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August 2009
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1 घुटन

 

घुटती हूं मैं

जब-जब याद आते हैं वो लम्हे !

 

चलती राह पर

साइकिल लिये जा रही थी

अचानक लगा

कोई पीछा कर रहा है

उसने अपनी साइकिल

मेरे आगे की ओर कहा

फिल्म देखने चलोगी

मैंने अनदेखा, अनसुना किया

थोड़ी दूरी पाटने के बाद

फिर वही हरकत

मैंने साइकिल आगे निकाली

फूल स्पीड के साथ

टांगें कांप रही थी

हैंडल कस कर पकड़ा

मानो सडक पर

मैं अकेली चली जा रहीं हों

लेकिन उतनी ही स्पीड के साथ

पीछा होता रहा

कब तक आगे निकलती ?

फिर वही हरकत

साइकिल बराबरी पर थी

चलती रही

अंदर एक आग लिए

आग से जलन पैदा हुई

सहन कब तक करती ?

सीधा तमाचा मुंह पर !

नाउम्मीद थी

हड़बड़ाकर, सीधा सडक पर गिरा

दाई और मेन सडक पर

गुजर रही तूफानी कार ने

तुरन्त ब्रेक लगाये

टायर चरमरा गये

एक अनहोनी टल गयी

दोनों ओर से आवाजें आईं

लेकिन दम घुट गया

सड़क पर जमा भीड़ को देखकर

बच गया, बच गया

मर ही गया होता

भगवान का शुक्र है

दूसरा व्हीकल नहीं आ रहा था

बीबी बच्चे बर्बाद होने से बच गए

बेचारा बाल-बाल बचा ।

मैंने भीड़ को देखकर कहा-

बीबी, बच्चों का पेट भरने के लिए

पैसे नहीं होते

राह चलती को फिल्म दिखा रहा है

जवाब मिला-

'तुम्हारा इससे क्या बिगड़ गया

फिल्म दिखाने के लिए ही पूछा था'

तुमने तो इसकी जान ही ले ली थी

भीड़ मेरी नहीं उसी की थी

मैंने साइकिल उठाई

चल पड़ी अपनी मंजिल की ओर

एक घुटन भरा अहसास लिए

 

घुटती हूं मैं

जब-जब याद आते हैं वो लम्हें !

---

 

विश्वविद्यालय का खुला

हरा भरा वातावरण

रंग-बिरंगे, हरे-भरे फूल

मानो जिन्दगी में

कुछ कर गुजरने का संदेश दे रहे हो

कांटों के बीच खिलना, हंसना सिखा रहे हो

अचानक पीछे कदमों की आहट सुनी

कान के पास फुसफुसाहट आई

कहाँ जा रही हो?

संक्षिप्त सा जवाब-'सैन्ट्रल लाइब्रेरी'

नैट की तैयारी कर रही हो !

दूसरा सवाल , जवाब -'हूँ'

पास होना चाहती हो

वी.सी. का बेटा मेरा दोस्त है

जे.आर.एफ. करवा देगा, अदा से कहा

लालच !

शिकारी, शिकार को फंसाने का

जाल बुन रहा था

गरीबी से जूझती लड़की

टूट गयी, जे.आर.एफ. के लालच में

कहा, जे.आर.एफ. करवा देगा ?

जवाब हाँ में था

चण्डीगढ घर पर जाना होगा

सुबह चलेंगे, शाम को वापिस

 

लेकिन मेरे पास किराए के पैसे नहीं

वहां तक का किराया बहुत लगता है

मैं दूँगा उधार

सूद सहित वापिस लूँगा ।

पहली बार छात्रावास से बाहर जा रही हूँ

अकेली एक अजनबी के साथ

अन्दर से सहमी, डरी हुई

लेकिन कोई चारा नहीं था

पचास रुपये उधार लिए जो अपर्याप्त थे

स्वाभिमानी भी थी

लेकिन लाचार और मजबूर भी

 

सुबह बस खाली सड़क पर

भागी जा रही थी

चण्डीगढ आ गया,

लेकिन पता चला आगे जाना पड़ेगा

वह बाहर गया है ।

सोचा,यहां तक आ गये हैं

थोड़ा और सही

चण्डीगड़ से कालका बस में बैठ गये

बस फिर दौड़ने लगी

पूछा, कितनी देर लगेगी पहुंचने में

जवाब मिला आने वाला है

छटपटाहट में खिड़की से बाहर झांका

बाहर घना अंधेरा था

सब कुछ धुंधला सा नजर आ रहा था

अचानक साइन बोर्ड पर ध्यान गया

लिखा था कालका २० किलोमीटर

खतरे की घण्टी बज गयी

चाय-पानी के लिए बस स्टाप पर रुकी

कहा, बहुत प्यास लगी है

पानी पीकर आती हूँ

दूसरी ओर कंडक्टर की आवाज आई

कंडक्टर चण्डीगढ़ - चण्डीगढ़ चिल्ला रहा था

मेरे अन्दर से आवाज आई

अपने आपको बचा लो

इसके चुंगल से बचाओ अपने आपको

एक शक्ति अन्दर महसूस की

भागकर चलती-चलती बस में चढ़ गयी

धम्म से सीट पर बैठ गयी

जैसे खूंखार शेर के मुंह से हिरन

किसी तरह बच निकलता है,

दिल धक्क-धक्क कर रहा था

मानो कलेजा फट जाएगा

लग रहा था शेर अभी भी पीछे दौड़ रहा हो

लेकिन बस सडक पर दौड़ रही थी

नहीं पता था ! आगे का रास्ता कैसे होगा ?

पचास रुपये का टिकट था चण्डीगढ़ का

इसके बाद फूटी कौड़ी नहीं थी

मंजिल तक पहुंचने के लिए

 

चण्डीगढ़ पहुंची

बस स्टैण्ड पर खड़ी सोचती रही

क्या करुं ?आगे कैसे जाऊं ?

कुछ समझ नहीं आया

बस में बैठ गयी,

एक सुन्दर जवान लड़के के पास

कहा, मेरा पर्स चुरा लिया है

मुझे भी टिकट लेनी है

उसने मेरी टिकट ले ली

आंखों में लालच की बू थी

इसके अलावा कोई चारा नहीं था

दोबारा मिलने का झांसा दिया

तीर निशाने पर लगा

और चल पड़ी अपनी मंजिल की ओर

एक घुटन भरा अहसास लिए

 

घुटती हूँ मैं

जब-जब याद आते हैं वो लम्हे !

----

 

चिलचिलाती धूप में

भूख-प्यास से दम निकला जा रहा था ।

कंकड़-पत्थरों से टकराते हुए

गंतव्य स्थल तक जाने को

दिल बेचैन था

पांव पूरे शरीर को घसीटते हुए लिए जा रहे थे

आखिर गर्मी से थोड़ा निजात पाने का जरिया मिला

सामने घनी छांव में खड़े लोग

बस का इन्तजार कर रहे थे

उस भीड़ में मैं भी शामिल हुई

सामने गुजरते हुए काले-काले अंगूर

रेहड़ी की शोभा बढ़ा रहे थे

मुंह में पानी आ रहा था

जीब अंगूर का स्वाद

चखने को बेताब थी

अंगूर खरीदकर खाने की गुंजाइश

जेब में नहीं थी

पांव अपने आप रेहड़ी की ओर बढ़ गये

पूछा, अंगूर कैसे दिए

सोलह रुपये पाव, जवाब मिला

सोलह से कम नहीं हो सकते

जवाब नहीं में मिला

अच्छा एक खाकर देखूं

दो अंगूर उठाये, मुंह में डाल लिए

जीभ की इच्छा पूरी हुई

कहा नहीं, मीठे नहीं है

कहकर चल पडी

पीछे से जवाब मिला

उम्र ही कुछ ऐसी है जो...

मैं कुछ नहीं कह सकी

और चल पड़ी

अपनी मंजिल की और

एक घुटन भरा अहसास लिए

 

घुटती हूँ मैं

जब-जब याद आते हैं वो लम्हे !

 

---

 

2. आम की फांक

 

रेहड़ी वाले ने पुकारा-

आम ले लो आम

मीठे-मीठे आम

पके हुए आम

लँगड़ा आम ले लो

 

दरवाजे में

चौखट के पास

बिछी हुई

खाट (चारपाई) पर

बैठा हुआ

छोटी, बड़ी लड़कियों का झुण्ड

रेहड़ी वाले की आवाज को सुनकर

बडे प्यार से

इत्मीनान से

प्यासी-प्यासी नजरों से

निहारता है

कभी आम वाले को

तो कभी

रेहड़ी में पड़े आमों को

 

जी मचल उठता है

ललचाई आंखें

ठहर जाती है

रेहड़ी पर रखे आमों पर

सभी एक-दूसरे के मुंह की ओर

ताकती हैं

आंखे आपस में टकराती है

मनों एक ही मंजिल हो

एक ही चाहत हो

एक ही प्यास हो

बस सिमट जाती है

सारी इच्छाएं

सारे सपने आमों पर

 

इतने पैसे किसी के पास

है नहीं

आम खरीदकर खा सके

दो जून रोटी

बामुशक्कत मिलती हो

आम का स्वाद

बडे दूर की बात है ?

 

सबकी आंखें

एक-दूसरे को ढाढ़स

सा देती है,

मानो बचपन में ही

सीख लिये हों

सपनों को

समेटने के तरीके

 

अनाज मण्डी से

चिलचिलाती

तपती धूप में

हाथों में झाडू

सर पर अनाज की

गठरी लिए

माँ

दरवाजे की चौखट पर

पाँव रखती है

 

खिल उठते हैं

सभी के चेहरे

कीचड़ में पैदा हुए

कमल के फूलों की तरह

मन मांगी मुराद

मानो पूरी हो गयी हो

 

 

बड़ी लड़की

अपने हाथों से सहारा

देती है

गठरी उतारने में

और छोटी

घड़े में से ठण्डा पानी

लाकर देती है

अपनी माँ को

 

खुशी-खुशी चहक उठती है

लड़कियाँ

रंग-बिरंगी

आकाश में उड़ती

तितलियों की तरह

 

एक बार फिर कहीं

दूर किसी गली से

आवाज कानों से

टकराती है

आम ले लो आम

मीठे-मीठे आम

पके हुए आम

लंगडा आम ले लो

 

कोई माँ

कोई ताई

कोई मौसी

कहकर चिल्लाती है

आम लाकर दो

आम लाकर दो...।

 

और माँ

गठरी खोलकर

कुछ अनाज

उनकी झोली में डालकर

दे देती है आम के लिए

अपनी प्यारी-प्यारी बेटियों को

सारी थकान काफूर

हो जाती है

उन खिले हुए

चेहरों को देखकर ।

 

अनाज को लेकर

लड़कियाँ

खरीद लाती है

एक आम

इकलौता आम

 

और माँ

बडे प्यार से

ममता का हाथ

सिर पर फेरकर

सबको बराबर-बराबर

दे देती है

चाकू से काटकर

छोटी-छोटी

आम की फांक ।

3. जीवन

 

जीवन तो है नाम एक ऐसी परिभाषा का

जिसमें आवागमन रहता आशा और निराशा का

निराशा को गले लगा आशा संग जिसने झेला है

सच मानो तो सच हुई उसकी यह जीवन बेला है ।

मीठा जीवन कड़वा जीवन, जीवन के कई रंग है

दुखों से तुम मत घबराना सुख भी आते संग है

धैर्य रख जीवन में जिसने दुखों को बाहर धकेला है

सच मानो तो सच हुई उसकी यह जीवन बेला है ।

तारों का अनुशासित रहना हमको यही सिखाता है

जीवन में मर्यादा हो तो सम्मान स्वयं मिल जाता है

घर-आंगन में लग जाता फिर तो खुशियों का मेला है

सच मानो तो सच हुई उसकी यह जीवन बेला है ।

बचपन यौवन और बुढ़ापा जीवन के ये अंग है

हर अंग में जीवन को जीने की नई उमंग है

उन उमंगों में जिसने रंगा मन का चेला है

सच मानो तो सच हुई उसकी यह जीवन बेला है ।

जन्म हुआ यदि जीवन का फिर मृत्यु भी तो आएगी

कितना भी बचा लेना पर लेकर तुमको जाएगी

पर संघर्ष करके हंसते-हंसते छोड़ा जिसने दुनिया का झमेला है

सच मानो तो सच हुई उसकी यह जीवन बेला है ।

 

 

4. अस्मत

 

हे ईश्वर ! तेरे सत्य और शक्ति को

अब मैं जान गई हूँ

तेरी दलाली और कमीनेपन को भी ।

शुक्र है तू कहीं नहीं है

केवल धंधे का ट्रेड नेम है

अगर सचमुच तू कहीं होता

तो सदियों की यातना का हिसाब

मैं तुझसे जरुर चुकाती ।

 

जिस तरह से हमने धिक्कार सहे

जालिमों के अत्याचार, अनाचार सहे

अपने शरीर पर लगे दाग सहे

भूख से तड़पते, कुचलते बाल सहे

अगर सचमुच तु कहीं होता

मैं तुझे दिखाती,

आकर देख

कैसे रोती है अस्मत ?

कैसे रोती है अस्मत ?

 

 

5. बेबसी

 

मैं आगे बढ़ने की तमन्ना करती हूं

क्यूं पांव मेरे पीछे ले जाते हैं

मैं हंसने की तमन्ना करती हूं

क्यूं आंसू मेरे छलक आते हैं

मैं चाहती हूं बयां करुं अपना अस्तित्व

क्यूं लेखनी मेरी कतराती है

दम घुटता है गमों को पीने से

क्यूं दर्द होंठों पर आकर ठहर जाता है ।

 

 

 

 

6. बेरी का पेड़

 

कैसी है जिन्दगी मेरी

ठीक बेरी के पेड़ की तरह

जो बीच चौराहे पर सीधी खड़ी

आने-जाने वाले राहगीरों को

चुपचाप देखती है

कभी तो सावन की फुहार पाकर

झूम उठती है

कभी बसन्त आने पर झड़ जाती है

जिन्दगी सफलता पाकर

अपने क्षैतिज को पा लेती है

खिल उठती है साकार सफलता से

लेकिन ...

जब टूटती है

बडे-बडे पहाड़ों को खाई बनते देर नहीं लगती

उस क्षण

जिन्दगी झड़ जाती है

बेरी के पेड़ की तरह ।।

 

खिल उठती है साकार सफलता से

लेकिन....

 

जब टूटती है

बडे-बडे पहाड़ों को खाई बनते देर नहीं लगती

उस क्षण

जिन्दगी झड़ जाती है

बेरी के पेड़ की तरह ।।

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सम्पर्क -

डॉ. कौशल पंवार

सहायक प्राध्यापक,

मोतीलाल नेहरू कालेज

दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

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चित्र – रेखा की कलाकृति – कागज पर स्याही से रेखांकन

सन् 1928 से लेकर 1935 के दस वर्ष के अछूतोद्धार आंदोलन का आकलन करें तो पुष्टि होगी कि यह आंदोलन दलितों के मंदिर प्रवेश तक केन्द्रित रहा। हिन्दू महासभा धर्म के नाम पर, गांधी जी राजनीति के प्लेटफार्म पर तथा मुंशी प्रेमचंद अपनी कहानियों, उपन्यासों और विचारों के माध्यम से अछूतों के लिए मंदिर प्रवेश की मुहिम छेड़े थे। इनका एक मात्र ध्येय यह था कि दलित अपनी दरिद्रता के बावजूद हिन्दू बने रहें। हिन्दू संस्कारों से सराबोर प्रेमचंद मंदिर मूर्ति को हिन्दुत्व का सच और सत मानते हैं।

प्रेमचन्द की 'मंत्र' 'सौभाग्य के कोड़े', 'मंदिर' जैसी कहानियाँ आईना हैं।

रंगभूमि उपन्यास तथा उनके मूल विचार भी इसी सूझ के संवाहक है। रंगभूमि में वे सूरदास नामक पात्र से अपनी मंशा प्रकट कराते हैं - ''यही अभिलाषा थी कि यहां एक कुआं और छोटा सा मंदिर बनवा देता, मरने के पीछे अपनी कुछ निशानी रहती।'' (रंगभूमि-भाग-7)

उन दिनों शिक्षा का प्रसार-प्रचार बहुत तेजी से हो रहा था, प्रेमचंद की प्रगतिशीलता यह थी कि वे मंदिर की बजाय शालाएं बनवाते। कहना होगा की मंदिर बनवा कर भी सूरदास का उस पर हक नहीं रह पाता। वहां कोई पुरोहित हक जमा लेता है और छुआछूत बढ़ती है। जहां मंदिर है, उनके ईद-गिर्द अस्पृश्यता उत्साही है।

सन् 1927 में लिखी गई विवेच्च कहानी 'मंदिर' पर एक नज़र।

प्रेमचंद 'मंदिर' कहानी में विधवा सुखिया, जो अछूत, अनपढ़ और अज्ञानी है, में मंदिर और मूर्ति के प्रति श्रद्धा की बारूद भरते हैं। उसे पति-दर्शन का स्वप्न दिखाया जाता है। स्वप्न की यह कला प्रवीणता तांत्रिक क्रिया में स्थान पाती है।

''तीन पहर रात बीत चुकी थी। सुखिया का चिंता-व्यथित चंचल मन कोठे-कोठे दौड़ रहा था। किस देवी की शरण जाए, किस देवता की मनौती करे, इस सोच में पड़े-पड़े उसे एक झपकी आ गई। क्या देखती है कि उसका स्वामी बालक के सिरहाने आ कर खड़ा हो जाता है और बालक के सिर पर हाथ फेर कर कहता है-''रो मत सुखिया, तेरा बालक अच्छा हो जाएगा। कल ठाकुर जी की पूजा कर दे, वही तेरे सहायक होंगे।'' यह कह कर वह चला गया। सुखिया की आंख खुल गई। अवश्य ही उसके पतिदेव आये थे। इसमें सुखिया को जरा भी संदेह नहीं हुआ। उन्हें अब भी मेरी सुधि है। यह सोच कर उसका हृदय आशा से परिप्लावित हो उठा। पति के प्रति श्रद्धा और प्रेम से उसकी आंखें सजल हो गईं। उसने बालक को गोद में उठा लिया और आकाश की ओर ताकती हुई बोली - ''भगवन, मेरा बालक अच्छा हो जाए, तो मैं तुम्हारी पूजा करूंगी, अनाथ विधवा पर दया करो।''

''उसी समय जियावन की आंखें खुल गईं। उसने पानी मांगा। माता ने दौड़ कर कटोरे में पानी लिया और बच्चे को पिला दिया।''

सपने जो प्रायः अवास्तविक और मिथ्या हुआ करते हैं, कहानी में यथार्थ और रूबरू बताया है। किसी विधवा की शोक संतप्त भावनाओं को भुनाने का इससे कारगर स्वांग दूसरा नहीं हो सकता। विश्वास और आस्था का इससे बड़ा सेतु और क्या हो, किसी का दिवंगत पति स्वप्न में आ कर यह यकीन दिला दे कि उसका बीमार बेटा ठाकुर जी की अर्चना से ठीक हो जाएगा। भूत-प्रेत, भाग्य-भगवान के प्रति अज्ञान वैसे ही उर्वरा है।

प्रेमचंद विधवा सुखिया के बच्चे का इलाज किसी डाक्टर, वैद्य अथवा हकीम से कराने की बजाय मूर्ति से करते हैं। वे उसमें मूति के प्रति ऐसी अंधश्रद्धा पैदा करते हैं कि सुखिया पागलपन की हद तक पहुंच जाती है।

कार्ल मार्क्स ने धर्म को अफीम की गोली कह कर उसे बेजरूरी बताया, प्रेमचंद धर्म को संजीवनी बूटी बता कर जीवन का सार सिद्ध करते हैं। धर्म दवा या दुआ के रूप में इंसान का हितैषी नहीं रहा। वह दगा या धूर्त्तता के बाने आदमी पर हावी रहा है। आदमी गरीब या अज्ञानी हो, धर्म जोंक बन जाता है। मंदिर और मूर्ति धर्म के निवेशी रूप है।

स्वामी विवेकानंद जो प्रेमचंद की ही जात विरादरी के थे, उन्होंने एक बात पते की कही है। संभवत प्रेमचंद का ध्यान उधर नहीं गया।

स्वामी जी कहते हैं- ''यदि ईश्वर है, तो हमें उसे देखना चाहिए, अगर आत्मा है, तो हमें उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति कर लेनी चाहिये। अन्यथा उन पर विश्वास न करना ही अच्छा है। ढोंगी बनने की अपेक्षा स्पष्ट रूप से नास्तिक बनना अच्छा है।''

