रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

November 2009
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

art10

हाय री दुनिया

दिखने में जैसे दिखती मगर वैसी नहीं है - दुनिया ।

हँसाने के बाद रूलाती है - दुनिया ।

सच्‍चाई नही, झूठ पसन्‍द करती है -दुनिया ।

सिर्फ अपना फायदा सोचती है - दुनिया ।

किसी की लाचारी पर हँसती है - दुनिया ।

दूसरों की खशी पर जलती है - दुनिया ।

हलाल का नहीं हराम का चाहती है - दुनिया ।

इनसानियत को पैसों से तोलती है - दुनिया ।

ईश्‍वर से भी भीख मँगवाती है- दुनिया ।

हमेशा मौत चाहती, मगर मौत आने पर

जीना चाहती है - दुनिया ।

जीवित रहने पर ही नहीं, मर जाने के बाद भी

जलाती है - दुनिया ।

मर जाने के बाद क्‍यों याद कर आँसू बहाती है

- दुनिया ?

---

 

डॉ. एम. शाहुल हमीद,

प्रवक्‍ता, हिन्‍दी विभाग,

मनोंमणियम सुन्‍दरनार विश्‍वविद्यालय,

तिरूनेलवेलि

तमिलनाडु

Deendayal Sharma (WinCE)

पानी!

ओ पानी

तू ढालते ही

ढल जाता है

जमाने से

जम जाता है

और उड़ाते ही

उड़ने लगता है-

हर बार।

आखिर क्यूं?

बता पानी

बता तू

कि

कब तक जिएगा

खुद को

कठपुतली बनाकर।

कवि!

तू क्यों नहीं समझता

कि मैं जल हूं

और केवल जल ही नहीं

जीवन हूं तुम्हारा।

तूने मेरे त्याग को

समझ लिया कठपुतली

और अपना सारा स्वार्थपन

थोप दिया मुझ पर!

तुम कितने स्वार्थी हो

सचमुच-

कवि!

तुम बहुत स्वार्थी हो।

---

दीनदयाल शर्मा, हनुमानगढ़ जं., राजस्थान,

 Image006 (WinCE)

पेड़ से उतर कर

बहुत चहकती - फुदकती थी

मेरे आंगन में

बच्चों की तरह

कभी पूँछ हिलाती

मेरे गुड़िया की तरह

कभी मुंह बनाती

अठखेलियाँ करती

 

कभी पेड़ पर

कभी मुंडेर पर

चढ़ती - उतरती

निकल जाती पास से

एक बच्ची की तरह

मुझे

बहुत अच्छी लगती थी

वह गिलहरी

ठीक मेरी बेटी की तरह.

 

मैं चाहता था

यूं ही खेलती रहे

मेरे आंगन में

मेरी बच्ची

और यह गिलहरी.

मगर एक दिन

काट दिया गया वह पेड़

एक विशाल भवन के लिए.

 

पेड़ के साथ ही

चली गई गिलहरी

न जाने कहाँ 

कर गई सूना मेरा जहाँ

ठीक उसी तरह

चली गई थी

पराई होकर

जैसे

मेरी बेटी!

 

हनुमानगढ़ जं. -३३५५१२, राजस्थान , मोबाइल : ०९४१४३२९५०५ ,

-प्रेषक : दीनदयाल शर्मा, मोबाइल : 09414514666


Image030

आप किसी भी कार्य का प्रारम्भ कैसे करते हैं कैसे मतलब कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व आप क्या सोचते हैं परीक्षाओं की तैयारी से पूर्व आपके मन में क्या रहता है या फिर आप कार चलाना सीखना चाहते हैं, सीखना शुरू कर रहे हैं, तब आपको क्या लगता है युवाओं से पूछे गए ऐसे कई प्रश्नों का प्रत्युत्तर होता है -´´तब मन में संशय रहता है कि पता नही क्या होगा, काम कैसे हो पाएगा, परीक्षा में अच्छे नम्बर मिलेंगे या नहीं, कार चलाना सीख पाएंगे क्या, पता नहीं कितने दिन लगेंगे.............।´´ बस यही गड़बड़ है। जैसे ही आपके मन में किसी कार्य के आरम्भ से पूर्व संशय आ गया, तो फिर समझ लो उस कार्य में सफलता मिलने की संभावना आधी ही रह जाती है। इस संशय का कारण है स्वयं पर विश्वास की कमी। हमें आपने आप पर विश्वास नहीं होता, इसीलिए हमें कोई भी कार्य ठीक प्रकार होने का विश्वास भी नही रहता। मन में शंका उभरने लगती है। ये शंकाएं तेज गति से अपना प्रभाव फैलाती जाती हैं और हमारे मन निराशा की ओर बढ़ने लगता है। हमारी मन की सकारात्मक शक्ति क्षीण होने लगती है और सामने असफलता ही दिखती है।
लव-कुश ने बालक होते हुए भी अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा रोक लिया, बालक कृष्ण ने शेषनाग को काबू में कर लिया, तेनजिंग-हिलेरी ने एवरेस्ट को जीत लिया, कल्पना चावला अंतरिक्ष मिशन पर जा पहुंची, कई बार हमारे सैनिकों ने खतरनाक आंतकवादियों को मार गिराया, अभिनव बिन्द्रा को ओलंपिक मेड़ल, सचिन का सर्वाधिक रनों का विश्व रिकार्ड...............ऐसे सैकडों उदाहरण हैं। इन सबकी सफलता का रहस्य है - मन में दृढ़ विश्वास।
एक सरल प्रयोग आप करके देखिए। प्रात: उठें तब मन में 10-15 बार यह दोहराएं-´´आज मैं पूरे दिन प्रसन्न रहूंगा।´´ और देखिए चमत्कार। दिन भर में भी जब आपको लगे कि आप इससे कहीं भटक रहे हैं, तो यही वाक्य मन में फिर से 10-15 बार दोहरा लें। रात्रि को आप जब पूरे दिन की गतिविधियों पर चिंतन करेंगे, तो आपको यह जानकर हर्ष एवं आश्चर्य होगा कि अन्य दिनों की अपेक्षा आज आपने सभी काम बड़ी सहजता-सरलता से संपन्न किये हैं। यही है मन के विश्वास की शक्ति।
इस प्रयोग में सफलता मिली है, तो इसे हर काम में अपनाएं। जब भी, जो भी कार्य प्रारम्भ करें मन में कई बार यह विश्वास दोहराएं-´´यह कार्य मैं अवश्य कर लूंगा।´´ परीक्षा की तैयारी करते समय मन में यही विचारें कि ´´मैं परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करूंगा।´´ बिना संशय लाये मन में स्वंय पर विश्वास दृढ़ कीजिए कि-´´मैं यह कर सकता हूँ। मुझमें इतनी क्षमता है।´´  आप पाएंगे कि कठिन लगने वाले कार्य भी सहज हो गए हैं, या पहले याद नहीं होने वाले उत्तर अब याद हो गए हैं।
बुजुर्गों ने कहा भी है कि-´´मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।´´ तो फिर अभी से स्वंय पर विश्वास को दृढ़ करने की प्रक्रिया शुरू कर दो। एक बार आपके मन में यह विश्वास जम गया कि आप कर सकते हैं, तो फिर उस काम में आपकी सफलता सुनिश्चित है। मन में विश्वास की यह शक्ति हमें मिलती है ईश्वर के प्रति श्रद्धा के माध्यम से। हमारे मन में ईश्वर के प्रति जितनी श्रद्धा होगी, हमारा स्वंय पर विश्वास उतना ही दृढ़ होगा। ध्यान रखिये यह शक्ति सत्कर्म के लिए है, दुष्कर्म तो जीवन की निष्फलता का द्योतक है। तो अब से जो भी करें स्वयं पर पूर्ण विश्वास रखकर करें। आपको हर कदम पर सफलता मिलती जाएगी।

---

चित्र – नवल जायसवाल का छायांकन

Image135

ग़ज़ल 1

मैं हूँ बीबी से परेशान तुम्हें क्या मालूम

है मुसीबत में मिरी जान तुम्हें क्या मालूम

 

जब से शादी हुई घर के रहे न घाट के हम

मर गए दिल के सब अरमान तुम्हें क्या मालूम

 

घर से बन ठन के न यूँ रात को निकलो खानम

राह में होगा कहीं खान तुम्हें क्या मालूम

 

पान मुंह में है अंधेरा है कहाँ ढूंढोगे

कहाँ रक्खा है उगलदान तुम्हें क्या मालूम

 

डर खुदा का नहीं मालिक का भी खा लेते हैं लोग

उठ गया दुनिया से ईमान तुम्हें क्या मालूम

 

वो जो शैतान था बैठा है सरेण्डर कर के

आदमी हो गया शैतान तुम्हें क्या मालूम

 

शादी के बाद बुरा वक़्त है आया जिसका

उसका अल्ला है निगहबान तुम्हें क्या मालूम

 

फर्माबरदार रहे, जुल्म सहे, कुछ न कहे

अच्छे शौहर की है पहचान तुम्हें क्या मालूम

 

सच तो कहते हैं मगर जान पे जब आती है

‘फ़ैज़’ बन जाते हैं अंजान तुम्हें क्या मालूम

 

----

 

ग़ज़ल 2

 

मेरी बीबी मुझे सताती है

अपनी-अपनी ही बस चलाती है

 

खाना होटल से वो मंगाती है

घर में चूल्हा नहीं जलाती है

 

ख़ूब खर्राटे नींद में लेकर

मेरी रातों की नींद उड़ाती है

 

खूब सलमा सितारे जड़-जड़ के

काली साड़ी में झिलमिलाती है

 

जब कभी खोलती है दरवाजा

फ़िल्म के गीत गुन गुनाती है

 

घर में सब काम मैं ही करता हूं

वो तो चिल्लाती और खाती है

 

मैं परेशान जब भी होता हूं

ऐसे मौक़ों पे मुस्कुराती है

 

उसको साहिल का कुछ पता ही नहीं

अपनी मस्ती में डूब जाती है

 

‘फ़ैज़’ कब तक करूं सहन आखिर

अक्सर आँखें मुझे दिखाती है

---

संपर्क – 17, पुरोहितों का वास, रतलाम (मप्र)

yashwant kothari[2]

मेरी बड़ी खराब आदत है, जब भी मौका लगता है कबाड़ी बाजार में या रद्दी वाले के यहां पर जाकर पुरानी पत्र-पत्रिकाएं, पुस्‍तकें आदि टटोलता रहता हूं, क्‍योंकि कभी-कभी घूरे में दानों के साथ-साथ मोती मिल जाते हैं ।

उस रोज यही सब करते-कराते पत्रों की एक पोटली मेरे हाथ लगी । जिज्ञासावश इसे पढ़ गया और आप सभी के ज्ञानवर्धन हेतु ज्‍यों की ज्‍यों धर दीन्‍ही चदरिया ।

प्रथम पत्र किन्हीं संपादक जी का है । लिखते हैं-

हे प्राण्‍ोश्‍वरी, मयूरपंखी, सुनयने,

जब से तुम्‍हें देखा है, मैं संपादकी छोड़कर कविता करने लगा हूं । तुम श्रृंगार रस की अनुपम उदाहरण हो । बिहारी की नायिका, रीतिकालीन सखी हो । आओ केलि-कीड़ा करें, नवअभिसार रचें ।

तुम्‍हारी वो स्‍वरचित कविता जो तुमने कल भ्‍ोजी थी, मैं मुखपृष्‍ठ पर सचित्र प्रकाशित कर रहा हूं, सो जानना ।

तुम किसी मेघदूत का इंतजार किए बगैर सीधी आफिस में आ जाना ।

तुम्‍हारी पिछली रचना का पारिश्रमिक मैंने टी.एम.ओ. से भिजवा दिया था । मिल गया होगा ।

तुम्‍हारे इंतजार में ।

तुम्‍हारा

प्‍यासा

दूसरा पत्र कुछ घटिया कागज पर टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा गया है, जो शायद बस के कंडक्‍टर का है-

जाने-मन,

उस दिन जब तुम मेरी बस पर चढ़ीं तो तुम्‍हारे गुजरने के साथ ही मैं किसी पुल-सा-थरथराया । तुमने टिकट मांगा, मैंने कहा, नहीं आपसे टिकट नहीं लूंगा । सरकार का क्‍या है, आपके तीस पैसों से लखपति नहीं हो जाएगी । तुम इस अहसान के बदले में धन्‍यवाद कहना चाहती थीं, लेकिन शरम के मारे तुम्‍हारे बोल नहीं फूटे । मैं समझ गया, तुम क्‍यों नहीं बोलीं ।

बस तब से ही स्‍टाप नंबर 21 पर गाड़ी को काफी देर तक तुम्‍हारा इंतजार करता रहता हूं । तुम आओ या न आओ, मैं तुम्‍हारा इंतजार करता रहता हूं ।

देखो सुनो, किसी दूसरी बस में मत बैठ जाना ।

तुम्‍हारा

बस कंडक्‍टर

आर.एस.वाई.

6099

तीसरा खत साफ-सुथरे अक्षरों में वाकायदा अच्‍छी तरह लिखा गया है । नीचे किन्‍हीं प्राध्‍यापक महोदय के हस्‍ताक्षर हैं -

है सुमुखि, कमलनयनी,

जिस दिन प्रथम बार तुम्‍हें मैंने कक्षा में बिहारी के दोहे का अर्थ पूछा, उसी दिन मुझे लगा-मेरी मंजिल आ गई है । मैं बेकार में इतने वर्ष भटकता रहा । मुझे अब कुुछ नहीं चाहिए । बस थोड़ा सा तुम्‍हारा सहारा मिल जाए ।

देखो मेरे पास क्‍या नहीं है ? एक दर्जन ग्रंथ लिख दिए हैं । मान, सम्‍मान, डिग्रियां, अभिनंदन, यश सभी कुछ है, लेकिन मुझे हमेशा लगता रहा कि कहीं कुछ अधूरा है । कुछ छूट रहा है, लेकिन आज मुझे महसूस हो रहा है कि श्रृंगार, सौंदर्य और रीतिकालीन साहित्‍य क्‍यों रचा गया है ।

देखो, तुम मुझे निराश मत करना नहीं तो मैं आत्‍महत्‍या कर लूंगा ।

और हां, कहीं यह पत्र मैनेजमेंट को मत दिखा देना, नहीं तो मेरी नौकरी का क्‍या होगा ?

तुम्‍हारा और केवल तुम्‍हारा

‘‘क''

चौथा पत्र जल्‍दी में घसीटा गया है । अक्षरों को पढ़ने में भी दिक्‍कत आ रही है, फिर भी कोशिश कर रहा हूं । शायद किसी नेता का है -

डार्लिंग,

देखो ये प्‍यार-व्‍यार सब बेकार की बातें हैं । मैं इसमें विश्‍वास नहीं करता । न ही अब मेरी वह उम्र ही है कि इन चोचलों के चक्‍कर में पड़ू ।

उस दिन तुम अपने पिता का स्‍थानांतरण कराने हेतु मेरे पास आईं तो मैंने केवल तुम्‍हारा मुंह देखकर ही उनका काम कर दिया, वरना मैं ऐसे मातहतों को लिफ्‍ट नहीं दिया करता ।

इधर सरकार में परिवर्तन की संभावना है । मैं शायद केबिनेट में आ जाऊंगा । फिर तुम्‍हें पी.एस. बना लूंगा । ऊंची नौकरी, गाड़ी, सब कुछ, राज करोगी राज । बस अब देर मत करना, नहीं तो मैं केबिनेट से रह जाऊंगा और सारा दोष तुम्‍हारा होगा ।

समझी, देर आयद दुरूस्‍त आयद ।

तुम्‍हारा

‘‘च''

उपरोक्‍त चार खतों को पढ़ने के बाद मेरी हिम्‍मत पांचवें खत को पढ़ने की नहीं हो रही थी, लेकिन पढ़ना पड़ा । ऐसे ही घसीटा गया पत्र था -

मास्‍टर की बच्‍ची,

तु शायद मुझे नहीं जानती, मैं तेरे मोहल्‍ले का इकलौता दादा हूं । तेरे भाई की हडि्‌डयां तोड़ चुका हूं और अगर तूने कुछ भी टू-टा की तो तेरे बाप को भी वहीं भ्‍ोज दूंगा जहां पर तेरा दादा हैं।

कम लिखूं अधिक समझ । कई बार जेल जा चुका हूं, दो खून कर चुका हूं । अब देख कल शाम को पीपल के पेड़ के नीचे आ जाना नहीं तो----------------------------------- ।

तुम्‍हारा

फन्‍ने खां

0 0 0

यशवन्‍त कोठारी 86, लक्ष्‍मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर 302002 फोन 2670596

जीवन सम्‍भावनाओं का दूसरा नाम है और मनुष्‍य है अनगिनत सम्‍भावनाओं की बैसाखियों के सहारे थम-थम कर चलने वाला हिम्‍मतवर सैलानी। जन्‍म के प्रारम्‍भिक क्षण से लेकर मृत्‍यु के अन्‍तिम क्षण तक की सारी यात्रा अनेक रूचियों, भावों और प्रतिक्रियाओं की एक ऐसी परिणति है जिसकी गहराइयों में सब कुछ ऐसे समा जाता है मानो जन्‍म मिला ही इसलिये है कि उसे अपने लिये सब कुछ समेटकर उसी में विला जाना है। औद्योगीकरण, नगरीकरण और वैज्ञानिक अन्‍वेषणों के पार्श्‍व में खड़ा जीवन बाहर से ही नहीं, भीतर से भी बदला है। आजादी ने हमें जितना दिया है, उससे अधिक हम से ले भी लिया है। कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि ‘स्‍वतंत्रता और संस्‍कृति एक अल्‍पसंख्‍यक वर्ग-विशेष को ही मिली है।' सामान्‍य मनुष्‍य तो अभी भी आजादी को टोह रहा है। आजादी राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जितनी अहम उपलब्‍धियाँ लेकर आई है, वैयक्‍तिक स्‍तर पर उतना और वैसा कुछ भी नहीं हस्‍तगत हुआ है। ‘‘व्‍यक्‍ति की मनोव्‍यथा बढ़ी है क्‍योंकि महानगरों में भीड़ बढ़ी है। मनुष्‍य पहले से अधिक अकेला हुआ है क्‍योंकि उसे अस्‍तित्‍व नहीं मिला है। उसकी ऊब दुगुनी हुई है क्‍योंकि मानवीय सम्‍बन्‍ध बिखर गये हैं। मनुष्‍य बेरोजगार होता गया है क्‍योंकि गाँव और नगर पीढ़ियाँ उगल रहे हैं। निराशा का रंग दिन-प्रतिदिन गाढ़ा होता जा रहा है क्‍योंकि मनुष्‍य की स्‍थिति अनपहचान सी होती जा रही है।'' महानगरों में भीड़ का दबाव बढ़ा है तो उसी अनुपात में जीवन यांत्रिक और एक रस होता जा रहा है। नतीजा यह है कि छोटे नगरों में जीवन के अभाव और विषम परिस्‍थितियाँ इतनी अधिक तेजी से बढ़ रही हैं कि व्‍यक्‍ति के मन में ‘एलियनेशन' और ‘बोरडम' की भावना ने डेरा सा डाल लिया है।

