रविवार, 13 दिसंबर 2009

दीप्‍ति परमार की कविताः औरत

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मिट्टी की सहनशीलता लेकर

उपजी है औरत

 

तभी तो रोज-रोज

अपने टूटे सपनों को भी

जोड़ लेती है औरत

 

बार-बार ठोकरें खाकर

फिर से संवरती है औरत

 

सबको जोड़ने में बार-बार

टूटती है औरत

 

मिट्टी में मिलकर भी

अपने आँसुओं से

फिर से

अपने आपको गूँध कर

फिर से

बनती है औरत

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डॉ. दीप्‍ति बी. परमार

प्रवक्‍ता-हिन्‍दी विभाग

श्रीमती आर. आर. पटेल

महाविद्यालय

राजकोट, गुजरात

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