यहां ढोंग 'मंदिर' कहानी का केन्द्रीय कथानक है।

स्वामी दयानंद सरस्वती जिनका बचपन का नाम मूलशंकर था, वे अपने घर परिवार में एक धार्मिक अनुष्ठान में उपस्थित हुए। जब सब सो गये, मूलशंकर के बालमन में भगवान के अस्तित्व के बारे में एक जिज्ञासा उत्पन्न हो गई। देखूं ईश्वर का रूप क्या है? बीती रात तक मूर्ति से भगवान प्रकट नहीं हुआ। हाँ सन्नाटे से आश्वस्त एक भूखा चूहा अपने भोजन के लिए भटकता हुआ वहां आया। वह बेखौफ वहां रखे ठाकुर जी के प्रसाद को खाता रहा। जब अफर गया, मूर्ति के पैर से होता उसके सिर चढ़ बैठा। बालक मूलशंकर को ज्ञान आया। इस ज्ञान ने उसकी समूची जिंदगी ही बदल दी। जो भगवान चूहे जैसे एक छोटे से जीव से अपने प्रसाद और खुद की सुरक्षा नहीं कर पाता, वह सर्वशक्तिमान और जग का पालनहार कैसे हुआ? भगवान मिथ्या है। आगे चल कर स्वामी जी ने भगवान के इसी मिथ्या रूप को जन-जन तक पहुंचाने के लिए सन् 1875 में आर्य समाज की स्थापना की। आर्य समाज ने न केवल भगवान के अस्तित्व को ही नकारा, बल्कि मंदिर और मूर्तिपूजा का भी पुरजोर खण्डन किया।

जो ठाकुर जी चूहे जैसे एक छोटे से जीव से अपने प्रसाद की रक्षा नहीं कर पाये, प्रेमचंद उन्हीं ठाकुर जी की मूर्ति की पूजा अर्चना के लिए सुखिया को प्रेरित करते हैं, कि उसका मरणासन्न पुत्र स्वस्थ हो जायेगा। बात यहां नोक बन जाती है कि स्वयं आर्यसमाज से जुड़े रह कर भी प्रेमचंद ने मंदिर कहानी लिखी। प्रगतिशील विचारों का कोई भी शख्स इसे बुद्धि का दिवालियापन कहे बिना नहीं सकता।

प्रेमचंद का ध्येय अछूतों को मंदिर प्रवेश तक ही था। अछूतों को आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी बनाने, शैक्षणिक दृष्टि से उनका उन्नयन कराने, सामाजिक दृष्टि से समानता लाने, छुआछूत मिटाने और सामूहिक भोज कराने की महात्मा फूले और गांधीजी जैसी प्रगतिशील सोच में उनकी दिलचस्पी कतई नहीं थी।

वे कहते हैं - ''खाने पीने की सम्मिलित प्रथा अभी हिन्दुओं में नहीं है, अछूतों के साथ कैसे हो सकती है? शहरों में दो चार सौ आदमियों के अछूतों के साथ भोजन कर लेने से यह समस्या हल नहीं हो सकती, शादी ब्याह इससे भी कठिन प्रश्न है। जब एक ही जाति की भिन्न-भिन्न शाखाओं में शादी नहीं हो सकती, तो अछूतों के साथ यह संबंध कैसे हो सकता है ?

(प्रेमचंद के विचार भाग-2, हरिजनों का मंदिर प्रवेश का प्रश्न, पृष्ठ-16, नवम्बर 14,1932)

प्रेमचंद के ये विचार डॉ. अम्बेडकर के विचारों का भी सीधा प्रतिकार है। डॉ. अम्बेडकर अपनी हर सभा में कहते थे कि साथ-साथ रहने, सामूहिक भोजों का आयोजन करने तथा अन्तर्जातीय विवाहों की परम्परा प्रारंभ करने से ही जातिभेद और अस्पृश्यता का विनाश हो सकता है।''

बाबा साहब के प्रयास से नागपुर में अछूत छात्रों के लिए एक अलग छात्रावास बना था, ताकि वे छात्र छुआछूत और जात-पांत के साया से दूर, यहां रह कर अपना शैक्षणिक विकास कर सकें। यह सद्कार्य प्रेमचंद की आंख की किरकिरी बन गया।

''नागपुर में हरिजन बालकों के लिए एक अलग छात्रावास बनाया गया हैं। इससे तो अछूतपन मिटेगा नहीं और दृढ़ होगा। उन्हें तो साधारण छात्रालयों में बिना किसी विचार के स्थान मिलना चाहिये। (प्रेमचन्द के विचार भाग-2/हरिजन बालकों के लिए छात्रालय/पृष्ठ 20/5 दिसम्बर, 1932)

प्रेमचंद अपने विचारों की एकरूपता से पीछे हटते हैं। 14 नवम्बर, 1932 के लेख में ये कहते हैं कि खाने पीने की सम्मिलित प्रथा अभी तक हिन्दुओं में ही नहीं है, अछूतों में कैसे हो सकती है? इसके 21 दिन बाद अर्थात 5 दिसम्बर, 1932 के लेख में लिखते हैं कि उन्हें तो साधारण छात्रालयों में बिना किसी विचार के स्थान मिलना चाहिये। (बिन पेंदे का लौटा उन्हीं का ईजाद किया मुहावरा है) यानि दलितों के प्रत्येक साहसिक कदम का उन्होंने विरोध किया।

अगर प्रेमचंद की बात भारत में लागू हो जाती, तो करोड़ों-करोड़ दलित छात्र-छात्राओं का भविष्य नहीं बन पाता। एक अनुमान के अनुसार आज भी पूरे भारत में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए जो पृथक छात्रावास संचालित किये जा रहे हैं, उनमें 80 लाख छात्र-छात्राएं अध्ययन कर रहे हैं। राजस्थान सरकार के छात्रावासों में 28 हजार विद्यार्थी रहते हैं। प्रेमचंद के विचारों में दकियानूसीपन और विचलन दोनों ही थे।

वे दलितों के साथ खान-पान और अलग छात्रावास बनाने का भी विरोध जताते हैं। उनका आशय प्रत्यक्षतः यह हैं कि दलितों को शिक्षा से अलग किये रखो, तभी वे मंदिर और मूर्ति में आस्था रख हिन्दू धर्म को बहुसंख्यक बनाये रहेंगे।

आइये 'मंदिर' कहानी की ओर बढ़े -

''दिनभर जियावन की तबीयत अच्छी रही। ...... जाड़े के दिन झाडू-बुहारी, नहाने-धोने और खाने-पीने में कट गये। मगर जब संध्या समय फिर जियावन का सिर भारी हो गया, तब सुखिया घबरा उठी। तुरंत मन में शंका उत्पन्न हुई कि पूजा में विलंब से ही बालक फिर से मुरझा गया है। अभी थोड़ा सा दिन बाकी था। बच्चे को लेटा कर वह पूजा का सामान तैयार करने लगी। फूल तो जमींदार के बगीचे से मिल गये। तुलसीदल द्वार पर ही था। पर ठाकुर जी के भोग के लिये कुछ मिष्ठान चाहिये, नहीं तो गांव वालों को बांटेगी क्या? चढ़ाने के लिए कम से कम एक आना तो चाहिए। सारा गांव छान आयी कहीं पैसे उधार नहीं मिले। अब वह हताश हो गयी। हाय रे अदिन! कोई चार आने पैसे भी नहीं देता। आखिर उसने अपने हाथों के चांदी के कड़े उतारे और दौड़ी हुई बनिये की दुकान पर गई। कड़े गिरो रखे, बताशे लिए और दौड़ी हुई घर आई। पूजा का सामान तैयार हो गया, तो उसने बालक को गोद में उठाया और दूसरे हाथ में पूजा की थाली लिए मंदिर की ओर चली।'' (मंदिर)

सुखिया का लड़का जियावन दिन भर ठीक रहता है। संभवतः उसे मियादी बुखार जैसी कोई बीमारी हो। इस बीमारी के चलते मरीज दिन में अपेक्षाकृत स्वस्थ महसूस करता है, लेकिन संध्या होते उसकी तबीयत नासाज होने लगती है।

यहां कहानी अंधविश्वास के पहलू में चली जाती है। बालक की बीमारी से आजिज सुखिया बालक को गोदी में लिए तथा दूसरे हाथ में पूजा का थाल लिए मंदिर के द्वार पर जा खड़ी होती है।

पुजारी बोले- ''तो क्या भीतर चली आएगी? हो तो चुकी पूजा। यहां आकर भी भ्रष्ट करेगी?''

सुखिया ने बड़ी दीनता से कहा- '' ठाकुर जी के चरण छूने आई हूं, सरकार पूजा की सब सामग्री लाई हूं।''

पुजारी- ''कैसी बेसमझी की बात करती है, रे। कुछ पगली तो नहीं हो गई। भला तू ठाकुर जी को कैसे छुएगी?''

सुखिया को अब तक ठाकुर द्वारे में आने का अवसर नहीं मिला था। आश्चर्य से बोली- ''सरकार वे तो संसार के मालिक हैं, उनके दर्शन से तो पापी भी तर जाता है, मेरे छूने से उन्हें कैसे छूत लग जाएगी?''

पुजारी- ''अरे, तू चमारिन है कि नहीं रे?

सुखिया- ''तो क्या भगवान ने चमारों को नहीं सिरजा है? चमारों का भगवान कोई और है? इस बच्चे की मनौती है सरकार।'' इस पर वहीं एक भक्त महोदय, जो अब स्तुति समाप्त कर चुके थे, बोले- 'मार कर भगा दो चुड़ैल को। भ्रष्ट करने आई है। फेंक दो थाली वाली। संसार में तो आप ही आग लगी हुई है। चमार भी ठाकुर जी की पूजा करने लगेंगे, तो पिरथी रहेगी कि रसातल को चली जाएगी।'

यहां रूढ़िवादिता है। धर्म का महिमा-मण्डन कहानी का देशकाल बन जाता हैं। धर्म भीरूता कहानी के रोंए रेशे हो जाते हैं। कहानी में ब्राह्मणत्व और शूद्रत्व का वर्ण व्यवस्था की दृष्टि से नाप-जोख होती है। कहानी सनातनी संस्कारों में पलती बड़ी होती है, जहां एक जाति विशेष के प्रति पूर्वाग्रह पानी पर काई की तरह तैरते हैं, वहीं कहानी मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक सरोकारों और समय सापेक्ष बदलाव से पूरी तरह मुंह फेरे है। ''कलम का सिपाही'' भीख को सम्मान और श्रम को अपमान मानता है।

मुंशी प्रेमचन्द दलितों के प्रति जिस भाषा का प्रयोग करते हैं, वह भी हृदय चीरती है। चूंकि पूरी तरह दुराग्रही, फूहड़ और असंतुलित है। उनकी कहानियों और उपन्यासों में चमारिनों के लिए चुड़ैल और चमारों तथा आदिवासियों के लिए चाण्डल जैसे निकृष्टतम शब्द बहुधा प्रयुक्त हुए हैं। लांछनिक भाषा का यह प्रयोग खून निकालता है। वरिष्ठ लेखक विभूति नारायण राय की बात जंचती है। परोक्षतः उनका संकेत प्रेमचन्द द्वारा दलित पात्रों के लिये अपनायी भाषा की ओर है।

''देश के जिन भागों पर वर्णव्यवस्था की जकड़न जितनी मजबूत थी, उनकी भाषा उतनी ही क्रूर और दुर्बल विरोधी थी। हिन्दी का उदाहरण लें तो स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। दलितों और स्त्रियों को ले कर तमाम गालियां हैं।'' (वर्णाश्रमी असभ्यता/विभूतिनारायण/अन्यथा/अंक-4/अगस्त, 2005/पृष्ठ 83)

''मंदिर'' कहानी धर्मान्धता की ओर बढ़ चली है। 'पुजारी संभल कर बोले- ''अरी पगली ठाकुर जी भक्तों के मन के भाव देखते हैं, कि चरणों पर गिरना देखते हैं। सुना नहीं है - 'मन चंगा तो कठौती में गंगा।' मन में भक्ति न हो तो लाख कोई भगवान के चरणों में गिरे, कुछ न होगा। मेरे पास एक जंतर है। दाम तो उसका बहुत है, पर तुझे एक ही रूपये में दे दूंगा।''

सुखिया - ''ठाकुर जी की पूजा न करने दोगे?''

पुजारी - ''तेरे लिए इतनी ही पूजा बहुत है। तू यह जंतर ले जा, भगवान चाहेंगे, तो रात ही भर में बच्चे का क्लेश कट जाएगा। किसी की दीढ़ पड़ गई हैं। है भी तो चोंचाल। मालूम होता है, छतरी बंस है।''

''मालूम होता है, छतरी बंस है।''

यहां सुखिया के चरित्र पर सीधा लांछन है, चरित्र हीनता का। प्रेमचन्द कहना यह चाहते हैं कि वह लड़का उसके मृत पति का खून नहीं, किसी गैर (क्षत्री) की जारज संतान है। सुखिया गरीब है। चमार है। बीमार बच्चा उसकी गोदी में है, चारों ओर से बिंधी क्या कहे बेचारी। महिलाओं के चरित्र को ले कर प्रेमचंद कुछ ज्यादा ही संशयी और अविश्वासी रहे हैं।

''गोदान'' के नारी पात्रों में सिलिया का चरित्र सबसे पतित है, क्यों कि वह चमार है। ''मंदिर'' की सुखिया चमारिन पर सीधा यह लांछन है कि उसका बेटा छतरी बंस है। क्यों कि वह चमार है। यहां छतरी बंस होना कहानी की मांग नहीं है, लेकिन वर्णवादी मानसिकता लेखक का पीछा नहीं छोड़ती। अपनी यौन शुचिता के कारण जहां गांव को स्वर्ग कहा गया है, वहीं प्रेमचन्द ग्रामीण पात्रों में यौनिक व्यवहार की अति दिखाकर गांव को नरक सिद्ध करते हैं।

एक सृजन होता है, सार्वभौम, और दूसरा होता है, स्वभौम। स्वभौम लेखन में अपने आग्रहों, पूर्वाग्रहों और कुंठाओं के चलते लेखक खुद आनंद विभोर रहता है। दलित पात्रों को गढ़ते प्रेमचंद ने चटकारों के साथ खूब मजे लिए हैं, चाहे दूसरों को खून निकलने लगे।

''रात के तीन बज गये थे। सुखिया ने बालक को कंबल से ढक कर गोद में उठाया, एक हाथ में थाली उठाई और मंदिर की ओर चली। घर से बाहर निकलते ही शीतल वायु के झोंकों से उसका कलेजा कांपने लगा। शीत से पांव शिथिल हुए जाते थे। उस पर चारों ओर अंधकार छाया हुआ था। रास्ता दो फर्लांग से कम न था। पगडंडी वृक्षों के नीचे-नीचे गई थी। कुछ दूर दाहिनी ओर एक पोखरा था, कुछ दूर बांस की कोठियां। पोखरें में एक धोबी मर गया था और बांस की कोठियों में चुडैलों का अड्डा था। ...... चारों ओर सन्न-सन्न हो रहा था, अंधकार सायं-सायं कर रहा था। सहसा गीदडों ने कर्कश स्वर ने हुआं-हुआं करना शुरू किया। हाय! उसे कोई एक लाख रूपये भी देता, तो भी वह इस समय न आती, पर बालक की ममता सारी शंकाओं को दबाये हुए थी। हे भगवान! अब तुम्हारा ही आसरा है। यह जपती मंदिर की ओर चली जा रही थी।''

यहां प्रेमचंद अंधविश्वास के पम्फलेट के रूप में प्रस्तुत हुए हैं। किसी पात्र के संवाद स्वरूप नहीं, खुद की अभिव्यक्ति लेकर। भूतप्रेत, प्रेतात्मा, चुडैलों, भाग्य-भगवान, पुनर्जन्म तथा मंदिर-मूर्ति को लेकर प्रेमचंद की पच्चीस-तीस कहानियां है। जाहिर है, इन सबमें उनकी अटूट आस्था थी।

''बांस की कोठियों में चुडैलों को अड्डा था''।

यहां प्रेमचंद कहानी में किसी तांत्रिक के मायाजाल की भांति विश्वास जताते हैं, मानो चुडैलें शरीरी हो। लेखक उनके अड्डे पर बैठ कर उनसे बोले हों, बतियाते हों। अगर अंध के प्रति सृजन का यही यकीन प्रगतिशीलता की श्रेणी में आता है, तो प्रगतिशीलता का नाम फरेब, पाखण्ड या रूढ़िवादिता रख दें!

अपने बीमार बच्चे को कंबल में लिपटा कर गोदी में लिए दूसरे हाथ में पूजा की थाली लेकर सुखिया भरी रात मंदिर द्वार पहुंच गई है। मंदिर के गेट पर ताला पड़ा था। पुजारी मंदिर में बनी कोठरी में किवाड़ बंद किये सो रहा था। कहानी के अनुसार चहुंओर घना अंधकार छाया था। सुखिया ने चबूतरे के नीचे से ईंट उठा ली और जोर-जोर से ताले पर पटकने लगी।

विरोधाभास के कारण यहां कहानी लचर हो जाती है। कहानी में आये विभिन्न घटनाक्रम के अनुसार सुखिया का टाबर तीन साल से सात साल तक बैठेगा। जब वह उसे खेत में साथ ले जाती है और उसके लिए घास छीलने के लिए छोटी सी खुरपी और झीका बनवाने की कहती है, वहां वह बालक निश्चित तौर पर 3-4 साल का है। रात जब वह थोड़ा ठीक होता है और जिस तरह बतियाता है और गुड़ खाने की जिद्द कर गुड़ की डली खा जाता है। वहां वह बालक 4-5 साल का है और जब वह घर से चल कर मंदिर तक खेलने चला आता है, वहां बालक जियावन निश्चित तौर पर 6-7 वर्ष का है। यानि 6-7 वर्ष का बालक कंबल में लिपटा था, दूसरे हाथ में पूजा की थाली थी, सुखिया चबूतरे के नीचे से ईंट उठा, मार-मार ताले को तोड़ डालती है।

जब कोई आदमी अंदर सोता है तो स्वाभाविक है कि वह ताला भी अंदर की ओर ही लगा कर सोएगा। मंदिरों के गेट भी लकड़ी के भारी तख्तों के हुआ करते थे, जो गांव के छुट्टे सांड और भैंसे की धूण से ना हिलें। यहां यह बात पाठक की समझ से परे है कि गोदी में कंबल लिपटा बीमार बच्चा, दूसरे हाथ में पूजा की थाली लिये सुखिया गेट के अंदर लगे ताले को ईंट मार-मार कर तोड़ती है।

द्वार पर ताला टूटने की आवाज सुन कर कोठरी में सोया पुजारी लालटेन हाथ में लिए बाहर निकल आया। उसने जोर-जोर से हल्ला करके गांव जुटा लिया था।

फिर क्या था, कई आदमी झल्लाये हुए लपके और सुखिया पर लातों और घंूसों की मार पड़ने लगी। सुखिया एक हाथ से बच्चे को पकड़े थी और दूसरे से उस की रक्षा किये थी।

पूजा की थाली ''मंदिर'' कहानी का जीव है। सुखिया एक हाथ से बच्चे को पकड़े थी और दूसरे हाथ से उसकी रक्षा किये थी। थाली न छिटकी, न गिरी, न उछली फिर गई तो गई कहां। सुखिया जब ईंट उठा कर ईंट मार-मार कर गेट का ताला तोड़ती हैं तब भी थाली ओझल रहती है। जितना बड़ा लेखक, उससे बड़ी चूक।

''बीमार बच्चा सुखिया के हाथ से छिटक कर फर्श पर गिरा और ठण्डा हो गया। अपने कुलदीपक के बुझते ही सुखिया बिफर पड़ी। उसकी दोनों मुट्ठियां बंध गईं। दांत पीस कर बोली- ''पापियों, मेरे बच्चे के प्राण ले कर दूर क्यों खड़े हो?''

