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दीप्‍ति परमार की कविता : मंझधार

 

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देर से वह खड़ा है मंझधार

दोनों किनारे पुकार रहे है

इस ओर आ जाओ

इस ओर आ जाओ

एक किनारे पर है

स्‍वप्‍नों का आविष्‍कार

कल्‍पना की उड़ान

निर्बाध जीवन

 

दूसरे किनारे पर है

कर्ज, रिश्‍ते, बंधन और आत्‍मीयता

वह सोच रहा

जाऊँ कहाँ ?

 

जाना उसको दोनों किनारे

कैसे मिले

दो- किनारे एक साथ ?

इसी सोच में

वह

अब भी खड़ा

मंझधार

---

 

डॉ. दीप्‍ति बी़ परमार

प्रवक्‍ता-हिन्‍दी विभाग

श्रीमती आर. आर. पटेल

महाविद्यालय

राजकोट, गुजरात

विषय:
रचना कैसी लगी:

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waah..........duvidha ka majhdhar......behtreen

डॉ. दीप्‍ति परमार जी,

आपकी रचना पढ़ कर बहुत अच्छा लगा...आपने बहुत ही गहरे अहसास को पकड़ने का एक सफल प्रयास किया है....बरसों पूर्व पढ़ी पंक्तियाँ भी याद आयीं....

इरादे बांधता हूँ, सोचता हूँ तोड़ देता हूँ,
कहीं ऐसा न हो जाये कहीं, ऐसा न हो जाये.

अच्छी सोच और सन्देश, सुंदर रचना, शुभकामनाएं. मंझधार से निकलना नितांत आवश्यक है - राकेश कौशिक

sundar ati sundar saral shabd or gahre bhaav

बहुत आसानी से कह दी गयी एक मुश्किल बात बहुत सुंदर
बधाई स्वीकारें

ये दो किनारे हैं, जो कभी आपस में मिलते नहीं,
सपनों की दुनिया अलग है, यथार्थ से मेल खाता नहीं।

ये दो किनारे हैं, जो कभी मिलते नहीं,
स्वप्न और यथार्थ आपस में जुड़ते नहीं

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