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रवि भारद्वाज की कहानी : मेकेनिक

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'' तड़ाक....तड़ाक... दो झापड़ बडे मिस्‍त्री ने जगत की गाल पर लगाये । अबे यहॉ रास्‍ते में गाड़ी खड़ी करके लगा कारबोरेटर खोलने........

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'' तड़ाक....तड़ाक... दो झापड़ बडे मिस्‍त्री ने जगत की गाल पर लगाये । अबे यहॉ रास्‍ते में गाड़ी खड़ी करके लगा कारबोरेटर खोलने.......... । एक तरफ हटा इसे.... पैनल वहाँ दीवार के साथ रख..........बडे मिस्‍त्री ने जगत से कहा ।

जगत ने न तो अपनी गाल सहलायी, न उसकी आँखों से कोई पानी गिरा । ठीक वैसे ही करने लगा जैसा उस्‍ताद ने कहा था । जगत पिछले 10-12 दिन से इस दुकान पर आया था । जगत का सौभाग्‍य यह था कि जिस सज्‍जन ने उसे इस दुकान पर लगवाया था वह उनकी बड़ी अनुकम्‍पा थी । यह दुकान इलाके का सबसे बड़ा वर्कशाप था । यहाँ से काम करके जाने वाले कई मिस्‍त्री अब दूसरी जगह पर अपने अपने वर्कशाप बनाकर काम रहे थे अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे थे । यह वर्कशाप सब्‍बरवाल साहब की है । उम्र होगी यही कोई 65-70 के करीब । काम धाम तो करते नहीं थे बस काउन्‍टर पर बैठे रहते थे बाकी के मेकेनिक लोग काम किया करते थे । पैसे का लेन देन सब्‍बरवाल साहब ही किया करते थे । मेकेनिक लोगों को जिस सामान की आवश्‍यकता होती वह सब्‍बरवाल साहब से मांग लेता । उन्‍हें न इस बात की चिन्‍ता थी कौन मेकेनिक काम छोड़कर चला गया? कौन नया आया है? यह सब काम बडे मिस्‍त्री साहब किया करते थे । जिन सज्‍जन ने जगत को इस वर्कशाप पर लगाया था वह बडे मिस्‍त्री साहब का जानकार था उन्‍हीं की कृपा से उन्‍होने जगत को इस वर्कशाप में काम सीखने के लिये लगा दिया । शुरू में तो कुछ नहीं मिलने वाला था, और जो मिलने वाला था वह उसे आज बडे मिस्‍त्री ने दे ही दिया था....... ।

उपरोक्‍त के परिप्रेक्ष्‍य में जगत के बारे में बताना जरूरी है। जगत कोई 15-16 साल का लड़का था । दुबला पतला, आवाज भी उसी की कद काठी के अनुरूप ही थी, वर्कशाप से करीब 3-4 कि0मी0 पर उसका घर था । घर में मां थी, एक बड़ी बहन थी उसकी उम्र यही कोई 20-21 साल की । दिखने में अप्रतिम सुन्‍दरता की मूर्ति, मधुर स्‍वभाव, इसलिये पिताजी ने उसका नाम रख दिया था मधु , कद काठी ठीक थी न तो अधिक मोटी थी न बिल्‍कुल पतली । इग्‍नु से बी0ए0 किया था अब एम0ए0 का इम्‍तहान भी इग्‍नू से ही करने की इच्‍छा थी । पिता अभय दास नगर निगम में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे, न कभी उन्‍होने अपने स्‍थाई होने की बात किसी से कही न किसी ने करने की सोची । हां अपनी मितव्ययता के चलते उन्‍होने एक दो कमरे का मकान, एक रसोई, एक स्‍नानघर एक शौचालय तथा आगे छोटा सा सहन उन्‍होने बनवा दिया था ।