आंसू बहाती सुखिया कहती है - ''तुम सबके सब हत्यारे हो। निपट हत्यारे। डरो मत, मैं थाना कचहरी नहीं जाऊंगी। मेरा न्याय भगवान करेंगे। अब उन्हीं के दरबार में फरियाद करूंगी।''

इतना कह कर सुखिया भी मूर्च्छित होकर वहीं गिर पड़ी और उसके प्राण पंखेरू उड़ जाते हैं। लेखक ने ठाकुर जी की मनौती के लोभ में उसके गहने ठगा दिये। इकलौते पुत्र की नृशंस हत्या करा दी। सुखिया का आत्मघात करा दिया।

हद यहां की प्रेमचंद सुखिया को थाना कचहरी न पहुंचा कर भगवान के दरबार में फरियादी के रूप में भेजते हैं। किसी न किसी कथानक के बहाने दलितों की हत्या कराना, उन्हें मरवान, कुटवाना, पशुवत व्यवहार, दलित औरतों को रखैल बना देना प्रेमचन्द के सृजन का सूत्र रहा है। यह सूत्र मनुस्मृति का मानस- पुत्र है।

प्रेमचंद कहानी के अंतिम वाक्य में दकियानूसी की जड़ों को और मजबूती प्रदान करते हैं।

''माता तू धन्य है। तुझ जैसी निष्ठा, तुझ जैसी श्रद्धा, तुझ जैसा विश्वास देवताओं को भी दुर्लभ है।''

प्रेमचंद का यहां आशय यह है कि विधवा सुखिया ने अपने बीमार बच्चे की दवा मूली कराने की बजाय मंदिर और मूर्ति (भगवान) में जो विश्वास व्यक्त किया, वैसा देवताओं को भी दुर्लभ है। कितना बड़ा वितंडा है। यह सोच प्रगतिशीलता है? आश्चर्य यह है कि यह कहानी वर्षों विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रम में रही।

प्रेमचंद को साहित्य जगत में मूर्ति मान लिया गया। मूर्ति के प्रति, सिर्फ आस्था ही प्रकट की जा सकती है। उसके चरित्र, अस्तित्व, आकार-प्रकार और नखशिख की आलोचना करने वाला विधर्मी माना जाता है। दरअसल प्रेमचंद को आज तक आराधना की दृष्टि से पढ़ा गया है। अलोचना की दृष्टि से उनके लेखन का अध्ययन नहीं हुआ। यदि उनके सृजन में आई अपरिपक्वता, अव्यावहारिकता, खामियों, पाखण्ड, ईश्वरवाद और उनके कट्टरपंथी बाना पर शोध कार्य हो तो इसके 'आऊटपुट' से कई किताबें निकल सकती हैं।

पुनश्चः - 'मंदिर' जैसी कहानी राजेन्द्र यादव को हंस के लिए भेजी जाये, तो वे उसे गीताप्रेस गोरखपुर का प्रोडेक्ट मान कर अविलंब लौटा दें।

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रत्नकुमार सांभरिया

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तुम हवाओं से लड़े हो

वीर हो तुम!

थक गए होगे

जरा विश्राम कर लो

वृक्ष की छाया

तुम्‍हें शीतल लगेगी

इस नदी का जल

तुम्‍हें मीठा लगेगा

क्रोध को तुम शांत कर लो

फिर जरा सोचो-विचारो,

क्‍यों लड़े हो वायु से तुम ?

पेड़ तुमने काट डाले

नीर में क्‍यों विष उड़ेला ?

कोई इनमें जन्‍मदाता

कोई है जीवन-प्रदाता

क्‍यों तुम्‍हारे शत्रु हैं फिर ?

वायुमंडल में धुआं है

वृक्ष के बस ठूंठ बाकी

और नदियों में

प्रवाहित हो रहा है

मल हमारा और विष्‍ठा

क्‍यों ․․․․․

जरा सोचो –विचारों,

वीर हो तुम!

इसलिए ही लड़ रहे हो

उन सभी से

जो तुम्‍हारी सांस में हैं

और तन मन में बसे हैं

हां, यही सच है तुम्‍हारा,

हम उन्‍हीं से जीत पाते

जो सगे होते हमारे

ये विरासत की लड़ाई

चल रही उनसे यहां

जो हैं हमारे बंधु-भाई․

धर्मयुद्ध में लिप्‍त हो तुम

जीत भी होगी तुम्‍हारी

युद्ध का जब अंत होगा,

गर्व से होगे खड़े तुम

पर तुम्‍हारे पास क्‍या

होगी मधुर-शीतल पवन,

और जब तुम

मृत्‍यु-शैया पर पड़े होगे

कहां से लायेंगे

वशंज तुम्‍हारे शुद्ध गंगाजल

बताओ․․․․․

या जरा सोचो-विचारो․

---

 

(राकेश भ्रमर)

सी․बी․आई․

कैराव्‍स कामर्शियल काम्‍प्‍लेक्‍स,

ए विंग, दूसरा माला,

15, सिविल लाइन्‍स,

जबलपुर- 482001․

ईमानदारों का साथ भगवान देता है । सच्‍चों का साथ भगवान देता है , इसी बूते पर पिछले महीने साहब से पंगा ले लिया । तय माना था कि भगवान निर्बल का साथ देंगे । पर अफसोस , भगवान ने अबके भी बास का ही साथ दिया और मुझे मरवा दिया। मेरी रातों की नींद ,दिन की चैन जो थोड़ा बहुत बचा था वह भी गायब । फिर परम मित्र की शरण में जा बेईमानी ,मक्‍कारी को साक्षी मानकर कसम खाई कि मर जाए जो ईमानदारी ,सच के मामले में खुद के साथ भगवान के खड़ा होने पर विश्‍वास करे ।अब जब-जब देह धारण करुंगा बास तो क्‍या , बास के कुत्‍ते से भी पंगा नहीं लूंगा । वह पत्‍नी को झांसा दे पीए के साथ मटरगश्‍ती करता है तो करता रहे । मैं कौन होता हूं किसी पर बदचलनी का आरोप लगाने वाला ? जब बास की मेहरबानी होगी तो अपुन भी.....

बड़ी मुश्‍किल से बास के कारकूनों को पटा साहब के निकट पहुंचा । जान में जान आई ! सुबह का भूला महीने बाद बाद घर लौटा ! घर में खुशियों के दीप जले । घी बाती सब बास की दया से जनता के ।अपनी तो बस माचिस ! जिधर चाहा ,लगा दी ।

असीम पीड़ा भोगने के बाद मैं तो इसी निष्‍कर्ष पर पहुंचा हूं कि बास को बाप कहिए ,आठों याम मलाई चाटते रहिए । बास चाहे गधा ही क्‍यों न हो । आपको क्‍या जरूरत पड़ी है गधे को गधा कहने की ? बाकियों के दिमाग नहीं है क्‍या ? जो गधे के आगे दुम हिला रहे होते हैं ? आपको क्‍या जरुरत पड़ी है चोर को चोर कहने की ? उसकी हिम्‍मत है । औरों की आंखें फूटी हैं क्‍या ? आपको क्‍या जरुरत पड़ी है बास को आवारा कहने की ? जिनकी बीवियां बाल डाई करवा बास के साथ घूमती रहती हैं जब उनके पतियों को ही चिन्‍ता नहीं ,तो आप कौन होते हो दिन -रात चिन्‍ता में घुलने वाले ? बास पर कीचड़ उछालने वाले ? ज्‍यादा खारिश हो रही है तो अपने मुंह पर कीचड़ मलिए । खारिश चली जाएगी ।

बास की हां में जबसे हां मिलानी शुरू की है ,बल्‍ले बल्‍ले हो रही है । यदि आप भी मेरी तरह बल्‍ल बल्‍ले चाहते हैं तो बास से भूलकर भी पंगा न लें । वह जो भी कहे बस हां में हां मिलाते जाइए । आप के बाप का क्‍या जाता है ? विरोध में भी मुंह ही हिलाना है और समर्थन में भी , तो फायदे वाली जगह ही परिश्रम क्‍यों न किया जाए ? बन्‍धुओं, बास हर हाल में बास है बस ! भगवान हर हाल में भगवान चाहे न हो । अगर आप बास की हां में हां नहीं मिलाते तो नरक के अधिकारी हो सकते हैं । आज के बास यमराज नहीं डरते ,यमराज बास से डरते हैं तो आप फिर हैं किस खेत की मूली ?

यदि आप बास के कोप -प्रकोप से बचना चाहते हैं तो लीजिए मैनेजमेंट गुरू के कुछ फंडे - -

बास अगर दिन में कहे कि रात के बारह बजे हैं तो आप भी उसकी हां में हां मिलाइए ,आपके बाप का क्‍या जाता है ? अपने बास के सामने भूले से भी बास से बड़ा गधा होने का परिचय कभी न दें । चाहे आप उससे कितने ही बड़े गधे क्‍यों न हों । कारण ? आदमी हो या गधा ,अपने सामने अपने से बड़े को पसन्‍द नहीं करता ।

बास के सामने हमेशा भीगी बिल्‍ली बनें । घर में आप श्‍ोर हों या चीता ,इस बात का गरूर घर में ही छोड़ आएं । घर के श्‍ोर बास के सामने अक्‍सर कुत्‍ते ही साबित होते हैं । बास और बाप के आगे भीगी बिल्‍ली बने रहने में ही भलाई होती है ।

बास की सदा पिछाड़ी संभालिए । हराम का खाने की आदत डालिए । आदर्शों की बात कीजिए , मौका मिलते ही उन्‍हें ठुड्‌ड मार परे कीजिए। बास की उंगलियों पर नाचिए और मोक्ष के अधिकारी बनिए ।

बास का बाप बनने का कभी सपने में भी प्रयास न करें , भले ही बाप में बाप बनने के सारे अवगुण मौजूद हों । बाप के सामने बेटा बने रहने में भलाई होती है ,बेटा चाहे कितना ही लायक क्‍यों न हो !

हमेशा दफ्‌तर के काम के बदले बास का मूड टटोलते रहिए । बास किसी मामले में संवेदनशील हो या न , अपनी बात को मनवाने के मामले में बड़ा संवेदनशील होता है । बास को आपसे क्‍या पर्सनल उम्‍मीदें हैं , उन्‍हें जी-जान से पूरा कीजिए ।

बास से कटे नहीं । उसके पास हरदम बने रहने का मौका तलाश्‍ों । उसके साथ बने रहने का अवसर खोजते रहें । बास की सेवा के लिए आपको किन परेशानियों से गुजरना पड़ रहा है , भूल जाएं । सेवा बिन मेवा नहीं मिलता , हमेशा याद रखें । बास की सेवा को मां-बाप से ज्‍यादा प्राथमिकता दें ।

कुशल पटाऊ बनें । जो बास को पटाने में सफल होते हैं ,मलाई उन्‍हीं के जीभों को चिकना करती है । ऐसों पर बास सदा मेहरबान रहते हैं। इतिहास साक्षी है । बास की सेवा को ईश्‍वरीय सेवा समझें । बास के हर काम को दैवीय समझें । अगर आप इस विधा में निपुण हो गए तो समझो भव सागर पार हो गए ।

बास आपको डांटे भी तो उसका विरोध न करें । लेने के देने पड़ सकते हैं । मलाई वैसे भी चिकनी होती है । मलाई के लिए बास का सब कुछ पचा जाइए । स्‍वर्णिम भविष्य की भलाई इसी में है। बास को हमेशा चने के झाड़ पर चढ़ाए रखें । जब भी मौका मिले बास की प्रशंसा के झंडे गाड़ें । चापलूसी करने से कभी बाज न आएं । क्‍योंकि चापलूसी हमेशा कुछ न कुछ देकर ही जाती है । बास पर दीवारों के पीछे भी कमेंट न करें । दीवारों के भी कान होते हैं । दफ्‌तर में अपना कोई सगा नहीं होता हमेशा याद रखें ।

बास से कभी न बिगाड़ें । बाप से बिगड़ जाए तो बिगड़ जाए । तो देर किस बात की ? आप भी मलाई खाने हो जाइए तैयार ! हे बास ! तू ही माता ,तू ही पिता है , तू ही है मेरी जात , हे बास़ .... हे बास ...

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संपर्क:

डॉ.अशोक गौतम

गौतम निवास ,अप्‍पर सेरी रोड

नजदीक वाटर टैंक ,सोलन -173212 हि. प्र.

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एक बेबस सी औरत

जो खड़ी है ऐसे मंज़र पर

एक हाथ में कलम

दूसरे में दस्तरखान है

एक तरफ लज़ीज़ पकवान हैं

दूसरी तरफ दुःख की दास्तान है

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लोग बन्दों को खुदा बनाते हैं

मैंने खुदा को बन्दा बनाने की

हिमाकत की है

वो जो बोलता नहीं

समय से पहले अपनी गठरी खोलता नहीं

लोग कहते हैं

वही खुदा है

पर हर बन्दा जो हमको मिला

खुदा हो गया

खुदा की तरह न बोला न मुस्कराया

बस फना हो गया

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आज हवा में कुछ हरारत सी है

कोई हया से पिघल गया होगा

आज हवा में शरारत सी है

कोई शरीर दिल मचल गया होगा

आज हवा में कुछ नमी सी है

कोई आंख भिगो गया होगा

आज हवा में कुछ कमी सी है

कोई रुखसत हो गया होगा

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लोगों ने चिरागों को जलाया

रोशनी के लिए.

हमने तो चरागों से अपने ही

हाथों को जलाया है.

हमने जब-जब रोशनी को सजाना चाहा

अंधेरों को और बढ़ाया है

लोग तो मोहब्बत की खातिर दिलों को जलाते हैं

हमने तो मोहब्बत में ही जख्म पाया है

लोग तो दिलों को सजाते है दिलदार के लिए

हमने तो दिलदार से ही धोखा खाया है

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वो जो जा रहा है शबे गम गुजार करके

कोई रहगुजर नहीं है मेरा हमसफ़र नहीं है

मेरी जिन्दगी को इसने जख्मों जहर दिए हैं

मेरी सांसें औ जुबान कहीं गिरवी रख दिए हैं

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उसका नाम ड्रीमलेट था. पहाड़ी गांव की एक निश्‍छल, चंचल लड़की... पहाड़ी झरनों सी जंगल में भटकती थी. अपने गांव के अलावा उसे बाकी दुनिया के बारे में पता नहीं था. उसे बस चीड़ के पेड़ों, जंगल में उगी ऊंची-ऊंची घास ... सरसराती हुई ठण्‍डी हवा और पहाड़ी फूलों के बारे में पता था... और अगर पता था तो अपनी बकरियों, मुर्गियों और बत्त्‍ाकों का... हां उसने सुना था कि दक्षिण में जहां और भी ऊंचे पहाड़ हैं, एक शहर शिलांग है, जहां उसका बाप कभी-कभी खरीददारी के लिए जाता था.
हरी-भरी वादियों में खेलते-कूदते और बकरियां चराते वह जवान हो गई. खासी परम्‍परा के अनुसार उसके मां-बाप ने उसे पूरी छूट दे रखी थी कि वह अपनी पसंद के लड़के से शादी कर ले. फिर भी लेसमन लिण्‍डो का लड़का एल्‍विस लिण्‍डो खास पसंद था. वह मेहनती था, शराब का सेवन केवल विशेष अवसरों पर ही करता था. ज्‍यादा बातचीत करने का आदी नहीं था. ड्रीमलेट के मां-बाप का आदर भी करता था. अतः वे जब-तब एल्‍विस को अपने घर बुलाते रहते थे, ताकि ड्रीमलेट का झुकाव उसकी तरफ बढ़ सके. वरना क्‍या पता, जंगल में भटकते-भटकते वह किसी और लड़के के सपने न देखना शुरू कर दे. लड़कियों का क्‍या भरोसा... जवान होते ही ऐसा खिल उठती हैं कि लड़के भंवरों की तरह उनके ऊपर छा जाते हैं. फिर ऐसे में क्‍या कोई फूल अपनी खुशबू बचाए रख सकता है ?


पर ड्रीमलेट का इन सब बातों से कोई सरोकार न था. वह बकरियां चराती, जंगल में तितलियां पकड़ती और जंगली बेरों की तलाश में न जाने कहां-कहां भटकती-फिरती... मन ही मन पहाड़ी गीत गुनगुनाती... बकरियों के बच्‍चों को गोद में लेकर किसी पेड़ की निचली शाखा में बैठ जाती और बेर या प्‍लम खाती रहती.
अचानक एक दिन गांव में कुछ बाहरी लोगों का आगमन हुआ. उन्‍होंने गांव के नीचे एक खुली जगह में, जिसके पास से एक स्‍वच्‍छ जल का पहाड़ी सोता बहता था, अपने तंबू गाड़े. मुख्‍य सड़क से गांव तक आने के लिए कोई सड़क नहीं थी. परन्‍तु कुछ ही दिनों में पत्‍थरों को तोड़कर वहां एक कच्‍चा रास्‍ता बना दिया गया था. अब वहां एक जीप आसानी से आ-जा सकती थी.


ड्रीमलेट, जिसने अपने गांव के बाहर कभी कदम नहीं रखा था, बाहरी लोगों के क्रिया-कलापों को बड़े आश्‍चर्य से देखती. उसे उनका पहनावा बड़ा अच्‍छा लगता. उसके गांव के सारे लड़के ढीले-ढाले चोगे टाइप के कपड़े पहनते थे, परन्‍तु इन लोगों के कपड़े कितने साफ-सुथरे थे... और वह पता नहीं कौन सी भाषा बोलते थे, जो ड्रीमलेट की समझ में ही न आती थी. सुबह वे लोग पहाड़ों के ऊपर चले जाते और सारा दिन पता नहीं क्‍या नाप-जोख करते रहते, कागज में कुछ लिखते. फिर छोटे-छोटे यन्‍त्रों को चलाकर पता नहीं क्‍या-क्‍या करते रहते जो ड्रीमलेट की समझ के बाहर की चीज थी.


गांव के बच्‍चों के लिए यह सब किसी अजूबे से कम नहीं था. सारा दिन वे उन लोगों के पीछे-पीछे दौड़ते रहते. आपस में बातें करते और खिलखिलाकर हंसते रहते. ड्रीमलेट की दिनचर्या में भी अब परिवर्तन आ गया था. बकरियां चराने की तरफ अब उसका ध्‍यान नहीं था. जंगल में उनको चरने के लिए छोड़कर वह उन लोगों के पीछे दौड़ती रहती. उनकी बातें तो वह न समझ पाती, परन्‍तु आश्‍चर्य-मिश्रित खुशी से उनके कार्यों को देखती रहती.
धीरे-धीरे गांव के लोगों से वे हिल-मिल गये. गांव का मुखिया कई बार शिलांग जा चुका था, अतः वह टूटी-फूटी हिन्‍दी बोल लेता था. उसी ने बाहरी लोगों से बात करके पता किया था कि वे लोग वहां खनिज पदार्थों की खोज करने आए थे तथा कई-एक महीने रहेंगे.


ड्रीमलेट सबसे ज्‍यादा आकर्षित थी उस युवक से जिसके पास एक ऐसा रेडियो था, जिसमें मन-पसन्‍द गाने आते थे. यूं तो वह हिन्‍दी समझती नहीं थी, परन्‍तु उन गानों की धुनें इतनी दिलकश होती थीं कि वह सुनकर झूम जाती. वह हंसकर पूछता-
‘‘तुमको हिन्‍दी गाने अच्‍छे लगते हैं ?''
वह खिलखिलाकर हंस देती... और हंसती ही रहती. हंसी का जैसे कभी खतम न होने वाला एक झरना था उसके पास... उज्ज्वल, निर्मल... इस हंसी का क्‍या एक कतरा वह अपने दामन में भर सकता था ?
‘‘तुमको हिन्‍दी नहीं आती ?'' वह फिर पूछता. कोई जवाब नहीं... बस हंसी... अनवरत बहने वाली हंसी.
‘‘अंग्रेजी...?'' हंसी रोककर वह सिर हिला देती. पर उसने ऐसे ढंग से सिर हिलाया था, जो हां भी हो सकता था और न भी. आदित्‍य उसकी परेशानी समझ गया, परन्‍तु विचार व्‍यक्‍त करने के लिए भाड्ढा रुकावट नहीं होती. उन दोनों के बीच मौन वार्तालाप होता. इशारों में एक दूसरे के मन की बातें जानने-समझने लगे. एक दिन आदित्‍य ने अपने टेप-रिकार्डर में ड्रीमलेट की आवाज टेप करके सुनाई, तो वह खिलखिलाकर हंस पड़ी. उसकी निश्‍छल और अबोध हंसी... आदित्‍य बस उसे निहारता रह गया.


