रविवार, 30 अगस्त 2009

कौशल पंवार की कविताएँ

1 घुटन   घुटती हूं मैं जब-जब याद आते हैं वो लम्हे !   चलती राह पर साइकिल लिये जा रही थी अचानक लगा कोई पीछा कर रहा है उस...

रत्नकुमार सांभरिया का आलेख : प्रेमचंद, ‘मंदिर’ और दलित

सन् 1928 से लेकर 1935 के दस वर्ष के अछूतोद्धार आंदोलन का आकलन करें तो पुष्टि होगी कि यह आंदोलन दलितों के मंदिर प्रवेश तक केन्द्रित रहा। हिन्...

शनिवार, 29 अगस्त 2009

राकेश भ्रमर की कविता : वीर हो तुम!

  तुम हवाओं से लड़े हो वीर हो तुम! थक गए होगे जरा विश्राम कर लो वृक्ष की छाया तुम्‍हें शीतल लगेगी इस नदी का जल तुम्‍हें मी...

अशोक गौतम का व्यंग्य – मेरा बॉस, मेरा बाप

ईमानदारों का साथ भगवान देता है । सच्‍चों का साथ भगवान देता है , इसी बूते पर पिछले महीने साहब से पंगा ले लिया । तय माना था कि भगवान निर्बल का...

रचना दीक्षित के कुछ मुक्तक

एक बेबस सी औरत जो खड़ी है ऐसे मंज़र पर एक हाथ में कलम दूसरे में दस्तरखान है एक तरफ लज़ीज़ पकवान हैं दूसरी तरफ दुःख की दास्तान है ...

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

राकेश भ्रमर की कहानी : उस गांव का चांद

उसका नाम ड्रीमलेट था. पहाड़ी गांव की एक निश्‍छल, चंचल लड़की... पहाड़ी झरनों सी जंगल में भटकती थी. अपने गांव के अलावा उसे बाकी दुनिया के ...

शोभना चौरे की कहानी : आनन्द

आज आठ साल बाद, सरिता की सास उसके पास आई थी। सरिता यश की नई नई शादी हुई थी जब वे लोग ऊपर के फ्लैट में रहने आए थे। दोनों का लव मैरिज़ था सा...

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

लक्ष्मण व्यास का आलेख : नए दौर में अतीत का संघर्ष

सामंती मूल्‍य दृष्‍टि और पुरुष प्रधान पितृसत्तात्‍मक समाज के पुरजोर प्रयासों के बावजूद मीरा लोक स्‍मृति में बची रही इसका क्‍या कारण है ? ...

गजेन्द्र कुमार मीणा का आलेख : राजकमल चौधरी की कविताओं में राजनीतिक चेतना

13 दिसम्‍बर 1929 को रामपुर हवेली, जिला सहरसा (बिहार) में राजकमल चौधरी का जन्‍म हुआ। उनका वास्‍तविक नाम मणीन्‍द्र चौधरी था, राजकमल उ...

संजय भारद्वाज का आलेख : दोपाया लोक – चौपाया तंत्र

(संजय भारद्वाज का यर आलेख पंद्रह अगस्त को स्वाधीनता दिवस विशेष रूप में प्रकाशनार्थ प्रेषित किया गया था, मगर स्पैम हो जाने के कारण यह इनबॉक्स...

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