बुधवार, 9 दिसंबर 2009

वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख : सफल लेखक कैसे बनें?

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आधुनिक युग मानव की अभूतपूर्व प्रगति का युग है। विश्‍वास और अविश्‍वास, उत्‍कर्ष और अपकर्ष की कसौटी सूचना प्रौद्योगिकी तथा जनसंचार माध्‍यम हैं। जनसंचार की इस महती भूमिका ने ‘लेखन' को मानव जीवन की अपरिहार्य आवश्‍यकता बना दिया है। यहाँ प्रश्‍न यह उठता है कि क्‍यों लिखना चाहिये, और किसके लिये लिखना चाहिये ? और कैसा लिखना चाहिये ? वास्‍तव में यदि आज के परिप्रेक्ष्‍य में देखें तो यह युग ‘मीडिया' का युग है। यही नहीं, पूरे के पूरे समाज का मानस बदलने में मीडिया की निरन्‍तर तथा ताकतवर भूमिका स्‍पष्‍ट दिख रही है। थोड़ा अतीत की ओर लौटें और संदर्भ पत्रकारिता का लें तो आजादी की लड़ाई के दौर से ही भारतीय पत्रकारिता देश और समाज के प्रति एक सजग प्रहरी का दायित्‍व निभाती रही है। राष्‍ट्र निर्माण और स्‍वस्‍थ मानवीय मूल्‍यों की स्‍थापना के लिये भारतीय पत्रकारिता का संघर्षपूर्ण इतिहास हम देशवासियों के लिये गौरवमयी स्‍मृति का प्रखर आख्‍यान है। पर आज की पत्रकारिता ने अपने दायित्‍व बोध को कमजोर कर दिया है। ‘मसाला' परोसना मीडिया के लिये अनिवार्य सा हो गया है जो मीडिया एक सीमा तक समूचे राष्‍ट्र का मानस बनाने की भूमिका में हो, यदि वह बिकाऊ और परोपजीवी (पैरासाइट) आकार ग्रहण करने लगे तो यह स्‍थिति देश और समाज के लिये कितनी चिन्‍ताजनक होगी, बेहतर समझा जा सकता है। इस नये संक्रमण काल में आज राष्‍ट्र निर्माण के प्रति लेखकों और पत्रकारों की भूमिका आजादी के दौर से भी अधिक महत्‍वपूर्ण हो गई है। ऐसे में जिस भी व्‍यक्‍ति में सृजनात्‍मक शक्‍ति है, समाज परिवर्तन की कसमसाहट है, उसे अच्‍छा लेखक भी होना चाहिये ऐसा मेरा मानना है। क्‍यों नहीं, आखिर सार्थक सोच वाले लोग आगे नहीं आयेंगे तो लोकतंत्र के ‘चतुर्थ स्‍तम्‍भ' पर कुंडली मारे बैठे माफिया और दलाल प्रवृत्‍ति के लोग पीछे हटेंगे ही क्‍यों ? इसलिये इस लेख के माध्‍यम से हम कुछ नया और सार्थक कर गुजरने का जज्‍बा रखने वाले साथियों से इतना ही कहना चाहेंगे कि -

कलम के सिपाही अगर सो गये तुम।

वतन के पहरूये वतन बेंच देंगे ...... वतन के .....

पहरूये वतन बेंच देंगे ......