पहले शाम होते ही ड्रीमलेट बकरियां लेकर घर पहुंच जाती थी. उन्‍हें बाड़े में बन्‍द करके घर के काम-काज में मां का हाथ बंटाती. एल्‍विस आ जाता तो उसके साथ बातें करती. परन्‍तु अब पहले जैसी बात नहीं थी. बीती रात तक वह आदित्‍य के साथ किसी पेड़ के नीचे बैठी रहती. पहले गाने सुनने के शौक में आया करती थी... और अब... गाने तो पुराने हो चुके थे. आदित्‍य उसे हिन्‍दी के शब्‍दों से परिचित कराता और उससे खासी भाषा सीखता. वह अब काफी हद तक एक दूसरे की बातें समझ लेते थे.
आदित्‍य सर्वे करने के बहाने पहाड़ियों के उस पार निकल जाता, जहां ड्रीमलेट अपनी बकरियां लेकर जाती थी. वहां एकान्‍त होता था... दूर-दूर तक चीड़ और सागौन के पेड़ नजर आते थे. हवा के साथ उनके सरसराने की आवाज एक अजीब सा माहौल पैदा कर देती थी. उसमें एक नशा था... जिंदगी के सारे गम भुला देने वाला नशा. दोनों पहाड़ी फूल इकट्‌ठा करते रहते. जब खूब सारे फूल इकट्‌ठा हो जाते तो उनका बिस्‍तर बनाकर लेट जाते.


‘‘तुमने कभी शहर देखा है ?''
‘‘उहूं...'' वह हल्‍की मुस्‍कान के साथ कहती.
‘‘मेरे साथ शहर चलोगी ?''
‘‘हूं... लेकिन यहां मेरे मां-पिता अकेले रह जाएंगे. मैं उनकी इकलौती लड़की हूं. मेरे बाद उनकी देखभाल कौन करेगा ?''
खासी परम्‍परा के अनुसार शादी के बाद लड़की अपनी ससुराल नहीं जाती. लड़का ही लड़की के घर आकर रहने लगता है. लेकिन मां-बाप की सम्‍पत्ति की इकलौती वारिस केवल छोटी लड़की होती है. ड्रीमलेट तो खैर अपने मां-बाप की इकलौती बेटी थी. सम्‍पत्ति उसे ही मिलनी थी. परन्‍तु आदित्‍य... क्‍या वह यहां नहीं बस सकता ? वह थोड़ा दुविधा में पड़ गई. परन्‍तु ज्‍यादा चिन्‍ता करने की आदत उसे नहीं थी. वह अजीब थी ... सांसारिक ज्ञान का उसमें अभाव था. दुनिया बस उसे एक गांव सी नजर आती थी. जिसमें वह निर्द्वन्‍द घूम सकती थी. कोई रोक-टोक नहीं थी. बस चारों तरफ फूल खिले हुए नज़र आते.


मां-बाप ड्रीमलेट की तरफ से बेखबर थे, ऐसी बात नहीं थी. पहाड़ दूर से सुंदर नज़र आते हैं, बाहर का आकर्षण ही कुछ ऐसा होता है. ड्रीमलेट बाहरी चमक-दमक से चकाचौंध थी. घर के अंधेरे उसे भाते न थे. उन्‍हें लड़की के बाहर घूमने-फिरने, किसी से घुलने-मिलने में कोई आपत्ति या परेशानी नहीं थी. बस उन्‍हें एक ही चिन्‍ता थी कि ड्रीमलेट एल्‍विस को बिलकुल भी नहीं चाहती थी. जबसे ये बाहर के लोग आए थे, तब से वह उससे मिलना भी पसन्‍द नहीं करती थी. बात करना तो दूर की बात रही.

सूरज पहाड़ों के पीछे छिप चुका था. गांव में अंधेरा दबे पांव उतरने लगा था. ड्रीमलेट बकरियों के साथ उछलती-कूदती घर की तरफ लौट रही थी. रास्‍ते में एल्‍विस खड़ा था. गौर से उसे देख रहा था. सोचा, ड्रीमलेट कुछ बोलेगी, परन्‍तु वह देखकर भी अनदेखा कर गई, तो उसे ही बोलना पड़ा,  ‘‘ड्रीमलेट सुनो...!''
‘‘क्‍या है ....?'' वह ठिठककर खड़ी हो गई.
‘‘मैं कल तुम्‍हारे घर गया था. तुम थी नहीं, काफी देर तक तुम्‍हारा इंतजार करता रहा, परन्‍तु तुम पता नहीं कहां चली गयी थी ?''
‘‘तो...और कुछ कहना है ?''
‘‘तुम्‍हें अपना गांव अच्‍छा नहीं लगता ? ये सुन्‍दर पहाड़, हरी-भरी वादियां...कल-कल करते झरने... धान के छोटे-छोटे खेत. ऐसा लगता है, जैसे संसार की सारी सुन्‍दरता अपने गांव में सिमट आई हो. वैसे ही जैसे चांद तुम्‍हारे मुख पर विराजमान है. सच, तुम्‍हीं तो एक चांद हो इस गांव की. तुम न रहोगी तो यहां कितना अंधेरा हो जाएगा.''
वह खिलखिलाकर हंस पड़ी, ‘‘अरे एल्‍विस, ये तुम कैसी बातें कर रहे हो ? मेरी समझ में तो कुछ नहीं आया. क्‍या कोई कविता है, जो तुम चर्च में याद करते हो ?''
‘‘हां ड्रीमलेट,'' आज वह भावुक हो गया था, ‘‘यह सचमुच ही एक कविता है... और तुम उस कविता की जान हो. तुम नहीं होगी तो यह कविता मर जाएगी. जुम जरा मेरी तरफ देखो. क्‍या तुम्‍हें मेरी आंखों में कुछ नज़र नहीं आता ? क्‍या तुम इतनी निष्‍ठुर और कठोर हो कि मेरे दिल की धड़कन भी तुम्‍हें सुनाई नहीं देती ? अरे, लड़कियां तो फूल होती हैं, जो हवा के हल्‍के स्‍पर्श से ही झूम-झूम जाते हैं. पर एक तुम हो कि...''आगे वह जान-बूझकर चुप रहा.


ड्रीमलेट पढ़ी-लिखी नहीं थी. भावात्‍मक शब्‍दों की सार्थकता उसकी समझ में क्‍या आती ? लेकिन एल्‍विस के स्‍वर की गंभीरता उसे अंदर तक हिला गई. वह समझी, उसे कोई कष्‍ट है. बोली, ‘‘क्‍या बात है ? तुम्‍हें कोई तकलीफ है ? मैं कुछ कर सकूं तो बताओ...''
एल्‍विस हक्‍का-बक्‍का उसका मुंह ताकता रह गया. समझ गया कि शब्‍दों के माया-जाल से ड्रीमलेट का दिल जीतना मुश्‍किल था. उससे सीधी बात करनी होगी. न जाने कितने दिनों से वह हौसला बांध रहा था. चुन-चुनकर शब्‍दों को उसने संजोया था एक गुलदस्‍ते की तरह. परन्‍तु ड्रीमलेट को गुलदस्‍ता पसन्‍द नहीं था. उसे तो जंगली फूलों से प्‍यार था, जो इधर-उधर उगे होते हैं. तो अब वह ड्रीमलेट से उसी भाषा में बात करेगा, जो उसकी समझ में आती थी.
पहली बार उसने सीधे शब्‍दों में पूछा, ‘‘क्‍या तुम मुझसे शादी करोगी ?''
ड्रीमलेट ने तुरन्‍त कोई जवाब नहीं दिया. उसकी आंखों के सामने आदित्‍य का चेहरा नाच उठा. फिर उसने एल्‍विस को देखा. दोनों में जमीन-आसमान का अंतर था. हौले से बोली, ‘‘सोचकर  बताऊंगी.''
‘‘कब तक... ?'' वह उतावली से बोला.
‘‘मैं कोई भाग थोड़े रही हूं. किसी दिन बता दूंगी.'' वह थोड़ा खीझकर बोली और आगे बढ़ गई.


पता नहीं, वह दिन कब आएगा ड्रीमलेट. काश, तुम भागकर न जाओ उस मैदानी छोकरे के साथ. तुम उसकी चमक-दमक और आधुनिकता पे मत मर मिटना. मैं तुम्‍हें पलकों पे बिठाऊंगा, सपनों में झूले पर झुलाऊंगा. तुम इस गांव की शोभा हो. अपनी और इस गांव की लाज बचाए रखना.
ड्रीमलेट में अब पहले जैसी चंचलता न रही थी. एल्‍विस की बातों से उसका दिल घबराने लगा था. मन उद्वेलित हो गया था. दूर आकाश में एक तारा टिमटिमा रहा था. वह उड़कर वहां तक पहुंचना चाहती थी. पास में उसके एक दीपक जल रहा था, जिसकी तरफ उसकी नज़र ही नहीं पड़ रही थी.
दूसरे दिन उसने आदित्‍य से पूछा, ‘‘तुम मुझसे शादी करोगे ?''
वह एकबारगी अचकचाया, ‘‘हां, परन्‍तु तुमने ऐसा क्‍यों पूछा ?''
‘‘क्‍योंकि मैं एल्‍विस से शादी नहीं करना चाहती. तुम हां कहो तो मैं उसके प्रश्‍न का जवाब उसे दे दूं; ताकि आइन्‍दा से फिर मेरा पीछा न करे.''
‘‘यह एल्‍विस कौन है ?'' उसने शंकित स्‍वर में पूछा.
‘‘है एक लड़का, जो मुझसे शादी करना चाहता है.''


आदित्‍य को यह बात पता नहीं थी. उसके मन में डर पैदा हुआ कि वह लड़का कहीं कुछ कर न बैठे, जब उसे पता चलेगा कि वह उसकी पे्रमिका को उससे छीन रहा था. हालांकि वह जानता था कि यहां की औरतों की मर्जी के खिलाफ. मर्द कुछ नहीं कर सकते. घर और बाहर औरतों का ही राज्‍य होता है. एक तरह से देखा जाए तो वहीं मर्दों को पालती हैं. मर्द की हैसियत यहां एक मजदूर से अधिक कुछ भी नहीं होती. फिर भी वह डर रहा था, क्‍योंकि वह बाहर से आया था और बाहर के लोगों के प्रति यहां के लोग क्‍या रुख अख्‍तियार करेंगे, उसे पता नहीं था.
उसने सोच-समझकर जवाब दिया, ‘‘एक खिलती हुई कली, जिसकी महक अभी जंगल में नहीं फैली थी. जिस पर भंवरे तो आकर्षित हुए थे, परन्‍तु बैठ न पाए हों, कौन तोड़कर सूंघना न चाहेगा. मैं तैयार हूं, परन्‍तु अभी कुछ दिन रुक जाओ. जब हमारा काम यहां खत्‍म हो जाएगा, तब तुम्‍हें अपने साथ लेता चलूंगा और शहर में तुमसे शादी कर लूंगा.''
‘‘नहीं, मैं तुम्‍हारे साथ शहर नहीं जाऊंगी. हमारे यहां की लड़कियां लड़कों के साथ बिदा नहीं होतीं. तुम्‍हें हमारे साथ यहीं, इसी गांव में रहना होगा.'' वह दृढ़ता से बोली.
‘‘परन्‍तु यह कैसे हो सकता है ? मैं एक सरकारी नौकर हूं. मेरा तबादला होता रहता है. एक जगह उम्र भर कैसे रह सकता हूं ?''
‘‘तुम नौकरी छोड़ दो...'' वह बिना किसी हिचक के बोली, ‘‘हम यहां खेती-बाड़ी करेंगे, फल उगाएंगे, बकरियां और मुर्गी पालेंगे और हंसी-खुशी जीवन गुजार देंगे.'' वह आदित्‍य का हाथ पकड़कर बोली.


आदित्‍य अच्‍छी तरह जानता था, यह उसके लिए कतई संभव नहीं था. लखनऊ में उसके मां-बाप थे, भाई-बहन थे. उनकी जिम्‍मेदारी उस पर थी. वह एक ड्रीमलेट का होकर नहीं रह सकता था. वह साथ चलती तो और बात थी, पर... बाधाएं दोनों तरफ थीं. वह नहीं चाहता था, ड्रीमलेट उसके लिए सपना बनकर रह जाए. उसने गौर से उसका चेहरा देखा... हल्‍की लालिमा लिए खूबसूरत गोरा चेहरा, जिसमें सैकड़ों सपने पले थे और हजार फूलों की मासूमियत और रंगत सिमटी हुई थी. यह फूल तो खिलना ही चाहिए. उसके आंगन में खिलता तो और ही बात होती. उसने तुरन्‍त निर्णय कर लिया, ड्रीमलेट को गंवाना उसकी सबसे बड़ी मूर्खता होगी.
‘‘जैसा तुम कहोगी, वैसा ही करूंगा. परन्‍तु जब तक यहां कैम्‍प है, मैं नौकरी करता रहूंगा. जब कैम्‍प चला जाएगा, मैं नौकरी से इस्‍तीफा देकर तुम्‍हारे साथ घर बसा लूंगा.''
‘‘ओह्‌, तुम कितने अच्‍छे हो.'' ड्रीमलेट उससे लिपट गई. उस दिन जंगल में चारों तरफ फूल खिल उठे, चिड़ियां चहचहा उठीं. हवा ने स्‍वागत गीत गाकर उनका अभिनन्‍दन किया. पेड़ों ने लहराकर उनको बधाई दी.


ड्रीमलेट के मां-बाप जानते थे, ऐसा ही होगा. जब-जब बाहर के लोगों ने पहाड़ों की कुंवारी धरती पर कदम रखे, फूलों की सुगन्‍ध उन्‍होंने छीन ली.
एल्‍विस ने उस दिन खूब शराब पी. अपने पे्रम का मातम मनाया और अन्‍त में बेहोश होकर एक नाली में गिर पड़ा. सुबह तक उसे होश नहीं आया.
आदित्‍य अब अपनी रातें ड्रीमलेट के घर पर ही बिताता. अपने कुशल व्‍यवहार से उसने सबका मन जीत लिया था. ड्रीमलेट के मां-बाप को अपनी लड़की से कोई शिकायत नहीं थी. उनकी खुशी में ही उन सबकी खुशी थी.
दिन बीतते रहे. आदित्‍य अपने काम पर बिला नागा जाता रहा. फिर एक दिन गांव से कैम्‍प उखड़ गए. जीप में लदकर सामान चला गया. दो-चार लोग रह गए थे, जिन्‍हें बाद में जीप लेने आने वाली थी.


ड्रीमलेट बकरियां लेकर जंगल में गई थी. आदित्‍य कैम्‍प के लोगों के साथ था. वह जितना भोली थी, बाकी लोगों को भी वैसा ही समझती थी. उसने कुछ अन्‍यथा न सोचा था, वरना आदित्‍य को छोड़कर जंगल में न जाती.
जीप जब दुबारा लोगों को लेने आई तो आदित्‍य उसमें बैठकर चला गया... जहां से आया था. एल्‍विस ने उसे जाते हुए देखा था. उसका खून खौल उठा था. एकबारगी मन हुआ कि जीप से उसे पकड़कर बाहर खींच ले और उसके सिर को पत्‍थर पर पटक दे. उसके सपनों का दुश्‍मन .... उसकी जिन्‍दगी बरबाद करनेवाला... एक मासूम कली को मसलकर भागा जा रहा था.
परन्‍तु उसे खुशी भी हो रही थी. ड्रीमलेट अब उसकी हो जाएगी. कोई दीवार उनके बीच में नहीं रहेगी... जो थी भी, वह आज अचानक टूट गई थी... अब ... उसने जीप को मोड़ पर गुम होते हुए देखा. धूल के बादल थोड़ी देर तक छाए रहे और फिर मिट गए. वह बेतहाशा उल्‍टी दिशा में भागा... ड्रीमलेट को खबर देने के लिए.
ड्रीमलेट फूल तोड़कर अपने आंचल में भर रही थी और एक पहाड़ी गीत गुनगुना रही थी. उसका चेहरा सौन्‍दर्य की आभा से दमक रहा था. उस पर सूर्य की किरणें और गजब ढा रही थीं.


एल्‍विस ठिठककर रुक गया. क्‍या ऐसी दुःखदायी खबर वह ड्रीमलेट को सुना सकता है, उसका कलेजा न फट जाएगा. कहीं सदमें को बर्दाश्‍त न कर पाए तो... परन्‍तु अभी नहीं तो थोड़ी देर बाद उसे स्‍वयं मालूम हो जाएगा. फिर वहीं क्‍यों न बता दे ? वह आहिस्‍ता से ड्रीमलेट के पीछे जाकर खड़ा हो गया. आहट पाकर उसने अपनी नज़रें ऊपर उठाईं. एल्‍विस को देखकर वह हौले से मुस्‍कराई. एल्‍विस उससे यह मुस्‍कराहट छीनने जा रहा था.
‘‘ ड्रीमलेट... वह चला गया !'' उसने रुक-रुककर कहा.
इल्‍विस के स्‍वर की गंभीरता और बेचैनी से ही वह समझ गई थी कि किसके बारे में कह रहा था. फिर भी पूछा, ‘‘कौन...?''
‘‘तुम्‍हारा आदित्‍य...''
‘‘कहां चला गया ?''
‘‘जहां से आया था... जीप में बैठकर. मैंने खुद अपनी आंखों से उसे जाते हुए देखा था.''
‘‘नहीं...'' वह अचानक चीखकर बोली, ‘‘तुम झूठ बोल रहे हो. तुम मुझे जलाने के लिए यह बात कह रहे हो. तुम खुद मुझसे और मेरे आदित्‍य से जलते हो न, इसलिए.''
‘‘नहीं, ड्रीमलेट ! मैं सच कह रहा हूं. विश्‍वास न हो तो खुद चलकर देख लो.''


वह एक पल तक एल्‍विस के चेहरे को ताकती रही... शायद सच की परछाई तलाश कर रही थी. फिर बेतहाशा उस तरफ भागी, जिस तरफ कैम्‍प लगे हुए थे.
कल तक जहां आदमियों की चहल-पहल थी, कहकहे लगते थे... आज वहां टूटे हुए पत्‍थरों और फटे हुए कागजों के सिवा कुछ न था. दूर-दूर तक कहीं कुछ नज़र नहीं आ रहा था. एक ऐसी खामोशी बिखरी हुई थी जो किसी की बरबादी की कहानी कह रही थी. ड्रीमलेट सन्‍न रह गई. उसे सच्‍चाई पर विश्‍वास नहीं आ रहा था. उसने मुड़कर एल्‍विस की तरफ देखा. वह उसके पीछे अपराधी की तरह खड़ा था.


ड्रीमलेट उसकी तरफ बढ़ी और उसकी कमीज पकड़कर झकझोरने लगी, ‘‘तो यह सब तुम्‍हारा किया धरा है, एल्‍विस ! तुमने उसे डराया-धमकाया होगा. जान-बूझकर उसे जाने दिया होगा कि उसके जाते ही मैं तुम्‍हारी हो जाऊंगी. परन्‍तु ऐसा नहीं होगा. तुमने बहुत गलत सोचा, एल्‍विस... बहुत गलत सोचा.''
वह सिसक-सिसककर रोने लगी. शब्‍दों ने उसका साथ छोड़ दिया. बस एक आंसू थे जो उसका साथ दे रहे थे. वह रोती जा रही थी. आंसू बह रहे थे और एल्‍विस उसे सांत्‍वना भी न दे सकता था. चाहकर भी वह ड्रीमलेट को छूने की हिम्‍मत नहीं जुटा पा रहा था. जी भर रो लेने के बाद वह उठी और घर की तरफ चली गई. एल्‍विस बाद में उसकी बकरियां हांककर घर लाया.

उस दिन के बाद ड्रीमलेट को किसी ने हंसते हुए नहीं देखा. उसकी सारी चंचलता गायब हो गई थी. घर से बहुत कम बाहर निकलती. मां-बाप समझाकर हार चुके थे. दुनिया से जैसे उसे कोई मतलब न रह गया था. बस यादों में खोई लेटी रहती. सपने देखती और सोचती कि शायद कभी आदित्‍य लौटकर फिर उसके पास आएगा. उसकी एक निशानी जो ड्रीमलेट के पास रह गई थी. यह एक जो मन का बंधन है, कभी नहीं टूटता. मन में आशा का दीप जलाए ही रखता है.