कहते हैं कि बुरे दिन एक साथ नहीं आते वह अपनी पूरी फौज लेकर आते है, कुछ ऐसा ही अभय दास के साथ भी हुआ एक दिन कार्यालय से लौटते हुये उन्‍हें बडे जोर से सीने में दर्द हुआ, जब तक कोई उन्‍हें घर पहुँचाता तब तक उनकी सांसों ने आना जाना बन्‍द कर दिया । क्‍या कह सकते हैं हार्ट फेल या उनका वक्‍त आ गया था । जगत की मां आरती यही कोई 50-55 साल की स्‍त्री, मधुर स्‍वभाव, दुबली पतली,धार्मिक प्रवृति की महिला। घर के कामों में कुशल शायद यही सब गुण उसने अपने बच्‍चों को दे दिये थे । आरती पर पहाड़ टूट पडा उस समय जगत 8 कक्षा में पढ़ता था, पढने में कोई बहुत चतुर तो नहीं था लेकिन फेल भी कभी नहीं होता था । गणित और अँग्रेजी उसके प्रिय विषय थे लेकिन भूगोल और इतिहास में उसका मन नहीं लगता था बस किसी तरह से पास हो जाता था । अभय दास के देहान्‍त के बाद आरती अकेली पड गयी वो तो शुक्र था कि रहने को छत थी नहीं तो कहां लेकर जाती जवान बिटिया और जवान होते बेटे को ......... । ले देकर कोई 25-30 हजार रू0 अभय दास के कार्यालय से उसे प्राप्‍त हुए फैमिली पेंशन की जगह 1200 रू0 माहवार । किसी तरह आटा चावल तो आ जाता था लेकिन बिटिया की शादी की चिन्‍ता ने आरती को समय से पहले ही बूढ़ा कर दिया ।

बेटे की आगे पढ़ाई भी तो करानी थी। अभय दास के मरने के बाद जगत को ही सारे क्रिया कर्म करने थे तेरहीं के दिन पगडी भी उसी के सिर पर बंधी थी । और इन आठ दस दिनों में मानों जगत ने दुनिया देख ली थी, अपनी जिम्‍मेदारी का अहसास हो गया था जगत को । दूर के नाते रिश्‍तेदारों में भी कोई ऐसा नहीं था जो आगे बढ़कर इन बच्‍चों को सहारा दे पाता। जब सभी लोग चले गये तो मानो जगत ने एक भीष्‍म प्रतिज्ञा की......उसने मां से कहा '' मां मैं अब आगे पढ़ाई नहीं करूंगा, कोई छोटी मोटी नौकरी कर लूंगा, अब घर की जिम्‍मेदारी मैं लूंगा ।'' मां ने अश्रु पूर्ण आंखों से बेटे को देखा, लेकिन वह कर भी क्‍या सकती थी । उसे तो मधु की चिन्‍ता सताये जा रही थी । आय का कोई तो ठिकाना हो । अनिच्‍छा से मानो मां ने मौन स्‍वीकृति दे दी । जगत ने कई दरवाजे खटखटाये लेकिन काम न मिलना था न मिला ।

जगत सबेरे घर से निकल जाता कई जगह धक्‍के खाता, सडक के नल से पानी पीता और फिर चल पड़ता अपने परिवार के लिये रोजगार खोजने । काम खोजते खोजते जगत अब खुद निराश हो चुका था । लेकिन जैसे हर अमावस्‍या के बाद शुक्‍ल पक्ष आता है ऐसे ही एक पहचान के मिल गये ....शायद जगत के पिता के जानकार थे। उन्‍हें जगत भी जानता था । दुआ सलाम के बाद उन्‍होनें सलाह दी ,'' बेटे ऐसा करो मैं तुम्‍हें कोई काम सीखने के लिये किसी दुकान पर लगवा देता हूं। काम सीखने के बाद अपना काम कर लेना आजकल नौकरी रखी कहां है?''........... और अपने सदप्रयासों से उन सज्‍जन ने जगत को सब्‍बरवाल साहब के वर्कशाप में काम दिलवा दिया ।

