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यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : किसी के आदमी बनने का सुख

ज्योंही मैं उनके कमरे में घुसा, उन्होने पूछा-''तुम किसके आदमी हो ?'' मैंने भी तुरत-फुरत जवाब दिया- ''हजूर मैं तो आपका ही आदमी हूँ।''
   उन्होंने फिर कहा-''झूठ क्यों बोलते हो ? मेरी तो तुमने ऊपर शिकायत की है और इसी कारण तुम्हें मैनें बुलाया है, सच सच बताओ तुम किसके आदमी हो ?''
   मैंने इस बार सच सच बता दिया- ''मैं मुख्यमंत्री का आदमी हूँ।''
   ''अफसर जी की हवा निकल गई। मुझे कुर्सी पर बैठने को कहा। मंत्री जी आपका ट्रांसफर नहीं चाहते थे, और इसी कारण मैंने आपके आवेदन पर विचार नहीं किया था। ''
   अक्सर दैनिक जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब कोई न कोई आप से पूछ बैठता है-आप किसके आदमी हो ? मोहल्ले में दादा तक पूछता है-आप किसके आदमी हैं, और यदि आप थानेदार के आदमी हो तो दादा आपको कुछ नहीं कहता।
   इसी प्रकार कॉलेज में एक बार मैंने एक बिगडैल छात्र से पूछा- ''तुम किसके आदमी हो ? वो तुरन्त बोल पड़ा-''पापा पूलिस में एसपी हैं।'   
   मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी। वह होनहार छात्र आगे जाकर प्रथम श्रेणी में पास हुआ और विश्वविधालय छात्रसंघ का अध्यक्ष बना।
   एक पी.एच. डी. छात्रा से मैनें यही प्रश्न पूछा- ''तुम्हारे पास किसका जैक है ?'' छात्रा ने विभाग के कबीना मंत्री का नाम लिया। मैं चुप हो गया । उस सुन्दर छात्रा की थीसिस मैंने ही लिखकर दी और विश्व विधालय से पास कराई।
  यदि आप किसी बड़े आदमी के आदमी हैं तो आपके लिए कोई भी काम मुश्किल नहीं हैं। मुन्ना भाई एम. बी. बी. एस. ही नहीं एम. डी. भी हो सकते हैं। विश्वविधालयों में, संस्थानों में, सरकारों में, यहां तक कि एन.जी.ओ मे भी ऐसे आदमी भरे है जो किसी न किसी के आदमी हैं। वे स्वतंत्र नहीं है, बस किसी के पिछल्लगू है और इसी कारण वे पावरफुल हैं। यदि आप डाक्टर हैं और किसी मंत्री के आदमी हैं तो आपको ये अधिकार है कि आप मरीज की बांयी टांग के बजाए दांयी टांग का ऑपरेशन कर दें। आप प्रसूति के बाद बच्चा भी बदल सकते हैं, आपका बाल भी बांका नहीं होगा क्योंकि आप चिकित्सा मंत्री के आदमी है। छोटे पदों पर काम करने वाले बड़े लोगों के क्या कहने। विभागाध्यक्ष का चपरासी विभागाध्यक्ष के अलावा किसी को कुछ समझता ही नहीं है। कई आर. ए. एस. मुख्य सचिव या कबीना सचिव के आदमी हो कर रहते हैं।
   यदि आप सम्पादक के आदमी है तो क्या कहने। आपकी तीसरे दर्जे की घाटिया रचना भी छप जाती है, पारिश्रमिक भी डबल मिलता है सो अलग। यदि आप डाकू गब्बर सिंह के आदमी हैं या थानेदार के आदमी हैं तो पूरा कस्बा आपके हवाले है कहीं से भी लूटपाट शुरू कर सकते हैं। यदि आप मुम्बई के किसी भाई के आदमी हैं तो सब खून माफ है, जितनी चाहिये उतनी सुपारी लीजिये। समीक्षकों का आदमी होना भी साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में काफी मायने रखता है आप रातों रात बड़े लेखक, कलाकार या नाटककार बन जाते हैं। किसी को भी बाप बना लीजिये।
   किसी बड़े आदमी की पूंछ पकड़ लीजिये और ट्रांसफर, पोस्टिंग, नौकरी दिलाने जैसे महान कार्यों में दोनों हाथों से सूंतिये।