कुछ दिनों बाद ड्रीमलेट ने एक सुन्‍दर गोल-मटोल बच्‍ची को जन्‍म दिया. महीनों बाद वह फिर से मुस्‍कराई थी. बच्‍ची को इस तरह अपनी गोद में लेकर बैठी थी, जैसे आदित्‍य को आगोश में छिपा रखा हो. मां-बाप खुश हुए. एल्‍विस भी उसे बधाई देने आया. उससे भी ड्रीमलेट ने हंसकर बातचीत की. खासी समाज में बगैर शादी के बच्‍चा होना अवैध भले हो, पर बुरा नहीं माना जाता. खासकर अगर लड़की पैदा हो.


‘‘बहुत सुन्‍दर बच्‍ची है.'' एल्‍विस ने उसे गोद में लेते हुए कहा.
‘‘हूं, आदित्‍य पर गई है.'' ड्रीमलेट के चेहरे से खुशी टपकी पड़ रही थी.
‘‘नहीं तुम दोनों पर...'' वह हसकर बोला.
ड्रीमलेट ने गौर से एल्‍विस को देखा. कितना खुश नज़र आ रहा था वह. जैसे उसी की बच्‍ची हो.
वह पीठ के बल लेट गई. नज़र छत पर टिका दी. बिना एल्‍विस की तरफ देखे उसने पूछा, ‘‘तुम इस कदर मेरे दीवाने हो !''


वह चुप रहा. ड्रीमलेट दाईं तरफ करवट लेकर उसकी तरफ मुड़ी, ‘‘तुमने मुझे मेरे प्‍यार से जुदा कर दिया. अब मेरे साथ हमदर्दी जताकर मेरा दिल जीतना चाहते हो ?''
‘‘ड्रीम... न तो मैंने आज तक कभी तुम्‍हारे आदित्‍य से बात की थी, न उसे डराया-धमकाया था. वह क्‍यों तुम्‍हें छोड़कर चला गया, मुझे नहीं मालूम. तुम मुझसे शादी करो या न करो, मेरा प्‍यार तुम्‍हारे हृदय में कोई स्‍पन्‍दन पैदा करता है या नहीं, इससे मुझे कोई सरोकार नहीं. परन्‍तु इस गांव में रहते हुए अगर कभी मेरी जरूरत पड़े तो अवश्‍य बुला लेना.''
और एल्‍विस उठकर चला आया. उस दिन के बाद एल्‍विस उसके घर नहीं आया. ड्रीमलेट अपनी मां से पूछती, ‘‘एल्‍विस कहां है ? यहां क्‍यों नहीं आता ?''
‘‘तूने ही तो उसे दुत्‍कार कर भगा दिया था. कहीं दारू पी रहा होगा बैठा.''
वह चुप रह जाती.


अन्‍ततः एक दिन वह उठी. शाम का अंधेरा घिर चुका था. गांव में बिजली का प्रकाश नहीं था. परन्‍तु सारे रास्‍ते ड्रीमलेट के जाने-पहचाने थे. वह सीधे एल्‍विस के घर पहुंची. वह बाहर ही बैठा था...नशे में धुत्‌. अपनी बरबादी का मातम मनाता हुआ. वह बैठा तो था, परन्‍तु ऐसे हिल रहा था जैसे आंधी में कमजोर पौधा हिल रहा हो. ड्रीमलेट उसके सामने खड़ी थी, परन्‍तु उसे पता न चला.
ड्रीमलेट ने उसे पकड़कर उठाया, ‘‘एल्‍विस, क्‍या हो गया है तुम्‍हें ?''
वह हक्‍का-बक्‍का रह गया, ‘‘तुम ड्रीम... यहां ...? कैसे... ? क्‍या हो गया ?''
‘‘कुछ नहीं हुआ है.'' उसने कसकर उसकी बाहों को पकड़ लिया, ‘‘तुम यहां बैठकर दारू पीकर अपना गम गलत कर रहे हो. मैं वहां तुम्‍हारे इंतजार में दुबली होती जा रही हूं.''
‘‘तुम... और मेरा इंतजार...'' एल्‍विस की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. उसकी आंखे झपक रही थीं. कोई सपना तो नहीं देख रहा था... नहीं, सपना तो नहीं था. ड्रीमलेट उसके सामने थी. उसको अपनी बाहों में थामे हुए. वह चकराकर रह गया.
‘‘चलो, घर चलो.''
‘‘घर...! कौन से घर ? यही तो मेरा घर है.''


‘‘नहीं, वह घर जहां तुम्‍हें ब्‍याहकर जाना है.... मेरे घर.'' ड्रीमलेट ने एल्‍विस का मुंह चूम लिया, ‘‘वहां तुम्‍हारी बेटी तुम्‍हारा इंतजार कर रही है.''
ऊंचे पहाड़ों और पेड़ों के साए चारों तरफ बिखरे हुए थे. किसी को कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था. परन्‍तु उस अंधेरे में भी दो मानव अपनी मंजिल की तरफ बढ़े जा रहे थे. उनके रास्‍ते में अंधेरा अवश्‍य था, परन्‍तु मंजिल की तरफ नहीं.....क्‍योंकि मंजिल की तरफ जाने रास्‍ते में उनके साथ एक उस गांव का चांद था.

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संपर्क:

(राकेश भ्रमर)
संपादक प्रज्ञा मासिक,
24, जगदीश पुरम्‌,
लखनऊ मार्ग, निकट त्रिपुला चौराहा,
रायबरेली- 229316

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आज आठ साल बाद, सरिता की सास उसके पास आई थी। सरिता यश की नई नई शादी हुई थी जब वे लोग ऊपर के फ्लैट में रहने आए थे। दोनों का लव मैरिज़ था साथ ही अन्तर जातीय विवाह भी। सरिता के मम्मी पापा की तो सहर्ष स्वीकृति मिल गई थी ,उनके प्यार को शादी के रूप में परिवर्तित होने की क्यूंकि सरिता के परिवार में उसकी दोनों बड़ी बहनों ने भी अन्तर जातीय विवाह किया था। बिना दहेज़ दिये ही भार्गव जी ने अपनी दोनों बेटियों का विवाह सादगी से कर दिया था ओर अब दोनों के परिवार वालो को भी कोई आपत्ति नहीं थी। उन दोनों के ससुराल वाले ,काफी सुलझे विचारों के थे। बेटों की पसंद को ही अपनी पसंद बना कर ,उन्होंने संतोष कर लिया था

किंतु सरिता का मामला टेढ़ा था।

यश की मम्मी के बहुत सपने थे यश की शादी को लेकर किंतु वो जानती थी ,यश ओर उसके पापा के आगे उसका विरोध ज़्यादा दिन तक नहीं रह पायेगा। फिर उन्होंने अनमने मन से स्वीकृति दे दी थी लेकिन उनका विरोध सरिता के साथ बर्ताव में हमेशा ही झलकता था।

दो चार दिन निकले ,तभी मैंने सोचा चलो आज यश की मम्मी से मिल कर आती हूँ इतने सालों बाद हैं , क्या वे पहचानती हैं या भूल गई। वैसे सरिता हर साल दीपावली पर आगरा जाती है वापसी में उसकी सास सबके लिए पेठे देना नहीं भूलती,इसका मतलब उन्हें हम सब याद तो रहते हैं। दरवाजा उन्होंने ही खोला ओर एक दम प्रफुल्ल्लित हो कर मेरा स्वागत किया। मैं आश्चर्य चकित थी हमेशा अनमनी सी रहने वाली यश की मम्मी तो एक दम बदल गई उन्हें देख कर अच्छा लगा। वरना में सोच रही थी पता नहीं ?उनसे क्या बात करुँगी? क्यूंकि सरिता मेरे जितने नज़दीक थी तो उन्हें मुझसे भी थोड़ा रोष था। पहले जब वे एक दो दिनों के लिए आती थी ,सरिता ने परिचय करवाया था,मैंने भी उन्हें चाय पर बुलाया था तो उनके व्यवहार से मुझे काफी असुविधा लगी थी। कुछ बातें उन्होंने सरिता के मायके के बारे में भी कही थी अगर सरिता वो जान जाती तो उसके मन को बहुत ठेस लगती और हमारे सम्बन्ध भी मधुर नहीं रह पाते।

थोड़ी देर इधर उधर के हाल जानने के बाद ,मैंने उनसे पूछा ओर आपकी प्रेक्टिस कैसी चल रही है। उन्होंने एल.एल.बी किया था। जिस उम्र में वकील अपने मुकाम पर होते हैं,उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत की थी

मैंने उनसे कहा , आपने यह काम बहुत ही अच्छा किया समय का सदुपयोग किया। }अपने दोनों बेटों की शादी कर ,जिम्मेवारी से मुक्त हो अर्निंग भी शुरू कर दी ओर समय के साथ कदम भी मिला लिए। आपके काम में भाई साहब मदद करते हैं या नहीं?मैंने उनकी चुटकी ली जबकि मुझे मालूम था,उनके आधे केस खन्ना साहब ही तैयार करते थे।

उन्हें तो बस काला कोट पहन कर कोर्ट। जाना होता था।

अरे कैसी बात कर रही है मिसेस खरे ?

आपने ही तो हमे बातो बातो में उकसाया था ,हम जब आगरा गये छोटू की शादी बाद हमे खालीपन लगता था बस तब से हमने आपकी बातों का ध्यान रखा और काम शुरू कर दिया। हाँ आपके भाई साहब कभी कभी हमारी मदद कर देते है पर आज कल ये वहां ज्यादा टिकते ही कहाँ है !उनकी जान तो यहां बेटे बहु और पोती में अटकी रहती है।

अरे सरिता आंटी के लिए नाश्ता लाओ ॥

नहीं नहीं! मैंने कहा । सरिता रहने दो।

अभी मुझे बाहर जाना है ,फ़िर आउंगी तब फ़िर से बैठेंगे।

इतना कह नमस्ते कर मैं अपने घर आ गई।

मेरा शंकालु मन ये स्वीकार करने को तैयार नहीं था ?की यश की मम्मी में इतना बदलाव कैसे हुआ।

मै उन दिनों को याद करने की कोशिश करने लगी ,जब यश की मम्मी आती थी और सरिता रोते -रोते मेरे पास आती थी ,उन दिनों सरिता और यश संघर्ष ही कर रहे थे नौकरी के लिए।

ख़ुद का काम डालकर भी देखा थोड़े दिनों तक सब ठीक चलता: पर प्रतियोगिता के इस दौर में उनके लिए जमे रहना मुश्किल हो रहा था। । इस बीच दोनों को को एक अच्छे संस्थान में नौकरी मिल गई ,साथ ही नन्हीं दीप्ती भी आ गई। उन्होंने अपना फ्लेट भी खरीद लिया आज वो दोनों कैरियर के शिखर पर है। और ऐसे हालात में यश की मम्मी आती. उसके पापा का भी दूसरे शहर में तबादला हो गया था। बार बार वहां भी नहीं जा सकती थी, मैं उसे समझती धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा यश भी उसे समझाता मम्मी कि बातों का बुरा मत मानो। सरिता कहती -आंटी

हमारी शादी में भी पापाजी ने ही सारे उत्साह से काम किया था। मम्मीजी आज भी मुझ अपनी बहू नहीं स्वीकार कर पाई है। उनके मन के कोने में अभी भी कुछ कसक है। जबकि मैं जानती थी सरिता अपनी साँस को खुश करने के लिए हर संभव प्रयत्न करती है। सरिता के बनाये खाने में मीन मेख निकालना, मेरे बेटे को अपने वश में कर लिया है ये बातें उनके लिए आम होती। जब भी कभी मैं उनके घर गई तो हमेशा मुझे ड्राइंग रूम में बिठाकर खुद अन्दर चली जाती ,और जब तक मैं बैठती वो बाहर नहीं आती। उनके इस असहज व्यवहार के कारण खन्ना साहब भी उनके साथ नहीं आते। वे महीनों सरिता के पास रहते। नन्ही दीप्ती उनकी जान थी। सरिता और यश को भी उन्होंने अपनी छाया में रखा। उनके घर में रहने से सरिता को बड़ा संबल मिलता वर्ना घर और बाहर दोनों जगह संघर्ष करते करते कभी कभी वो रुआंसी हो जाती।

सर्व गुण सम्पन्न सरिता ने अपने व्यवहार से सभी बिल्डिंग वालो को अपना बना रखा। व्यस्त होने के बावजूद हमेशा सबकी मदद को तैयार रहती। ,छुट्टियों में बच्चो को पेंटिग सिखाना ,लड़कियों को मेहँदी सिखाना ओर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करना इसमें सबसे आगे रहती। पर यश कि मम्मी के सामने अपने को असहाय पाती। यश कि मम्मी जब भी आती दो दिन तो सरिता के साथ बहुत अच्छा व्यवहार करती फिर उनका ध्यान पूरी तरह से अपने बेटे पर केन्द्रित हो जाता और सरिता कि उपेक्षा उनके व्यवहार में निहित रहती। सरिता अपनी उपेक्षा देख व्यथित होती।

एक दिन बिल्डिंग में मिसेस वर्मा के घर भजन थे वही यश कि मम्मी भी आई थी ,सरिता तो अपने काम पर गई थी यश कि मम्मी और मैं पास पास ही बैठे थे ,बस वहीं वो शुरू हो गई आजकल लोग अपनी लड़कियों को बहुत स्वतन्त्रता दे देते है ?लड़कियाँ भी जहाँ अच्छे पढ़े लिखे लड़के मिले बस पहुँच जाती है।

मैंने खा -

किसकी बात कर रही है ?

अरे ? आप नहीं जानती हमारा यश यहाँ पढ़ने आया था और फिर यही नौकरी लग गई अपने एक दोस्त के साथ रहता था। थोड़ी दूर पर ही तो सरिता का घर था बस ताड़ लिया ;कभी सब्जियां भेजी जाती, कभी केक कभी पकोडे ? लड़कों का क्या? घर से दूर अच्छा खाना मिला उन्ही के गुलाम हो गये मेरे बेटे को फांस लिया। वर्ना एक से एक रिश्ते आ रहे थे सुन्दर लड़कियों के पैसे वाले घरों के ?यहाँ तो हाथ जोड़कर माफ़ी मांग ली बरी हो गये।

न कोई लेन देन न ही कोई स्वागत सत्कार।

बातों में सरिता को ताने देती कि ,स्वजाति कि बहू आती तो इतना दहेज मिल जाता और आगे पढ़ने के लिए यश को अमेरिका भेज सकते थे। सरिता बेचारी चुपचाप सुनकर मेरे पास आती और हलकी हो लेती।

न कोई लेन- देन न स्वागत ही सत्कार?

मेरी यह हालत थी कि मेरा उनके पास बैठना मुश्किल हो गया मैंने उनसे माफ़ी मांगी और हाथ जोड़ केर उसी समय उठ कर आ गई। इतनी पढ़ी लिखी संस्कारित बहु पा कर कोई भी खुश हो, परन्तु यशः की मम्मी की बातों ने साबित केर दिया की वोह खुद भी पढ़ी लिखी है हैं उनके पति भी अच्छे ओहदे पर है। सभ्य लोगों में उनका उठाना बैठना था ;परन्तु उनकी यह सोच ? इस सोचा ने में लड़के की माँ हूँ, मेरा लेने पर कितना हक़ है उन्हें यह सब एक अजनबी के सामने कहने पे मजबूर कर दिया। हमारे समाज में लड़का होने पर जो खुशी मनाई जाती है;तो धीरे धीरे लड़के कि माँ के मान में जो अहम् भर देती है। हमारी कुरीतियाँ , उनकी परतें यश की मम्मी पर पड़ी हुई थी :उसके बाद में उनसे कभी नहीं मिली। वह एक आध बार आई थी सरिता ने कहा भी था । आंटी मम्मीजी आई हैं ?,

पर मेरा मान उनसे बात करने को नहीं हुआ; न ही कोई बिल्डिंग से उनके घर मिलने गया।

दबे दबे उनका स्वभावः सबको मालूम हो गया था वो तो सरिता का सब लोग लिहाज करते थे तो उपरी तौर पर उन्हे मान लेते थे। उसके बाद पता नहीं उनके और उनके पति के बीच क्या कह सुनी हुयी वे भोपाल नहीं आई हाँ सरिता हर साल दीपावली पर सबके लिये ढेर साड़ी गिफ्ट ले केर आती सुना उनके छोटे लड़के की भी धूम धाम से शादी हुई सरिता ने कार्ड भी दिया मिठाई भी दी दीप्ती ने भी अपनी चची के सारे गुण अपनी तोतली भाषा में बताये, क्योंकि दीप्ति स्कूल से आने के बाद मेरे पास ही रहती जब उसके दादू आगरा में रहते तब तक। वर्ना दादू के और उसकी इतनी पटती की कोई उनके बीच नहीं आता पा ता। दादू ने भी अपना पूरा कर्तव्य निभाया। जब तक दीप्ति समझदार हुई वे उसके पास ही रहते अब वे भी थोडे अशक्त हो गये थे फिर डायबिटीज़ के मरीज तो उनका आना जाना कम हो गया था।

दीप्ति अपने छोटे भाई चाचा के बेटे की बातें करते नहीं थकती थी छोटा ऐसा छोटा वैसा। उसके लिए मानो वो एक खिलौना था । मैं खाना बनाते बनाते जाने क्या विचार करती रही खरे साहब भी अभी तक सैर करके नहीं आये थे वे रोज शाम को घूमने जाते थे अपनी हम उम्र के लोगो के साथ पार्क में। उनके साथ उनका समय अच्छा व्यतीत हो जाता। मैं सुनीता का इंतजार कर रही थी वो आवे तो उसकी पसंद कि सब्जी बना दूं। योगेश तीन महीने के लिए अमेरिका गया है तब से सुनीता को मैंने यही रहने को कह दिया है \सुनीता मेरी भांजी है मेरे पास ही उसकी पढ़ाई हुई है और इसी शहर में उसकी शादी हुई है हमारा अपना कोई बच्चा नहीं है। इतने में ही दरवाजे कि घंटी बजी \दरवाजे पर सुनीता थी।

अरे मामी इतनी देर लगा दी ?

दरवाजा खोलने में ?क्या सोच रही थी आज क्या बनाऊं?

सुनीता को क्या पसंद है ?

मामा को क्या पसंद है ?मामी कभी अपनी पसंद की तो कोई चीज बनाया करो।

अच्छा मामी छोड़ो सब आज मैं बहुत अच्छी खाने कि चीज ली हूँ आपके लिए ,कहकर उसने अपना बैग डायनिंग टेबल पर रखा और मेरे दोनों कंधे पकड़कर कुर्सी पर बैठा दिया। उसके आने से पूरे घर में जैसे भूचाल सा आ गया हो।

अच्छा मामी बताओ मैं क्या लाई हूँ ?

अरे ? भाई मैं क्या जानूं?

शायद समोसे शायद कचोरी ,?

नहीं ? मामी मैं आज मैं भरवां पराठे लाई हूँ उड़द की दल के जो कि आपको बहुत पसंद है। साथ में आलू का झोल भी है और उसने फटाफट प्लेटें भी लगा दी।

अरे ? तेरे मामाजी को तो आने दे?

वो अभी आये ही समझो

मैंने आते समय पार्क में ही उन्हें इशारा कर दिया था।

इतने में ही फिर कॉल बेल बज उठी। आप बैठो ऐसा कहकर वह दरवाजा खोलने गई।

देखा तो सरिता थी अरे सरिता भाभी आप ?

बहुत दिनों बाद ? कैसी हैं आप ?उसके अन्दर आने के पहले ही इतने सवाल ? वो बिचारी दरवाजे पर ही ठिठकी खड़ी रही?

मैंने उसे कहा -सरिता अन्दर आओ।

जी आंटी इतना कहकर उसने सरिता के सवालों का जवाब दिया, फ़िर कहने लगी -आंटी कल माताजी के भजन रखे है

अष्टमी है और फ़िर मम्मजी भी आई हुई है उनकी बहुत इच्छा थी आप जरुर आना। सुनीता तुम भी आना। अच्छा मैं चलती हूँ।

सुनीता ने तो माफ़ी मांग ली यह कहकर भाभी मेरी तो छुट्टी नहीं है पर प्रसाद लेने जरुर आउंगी।

हा हा क्यो नहीं ?पर वादा मत भूलना।

सरिता तो चली गई पर सुनीता के प्रश्नों की बौछार शुरू हो गई।

आंटी कब आई ?सरिता भाभी पर इतना प्यार क्यो?आदि आदि ......मैंने उसे टालने को कहा -चलो अब मुझे बहुत भूख लगी है फ़िर परांठे भी ठंडे हो रहे है ,इतने में ही सुनीता के मामाजी भी आ गये आज तो उनके मजे हो गये सुनीता आती है

तो उनके मन की कली -कली खिल जाती है हम सबने मिलकर परांठे खाए सुनीता ने मुझे उठने ही नहीं दिया सारा कम कर रसोई साफ कर हम दोनों को दवाई दी फ़िर अपने लेप टॉप पर काम करे बैठ गई।

दूसरे दिन मैं भजन शुरू होने के थोड़ी देर पहले ही सरिता के घर पहुंच गई थी। सरिता लगी थी तयारी में। मुझे मालूम था सरिता के घर भजन यानि की अच्छी खासी दावत। तभी तो आरती के समय तक पुरा कमरा भर जाता है भजन के पहले घंटे में तो चार पांच भजन गाने वाली महिलायें ही होती है।

मैंने उससे कई बार कहा सरिता बहनों के कार्यक्रम में ये खाने पीने का झंझट क्यो ?