उपयुक्‍त साधनों का अभाव, जीवन स्‍तर में उत्‍पन्‍न बाधाएँ, अव्‍यवस्‍था व अनुपयोगी शिक्षा, बेकारी, जनसंख्‍या की बढ़ोत्‍तरी, वैज्ञानिक सुविधाओं का अधकचरापन और बीमारी, गन्‍दगी व भुखमरी के कारण देश का आम आदमी पीड़ित है। उसका रक्‍तचाप या तो ऊँचा है, या काफी नीचा है। वह ‘नार्मल' नहीं रह गया है। युवक-युवतियों को अपनी समस्‍याएँ हैं। अप्राकृतिक यौन सम्‍बन्‍ध, उन्‍मुक्‍त प्रेम, समलैंगिक विवाह, नशीले पदार्थों का सेवन, तलाक, हड़ताल, भू्रण हत्‍या और नंगे-अधनंगे शरीरों का नृत्‍य आदि जीवन को जिस हवा के साथ बहाये जा रहा है वहाँ ठहरकर सोचने का अवकाश ही किसको है ? नयी पीढ़ी समाज की सड़ी-गली परम्‍पराओं को तोड़ रही है। लीक से हटकर अपने अनुसार लीक बना रही है। वह ‘वाइफ स्‍वैपिंग' के खेल खेलती है। फैशन का नया दौर सामने से गुजर रहा है। ‘टापलेस' और ‘मिनी स्‍कर्टस' का फैशन जोरों पर है। फैशन का बाजार गर्म है। एक तरह का डिजाइन आ नहीं पाता कि दूसरा आकर उसे पुराने खाते में धकेल देता है। हिप्‍पी व वीटनिक संस्‍कृति ने देश के महानगरों का जीवन क्रम ही बदल दिया है। वर्तमान जीवन में कालेजों और विश्‍वविद्यालयों का जीवन भी अनाकर्षक अव्‍यवस्‍थित और असन्‍तोषपूर्ण होता जा रहा है। युवा बुद्धिजीवियों के सामने भविष्‍य का रूप स्‍पष्‍ट नहीं है और आज की नारकीय जिन्‍दगी की धकापेल में कर्तव्‍य का ज्ञान ही हवा हो गया है। अतः विगत वर्षों में हमारा जीवन जितना बदला है, उसमें जो अव्‍यवस्‍था, दरार और बिखराव आया है, उतना पिछले सैकड़ों वर्षों में भी नहीं आ पाया था। मध्‍यवर्गीय व्‍यक्‍ति एक ओर तो पुराने संस्‍कारों की जकड़न से बाहर आना चाहता है और दूसरी ओर ‘टेबूज' व रूढ़ियों की जंजीरों को तोड़ डालने पर आमादा है, किन्‍तु करे क्‍या ? उसके हाथों की ताकत गायब है। वह आधुनिक विदेह हो गया है। उसकी संकल्‍पी मनोवृत्‍ति नीचे दब गई है। अतः विवश है, अभिशप्‍त जीवन जी रहा है। इस विवशता ने उसके मानस में कुंठा, एकाकीपन, अजनबीपन, घुटन, निरूद्देश्‍यता, नपुंशक आक्रोश और अकेलेपन के बोध को गहरा दिया है। इस स्‍थिति से केवल पुरूष गुजर रहा हो ऐसी बात नहीं है, स्‍त्रियाँ भी इसी स्‍थिति और परिवेश में जी रही हैं। उनका शरीर रीतिकालीन नायकों के द्वारा तो उन्‍मथित ही हुआ था। आज तो वह बार-बार नापा जा रहा है। वासना के फीते के सामने वह छोटा पड़ गया है। अंग-प्रत्‍यंग पर वासना के नीले निशान हैं और उसकी परिणति भू्रण हत्‍या, एबार्शन और भोग की दीवारों से सिर पटकने में ही रह गई है। कहने का तात्‍पर्य यह है कि आधुनिक परिवेश का मानचित्र काफी भयावह त्रासद और घिनौना है। उसमें समस्‍याओं के पहाड़ हैं, अतृप्‍तियों व विक्षुब्‍ध मनः स्‍थितियों की सरिताएँ हैं, अकेली शैलमालाओं और समूचे मानचित्र में न कोई रंग है, न रौनक। वह विकृत, हाशियाहीन, सीमाहीन और लिजलिजा सा हो गया है। इतना ही नहीं उसमें अंकित प्रत्‍येक नगर अजनबीपन का भार लिये अपनी जगह पर खड़ा भर है। यों उसके आसपास, छोटे बड़े नगरों की भीड़ है, उसका दबाव है, परन्‍तु फिर भी वह अकेला है। ऐसे परिवेश में लिखा गया आधुनिक साहित्‍य इससे अलग कैसे हो सकता था ? नहीं न। अतः उपरिसंकेतित परिवेश से प्रभावित साहित्‍य का रूप रंग भी तदनुकूल ही है।

समूची मानवता, मानवीय सम्‍बन्‍धों और मूल्‍यों का अपने ढंग से पुनरूवेषण करती है, अपने लिये एक मार्ग चुनती है, उसे केवल उसकी जन्‍म विवरणिका के माध्‍यम से कैसे समझा जा सकता है। उसकी पहचान उसकी व्‍यक्‍तिगत रूचियों, आदतों और प्रतिक्रियाओं से तो होती ही है उसे उसके परिवेश और सृजन के सहारे से भी समझा जा सकता है। व्‍यक्‍ति वह नहीं है जो वह बाहर से दिखता है, अपितु असली व्‍यक्‍ति वह है जो आदमीनुमा शक्‍ल का खोल ओढ़कर अपने भीतर एक आदमी को लिये चलता है। यह तथ्‍य सामान्‍य व्‍यक्‍ति से लेकर कलाकार तक पर लागू होता है। आधुनिक जीवन की विसंगतियाँ तो इस तथ्‍य को और भी प्रमाणित कर देती हैं। मनुष्‍य लाख कोशिश करे, परन्‍तु वह आन्‍तरिक संवेदना को छुए बिना न तो जीवन की विचित्रताओं से परिचित हो सकता है और न उसके मूल में कार्य कर रही शक्‍तियों से।

आज का आदमी अपने आसपास के अनेक सवालों से टकराता, टूटता और निर्वासित हो रहा है। क्‍योंकि मनुष्‍य वैज्ञानिक उपलब्‍धियों को अपने जीवन में जाने-अनजाने स्‍वीकार कर रहा है और वैज्ञानिक विचारधारा ही आधुनिकता की धारणा बन गई है। अतः आधुनिकता ने वार्तालाप के दायरे को नितांत सीमित और संकुचित कर दिया है। व्‍यक्‍ति अकेलेपन से निकलने और परिवेश से जुड़ने के लिये छटपटा रहा है। वह जीने के लिये नये सम्‍बन्‍धों और नयी मान्‍यताओं की तलाश करता है ताकि अपनी खोई हुई दिशा को प्राप्‍त कर सके और जीवन को नये सम्‍बन्‍धों और सन्‍दर्भों से जोड़ सके। स्‍वीकार और अस्‍वीकार, ग्रहण और त्‍याग तथा विरोध और सामंजस्‍य की यह बहुत बड़ी उपलब्‍धि है कि एक रचनाकार अपने समय और परिवेश को पूरी ईमानदारी से अपने साहित्‍य में अंकित करता हुआ उसे विश्‍वसनीय बना दे। इसमें प्रकृति की अनाघात छवियों को समाहित कर दे, सौन्‍दर्य की तरंगें , सांस्‍कृतिक संदर्भ और इन सबको वाणी प्रदान करने वाली अद्‌भुत शैली को उत्‍पन्‍न कर दे। इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्तमान युग का हिन्‍दी साहित्‍य युग साहित्‍य है। उसमें समकालीन युग-जीवन की अभिव्‍यंजना है। उसमें मनुष्‍य के राग-विराग, आसक्‍ति-अनासक्‍ति, स्‍वीकार-अस्‍वीकार, ग्रहण और त्‍याग, जीवन के गुह्य और जटिल संदर्भ, युग-त्रासदी और उससे उत्‍पन्‍न विभिन्‍न मनः स्‍थितियों का यथार्थ, विश्‍वसनीय और सही अंकन हुआ है। वर्तमान युग के साहित्‍य का सर्वप्रमुख गुण है। अनुभूति की ईमानदारी और अभिव्‍यक्‍ति का निश्‍छल स्‍याह यथार्थ सबसे बड़ी उपलब्‍धि है। इसके साथ ही समकालीन जीवन की समग्र पहचान-पकड़ और सूक्ष्‍म संवेदनात्‍मक अभिव्‍यक्‍ति। प्रस्‍तुत बिन्‍दुओं पर व्‍यापक विमर्श करना अन्‍वेषक का अभीष्‍ट अन्‍वेषण होगा ।

---

युवा साहित्‍यकार के रूप में ख्‍याति प्राप्‍त डाँ वीरेन्‍द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्‍थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्‍त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्‍ट्र्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की स्‍तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्‍त्री विमर्श, राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी में अनेक पुस्‍तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्‍द्र ने विश्‍व की ज्‍वलंत समस्‍या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्‍तुत किया है। राष्‍ट्रभाषा महासंघ मुम्‍बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्‍व0 श्री हरि ठाकुर स्‍मृति पुरस्‍कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्‍बेडकर फेलोशिप सम्‍मान 2006, साहित्‍य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्‍मान 2008 सहित अनेक सम्‍मानो से उन्‍हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्‍च शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान राष्‍ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।

---

सम्‍पर्क-वरिष्‍ठ प्रवक्‍ता, हिन्‍दी विभाग

दयानन्‍द वैदिक स्‍नातकोत्‍तर महाविद्यालय, उरई (जालौन)285001

clip_image002

हिन्‍दी साहित्‍य की राष्‍ट्रीय कविता-धारा में निराला कवि गुरू हैं। इनके व्‍यापक व्‍यक्‍तित्‍व की गरिमा इस अर्थ में निहित है कि इस कवि ने कविता को मानवीय सत्‍ता सौंपकर इसकी मुक्‍ति का मार्ग प्रशस्‍त किया। निराला जी निश्‍चित अर्थ में युग पुरूष थे। यही कारण है कि इनकी कविताओं को प्रवृत्‍तियों के आधार पर तो किसी वाद विशेष से जोड़कर देखा जा सकता है लेकिन किसी वाद से पूर्णतया सम्‍पृक्‍त इनका व्‍यक्‍तित्‍व कदापि नहीं रहा। आपका जीवन और साहित्‍य, कर्म और ज्ञान साधना और कल्‍पना, विचार और व्‍यवहार जगत की एकरूपता में ही अर्थ-विस्‍तार पाता रहा। डॉ. दूधनाथ सिंह ने निराला को ‘आत्‍महंन्‍ता आस्‍था' की संज्ञा दी है। वे अपने इस नामकरण के सम्‍बन्‍ध में स्‍पष्‍टीकरण देते हुये लिखते हैं -

दरअसल, सच्‍चा रचनाकार-घनी, सुनहली, अयालों वाला एक सिंह होता है, जिसकी जीभ पर उसके स्‍वयं के भीतर निहित रचनात्‍मकता का खून लगा होता है। अपनी सिंह वृत्‍ति के कारण वह कभी भी इस खून का स्‍वाद नहीं भूलता और हर वक्‍त अपने शिकार की ताक में सजग रहता है - चारों ओर से अपनी नजरें समेटे एकाग्र चित्‍त, आत्‍म-सुख, एकाकी और कोलाहलपूर्ण शान्‍ति में जूझने और झपटने को तैयार। इसी तरह की एकाग्रचितता और आत्‍ममुखता में सिंह को मचान पर बैठे हुये शिकारी का ध्‍यान नहीं रहता। यहीं से एक भयंकर अपमान, यंत्रणा और दुःखांत की सृष्‍टि होती है, जिससे वह अपनी सारी गर्जनाओं के बाद भी मुक्‍त नहीं हो पाता और मारा जाता है। महान और मौलिक कलाकारों का यही विम्‍ब बार-बार मेरे दिमाग में बनता है। कला के प्रति सम्‍पूर्ण आत्‍म-समर्पण उसे बाहरी दुनिया से बेखबर कर देता है। वह इन दोनों दुनियाओं में सामंजस्‍य नहीं स्‍थापित कर पाता। वह कोशिश करता है, जैसे सिंह भी कभी-कभी मचान की ओर झपटता है (और निराला ने भी शायद बहुत कोशिश की होगी) लेकिन उसकी सघन आत्‍ममुखता इसमें बाधक होती है। इस तरह यह एकांत समर्पण एक प्रकार का आत्‍मभोज होता है, कला रचना के प्रति यह अनन्‍त आस्‍था एक प्रकार के आत्‍म हनन का पर्याय होती है, जिससे किसी मौलिक रचनाकार की मुक्‍ति नहीं है। जो जितना ही अपने को खाता जाता है - बाहर उतना ही रचता है। लेकिन दुनियावी तौर पर वह धीरे-धीरे विनष्‍ट, समाप्‍त, तिरोहित तो होता ही चलता है। महान और मौलिक सर्जना के लिये यह आत्‍म बलि शायद अनिवार्य है।

दूधनाथ जी के उपर्युक्‍त कथन से यह बात स्‍पष्‍ट होत है कि हर महान रचनाकार निराला की तरह अन्‍तर्मुख होता है, दुनियादार नहीं होता। वह सत्‍तासुख (मचान) की ओर झपटता तो है लेकिन अपने निहित संस्‍कारों के कारण उसमें सफल नहीं हो पाता। इसका यह तात्‍पर्य नहीं कि वह मारा जाता है। प्रत्‍येक रचनाकार जो महान हैं अपनी असफलताओं को उदात्‍त करता है और महान रचना देता है। वह आजीवन मचान की ओर झपट्टा मारकर ही महान बनता है। जो रचनाकार झपट्टा मारने में सफल हो जाता है, वह महान नहीं रह जाता। सुविधा-भोगी होकर सत्‍ता का गुलाम हो जाता है। अतः इस वाक्‍य को इस तरह से भी कहा जा सकता है कि हर महान रचनाकार आत्‍म-भोग में जन-भोग का सुख अनुभव करता है, यही उसकी नियति है। निराला ने भी यही किया है। आपने झपट्टे की चिन्‍ता से अलग अपनी पीड़ाओं, असफलताओं और विवशताओं को उदात्‍त करके समाज के लिये ऐसी कालजयी रचनायें दी हैं, जो झपट्टाबाज रचनाकार कई जन्‍म लेकर भी नहीं दे सकते। यह सच है कि रचनाकार भी मनुष्‍य होता है, उसे भी समाज में रहना पड़ता है, उसे भी सुख-सुविधाओं की ओर आकर्षण होता है उसमें भी मनुष्‍य की सामान्‍य कमजोरियाँ होती हैं। पर हर महान रचनाकार या महापुरूष बिना सुख सुविधाओं को त्‍यागे महान नहीं बनता। वह इस सुख को विवशता से, और स्‍वेच्‍छा से भी वरण करता है। इसके लिये उसके संस्‍कार उत्‍तरदायी होते हैं। निराला के साथ भी ऐसा ही हुआ है। उन्‍होंने परिस्‍थितियों के साथ कभी समझौता नहीं किया और आत्‍महनन का सुख मजबूरी से अधिक स्‍वेच्‍छा से वरण किया।

निराला की राष्‍ट्रीयता या राष्‍ट्रीय चेतना, सांस्‍कृतिक गौरव से परिपूर्ण आध्‍यात्‍मिकता से समृद्ध और उज्‍जवल भविष्‍य की आकांक्षा से युक्‍त एक व्‍यापक और गतिशील चेतना है। आपकी राष्‍ट्रीयता न तो भारतेन्‍दु युगीन राष्‍ट्रीयता की तरह हिन्‍दुत्‍व की परिधि तक सीमित है और न द्विवेदी युगीन राष्‍ट्रीयता की भाँति जाति, समाज और देश तक। वह एक विस्‍तृत मानवीय धरातल पर प्रस्‍तुत होने वाली राष्‍ट्रीयता है। निराला जी की राष्‍ट्रीयता में सांस्‍कृतिक जागरण के स्‍वर हैं, स्‍वामी विवेकानन्‍द और टैगोर के सम्‍पर्क से उपजी आध्‍यात्‍म की गहराई है और दूसरी ओर लोकमान्‍य तिलक के वैचारिक विद्रोह से उत्‍प्रेरित ओजमयी वाणी है। उनके राष्‍ट्रीय गीतों में भारत के अतीत के गौरवपूर्ण चित्र, वर्तमान का सामाजिक-आर्थिक वैषम्‍य तथा आदर्श और उज्‍जवल भविष्‍य की आकांक्षा स्‍पष्‍ट रूप से दिखाई पड़ती है।

निराला जी ने जिन राष्‍ट्रीय-गीतों का निर्माण किया है, उनमें भारत-जय-विजय का अत्‍यन्‍त प्रसिद्ध गीत है और देश के विभिन्‍न भागों में राष्‍ट्रीय समारोहों में गाया जाता है। आचार्य नन्‍द दुलारे बाजपेयी ने लिखा है कि - ‘‘राष्‍ट्रीय गीतों के अनुरूप राष्‍ट्रीय उत्‍कर्ष और गौरव की भावना तथा उनके सौन्‍दर्य और ऐश्‍वर्य का प्राचीन सांस्‍कृतिक प्रतीकों के माध्‍यम से आलेखन किया गया है। राष्‍ट्र गीत के सभी मूलतत्‍व इन्‍हीं गीतों में प्राप्‍त होते हैं। राष्‍ट्रीय गीतों में निराला की दृष्‍टि केवल राष्‍ट्रीय जीवन के उत्‍कर्ष से सम्‍बन्‍धित नहीं है बल्‍कि उनमें राष्‍ट्र की अधोगति, विषमता आदि के भाव व्‍यक्‍त किये गये हैं।''

निराला ने अपने काव्‍य में अतीत की गरिमा और आदर्श चरित्रों का भव्‍य चित्रांकन किया है। गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई, हीन भावना से ग्रस्‍त जन चेतना को उदबुद्ध करने के लिये आपने अपना प्रसिद्ध उद्‌बोधन गीत ‘‘जागो फिर एक बार'' लिखा। प्रस्‍तुत कविता में निराला ने आधुनिक भारतीय जनमानस की प्रेरणा, स्‍फूर्ति, ओज एवं गौरव की भावना से प्रभावित कर उद्‌बुद्ध करने की विराट चेष्‍टा की है -

पशु नहीं, वीर तुम, समर शूर, क्रूर नहीं,

काल चक्र में हो दबे आज तुम राजकुंवर,

समर सरताज ? मुक्‍त हो सदा ही तुम

बाधा विहीन-बन्‍धन चन्‍द ज्‍यों।

निराला के इस उद्‌बोधन गीत में कवि की जिस ओजमयी वाणी की झंकार सुनाई पड़ती है उससे लगता है कि बूढ़ी शिराओं का भी खून उबल पड़ेगा -

समर में अमर कर प्राण गान गाये महासिन्‍धु से

सिन्‍धु-नद-तीरवासी ?