* सार्थक और सफल लेखक बनने के लिये हमेशा तीन बातों का होना अनिवार्य है - भाषा, दृष्‍टि और पुरूषार्थ। इन तीनों के समन्‍वय से आप एक महान लेखक बन सकते हैं। ऐसे समझें कि मान लीजिये आपकी भाषा पर अच्‍छी पकड़ है लेकिन अन्‍य आवश्‍यक मुद्दों पर आपकी दृष्‍टि (विजन) स्‍पष्‍ट नहीं है इसके साथ ही आपकी मेहनत और लगन (पुरूषार्थ) भी कमजोर है। ऐसे में आप एक सफल भाषाविद्‌ होकर भी लेखन में आगे नहीं बढ़ सकते। इसी तरह से आपके पास दृष्‍टि और पुरूषार्थ तो है लेकिन भाषा पर पकड़ न हो तो भी आप अपनी भावाभिव्‍यक्‍ति नहीं कर पायेंगे। यह भी हो सकता है कि आपकी भाषा पर पकड़ अच्‍छी है और आपमें पुरूषार्थ भी है, लेकिन चीजों के प्रति आपकी समझ विकसित नहीं है, तो यह संभव है कि किन्‍हीं अर्थों में आप सफल लेखक बन जायें, पर आपके लेखन में सार्थकता की सदैव कमी रहेगी।

* वास्‍तव में देखा जाये तो लिखना काफी कष्‍टप्रद एवं दुष्‍कर कार्य है। शुरूआती दौर में, समझ ही में नहीं आता कि क्‍या लिखा जाये ? यदि आपने हिम्‍मत नहीं हारी तो बाद में सृजन का विशिष्‍ट महत्‍व एवं आनन्‍द है और एक समय तो ऐसा आयेगा जब आप बगैर लिखे नहीं रह सकते।

* यूँ तो हर अनुभवी लेखक का लिखने का अपना अंदाज अपना तरीका होता है, पर नये लेखक की मुश्‍किल होती है कि वह कहाँ से लेख शुरू करे और कैसे विस्‍तार दे। ऐसे में बेहतर है कि जिस विषय को आप उठायें सबसे पहले उससे सम्‍बन्‍धित जितनी भी चीजें दिमाग में हों, उन्‍हें एक कागज पर बिन्‍दुवार लिख लें। इसके बाद अलग-अलग बिन्‍दुओं को अलग-अलग कागज पर अनुच्‍छेद के रूप में विस्‍तार दें। अब कुछ अनुच्‍छेदों को आगे-पीछे करने की जरूरत हो तो उन्‍हें ठीक क्रम देकर अंतिम संशोधन के बाद स्‍वच्‍छ प्रति तैयार कर लें।

* यह महत्‍वपूर्ण तथ्‍य है कि यदि लेख बहुत वैचारिक या गम्‍भीर किस्‍म के न हों, तो छोटे-छोटे अनुच्‍छेदों को लिखना बेहतर होगा। पाठकों का मनोविज्ञान देखा जाये तो लम्‍बे अनुच्‍छेद ऊब पैदा करते हैं।

* लिखने में वाक्‍य-विन्‍यास गड़बड़ाता हो, प्रवाह न बन पाता हो, तो एक दूसरा अभ्‍यास शुरू कीजिये। दिमाग पर जोर डालिये कि क्‍या थोड़ी देर पहले आपने किसी मुद्दे पर किसी से कोई बातचीत या बहस की ? मेरी समझ में ऐसी बातचीत या बहसें आप अक्‍सर करते हैं। कागज, कलम लीजिये और जिस भी अंदाज में, जिस भी शैली में आपने बातचीत या बहस की हो, हूबहू वही सब लिखने की कोशिश कीजिये। आशा है इस अभ्‍यास से लेखन प्रवाहपूर्ण होना शुरू हो जायेगा। इसका कारण यह है कि किसी भी व्‍यक्‍ति की बातचीत की भाषा प्रायः प्रवाहपूर्ण हुआ करती है क्‍योंकि नया लेखक लिखने में यह प्रवाह नहीं ला पाता। हूबहू की गई बातचीत को ठीक उस भाषा में लिखने का अभ्‍यास करने से लेखन में प्रवाह आने लगता है।

