रविवार, 12 जुलाई 2009

फारूक आफरीदी का व्यंग्य : ओवर लोडिंग

farooq afradi

राज्‍य कर्मचारी परसादी लाल ने अखबार में जब से यह खबर पढ़ी है कि ओवर लोडिंग करने वाले वाहन मालिकों के खिलाफ सख्‍त कार्यवाही की जायेगी और उन्‍हें छः महीने की जेल हो सकती है। हो सकती क्‍या है, होगी ही तो उसने संतोष की सांस ली है।

मैंने उससे पूछा, ‘परसादी! तू इतना खुश क्‍यों हो रहा है भाई!' कहने लगा, ‘मैं' भी तो ओवर लोडिंग काम कर रहा हूं। मेरे भी मालिक को छः महीने की सजा हो जाये तो मैं भी राहत की सांस लूं।'

मैं उसकी बात समझ नहीं पाया, इसलिए उससे पूछ बैठा, ‘तुम और ओवर लोडिंग! बात कुछ भेजे में समाई नहीं।' कहने लगा, तुम अपना भेजा फ्राई करवाओ जैसे चटखारे लेने के लिए दाल फ्राई करवाते हो।' मैं फिर भी नहीं समझा तो कहने लगा, तुम मूर्ख हो और मूर्ख ही रहोगे। ऐसा लगता है ऊपर-ऊपर की खा रहे हो। हम गधे की तरह काम के बोझ तले दबे जा रहे हैं और तुम तले हुए काजू खा रहे हो।'

मैं अब कुछ समझा लेकिन यही समझा कि परसादी शायद काम के बोझ तले दबा हुआ बड़बड़ा रहा है। इसको शायद छुट्टियां नहीं मिल रही। वह झन्‍नाते हुए बोला, ‘देखो बंधु! तुम सरकारी सांड हो। फाइव डे वीक का मजा लूट रहे हो और फाइव स्‍टार लाइफ भोग रहे हो लेकिन मैं एक निजी संस्‍थान में पांच क्‍लर्कों की ड्‌यूटी अकेला कर रहा हूं। पिछले दस साल से हमारे यहां नयी भर्ती नहीं हुई और जो रिटायर होते गये उनका काम भी अकेले मुझ पर आ पड़ा है। अब बताओ ओवर लोडिंग हुआ कि नहीं!

मुझे हां कहना ही पड़ा क्‍योंकि परसादी की बात दमदार और वजनदार थी। मुझे इस बात का भी गम था कि वाहनों की ओवर लोडिंग में मालिक को ज्‍यादा कमाई होती है लेकिन बेचारे परसादी की तो पिदाई ही ज्‍यादा होती है। सूखकर कांटा हुआ जा रहा है। उसकी ओवर लोडिंग का सुख मालिकों को मिलता है जबकि उन्‍हें सजा मिलनी चाहिए।

 

परसादी को यह भी शिकायत थी कि जिनके पास काम का ओवर लोड नहीं है वे इधर-उधर मुंह मारते फिरते हैं और वे ही शिकायत करते रहते हैं कि वे अपना काम समय पर नहीं निपटाते और दफ्‍तर में रात तक बैठे-बैठे बिजली का खर्च बढ़ाते रहते हैं। बेचारा चौकीदार घण्‍टों इनका काम खत्‍म होेने का इंतजार करते हैं कि वह कब जाये और रूम का ताला लगाये। परसादी की मुसीबत यह है कि वह अपने काम के ओवरलोड की शिकायत लेकर जब अपने मालिक के पास जाता भी है तो उसे उल्‍टा उलाहना मिलता है कि काम टाइम पर पूरा करते नहीं और मुंह लटकाए चले आते हो। इधर परसादी है कि अपनी जबान पर ताला लगाये फाइलों में माथा गड़ाये गर्दभराज की भांति काम करता रहता है। उसे डर है कि यदि उसने अपनी जबान का ताला खोला तो उसके पेट पर ताला पड़ सकता है। यह भी आरोप मढ़ दिया जायेगा कि काम चोर कहीं का, कोरे बहाने बनाता है।

वह दिन भर सिर झुंझलाते हुए अपनी किस्‍मत को कोसता है और रात में सपने देखता है कि काश! उसे भी सरकारी सांड बनने की ‘जूण' मिल जाती तो कितना मजा आता। वह भी ‘फाइव डे वीक' का लुत्‍फ उठाकर अपना जीवन धन्‍य कर लेता। परसादी को तो यही लगता है कि फाइव डे वीक में भी परनाला तो वहीं गिर रहा है जहां पहले गिरता था। रेलें भी जब समय पर नहीं चलती तो कर्मचारी कहां से समय पर चलने की सीख लेंगे। यही नहीं उन अधिकारियों-कर्मचारियों के ठाठ तो और भी निराले हैं जो काम नहीं करते लेकिन हर पहली तारीख को जेबें फुल भर कर ले जाते हैं। ‘ओवर लोडिंग' शब्‍द से तो उनका कभी परिचय ही नहीं हुआ।

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(फारूक आफरीदी)

ई-916, न्‍याय पथ,

गांधी नगर, जयपुर-302015

ईमेल - farooq.afridy@gmail.com

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