सैन्‍धव तुरंगों पर चतुरंग-चमू-संग,

‘‘सवा सवा लाख पर एक को चढाऊँगा,

गोविन्‍द सिंह निज नाम तब कहाऊँगा।

निराला जी की सांस्‍कृतिक चेतना एक विशिष्‍ट आध्‍यात्‍मिक गरिमा से ओतप्रोत है। जीव और ब्रह्म के अमिट सम्‍बन्‍धों को कितनी सुन्‍दर व्‍यंजना इन पंक्‍तियों में दिखती है -

तुम दिनकर के खर किरण जाल, मैं सरसिज की मुस्‍कान।

तुम वर्षों के बीते वियोग, मैं हूँ पिछली पहचान।

तुम योग और मैं सिद्धि, तुम हो रागानुग निश्‍चय लय

मैं शुचिता सरल समृद्धि।

निरला ने अपनी कविता ‘‘छत्रपति शिवाजी का पत्र'' में शिवाजी के आदर्श चरित्र और ओजमयी वाणी के प्रस्‍तुतीकरण द्वारा कवि ने व्‍यंजना से गुलाम भारतीयों को ही उद्‌बुद्ध किया है। छत्रपति शिवाजी जिस प्रकार जय सिंह को धिक्‍कारते और समझाते हैं उसे पढ़कर कौन जड़ उद्‌बुद्ध नहीं होगा -

शत्रुओं के खून से धो सके यदि एक भी तुम माँ का दाग,

कितना अनुराग देशवासियों को पाओगे। निर्जन हो जाओगे अमर कहलाओगे।

इसी प्रकार अपनी अन्‍य कविताओं (यमुना के प्रति, राम की शक्‍ति पूजा, दिल्‍ली और खण्‍डहर आदि) में भी पुरातन वैभव, आदर्श और गौरव को उपस्‍थित कर जीवन्‍त करने का सफल प्रयास किया है।

निराला जी का युग बोध बहुत गहरा था। यही कारण है कि उन्‍होंने देश की सामाजिक विभीषिका आर्थिक शोषण की प्रवृत्‍ति धर्मान्‍धता और अमानवीयता पर गहरा क्षोभ प्रकट किया है। उनकी कविता में तिलमिला देने वाले व्‍यंग्‍य भरे पड़े हैं। देश की दयनीय अवस्‍था और भग्‍न संस्‍कृति का जो चित्र ‘तुलसीदास जी' ने रेखांकित किया है, वह दुर्लभ है। निराला इस सांस्‍कृतिक पतन पर व्‍यंग्‍य करते हुये मानव को यह निश्‍चय करने की प्रेरणा प्रदान करते हैं कि -

करना होगा यह तिमिर पार, देखना सत्‍य का मिहिर द्वार,

बहना जीवन के प्रमुख ज्‍वार में निश्‍चय।

दलित शोषित, कुलियों और मजदूर वर्ग के जितने मर्मस्‍पर्शी चित्र निराला ने दिये हैं, वह अनुपम हैं। भिक्षुक ‘वह तोड़ती पत्‍थर' जैसी सशक्‍त कविताएं एक तरफ जहाँ उनकी दुरवस्‍था और विवशता को अंकित करती हैं, दूसरी तरफ ‘मानव जहाँ बैल-घोड़ा है, कैसा तन-तन का जोड़ा है,' के द्वारा मानवीय विद्रूपताओं पर व्‍यंग्‍य किया गया है।

‘नये पत्‍ते', ‘बेला' और कुकुरमुत्‍ता में न जाने कितने ऐसे चित्र मिलेंगे जो इस देश की सामाजिक-आर्थिक विषमता और सांस्‍कृतिक गिरावट की सूचना देते हैं और इसके साथ ही इन कविताओं में न केवल वैषम्‍य के प्रति कवि का गहरा आक्रोश है बल्‍कि अमानवीय शोषण और अराजनीति पर गहरे व्‍यंग्‍य भी हैं -

‘इनके साथ और अफसरान हैं

जैसे दरोगा जी

बीस सेर दूध दोनों घड़ों में जल्‍द भर।'' (नये पत्‍ते)

खून चूसा खाद का तूने अशिष्‍ट,

डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्‍ट। (कुकुरमुत्‍ता)

इतना ही नहीं निराला जी अमीर वर्ग को चेतावनी देते हुये घोषणा करते हैं -

आज अमीरों की हवेली, किसानों की होगी पाठशाला।

धोबी, पासी, चमार, तेली, खोलेंगे अंधेरे का ताला। (बेला)

---

बालों के नीचे पड़ी जनता बल तोड़ हुई

माल के दलाल ये वैश्‍य हुए देश के

सागर भरा हुआ

लहरों से बहले रहे

किरनें समन्‍दर पर पड़ती कैसे दिखीं

लहरों के झूले-झूले

कितना विहार किया कानूनी पानी पर (नये पत्‍ते)

निराला जी की कविताओं में जहाँ अतीत के गौरवमय चित्र हैं, मानवता का आदर्श है। वर्तमान का वैषम्‍यपूर्ण बोध है। वहीं उसमें उज्‍जवल भविष्‍य की प्रबल आकांक्षा भी है। उन्‍होंने सुखी स्‍वाधीन समाज की परिकल्‍पना की है। भारत के सामाजिक वैषम्‍य, अमानवीय कुकृत्‍यों और अराजनीति पर क्षोभ व्‍यक्‍त करते हुये कवि जहाँ तोड़ने और उनमें संघर्ष करने की बात करता है, वहीं उसमें भविष्‍य में उगने वाले सूर्य का सुन्‍दर आलोक भी है -

लड़ना विरोध से द्वन्‍द्व-समर,

रह सत्‍य-मार्ग पर निर्भर

करने को ज्ञानोद्धत प्रहार

तोड़ने को विषम वज्र द्वार,

उमड़े भारत का भ्रम अपार हरने को।

जागा दिशा ज्ञान,

उगा रवि पूर्ण का गगन में नवगान,

हारे हुये सकल सैन्‍य दलमल चले

जीते हुये लगे हुये गले

बन्‍द वह विश्‍व में गूंजा विजय गान।

क्रांति का आहवान निराला जी का प्रमुख ध्‍येय है आपके अनुसार नव-समाज-निर्माण की स्‍थापना का बीज क्रांति और विद्रोह में ही निहित है। निराला जी की ‘जागो फिर एक बार' कविता में क्रांति के बीज ही पूर्णरूपेण प्रस्‍फुटित हुये हैं -

‘‘योग्‍य जन जीता है

पश्‍चिम की उक्‍ति नहीं

गीता है, गीता है

स्‍मरण करो बार-बार

जागो फिर एक बार।''

निष्‍कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि निराला जी के राष्‍ट्रीय गीतों में केवल राष्‍ट्रीय जीवन का उत्‍कर्ष ही चित्रित नहीं है, बल्‍कि उनमें राष्‍ट्र की अधोगति उसकी भौतिक दरिद्रता एवं विषम परिस्‍थितियों आदि के भाव भी व्‍यक्‍त किये गये हैं। इसके साथ ही इन गीतों में उज्‍जवल भविष्‍य की आकांक्षा और कल्‍पना भी वर्तमान है।

---

युवा साहित्‍यकार के रूप में ख्‍याति प्राप्‍त डाँ वीरेन्‍द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्‍थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्‍त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्‍ट्र्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की स्‍तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्‍त्री विमर्श, राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी में अनेक पुस्‍तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्‍द्र ने विश्‍व की ज्‍वलंत समस्‍या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्‍तुत किया है। राष्‍ट्रभाषा महासंघ मुम्‍बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्‍व0 श्री हरि ठाकुर स्‍मृति पुरस्‍कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्‍बेडकर फेलोशिप सम्‍मान 2006, साहित्‍य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्‍मान 2008 सहित अनेक सम्‍मानो से उन्‍हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्‍च शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान राष्‍ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।

सम्पर्क:

- डॉ. वीरेन्‍द्र सिंह यादव

वरिष्‍ठ प्रवक्‍ता, हिन्‍दी विभाग

दयानन्‍द वैदिक स्‍नातकोत्‍तर महाविद्यालय, उरई

aatma

अधिकांश दर्शन एवं धर्म ‘ईश्‍वर' को सृष्‍टि एवं जीवों को उत्‍पन्‍न करने वाला, उनका पालन करने वाला एवं उनके भाग्‍य का निर्धारण करने वाला मानते हैं। कर्ता/पालनकर्ता /संहारकर्ता के रूप में ‘परम शक्‍ति' की अवधारणा अधिकांश धर्मों में है। मध्‍ययुगीन चेतना के केन्‍द्र में ‘ईश्‍वर' प्रतिष्‍ठित है। ‘परमशक्‍ति' के कहीं अवतार के रूप में, कहीं पुत्र के रूप में, कहीं प्रतिनिधि के रूप में प्रतिष्‍ठित है।

विज्ञान ने दुनिया को समझने और जानने का वैज्ञानिक मार्ग प्रतिपादित किया है। विज्ञान ने स्‍पष्‍ट किया है कि यह विश्‍व किसी की इच्‍छा का परिणाम नहीं है। भौतिक विज्ञान ने सिद्ध किया है कि भौतिक द्रव्‍य/पदार्थ का कभी विनाश नहीं होता, उसका केवल रूपान्‍तर होता है। विज्ञान ने शक्‍ति के संरक्षण के सिद्धान्‍त का प्रतिपादन किया है। भौतिक द्रव्‍य अथवा पदार्थ के ध्रौव्‍यता/अविनाश-सिद्धान्‍त की पुष्‍टि की है। समकालीन अस्‍तित्‍ववादी दर्शन ने भी ईश्‍वर का निषेध किया है। साम्‍यवादी दर्शन भी ईश्‍वर का अस्‍तित्‍व स्‍वीकार नहीं करता। इस प्रकार विज्ञान, साम्‍यवाद तथा अस्‍तित्‍ववादी दर्शन-तीनों ईश्‍वर की सत्‍ता का निषेध करते हैं। आधुनिकता-बोध का मूल प्रस्‍थान-बिन्‍दु यह है कि ईश्‍वर मनुष्‍य का स्रष्‍टा नहीं है अपितु मनुष्‍य ही ईश्‍वर का स्रष्‍टा है। मनुष्‍य ने ईश्‍वर नामक सत्‍ता को गढ़ा है। मध्‍ययुगीन चेतना के केन्‍द्र में ईश्‍वर प्रतिष्‍ठित था। आधुनिकता-बोध की चेतना के केन्‍द्र में मनुष्‍य प्रतिष्‍ठित है। मनुष्‍य ही सारे मूल्‍यों का स्रोत है। वही सारे मूल्‍यों का उपादान है।

यहाँ यह द्रष्‍टव्‍य है कि भारतीय आत्‍मवादी दर्शनों के अनुयायी साधकों ने भी मध्‍य युग में ‘ईश्‍वर कर्तृत्‍व' को सिद्धान्‍त रूप में अथवा लौकिक व्‍यवहार में मान्‍यता प्रदान की। जिन्‍होंने आत्‍मा को अनादि-निधन, अविनाशी और अक्षय माना उन्‍होंने भी मध्‍य युग में ईश्‍वर कर्तृत्‍व में आस्‍था व्‍यक्‍त की। ईश्‍वर की भक्‍ति, स्‍तुति एवं जयगान को ही धर्म-आचरण का पर्याय मान लिया गया।

यदि आत्‍मा अनादि-निधन है तथा भौतिक द्रव्‍य/पदार्थ भी अनादि-निधन है तब सृष्‍टि के कर्ता-धर्ता तथा जीवात्‍माओं के शरीर, इन्‍द्रिय एवं मन के कारण तथा उनके भाग्‍य-विधाता के रूप में ‘ईश्‍वर' की सत्‍ता मानने का कोई औचित्‍य है। इस दृष्‍टि से विचार अपेक्षित है। क्‍या ईश्‍वर ही मनुष्‍य के भाग्‍य का निर्माता है ? क्‍या वही उसका भाग्‍यविधाता है ? यदि कोई मनुष्‍य सत्‌कर्म न करे तो भी क्‍या वह उसको अनुग्रह से अच्‍छा फल दे सकता है ? मनुष्‍य के जितने कर्म हैं वे सबके सब क्‍या पूर्व निर्धारित हैं ? उसके इस जीवन के कर्मों का उसकी भावी नियति से क्‍या किसी प्रकार कोई सम्‍बन्‍ध नहीं है ? मनुष्‍य अपनी निजी चेतना शक्‍ति एवं पुरुषार्थ के कारण पूर्व निर्धारित कर्मों के प्रवाह को बदल सकता है अथवा नहीं ?

यदि ईश्‍वर ही भाग्‍य निर्माता है तब तो वह मनुष्‍य को बिना कर्म के ही स्‍वेच्‍छा से फल प्रदान कर सकता है। यह मानने पर मनुष्‍य के पुरुषार्थ, धर्म, आचरण, त्‍याग एवं तपस्‍या मूलक जीवन व्‍यवहार की क्‍या प्रासंगिकता है। यदि जीव ईश्‍वराधीन ही होकर कर्म करता है तो इस संसार में दुख एवं पीड़ा का क्‍या कारण हैं। इस संसार में तो मनुष्‍य अनेक कष्‍टों को भोगता है। यदि ईश्‍वर या परमात्‍मा ही निर्माता, नियंता एवं भाग्‍य विधाता है तो इसके अर्थ हैं कि ईश्‍वर इतना परपीड़ाशील है कि वह ऐसे कर्म कराता है जिससे अधिकांश जीवों को दुख प्राप्‍त होता है। निश्‍चय ही कोई भी व्‍यक्‍ति ईश्‍वर की परपीड़ाशील स्‍वरूप की कल्‍पना नहीं करना चाहेगा। इस स्‍थिति में यह मानना होगा कि जीव में कर्म-संपादन की स्‍वतंत्र शक्‍ति है।

कर्मों को सम्‍पादित करने की स्‍वतंत्र शक्‍ति या पुरुषार्थ की स्‍वीकृति मानने के अनन्‍तर क्‍या ईश्‍वर कर्मों का फल एक न्‍यायाधीश के रूप में देता है अथवा कर्मानुसार फल प्राप्‍ति होती है। दूसरे शब्‍दों में फलोद्‌भोग में ईश्‍वर का अवलम्‍बन अंगीकार करना आवश्‍यक है अथवा नहीं ?

तार्किक दृष्‍टि से यदि विचार करें तो ईश्‍वर को नियामक एवं पाप पुण्‍य का फल प्रदाता मानने की कोई आवश्‍यकता नहीं है। कारण कार्य के सिद्धान्‍त के आधार पर विश्‍व की समस्‍त घटनाओं की तार्किक व्‍याख्‍या करना सम्‍भव है। यदि ऐसा न होता तो प्रकृति के नियमों की कोई भी वैज्ञानिक शोध सम्‍भव न हो पाती।

यह तर्क दिया जा सकता है कि ईश्‍वर ने ही प्रकृति के नियमों की अवधारणा की है। इन्‍हीं के कारण जीव सांसरिक कार्य प्रपंच करता है। यदि ईश्‍वर के द्वारा ही प्रकृति के नियमों की अवधारणा हुई होती तो उसमें जागतिक कार्य प्रपंचों में परिवर्तन करने की भी शक्‍ति होती। यह सत्‍य नहीं है। इसका कारण यह है कि यदि ऐसा होता तो तथाकथित परम दयालु ईश्‍वर के संसार में रहने वाले जीवों के जीवन में किंचित भी दुख, अशान्‍ति एवं क्‍लेश नहीं होता।

ईश्‍वर की कल्‍पना प्रशांत, परिपूर्ण, रागद्वेष रहित, मोह विहीन, वीतरागी, सच्‍चिदानंद रूप में की जाती है। ऐसी स्‍थिति में भी उसे फल में हस्‍तक्षेप करने वाला नहीं माना जा सकता। इसका कारण यह है कि उस स्‍थिति में वह राग द्वेष तथा मोह आदि दुर्बलताओं से पराभूत हो जाएगा।

यदि यह मान लिया जाए कि जीव स्‍वेच्‍छानुसार एवं सामर्थ्‍यानुकूल कर्म करने में स्‍वतंत्र है, उसमें ईश्‍वर के सहयोग की कोई आवश्‍यकता नहीं है; वह अपने ही कर्मों का परिणाम भोगता है, फल प्रदाता भी दूसरा कोई नहीं है, तो ऐसी स्‍थिति में क्‍या उसकी उत्‍पत्‍ति एवं विनाश के हेतु रूप में किसी परम शक्‍ति की कल्‍पना करना आवश्‍यक है ? इसी प्रकार क्‍या सृष्‍टि विधान के लिए भी किसी परम शक्‍ति की कल्‍पना आवश्‍यक है ?