* शुरू में आत्‍मविश्‍वास बढ़ाने का अच्‍छा उपाय है ‘सम्‍पादक के नाम पत्र' लिखना। रोज ही अखबार उलटते-पलटते कोई न कोई खबर दिख ही जाती है, जिस पर कि मन उद्वेलित हो उठता है और प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करने की इच्‍छा होती है। इस प्रतिक्रिया को यूँ ही न भूल जाइये। लिख डालिये और ‘सम्‍पादक के नाम पत्र स्‍तम्‍भ' में भेज दीजिये। इस तरह एक तो आपके भावों को अभिव्‍यक्‍ति मिलेगी; दूसरे आपके पत्र प्रकाशित होंगे, तो आपका हौसला भी बढ़ेगा।

* पहली बार ही किसी बड़े अखबार या पत्रिका में छपने और पारिश्रमिक पाने का मोह न पालिये। शुरूआत में बेहतर यही होगा कि अपने आस-पास की स्‍तरीय क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकायें तलाशिये। जरूरत समझें तो उनके सम्‍पादकों से यदा-कदा मुलाकात करते रहिये और उनसे लिखने के गुर सीखिये। जैसे-जैसे आपकी रचनायें प्रकाशित होंगी, वैसे-वैसे आपका आत्‍मविश्‍वास भी बढ़ेगा।

* एक प्रयोग आप यह भी कर सकते हैं कि पत्र-पत्रिकाओं और प्रकाशन की अन्‍य विधाओं पर लगातार नजर रखिये। पत्र-पत्रिकाओं की प्रवृत्‍ति क्‍या है ? वे किस तरह की सामग्री की मांग करती हैं ? उनकी भाषा-शैली की नीति क्‍या है ? उनमें आए-दिन क्‍या परिवर्तन हो रहे हैं ? ये परिवर्तन एक अच्‍छे लेखक को हमेशा ध्‍यान में रखना चाहिये। आपकी रचना कितनी ही स्‍तरीय हो, यदि रचना का पत्र-पत्रिका के नीतिगत स्‍वभाव से मेल न हुआ तो आप असफल होंगे। बदलते जमाने की रग टटोलिए, पाठकों का मनोविज्ञान जानिए, तभी आप नई-नई रूचिकर और समाजोपयोगी सामग्री दे सकेंगे।

* अखबारों में लिखना है तो आपको अपनी भाषा को सरल सहज बनाना होगा। किलिष्‍टता, दुरूहता नुकसानदेह है। आप लिखें ऐसा कि पाठक तक आपकी बात सहजता से सम्‍प्रेषित हो जाये। पांडित्‍य प्रदर्शन की अपेक्षा भाव संप्रेषण महत्‍वपूर्ण है।

* लेखकीय सफलता के लिये जरूरी है कि लेखक पाठक के मानस और उसकी जरूरतों की ओर अपना ध्‍यान आकृष्‍ट करें क्‍योंकि कोई भी पाठक ऐसा तो नहीं चाहता कि कोई आलेख उसमें ऊब पैदा करे, इसलिये अपने लेखों में मनोरंजन के पुट डालिये। निरे तथ्‍यात्‍मक लेखों में भी मनोरंजन के तत्‍व उनकी सरसता बढ़ा देते हैं आपके लेख पाठक के लिये उपयोगी साबित हों, उनके मर्म को कुरेदते हों उनकी ज्ञान-पिपासा को शान्‍त कर सकते हो तो आप निःसन्‍देह लोकप्रिय लेखक हो सकते हैं।

* नए लेखक को सबसे बड़ी परेशानी होती है विषय की। वे घंटों सोचकर भी विषय नहीं तलाश पाते। विषय की खोज उनके लिए सामानों के ढेर में खोई हुई सुई के मानिन्‍द होती है। यूँ तो आपके चारों तरफ इतने विषय बिखरे पड़े हैं कि अनेकों जन्‍म कलम रखने की नौबत ही न आए। बस, जरूरत है चीजों के प्रति संवेदनशीलता और चौकन्‍नेपन की। वास्‍तव में एक विशिष्‍ट प्रकार की संवेदनशीलता और दृष्‍टि का पैनापन ही किसी को आम आदमी से अलग करते हैं।