   यदि आपने अनाचार, हत्या, अपहरण कर लिया है तो किसी बड़े आदमी की शरण में चले जाईये, वह आपको अपना आदमी घोषित कर दे तो मजाल है कोई आपको हाथ भी लगा सके। किसी का आदमी बन जाईये। बस फिर आपके सौ खून माफ हे। बाप पुलिस में है तो बेटा अपराधी हो सकता है। बाप काबीना मंत्री है तो बेटे को हत्या, बलात्कार का हक स्वयं मिल जाता है। सामाजिक सरोकार बदल जाते हैं। मीडिया के सुर बदल जाते हैं। इलेक्ट्रोनिक मीडिया हो या प्रिन्ट मीडिया विज्ञापन सबको चाहिये।
   यदि आत अभी तक आम आदमी हैं और किसी के आदमी नहीं बन सके हैं तो यह आपका, समाज का और देश का दुर्भाग्य है, तुरन्त किसी पावरफुल सत्ताधारी का आदमी बन जाईये। या स्वय को उसका आदमी घोषित कर दिजिये और यदि वो ना-नुकर करे तो विपक्षी खेमे की और रूख करने की धमकी दे दीजिये। आपका काम तुरन्त हो जायेगा, आपको बचाने की गारण्टी उस बड़े आदमी की स्वतः हो जाएगी। आपका बाल भी बांका नहीं होगा। बस बाप बदल लीजिये। बाप बदलते ही आपके लिए सब रास्ते स्वतः खुल जाते हैं। आजकल बापों का जमाना है। एक बाप से काम नहीं चलता। बस बदलते रहिये जब तक सफलता नहीं मिलती है।
   आपको लोन लेना है, मैनेजर घास नहीं डाल रहा है, तुरन्त बैंक में अफवाह फैला दीजिये, कि आप वित्त मंत्री के आदमी है, आप का काम चुटकियों में हो जायेगा। आपको शास्त्रीय संगीत या पुरस्कार सामारोह का कार्ड नहीं मिला है, तुरन्त स्वयं को कलाकार या अध्यक्ष का रिश्तेदार घोषित कर दीजिए। दस कार्ड आपकी सेवा में उपस्थित हो जायेंगे। मैं ऐसे सैकड़ो लोगों को जानता हूँ जो इसी प्रकार आदमियों के सहारे स्वयं बड़े बन गये। इतिहास गवाह है कई मंत्रियों के पी. ए. स्वयं मंत्री बन गये। कई वैज्ञानिकों के चमचे बड़े वैज्ञानिक बन गये । कई अफसरों के पी. ए. आगे जाकर स्वयं अफसर बन गए। इस कार्य हेतु नियम बदल दिये गये। यदि आप किसी बड़े आदमी से जुड़ी हुई हैं तो क्या कहने, फिर तो बस आप ही आप हैं। चरित्र की चाट चटनी का चमत्कार देखते ही बनता है। चरित्र का इस देश में इतना ही उपयोग हैं। आप प्रमोशन की सीढ़ियां चढ़ना चाहती हैं। तुरन्त बास को अपना बना लीजिये स्वयं को बास का आदमी या औरत घोषित कर दीजिये।
   आप अयोग्य हैं, कमजोर हैं समय पर नहीं आते, काम नहीं करना चाहते ? चिन्ता की कोई बात ही नहीं है। स्वयं को कार्यालयाध्यक्ष का विश्वस्त आदमी घोषित कर दीजिये। अब कोई आपका क्या कर लेगा । पूर्व लेखक हैं या पूर्व कवि हैं, अपने आपको सम्पादक का आदमी घोषित कर दीजिये। सम्पादक न माने आपकी बला से मगर आप साहित्य की सड़क पर धुंआ देते रहिये। प्रदूषण फैलाते रहिये।
   राजधानी में काम करने वाला हर व्यक्ति किसी न किसी बड़े आदमी का आदमी होता है। राजधानी की पूँछ ही यह आदमी होता है। कस्बे का छुठभैया नेता इसी छोटे आदमी की पूँछ पकड़ कर राजधानी के काम करवाते हैं।
   लेकिन कभी-कभी आप जिसके आदमी होते हैं, सामने वाला उससे भी बड़े आदमी का आदमी होता है, ऐसी स्थिति में आप अपने बड़े आदमी को छोड़िये और उससे भी बड़े आदमी का पल्ला पकड़ लीजिये। सफलता के लिए इतना तो करना ही पड़ता है। जो लोग भवसागर को पार करने के लिए ईश्वर पर आश्रित हैं वे अपने मामले पर पुनर्विचार करें और किसी बड़े आदमी के आदमी बन जाएं ताकि भौतिक संसार में प्रगति होती रहे और आध्यात्मिक संसार किसने देखा है ?


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यशवन्त कोठारी
86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर
जयपुर 302002
फोन 2670596

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