कर्तावादी सम्‍प्रदाय पदार्थ का तथा उसके परिणमन का कर्ता (उत्‍पत्ति-कर्ता, पालनकर्ता तथा विनाशकर्ता) ईश्‍वर को मानते हैं। इस विचारधारा के दार्शनिकों ने ईश्‍वर की परिकल्‍पना सम्‍पूर्ण ब्रह्माण्‍ड की परम शक्‍ति के रूप में की है जो विश्‍व का कर्ता तथा नियामक है तथा समस्‍त प्राणियों के भाग्‍य का विधाता है। ईश्‍वर द्वारा उत्‍पादित सृष्‍टि की धारणा सिद्ध करने हेतु जो तर्क दिए जाते हैं उनकी मीमांसा आवश्‍यक है -

कर्तावादी दार्शनिकों ने विश्‍व स्रष्‍टा की परिकल्‍पना इस सादृश्‍य पर की है कि जिस प्रकार कुम्‍हार घड़ा बनाता है उसी प्रकार ईश्‍वर संसार का निर्माण करता है। बिना बनाने वाले के घड़ा नहीं बन सकता। सम्‍पूर्ण विश्‍व का भी इसी प्रकार किसी ने निर्माण किया है। यह सादृश्‍य ठीक नहीं है। यदि हम इस तर्क के आधार पर चलते हैं कि प्रत्‍येक वस्‍तु, पदार्थ या द्रव्‍य का कोई न कोई निर्माता होना जरूरी है तब इस जगत के निर्माता परमात्‍मा का भी कोई निर्माता होगा और इस प्रकार यह चक्र चलता जाएगा। अन्‍ततः इसका उत्‍तर नहीं दिया जा सकता।

ईश्‍वर से सृष्‍टि विधान इस आधार पर माना जाता है कि ईश्‍वर अपने में से जगत रूप आकार बनकर आप ही क्रीड़ा करता है। यह मानने पर पृथ्‍वी आदि जड़ के अनुरूप ईश्‍वर को भी जड़ मानना पड़ेगा अथवा ईश्‍वर को चेतन मानने पर पृथ्‍वी आदि को चेतन मानना पड़ेगा।

यदि ईश्‍वर ने सृष्‍टि विधान किया है तो इसका अर्थ यह है कि सृष्‍टि विधान के पूर्व केवल ईश्‍वर का अस्‍तित्‍व मानना पड़ेगा। इसी आधार पर शून्‍यवादी कहते हैं कि सृष्‍टि के पूर्व शून्‍य था, अन्‍त में शून्‍य होगा, वर्तमान पदार्थ का अभाव होकर शून्‍य हो जाएगा। शांकरवेदांती ब्रह्म को विश्‍व के जन्‍म, स्‍थिति और संहार का कारण मानते हुए भी जगत को स्‍वप्‍न एवं माया रचित गंधर्व नगर के समान पूर्णतया मिथ्‍या एवं असत्‍य मानते हैं। क्‍या सृष्‍टि विधान का कारण परमात्‍मा ही है ? क्‍या सृष्‍टि की आदि में जगत न था, केवल ब्रह्म था? प्रश्‍न उपस्‍थित होते हैं कि सृष्‍टि की सत्ता सत्‍य है या मिथ्‍या है, नित्‍य है या अनित्‍य है, जड़ है या चेतन है ? यदि परमात्‍मा से सृष्‍टि विधान माना जाता है तो या तो परमात्‍मा की चेतन रूप की परिकल्‍पना के अनुसार पृथ्‍वी आदि को भी चेतन मानना पड़ेगा अथवा पृथ्‍वी आदि के अनुरूप परमात्‍मा को जड़ मानना पड़ेगा। सत्‍यस्‍वरूप ब्रह्म से जगत की उत्‍पत्‍ति मानने पर ब्रह्म का कार्य असत्‍य कैसे हो सकता है ? यदि जगत की सत्ता सत्‍य है तो उसका अभाव कैसा ? जगत को स्‍वप्‍न एवं माया रचित गंधर्व नगर के समान पूर्णतया मिथ्‍या एवं असत्‍य मानना क्‍या संगत है ?

क्‍या जगत को माया के विवर्त रूप में स्‍वीकार कर रज्‍जु में सर्प अथवा शुक्ति में रजत की भांति कल्‍पित माना जा सकता है ? कल्‍पना गुण है। पदार्थ एवं गुण की पृथकता नहीं हो सकती। स्‍वप्‍न बिना देखे या सुने नहीं आता। सत्‍य पदाथोंर् के साक्षात सम्‍बन्‍ध से वासनारूप ज्ञान आत्‍मा में स्‍थित होता है। स्‍वप्‍न में उन्‍हीं का प्रत्‍यक्षण होता है। स्‍वप्‍न और सुषुप्‍ति में बाह्य पदार्थों का अज्ञान मात्र होता है, अभाव नहीं। इस कारण जगत को अनित्‍य भी नहीं माना जा सकता। जब कल्‍पना का कर्ता नित्‍य है तो उसकी कल्‍पना भी नित्‍य होनी चाहिए अन्‍यथा वह भी अनित्‍य हुआ। जैसे सुषुप्‍ति में बाह्य पदार्थों के ज्ञान के अभाव में भी बाह्य पदार्थ विद्यमान रहते हैं वैसे ही प्रलय में जगत के बाह्य रूप के अभाव में भी जगत का मूल वर्तमान रहता है। कोयले को जितना चाहे जलावें, वह राख बन जाता है, उसका बाह्य रूप नष्‍ट हो जाता है किन्‍तु ‘कोयला' में जो मूल तत्‍व है वह सर्वथा नष्‍ट कभी नहीं हो सकता। मूल कभी नष्‍ट नहीं होता, उसका केवल रूपान्‍तरण होता है।

विश्‍व जिन चेतनाओं एवं पदार्थों का समुच्‍चय है वे तत्‍वतः अविनाशी एवं आंतरिक हैं। इस कारण जगत को मिथ्‍या स्‍वप्‍नवत्‌ एवं शून्य नहीं माना जा सकता। किसी भी नवीन पदार्थ की उत्‍पत्‍ति नहीं होती। पदार्थ में अपनी अवस्‍थाओं का रूपान्‍तर होता है। इस प्रकार इस ब्रह्माण्‍ड के प्रत्‍येक मूल तत्‍व की अपनी मूल प्रकृति है। कार्य कारण के नियम के आधार पर प्रत्‍येक मूल तत्‍व अपने गुणानुसार बाह्य स्‍थितियों में प्रतिक्रियाएं करता है। इस कारण जगत मिथ्‍या नहीं है। संसार के पदार्थ अविनाशी हैं। इस कारण विश्‍व को स्‍वप्‍नवत्‌ नहीं माना जा सकता। ब्रह्माण्‍ड के उपादान या तत्‍व अनादि, आन्‍तरिक एवं अविनाशी होने के कारण अनिर्मित हैं। शून्‍य से किसी वस्‍तु का निर्माण नहीं होता। शून्‍य से जगत मानने पर जगत का अस्‍तित्‍व स्‍थापित नहीं किया जा सकता। जो वस्‍तु है उसका अभाव कभी नहीं होता। इस प्रकार जगत सत्‍य है तथा उसका शून्‍य से सद्‌भाव सम्‍भव नहीं है। विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि पदार्थ अविनाशी है।

क्‍या परमात्‍मा या ईश्‍वर को समस्‍त जीवों के अंशी रूप से स्‍वीकार कर जीवों को परमात्‍मा के अंश रूप में स्‍वीकार किया जा सकता है।

आत्‍मवादी दार्शनिक आत्‍मा को अविनाशी मानते हैं। गीता में भी इसी प्रकार की मान्‍यता का प्रतिपादन हुआ है। आत्‍मा न कभी उत्‍पन्‍न होता है, न कभी मरता है, न कभी उत्‍पन्‍न होकर अभाव को प्राप्‍त होता है। यह अजन्‍मा है, नित्‍य है, शाश्‍वत है, पुरातन है और शरीर का नाश होने पर भी नष्‍ट नहीं होता। इस जीवात्‍मा को अविनाशी, नित्‍य, अज और अव्‍यय समझना चाहिए। जैसे मनुष्‍य जीर्ण वस्‍त्रों का त्‍याग करके नवीन वस्‍त्रों को धारण कर लेता है, वैसे ही यह जीवात्‍मा पुराने शरीरों को छोड़कर नवीन शरीरों को ग्रहण करता है। इसे न तो शस्‍त्र काट सकते है, न अग्‍नि जला सकती है, न जल भिगो सकता है और न वायु सुखा सकती है। यह अच्‍छेदय्‌, अदाह्य एवं अशोष्‍य होने के कारण नित्‍य, सर्वगत, स्‍थिर, अचल एवं सनातन है। इस दृष्‍टि से किसी को आत्‍मा का कर्ता स्‍वीकार नहीं कर सकते। यदि आत्‍मा अविनाशी है तो उसके निर्माण या उत्‍पत्ति की कल्‍पना नहीं की जा सकती। यह सम्‍भव नहीं कि कोई वस्‍तु उत्‍पन्‍न तो हो किन्‍तु उसका विनाश न हो। इस कारण जीव ही कर्ता तथा भोक्‍ता है।

सूत्रकाल में ईश्‍वरवाद अत्‍यन्‍त क्षीण प्रायः था। भाष्‍यकारों ने ही ईश्‍वर वाद की स्‍थापना पर विशेष बल दिया। आत्‍मा को ही दो भागों में विभाजित कर दिया गया- जीवात्‍मा एवं परमात्‍मा।

‘ज्ञानाधिकरणमात्‍मा । सः द्विविधः जीवात्‍मा परमात्‍मा चेति।'1

इस दृष्‍टि से आत्‍मा ही केन्‍द्र बिन्‍दु है जिस पर आगे चलकर परमात्‍मा का भव्‍य प्रासाद निर्मित किया गया।

आत्‍मा को ही बह्म रूप में स्‍वीकार करने की विचारधारा वैदिक एवं उपनिषद्‌ युग में मिलती है। ‘प्रज्ञाने ब्रह्म', ‘अहं ब्रह्मास्‍मि', ‘तत्‍वमसि', ‘अयमात्‍मा ब्रह्म' जैसे सूत्र वाक्‍य इसके प्रमाण है। ब्रह्म प्रकृष्‍ट ज्ञान स्‍वरूप है। यही लक्षण आत्‍मा का है। ‘मैं ब्रह्म हूँ', ‘तू ब्रह्म ही है; ‘मेरी आत्‍मा ही ब्रह्म है' आदि वाक्‍यों में आत्‍मा एवं ब्रह्म पर्याय रूप में प्रयुक्त हैं।

आत्‍मा एवं परमात्‍मा का भेद तात्‍विक नहीं है; भाषिक है। समुद्र के किनारे खड़े होकर जब हम असीम एवं अथाह जलराशि को निहारते हैं तो हम उसे समुद्र भी कह सकते हैं तथा अनन्‍त एवं असंख्‍य जल की बूँदों का समूह भी कह सकते हैं। स्‍वभाव की दृष्‍टि से सभी जीव समान हैं। भाषिक दृष्‍टि से सर्व-जीव-समता की समष्‍टिगत सत्ता को ‘परमात्‍मा' वाचक से अभिहित किया जा सकता है।

-----

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवा निवृत्‍त निदेशक, केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान

123ए हरि एन्‍कलेव, चाँदपुर रोड, बुलन्‍द शहर - 203 001

rachanakar-vyangya

(प्रविष्टि क्रमांक - 26)

बढ़ती उम्र बढ़ता नासूर है. यह बालपन से बढ़ कर जवानी की ओर जाती उम्र की उछाल नहीं है कि लोग रूमानी होवें, सपने देखें, आहें भरें, गिले शिकवे करें. यह तो जवानी की खेप तय कर चुकने के बाद बुढ़ापे की ओर भागती उम्र का पका घाव है, मवाद भरा हुआ. फोड़ा पका नहीं है, फूटा नहीं है. फोड़ते डर लगता है. फोड़ा कि बहा मवाद कि हो गई छुट्टी.

यह मत समझिए कि बढ़ती उम्र से केवल महिलाएं ही परेशान होती हैं. आज की तो बात ही छोड़ दीजिए, रीतिकाल में केसवदास जी भी कह गये;

केसव असि करी की कहौं, असि करी कह्यो ना जाई,

चंद्रबदन, मृगलोचनी, बाबा कहि कहि जाई.

बताइये भला, कौन ऐसा अक्ल का मारा होगा जो किसी सुंदरी से अपने लिए बाबा कहलवाना चाहेगा. महिलाएं भी नहीं चाहतीं कि कोई उन्हें आंटी कहे. सुना कि सोनम ने ऐश्वर्या को आंटी कह दिया तो वे ख़फा हो गईं. सोनम ने तर्क दिया कि उन्होंने मेरे पापा के साथ काम किया है तो आंटी ही हुई ना? छम्मक्छल्लो जब दिल्ली में थी, तब एक महिला सब्ज़ीवाले छोकरे से इसी बात पर उलझ गईं कि उसने उसे आंटी क्यों कहा? वे चिल्ला चिल्ला कर कहने लगीं कि मैं तेरे को आंटी दिखती हूं? सब्ज़ीवाला छोकरा हुशियार था. तपाक से बोला, “भाभीजी, गल्ती हो गई” वो भाभी जी जब सब्ज़ी ले कर चली गई, तब छोकरा कहने लगा, “लगती तो दादी की उम्र की है और आंटी में भी आफत” इसीलिए “हम पांच” सीरियल ने यह मर्म वाक्य दे दिया, “आंटी मत कहो ना” यह जुमला इतना मशहूर हुआ कि आज तक यह ताज़ा फूल की तरह टटका और खुशबूदार है.

इस बढ़ती उम्र के नुकसान के क्या कहने! सबसे बड़ा नुकसान तो यही होता है कि आपके रूमानीपन के फूले चक्के की हवा सूं.... करके निकाल दी जाती है. अब लोगों को कैसे समझाएं कि उम्र तो दिल से होती है, देह से नहीं. किसी ने कहा भी है कि दिल को देखो, चेहरा न देखो. लेकिन लोग हैं कि चेहरे और उस पर पड़ती जा रही उम्र की सलवटों को ही देखते और बढ़ती उम्र से संबंधित तमाम नसीहतें देते रहते हैं. यह तो कोई बात नहीं हुई कि आप 60 के हो गये तो रोमांस सपने से भी ऊंची चीज़ हो गई. पति पत्नी भी आपस में कहने लगते हैं कि अब इस उम्र में यह सब शोभा देगा क्या? क्यों भाई, जब आपने शादी की थी तो क्या सात कसमों के साथ साथ यह क़सम भी खाई थी कि एक उम्र तक ही रोमांस करेंगे, उसके बाद नहीं?

उम्र बढ़ी और आपके इधर उधर के रसास्वादन का भी मौका गया. जवानी में, उम्र के जोश में लोग सिर्फ अपनी बहन बेटी के अलावे सभी की बहन बेटी के साथ अपना रसिकपन स्थापित करते थे, तब लोग बस मार पीट कर छोड़ देते थे. बढ़ती उम्र में लोग यह भी जोड़ देते हैं कि देखो बुड्ढे को? उम्र निकल गई, मगर आदत नहीं गई. तो भाई साहब, आदत क्या जाने के लिए बनाई जाती है, और वह भी ऐसी आदतें, जिसकी कल्पना से ही मन में सात सात सितार झंकृत होने लगे और सात कपड़ों के तह से भी देह के दुर्लभ दर्शन की कल्पना साकार होने लगे?

बढ़ती उम्र में आज के चलन के मुताबिक कपड़े पहनिये तो मुसीबत. अपने ही बच्चे कहने लगेंगे, मां, पापा, ज़रा उम्र तो देखिए”.. तो लो जी, वो भी गया. अब नए फैशन के रंग, डिज़ाइन, कपड़े, गहने क्यों ना हों, आप तो मन मार कर बस, अपने पुराने ज़माने की शर्ट, पैंट, चप्पल, साड़ी पर संतोष करते रहिये. महिलाएं शलवार कमीज़ भी पहन लेती हैं, मगर उनकी काट और डिज़ाइन देखिए तो लगेगा कि उम्र दस साल और पहले ही उन तक पहुंच गई है. आज के काट के कपड़े हों तो लोग कहने लगते हैं, बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम या चढ़ी जवानी बुड्ढे नूं. कोई यह नहीं कहता जवान घोड़ा सफेद लगाम. कोई जवान बूढ़ा दिखने लगे तो तमाम अफसोसनाक मर्सिया पढ़े जाने लगते हैं. बूढ़ा जवान बनने की कोशिश करे तो सौ सौ लानतें मलामतें!

पहले बड़ी उम्र का यह तो फायदा होता था कि लोग बुड्ढों से उनके अनुभव का लाभ उठाते थे. अब तो तरह तरह की देसी विदेशी पढ़ाई ने यह तय कर दिया है कि नई उम्रवाले जो सोच, जो आइडिया देते हैं, वह इन बुड्ढों में कहां ? ये सब तो अब सूखे बीज हो गये हैं, पक्के घड़े हो गये हैं, ठोस और जड़ दिमाग के हो गए हैं. तो अब इनसे इनके अनुभव भी गए. सो दफ्तरों में भी इनकी छांट छंटाई हो जाती है. घर में ऐसे ही कोई नहीं पूछता. अब दफ्तर के निकाले और घर के मारे कहां जाएं ?

बच्चा हो तो उसकी बढ़ती उम्र का हर कोई आनंद लेता है. जवानी के बाद की ढ़लवांनुमा उम्र की बढ़त पर हर कोई अफसोस ही करता है. तमाम नसीहतें दी जाने लगती हैं कि बाबा रे, ज़रा सम्भल के, पैर इधर उधर हुए कि कुछ कड़े चीज़ खा ली कि ज़रा ज़्यादा देर तक टीवी देख लिया कि किताब पढ़ ली कि कुछ और ही कर लिया, खुद भी पड़ोगे और घर के लोगों की भी जान सांसत में डालोगे.

बढ़ी उम्र को टीवी वाले भी धता बता गए. आजकल के सीरियल देखिए, कौन सास है कौन बहू, कौन मां है कौन बेटी, कौन बेटा है और कौन पति, पता ही नहीं चलता. मगर राजनीति में यह सब चलता है. यह राजनीति घर, दफ्तर, बाजार, सिनेमा सभी जगह चलती है. यहां लोग बूढे नहीं होते. यहां लोग शान से कहते हैं, “ये नए, आज के लोग क्या कर लेंगे? इनको कोई अनुभव है क्या?” सुना कि एक बीच की उम्र के नेता ने सोनम की तरह ही अपने से कहीं बडी उमर के नेता को बूढ़ा कह दिया. वे नेता अब सचमुच में उम्र ही नहीं, दिल और क्रियाशीलता के लिहाज़ से भी बूढे हो गए हैं. बेटे को कमान सौंप दी है. बढ़ती उम्र की गिरती सेहत ऐसी कि वोट तक देने नहीं जा सके. उनके लोग उन्हें बाबा कहते हैं. मगर इन्होंने उन्हें बाबा कह दिया और आफत मारपीट तक आ गई, “हमारे साहेब को बुड्ढा बोला रे?” सभी को नसीहत का पाठ पढ़ानेवाले उन बाबा ने अपने लोगों से यह नहीं कहा कि “जाने दो रे बाबा, बाबा को बाबा ही तो बोला जाएगा ना.”