* ऐसा भी देखा जाता है कि किसी तथ्‍य को नए अंदाज में लिखने से लेख की रोचकता बढ़ जाती है। माना कि आप किसी महत्‍वपूर्ण घटना के बारे में लिख रहे हैं और परम्‍परा से हटकर उदाहरण दे रहे हैं तो पाठक की दिलचस्‍पी स्‍वभावतः बढ़ जाएगी। रोचकता बढ़ाने के लिए लेख में घटनाएं और संस्‍मरण दीजिए। अप्रचलित, अनोखे तथ्‍य देकर लेख को और रोचक बनाया जा सकता है।

* पत्र-पत्रिकाओं एवं अखबारों में रचनाएं भेजने के लिए फुल स्‍केप मजबूत कागज का इस्‍तेमाल करना चाहिए। पांडुलिपि की लिखावट साफ-सुथरी सुपाठ्‌य हो। टाइप कराकर भेजें तो अलग बात हैं। पांडुलिपि के पहले पृष्‍ठ पर सिर्फ रचना का शीर्षक, अपना नाम पता आदि लिखना चाहिये। रचना की शुरूआत अगले पृष्‍ठ से करें तो बेहतर होगा। पृष्‍ठक्रम जरूर लिखिये। कागज के चारों सिरों पर पर्याप्‍त हाशिया छोड़ना चाहिये। इससे सम्‍पादक को सम्‍पादन में सुविधा रहती है।

* यदि आपके द्वारा भेजी गई रचना सखेद वापस आ जाए तो निराश न होइए। उसे सुरक्षित मेज की दराज में रख दीजिये। कुछ समय बाद रचना की नए सिरे से जाँच कीजिए। आपको उसमें खामियाँ अवश्‍य दिख जायेगी। उन्‍हें संशोधन कीजिए और किसी अन्‍य पत्र-पत्रिका में भेज दीजिये।

* अपने जीवन के विविध आयामों को पहचानने की कोशिश कीजिये। आपको तमाम विषय मिलेंगे। अपने अनुभवों, जानकारियों को खँगालिए, उनका वर्गीकरण कीजिए। जैसे कि आपने किन-किन विषयों पर अध्‍ययन किया है, आपकी रूचियां क्‍या हैं, कैसी समस्‍याएँ सामने अक्‍सर आती हैं, आप अपने जीवन यापन के लिए क्‍या करते हैं ? इसके अलावा अपने जीवन के अनेक प्रश्‍नों एवं अनुभवों पर नजर दौड़ाइए। ऐसे तमाम मुद्दे दिखेंगे जिन पर अपनी कलम चलाकर आप समाज को सार्थक दिशा देने का काम कर सकते हैं।

* किसी लेख को लिखने से पहले उससे सम्‍बन्‍धित सामग्री के स्रोत भी तय करने होंगे। जिस विषय पर लिखना हो, उससे सम्‍बन्‍धित पुस्‍तक-पुस्‍तिकाएं एकत्र कीजिए। समाचार पत्र और पत्रिकाओं से लाभ लें। विभिन्‍न प्रकार के संदर्भ ग्रन्‍थों से भी मदद की जा सकती है। इस कार्य में पुस्‍तकालय आपकी उचित सहायता कर सकते हैं।

* महत्‍वपूर्ण विषयों पर कतरने सहेजने की आदत डालिए। सबेरे अखबार पढ़ते समय जो भी काम की बात लगे उस पर निशान लगाइए, और शाम को उसे काटकर ‘फाइलाइज' कर दीजिए। अलग-अलग विषयों की अलग-अलग फाइलें बनाइए। उदाहरण के तौर पर - राजनीति, संस्‍कृति, पर्यावरण, परम्‍परा, अर्थव्‍यवस्‍था एवं तात्‍कालिक विषयों पर फाइलें बनाई जा सकती हैं। कुछ पत्र-पत्रिकाओं की पूरी की पूरी सामग्री संग्रहणीय होती हैं, उनका संग्रह करना चाहिए।

