यदि कहीं दफ्तर है तो दफ्तर में लंच अवश्य है। बल्कि यों कहा जाना चाहिए कि दफ्तर काल में लंच स्वर्णिम काल होता है। वास्तव में दफ्तर वह स्थान हैं जहां पर घरेलु कार्य तसल्ली से किये जाते हैं। यदि आप दफ्तर में काम करते हैं तो दफ्तर में लंच का इंतजार अवश्य करते होंगे। यदि आप किसी काम से किसी दफ्तर में गये हैं तो लंच का सामना अवश्य किया होगा। वास्तव में लंच दफ्तर का निशान का हाथी हैं। बड़े-बड़े कामों के लिए केवल लंच होता है।
लंच के बिना दफ्तर की कल्पना करना व्यर्थ है। छोटे बच्चों के स्कूलों में ख्ोल-घंटी होती है। बड़े स्कूलों में रिसेस होती है, दफ्तरों में लंच होता है। सभा, सोसायटी तथा सेमिनार, कोंफ्रेसों में लंच होता है। आजकल राजनीति के क्ष्ोत्र में भी लंच-डिप्लोमेसी का बोलबाला है। ‘लंच के साथ' या ‘लंच के पहले' या ‘लंच के बाद' ये शब्द अक्सर आप दफ्तर में सुन सकते है।
दफ्तर में लंच हो गया है, इस बात का पता चलाना मुश्किल नहीं है क्योंकि जो कर्मचारी अब तक दफ्तर से गायब थ्ो, वे वापस दफ्तर में पहुंच जाते हैं, इसका मुख्य कारण यह है कि लंच के बाद दफ्तरों में पुनः हाजरी होती है या हाजरी के हस्ताक्षर करने पड़ते है। किसी बड़े सरकारी, अर्ध सरकारी या गैर सरकारी संस्था के बडे़ कार्यालय में जाकर देखिये कि लंच की क्या छटा होती है। हर तरफ कहकहे, मुस्कानें, खाने-पीने की मनुहार और मंत्रालय के बगीचे और लान में सैर-सपाटे। सच में लंच का आनंद ही अलग है। चाय-पकौड़ियों, समोसों, लस्सियों, फ्रुट डिशों, शीतल पेयों का आनंद वर्णनानीत है क्योंकि इन सबका भुगतान कर्मचारी की जेब से नही होता है, कोई-न-कोई भक्त कर्मचारियों की नजरें इनायत पाने के लिए यह सब भुगतान करता है।
लंच में लेडी सेक्रेटरी साहब की कार में पांच सितारा या तीन सितारा होटल में चली जाती है और गरीब भीखाराम दो रूप्पली की चाय के साथ सूख्ो टोस्ट कुतरता है।
लंच मे बडे़-बड़े लोग बड़ी-बड़ी डील पक्की करते हे और छोटे-छोटे लोग छोटी-छोटी बातों के लिए लड़ते-झगड़ते और किस्मत को कोसते हैं।
लंच में कई दफ्तरों की टेबलों से फाइलें और सरकारी कागज हटा कर कास्मेटिक्स, साड़ियां, पापड़, चाय, मंगोड़ी, बड़ी, अचार, चटनी, मुरब्बा, टाफियों की दुकानें सज जाती है और दफ्तर के लोग ही आवश्यक खरीददारी कर लेते हैं ताकि शाम को घर जल्दी जा सकें।
लंच में दफ्तर का आलम निराला हो जाता है। दफ्तर दफ्तर न लग कर सब्जी बाजार लगने लगता है। ख्ोलने वाले ख्ोल-कक्ष में चले जाते हैं। कैरम, ताश, शतरंज ख्ोली जाती है। महिला कर्मियों के बारे में हंसी मजाक किये जाते हैं और कैंटीन में चाय की शर्ते लगाई जाती हैं।
कुछ समझदार कर्मचारी लंच के बाद घर चले जाते है या मैटनी शो देखने निकल जाते हैं कुछ लोग लंच घर पर ही करने के लिए चले जाते हैं और वापस नहीं आते।
दफ्तर में अपना काम कराने आये आगंतुक को अक्सर जवाब मिलता हैं। ‘कल लंच के पहले आना।' या ‘परसों लंच के बाद आना ।' या ‘फिर वह बाबू जो आपका काम कर सकता है, आज लंच के बाद नहीं आया ।'
लंच एक ऐसा हथियार है जो सबको ठीक कर सकता है। लंच पर जाना अफसरों का प्रिय शगल होता है। लेडी सेक्रेटरी लंच पर ही रहती हैं।