इसलिए खबरदार, बामुलाहिजा, होशियार, कभी किसी की बढ़ती उम्र पर मत जाइए. उन्हें हमेशा जवान कहिए, आपका भी भला होगा और उनका भी. अपनी बीती जवानी के जोश में भरकर अपनी झुकी कमर को खींचकर खुद ही सीधी करेंगे. अब इसमें कमर में मोच आती है या घुटने टूटते फूटते हैं तो हमें दोष मत दीजिए. आखिर मर्ज़ी है आपकी, क्योंकि तन मन है आपका.

----

neibourhood 4-6

अदिति के मस्‍तिष्‍क में रह-रह कर कहीं पढ़ी हुई लाइन गूंज रही थी......, जब तब सुपात्र न मिले प्रेम मरता नहीं है। मुम्‍बई जैसे शहर में जहां भीड़ में हर कोई अकेला है। सब अपने - अपने अकेलेपन के द्वीप में बन्‍द हैं। अमित उसके द्वीप में कब आ गया उसे समझ में ही नहीं आया। एक ही ट्रेन का सफर एक ही स्‍टेशन पर उतरना........ और अमित अब उसे वह सुपात्र लगने लगा। जिसमें वह स्‍वंय को रिक्‍त कर देना चाहती हो..... लेकिन फिर राज कौन है। जिससे उसने प्रेम विवाह किया। सारे परिवार की मर्जी के विपरीत जाकर अदिति समझ नहीं पा रही थी कि राज सुपात्र नहीं था तो उससे उसे प्रेम क्‍यों हुआ। शादी क्‍यों की और सुपात्र था तो उसके मन में द्वंद्व और भटकाव क्‍यों ?

अमित से निकटता क्‍या राज की अनुपस्‍थिति से उपजे अकेलेपन के कारण थी। अदिति अपनी रिक्तता को अमित के प्रेम से भर रही थी। अमित सुपात्र था या फिलर ? डोरबेल ने अदिति के चिन्‍तन पर ब्रेक लगा दिया। अदिति के अनुमान के अनुसार दरवाजे पर अमित ही था। इतवार की शाम दोनों अक्‍सर साथ ही बिताते थे। अदिति तो इस शहर में अकेले थी। अमित पता नहीं घर वालों को कैसे और क्‍या समझाकर आ जाता है।

‘‘अमित तुमसे कुछ पूछना था'' अदिति ने काफी गम्‍भीर होते हुये कहा। अमित ने माहौल हलका करने के लिये नाइंटी डिग्री पर झुक कर कहा ‘‘जो कहना है कहो, जो करना है करो आय एम एट योर सर्विस डियर'' अमित की बात पर बिना किसी रिएक्‍शन के अदिति ने कहा ‘‘अमित डोंट यू थिंक वी आर चीटिंग अवर पार्टनर्स ?''

कुछ देर की चुप्‍पी के बाद अमित ने कहा ‘‘यार कितनी खुबसूरत शाम है तुम अपनी फेवरेट यलो लाइट जलाओ न, जिसमें हम दोनों एक दूसरे को भी मुश्‍किल से देख पाते हैं।

--

( लघुकथा संग्रह – अपने अपने दृष्टिकोण से साभार. बहुविधा की रचनाकार अनीता गृहलक्ष्मी पत्रिका की उप-संपादिका रह चुकी हैं)

ashok gautam

 

देसी भव बाधा हरौ, सोनिया नागरी सोइ,
जा तन की झांई परै, मोहन हरित दुति होइ।

दिल्‍ली सोए सेज पर, मुख पर पूंजीवाद।
रोटी कपड़ा मकान नहीं, हम कहने को  आजाद।

खेता उगाई जतन से, महाजन लिया उधार।
होरी टप टप  रो रहा, दलाल सब दियो उजाड़।


गोबर घर से भाग के, पहुंचा जनपथ रोड,
देखा अजब शहर तो, पेट फिरै मरोड़।


गांव शहर में में पड़ गई, इतनी गहरी खाई।
लाख  आवै हनुमान, तो भी लांघी न जाई।


गोबर गांव में रहे, उसकी ये मजाल।
गांव  सिवा गरीबी के, बाकी सब कंगाल।


फसल लगाई जोस से, बीमा दिया करा। 
आया न इंद्र सूख गई, चाची  डिपू जा।

धनिया बोले गोबर से, गांव बचा अब क्‍या।
महाजन से जो बचना तो, किसी शहर खपजा।

होरी बिस्‍तर पर पड़ा, तन मन जम लिपटाए।
स्‍वर्ग का रस्‍ता तब दिखे, जो कोई पंडित खाए।

गाय लावारिस हुई, पी सिंथेटिक  सो।
तेरा मेरा यहां कोई नहीं, बस  अपने को रो।

बैल किसान बिसारिए, अब सारा दिन बस ताश।
औरतन बिजी चुगली में, क्‍या लकड़ी क्‍या घास।

मक्‍की रोटी पकाइए,क्‍यों ये मौना सुकुमार ।
गाय देख डरत हो, आलस ही के भार।

प्रेम से अब बास पड़े, सुंदर जवान सरीर।
अब तो डर से भाग गए, क्‍या रांझा क्‍या हीर।

खद्‌दर से हो गया, कुर्सी का याराना।
कौड़ा हो या बौड़ा हो, सबका  हक है खाना। 

बिसर गए पनघट सारे, सरकार जो नलका लाए।
नलका तो गांव गांव लगा, पर पानी कहां से आए।

बिस्‍तर बिस्‍तर गूंज रहे, अब फिल्‍मों के गीत।
गंगी गिद्‌दा भूल गए, ये पच्‍छम के मीत।

बारह मासा की जगह, कव्‍वाली का काल।
बेबी पैदा होते ही, हग्‍गी का मांगे थाल। 

अब गांव में आत है, गोबर गौंच से बास।
ताहिं काकी ने लिबड़े, चारमिस से हाथ।

मक्‍की- छाछ ने कहा, अलविदा ओ गांव।
भूल गए पीपल के झूले, अब पंखे की छांव।

दीए सड़े स्‍टोर में, जबसे बल्‍ब आए।
पर ये कैसी रोशनी,  अपना नजर न आए।

नदियों नालों का ले गए, वे सब पानी चोर।
चिड़ियाघर में जा बसे, कोयल मोर चकोर।

अब गांव को रोत है, डाबर हाट घराट।
गोबर तो शहरी हो गया, गंदी बस्‍ती खाट।

जिन पीपल ब्रह्‌म रहे, सो कल दियो कटाय।
जनता के हित  खातर, वहां ठेका दियो खुलाय।

नेता ने कर दिया, घर-घर बंटाधार।
बेटा जलसे में गया, बाप पड़ा बीमार।

ठंडा- ठंडा हो गया, अब रिश्‍तों का ताप।
बेटा कहे दिन रात तो, बाप सुने चुपचाप।

सत्‍तू मट्‌ठा हो गए, बीते जुग की बात।
बै्रड बटर की आई, जबसे गांव सौगात।

पैंट शर्ट में भूल गए, मीठी अपनी बोली।
अब तो हर रेहड़ी बिकै, अंगे्रजी की गोली।

चिड़िया भी भूल गई अब तो, अपने पुरखों के गीत।
सच की हार हुई पग- पग पर, पल पल झूठ की जीत।

धोती पतलून जो पहने, अति गंवार कहाय।
काम बिगाड़े आपणा, कहीं रिसपेक्‍ट न पाय।

गांव गांव  हो गया, बस बड़प्‍पन का खेल।
पैकिंग का आटा मिले, पाउच में अब तेल।

बिन दानों के रो रहे अब सारे घराट।
गावं गांवी कोई नहीं, हो गए सब लाट।

या पगलाए शहर गति, समुझै नहिं कोई।
ज्‍यों- ज्‍यों उतरै पेंट, त्‍यों त्‍यों काला होई।

गुड़ हुआ कड़वा जबसे, केक मिलावटी आयै।
आह रे अंध्‍ो गांव के,  चटकारे ले ले खायै।

शहर की चमचम देख के,बरगद छप छप रोय।
गांव का जो दुत्‍कारे, शहर बचे न कोय।

हालत अपनी देख के, गांव करे पुकार।
सुन ओ बुधिया,सुन ओ रधिया,ये रौनक दिन चार।

हटके काम तो आवैंगे, ये अपने ही खेत।
पनघट पीपल छोड़के, लाख तू खुद को सैंत।

सीतल छांव पीपर की, पनघट पर मनुहार।
शहरी खोए रात दिन, पाए सदा गंवार।

स्‍वार्थी शहर देख के,दी गांवड़ी रोय।
लाख शहर से प्रेम करो, शहर न अपना होय।

झूठ फरेब अरू मालिस, सरै न दूजो कामू।
मन  अटके भटके टटके वृथा, गांव चल ओ रामू।

---


  अशोक गौतम
गौतम निवास, अप्‍पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र.

Image032

वो नन्‍हा रंगबिरंगी फुदकती चिड़िया से बड़ा प्रभावित था। उसके आंगन में तुलसी की क्‍यारी थी। घर के सामने बड़ा मेहराबदार दरवाजा था जिसमें से बैलगाड़ियों का दिन रात आना जाना लगा रहता था। घर के पास अनाज रखने का भण्‍डार था। गांव के बड़े एवं रसूखदार लोगों में उसके परिवार का नाम था। घर की छतों एवं मुंडेरों पर कबूतर, मोर अक्‍सर आया करते थे और बिखरे अनाज को खाया करते थे। परिवार के लोगों ने पक्षी उनके घरों में आते रहें इसके लिए गाड़ियों की आवाजाही पर तथा नौकरों पर नियम की लगाम कसी थी। बच्‍चे को किलकारियां भरते देख परिवार के सभी बड़े बुजुर्ग सुबह सवेरे ही प्रसन्‍नचित हो जाते थे। दादी अपने पोते को मंदिर ले जाती तो उनकी उंगली थामें यह पोता कभी तोते, मैना और कई छोटी-छोटी चिड़िया देखता और पुलकित हो जाया करता। दादी की सुबह सवेरे की ‘‘राम-राम, श्‍याम-श्‍याम'' रास्‍ते भर चलती और मंदिर पहुंचकर वे जब तक देव दर्शन, पूजन आदि करती तो अनेकों चिड़ियों की मौजूदगी में यह नन्‍हा मस्‍ती करता फर्श पर दौड़ लगाता रहता और अठखेलियां करता छोटी चिड़िया भी उसके रोज के करतबों से वाकिफ थी उसके द्वारा बिखराए जाने वाले अनाज के दानों को पाने के लिए वे इंतजार करती। दादी को जिस किसी दिन मंदिर जाने में कठिनाई होती तो वह मचल जाता और घर के किसी सदस्‍य के साथ मंदिर पहुंचकर अपनी दिनचर्या को व्‍यवस्‍थित बनाए रखता था। आंगन में मोर और कबूतरों के बीच में इसे देखकर सारे गांव के लोग चकित रहते और दांतों तले उंगली दबा लेते जब वह किसी मोर को अचानक बांहों में भर लिया करता।

घर की चाहर दिवारी से लगे गुडहल, चम्‍पा, जुही, मालती, चांदनी, चमेली के फूलों का रस पीने को भी शकरखोरा, भंवरे आदि मंडराया करते। सुहावने दिन की शुरूआत परिवारजनों में नन्‍हें की उपस्‍थिति से जितनी रहती उससे अधिक उनके मन में उसकी चहकती आवाज खुशियां घोला करती थी। समय थमा नहीं करता मगर घर के आनंदोत्‍सव में लगभग समय लुप्‍त हो गया था। बड़े होते होते यह बालक अब घर से बाहर निकलते बैल, कुत्‍ते, गाय से भी परिचित होने लगा। श्‍यामा जब तक गौ ग्रास नन्‍हें के हाथ से पा नहीं लेती वो जंगल की ओर जाने को तैयार ही नहीं होती। नाक, कान, आंख, मुंह जहां चाहे यह नन्‍हा उसके हाथ व अंगुली घुसा देता और श्‍यामा उसे यह सब करने देती। श्‍यामा ने बछड़े को जनम दिया तो नन्‍हा अपने नए साथी से भी लगाव कर बैठा दोनो साथ-साथ बढ़ते जा रहे थे और आपस में खेलते हुए कई अनूठे व दंग कर देने वाले करतब कर जाया करते।

स्‍कूल के लिए अपने दोस्‍तो के साथ जाने की शुरुआत की तो गाँवभर के सारे श्‍वान उसके साथ स्‍कूल तक जाने लगे। जब तक वह पढ़ता वे सारे के सारे बाहर बैठे रहते। स्‍कूल से वापस घर तक साथ ही आते। गॉव के लोगों का चहेता नन्‍हा गाँवभर के जानवरों का दुलारा बन गया था। उसकी उपस्‍थिति का अंदाजा पशुओं की मौजूदगी से अनायास हो जाता था। असामान्‍य होने के बावजूद यह बातें गॉव वालों के लिए अनोखी नहीं रही थी।

बबली के घर के सामने खडे जानवर बता रहे थे कि आज वह यहां आया हुआ है। उसके दोस्‍त ने यह देखकर आंगन में प्रवेश किया तो देखा कि छटपटाते हुए एक बैल को वह दवा देने का श्रमसाध्‍य काम कर रहा है। देशी इलाज का उपक्रम सभी कर चुके थे मगर सिर्फ नन्‍हा ही था जो आज इस बैल को दवा पिलाने में कामयाब रहा था। आज की शाम चौपाल इस कारनामें की कौतुकना से भरी रही। नन्‍हा अभी कोई पांच साल बरस का ही तो है और उसके हाथ धरते ही ‘रंगा' (बैल) काबू में आ गया और दवा पी गया। छटपटाने दर्द के बावजूद उसने नन्‍हें के हाथ से दवा पीना कबूला और वह अब बेहतर है यह घोर अचरज की बात रही।

अब जब कभी जहां कभी कोई पशु पक्षी घायल मिलते तो वह नन्‍हे तक आ पहुंचाते। कभी डॉक्‍टर तो कभी देशी इलाज जो कुछ भी किया जाता नन्‍हें की मौजूदगी में होता और जानवर भी उसकी उपस्‍थिति से राहत महसूस किया करते।

एक दिन अचानक एक बिगडैल साण्‍ड (नन्‍दी) गांव में घुस आया। वह खेतो में खड़ी फसलें तबाह करने लगा। खेतो पर खड़े बैलों से लड़ाईयां करने लगा। नन्‍हा स्‍कूल से घर लौट रहा था। अब वह पांचवी में पढ़ रहा था। उसके रास्‍ते में यह साण्‍ड गुर्राते हुए दंभी आवाज देता सुनाई दे रहा था सो उसने सहज ही कहा कि आज कोई बाहर का पशु गांव में है। वह इस आवाज को सुनते हुए पहुंचा तो लाल धधकती आंखों से गुस्‍सैल नजर आ रहा यह साण्‍ड गांव के लोगों को दौड़ा रहा था। लोग पत्‍थर लिए तो कुछ लाठियां लिए खड़े उसे गांव से भगाने में लगे थे। उसकी हुंकार से बदबु पसर रही थी। नन्‍हें ने ऐसे गजब नजारे की उम्‍मीद नहीं की थी। उसने आक्रोशित इस साण्‍ड को बस देखा ही भर थ कि पता नहीं क्‍या गजब हुआ साण्‍ड ने नजरें मिलते ही समर्पण भाव प्रदर्शित कर डाला। यह भी घोर आश्‍चर्य की बात थी। सारा गांव घटना की चर्चा में व्‍यस्‍त था और दूर-दूर तक यह चर्चा जा पहुंची। गांव गांव होते यह खबर मठ में भी पहुंची तो वहां के महात्‍मा का मन हो आया इस बालक से मिलने का। महात्‍मा ने अपने सारे बन्‍दोबस्‍त कर नन्‍हें के गांव की ओर प्रस्‍थान किया। गांव पहुंचकर उन्‍होंने एक मंदिर में ठहराव किया फिर समाचार भिजवाया कि वे नन्‍हें से मिलने को इच्‍छुक हैं तो उन्‍हें लिवाने घर परिवार के सभी मंदिर पहुंचे। मंदिर से उनकी आगवानी कर जब लोग नन्‍हें के घर पहुंचे तो महात्‍मा जी ने देखा सारा का सारा गॉव उनके दर्शन और वचनों के लिए वहां उपस्‍थित है तो उन्‍होंने सबसे मंदिर पर शाम को आने को कहा और कहा कि अभी तो वे सिर्फ नन्‍हें से मिलना चाहते है।

महात्‍माजी के हाथ पैर धुलवाकर धर्मलाभ लिया गया और उन्‍हें बताया कि नन्‍हा स्‍कूल से आने में है तब तक आप भोजन फरियाल या फलाहार ग्रहण करें और विश्राम करें ताकि सफर की थकान से राहत हो जाए।

नन्‍हें को स्‍कूल से आते वक्‍त बताया गया कि पास के मठ के महात्‍मा चलकर घर आ पहुंचे है और उससे मिलना चाहते हैं। रास्‍ते में वह समाचार पाकर उसकी समझ में कुछ आया नहीं था मगर घर पहुंचा तो घर का नजारा एकदम निराला था। दीपोत्‍सव की भांति आनंद व्‍याप्‍त था। आसपास के गांवों के बहुत से सज्‍जन तथा मिलने जुलने वाले लोगों का तांता लगा हुआ था। वह समझ गया कि कोई महान संत महात्‍मा उसके घर पहुंचे है। उसका घर में पदार्पण होते ही थोड़ी खुसुर पुसुर हुई और नन्‍हें को सीधे ही महात्‍माजी के समक्ष भिजवा दिया गया। नन्‍हें के ललाट को देखकर महात्‍मा मंत्र मुग्‍ध हो गए। उनके भाव भी चेहरे पर तेजी से प्रकट होते गए और फिर उनकी आंखों से अश्रुधारा फूट पड़ी। नन्‍हें को अपने समक्ष बैठाकर उन्‍होंने उसे निहारा कांतिवान चेहरा, प्रसन्‍नमुख, प्रेममय व्‍यक्‍तित्‍व देखकर वे आश्‍चर्य मिश्रित प्रसन्‍नता अनुभव करते नजर आ रहे थे। ऐसा लग रहा था मानों किसी अलौकिक दुनिया में विचरण करने लगे हो। काफी देर बार उन्‍होंने अपनी स्‍तब्‍धता पर काबू पाया और बालक को अनेकों आशीष दिए। शाम को मंदिर पहुंचकर प्रवचन देते वक्‍त भी उन्‍होंने यह बताया कि नन्‍हें से मिलने की बेताबी की वजह से वे आज गांव में आए है। नन्‍हें के प्रसंगो ने उन्‍हें मठ छोड़ने को बाध्‍य कर दिया। यह जैसा अनुभव वे कर पाए वह अभिव्‍यक्‍त करना उनके लिए बड़ा कठिन है।