* जिस विषय पर आप लिखना चाह रहे हैं उसकी प्रासंगिकता, उपयोगिता और पठनीयता की अच्‍छी तरह जाँच कर लें। कहीं ऐसा न हो कि एक-दो पन्‍ने लिखने के बाद आपको लगे कि विषय ही महत्‍वपूर्ण नहीं है। विषय परीक्षण के लिए सोचिए कि क्‍या उस मुद्दे पर आपकी अच्‍छी पकड़ है ? लेख के लिए महत्‍वपूर्ण सामग्री की उपलब्‍धता तथा उस विषय पर लेख छप सकने की संभावनाओं को ठीक से पड़ताल करने के बाद ही काम चलाएं तो बेहतर होगा। उस विषय में पाठकों की कितनी दिलचस्‍पी हो सकती है, इसका भी ख्‍याल रखना चाहिए।

* शीर्षक का चयन अति महत्‍वपूर्ण कार्य है। अपने लिखे हुए लेख के लिए एक अच्‍छा सा शीर्षक सोचिए। पाठक को सबसे पहले शीर्षक ही आकर्षित करता है। अक्‍सर ऐसा देखा गया है कि पाठक पत्र-पत्रिकाओं के पन्‍ने सरसरी तौर पर पलटते हैं और कोई रोचक शीर्षक दिखते ही उस लेख या रचना को पढ़ना शुरू कर देते हैं। असरदार शीर्षक के अभाव में हो सकता है कि एक अच्‍छा लेख भी उतना न पढ़ा जाए जितना कि उसे पढ़ा जाना चाहिए।

* शीर्षक छोटा हो, पर रोचक हो। शीर्षक को विषय वस्‍तु का सही संकेत देने वाला भी होना चाहिए। शीर्षक ऐसा हो कि लेख पढ़ने की उत्‍सुकता जगाए। कई बार महापुरूषों के वचन, सूक्‍तियाँ या मुहावरे अच्‍छे शीर्षक बन जाते है। जरूरत हो तो लेख में उपशीर्षक भी लगाएं।

* लेख का आरम्‍भ असरदार हो, इसका सदैव ध्‍यान रखना चाहिए। रोचकता से आरम्‍भ लेख को पूरा पढ़े जाने की संभावना बढ़ जाती है। लेख की प्रकृति और उसके आकार के आधार पर आरम्‍भ का शिल्‍प निर्धारित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि आप किसी चर्चित या महान व्‍यक्‍ति के जीवन पर लेख लिख रहे हों तो जन्‍म स्‍थान, जन्‍म तिथि या परिवार के वर्णन से शुरू करने के बजाय उस व्‍यक्‍ति के जीवन की किसी रोमांचक या प्रेरक घटना से लेख का मुखड़ा बनाएं तो पाठक उसमें तुरन्‍त बँध जाता है और लेख के प्रति उसकी उत्‍सुकता बढ़ जाती है। कुछ लेखों में सीधे विषय से शुरूआत करना भी लेख के प्रति उत्‍सुकता जगाता है। कभी-कभी सूक्‍तियों, शेरों, मुहावरों या कविता की पंक्‍तियों से लेख शुरू करना असरदार होता है। एक जोरदार आरम्‍भ लेखक के सजग दिमाग की पहचान होती है।

* इसके लिए आप एक प्रयोग कर सकते हैं कि कुछ अच्‍छे लेखों का चयन करें और उनके आरम्‍भ के शिल्‍प का बारीकी से अध्‍ययन करें। इससे असरदार आमुख लिखने की कला सीखने में मदद मिलेगी।

* लेख का आरम्‍भ अच्‍छा है यह अच्‍छी बात है परन्‍तु लेख का अंत भी असरदार होना चाहिए। आरम्‍भ की तरह अन्‍त भी किसी महत्‍वपूर्ण तथ्‍य, मुहावरे, उदाहरण, कविता या शेर की पंक्‍तियों से किया जा सकता है। लेख के अंत में उपसंहार देने की भी परम्‍परा होती है जो लेख का निष्‍कर्ष होती है इस पर विशेष ध्‍यान देना चाहिए।

