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रचना दीक्षित की कुछ कविताएँ

women - art by rekha shrivastava

जंगल और रिश्ते

कभी यहाँ जंगल थे

पेड़ों की बाँहें

एक दूसरे के गले लगतीं

कभी अपने पत्ते बजाकर

ख़ुशी का इज़हार करतीं

कभी मौन हो कर

दुःख संवेदना व्यक्त करतीं

न जाने कैसे लगी आग

सुलगते रहे रिश्ते

झुलसते रहे तन मन

अब न वो जंगल रहे

न वो रिश्ते

जंगल की विलुप्त होती

विशिष्ठ प्रजातियों की तरह

अब अति विशिष्ट और विशिष्ट रिश्ते भी

सामान्य और साधारण की

परिधि पर दम तोड़ रहे हैं

रोक लो

संभालो इन्हें

प्रेरणा स्रो़त बनो

इन्हें मजबूर करो

हरित क्रांति लाने को

रिश्तों की फसल लहलहाने को

क्योंकि अब रिश्तों को

मिठास से पहले

अहसास की ज़रूरत है

कि कुछ रिश्ते और कुछ रिश्तों के बीज

अभी जीवित हैं

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-

  

धूप का दर्द

अब तो धूप के भी पांव जलने लगे हैं

अपनी ही तपिश से

न सहारा न छाँव

कभी यहाँ पेड़ हुआ करते थे

उनकी टहनियों पर बैठ

सुस्ता लेती थी धूप

कभी पत्तियों के साथ

आंख मिचोली

कभी पक्षियों संग

छुपन छुपाई

 

अब तो धूप के भी पांव सुलगने लगे हैं

अपनी ही तपिश से

कंक्रीट के घने ऊँचे जंगल

सुलगती छतें

मीलों फैले रेगिस्तान

उस पर रूठी बयार

पानी को तरसती

धरती की छाती

 

अब धूप के पांव में फफोले पड़ने लगे हैं

अपनी ही तपिश से

सुबह से शाम तक सिर्फ चलना

मीलों मीलों और मीलों

एक घर से दूसरा

एक गली से दूसरी

शाम होते होते

बेहाल बेदम बेहोश हो कर

लड़खड़ा कर गिर पड़ती है धूप

और सारी रात

चांदनी का मलहम लगा कर

किसी कोने में पड़ी

करवटें बदलती कराहती सुबकती है धूप

फिर अनमने से करती है

अगले दिन का इंतजार

 

अब धूप के पांव के घाव बढ़ने लगे हैं

अपनी ही तपिश से

सोचती है धूप की कह दूं

अपने दिल की बात

 

कब लगेंगे पेड़

कब फूटेंगी कोपलें

कब खेलूंगी

धूप छावं का खेल

कब आँगन में किसी बच्चे की

बन के छाया

अठखेलियाँ करूंगी

कब आएगा बादल

कब बरसेगी बदली

कब दिन भर अपने घर बैठ

चिंतन करूंगी

 

आगे बढ़ने होड़ में

ऐ दुष्ट प्राणी

तूने क्या खोया क्या पाया गयी

पैसा कमाने की होड़ में

भूल गया मुझ दुखयारी को

थक गयी हूँ मैं

मुझे विश्राम चाहिए

मुझे कुछ पेड़ चाहिए

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सृष्टि

 

 

जब चाँद कभी झुक जाता है

और बादल को गले लगाता है

जब कोई कहीं शर्माता है

और झूम-झूम वो जाता है

तो बारिश का महीना आता है

 

जब कोई याद किसी को करता है

और सारा इतिहास गुजरता है

जब वक़्त कहीं पे ठहरता है

और आँखों से निर्झर बहता है

तो सावन का महीना आता है

 

जब नन्ही आँखों में कोई सुंदर सपने संजोता है

और कागज़ की कश्ती को ले कोठे पे दौड़ा जाता है

जब इन नन्ही आँखों को करने को कुछ न रह जाता है

तो रिमझिम का महीना आता है

 

जब अपनी बिटिया रानी का इक अच्छा रिश्ता आता है

और उस रिश्ते की खातिर इक गांठ लगाया जाता है

जब ख़ुशी-ख़ुशी गुडिया रानी के सपने को सजाया जाता है

और उसे प्रीतम के संग डोली में बिठाया जाता है

तो वृष्टि का महीना आता है

 

जब कामुकता को हद से बढ़ाया जाता है

और वो विकराल रूप ले आता है

जब अपनी ही बिटिया को बाप अपने पास बुलाता है

फिर उस पे बुरी नज़र दौड़ाता है

तो सृष्टि को पसीना आता है

---

(चित्र – रेखा की कलाकृति)

टिप्पणियाँ

  1. स्रष्टि को पसीना आता है---सुन्दर अभिव्यक्ति। आगे बढने की होड में मानव स्वयं को ही मिटाने का उपक्रम कररहा है--बहुत सत्यं,शिवम, सुन्दरं प्रस्तुति . बधाई.
    ----स्रष्टि के अन्तिम तीन पद- वक्तव्य हैं कविता नहीं, सुधार की गुंजाइस है।

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