बड़ा होते होते शिक्षा के लिए उसके गांव छोड़ने का समय आया आज वह बिदाई ले रहा था तब भी गांव का बस स्‍टेण्‍ड उसकी सदा सी उपस्‍थिति का परिचय दे रहा था। उच्‍च शिक्षा के लिए अब विषय चुनने की बारी आई तो वह कई लोगों से मिलने के बावजूद तय नहीं कर पा रहा था कि उसके लिए उपयुक्‍त विषय कौन सा रहेगा। खेती उसके परिवार में रची बसी थी और पशुपालन का वह सिद्धहस्‍त था। विज्ञान के विषय व्‍यवहारिक नहीं लगते थे और व्‍यवहार की शिक्षा से भविष्‍य संशय देता नजर आता था। आखिरकार प्राथमिक तौर पर जीवविज्ञान संकाय से उसने शिक्षा की नीव रखना प्रारंभ करना तय किया और नवीं में वह बॉयोलॉजी स्‍टूडेण्‍ट था। उटपटांग से रेखाचित्र और अजीब सी भाषा पढ़ते हुए उसने पढ़ाई को जारी रखा फिर वह दिन आया जबकि उसे कॉलेज में जाना था। उसके सामने मेडिकल, फार्मेसी पशुचिकित्‍सा, नर्सिंग जैसे विषय खड़े थे और इसके लिए उसे परीक्षाएं देनी थी। इनमें मिले नंबरों के आधार पर उसका चयन सीटों के आधार पर तय होना भी उसे विदित हुआ। बड़ी मेहनत करके वह इसमें सफल होने के प्रयासों में जुझने लगा और आखिरकार वह सारी शक्‍ति लगाकर की गई मेहनत के बावजूद आरक्षण और अन्‍य कारणों के चलते पिछड़ गया। उसने पढ़ाई छोड़ देना तय किया और अपना गांव अपनी खेती और अपने पशुओं की ओर रूख कर लिया।

भौतिकतावाद की भेंट चढ़ चुके ग्रामीण परिवेश में जब वह लौटने लगा। तो गांव में ट्रेक्‍टरों की भरमार थी। टनटनाती घण्‍टियों की मधुर ध्‍वनि अब टकटकाहट से भरी आवाज में बदल चुकी थी। खेतों की सिंचाई के लिए नलकूप खोदे जा चुके थे। बिजली व्‍याप्‍त थी। शाम का दीपक रात के लाउडस्‍पीकर के साथ मंदिर में गुंजित होने लगा था। उसके अपने घर में भी खेतों व घर का बंटवारा हो चुका था। दादा-दादी ईश्‍वर चरण में विलीन हो चुके थे। गांव लौटा तो गांव के उसके अपने परिचित उसे अनजान लगने लगे थे। शहरीकरण का प्रभाव गांव में जमने लगा था। शाम को आठ बजे जिस गांव में लोग मंदिरों पर जमा होकर अपनी कथा व्‍यथा सुनाते थे अब वहीं देर रात तक गांव के युवा गांव में खोली गई कलाली पर नजर आते थे। उसके दोस्‍त रामा और बंटी भी आज शाम लड़खड़ाते कदमों से घर को लौटते उसे रास्‍ते में मिले। वे बिजली चोरी की बातें कर रहे थे और अपनी समझदारी दिखा रहे थे। वे हंसे जा रहे थे कैसे आज गांव की बिजली काटने पहुंचे दल को उन्‍होंने दफा कर दिया था। वे चुनावों में नेता बनने की तैयारी और शराबखोरी के फायदे बिताए जा रहे थे।

नन्‍हा जिसका नाम अब तक बदल कर प्रेमप्रताप हो चुका था यह नजारे उसको, उसकी शिक्षा को, उसकी सभ्‍यता को, विपरीत नजर आते थे। बचपन के दिन और बदली परिस्‍थितियां उसके लिए सामंजस्‍य बैठाने में कठिन बन गई थी। वह समझ नहीं पा रहा था कि पिछले वर्षों में ऐसा क्‍या गुजरा है कि अचानक परिदृष्‍य बदल गए है। वह अपने अनुभव और ज्ञान के दम पर पुनः स्‍थापित होने का प्रयास करने लगा। अब वह चिड़िया और मोर कबूतर भी उसके अपने नहीं रहे थे। बाड़े में मशीने थी तो वहां अब पक्षियों का आना जाना हो नहीं सकता था। उसने मां से पूछा तो मां टी.वी. देख रही थी और उसने अपने पुत्र को पुरानी बाते करते सुना तो वह भी चौंक पड़ी और टी.वी. बंद कर उसने उसे समझाने का प्रयास किया कि बचपन की बातें भूल जाए और नई परिवर्तन की परिभाषा को समझते हुए कुछ नया करें अपनी शिक्षा का उपयोग करें और खेती करें ।

खेत में पहुंचा और देखा कि खड़ी फसलें बदल चुकी हैं कुछ अनजान पौधें खेतों में उगाए गए है तो उसने जानकारी लेने का प्रयास किया। उसे पता चला कि खेत में अब रासायनिक खाद और संकरित नस्‍लें उगाई जाती है। वह अब सामंजस्‍य बैठाने की कोशिश में था। गांव के कुत्‍तों को अपने पास बुलाने की कोशिश भी व्‍यर्थ पड़ने लगी। ये कुत्‍ते अब उसे देखकर भौंकते थे।

आज उसे महात्‍मा की याद आई और अब वह मठ को जाने को उद्यत हुआ। मठ में महात्‍मा के पास गया वो अब बुजुर्ग स्‍थिति में थे। उनसे चर्चा करना चाही तो बड़ी मुश्‍किल से वह समझा सका कि वह वही बच्‍चा है जिससे मिलने महात्‍मा गांव पहुंचे थे। उसने प्रश्‍न किए तो उत्‍तर मिले की अब लोगों में बड़ा परिवर्तन है। वे स्‍वार्थ की राह पर है। परमार्थ मन में रहा नहीं है। जीवमात्र के प्रति प्रेम नहीं बचा है। इस दौर में जिस दुष्‍ट बुद्धि की वृद्धि हुई है वह मनुष्‍य के प्रति भी

विरोधी ही है। इसका प्रभाव है कि पशु भी अब हाईब्रिड खाकर स्‍वभाव बदल चुके है। प्रेमप्रताप विचार मग्‍न हो गया चार दिन की जिंदगी इतनी बदल जाएगी यह सहसा समझ नहीं पाया शहर में तो यह सब ठीक था किन्‍तु गांव में व्‍यावसायिकता का बोल बाला ऐसा बढ़ेगा उम्‍मीद भी नहीं की थी। महात्‍माजी से जो आशाएं थी उन पर पानी फिर गया था। देर रात में गांव लौटा था तो देखा कि लोग जाग रहे है। उसने पता किया कि माजरा क्‍या है? उसे बताया गया कि कल मंत्रीजी का दौरा है तथा पता चला है कि पास बह रही नदी में बांध बनेगा। वह खुश होना चाह ही रहा था कि उसे पता चला यह गांव भी अब उसे छोड़ना पड़ेगा क्‍योंकि यह डूबत में आने वाला है। डूब में आने के कारण उन्‍हें कही ओर प्रस्‍थापित होना पड़ेगा। आज के जमाने का अर्द्धशिक्षित बालक घबरा उठा था कि भविष्‍य क्‍या होगा?

आज कालूराम तेजी से मोटर सायकल दौड़ाता आया और उसने बताया कि रोजगार के लिए सरकार ने योजनाएं बनाई है। प्रेम ने उससे जानकारी लेना चाही तो वह सिर्फ इतना ही बता सकता कि उद्योग विभाग से संपर्क करना पड़ेगा।

उसने भविष्‍य में क्‍या, क्‍यों, कैसे पर मंथन किया और तय किया कि वह शहर में जाएगा और पता लगाएगा कि क्‍या उसका भी कुछ हो सकता है?

सवेरे नहा धोकर उसने टिफिन लिया और पिताजी से मोटरसायकल लेकर शहर जाने की तैयारी की। दफ्‍तर में पहुंचा तो सुबह के 11ः30 बजे थे। बाहर बरामदे में योजनाओं के बोर्ड लगे थे। उसने देखा कि सब कुछ आशा से भरा है मगर वह विचारमग्‍न हो गया था अचानक दफ्‍तर के किसी बाबू की आवाज से चौंक पड़ा और घबरा सा गया। बाबू जैसे दिखने वाले इस व्‍यक्‍ति ने उससे पूछा क्‍या देख रहे हो? उसने घबराहट में जवाब दिया बस यह बोर्ड। बाबू हंसा और उसे अपने कमरे में आने को कह गया। यह एक साधारण सा कमरा था उसके बैठने को भी कोई जगह या साधन नहीं था। बाबू ने तड़ाक से सवाल साध दिए कौन हो? कहां से आए हो? कहां तक पढ़े लिखे हो? यहां का पता कैसे मिला? क्‍या करने की इच्‍छा रखते हो? सवालों के जवाब देते हुए वह पसोपेश में आ चुका था। फिर उसे यह सब खड़े-खड़े ही कहना भी था।

उसकी बाते सुनकर बाबू ने उससे कहा अपनी रूचि के अनुसार काम तलाशो, योजना बनाओ और फिर शांति से आकर बात करना उसकी पूरी मदद करेंगे तो वह शांत हो सका था। उससे कुछ पूछना भी उसे याद नहीं आया। एक बार वह बाहर निकला तो बोर्ड पर लिखी भाषा और कमरे का साहब उमड़ घुमड़ रहा था। उसने दोपहर का भोजन कर वापस मिलने की ठानी और अब वह पुनः कमरे में जा पहुंचा। साहब ने उससे कहा भई बड़ी जल्‍दी आ गए हो? क्‍या तय किया तो प्रेमप्रताप ने कहा कि पशुपालन की राह पर जाना ही ठीक है क्‍योंकि बस यही एक है जो उसको ठीक से आता भी है। काफी पूछताछ और तसल्‍ली के बाद उसे एक फार्म दिया गया और उसे कहा कि ये सब भरकर लाना है। वह खुश था उसके सपने सच होने की राह में थे। घर पहुंचकर उसने अपने पिताजी से चर्चा की। पहली नजर में सब कुछ सुनहरा दिखने के कारण चकाचौंध में न पड़ने की सलाह उसे मिली तो वह तमतमाया सा महसूस करने लगा। फिर उसने कई रास्‍ते ढूंढने की कोशिश की।

गांव डूब जाने वाला था तो मजबूरी थी ही। पिताजी से ठंडे दिमाग से बात करने की ठानी मगर पुश्‍तैनी जायदाद बैंक के पास गिरवी रखकर कर्ज लेना ठीक नहीं लगा था उन्‍हें। कोई दूसरा रास्‍ता नजर भी नहीं आता था। कम पढ़ा लिखा होना भी तो दुर्गुण ही था। हौसलों में बड़ी ताकत होती है। मां की नजर में बेटे की लगनशीलता छुपी नहीं थी उसने अपने बेटे के लिए पिताजी से चर्चा की तो नाती के लिए नानाजी तैयार हो गए और बात बन गई। कर्ज लेना फिर उसे उतारना अपनी मेहनत, ज्ञान और तौर तरीकों से यह आसान नहीं होता मगर नाती ने जब दूध का व्‍यवसाय पशुपालन के बूते करना चाहा तो उसकी योग्‍यता पर संदेह नहीं हुआ।

आज वह गांव छोड़ देने की मजबूरी के बावजूद अपने पैरों पर खड़ा है। गांव के कई बच्‍चे जिस दौर से बेरोजगार हैं वह अपनी पशुशाला में रोजगार मुहैया करा रहा है। उसे सुकून है कि ज्‍यादा न पढ़कर उसने हैसियत के पर्दे नहीं चढ़ाए। विदेशों में आज उसके मिल्‍क प्रोडक्‍ट बिकने लगे है। गांव का ग्‍वाला आज भी उतना ही सहज और सरल है जबकि उच्‍च शिक्षित उसके यहां नौकरियों के लिए लाइनों में खड़े रहते हैं। उसने सही समय पर उद्यमिता की ताकत को पहचाना। पिता की सलाह, सुनहरे की चकाचौंध से बचना पर अमल किया। पशुओं के वध से वह दुःखी हुआ और पशुपालन की दिशा में उसने कई गौशालाएं भी बना डाली ।

अल्‍पशिक्षित यह नौजवान अधेड़ता की दहलीज पर है मगर बेटे को विदेशों में सर्वोच्‍च शिक्षा के बावजूद सलाह देता है कि अपनी योग्‍यता का भरपूर उपयोग करना, उद्यमशील बनना और सहज रहना।

women in crowd 2
ढलती शाम और डूबता सूरज,, वही स्थान,वही समय,वही दृश्य । नदी के किनारे एक ऊंचे टीले के छोर पर एक पत्थर और उसपर सफ़ेद मुलायम ऊन के बन्डल सा उकडूं बैठा-खरगोश,लाल-लाल अनार के दाने की तरह चमकती हुई आंखें । सफ़ेद शरीर पर एक धब्बा, चन्द्रमा पर कलंक की भांति शोभायमान हो रहा था। चारों ओर की आहट लेते हुए सतर्क खड़े कान और पलक झपकते ही हवा हो जाने को तैयार टांगें ।
पत्तों की थोड़ी सी भी खड़खड़ाहट होते ही खड़े हो जाने की प्रवृत्ति । वह कभी सूंघकर इधर देखता कभी उधर। बारी-बारी से चारों ओर सूंघकर शायद किसी के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा हो ।
मैं पास के ही पेड़ की ओट में खड़ा हुआ यह दृश्य देख रहा हूं। अब खरगोश ने एक ओर को देखकर सूंघा, कान खड़े किये और एक विशिष्ट आवाज निकाली । कुछ देर पश्चात ही एक अन्य खरगोश उसी दिशा से आता हुआ दिखाई दिया। दोनों की आंखों मैं एक विचित्र चमक उत्पन्न हुई और आतुरता का स्थान प्रसन्नता ने ले लिया । आपस में उछल-उछल कर कुलांचें भरते हुए ,खेलता हुआ जोड़ा अत्यन्त सुन्दर प्रतीत हो रहा था। धत्तेरे की...! अचानक बडे जोर की छींक आई, दोनों खरगोश पलक झपकते ही नौ दो ग्यारह ...।
दूसरे दिन ,प्रयोगात्मक कार्य के कारण कुछ देर हो गई है । दूर से देखता हूं दोनों खरगोश पत्थर पर आसीन हैं, शिव-पार्वती की तरह । वृक्ष के समीप पहुंचते ही पैरों से पत्तों के दबने की आहट को भी वे न भूल सके और हवा पर सवार होकर उड़ लिये। कई दिन यह क्रम चलता रहा, मैं देर से पहुंचता और वे जरा सी आहट पर हवा हो जाते ।
प्रकृति की सुन्दरता किसका ह्रदय परिवर्तन नहीं कर देती। प्रारम्भ में, मैं उन्हें ज़िन्दा या मृत पकड़ कर प्रयोगशाला में उपयोग करने की सोचता था; परन्तु यह नैसर्गिक सौन्दर्य मेरे ऊपर पूरी तरह हावी हो गया है। प्रकृति के इन सुकुमार जीवों की भोली-भाली मूर्ति ने मेरा ह्रदय परिवर्तन कर दिया है, अत: अब मैं इनके सौन्दर्य से द्विगुणित होती प्रकृति की सुछवि का पान करने आता हूं।
आज रविवार है, मैं यहाँ समय से पहले ही छिपा हूं; प्रकृति की नैसर्गिक आभा के अतुलनीय रूप का निरीक्षण करते हुए अपने- अपने नीड़ों को लौटते हुए खगवृन्दों को देख रहा हूं सर्वत्र शान्ति है , केवल नदी का कल-कल निनाद व पक्षियों का कलरव ही सुनाई देता है| वही दृश्य -ढलती शाम और डूबता सूरज
खरगोश का जोड़ा आज साथ-साथ आया है| पत्थर पर एक साथ बैठे हुए उनकी भोली-भाली मन मोहक छवि कैलाश पर्वत की उपत्यका पर आसीन शिव-पार्वती की याद दिलाती है मैं कल्पना लोक में डूबता जा रहा हूँ
धायं -धायं ...,एक चीख ..और सब कुछ समाप्त सहसा पार्श्व से किसी न आग उगल दी एक करुण चीख के साथ शिवजी पत्थर से उलट कर नदी की धार में समा गए और पार्वती जी ने भी एक लम्बी चीख के साथ धारा में छलांग लगा दी
मेरे पैर वहीं जड़ हो जाते हैं मन एक करुणामयी भाव में भरकर वैराग्य की स्थिति में आकर संसार की असारता पर विमर्श करने लगता है क्रोध मिश्रित करुणा विगलित भाव सोचने लगता है कि किंचित यही अनुभूति आदि- कवि को हुई होगी जब उनके मुख से प्रथम श्लोक उद्भूत हुआ होगा-----
   " मा निषाद प्रतिष्ठाम त्वमगम शाश्वती समां
यत क्रोंच मिथुनादेकम वधी   काम मोहितं|"

----
डॉ. श्याम गुप्त , सुश्यानिदी ,के-३४८, आशियाना ,लखनऊ -२२६०१२.

--

चित्र – रेखा की कलाकृति – वीमन इन क्राउड

rachanakar-vyangya

(प्रविष्टि क्रमांक - 25)

धर्म , कुल , गोत्र, जाति और संप्रदाय की जड़ें हमारी संस्कारों में बहुत गहरी हैं. यूं हम आचरण में धर्म के मूल्यों का पालन करें न करें , पर यदि झूठी अफवाह भी फैल जाये कि किसी ने हमारे धर्म या जाति पर उंगली भी उठा दी है , तो हम कब्र से निकलकर भी अपने धर्म की रक्षा के लिये सड़कों पर उतर आते हैं , यह हमारा राष्ट्रीय चरित्र है. हमें इस पर गर्व है. इतिहास साक्षी है धर्म के नाम पर ढ़ेरों युद्ध लड़े गये हैं , कुल , जाति , उपजाति ,गोत्र , संप्रदाय के नाम पर समाज सदैव बंटा रहा है. समय के साथ लड़ाई के तरीके बदलते रहे हैं , आज भी जाति और संप्रदाय भारतीय राजनीति में अहं भूमिका निभा रहे है. वोट की जोड़ तोड़ में जातिगत समीकरण बेहद महत्वपूर्ण हैं. जिसने यह गणित समझ लिया वह सत्ता मैनेज करने में सफल हुआ. इन जातियों , कुल , गोत्र आदि का गठन कैसे हुआ होगा ? यह समाज शास्त्र के शोध का विषय है पर मोटे तौर पर मेरे जैसे नासमझ भी समझ सकते हैं कि तत्कालीन , अपेक्षाकृत अल्पशिक्षित समाज को एक व्यवस्था के अंतर्गत चलाने के लिये इस तरह के मापदण्ड व परिपाटियां बनाई गई रही होंगी , जिनने लम्बे समय में रुढ़ि व कट्टरता का स्वरूप धारण कर लिया.