* आप कुछ असरदार अंत वाले लेख छांटिए और उनके शिल्‍प पर गौर फरमाएं। आपको लगेगा कि लेख का असरदार अंत करना भी एक कला है।

* सफल लेखक बनने के लिए यह आवश्‍यक है कि आपको कम से कम एक विषय पर विशेषज्ञता जरूर हासिल होनी चाहिए। अर्थशास्‍त्र, पर्यावरण, राजनीति, संस्‍कृति, बहुराष्‍ट्रीय उपनिवेशवाद, कृषि, मनोविज्ञान, खेल, मीडिया आदि तमाम विषय हैं जिनमें से अपनी रूचि के एक-दो विषयों पर विशेषज्ञता हासिल कर लेना चाहिए।

* वास्‍तविकता यह है कि जिस विषय में आपको विशेषज्ञता हो, उससे सम्‍बन्‍धित किसी भी मुद्दे पर आपके लिए कलम चलाना आसान हो जायेगा। विशेषज्ञता की स्‍थिति में लेखक की एक खास पहचान भी कायम हो जाती है। ऐसे में उस विषय पर जब भी किसी पत्र-पत्रिका को सामग्री की जरूरत होती है तो संपादक का ध्‍यान सबसे पहले उस विषय के विशेषज्ञ की तरफ ही जाता है।

* यदि आप एक अच्‍छे लेखक बनना चाहते हैं तो आपको अच्‍छा पाठक बनना पड़ेगा। अपनी परीक्षा स्‍वयं कीजिए कि आप एक मिनट में कितने शब्‍द पड़ सकते हैं। कम से कम प्रति मिनट दो सौ से पाँच सौ शब्‍द पढ़कर समझ सकने की क्षमता तो आपमें होनी ही चाहिए। इससे भी आगे पढ़ें तो बेहतर होगा।

* अपने मन से यह भ्रम निकाल दीजिए कि आहिस्‍ता-आहिस्‍ता पढ़ने से ज्‍यादा समझ में आता है। उल्‍टे इस तरह की पढ़ाई से मन को इधर-उधर भटकने का मौका ज्‍यादा मिलता है। क्‍या आपने कभी ऐसा महसूस नहीं किया कि जब आप अधिक आराम से धीरे-धीरे पढ़ रहे हों तो आँखें तो किताब पर होती हैं, पर मन और कहीं विचरण करता रहता है। वास्‍तव में तेज पढ़ना और तेज समझना एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। दिमाग की क्षमता पहचानिए और पढ़ने की रफ्‍तार बढ़ाइए। अगर आप धीमा पढ़ते हों तो रोज दस या बीस मिनट सिर्फ तेज पढ़ने का अभ्‍यास कीजिए। आप स्‍वयं देखेंगे कि दो हफ्‍ते बाद आपमें चमत्‍कारिक परिवर्तन दिखाई देगा। इतनी सावधानी जरूर रखिए कि तेज पढ़ने के चक्‍कर में ‘समझने' की बलि न हो जाए। गूढ़ और गंभीर सामग्री हो तो पढ़ने की गति कुछ धीमी हो सकती है। अधिक अच्‍छा समझने या लेखन के लिए सबसे पहले आप यह करें कि कोई पुस्‍तक या लेख पढ़ने से पहले सोचिए कि उस विषय में आपको क्‍या-क्‍या पूर्व जानकारियाँ रही हैं। इस तरह सोचने की क्रिया से उस पुस्‍तक या लेख के प्रति आपमें दिलचस्‍पी पैदा होगी। कोई चीज पढ़ने से पहले उसके बारे में सोचना मस्‍तिष्‍क को जागृत करता है और उसके प्रति आपमें अधिक रूचि जागृत होती है।