जगत को अपना मूल नाम बहुत पसन्‍द था, अगर कोई जग्‍गी या जग्‍गू कह देता तो निराश हो जाता, लड़ना भिढ़ना तो बेचारा जानता नहीं था, अलबत्‍ता उससे बात करनी बन्‍द कर देता और कभी कभी साहस कर के कह देता मेरा नाम जगत दास है। मुझे मेरे नाम से बुलाया करो । वर्कशाप में बडे मिस्‍त्री की बहुत चलती थी। वह भी जगत को जग्‍गी कहकर बुलाते थे, लेकिन न जाने क्‍यों जगत ने उन्‍हें कभी नहीं कहा कि मेरा नाम जगत हैं हॉ साथ के मैकेनिकों से अवश्‍य एक दो बार कहा । लेकिन नक्‍कार खाने में तूती की आवाज कभी सुनाई नहीं देती उसकी आवाज भी उसके कण्‍ठ में ही डूबकर रह गयी । लेकिन किसी से बहस करते या लडते झगडते कभी किसी ने जगत को नहीं देखा ।

चूंकि जगत नया नया आया था, सबसे छोटा था अतः सुबह साढे आठ तक आकर सब्‍बरवाल साहब के घर से चाबी लेकर दुकान खोलना उसकी जिम्‍मेदारी हो गई थी, सब्‍बरवाल साहब दुकान के पिछले हिस्‍से में ही रहते थे अच्‍छा खासा मकान था आगे ठीक होने के लिये आई गाड़ियों को खडा करने के लिये पर्याप्‍त स्‍थान था । रात में गाडियां वहीं खडी होती थी । जगत सुबह आकर वर्कशाप में झाडू लगाता, सारे औजार मेज पर और स्‍टेण्‍ड पर लगाता, धोने वाले पानी के टैंक को भरता, कुर्सी वगैरह ठीक करता, हवा भरने के चैम्‍बर को चलाता । और भी सारे काम वह बडे मिस्‍त्री के आने से पहले ही कर लेता । बडे मिस्‍त्री ने देखा कि लड़का मेहनती है तो अक्‍सर वह उसे अपने साथ लगा लेते । गल्‍ती करने पर कहते.....जग्‍गी आदमी बन जा.... काम क्‍या मेरी उम्र में सीखेगा । धीरे धीरे जगत को कारबोरेटर साफ करना, चैम्‍बर खोलना, 5-6, 8-10,10-12 की चाबी पहचानना । पहिये खोलना, पंक्‍चर लगाना आ गया । काम करते करते अब जगत को एक माह हो गया था । बडे मिस्‍त्री उसके स्‍वभाव तथा काम की लगन से बडे खुश थे । अब उनकी जुबान पर जग्‍गी का नाम ही रहता, बाकी के मेकेनिक गौण हो चुके थे । अब बडे मिस्‍त्री साहब उसे जग्‍गी बेटा बुलाने लगे थे, सब्‍बरवाल साहब को न जाने क्‍यों यह लड़का शुरू से ही पसन्‍द आ गया था । जगत अब सब्‍बरवाल साहब के भी छोटे मोटे काम करने लगा ।