चरम पंथी कट्टरता इस स्तर तक बढ़ी कि धर्म , कुल , गोत्र, जाति और संप्रदाय से बाहर विवाह करने के प्रेमी दिलों के प्रस्तावों पर हर पीढ़ी में विरोध हुये , कहीं ये हौसले दबा दिये गये , तो कही युवा मन ने बागी तेवर अपनाकर अपनी नई ही दुनिया बसाने में सफलता पाई. जब पुरा्तन पंथी हार गये तो उन्होने समरथ को नहिं दोष गोंसाईं का राग अलाप कर चुप्पी लगा ली , और जब रुढ़िवादियों की जीत हुई तो उन्होने जात से बाहर , तनखैया वगैरह करके प्रताड़ित करने में कसर न उठा रखी. जो भी हो , इस डर से समाज एक परंपरा गत व्यवस्था से संचालित होता रहा है. धर्म , कुल , गोत्र, जाति और संप्रदाय के बंधन प्रायः शादी विवाह , रिश्ते तय करने हेतु मार्ग दर्शक सिद्धांत बनते गये. पर दिल तो दिल है , गधी पर दिल आये तो परी क्या चीज है ? जब तब धर्म की सीमाओं को लांघकर प्रेमी जोड़े , प्रेम के कीर्तिमान बनाते रहे हैं. प्रेम कथाओ के नये नये हीरो और कथानक रचते रहे हैं. इसी क्रम को नई पीढ़ी बहुत तेजी से आगे बढ़ा रही लगती है.

यह सदी नवाचार की है. नई पीढ़ी नये धर्म , कुल , गोत्र, जाति और संप्रदाय बना रही है. आज इन पुरातन जाति के बंधनों से परे बहुतायत में आई ए एस की शादी आई ए एस से , डाक्टर की डाक्टर से , साफ्टवेयर इंजीनियर की साफ्टवेयर इंजीनियर से , जज की जज से , मैनेजर की मैनेजर से होती दिख रही हैं. ऐसी शादियां सफल भी हो रही हैं. ये शादियां माता पिता नही स्वयं युवक व युवतियां तय कर रहे हैं. माता पिता तो ऐसे विवाहों के समारोहों में खुद मेहमान की भूमिका में दिखते हैं. बच्चों से संबंध रखना है तो , उनके पास इन नये कुल गोत्र जाति की शादियों को स्वीकारने के सिवाय और कोई विकल्प ही नही होता. मतलब शिक्षा , व्यवसाय , कंपनी , ने कुल , गोत्र, जाति का स्थान ले लिया है. इन वैवाहिक आयोजनों में रिश्तेदारों से अधिक दूल्हे दुल्हन के मित्र नजर आते हैं.रिश्तेदार तो बस मौके मौके पर नेग के लिये सजावट के सामान की तरह स्थापित दिखते हैं. ऐसे आयोजनों का प्रायः खर्च स्वयं वर वधू उठाते है.

सामान्य तया कहा जाता था कि दूल्हे को दुल्हन मिली , बारातियों को क्या मिला ? पर मैनेजमेंट मे निपुण इस नई पीढ़ी ने ये समारोह परंपराओं से भिन्न तरीकों से पांच सितारा होटलों और नये नये कांसेप्ट्स के साथ आयोजित कर सबके मनोरंजन के लिये व्यवस्थायें करने में सफलता पाई है. कोई डेस्टिनेशन मैरिज कर रहा है तो कोई थीम मैरिज आयोजित कर रहा है. ये विवाह सचमुच उत्सव बन रहे हैं. कुटुम्ब के मिलन समारोह के रूप में भी ये विवाह समारोह स्थापित हो रहे हैं. लड़कियों की शिक्षा से समाज में यह क्रांतिकारी परिवर्तन होता दिख रहा है. लड़के लड़की दोनो की साफ्टवेयर इंजीनियरिंग जैसे व्यवसायों की मल्टीनेशनल कंपनी की आय मिला दें तो वह औसत परिवारों की सकल आय से ज्यादा होती है , इसी के चलते दहेज जैसी कुप्रथा जिसके उन्मूलन हेतु सरकारी कानून भी कुछ ज्यादा नही कर सके खुद ही समाप्त हो रही है. हमारी तो पत्नी ही हम पर हुक्म चलाती है , पर इन विवाहों में सब कुछ लड़की की मरजी से ही होता दिखता है , क्योंकि कुवर जी पर दुल्हन का पूरा हुक्म चलता दिखता है.

यूं तो नये समय में कालेज से निकलते निकलते ही बाय फ्रेंड , गर्ल फ्रेंड , अफेयर , ब्रेकअप इत्यादि सब होने लगा है , पर फिर भी जो कुछ युवा कालेज के दिनो में सिसियरली पढ़ते ही रहते हैं उनके विवाह तय करने में नाई , पंडित की भूमिका समाप्त प्राय है , उसकी जगह शादी डाट काम , जीवनसाथी डाट काम आदि वेब साइट्स ने ले ली है. युवा पीढ़ी एस एम एस , चैटिंग , मीटिंग , डेटिंग , आउटिंग से स्वयं ही अपनी शादियां तय कर रही है. सार्वजनिक तौर से हम जितना उन्मुक्त शादी के २० बरस बाद भी अपनी पिताजी की पसंद की पत्नी से नही हो पाये हैं ,हनीमून पर जाने की आवश्यकता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुये परस्पर उससे ज्यादा फ्री , ये वर वधू विवाह के स्वागत समारोह में नजर आते हैं. नये धर्म , कुल , गोत्र, जाति और संप्रदाय की रचियता इस पीढ़ी को मेरा फिर फिर नमन. सच ही है समरथ को नही दोष गुसाईं. मैं इस परिवर्तन को व्यंजना , लक्षणा ही नही अमिधा में भी स्वीकार करने में सबकी भलाई समझने लगा हूं.

----

विवेक रंजन श्रीवास्तव

ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

rachanakar-vyangya

(प्रविष्टि क्रमांक 24)

चिरौंजीलाल जी सरकार की उपलब्धियां बताते हुए तथा विरोधियों द्वारा लगाये गये आरोपों का जबाब देते  हुए एक राज का खुलासा किया । उन्होंने बताया कि 'सब कुछ अपना पार्टी -एसकेएपी'   के सकारात्मक व विकासात्मक क़दमों से विरोधी बौखला गये हैं । इसी से वो बे सिर- पैर की बातें कर रहे हैं तथा उलूल-जुलूल बक रहे हैं ।

सरकार पर कला विरोधी होने का मिथ्या आरोप लगाया जा रहा है। कहा जा रहा है कि सरकार कला के विकास के प्रति  बेहद लापरवाह है तथा बेरोजगारों की बढ़ती संख्या की ओर कोई ध्यान नहीं दे रही है। लेकिन यह आरोप बिल्कुल बेबुनियाद है। हम आपको बताना चाहेंगे कि हमने हजारों ताली वादकों की नियुक्तियाँ कराई है। इससे जहाँ एक ओर कला का सम्मान हुआ है वहीं दूसरी ओर बेरोजगारों की संख्या में भी कमी हुई है। इतना ही नहीं अभी हजारों ताली वादक और नियुक्ति किये जायेंगे । हम इसके लिए आवश्यक कदम उठा रहे हैं। मेरे सहयोगी चिम्मनलाल जी अन्य सभी आरोपों का करारा जबाब आगामी चुनावी रैली में देंगे ।

इस घोषणा से बहुतों बेरोजगारों के जान में जान आई। सबको लगा कि देर-सबेर चुनावों की घोषणा होने वाली है ही। अतः कुछ न कुछ लोक-लुभावने काम होंगे ही। इसी समय जो बाजी जीत जाये उसकी ही जीत है। चुनाव बाद क्या होगा ?  किसका होगा, कैसे होगा कुछ पता नहीं  ?   यह खबर जब रामू को मिली तो फ़ौरन मोहन को खबर देने चल पड़ा।

अरे भाई मोहन ! ओ मोहन ! रामू ने मोहन के घर जाकर पुकारा । अरे रामू तुम  !  लगता है सुबह- सुबह ही कहीं जा रहे हो। कहीं भाभी से झगडा तो नहीं हो गया। मोहन घर से बाहर आकर बोला। रामू बोला तूँ तो चाहता  ही है कि हमारे घर में हमेशा लड़ाई- झगड़ा ही होता रहे । मैं शांति के साथ न रहूँ । लेकिन वैसी बात नहीं है। तूँ शांति के साथ रहे या मालती के मुझे क्या करना है  ?   लेकिन किसी और के साथ रहने की  भाभी इजाजत तो दें । मोहन ने मुस्कराते हुए कहा। रामू ने कहा मजाक की बातें छोड़   !     

एक बहुत अच्छी खबर है। मोहन बोला खबर भी बताओ न ताकि मैं भी जानूँ कि कितनी अच्छी है। रामू बोला तूँ बहुत अच्छी ताली बजाता है न । मोहन बोला क्या मतलब  ?   रामू ने कहा मेरा मतलब ताली बजाकर जबरन वसूली करने वालों से नहीं है। मोहन बोला अब समझा लेकिन कहाँ तूँ और कहाँ मैं  ?   भाभी के हर काम में ताली बजाते-बजाते तेरे हाथों में घट्ठे जो पड़ गये हैं। रामू ने कहा पहले काम की बात तो सुन ले। नेता जी ने हजारों ताली वादकों के नियुक्त की घोषणा की है। मोहन बोला खबर तो अच्छी है। लेकिन मुझे कोई खास ख़ुशी नहीं हो रही है। रामू ने पूछा आखिर वह  क्यों ?  मोहन बोला क्योंकि न तो हम लोगो के पास पैसा ही हैं और न ही जुगाड़।

रामू ने कहा पैसे और जुगाड़ को मार गोली। सिर्फ ताली बजाओ और पैसा कमाओ। समय-समय पर सम्मानित भी किये जाओगे। मतलब नाम व इनाम भी मिलेगा। बशर्ते ईमान से दूर का भी रिश्ता न हो। समझ गया न। आजकल ज्यादातर ताली बजाने वाले ही पुरस्कृत होते हैं और आगे बढ़ते हैं।

कितने ही ताली वादक कहाँ से कहाँ पहुँच गये ? ऐसे-ऐसे पुरस्कार पा लिए जिसका नाम भी पहले कभी नहीं सुना था।    'जो जीता वह भी हैरान तथा जो हारा वह भी हैरान वाली'  बात ताली वादक सहज ही चरितार्थ कर व करा देते हैं। ताली वादक खुद तो गौरव प्राप्त करते ही हैं। साथ ही  दूसरों को भी गौरवान्वित  करते-कराते हैं। जिसके पास जितने ही अधिक ताली-वादक होते हैं। वह  उतना ही गौरवशाली बन जाता है। इसी से इनकी मांग हर जगह रहती है तथा बराबर मान-सम्मान भी मिलता रहता है।

रही बात घूस व जुगाड़ की तो यह कोई आम लोक सेवकों की नियुक्त थोड़े है कि कोई भी ऐरा-गैरा पहुँच जाये। जुगाड़ और पैसे के बल पर। यह तो नेता जी और उनकी सरकार का खास काम है। अतः सिर्फ योग्यता होनी चाहिए। ताली बजाने की । आरक्षण का भी झमेला नहीं है । ऐसा नहीं होगा कि जाति या धर्म के नाम पर अयोग्यों को भर लिया जाये। गरीबों और पिछडों को अलग से मुफ्त ट्रेनिंग व आर्थिक सहायता तो दी जायेगी। लेकिन नियुक्ति के समय योग्यता साबित करना ही होगा। जाति-धर्म वाला वेटेज इसमें नहीं मिलेगा।

अयोग्य जन चाहे वे जुगाड़ या घूस वाले हों अथवा आरक्षण वाले। जब जन-सेवा करते हैं। तो उससे नेता की कोई हानि थोड़े होती है । अतः अधिक से अधिक ताली वादक हर विभाग में  रहते हैं । उन्हें कुछ आये या न आये इससे फर्क नहीं पड़ता । बशर्ते उन्हें ताली बजाना अच्छी तरह आता हो ।

आज के समय में अधिकांश लोगों का मूल-मंत्र – ‘अपना सर बचे दूसरे का बेल बराबर’   ही होता है। अतः जनता भुगते तो नेता का क्या जाता है ?   जैसे यदि डॉक्टर को आँख में लेंस डालना है। उसे बारीकी नहीं पता तो आड़ा-तिरछा किसी तरह डालेगा ही। मरीज को दिखेगा कैसा ?   इसका ठेका तो उसने ले नहीं रखा है। बहुत होगा तो फिर से ओपरेट कर देगा। लेंस की जगह अबकी पूरी आँख ही निकाल बाहर रख देगा। सुना ही होगा नत्थू आँख के आपरेशन के लिए गया था। सोचा था आँख ठीक हो जाएगी। उसकी रही-सही रोशनी भी चल- बसी । अब ऐसी बेबसी है कि क्या कहें ? 

ऐसे ही शिक्षक से कोई विद्यार्थी पूछें कि बीजगणित को बीजगणित  क्यों कहते है  ?   तब यदि शिक्षक बताये कि 'अ'  से अंकगणित,  'र'  से रेखागणित तथा 'ब'  से बीजगणित की उत्पत्ति हुई है। तथा 'अ'  और 'र'   के बीच में 'ब'  आता है। अतः अंकगणित और रेखागणित के बीच में होने से ही इसे बीजगणित कहते  हैं।

अपना तर्क भी दे कि फलों व अनाजों आदि में भी बीज बीच में ही होता है। बीज और बीच में बहुत गहरा सम्बन्ध है। दार्शनिक लहजे में भी समझाए कि प्रकृति में बीज ही प्रधान होता है । तथा जो प्रधान होता है वह बीच में ही रहता है । उदाहरण भी दे कि जैसे नेता । वह सदा बीच में ही रहता है चाहे ताली वादकों के  चाहे गनरों के । तो  इसमें क्या गलत है ?  आजकल तार्किकों की कमी नहीं है और तर्क के आधार पर बहुत कुछ सही भी मान लिया जाता है। आज के ज्ञानी बहुत उच्च तार्किक होते हैं।

आज के समय में भजन भी खाली हाथ बहुत कम ही होती है। यानी ऐशो-आराम चाहिए, चलने के लिए कार चाहिए। कुछ ऐसे चेले -चपाटी पालने को भी चाहिए जो हर तरह की सेवा का जुगाड़ कर सकें। इसलिए नियुक्ति पक्की होगी। डेली बेसिस और कोंट्राक्ट की समस्या नहीं है। क्योंकि जब रोज पेट ही नहीं भरेगा तो काम क्या खाक होगा  ? 

ऐसा काम कहीं नहीं मिलेगा। सिर्फ प्रभावपूर्ण ताली लय से बजाओ कि हर कोई प्रभावित हो जाये। काम भी आसान है। नेता जी कुछ भी कहें ताली बजाते जाओ । सभाओं में तो और ही सुविधा रहती है। सबसे पीछे रहो । कहीं ऐसी वैसी घटना हो जाये तो पीछे से ही खिसक भी लो। मोहन बोला चुनाव बाद कहीं छुट्टी न कर दें। रामू बोला नहीं यार। यह नयी योजना है और मैंने बोला न कि नियुक्त पूरी सरकारी। सरकार को तो हर समय ताली वादक चाहिए ही होते हैं।

मोहन बोला अच्छा मान ले चुनाव बाद ‘सब कुछ अपना पार्टी’ सत्ता से बाहर हो जाती है। तब हम लोगों का क्या होगा ?   रामू बोला तूँ तो खामखाह सोचे जा रहा है। सियासत और सरकार में ताली वादकों की जरूरत किसे नहीं होती। सरकार चाहे जिस पार्टी की बने। तालीवादकों की जरूरत तो हर पार्टी को रहती ही है।

----

एस के पाण्डेय,

समशापुर (उ. प्र.)।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

                               *****************************************************

Image031

जवानी दीवानी होती है, मस्‍तानी होती है।

ख़ुशियों की राजधानी होती है।

दिल की सुनी-दिमाग की अनसुनी होती है।

कइर् हसीन सुहाने पलों की कहानी होती है।

मां-बाप पर नहीं परायों पर मेहरबानी होती है।

बिगड़ते भविष्य की चेतावनी होती है।

आने वाले कल की तैयारी होती है।

जवानी ना समझ मगर जोर की आंधी होती है।

---

 

डॉ. एम. शाहुल हमीद,

प्रवक्‍ता, हिन्‍दी विभाग,

मनोंमणियम सुन्‍दरनार विश्वविद्यालय,

तिरूनेलवेलि

तमिलनाडु

Image132

सामर्थ्य 

1

सत्ता का सिंहासन
कितना ही छोटा क्यो न हो
बन जाता है केन्द्र.
पैदा कर लेता है

गुरुत्वाकर्षण का बल
सूर्य बन खींच लेता है 
आसपास मंडराते तमाम ग्रह
उनके उपग्रहों समेत.

निर्धारित करने लगता है
नियम और प्रतिमान
परिक्रमा-पथ
गति और दिशा
समय/ मौसम/ पर्यावरण.

बन जाता है जरुरत
अपनी परिधि के भीतर जगते
कण कण के अस्तित्व की.

विस्तृत ब्रंह्मांड मे
घूमती आकाश-गंगाओं
और चमकते विशाल नक्षत्रों के बीच
कितना ही क्षुद्र/नगण्य हो वह
अपने सौर मंडल का तो
स्वामी ही होगा.

चाहेगा ही अपने
प्रभामंडल का विस्तार.

दूर परिक्रमा पथ पर
घूमते पिंडो को रोके रखेगा यथाशक्ति
विचरित अथवा विचलित होने से
किसी और आकर्षण की तहत.

प्रकाश और ऊर्जा की पूंजी
लुटाता है
प्रतिबद्धता की एवज में.

