हाय री दुनिया
दिखने में जैसे दिखती मगर वैसी नहीं है - दुनिया ।
हँसाने के बाद रूलाती है - दुनिया ।
सच्चाई नही, झूठ पसन्द करती है -दुनिया ।
सिर्फ अपना फायदा सोचती है - दुनिया ।
किसी की लाचारी पर हँसती है - दुनिया ।
दूसरों की खशी पर जलती है - दुनिया ।
हलाल का नहीं हराम का चाहती है - दुनिया ।
इनसानियत को पैसों से तोलती है - दुनिया ।
ईश्वर से भी भीख मँगवाती है- दुनिया ।
हमेशा मौत चाहती, मगर मौत आने पर
जीना चाहती है - दुनिया ।
जीवित रहने पर ही नहीं, मर जाने के बाद भी
जलाती है - दुनिया ।
मर जाने के बाद क्यों याद कर आँसू बहाती है
- दुनिया ?
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डॉ. एम. शाहुल हमीद,
प्रवक्ता, हिन्दी विभाग,
मनोंमणियम सुन्दरनार विश्वविद्यालय,
तिरूनेलवेलि
तमिलनाडु
दीनदयाल शर्मा, हनुमानगढ़ जं. राजस्थान , ०९४१४५१४६६६
प्रत्युत्तर देंहटाएंडॉ. शाहुल हमीद की कविता ....हाय री दुनिया ....में जग के प्रति घोर निराशा है. लेकिन कविता के भाव अच्च्न्हे हैं. बधाई.
रुलाना जग की रीत है,
झूठ से सबको प्रीत है.
पर लोग उसी के होते हैं,
जिसकी जग में जीत है
बात तो आपने सच्ची और अच्छी कही है, जरुरी नहीं कि कविता के भाव ऐसे है तो आप दुनियां से निराश हैं - आशावादी रहें और अच्छा लिखें - शुभकामनाएं
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