अक्‍सर शाम को जब सभी मेकेनिक चले जाते तो सब्‍बरवाल साहब और बडे मिस्‍त्री अपनी थकान मिटाने बैठ जाते । उस समय जगत से कहा जाता कि '' जा बेटा एक अद्घा तो लेकर आ, हा थोड़ी सी नमकीन भी ले आना ।'' जगत बिना किसी हील हुज्‍जत के सारे काम कर देता लेकिन वह सारे काम कर सकता था लेकिन शराब की दुकान पर जाने में उसके पैर कांप जाते । रोज सोचता आज बडे मिस्‍त्री को मना कर दूंगा लेकिन वक्‍त आने पर उसकी बोलती बन्‍द हो जाती । लेकिन आज जगत ने बडे विनम्र स्‍वर में बडे मिस्‍त्री से कहा, '' सर, आप मुझ से यह मत मंगवाया करो।'' बडे मिस्‍त्री ने आज पहली बार अपने खिलाफ आवाज सुनी थी , सब्‍बरवाल साहब भी चौक गये बोले '' क्‍यों भाई जग्‍गी इसे लाने में क्‍या तकलीफ है? जगत ने अपने दबे स्‍वर में कहा '' सर, अगर कोई मुझे उस दुकान पर देख लेगा तो फिर बहन की शादी में बडी मुश्‍किल हो जायेगी, मुझे मां की और दीदी की बडी चिन्‍ता है'' । बडे मिस्‍त्री ने कहा '' बेटा जग्‍गी, तुम अपनी मां बहन का इतना ध्‍यान रखते हो, चलो अब से तुम्‍हें नहीं भेजेंगे ।'' सब्‍बरवाल साहब भी बडी हैरत से उसकी ओर देख रहे थे ।

'' जा बेटा तू घर चला जा, दुकान हम बढा देंगे'' बडे मिस्‍त्री ने बडे प्‍यार से कहा ।

'' नहीं सर, मेरे होते हुये तो यह काम मैं ही करूंगा । जब आप लोग चले जायेंगे तो दुकान मैं बढ़ा दूंगा ।.....जगत ने कहा

काम करते हुये अब जगत को करीब एक माह हो गया था । वेतन मिलने की बात ही तय नहीं हुयी थी, लेकिन उस रोज के बाद से सब्‍बरवाल साहब ने बडे मिस्‍त्री से बात की और उसकी तन्‍खा तय हुयी 700 रू0। आज जब सभी मेकेनिक अपना अपना वेतन ले रहे थे तो जगत उन्‍हें बड़ी हसरत भरी निगाह से देख रहा था सभी अपनी अपनी तन्‍खा लेकर चले गये । सब्‍बरवाल साहब ने जगत को बुलाया और कहा '' बेटा बडे मिस्‍त्री तेरे काम से बडे खुश हैं आज तुझे एक महीना हो गया ले तेरी तन्‍खा। उन्‍होंने उसके हाथ पर 700 रू0 रख दिये । जगत की आंखों में पानी आ गया उसने तुरन्‍त सब्‍बरवाल साहब के पैर छू दिये और फिर सारे पैसे लेकर बडे मिस्‍त्री के पास गया बोला '' सर आप बहुत बडे दिल के आदमी है...यह कहकर जो रूलाई वह अब तक रोक हुये था जोर से रो पडा और सारे पैसे बडे मिस्‍त्री के पैर में रख दिये और उनके पैर पकड़ लिये । बडे मिस्‍त्री की आंखें भी छलछला आयी बोले '' बेटा ये तेरी मेहनत के पैसे हैं, अपनी मां को देना, और खूब लगन से काम करना मेरे बाद इस वर्कशाप का हैड मिस्‍त्री तुझे ही बनना है'' ।

जगत बोला '' सर आप जहां भी जायेगें मैं आपके साथ रहूंगा कोई बेटा अपने बाप को छोड़कर जाता है या बाप बेटे को छोड़कर जाता है।''

बडे मिस्‍त्री ने प्‍यार से कहा '' अबे भाग यहां से....और उस बजाज सुपर में देख क्‍या प्राबल्‍म है।''

जगत को अब सात माह हो गये थे , बडे मिस्‍त्री ने और सब्‍बरवाल साहब ने उसे कह रखा था कि दस रुपये तक के पैसे जो गाडी वह ठीक करेगा उसके होगें बाकी का हिसाब सब्‍बरवाल साहब ही करेंगे ।