* एक अच्‍छे लेखक के लिए जितना महत्‍वपूर्ण है सतत लेखन, उससे भी अधिक महत्‍वपूर्ण है उसका निरन्‍तर चिन्‍तन। वास्‍तव में सोचना भी एक कला है। जो लेखन के क्षेत्र में प्रवेश चाहते हैं, उन्‍हें अपने सोचने की क्रिया को अवश्‍य रचनात्‍मक बनाना चाहिए। प्रतिदिन चिन्‍तन-मनन के लिए कुछ समय अवश्‍य निकालिए। कोई मुद्दा चुन लीजिए और किसी एक ठोस निष्‍कर्ष तक पहुँचने की कोशिश कीजिए।

* आप हमेशा अपने शब्‍द भण्‍डार को बढ़ाने के प्रति सचेत रहें क्‍योंकि बिना पर्याप्‍त शब्‍द भण्‍डार के आपके चिन्‍तन, मनन और लेखन का फलक व्‍यापक नहीं हो सकता। वास्‍तव में यह काम बहुत मुश्‍किल नहीं है। शब्‍दों के प्रति एक सतत रूचि अपने अन्‍दर पैदा कीजिये, आपका दिमाग सहज तरीके से नए शब्‍दों को ग्रहण करने और उनके प्रयोग के प्रति सजग रहने लगेगा। शब्‍दकोश और समान्‍तर कोश का प्रतिदिन इस्‍तेमाल करने की आदत डालिए। प्रतिदिन पाँच-दस नए शब्‍दों को जानने की आदत डालिए, धीरे-धीरे शब्‍द आपके हाथ का खिलौना बनते जाएंगे। यूँ भी यह देखा गया है कि एक अच्‍छे शब्‍द भण्‍डार वाले व्‍यक्‍ति और एक कमजोर शब्‍द भण्‍डार वाले व्‍यक्‍ति में आम तौर पर हजार-दो हजार शब्‍दों से ज्‍यादा का अंतर नहीं होता।

* अपनी ही रचना को आत्‍म विश्‍लेषण एवं आत्‍म मूल्‍यांकन के लिए पाठक के नजरिए से परखने का माद्‌दा आपको पैदा करना होगा जिसमें अपने रचनाकर्म की निष्‍पक्ष समीक्षा की प्रवृत्‍ति जितनी ही कम होगी, वह उतने ही भ्रमों का शिकार भी हो सकता है। कई लेखक जो अपनी खुद की वस्‍तुस्‍थिति की सही पहचान नहीं कर पाते, वे थोड़ा भी लिख लेने के बाद अपने आपको महत्‍वपूर्ण लेखक समझने लगते हैं। ऐसे लोगों के लिए अपनी आलोचना बर्दाश्त करना बड़ा मुश्‍किल होता है। जो अपनी समीक्षा जितनी ही बेहतर कर सकता है, वह स्‍वयं का और समाज का अच्‍छा मार्गदर्शक भी हो सकता है।

* यदि आप साहित्‍यिक लेखन में उतरना चाहते हैं तो अच्‍छे साहित्‍यकारों को पढ़ने की आदत डालिए। साहित्‍यिक गोष्‍ठियों में शामिल होइए। अपनी सृजनात्‍मक क्षमता को आँकिए। साहित्‍यिक लेखन के लिए परिपक्‍व भाषा संस्‍कार और शैली में पैनापन अनिवार्य है। साहित्‍य लेखन कठिन साधना का काम है।

