शनिवार, 29 अगस्त 2009

रचना दीक्षित के कुछ मुक्तक

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एक बेबस सी औरत

जो खड़ी है ऐसे मंज़र पर

एक हाथ में कलम

दूसरे में दस्तरखान है

एक तरफ लज़ीज़ पकवान हैं

दूसरी तरफ दुःख की दास्तान है

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लोग बन्दों को खुदा बनाते हैं

मैंने खुदा को बन्दा बनाने की

हिमाकत की है

वो जो बोलता नहीं

समय से पहले अपनी गठरी खोलता नहीं

लोग कहते हैं

वही खुदा है

पर हर बन्दा जो हमको मिला

खुदा हो गया

खुदा की तरह न बोला न मुस्कराया

बस फना हो गया

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आज हवा में कुछ हरारत सी है

कोई हया से पिघल गया होगा

आज हवा में शरारत सी है

कोई शरीर दिल मचल गया होगा

आज हवा में कुछ नमी सी है

कोई आंख भिगो गया होगा

आज हवा में कुछ कमी सी है

कोई रुखसत हो गया होगा

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लोगों ने चिरागों को जलाया

रोशनी के लिए.

हमने तो चरागों से अपने ही

हाथों को जलाया है.

हमने जब-जब रोशनी को सजाना चाहा

अंधेरों को और बढ़ाया है

लोग तो मोहब्बत की खातिर दिलों को जलाते हैं

हमने तो मोहब्बत में ही जख्म पाया है

लोग तो दिलों को सजाते है दिलदार के लिए

हमने तो दिलदार से ही धोखा खाया है

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वो जो जा रहा है शबे गम गुजार करके

कोई रहगुजर नहीं है मेरा हमसफ़र नहीं है

मेरी जिन्दगी को इसने जख्मों जहर दिए हैं

मेरी सांसें औ जुबान कहीं गिरवी रख दिए हैं

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4 blogger-facebook:

  1. बेहतरीन मुक्तक। आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहद खूबसूरत मुक्तक ..
    आभार ..!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. एक तरफ लज़ीज़ पकवान हैं
    दूसरी तरफ दुःख की दास्तान है
    औरत की कितनी बारीक दास्तान है ये.

    उत्तर देंहटाएं

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