उसी पूंजी के सहारे
जो चुक रही है पल पल,
विशाल दानवी आकार
अथवा ब्लैक होल में

बदल जाने से पहले,
अधिपत्य चाहता है
एक जीती/ धड़कती
दुनिया पर.

2.

 


थामे रखनी है
अपने हाथों मे एक मशाल
ताकि गुजर सकें
वक्त-बेवक्त अकेले
अन्धी सुरंगों से होकर
बेखौफ़.

षड़यंत्रो से परिचित हो कर भी
दिख सके निश्चिंत
बना कर रखनी है
खुद अपने लिये सुरंगे
जो निकाल सके
सही वक्त पर
लाक्षागृहों से.

अपने ही प्रयासों से
पाने होंगे मंत्र
रथी-महारथियों के रचे
चक्र-व्यूहों को
सुरक्षित भेद सकने के लिये.

रखना  होगा
थोड़ी सी हंसी और
उल्लास को बचा कर
विषाद और आंसू की
वैतरणी को
पार कर सकने के लिये.

बचा कर रखने होंगे
कुछ अंकुर
सृष्टि के अंत तक
फिर नये जीवन की
सम्भावना के लिये.

---

yashwant kothari[2]

भेड़िये सब तरफ थे । वे भेड़ों का मुण्‍डन करने में व्‍यस्‍त थे । भेड़ों के प्रबन्‍धन हेतु भेड़ियों ने कुछ महत्‍वपूर्ण निर्णय लिये थे ं वे चाहते थे कि भेड़े भेड़ चाल से चलती हुई प्रजातन्‍त्र की रक्षा करे । वे ये भी चाहते थे कि भेड़े भेड़ियों के प्रति वफादार रहे । जो भेड़े वफादार नहीं होगी उन्‍हें बरखास्‍त कर देने की भी घोषणाएं हो रही थी । भेड़े बड़ी डरी हुई थी , वे भेड़ चाल से प्रजातन्‍त्र की पगडंडी पर चल रही थी , मगर भेडियों में भी फूट थी । कुछ भेड़िये सत्‍ता के साथ थे कुछ सत्‍ता के विरोध में थे , वे जनता रूपी भेड़ों की उन उतारने में व्‍यस्‍त थे , मगर बहुत सारी भेड़े उन उतरवाने में आनाकानी करने लगी थी , भेड़ियों को भेड़ों का यह व्‍यवहार नागवार गुजर रहा था । वे फिर भेड़ प्रबन्‍धन के विषय में सोचने लगे थे । अकाल , बाढ़ , भूकम्‍प जैसे उत्‍सवों में भेड़ियों को बड़ा आनन्‍द आता था । प्रशासन के अनन्‍त आकाश में भेड़िये अपने आप को सबसे उंचा खम्‍भा समझते थे । वे मानते थे कि प्रशासन के खम्‍भे पर चढ़कर वे भेड़ों को आसानी से हांक सकते है , मगर पिछले कुछ वर्षों में भेड़ों ने अपना चाल-चलन , चरित्र बदल लिया था ं भेड़ों के इस चरित्र-परिवर्तन से भेड़िये परेशान थे । उन्‍होने भेड़ों के प्रबन्‍धन के लिए कुछ नये प्रबन्‍धन , गुरूओं से सलाह मशविरा किया था । मगर इन प्रबन्‍धन गुरूओं के किताबी ज्ञान से भेड़े अप्रभावित रही । भेड़ों ने चरित्र की चटनी और प्रतिभा के अचार को खाने से मना कर दिया । भेड़िये बड़े परेशान थे , मगर भेड़ों को अपनी मांद तक लाना और खाना एक मुश्किल काम हो गया था । सभी भेड़िये इसी फिराक में थे कि भेड़े उनकी मांद तक स्‍वतः आ जाये तो मजा आ जाये । भेड़े इन भेड़ियों के रूप , रंगा आदतों से इतने वर्षो में अच्‍छी तरह परिचित हो गई थी । कुछ बुजुर्ग भेड़ों ने भी नये मेमनो को भेड़ियों के चरित्र , आदतों , बेइमानियों से परिचित करा दिया था । भेड़े भेड़ियों के झांसे में आने को तैयार नहीं थी ।

भेड़ियों ने पड़ोसी देशों से युद्ध का नाटक किया । भेड़ें नहीं मानी । भेड़ियों ने आंतकवाद का होंव्‍वा खड़ा किया , मगर भेड़ों ने कोई ध्‍यान नहीं दिया । सुरक्षा , महंगाई , मंदी , बेरोजगारी , शिक्षा , स्‍वास्‍थ्‍य आदि के मुद्‌दे भी प्रभावहीन हो गये । भेड़ियों की चिन्‍ताएं बढ़ने लगी । वे बार बार भेड़ों की ओर ललचायी निगाहों से देखने लगते मगर भेड़े उन्‍हें धास नहीं डाल रही थी इन अजीब भेड़ों के अजीब व्‍यवहार के कारण भेड़ियों के महलों में चिन्‍ता व्‍यक्‍त की जाने लगी । कुछ युवा भेड़ियों ने पुराने बुजुर्ग , काईयां भेड़ियों से सलाह मशविरा करना शुरु किया । पुरानी गाली देने वाली परम्‍परा का पुनः विकास किया गया मगर मेमने भी बड़े बदमाश हो गये थे , वे पानी पीने ही नहीं आते । भेड़ियों ने जल-प्रबन्‍धन , बिजली प्रबन्‍धन , सड़क मरम्‍मत प्रबन्‍धन जैसी योजनाएं शुरू की , मगर भेड़ों के कान पर जूं नही रेंगी । भेड़िये अब अपनी असली औकात पर आ जाना चाहते थे , वे कहीं भी भेड़ या मेमने को देखते और टूट पड़ना चाहते थे , मगर हाइकमाण्‍ड का आदेश नहीं था । वे क्‍या करते । वे मजबूर थे । बिना आलाकमाण्‍ड के आदेष के भेड़िये सांस भी नहीं ले सकते थे । कभी कभी सांस लेने की स्‍वीकृति देर से प्राप्‍त होने के कारण किसी किसी भेड़िये की अकाल मृत्‍यु हो जाती थी । अकाल मृत्‍यु को प्राप्‍त भेड़िये के परिवार के किसी सदस्‍य को अनुकम्‍पा आधारित नौकरी देने की परम्‍परा के कारण परिवार के अन्‍य भेड़िये मृत्‍यु के दुख को भूल जाते थे । वे अनुकम्‍पा में प्राप्‍त मेमने के ताजा गोस्‍त को खाने में मशगूल हो जाते थे । भेड़िये-भेड़ो के मुण्‍डन संस्‍कार में फिर व्‍यस्‍त हो जाते थे । जनता रूपी भेड़ बकरियों और मेमने की सुरक्षा का कोई इन्‍तजाम नहीं था । सरकारी अमला भेड़ियों से रक्षा करने के बजाय स्‍वयं एक छोटा-मोटा भेड़ियां बनकर काम करने लग जाता । भेड़िये कभी सम्‍मूह में कभी एकल रूप से नियमित रूप से भेड़ों को खा रहे है । प्रजातन्‍त्र में भेड़े असुरक्षित है । जनता असुरक्षित है और जनता के मुनीम सुरक्षा के सात तालों में बंद रहते है ।

कभी कभी जनता को ये भ्रम हो जाता कि भेड़ियों का हृदय परिवर्तन हो गया है मगर यह सिर्फ अफवाह ही निकलती । भेडिये अपने परिवर्तित हृदय से यथाषीघ्र भेड़ो का मुण्‍डन षुरूकर देते । भेड़िये केवल जंगल में ही नहीं षहर में भी होते है और प्रजातन्‍त्र में भी । प्रजातन्‍त्र है तो भेड़े भी होगी और भेड़िये भी । अकाल भी होगे और भेड़िये भी । बाढ़ भी होगी और भेड़िये भी ।

भेड़िये सर्वत्र होगे बस मुखौटे नये। भेड़ियों ने भेड़ों के प्रबन्‍धन हेतु कुछ नये पाठ्‌यक्रम बना लिये है और वे भेड़ों को पढाने चल पड़े है । सावधान रहियेगा ।

0 0 0

यशवन्त कोठारी

86 , लक्ष्‍मीनगर ब्रहमपुरी बाहर

जयपुर . 2 -फोन -2670596

- नारी विमर्श।

आज की नारी तुम कर लो संकल्‍प

उपर उठना है बंश मोह से

लेना है बराबरी का हक

तुम्‍हें चाहिये तो सामाजिक समानता

बंश की चिन्‍ता में ना मरो अब।

अब तुम संघर्ष करो

सामाजिक समानता की मान्‍यता के लिये

तोड़ दो मौन अपना

रूढिवादी आंखों से नही

खुली आंखों से देखो सपने।

बदल डालो तुलसी की चौपाई

शुद्र गंवार ढोल पशु नारी

समान अधिकार की मांग करो

मौन में जीना छोड़ दो

रूढिवादी बंदिश्‍ों तोड़ दो ।

महाभारत और रामायण में क्‍या हुआ ?

मालूम तो है ना ?

ना सहो अत्‍याचार,शोषण ,ना मरो दहेज की आग,

करो नारा बुलन्‍द नर-नारी एक समान

चाहिये सामाजिक समानता का अधिकार

यही है आज का नारी विमर्श

शुरू कर दो संघर्ष आज से ही......-

 

-वह बीनती थी ।

वह बीनती थी,

पेट की आग बुझाने के लिये

दूसरों के ख्‍ोत में छुटे,

एक-एक दाने और बालियां

मैली-कुचैली जगह-जगह से

फटी साड़ी में ढंकी हुई

कंध्‍ो पर टंगा होता था

मैला कुचैला टाट का थ्‍ौला

जोड़ती रहती थी टाट के थ्‍ौले में

गांव के मालिको के ख्‍ोत में छुटे

एक -एक दानें बूढे कांपते हाथो से ।

यह वही गांव था

जहां उगता है सूरज सबसे पहले

आबाद है बेटे-बेटी और नाती-पोते भी

परन्‍तु उस बूढी के लिये कोई

कोई मायने नही रखता था ये सब

क्‍योंकि

वह निष्कासित थी पुत्र के हाथों ।

वक्‍त बदला पर तकदीर नही बदली

वह बिनती रहा दाना-दाना

सूरज उगने से डूबने तक।

जोड़ती रही पेट की आग बुझाने का सामान

अपनों के बीच पराई होकर ।

परिवार धन वैभव सब कुछ था

उसके लिये तपता रेगिस्‍तान

भूख के आगे ।

वह रूकी नही जब तक थकी नही

थक कर जब गिरी तो उठी नही

चल बसी छोड़कर

अनाज से भरी गगरी

और

उजड़े सपने का हंसता संसार।

 

-सामने वाले घर में ।

मेरे सामने वाले घर में

एक दुल्‍हन रहती है

सास है,ससुर है,ननद,देवर

पति हृष्‍ट.-पुष्‍ठ,अच्‍छा व्‍यापार

खाता-पीता परिवार ।

आधुनिक साजो-समान है

दुल्‍हन का नही परिवार में मान है

अपराधी घोषित हो चुकी है

क्‍योंकि बड़ी बहन,

अर्न्‍तजातीय शादी कर चुकी है ।

निरापद करे कोई भरे कोई की,

प्रताड़ना पा रही है

चरित्रहीनता का कलंक ढो रही है

सजातीय ब्‍याह कर खुद दुख

बहन दुनिया का सुख भोग रही है ।

मेरे सामने वाले घर में,

एक दुल्‍हन रहती है

जो कुल की मर्यादा पर मरती है ।

 

-ललकार ।

गांव की सौभाग्‍य से कुछ पढी लड़की,

बूढी लग रही थी

बेसहारा दुख का बोझ ढो रही थी

फटे वस्‍त्र में नारी की मर्यादा,

ढांपने की कोशिश कर रही थी ।

परिचित अपरिचित हो गये थ्‍ो

संग ख्‍ोले दुश्‍मन लग रहे थ्‍ो

विस्‍मित आसरा ढूंढ रही थी

ना मालूम था मिलेगा कहां ?

बरगद की छांव बैठकर कर

कर लिया दृढ़-प्रतिज्ञा उसने

जमा लिया पांव अंगद की भांति

नये मकसद पर ।

कामयाब हो गयी एक दिन

पा गयी मन-माफिक मंजिलें ।

एक प्रश्‍न था बार-बार पीछा कर रहा था,

क्‍या मैं दोषी थी ?

या बाप या सौतेली मां

या बेदाग जमाने के रीति-रिवाज

जिसको मैंने ललकार दिया ।

 

-विरासत ।

याद है मां का सूप से पछोरना

नियत समय बैठ जाती थी

हैण्‍डपाइप पर अनाज धोने ।

खुद के पसीने का होता था

साफ-सुथरा

फिर शंका होती थी

कंकड़ और छूछे अन्‍न के मिले होने का ।

हैण्‍डपाइप पर धोकर सुखाती थी

दिन भर ।

फिर फुर्सत मिलते ही बैठ जाती थी

पछोरने सूप लेकर ।

हर फटकन के बाद

दूर जा गिरते थ्‍ो कंकड़ और छूछे अन्‍न

मां चुन-चुन कर सहेजती थी

दाना-दाना ।

जैसे मां दुख को धिक्‍कार रही हो

सुख को सहेज रही हो

हमारे लिये ।

धीरे-धीरे मां के हाथ थक गये

चिरनिद्रा में सो गयी

मां की विरासत सम्‍भाल रही है

मेरे बच्‍चों की मां ।

शायद हर मां की ख्‍वाहिश होती है

बच्‍चों के जीवन में बरसे सुख

कोसों दूर रहे दुख

मेरी मां के हाथों सूप से ,

पछोरे अन्‍न की तरह ।

--

परिचय:

नन्दलाल भारती

शिक्षा - एम.ए. । समाजशास्त्र । एल.एल.बी. । आनर्स ।

पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन ह्यूमन रिर्सोस डेवलपमेण्ट

जन्म स्थान- - ग्र्राम चौकी। खैरा। तह.लालगंज जिला-आजमगढ ।उ.प्र।

प्रकाशित पुस्तकें

म.पुस्तक प्रकाशन उपन्यास-अमानत ,निमाड की माटी मालवा की छाव।प्रतिनिधि काव्य संग्रह।

प्रतिनिधि लघुकथा संग्रह- काली मांटी एवं अन्य कविता, लघु कथा एवं कहानी संग्रह ।

उपन्यास दमन और अभिशाप- उखड़े पांव ।लघुकथासंग्रह।

अप्रकाशित पुस्तके उपन्यास-दमन,चांदी की हंसुली एवं अभिशाप, कहानी संग्रह- 2

काव्य संग्रह-2 लघुकथा संग्रह-1 एवं अन्य

सम्मान लेखक मित्र ।मानद उपाधि।देहरदून।उत्तराखण्ड।

भारती पुष्प। मानद उपाधि।इलाहाबाद,

भाषा रत्न, पानीपत ।

डां.अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान,दिल्ली,

काव्य साधना,भुसावल, महाराष्ट्र,

ज्योतिबा फुले शिक्षाविद्,इंदौर ।म.प्र.।

डां.बाबा साहेब अम्बेडकर विशेष समाज सेवा,इंदौर

कलम कलाधर मानद उपाधि ,उदयपुर ।राज.।

साहित्यकला रत्न ।मानद उपाधि। कुशीनगर ।उ.प्र.।

साहित्य प्रतिभा,इंदौर।म.प्र.।

सूफी सन्ज महाकवि जायसी,रायबरेली ।उ.प्र.।

विद्यावाचस्पति,परियावां।उ.प्र.। एवं अन्य

आकाशवाणी से काव्यपाठ का प्रसारण ।कहानी, लघु कहानी,कविता

और आलेखों का देश के समाचार पत्रों@पत्रिकओं

में एवं www.swargvibha.tk/

www.swatantraawaz.com
rachanakar.com / hindi.chakradeo.netwww.srijangatha.com,esnips.con, sahityakunj.net

एवं अन्य ई-पत्र पत्रिकाओं पर रचनायें प्रकाशित ।

आजीवन सदस्य इण्डियन सोसायटी आफ आथर्स।इंसा।नई दिल्ली

हिन्दी परिवार,इंदौर ।मध्य प्रदेश।

आशा मेमोरियल मित्रलोक पब्लिक पुस्तकालय,देहरादून ।उत्तराखण्ड। एवं अन्य

स्थायी पता आजाद दीप, 15-एम-वीणानगर ,इंदौर ।म.प्र.!

Email-nandlalram@yahoo.com

Visit us-: http://nandlalbharati.mywebdunia.com

Image001

समझ

बच्‍चा जब तक

रहता है मां के पास

डर नहीं रहता

उसे किसी का

मां की आंचल में

सुरक्षित महसूस करता है

अपने आप को

नही जानता वह

आधुनिक इंसान के

परमाणु बमों को

आग्‍नेयास्‍त्रों को

वह तो बस मां की

गोद को ही जानता है ।

मां भी

बच्‍चे के लिए

भूल जाती है

अपना सब कुछ

पूर्णतः समर्पित होती है

बच्‍चे के लिए

मां की ममता के आगे

हार भले ही न माने

आज के परमाणु बम

या मिसाइल

जो लाखों मील तक

प्रहार कर देते हैं

लेकिन हार मान जाते हैं

वे इंसान जो खुद ही

बनाते हैं इन

आग्‍नेयास्‍त्रों को

दुनिया को खत्‍म करने के लिए ॥

----0----

सूरज तिवारी 'मलय' , ब्राम्‍हण पारा, लोरमी

जिला- बिलासपुर छत्‍तीसगढ़ 495115

----

हास्य व्यंग्य कविता

झारखण्ड के गहने --------

भ्रष्टाचार  के है क्या कहने.

झारखण्ड के ये बन गए गहने..

मंत्री संतरी दोनों मिलकर.

टेबुल नीचे खाते छुपकर..

लो़कर ही दोनों के सपने  --

भ्रष्टाचार  के है क्या कहने ---

दस बरस की बाली उमरिया.

नेता अफसर भर ली गगरिया..

बने अरबपति खाकपति थे जितने -

भ्रष्टाचार  के है क्या कहने ---

राज्य में क्या कोई कृष्ण आएगा.

इन कंसों को मार गिराएगा..

होंगे जरुर हरिश्चंद्र चमन में --

भ्रष्टाचार  के है क्या कहने ---

 

सुजान पंडित

शंकर विला, कांटा टोली चौक, ओल्ड एच. बी. रोड, रांची - ८३४००१ (झारखण्ड)

दूरभास - ९९३४३७०४०८.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *