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रचना दीक्षित की असह्य वेदना की कविताएँ

मौत से बातें
 
आज फिर मेरी मौत हो गयी                            
अपनों से बिछुड़ने का ग़म क्या कम था   
जो सारी दुनिया खफा हो गयी  
आज फिर मेरी मौत हो गयी
कब से पड़ा था मेरा जनाज़ा कोई कांधा देने  को   न था 
एक बची थी में अकेली
आज फिर मेरी मौत हो गयी
अपना जनाज़ा अपने कांधों पर ले के जो निकली 
एक अजनबी की बददुआ लग गयी  
आज फिर मेरी मौत हो गयी
 यूँ तिल तिल जीना,यूँ तिल तिल मरना 
आज मौत इतनी बेखौफ हो गयी 
आज फिर मेरी मौत हो गयी
यूँ चिंदा चिंदा जिंदगी यूँ लम्हा लम्हा मौत 
आज मौत जिंदगी से बड़ी हो गयी 
आज मेरी आखिरी मौत हो गयी
_______________________________________________________________ 
       ग़म
 
एक ग़म जो तुमसे मिला
उसके मिलने का अब क्या गिला 
एक रहबर जो मुझे मिला 
उसके बिन अब क्या काफिला 
अब तो यूँ ही चलेगा गम का सिलसिला 
सुकून मिला,मिला,न मिला न मिला 
उसके न  मिलने का भी अब क्या गिला 
अब तो है यह सिर्फ ग़मों का काफिला 
इसमें  फिर एक ग़मगीन फूल खिला  
एक ग़म जो तुमसे मिला 
उसके मिलने का अब क्या गिला  
________________________________________
  पर तुम न आये 
 
होंठों ने कितने ही गीत  गाये 
आँखों ने सपने सजाये
कितने ही मौसम गुज़रे 
कितने ही सावन आये  
पर तुम न आये 
कभी सोचा तेरे होंठों की छू पायें 
पर आस पास थे भौरों के साये 
ये बात और है कि हमने
कुछ ज्यादा ही सपने सजाये 
पर तुम न आये 
बिछुड़ गए अपने ही सब साए 
आज मेरे ख्वाब  ही ख्वाब होने की आये 
शुक्र  है तुम आज मेरी मजार पर आये 
फूल चढाने न सही,ले जाने तो आये 
_____________________________
 
    रातें
काली सी स्याह रातें 
हर तरफ कांटे ही कांटे  
पथरीली सी ये धरती 
रेतीली हैं चक्रवातें 
बुझता हुआ सा दीपक 
उखडी हुई हैं साँसें 
व्याकुल सा है ये तन-मन 
बोझिल हुई हैं ऑंखें 
आतुर सा ये जिगर है 
कोई  आह़त से दिल में झांके 
पल पल मरी हूँ इतना 
कोई  मेरा ग़म क्यों बांटे                   
दो पल की ख़ुशी आस  में
अटकी हैं चंद साँसें
काली सी स्याह रातें 
हर तरफ कांटे  ही कांटे

टिप्पणियाँ

  1. इन छोटी छोटी नज़्मो में छुपा दर्द अपनी इंतेहा तक पहुंचा दिखाई देता है । दर्द जिसकी कोई सूरत नही होती ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. gahre ahsason se labrej kavitayein....badhayi

    उत्तर देंहटाएं

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