गुरुवार, 16 जुलाई 2009

सुधा भार्गव की दो नई लघुकथाएँ

 gadar

१.ग़दर की चिंगारी 

                         उस दिन मेरी सहेली भोगल में सब्जी  खरीदते   मिल गई !उसके चेहरे पर उदासी ने चादर तान रखी थी !मैं परेशान हो उठी -यह अनहोनी क्यों !मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लिया !एक स्पर्श से उसकी आँखें झरझरा  उठीं !उसने मेरा हाथ नहीं छोड़ा और अपनी  ओर खींचती बोली -चल मेरे घर--चल,बस थोड़ी देर को !न जाने उसकी आँखों में क्या  था कि उसकी तरफ खींचती चली गई !

गर्मी अपनी चरम सीमा पहुँच कर गजब का कहर ढा रही थी !उसके घर में घुसते ही लगा तपते ओवन में कदम पड़ गए हैं !'बड़ी गर्मी है यहाँ एक एयर कंडीशन लगाव ले!'मैंने अपनेपन से कहा !'

'मैं घर की देखभाल करने वाली हूँ ,मालकिन नहीं !मेरे हाथ में कुछ नहीं !चल बेड रूम में बैठते हैं !वहां ए.सी .है !'

'क्या बात करती है !अब तो पैसे की भी कमी नहीं है !उम्र के इस ढलते सूरज में इतनी माया बचा कर क्या करना है !'

कुछ देर के लिए मौन हम दोनों के बीच आलती -पालती मार कर बैठ गया !पर कब तक!सारे बांध तोड़ व्यथा स्वयं ही  उमड़   पडी !

'कल रात मैंने अपने पति से कुछ रुपये देने को कहा था ताकि मनपसंद समान खरीद लाऊं !बहुत देर तक इन्तजार किया कि वे खुशी से मेरे हाथ पर रख देंगे !गिनगिनाकर जब  लक्ष्मी को अपनी एलमारी में बंद करने लगे तो हंसकर मैंने सुनाया भी --पहले घर की लक्ष्मी को तो प्रसन्न करो तब उसे बंद करना !'

'यह सब तुम्हारा ही है मेरे मरने के बाद !पहले नाती -पोतों के नाम कुछ कर दूँ !बच्चों को भी देकर जाना है !'बड़ी मीठी आवाज में वे बोले !इनकी मीठी छुरीने मुझे चीर कर रख दिया है ,पर एक बात निश्चित है-यदि इन्होंने मेरे साथ अन्याय किया तो इक धेला बच्चों को नहीं देने दूंगी और करूंगी इनके मरने की प्रतीक्षा !कम से कम कुछ दिन तो मिलेंगे अपने अरमान पूरे करने के !'      ग़दर की चिंगारी भड़क उठी थी !

२ हाथी -घोड़े

समीरा को बचपन  से ही शतरंज खेलने का शौक था !उम्र बढने के साथ साथ शौक भी उफनती नदी की तरह बढ़ता गया !एक दिन वह इसकी चैम्पियन बन गई !उसके पड़ोस में टेनिस  का खिलाडी विक्रम भी रहता था !दोनों एक ही कालिज में पढ़ते थे !पटती भी आपस में   खूब थी !बड़े   होने पर  दोनों ने शादी करने का निश्चय किया !विक्रम के पिता जी ने स्पष्ट शव्दों में समधी जी से कह दिया --हमें दहेज़ नहीं चाहिए ,केवल बेटी समीरा चाहिए !'शादीसाधारण तरीके से हो गई !

एक संध्या विक्रम ने कुछ दोस्तों को चाय पर बुलाया !मित्रों को विश्वास ही नहीं होता था कि बिना दहेज़ के शादी भी हो सकती है !एक का  स्वर मुखर हो उठा --'यार यह तो बता ससुराल से सौगातों में क्या -क्या मिला है ?'

'हमने तो बहुत कहा -'कुछ नहीं चाहिए !लेकिन हाथी -घोडे तो साथ बांध ही दिए !'

'हाथी ----घोड़े !पूछने वाला सकपका गया !हिम्मत करके फिर बोला -'जरा दिखाओ तो !'

'जरुर ---जरुर !'कहकर विक्रम समीरा की ओर मुड़ा   -जरा लेकर तो आओ !'

खुशी -खुशी समीरा गई और शीघ्रता से हाथों में एक डिब्बा लेकर उपस्थित हो गई !बड़ी आत्मीयता से उस मित्र से बोली -'क्या आपको भी शतरंज खेलने का शौक है !मैं अभी उसे मेज पर सजा देती हूँ !देखें किसके हाथी -घोड़े पिटते हैं !'

दोस्त की हालत देखने लायक थी !बिना खेले ही शतरंजी चाल में फंस चुका था !

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परिचय --सुधा भार्गव

जन्मस्थल --अनुपशहर ,जिला --बुलंदशहर--भारत

शिक्षा --बी ,ए.बी टी ,रेकी हीलर

शिक्षण --बिरला हाई स्कूल कलकत्ता में २२ वर्षों तक हिन्दी भाषा का शैक्षिक कार्य |अ

साहित्य सृजन ---

विभिन्न विधाओं पर रचना संसार

साहित्य संबन्धी संकलनों में तथा पत्रिकाओं में रचना प्रकाशन

प्रकाशित पुस्तकें

रोशनी की तलाश में --काव्य संग्रह

बालकथा पुस्तकें---

१ अंगूठा चूस

२ अहंकारी राजा

३ जितनी चादर उतने पैर ---सम्मानित

आकाश वाणी दिल्ली से कहानी कविताओ. का प्रसारण

सम्मानित कृति--रोशनी की तलाश में

सम्मान --डा .कमला रत्नम सम्मान

पुरस्कार --राष्ट्र निर्माता पुरस्कार (प. बंगाल -१९९६)

अभिरुचि --देश विदेश भ्रमण ,पेंटिंग .योगा

वर्तमान लेखन का स्वरूप

संस्मरण --कनाडा के १५१ दिन ..,बाल साहित्य

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संपर्क --जे =७०३ स्प्रिंग फील्डस

#१७/२० अम्बालिपुरा विलेज

बेलंदुरगेट

सरजापुरा रोड

बैंगलोर -५६०१०२

कर्नाटक (भारत

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