वो कहती आंटी कभी कभी तो कोई घर आता है इस बहान भी थोड़ा कुछ बना लेती हुँ। मैं भी हमेशा उसे मदद करवाती परन्तु आज तो सरिता की मम्मीजी उसके साथ जोर शोर से कम करवा रही थी , मैं तो भजन वाले कमरे में ही बैठ गई रसोई तक गई ही नहीं \

कमरा धूप बत्ती कि सुगंध से महक रहा था दुर्गा माँ कि तस्वीर और झांकी सरिता ने बहुत अच्छे से सजा राखी थी दीप्ती भी माँ का पूरा सहयोग कर रही थी \

मुझे देखते ही मिसेस खन्ना रसोई से बाहर आई और कहने लगी -देखिये तो मिसेस खरे !कही कोई कमी तो नहीं है हमे तो ये सब काम आते नहीं ?आप तो हमेशा करती रहती है। हम तो बस ग्रहस्थी में उलझे रहे और अब कोर्ट कचहरी में ये तो सरिता के संस्कार अच्छे है और आप जैसे लोगो का साथ मिला है तो वो सत् ईश्वरीय कार्यो में लगी रहती है \

नहीं ऐसी कोई बात नहीं है ,मुझे अपने आप पर थोड़ी सी शर्म महसूस हो रही थी मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया था जिससे मिसेस खन्ना को मेरी इतनी तारीफ करना पड़ रही थी \या फिर मुझे लगा शायद वो अपनी झेंप मिटाने के लिए ये कह रही हो।

लेकिन उस बात को भी अब तो कई साल हो गये। और वो भी हमारे साथ ही आकर बैठ गई।

इसके बाद और कई महिलायें आ गई और फिर विधिवत गणेश वंदना के साथ भजनों का कार्यक्रम शुरू हुआ माताजी के जयकारे के साथ आरती सम्पन्न हुई। सबने प्रसाद पाया और नाश्ता कर जाने लगे। सरिता ने कहा - आंटी अंकल के लिए भी नाश्ता और परसाद लेते जाना।

थोड़ा रुकिए न ? पड़ोस की मिसेस शर्मा भी बैठी थी मुझे भी कोई जल्दी नहीं थी।

इतने में वादे के मुताबिक सुनीता भी आ गई उसने प्रसाद लिया और खन्ना आंटी के समाचार पूछने लगी \

मिसेस खन्ना भी उसे देखकर खुश हो गई सुनीता कि शादी के बाद पहली बार ही उसे देख रही थी \

आंटी वकालत कैसी चल रही है ?

अरे तुम्हें भी मालूम है मैं प्रेक्टिस करती हूँ।

क्यों नहीं आंटी ?आप इतना अच्छा काम करती है। वैसे आपके पास कैसे केस आते ह?

सुनीता तो बस बाल कि खाल ही निकलने लगी है। मुझे डर था कही बातों बातों में उन्हें कुछ सुना ना दे। इतने में मिसेस खन्ना ने कहा वैसे तो सब तरह के केस लेती हुँ पर बहु को ससुराल में अपना हक़ दिलाने में ,न्याय दिलवाने की कोशिश करती हुँ ,

दहेज पीड़ित बहू , औरतों पर हुए शारीरिक या मानसिक अत्याचार के मामलो में न्याय दिलवाना ऐसे कैसों पर ज्यादा काम करती हुँ और कोई महिलायें जो फीस नहीं दे सकती उनके लिए निशुल्क भी कर रखा है ,आज मिसेस खन्ना को पूरा अवसर दिया था सुनीता ने ताकि वो अपने बारे में कुछ कह सके। आंटी आपने तो बहुत ही अच्छा काम हाथ में ले लिया है एक तरह से तो समाज सेवा ही है।

और छोटे भइया भाभी कैसे है वो लोग साथ नहीं आए ?उन्हें कभी देखा भी नहीं ?

मै जो बात पूछ नहीं पाई थी या जो बात मेरी पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी सुनीता ने बेहिचक साफ शब्दों में पूछ लिया।

हा वे लोग अच्छे हैं उनका चेहरा थोड़ा सपाट हो गया था वे एकदम से इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं थी उस पर सुनीता ने एक और प्रश्न कर डाला

आपकी छोटी बहु तो सजातीय है ?आपके साथ ही रहती है ?क्या वो भी सर्विस करती है ?

नाश्ते की प्लेट रख कर सुनीता भी वहीँ बैठ गई थी मैंने उसके चेहरे को देखा सुनीता काम ये प्रश्न उसे विचलित कर गया था मुझ लगने लगा सुनीता को कुछ समझता ही नहीं कुछ भी ऊटपटांग पूछने लगती है ये उनके घर का मामला है।

परन्तु मिसेस खन्ना ने तपाक से उत्तर दिया -नहीं हमारी छोटी बहु हमारे साथ नहीं रहती शादी के दो सालबाद ही वो दूसरे घर में रहने चले गये जो की उसके मायके से उसे मिला था। जब बच्चा ६ महीने का था तभी चले गये थे और वो सर्विस भी नहीं करती, हा हमारा बेटा जरुर उनकी सर्विस करता है। कभी कभी त्योहारों पर मिलने आ जाते है इतना कहते कहते वो रुँआसी हो गई लेकिन अच्छा है.. रोज रोज की तकरार से निजात मिल गई वो भी वंहा खुश हम भी अपने काम में खुश।

अरे आप लोग नाश्ता नहीं ले रहे कहा की बातों में उलझ गये। इतने सुंदर भजनों का आनन्द लिया ये सब बातें व्यर्थ है।

सरिता बेटी -शर्मा आंटी और सबके लिए चाय तो बनाओ ?

हम लोग चाय पीकर नमस्ते कर घर आ गये। धर आते ही मैंने सुनीता को कहा तुमने खन्ना आंटी को परेशान कर दिया ?

नहीं मामी ...

मुझे अच्छा लगा और उन्हें भी अच्छा लगा जाने अनजाने उन्हें सरिता भाभी के साथ किए गये व्यवहार पर स्पष्ट रूप से पश्चाताप था जो की आज उन्होंने हम सबके साथ स्वीकार किया था यह बहुत बड़ी बात है।

तुम और तम्हारी ये बातें तुम ही जानो मैंने सुनीता से कहा -पर मेरा मन भी कही हल्का हो रहा था और आज के भजनों का आनन्द और दुगुना हो गया था ..............................

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चित्र – रेखा की कलाकृति – कागज पर स्याही से रेखांकन

meera.

सामंती मूल्‍य दृष्‍टि और पुरुष प्रधान पितृसत्तात्‍मक समाज के पुरजोर प्रयासों के बावजूद मीरा लोक स्‍मृति में बची रही इसका क्‍या कारण है ? हाल में आई पुस्‍तक 'मीरा ः एक पुनर्मूल्‍यांकन' इन सवालों के गिर्द मीरा के साहित्‍य और व्‍यक्‍तित्‍व का नया विश्‍लेषण प्रस्‍तुत करती है। पल्‍लव के संपादन में इस पुस्‍तक के अधिकांश लेख समकालीन विमर्शों की रोशनी में तत्‍कालीन राजनैतिक, सामाजिक, सांस्‍कृतिक व आर्थिक परिस्‍थितियों में एक स्‍वतंत्र चेता नारी के संघर्ष के विभिन्‍न पहलूओं से देखने का प्रयास करते हैं। यह पुस्‍तक भक्‍तों के जैकारा (जयकारा) साहित्‍य से बिल्‍कुल अलग सामंती ढांचे की निरंकुशता, सामाजिक जकड़बन्‍दियों पितृसत्तात्‍मक समाज की कैद में छुटकारा पाने और अपना मुकाम हासिल करने की मीरा की संघर्ष गाथा को समझने और परखने का उपक्रम करती है।

मीरा पर उपलब्‍ध ढेर सारी सामग्री के बीच एक और पुस्‍तक की क्‍या जरूरत है ? इस संबंध में संपादक पल्‍लव का कहना है- ' बावजूद छोटी बड़ी पुस्‍तकों के मीरा की कविता का सही महत्त्व अभी पहचाना नहीं जा सकता है। प्रयत्‍न रहा है कि मीरा के व्‍यक्‍तित्‍व और उनकी कविता पर पडे़ आवरणों से हटकर उनका सही मूल्‍यांकन किया जाए।'

इस मूल्‍यांकन की दिशा के बारे में अंदाजा हम सुरेश पंड़ित के लेख की इन पंक्‍तियों में लगा सकते है- ' मीराबाई कृष्‍ण के प्रति अटूट भक्‍ति के कारण जितनी लोकप्रिय हुई, उतनी अपने समय के सामंतवाद, पुरूष वर्चस्‍व, कुलीन रीति रिवाज आदि के विरुद्ध बगावत का बिगुल बजाने वाली एक अपराजेय महिला के रूप में क्‍यों नहीं हुई ? ' कुल छब्‍बीस लेख मीरा की कविता और जीवन को विभिन्‍न कोणों से विश्‍लेषित करते है अतः मत विभिन्‍नताएं भी है जो स्‍वाभाविक है, ये विभिन्‍नताएं ही पुस्‍तक की खूबी भी है स्‍त्री विमर्श के आलोक में अनुराधा, अनामिका, चन्‍द्रा सदायत, शिव कुमार मिश्र, मधु किश्‍वर व रुथ वनिता के लेख मीरा के जीवन और कविता का मूल्‍यांकन करते है, पितृसत्ता-राजसत्ता के शोषणकारी स्‍वरूप को सामने लाते है। हिमांशु पंड्‌या का आलेख बताता है कि मठाधीशों को स्‍वतंत्र स्‍त्री का अस्‍तित्‍व किस कदर असहनीय है, कोई भी धर्म इस स्‍वतन्‍त्रता की इजाजत नहीं देता। पंड्‌या अपने आलेख में बताते हैं कि हिन्‍दी की प्रगतिशील आलोचना मीरा के मूल्‍यांकन के संदर्भ में किस रुढ़ दृष्‍टि का शिकार रही। पंकज बिष्‍ट अकादमिक लेखों की गंभीरता के बीच सरस, आत्‍मीय व विरासत को तत्‌कालीन व समकालीन संदर्भों में विश्‍लेषित करते हैं। मीरा से जुड़े विभिन्‍न स्‍थलों पर लिखे उनके यात्रा संस्‍मरण‘विद्रोह की पगडंडी' में पैनी निरीक्षण दृष्‍टि उजागर होती है। इसमें उन्‍होंने मेड़ता और चित्तौड़गढ़ की यात्राओं पर लिखते हुए मीरा की कविता और जीवन पर सहृदयता से विचार किया है।

लेखकों ने मीरा के जीवन और संघर्ष को अपने ढंग से देखा है अतः विचारों की बहुलता के साथ-साथ सहमतियां असहनीय भी है। डॉ. विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है- मीरा भक्‍त थी, भक्‍त होना न तो बुरी बात है न आपत्तिजनक, यदि व सभी लोगों की तरह घर में रहकर पूजा-पाठ करके भक्‍ति करके अपना वैधव्‍य काटती रहती तो राणा को क्‍या आपत्ति होती। आपत्ति का कारण साधु-संगति ही ज्ञात होता है मीरा केवल भक्‍त नहीं थी वह राजमहल की वधू भी थी, वह सामान्‍य भक्‍ति की तरह सामान्‍य लोगों से मिलती जुलती थी तो राणा कुल की मर्यादा कैसे न भंग होती'। वरिष्‍ठ समालोचक नवलकिशोर ने अपने आलेख ‘मीरा चर्चा में जैनेन्‍द्रीय सुनीता प्रसंग‘ में इस सवाल पर अपने विचार व्‍यक्त किये हैं। यहाँ वे एक ओर जैनेन्‍द्र के चर्चित उपन्‍यास सुनीता का प्रसंग लाकर मीरा की नयी अर्थवत्ता की तलाश करते हैं तो दूसरी ओर विमर्श प्रसंग पर उनका मत है - ‘मीरा का साहित्‍येतर अनुशीलन कितना ही वांछनीय हो - उनके समग्र अध्‍ययन के लिए वह बहुत जरूरी भी है - उनके काव्‍य का सौन्‍दर्यात्‍मक अनुभव हम काव्‍य रसिक के रूप में ही कर सकेंगे। इस दिशा में हमारी आलोचना - परंपरा हमारे लिए साधक और बाधक दोनों हैं। हम उनके काव्‍य को भक्‍ति काव्‍य की परिधि में ही पढ़ते और सुनते हैं तो उनके काव्‍य में मन्‍द-मुखर आत्‍मकथा और समाजाख्‍यान को सुन ही नहीं पाएंगी लेकिन उनके प्रेम निवेदन का उनकी भक्‍ति और उसकी परंपरा से उसे अलगा कर विखंडन करते हैं तो हमारी सारी उद्‌घोषणाएं आरोपणाएं होंगी - मीरा के काव्‍य और काल से संदर्भित स्‍थापना नहीं।‘

पुस्‍तक में आये अपने आलेख में प्रो. मैनेजर पाण्‍डेय ने मीरा के संघर्ष और प्रतिरोध का बारीक विश्‍लेषण किया है, वे लिखते हैं-'मीरा का विद्रोह अन्‍धे के हाथ लगा बटेर नहीं है। वे अपने संघर्ष की परिस्‍थितियों के बारे में पूरी तरह सजग हैं। विरोधी शक्‍तियों के खूंखार स्‍वभाव और अपनी स्‍थिति की पहचान के बाद ही उन्‍होंने कहा था कि-तन की आश कबहुं नहिं कीनो, ज्‍यों रण मांही सूरो। उनका संघर्ष सचमुच असाधारण है।' वहीं शिव कुमार मिश्र अपने लेख में मीरा के विद्रोह के अलक्षित पक्षों का संधान करते हैं- 'पदों का साक्ष्‍य देखे तो मीरा का यह विद्रोह उनका एकदम निजी व्‍यक्‍तित्‍व विद्रोह ही लगता है वह व्‍यजंक है परन्‍तु वह व्‍यक्‍तित्‍व विद्रोह ही। 'हमें मीरा के ऐसे पद ही मिलते जिनमें उनका यह विद्रोह उनके 'स्‍व' से आगे जाकर स्‍त्री जाति की यातना और मीरा जैसी उनकी मनोकांक्षा से जुड़ा हो, बंधनों से अपनी 'मुक्‍ति' का आग्रह मीरा में जरूर है परन्‍तु उस मुक्‍ति की आकांक्षा के तार-स्‍त्री जाति की वैसी ही मुक्‍ति से सीधे नहीं जुड़ते' इसी लेख में वे आगे विचार व्‍यक्‍त करते है-' मीरा तो प्रतिरोध में है- मुक्‍त होगी जैसा कि वे हुईं- पर मीरा की मुक्‍ति से भी ज्‍यादा अहम सवाल हमारे लिए यह होना चाहिये कि मीरा की उस सास और ननद की मुक्‍ति भी स्‍त्री-मुक्‍ति के अभियान से जुड़ी हुई है, मुक्‍त उन्‍हें भी होना है, जिसके लिए सचमुच गुलाम होने का सुख बहुत बड़ी यातना है।' अपने विश्‍लेषण में वे आगे जोड़ते हैं-' मीरा ने अपने समय में अपनी सीमाओं में जो किया बड़ा काम था, उनका महत्व इस बात में है कि मुक्‍ति के सपनों के उन्‍होंने पराधीनों की आंखों में जीवित रखा।'

'मीरा का मर्म' शीर्षक से लिखे अपने आलेख में प्रो. रामबक्ष ने बताया है कि मीरा ने स्‍त्री के मूल अधिकार 400 वर्ष पहले मांग लिए और वह 'बावरी' करार दे दी गई। वे मीरा के दर्द की नयी व्‍याख्‍या करते हैं-'कौन विरोध कर रहा है ? कौन समर्थन कर रहा है ? कौन प्रेम के वशीभूत होकर समझा रहा है ? कौन मुझसे चिढ़ रहा है ? यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। मेरी सबसे बड़ी चिन्‍ता यह है कि कोई मेरे दर्द को समझ नहीं रहा है। जो मित्र है, शुभचिन्‍तक है, वह भी नहीं समझ रहा है और जो विरोधी है, वह भी बिना जाने समझे विरोध कर रहा है। इसलिए दोनों नादान हैं और इसलिए क्षम्‍य हैं। मीरा के पदों में बार-बार गूंजता रहता है कि हेरी मैं तो दरद दीवाणी, म्‍हारो दरद न जाणे कोय। यह दर्द सबसे बड़ा है और यह दर्द मीरा के समकालीनों को बहुत बाद में समझ में आया। साथ रहने वालों में से तो किसी के भी समझ नहीं आया।' डॉ. चन्‍द्रा सदायत का आलेख 'मीरा और भारतीय भक्‍त कवयित्रियाँ' एक तुलनात्‍मक अध्‍ययन प्रस्‍तुत करता है। मीरा के काव्‍य की विशिष्‍टता के बारे में उनका कहना है- 'काव्‍यानुभूति की व्‍यापकता और गहराई काव्‍य की भाषा की सहजता और लोकोन्‍मुखता तथा पदों की संगीतमयता के कारण जैसी अखिल भारतीय ज्‍योति मीरा की है वैसी किसी अन्‍य भक्‍त कवयित्री की नही।' यहां वे हिन्‍दी पाठ्‌यक्रम में मीरा के काव्‍य की उपेक्षा के कारणों में उस विचारधारा को उजागर करती है जो- 'मीराबाई को प्रयत्‍नपूर्वक पाठ्‌यक्रम से अलग और नई पीढ़ी से दूर रखती है।' डॉ. आशीष त्रिपाठी का आलेख भी पर्याप्‍त बहस का अवसर देता है क्‍योंकि वे जहाँ मीरा के भक्‍ति तत्‍व का विश्‍लेषण करते है वहीं मीरा की मध्‍यकालीन सीमाओं को पहचान कर उनके भाग्‍यवाद की आलोचना भी करते हैं। इस अन्‍तर्विरोध का कारण वे यह बताते हैं कि मीरा की वैचारिकता आधुनिक वैज्ञानिक दृष्‍टिकोण सी नहीं हो सकती थी और उनका प्रेम भी एक हद तक भावावेषी था। लेकिन डॉ. त्रिपाठी लिखते है कि अपनी सीमित क्रान्‍तिकारिता के बावजूद आज भी मीरा के विद्रोह का आत्‍यंतिक महत्‍व है क्‍योंकि मीरा का समाज एक मायने में आज भी मौजूद है। जिस समाज ने आज से लगभग पांच सौ बरस पहले मीरा को बिगड़ी हुई लोक लाज हीन, कुलनासी, भटकी हुई और बावरी कहा था, वही समाज आज तसलीमा नसरीन को ‘नष्‍ट लड़की‘ तथा किश्‍वर नाहिद को ‘बुरी औरत‘ कहकर संबोधित कर रहा है।

कहना न होगा कि किसी मध्‍यकालीन रचनाकार का ऐसा नया मूल्‍यांकन इधर कम ही हो पाया है। संपादक ने परस्‍पर संवादधर्मी आलेख एकत्र कर नयी बहस की संभावना बनाई है। परिशिष्‍ट में रामचन्‍द्र शुक्‍ल और मिश्र बन्‍धुओं के इतिहास अंश दिये हैं, बेहतर होता कि ऐसे सभी महत्त्वपूर्ण इतिहास ग्रन्‍थों के मीरा सम्‍बन्‍धी वर्णन पर एक आलेख ही दे दिया जाता।

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'मीरा ः एक पुनर्मूल्‍यांकन'/सं.पल्‍लव/आधार प्रकाशन, पंचकूला/मूल्‍य 450 रु.

लक्ष्‍मण व्‍यास

सी 20 आकाशवाणी कालोनी, उदयपुर 313002

13 दिसम्‍बर

1929 को रामपुर हवेली, जिला सहरसा (बिहार) में राजकमल चौधरी का जन्‍म हुआ। उनका वास्‍तविक नाम मणीन्‍द्र चौधरी था, राजकमल उनके साहित्‍य जगत का नाम है। राजकमल चौधरी ने कविता, उपन्‍यास और कहानी विधा में रुचि दिखाई। उनके द्वारा लिखित कथा-साहित्‍य में ‘नदी बहती थी', ‘देहगाथा' एवं ‘मछली मरी हुई' काफी चर्चित उपन्‍यास हैंं। ‘शहर था या नहीं था', ‘अग्‍निस्‍नान', ‘एक अनार एक बीमार', ‘बीस रानियों का बाईस्‍कोप' और ‘अरण्‍यक' उनके अन्‍य उपन्‍यास हैंं। राजकमल ने लगभग एक सौ कहानियां भी लिखी, लेकिन उनकी प्रिय विधा कविता ही थी। राजकमल के ‘स्‍वरगंधा', ‘कंकावती', ‘मुक्‍तिप्रसंग', ‘इस अकाल वेला में' और ‘विचित्रा' नामक काव्‍य संकलन है। इसके पश्‍चात 2006 में देवशंकर नवीन के संपादन में ‘अॉडिट रिपोर्ट' नामक कविता संकलन प्रकाशित हुआ। इस संकलन में राजकमल की अधिकांश कविताएँ संकलित हैं। पर अभी भी यह कहने का साहस नहीं किया जा सकता कि राजकमल की सारी कविताएँ आ गई। फिर भी पूर्व प्रकाशित सभी कविता संग्रह की महत्त्वपूर्ण कविताओं को इस संग्रह में देखा जा सकता है।

राजकमल का जीवन, लेखन, मृत्‍यु सभी कुछ विवादास्‍पद रहा। उनकी मृत्‍यु के बाद उनका व्‍यक्‍तित्‍व एवं कृतित्‍व और विवादास्‍पद हो गया। एक तरफ समीक्षकों ने उनके काव्‍य को अश्‍लील और अपाठ्‌य घोषित करते हुए कहा- अच्‍छा हुआ साला मर गया पूरी न्‍यू राईटिंग को करप्‍ट कर रहा था तथा वह तो साला फ्रॉड था फ्रॉड। 1 एक समय ऐसा भी आया जब उन्‍हें साहित्‍य की दुनिया से बाहर कर देने की साजिश की गई। संक्षेप में उनके साहित्‍य और व्‍यक्‍तित्‍व संबंधी जितने अपशब्‍द कहे जा सकते थे, कहे गए। दूसरी तरफ हिन्‍दी की अनेक लघु पत्रिकाओं युयुत्‍सा, लहर, आधुनिका, दर्पण, निवेदिता, आरंभ, नईधारा आदि के अतिरिक्‍त मैथिली पत्रिकाओं ने राजकमल विशेषांक प्रकाशित किए, जिनमें प्रकाशित सभी लेख उन अपशब्‍दों का विरोध करते हैं और राजकमल की प्रशंसा। समकालीन कवियों ने उनके लेखन को संबोधित कर जितनी कविताएँ लिखी, उतनी हिन्‍दी के किसी बड़े से बड़े लेखक की मृत्‍यु पर शायद ही लिखी गई हो। इन दोनों पक्षों की सबसे बड़ी वजह राजकमल का खुला जीवन था जिसमें न दीवार, न दरवाजे, न खिड़कियां और न परदे थे। शायद इसी के चलते उन्‍हें अपने 37 वर्षों के अल्‍पजीवन में घोर उपेक्षा, अपमान और आत्‍मनिर्वाचन का शिकार होना पड़ा था। यह सब इसलिए हुआ क्‍योंकि वे अपनी पीढ़ी के कुछ थोडे़ से ईमानदार कवियों और व्‍यक्‍तियों में से एक थे। उनकी इसी ईमानदारी की सजा उन्‍हें मरणोपरान्‍त भी मिलती रही, जिन्‍हें आज तक हिन्‍दी जगत ने संभवतः माफ नहीं किया है। उनकी गलती सिर्फ इतनी थी कि उन्‍होंने अपनी हर गलती को न केवल सार्वजनिक स्‍तर पर स्‍वीकार किया बल्‍कि उसे हुबहु लिखा भी। 2

साधारणतया राजकमल चौधरी का नाम लेते ही अश्‍लीलता, नग्‍नता और विद्रूपता अथवा कथ्‍य और टेक्‍नीक के धरातल पर अश्‍लील एवं अपाठ्‌य कवि दिखते हैं, जैसा कुछ कवि और समीक्षक बताते भी हैं। लेकिन वास्‍तविकता यह नहीं है। राजकमल की कविता की आलोचना करने वाले लोग प्रायः उनकी कविता में खुले शब्‍दों में सेक्‍स की चर्चा करने से बिदकते हैं। लेकिन उनकी कविताओं में केवल देह की राजनीति नहीं है।'3 ‘निषेध' एवं ‘अकविता' के पक्षधर कवियों में राजकमल चौधरी का नाम उल्‍लेखनीय है। वे ‘भूखी' और ‘बीट' पीढ़ी का प्रतिनिधित्‍व भी करते हैं। लेकिन राजकमल का महत्‍वपूर्ण कार्य कथ्‍य और टेक्‍नीक का एक नया धरातल स्‍थापित करना रहा। इस नये धरातल का उनके जीवनकाल में कम महत्त्व मिला, पर बाद में इसी कारण राजकमल को महत्त्वपूर्ण कवि तक घोषित किया गया। समकालीन लेखकों में इसे काफी लोकप्रियता भी मिली। यह कथ्‍य और टेक्‍नीक अनैतिक नहीं है बल्‍कि परम्‍परागत मूल्‍यों का विध्‍वंस, राजनीतिक पूंजीवादी व्‍यवस्‍था से विद्रोह और नगरीय विद्रूपताओं का पर्दाफाश करता है। कुछ कविताएँ ऐसी भी हैं जो सामान्‍यतः बकवास सी लगती हैं, किन्‍तु जब राजकमल का मन्‍तव्‍य और कविता का मूल अर्थ खुलता है तब कविता की सार्थकता उभरती है। हो सकता है इसे कुछ विद्वान स्‍वीकार न करें, लेकिन यह सत्‍य है। वैचारिक परिपे्रक्ष्‍य के आधार पर कई बार रचनाकार रद्द कर दिये जाते रहे हैं पर उनके अनुभव जगत में छिपा तनाव बावजूद इसके आने वाले समय के लिए भी प्रासंगिक बना रहता है- राजकमल चौधरी ऐसे ही कवियों में से एक हैं।'4.

स्‍वतन्‍त्रता के पश्‍चात आम भारतीय ने एक सुनहरा सपना देखा था। कुछ वर्षों तक आशाएँ भी बनी रही, लेकिन दूसरे आम चुनाव (1957) के बाद स्‍थिति धीरे-धीरे स्‍पष्‍ट होने लगी। भविष्‍य के जो सपने आम भारतीय ने देखे थे वो पूरे होते नहीं दिखे। उस समय राजनीतिक भ्रष्‍टाचार चारों तरफ फैला हुआ था। ऐसी स्‍थिति में एक सजग रचनाकार का जो दायित्‍व होता है उसे राजकमल ने बखूबी समझा और अपनी कविताओं के माध्‍यम से कटु यथार्थ हमारे सामने रखा। वैसे कविता के साथ राजनीति का संबंध पुराना और गहरा है लेकिन कविता के इस साठोत्तरी दौर में राजनीति केंद्रीय स्‍थिति पा जाती है और राजकमल ने इसे क्रूर और नंगे अमानवीय रूप में हमारे सामने प्रस्‍तुत किया है। आजकल कांग्रेस सरकार में कैसे-कैसे व्‍यक्‍ति मंत्री बन रहे हैं, उनकी योग्‍यताऐं क्‍या हैं। राजकमल के शब्‍दों में-

कोई भी भारतवासी

हत्‍या बलात्‍कार आगजनी काला बाजार दवाओं में

पत्‍थरों का चूरन भरने के

समस्‍त अपराध लगातार 18 वर्षों

करते रहने के बाद ही कांग्रेसी सरकारों का

मंत्री उपमंत्री राज्‍य मंत्री हो सकता है।

जिस व्‍यक्‍ति में नैतिकता ही नहीं बची हो तथा जो अपराध में संलग्‍न हो- वह भी लगातार अठारह वर्षों तक। वह जब राजनेता अथवा मंत्री बनने लगे तो जनता के प्रति उत्तरदायी कैसे हो सकता है ? ऐसे अपराधियों (नेताओं) से देश का भविष्‍य क्‍या होगा ? आसानी से सोचा जा सकता है।

आज़ादी के बाद पंचवर्षीय-योजनाओं का क्रियान्‍वयन किया गया। जिससे देश की समृद्धि के साथ विकास हो सके, लेकिन हुआ क्‍या ? कुछ नहीं। ये योजनाऐं खोखली साबित हुई। इन योजनाओं के मोहजाल में आम-आदमी फंसा रहा। आकाशवाणी केवल पंचवर्षीय- योजनाओं की बातें करती रही, लेकिन जब योजनाओं की असफलता समझ आई तो राजकमल क्षुब्‍ध हो उठे और कहने लगे-

सतरह साल हो गए पूरे सतरह

साल। चौथी योजना भी

अब पूरी होने को आई

लेकिन

क्‍या हुआ ? किसके लिए

उत्तर कोई नहीं देगा

उत्तर नहीं है।

राजकमल की कविताएँ निरन्‍तर राजनीतिक व्‍यवस्‍था का यथार्थ चित्रण करती हैं। राजकमल आगे बताते हैं कि अन्‍न मंत्री किस तरह देश के अन्‍न संकट का गलत कारण बताकर बरगलाते हैं। खाद्य विभाग के अन्‍नमंत्री अपने बजट पर बहस का उत्तर किस तरह देते हैं देखिए-

लोकसभा में अन्‍नमंत्री कहते हैं कोई पांच अरब चूहे

इस देश में

बजट के अंको टेक्‍सों के रेखागणित में डूबे हुए इस देश में

चूहों की जनसंख्‍या सबसे भयानक प्रश्‍न है।

कुछ इसी तरह राज्‍यसभा में अन्‍न उपमंत्री बयान देते हैं-

राज्‍य सभा में अन्‍न उपमंत्री ने बताया है-देश में

बसते हैं

कोई पौने पांच अरब चूहे

(और बिल्‍लियां ? कुत्ते ?)

सुनो हम अपने नाटक में कुत्ते बिल्‍लियों की संख्‍या

निर्धारित करें....................।

यहाँ राजकमल मंत्री नेताओं को चूहों से ज्‍यादा खतरनाक मानते हैं। देश में भुखमरी है और लोकसभा में अन्‍नमंत्री तथा राज्‍यसभा में अन्‍न उपमंत्री भुखमरी के संबंध में बयानबाजी करते हैं कि चूहों की जनसंख्‍या निर्धारित करें। चूहों की बहुलता खेत में फसलों को नुकसान पहुँचाती है जिसके कारण पैदावर अच्‍छी नहीं हो पाती। बाकी पैदावर चूहे अन्‍नगृहों में खा जाते हैं। इस कारण देश में अन्‍न की कमी है। इस अन्‍न की कमी को पूरा करने के लिए हमें अमेरिका से गेहूं के लिए हाथ फैलाने पड़ते हैं। देश के विकास के लिए हमें विश्‍व-बैंक से ऋण लेना पड़ता है और इस भीख और ऋण के चलते चाहे पूरा देश ही क्‍यों न बिक जाए-

आदमी वर्ल्‍ड-बैंक से तीस करोड़ डालर ले जाए

आदमी खुद बिके अथवा बेच डाले अपनी स्‍त्री अपनी आंखे अपना देश।

कवि कहता है कि आम-आदमी के लिए विकास की बात करना निरर्थक है क्‍योंकि आम-आदमी विकास की बात पेट भरने के लिए गेहूं और सोने के लिए गंदे बिस्‍तर मिलने के बाद सोचता है। उसके लिए दूसरी चिंताओं का कोई अर्थ नहीं है। पेट की चिंता सबसे बड़ी चिंता है-

मगर भीड़ अब खाने के लिए गेहूं

और सो जाने के लिए किसी भी गंदे बिस्‍तर के सिवा कोई बात

नहीं कहती है

प्रजाजनों के शब्‍दकोश में नहीं रह गये हैं दूसरे शब्‍द दूसरे वाक्‍य

दूसरी चिंताऐं नहीं रह गई हैं।

आज आमजन बढ़ती मंहगाई, बेरोजगारी और भुखमरी से चिंतित है देश के विकास को लेकर नहीं। राजनेता विकास के नाम पर विदेशियों से भीख मांगने में जरा भी संकोच नहीं करते। जब भिक्षा के रूप में उन्‍हें कुछ विदेशी मुद्रा मिल जाती है तो वे इस मुद्रा का उपयोग देश के विकास के लिए कम और आत्‍मविकास के लिए अधिक करते हैं। विदेशों से भिक्षा मांगने में नेता कैसे पारंगत होते जा रहे हैं राजकमल चौधरी के शब्‍दों में-

हमारे भाग्‍य विधाता डॉलर रूबल पौंड

क्षेत्रों की भिक्षाटन-यात्राओं में क्रमश निर्लज्‍ज पारंगत होते जा
रहे हैं साहसी।

स्‍वतन्‍त्रता का सपना सुखदायी और सुन्‍दर था किन्‍तु वह विकृत और वीभत्‍स साबित हुआ। स्‍वतन्‍त्रता का रूप ‘पागल काली मरी हुई स्‍त्री' है जो पानी और अपना पेट भरने के लिए अनाज हेतु सरकार से भीख मांगती है। लेकिन उसे कुछ नहीं मिलता । वह राजनीतिज्ञों के कृत्‍यों से गंभीर रूप से आहत है। राजकमल कहते हैं आजादी का अर्थ ही क्‍या है जबकि हम पानी और अनाज जैसी बुनियादी समस्‍याओं का समाधान नहीं कर पाए। राजकमल की ‘मुक्‍तिप्रसंग' कविता की यह पंक्‍तियां इसी खोखले राजतन्‍त्र और स्‍वतन्‍त्रता के पश्‍चात की घोर निराशा को व्‍यक्‍त करती हैं-

ग्‍यारह बजकर उनसठ मिनट पर हर रात

शहीद स्‍मारक के नीचे नंगी होती है

पागल काली मरी हुई स्‍त्री

उजाड़ आसमान में दोनों बाहें फैलाकर

रोने के लिए

रोते हुए जाने के लिए पानी और अनाज

के देवताओं से भीख मांगती है।

लोकतन्‍त्र का अर्थ होता है लोक का शासन। क्‍या आजादी के बाद सही मायनों में लोकतंत्र स्‍थापित हो पाया। लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था के संबंध में अंतिम निर्णय लोगों का होना चाहिए। क्‍या ऐसा हुआ है ? बिलकुल नहीं। इसलिए राजकमल आम-आदमी को लोकतंत्र की इस सरकार से अलग होने के लिए कहते है अर्थात्‌ ऐसे लोकतन्‍त्र को अस्‍वीकार करते हैं यथा-

आदमी को तोड़ती नहीं हैं लोकतांत्रिक पद्धतियां केवल पेट के बल

उसे झुका देती हैं धीरे-धीरे अपाहिज

धीरे-धीरे नपुसंक बना लेने के लिए उसे शिष्‍ट राजभक्‍त देशप्रेमी नागरिक

बना लेती हैं

आदमी को इस लोकतंत्री सरकार से अलग हो जाना चाहिये।

जिसे जनतंत्र कहा जाता था, लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था की जो विशेषताएं थी और होनी चाहिए, वही आज संक्रामक रोग बन गई है। सत्ताधारियों ने हमारे देश को रोग-पीड़ित बना दिया है-

जिसे कहते थे समय दरअसल जनतंत्र है

संसदीय लोकतांत्रिक समाज-शैलिक मानव धर्मी धर्म सम्‍मत धर्म निरपेक्ष
यह संक्रामक रोग।

राजकमल का विद्रोह सिर्फ राजनीति के प्रति ही नहीं, उन्‍होंने पूंजीवादी व्‍यवस्‍था की विद्रूपता का भी चित्रण किया है। आज़ादी के बाद यह सोचा गया था कि पूंजीवादी व्‍यवस्‍था देश से समाप्‍त हो जाएगी किन्‍तु इसके विपरीत पूंजीवादी व्‍यवस्‍था स्‍थापित हो गई। आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक सारे क्षेत्रों पर पूंजीवादियों ने एकाधिकार स्‍थापित कर लिया। राजकमल चौधरी सदैव पूंजीवादी व्‍यवस्‍था और विचारों का विरोध करते रहे। वे मुक्‍तिप्रसंग' कविता में पूंजीवादी व्‍यवस्‍था की विद्रूपता को इस तरह अभिव्‍यक्‍त करते हैं-
केवल हवा, कीडे़ ज़ख्‍म और गंदे पनाले है अधिक

स्‍थानों पर इस देश में

जहां सड़क फट गई है नसें, वहां हवा तक नहीं

ऊपर की त्‍वचा चीटने पर आग नही निकलेगी नहीं धुआं

जठाराग्‍नि.................दावानल..................