* अपने व्‍याकरण को दुरूस्‍त करने के लिए यह आवश्‍यक है कि आप हिन्‍दी व्‍याकरण की कुछ अच्‍छी पुस्‍तकें पढ़ जाइए। डॉ. हरदेव बाहरी की ‘हिन्‍दी व्‍याकरण', पं. कामता प्रसाद गुरू की ‘हिन्‍दी व्‍याकरण' अवश्‍य पढ़ लेनी चाहिए। नए सन्‍दर्भों के लिए कुछ और पुस्‍तकें चुनी जा सकती हैं। अच्‍छे लेखकों के लिए डॉ. हरदेव बाहरी का ‘हिन्‍दी शब्‍द कोश' (राजपाल प्रकाशन), अरविन्‍द कुमार कृत एन. बी. टी. द्वारा प्रकाशित समान्‍तर कोश काफी उपयोगी है। इसके साथ आप चाहें तो विजय अग्रवाल द्वारा लिखित सूचना विभाग से प्रकाशित ‘अपनी हिन्‍दी सुधारें', नामक पुस्‍तक भी सामान्‍य व्‍यवहार की हिन्‍दी सुधारने के लिए आपके लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

* आपके पास सदैव एक पाकेट नोट बुक होनी चाहिए। कोई पुस्‍तक या लेख पढ़ते समय जरूरी वाक्‍यांश, उद्धरण, तथ्‍य, आंकड़े आदि नोट करते रहना भविष्‍य के लिए काफी उपयोगी हो सकता है। नोट लेने की प्रवृत्‍ति आपके पठन-पाठन को बहुपयोगी बनाती है। हालांकि यह एक कष्‍ट साध्‍य काम अवश्‍य है, परन्‍तु इससे लेखन की दृष्‍टि से कई तरह की सामग्री और संदर्भों का विशाल भण्‍डार भी उपलब्‍ध होता रहता है जो भविष्‍य में किसी पुस्‍तक के सृजन या बड़े लेखन में आपका मददगार साबित हो सकता है।

* वर्तमान की घटनाओं एवं विश्‍व परिप्रेक्ष्‍य में हो रही हलचलों को समझने एवं इसकी नब्‍ज टटोलने के लिए एक या दो समाचार पत्रों का अध्‍ययन अवश्‍य कीजिए। आपकी अर्थव्‍यवस्‍था साथ दे तो एक मासिक समसामयिक पत्रिका का अध्‍ययन अवश्‍य करें, या किसी सक्षम पुस्‍तकालय की मदद भी आप ले सकते हैं।

* आपकी दृष्‍टि जितनी ही स्‍पष्‍ट होगी, आपका लेखन उतना ही सार्थक होगा। हम जितने ही सहज होंगे, दुनिया को उतना ही सुन्‍दर, सौहार्दपूर्ण बना सकेंगे। लेखक तो एक मायने में समाज को दिशा देने का काम करता है, इसलिये उसका निष्‍पक्ष व सहज होना और भी जरूरी हो जाता है।

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युवा साहित्‍यकार के रूप में ख्‍याति प्राप्‍त डाँ वीरेन्‍द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में ‘दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्‍थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्‍त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्‍ट्र्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की स्‍तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्‍त्री विमर्श, राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी में अनेक पुस्‍तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्‍द्र ने विश्‍व की ज्‍वलंत समस्‍या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्‍तुत किया है। राष्‍ट्रभाषा महासंघ मुम्‍बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्‍व0 श्री हरि ठाकुर स्‍मृति पुरस्‍कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्‍बेडकर फेलोशिप सम्‍मान 2006, साहित्‍य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्‍मान 2008 सहित अनेक सम्‍मानो से उन्‍हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्‍च शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान राष्‍ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।

डॉ. वीरेन्‍द्र सिंह यादव

वरिष्‍ठ प्रवक्‍ता, हिन्‍दी विभाग

दयानन्‍द वैदिक स्‍नातकोत्‍तर महाविद्यालय, उरई (जालौन)285001

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  1. बहुत बहुत शुक्रिया जनाब , आपके लेख को पढ़कर ,बहुत कुछ सीखे .आत्मविश्वास भी बढ़ा... ऐसे ही कृपा बनाये रखिये...

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  2. बेहतर सुझाव अस्पष्ट और सुन्दर ढंग लिखने के लिए बहुत धन्यबाद

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामी5:33 pm

    आज से ही कोशिश करेंगे

    उत्तर देंहटाएं

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