'

‘ तो??'

मैंने भी उससे जोश में आकर कह दिया कि हमारा बंदा जीत गया।'

‘तो?'

‘ तो उसने कहा कि उसका तो बंदा हार गया। इसका मतलब मैंने उसके बंदे को वोट नहीं पाई। बस! आव देखा न ताव और जड़ दिया लैटरिन पर ताला। मैंने उसके आगे बहुत नाक रगड़ी, पर बंदा नहीं माना तो नहीं माना। यार! रूठे रब्‍ब को मनाना आसान है, रूठे मकान मालिक को मनाना मुश्‍किल। '

‘ तो कमेटी के शौचालय ऐसों के लिए ही तो बने हैं।'

‘वहां भी गया यार! रोक दिया।'

‘क्‍यों??'

‘वहां कमेटी के बंदे ने कहा कि किसकी इजाजत से यहां आया है।'

‘सार्वजनिक शौचालय के लिए इजाजत लेनी कबसे जरूरी हो गई?' मैंने सगर्व कहा।

‘अब इजाजत जरूरी है। वह बोला, देखो भैया, काउंसलर का साफ आदेश है कि अपोजीशन का यहां कुत्‍ता भी नहीं फटकना चाहिए। क्‍या जीते हुए काउंसलर को वोट पाया था।'

‘हां तो!' मैंने पतलून कसकर पकड़ते कहा ।

‘ कहने को तो कुत्‍ते भी आजकल अपने को काउंसलर का खासमखास कह रहे हैं। कहने से कुछ नहीं होता। कोई प्रूफ है तो दो? है तो पांच साल तक जहां चाहो देश में हगो। मेरे ही जूते मारना अगर कोई पूछ भी ले तो। शौचालय तो शौचालय, पूरा देश तुम्‍हारा। वरना भैया श्‍मशान घाट पर जलने के भी लाले पड़े समझो। काउंसलर ने साफ कह दिया है कि कल से श्‍मशान घाट पर मुर्दे भी वही जलेंगे जिनको उसके चमचे पहचानते हों या फिर जिनके पास काउंसलर का लिखा होगा कि इस मुर्दे ने उन्‍हें ही वोट पाया है। यह मुर्दा उनका ही बंदा है। ' मैं चुप! यार शौच जाने का तो वक्‍त तय सा होता है पर मरने का तो कोई वक्‍त तय नहीं। जहां मरने के बाद भी चैन न मिले आग लगे ऐसी व्‍यवस्‍था को।

‘फिर मेरी जेब से बीड़ी निकाल सुलगाता बोला, देखो, आज जा लो । कल तो लिखवा कर लाना ही पडे़गा कि काउंसलर के बंदे हो। वरना खुद ही न आना। फिर मत कहना बच्‍चों की तरह पाजामा गंदा करवा दिया। भैया क्‍या करें, नौकरी तो हमें भी करनी है। काउंसलर के आगे मेरे भी तो हाथ बंधे हैं।

‘मार्किट रेट में ही शौच करने दे यार!‘

‘हु अ हू! शौचालय में तो यार कम से कम रिश्‍वत मत खिला।'

‘ तो काउंसलर से लिखवा कर ले लेना था।'

‘सीधे नहीं मिलता न वो जनता से।'

‘क्‍यों ?'

‘तो भैया चमचे किस लिए हैं। चमचों ने काउंसर से साफ कहा है कि साहब ! हमारे मुहल्‍ले के काम हमारे थू्र होने चाहिएं वरना हम अगले चुनाव में गए। हमारे भी तो कमाने के दिन अभी आए हैं। जिस तरह आत्‍मा को स्‍वर्ग जाने के लिए बीच में पंडे को होना परम आवश्‍यक है उसी तरह नेता से मिलने के लिए चमचा परम आवश्‍यक है। चमचे के बिना नेता जनता को तो क्‍या भगवान को भी पहचान जाए तो तेरे जूते पानी पिऊं। चमचा नेता दोउ अड़े काके लागू पाय, बलिहारी चमचा आपने जिन नेता दियो मिलाय।' मामला इतना नाजुक होगा अब पता चला। शुक्र है यार! मेरे घर में और तो कुछ नहीं , पर कम से कम एक अदद शौचालय तो है।

‘तो किसी चमचे से बात कर लेते।‘

‘करूं तो तब जो हाथ आए। अरबी के पत्‍ते पर के पानी को पकड़ा जा सकता है पर नेता के चमचे को नहीं। बस, जबसे तू मुझे बाहर बैठा हुआ देख रहा है न! तबसे काउंसलर के चमचे को ही ढूंढ रहा हूं।'अभी भी हल्‍का होकर उसीके घर जा रहा हूं।' कह बंदा बिना पानी लिए अपने मिशन पर हो लिया।

भगवान से मेरी बस यही गुजारिश! आज मुझे कुछ मिले या न पर उसे उसके मिशन में सफलता जरूर मिले ताकि देश में हैजा फैलने से बच जाए।

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अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्‍पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक

सोलन-173212 हि.प्र.

E maila_gautamindia@rediffmail.com

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