दफ्तरों में लंच का होना इस बात का प्रतीक है कि देश में खाने-पीने की कोई कमी नही है। जो अपने पैसे से चाय भी नहीं पीते वे भक्तों के पैसे से डोसा, इडली, बड़ा और जूस के गिलास डकार जाते हैं। लंच में इतना खा लो कि शाम के खाने की जरूरत नहीं रहे।
एक दफ्तर में अपने दफ्तर के सरकारी काम से जाना हुआ । प्रातः से ही लंच का आलम था। पता चला कि किसी की विदाई पार्टी है जो चार बजे होगी। मगर दफ्तर में काम-काज सुबह से ही बंद था। इसी प्रकार पे डे पर लंच ही लंच होता है। दफ्तर वाला हिस्सा तो होता ही नहीं है । कोई पैसे निकाल रहा है, कोई वसूल कर रहा है। हर आदमी व्यस्त है लेकिन अपने काम में, उसे दफ्तर के काम में कोई दिलचस्पी नहीं है। दफ्तर में लंच होने भर की देर है, फिर कर्मचारी को कौन रोक सकता है। वो तो नौ दो ग्यारह हो जाता है। अफसर भी बेचारे लंच में कुछ नही कर सकते। लगभग हर दफ्तर में लंच के नाम पर मस्ती का आलम रहता है।
लगे हाथ उस दफ्तर की भी चर्चा कर लें जहां पर लंच नहीं होता। ऐसे दफ्तरों में चूंकि लंच नहीं होता है अतः हर समय लंच का आलम रहता है, कोई कैंटीन में जा रहा है, कोई कैंटीन से आ रहा है। चाय, पान-सिगरेट की थड़ियां हर समय भरी रहती हैं।
हर बाबू अपनी सीट के अलावा हर जगह मिल सकता है। किसी भी कर्मचारी को सीट पर ढूंढ़ना बाबू का अपमान करना है। और यदि कोई बाबू लंच में भी अपनी सीट पर उपलब्ध है तो समझ लीजिये कि उसका कोई निजी काम कहीं पर अटक गया है और वह निजी कार्य तभी होगा जब बाबू अपनी सीट का काम पूरा करेगा। ऐसा अक्सर होता है कि बाबू अपनी सीट का काम किसी दबाव या गरम मुट्ठी के लिए करता है।
ऐसा नही है कि सभी दफ्तरों में लंच की स्थिति एक जैसी होती है। निजी संस्थानों में लंच के गिने चुने मिनट होते है और बाद में गेट बंद। लेकिन सरकार में केवल लंच होता है काम नहीं।
कुल मिलाकर दफ्तर में लंच एक ललित लेख का विषय है। सरकार लंच पर है, साहब लंच पर है, कर्मचारी लंच पर है और जो लंच पर नहीं जा सकता वो इस देश का आम आदमी है, उसे लंच की नहीं रोटी की दरकार है, क्या दफ्तर में लंच लेते समय आप इस विषय पर चिन्तन करेंगे। शायद नहीं, क्योंकि आपको कल के लंच की चिन्ता है। महिला कर्मियों के लंच की दास्तान लिखना ज्यादा मुश्किल है क्योंकि उन लोगों के पास लंच के लिए इतने विषय होते हैं कि यह लेख एक उपन्यास बन सकता है। साड़ी, फैशन, ब्यूटी शो, विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता, फिल्मों से शुरू हुई बातचीत अपनी अनुपस्थित सहेली के काल्पनिक प्रेम प्रसंगों तक चलती है। महिलाएं लंच बाक्स खोल तो लेती हैं लेकिन उनका ध्यान दूसरी के लंच बाक्स की और रहता है और मौका लगाने पर अचार की फांक उठा लेती है।
‘लंच मय सब जग जाना हो रामा'।
;;;
यशवन्त कोठारी
86, लक्ष्मीनगर, ब्रह्मपुरी बाहर,
जयपुर-302002
फोन- 2670596
हम लोग बैंक मे लंच के समय एक दूसरे का दिमाग खाते थे ..बाकि समय कस्टमर्स का ... बढिया व्यंग्य ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंsatik vyangya...
प्रत्युत्तर देंहटाएंकभी समय मिले तो मेरे ब्लॉग पर आकर अपने विचारों से मेरा मार्ग-दर्शन करें.