सब बुझ गए अचानक पहले पन्‍द्रह अगस्‍त की पहली रात के
बाद अब राख ही राख बच गया है पीला मवाद।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि राजकमल चौधरी की कविताओं में राजनीतिक चेतना का विद्रोही स्‍वरूप देखा जा सकता तथा उनकी कविताएँ आम जनमानस को ललकारने और उसे अपनी उस ताकत की याद दिलाने का गीत है, जिसे व्‍यवस्‍था की चकाचौंध रोशनी में या बेहताशा शोरगुल में जनता भूल गई थी।

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पताः-गजेन्‍द्र कुमार मीणा द्वारा राजेन्‍द्र खराड़ी

305 ‘बी' ब्‍लॉक हिरण मगरी सेक्‍टर-14

उदयपुर (राज.) 313001

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1. युयुत्‍साः राजकमल अंकः राजकमल की स्‍मृति, कुछ ईमानदार प्रतिक्रियाऐं- भीमसेन त्‍यागी 1966-67

2. कवियों की पृथ्‍वी- डॉ. अरविन्‍द त्रिपाठी पृ.सं. 80 आधार प्रकाशन पंचकूला, हरियाणा प्र.सं. 2004

3. मेरे साक्षात्‍कार- मैनेजर पाण्‍डेय पृ.सं. 24 किताब घर प्रकाशन, नई दिल्‍ली प्र.सं. 1998

4. कविता की संगत- विजय कुमार पृ.सं. 42 आधार प्रकाशन पंचकूला, हरियाणा प्र.सं. 1995

5. समस्‍त उद्वरण ऑडिट रिपोर्ट- राजकमल चौधरी से उद्‌धृत वाणी प्रकाशन, नई दिल्‍ली प्र.सं. 2006

(संजय भारद्वाज का यर आलेख पंद्रह अगस्त को स्वाधीनता दिवस विशेष रूप में प्रकाशनार्थ प्रेषित किया गया था, मगर स्पैम हो जाने के कारण यह इनबॉक्स में नहीं आ पाया. यह आलेख न सिर्फ भारत की तथाकथित नकली आजादी के सच को नंगा करता है, बल्कि एक बड़ा प्रश्न चिह्न खड़ा करता है कि आम जनता क्या वास्तव में आजाद हुई है? – अत्यंत पठनीय व अनुशंसित आलेख)

15 अगस्त 1947 को देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद हमारे शासकों ने गणतांत्रिक लोकतंत्र की व्यवस्था स्वीकार की। इसका अर्थ था कि ऐसी व्यवस्था जिसमें शासन बहुमत के आधार पर हो और देश के सर्वोच्च पद का चुनाव भी हर वयस्क नागरिक लड़ने का अधिकारी हो। लोकतंत्र के तीन मुख्य प्रकारों में से प्रतिनिधि लोकतंत्र चुनते समय ब्रिटिश शासन व्यवस्था का रोल मॉडेल हमारे सामने था। उसका प्रभाव सर्वाधिक होता, ये स्वाभाविक था। पर साथ में गणतंत्र चुनकर हमने समानता के अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। ब्रिटेन में लोकतंत्र तो था पर गणतंत्र वहाँ आज तक नहीं स्वीकृत हो पाया है। ब्रिटिश रानी आज भी सरकार की औपचारिक प्रमुख है। लेकिन संविधान तैयार करते समय, व्यवस्था की विभिन्न धाराएं तैयार करते समय ब्रिटिश व्यवस्था छाई रही। फलतः हमारे नियम-कानूनों की पुस्तकों को "उधार का झोला' भी कहा गया। अलबत्ता हमारी पुस्तकों में 'हर हाइनेस क्वीन एलिजाबेथ ऑफ ग्रेट ब्रिटेन' की जगह "भारत का/ की राष्ट्रपति' ने ले ली।

भारतीय लोक तंत्र के तीन महत्त्वपूर्ण स्तंभ हैं - विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका । जिस इंग्लैंड से इसे आयातित किया गया था वहाँ अपने शैशवकाल में लोकतंत्र-राजा, सरकार, चर्च और सामंतों के चार स्तंभों पर टिका था। कालातंर में ये दायित्व सरकार, न्यायपालिका,चर्च और प्रेस उठाने लगे। लोकतंत्र के प्रादुर्भाव से अब तक चर्च का महत्व वहाँ बना हुआ है। भारत में अंगे्रजों की दो सौ साला हुकूमत में भारतीय संस्कृति, परंपराओं और विशेषकर हिन्दू धर्म को उपेक्षित करने की इतनी कोशिशें हुई कि खुद को आधुनिक शासन दिखाने के लिए हमारे राज्यकर्ता संस्कृति की कोई भूमिका शासन में तलाश नहीं पाये। तिस पर धर्मनिरपेक्षता का लब्बेलुबाब ऐसा था कि धर्म का शासन से दूर-दूर तक भी वास्ता ना पड़े।

शनैः-शनैः संतुलन बनाये रखने के लिए चौथे स्तंभ की आवश्यकता अनुभव होने लगी। इस आवश्यकता ने जन्म दिया स्वतंत्र (!) प्रेस को। वस्तुतः इंग्लैड में प्रेस को चौथे स्तंभ के रूप में अपनाते हुए "एस्टेट' शब्द का इस्तेमाल किया गया था, जिसका शासन के संदर्भ में "आधार'अर्थ था न कि "स्तंभ।' हमारे यहाँ शाब्दिक अर्थ में उपयोग होने से ये "पिलर' या खंभा कहलाने लगा। यहीं से नई आजादी के अंतर्गत भारत का दोपाया नागरिक चौपाये तंत्र के हवाले कर दिया गया।

स्वाधीनता के विगत 62 वर्षों के प्रदर्शन के आधार पर यदि हमारे लोकतंत्र के चारों स्तंभों का विश्लेषण करें तो कोई बहुत बड़ी उपलब्धि सामने नहीं आती।..... विधायिका से आंरभ करें। हमारी संसद में अधिवेशनों के दौरान कुल समय का काफी कम ही काम करने के लिए उपयोग हो पाता है। समय के अपव्यय एवं सदन को अखाड़ा बनाने की ये प्रवृत्ति निरंतर बढ़ रही है। 11 वीं लोकसभा (1996-98) में शोर-शराबे के चलते 5.28 प्रतिशत समय का अपव्यय हुआ। 12 वीं लोकसभा में अपव्यय 10.66 प्रतिशत तक पहुँचा। 13 वीं लोकसभा में ये 22.46 प्रतिशत रहा। ये स्थिति तब है जब संसद वर्ष भर में औसत डेढ़ महीने ही चलती है। क्या अपने कार्यालय में आपको वर्ष भर में केवल 45 दिन काम करने (उसमें भी आधा समय बर्बाद करने) के लिए पूरे वर्ष के वेतन का भुगतान हो सकता है? क्या कार्यालय अपना नुकसान बर्दाश्त कर सकता है? हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों को संभवतः जानकारी भी न हो कि संसद का प्रतिमिनट खर्च रू 26035/- है। समय और जनता से ली गई करराशि के अपव्यय का यह नज़ारा और बड़ा हो जाता है यदि हम केवल लोकसभा का रेकॉर्ड देखें।(ये तथ्य लोकसभा व राज्यसभा की एकसाथ की गई गणना के हैं।

हमारी विधायिका अपराधियों से भरी पड़ी है। 1200 स्वयंसेवी संस्थाओं के संगठन न्यू(नेशनल इलेक्टोरोल वॉच) द्वारा 16 मई 2009 को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया कि 15 वीं लोकसभा के 543 सदस्यों में से 533 के शपथपत्र (शेष 10 के तब तक उपलब्ध नहीं थे ) देखने से ज्ञात होता है कि उनमें से 150 पर (28.14%) पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इनमें से 72 सांसदों पर 213 कानूनन गंभीर आरोप (हत्या, आगजनी, अपहरण, फिरौती मॉंगना आदि) है। विगत लोकसभा में दागी सांसदों की संख्या 128 थी। वर्तमान लोकसभा में धनाढ्‌यों की भरमार है । 300 सदस्य ऐसे हैं जिनकी घोषित संपत्ति एक करोड़ से अधिक है। 543 सांसदों की कुल संपत्ति लगभग 3000 करोड़ रूपये है। इस आधार पर एक सांसद के पास औसत 5 करोड़ की संपत्ति है।

सदन की कार्यवाही पर दृष्टिपात करें तो देखने को मिलेगा कि अनेक महत्त्वपूर्ण विधेयक बिना चर्चा के पारित कर दिये गये हैं। परमाणु अप्रसार संधि जैसे संवेदनशील और राष्ट्रीय संप्रभुता व सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर भी सकारात्मक चर्चा नहीं हुई। लेखानुदान मांगें तो यों पारित हो जाती हैं मानो चाय का बिल हो। इसके मुकाबले संसद में नोट दिखाने, हथियार ले जाने, कुसियॉं फेंकने, अभद्र शब्दों का प्रयोग करने के अनेक मामले घटे। अपराधी लोकतंत्र के मंदिर में देवता बने बैठे हैं। अपने समर्थकों के संख्याबल के आधार पर कोई किसी भी मंत्रालय का मंत्री हो सकता है। रक्षा, विदेश और वित्त जैसे विभागों के लिए भी विशेषज्ञ मंत्री न बना पाना हमारी व्यवस्था की असहायता को इंगित करने के लिए पर्याप्त है। विषयों पर अनर्गल प्रलाप करनेवाले अधिकंाश सांसदों की तुलना में अध्ययन करके आनेवाले प्रतिनिधि गिने-चुने ही हैं। औसत 10 प्रतिशत सांसद ऐसे हैं जिन्होनें अपनी सदस्यता के दौरान संसद में एक बार भी मुँह नहीं खोला। संसद में उपस्थिति का कोई नियम पाला नहीं जाता। चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के लिए भी न्यूनतम शिक्षा की अर्हता देखनेवाली व्यवस्था अगूंठाछाप मंत्रियों के आगे अंधी बन जाती है।इन सबके फलस्वरूप विधायिका कोई नीतिगत निर्णय नहीं ले पाती। दिग्‌भ्रम के चलते देश को अनिर्णय के अधर में लटकाये रखने का जीवंत प्रतीक बन चुकी है हमारी विधायिका। मसला हिन्दी को लागू करने का हो, महिला आरक्षण का या अफजल गुरू को फॉंसी देने का, वोट बैंक के आधार पर संतुलन बनाये रखने के लिए सर्वदा यथास्थिति बनाये रखी गई । राज्यों में हमारी विधानसभाएं एवं विधानपरिषद भी संसद का प्रतिरूप बनकर ही काम कर रही हैं।

कार्यपालिका की लालफीताशाही की कथा बयान करने में कई सर्ग कम पड़ सकते हैं। अवैध रूप से भारत में रह रहे (अधिकांश बस चुके) बांग्लादेशी नागरिकों को आठ सौ रूपये में राशनकार्ड उपलब्ध करवाने वाली भ्रष्ट व्यवस्था देश के ईमानदार नागरिकों को "डोमेसाइल' लेने के लिए कैसा नाच नचवाती है, ये किसी भी भुक्तभोगी से पूछ लें। "ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल' द्वारा जारी रपट के मुताबिक भ्रष्ट कार्यपालिका वाले देशों में भारत अग्रणी है। रपट "वर्ल्ड इकानॉमिक फोरम' द्वारा विश्व के 11000 उद्यामियों के बीच कराये गये सर्वेक्षण पर आधारित है। विश्व निर्यात में 1.2 प्रतिशत की भागीदारी रखनेवाले भारत का रिश्वत सूचकांक (Bribe payer index) 4.52 है। 1 से 10 के पैमाने पर सबसे कम अंक लेकर रिश्वतखोरी में हम सबसे ऊपर हैं। इस सर्वेक्षण में हमारी राजनीतिक व्यवस्था को सर्वाधिक भ्रष्ट बताया गया है, दूसरे स्थान पर पुलिस है। सच भी है, खाकी और खादी अब आतंक के नए पर्याय बन चुके हैं । इस सर्वेक्षण का अपने धरातल पर विस्तार करें तो भ्रष्टाचार की इस प्रतियोगिता में सार्वजनिक निर्माण विभाग, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सरकारी अस्पताल, बिजली विभाग, चुँगी नाका सभी एक दूसरे से होड़ करते दिखते हैं।

राजनीतिक व्यवस्था और पुलिस की गलबॉंही के उदाहरण हम रोज देखते-सुनते-पढ़ते रहते हैं। 100 या 50 रुपए की चोरी करनेवाले, बस्ती के सार्वजनिक नल पर पानी को लेकर हुए झगड़े में बंदी बनाये गये कथित गंभीर अपराधी, पापी पेट के कारण टोकरियों में सामान भरकर यहाँ-वहाँ व्यापार करते पर अतिक्रमण निरोधी दस्ते से उलझकर तू-तू-मैं-मैं कर सरकारी काम में बाधा पहुँचाने के आरोपी, एक समय जलनेवाले चूल्हे के लिए अपने ही जंगल से लकड़ियॉं लेकर आनेवाले आदिवासी पुलिस थानों में रोज पिटते रहते हैं। इसके विपरीत करोड़ों के घोटाले, हत्या, दंगा उकसाने के आरोपी राजनेता पत्रकार परिषद आयोजित कर लफ्फाजी करते हैं और पुलिस सर्च वॉरंट लिए उनको फरार घोषित कर यहाँ-वहाँ कागजी छापामारी करती दिखती है।

आर्थिक तरक्की का चित्र भी काफी बड़ा करके आजकल खींचा जा रहा है। उन्मुक्त अर्थव्यवस्था के नाम पर हमने हमारे बाजार क्या खोले, धूर्त यूरोप टूट पड़ा। अंग्रेजी में कहा गया है कि कस्टमर्स आर टु गुड टू लूज, कीप देम स्माइलिंग भारतीय ग्राहक को "स्माइलिंग' रखने की कवायद में कई तरह के लटके -झटके शुरू हो गये। क्या वजह है कि भारतीय लड़कियॉं पिछले कुछ वर्षों से ही "मिस वर्ल्ड/मिस यूनिवर्स/ मिस अर्थ' चुनी जाने लगीं। क्या इससे पहले वे सुंदर या बुद्धिमान नहीं थीं? ऑस्कर से नवाजी गई "स्लमडॉग मिलेनिअर' को फिल्ममेकिंग की थोड़ी भी समझ रखनेवाले किसी भी सामान्य व्यक्ति को दिखा लीजिये। यथार्थ से परे अतार्किक कथा, पटकथा, लचर ट्रीटमेंट पर वह प्रश्न खड़े कर देगा। इस लेख का उद्‌देश्य हमारी सुंदरियों या कलाकारों की क्षमता पर प्रश्न खड़ा करना नही है। उनकी प्रतिभा निर्विवाद है। प्रश्न है कि ये प्रतिभा अब ही क्यों याद आ रही है? बच्चे के मुँह में लॉलीपॉप रखकर उसका मुंडन कराने के दृश्य आपने प्रायः देखे होंगे। भारतीय राजनेताओं और नीति-निर्माताओं की मदद से हमारे सिर मूँडने का काम गोरा व्यापारी भली-भॉंति कर रहा है। तुर्रा ये कि सिर मुँडाने से जी.डी.पी बढ़ा है। लेकिन तथ्य इससे मेल नहीं खाते। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोश ने अपनी हालिया रपट में जी.डी.पी (सामान्य) के आधार पर 179 देशों की सूची में भारत को 142 वॉं स्थान दिया है। सी.आई.ए. फैक्टबुक ने 192 देशों में भारत को 146 वें स्थान पर रखा है।

वर्षों से प्रलंबित मुकदमे हमारी न्यायपालिका के मूल पर ही कुठाराघात करते हैं।जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड का आदर्श सामने रखनेवाली न्यायपालिका में "डिलेड जस्टिस' द्वारा परोक्ष में न्याय नकारा ही जा रहा है। भारत के "रजिस्ट्रार ऑफ हाईकोर्ट' के अनुसार 31 दिसम्बर 2008 तक देश की निचली अदालतों में 2,66,50467 मुकदमे प्रलंबित थे। उच्च न्यायालयों में चल रहे मुकदमों की संख्या 39,10858 है जबकि सर्वोच्च न्यायालय में 50,659 मामले (19,296 नियमित + 31363 विचारार्थ याचिकाएं ) हैं। गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार इस समय 2069 लोग ऐसे हैं जो बिना किसी पेशी के पॉंच वर्ष से अधिक समय से जेल में हैं। विभिन्न मसलों पर बननेवाले जॉंच आयोग धारावाहिकों की तरह हर बार एक्सटेंशन पाते रहते हैं। ताज़ा उदाहरण लिबरहान आयोग का है। तीन महीने में अपेक्षित रिपोर्ट को आने में सत्रह वर्ष लग गये। इस पर कार्यवाही कब होगी, मुकदमा कब चलेगा, निर्णय कब आयेगा ? ऐसे अनेक आयोगों की रिपोर्ट धूल खा रही है। वर्तमान में कार्यरत आयोगों की मियाद बढ़ाते रहने का रूटीन काम जारी है और नतीजा-वही ढाक के तीन पात।

भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य को सुधारने, चहारदिवारियों में होनेवाले शोषण को उजागर करने में मीडिया ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई । आपसी प्रतियोगिता के चलते ही क्यों न सही, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने लोकतंत्र को झकझोरना शुरू किया। हरियाणा के मासूम प्रिंस के प्राण बचना मीडिया की सक्रियता का सकारात्मक परिणाम था। पर धीरे-धीरे 24 घंटे चैनल चलाये रखने के दबाव ने चैनलों की चाल-ढाल में परिवर्तन आंरभ कर दिया।"जो बिकेगा वही दिखेगा' की नीति पर चलते मसाला तलाशा जाने लगा है। सो खबरें छूट गई, ब्रेकिंग न्यूज के नाम पर सनसनियॉं शुरू हो गईं। चौथे स्तंभ का जामा पहने मीडिया "लाइव कवरेज' को न्यूज बनाकर पेश करने लगा। समाचार में वांछित विश्लेषण और सत्य पीछे छूटते गये और पहली नज़र में सुर्खी बनने की क्षमता रखने वाली ऊटपटांग तात्कालिक घटनाएं, तुरत प्रतिक्रिया के साथ छाने लगीं। अभिव्यक्ति के आधुनिक क्षितिज तलाशने के मुगालते में अब मीडिया-रिअलिटी शो या प्रश्नोत्तरों के नाम पर अश्लीलता, कामुकता और वीभत्स बातें सार्वजनिक रूप से परोसने लगा है। विकृत, द्विअर्थी और यौनांगो की छिछोरी चर्चा को हास्य की नई परिभाषा बनाकर पेश का दिया गया है।

जनता से सीधे संपर्क और व्यापकता के चलते मीडिया लोकतंत्र के अन्य तीनों स्तंभों पर हावी हो गया है। इस अहंकार के कारण पवित्र मंदिर अब मठ में तब्दील होता जा रहा है। इन मठों में स्वयंभू पंडित, मौलाना, पादरी रहने लगे हैं। धर्म की "बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रूपैया' की नई क्रांतिकारी परिभाषा के ये अन्वेषक हैं। प्रिंट मीडिया में किसी अखबार की खबरें पढ़कर पाठक समझ जाता है कि अखबार किस राजनीतिक दल या समूह के लिए काम कर रहा है। पाठक या दर्शक जो आग्रह या दुराग्रह के बिना केवल खबर चाहता है, ठगा सा अनुभव कर रहा है। खबरों की विश्वसनीयता को जॉंचने की मॉंग प्रबल हो रही है। यही कारण है कि अनेक संगठनों ने मीडिया पर भी सूचना का अधिकार कानून लागू करने की हिमायत की है। अन्य तीन स्तंभों के प्रमुखों की तरह यहाँ भी समूह प्रमुख द्वारा अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा वांछित है।

ऐसा नहीं है कि पिछले 62 वर्ष में हमारी व्यवस्था ने कुछ हासिल ही नहीं किया। पर यदि 62 वर्ष के एक व्यक्ति से उसकी उपलब्धियों की जानकारी मॉंगी जाये और वह अपनी शिक्षा, नौकरी, विवाह, संतानों की शिक्षा, उनकी नौकरी का उल्लेख करे तो यह कितना तर्कसंगत होगा? राष्ट्र के जीवन में भी ढेर सारी प्रक्रियाओं को प्राकृतिक रूप से अनिवार्यतः घटना पड़ता है। इस अनिवार्यता को उपलब्धि का मुलम्मा चढ़ाकर देखा नहीं जा सकता। राष्ट्रीयता की संकल्पना का आधार भावुक हो सकता है पर राष्ट्र का आकलन तथ्यों के आधार पर किया जाता है। ये आकलन भविष्य में यात्रा की दिशा तय करते हैं।

वर्तमान में लोकतंत्र के चारों खंभों की दशा और दिशा पर सवाल उठ रहे हैं। विंस्टन चर्चिल की भारतीयों द्वारा अपना देश संभाल कर न रख पाने की भविष्यवाणी भी चर्चा में है। तथ्यात्मक कटु सत्य इंगित कर रहा है कि आलम यही रहा तो इन चार खंभों को लोकतंत्र को ढोते चार कंधों में बदलते देर नहीं लगेगी। गणतांत्रिक-लोकतंत्र का केंद्र है नागरिक। अतः आम नागरिक से सजगता की अपेक्षा है। लोकोक्ति है कि पशु उसे कहते हैं जो सोचता नहीं, बोलता नहीं। नहीं सोचने, नही बोलनेवाला पशु हो जाता है। वर्तमान शासन व्यवस्था से यदि वांछित परिणाम नहीं मिल रहे तो समानुपातिक लोकतंत्र अथवा राष्ट्रपति प्रणाली के विकल्प की संभावना तलाशी जानी चाहिए। ये बहस का मुद्दा हो सकता है पर चौपाये द्वारा हाँका जाता दोपाया बने रहने से बेहतर है कि हम इस दिशा में सोचना और बोलना शुरू करें।

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मेरा देश कब होगा आजाद !

वे लूट रहे हैं आभूषण सभ्यता के

वे खींच रहे हैं वस्त्र संस्कृति के

वे ओढ़ा रहे हैं अपना चोला इतिहास को

वे मिटा रहे हैं हमारी आस्था विश्वास को,

कभी भाषा, कभी साहित्य

प्रायः परंपरा और सर्वदा पहरावे

के क्षेत्र पर छा रहे हैं

अपने बच्चों के निवाले

हम उन्हें थमा रहे हैं,

भूमंडलीकरण के नाम पर

देश बना बैठा हाट है

विदेशी मुद्रा के नाम पर

निर्लज्ज ठाठ-बाट है,

लूट-खसोट के इस दौर में सुनता हूँ,

कहकहे, भाषणबाजी और अट्टाहस

देखता हूँ-

बिका हुआ स्वाभिमान, नारेबाजी

और शराब से भरा गिलास,

निजीकरण के बैनर तले

मॉं को बाजार में उतारने की विकृति

बलि के लिये ले जाते

प्राणी की सी स्थिति,

रैम्प की धुन पर थिरकता

भरतनाट्यम्का समाज

गोरों को लज्जित करता

काले फिरंगियों का राज,

प्रश्न अनुत्तरित रखने के नुस्खे

दिखावटी उत्तरों की बरसात

कानों पर रखकर हाथ

सोचता हूँ, हर पंद्रह अगस्त को

मेरा देश कब होगा आजाद ?

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