जगत की मेहनत ईमानदारी और काम की प्रवीणता को देखते हुये अब लोग दूर दूर से सब्‍ब्‍रवाल साहब के पास आने लगे थे कई बार तो ग्राहकों वापस करना पड़ता था । उसका वेतन भी बढ़कर 2500 रू0 हो गया था जिन्‍दगी आराम से कट रही थी ।

जगत अब छोटे मोटे काम अपने घर पर भी कर दिया करता था । लेकिन अपने काम पर वह सही समय पर चला जाता था ।

एक दिन दूर के किसी रिश्तेदार ने मधु के लिये एक रिश्‍ता भेजा, उन्‍हें लड़की पसन्‍द आ गई उन्‍होने गोद भराई की रस्‍म कर दी बडे मिस्‍त्री और सब्‍ब्‍रवाल साहब भी उस दिन जगत के घर आये थे मां का मृदुल स्‍वभाव देखकर, बेटी की सौम्‍यता देखकर दोनों बडे खुश हुये और चलते चलते जगत की तारीफ करना भी नहीं भूले ।

सब्‍बरवाल साहब की पत्‍नी अमरजीत कोई 55-60 की उम्र की होगी । सब्‍बरवाल साहब के कोई सन्‍तान नहीं थी दोनो बुढढे-बुढिया ही रहते थे । अमरजीत भी एक ममतामयी स्‍त्री थी उनका सभी मेकेनिक से बच्‍चों जैसा व्‍यवहार होता था जगत से कुछ विश्‍ोष लगाव था उनका ।

एक दिन जगत काम पर नहीं आया ....थोड़ी देर तक इन्‍तजार हुआ फिर एक मेकेनिक को उसके घर भेजा गया पता चला उसे तेज बुखार है। जगत के बिना आज कुछ अधूरा सा लगा रहा था सभी को लेकिन काम तो करना ही था । शाम को बडे मिस्‍त्री भी उसके घर गये देखा जगत को इतना तेज बुखार था कि वह बोल भी नहीं पा रहा था न पहचान ही पा रहा था । उन्‍होने उसे डा0 को दिखाने के लिये कहा लेकिन उस समय तक दुकानें बन्‍द हो गयी थी, लिहाजा यह कह कर बडे मिस्‍त्री चले गये कल सुबह मैं इसे बडे डा0 को दिखाकर काम पर जाऊंगा ।

अगले दिन जब बडे मिस्‍त्री जगत के घर पर गये तो उन्‍हें कोई बाहर नहीं मिला न मधु, न मां । उन्‍होने दरवाजा खटखटाया, दरवाजा खुला था अन्‍दर मधु और मां बैठी थी पूछा....... जगत की तबीयत कैसी है'' मधु चीखकर रो पडी .....क्‍या हुआ बेटी कुछ बतायेगी भी ....बडे मिस्‍त्री ने कहा

'' जगत हमें छोड़कर चला गया''.... मां बेटी दोनो रोने लगी । बडे मिस्‍त्री को तो ऐसा लगा कि अब चक्‍कर खाकर गिर पड़ेंगे ।

फिर वही हुआ कफन काठी, आग लकड़ी, शमशान यात्रा......जगत की कहानी खत्‍म हो चुकी थी ।

बडे मिस्‍त्री का अब काम में मन नहीं लगता था कई बार जग्‍गी बेटा कहते कहते रूक जाते और फिर सब कुछ भूलकर काम में लग जाते । सब्‍ब्‍रवाल ने भी अब काउन्‍टर पर बैठना बन्‍द कर दिया था बहुत कम आते थे अब बडे मिस्‍त्री ही पैसों का लेन देन किया करते थे । मानों जगत के बाद सब खत्‍म हो चुका था ।

