दीप्‍ति परमार की कविता : मंझधार

 

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देर से वह खड़ा है मंझधार

दोनों किनारे पुकार रहे है

इस ओर आ जाओ

इस ओर आ जाओ

एक किनारे पर है

स्‍वप्‍नों का आविष्‍कार

कल्‍पना की उड़ान

निर्बाध जीवन

 

दूसरे किनारे पर है

कर्ज, रिश्‍ते, बंधन और आत्‍मीयता

वह सोच रहा

जाऊँ कहाँ ?

 

जाना उसको दोनों किनारे

कैसे मिले

दो- किनारे एक साथ ?

इसी सोच में

वह

अब भी खड़ा

मंझधार

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डॉ. दीप्‍ति बी़ परमार

प्रवक्‍ता-हिन्‍दी विभाग

श्रीमती आर. आर. पटेल

महाविद्यालय

राजकोट, गुजरात

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2 टिप्पणियाँ "दीप्‍ति परमार की कविता : मंझधार"

  1. ये दो किनारे हैं, जो कभी आपस में मिलते नहीं,
    सपनों की दुनिया अलग है, यथार्थ से मेल खाता नहीं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. ये दो किनारे हैं, जो कभी मिलते नहीं,
    स्वप्न और यथार्थ आपस में जुड़ते नहीं

    उत्तर देंहटाएं

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