.......दिन गुजरते गये .....एक दिन मधु सब्‍बरवाल साहब के वर्कशाप आयी साथ में मां थी। बडे मिस्‍त्री की नजर उस पर पडी '' अरे मधु बेटा.....मां भी है.... बोल बच्‍ची क्‍या काम है'' बडे मिस्‍त्री ने मधु से कहा

'' मां को आप से बात करनी है''

सब्‍बरवाल साहब ने भी देखा, बोले ''तुम लोग अन्‍दर चलो हम अभी आते है।''

दोनो सब्‍बरवाल साहब के घर में चली गयी ।

बडे मिस्‍त्री और सब्‍बरवाल साहब थोडी देर बाद आये । अमरजीत ने उन सबके सामने पानी रखा पानी पीने के बाद मधु गिलास उठाकर किचन में रखने चली गयी ।

आरती ने कहा'' भैया, जगत तो हमें छोड कर चला गया...अब मधु की शादी जिस घर में हुयी थी वह कल बात करने आ रहे हैं जाने आगे रिश्ता रखेंगे या कोई मांग रखेंगे आप लोग ही कोई रास्‍ता दिखाओ''

'' कल तो इतवार है, वर्कशाप बन्‍द रहेगा, हम लोग मिल बैठकर बात करेंगें आप कोई चिन्‍ता न करें '' सब्‍बरवाल साहब ने कहा ।

'' मैं भी चलूंगी औरतों से मैं बात कर लूंगी'' अमरजीत ने कहा

इतवार के दिन लड़के वाले आ गये इस पक्ष से बडे मिस्‍त्री, सब्‍बरवाल साहब,अमरजीत और मां थे । मधु तो प्रश्‍नगत प्रकरण में थी ही ।

उधर से लड़के पिता, ताऊ, चाचा एक और रिस्‍तेदार तथा पांच सात स्‍त्रियां थी ।

सब्‍बरवाल ने ही पूछा '' तो क्‍या विचार है आप लोगों का''

सोचते हैं जो होना था वह तो हो गया, अब आगे के काम तो निपटाने ही है ऐसा करते है........लड़के के ताऊ ने कहा

'' आप लोग यह मत समझ लेना कि जगत के बाद इनकी दुनिया खत्‍म हो गयी, आप लोगों को जितनी मांग करनी है करें....शहर के सबसे बडे होटल में बारात का स्‍वागत होगा, जितने चाहे बाराती ले आयें, मधु की आवश्‍यकता की जितनी भी चीज है सब देंगे, इक्‍यावन हजार टीके में देंगे, इसके अलावा कुछ और चाहिये तो वो भी मिलेगा, लेकिन मधु की शादी हो कर रहेगी '' यह इस पंजाबी पुत्‍तर का जवाब है।

वातावरण में खामोशी छा गयी ....लड़के के पिता ने कहा '' भाई साहब हम इसी सम्‍बन्‍ध में बात करने आये हैं, हमारा ऐसा विचार है कि मन्‍दिर में शादी कर देते हैं हम पांच लोग आयेंगे, अब दुनियादारी तो निभानी ही है, जगत होता तो शायद कुछ मांग भी लेते लेकिन हम चाहते हैं कि शादी के बाद मधु की मां भी हमारे साथ ही रहे । उनकी देखभाल भी हो जायेगी । यह मकान किराये पर चढ़ा देते हैं किराया मधु की मां लेती रहेगी । बस हमारी तो इतनी सी प्रार्थना है।

'' यह सब नहीं होगा, मधु की मां अपनी जेठानी के घर रहेगी । आज से इसका मायका सब्‍बरवाल साहब का घर होगा....आप किसी तरह की चिन्‍ता न करें।......अमरजीत ने कहा ।

..............................मां की आंखों में आँसू थे............. खुशी के या गम के............... मधु भी रो रही थी भाई को याद करके या इन देवदूतों को देखकर ।

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रचनाकार: रवि भारद्वाज की कहानी : मेकेनिक
रवि भारद्वाज की कहानी : मेकेनिक
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