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व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – दीनदयाल शर्मा का व्यंग्य : गुरू जी का टाइम पास

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(प्रविष्टि क्रमांक - 45)

एक सरकारी स्कूल का दृश्य। स्कूल परिसर में दरी पर पांच गुरुजन और तीन मैडमें हैं। दो गुरुजन लेटे-लेटे बातों में मशगूल हैं। एक अख़बार पढ़ रहे हैं। एक खर्राटे ले रहे हैं। एक गुरुजी मैडमों की नज़रें बचाकर जर्दा लगा रहे हैं। तीनों मैडमें बातें कम और हँस ज्यादा रही हैं।

-घण्टा लगे आठ मिनट बीत चुके हैं। जर्दा लगाने वाले गुरुजी धीरे-धीरे कदमों से पेशाबघर की ओर बढ़ रहे हैं। एक गुरुजी पेशाबघर में पहले से ही खड़े हैं। कुछ देर बाद भीतर वाले गुरुजी बाहर आ गए।

-पेशाब करना है?

-पेशाब क्या करना है यार? फिर वे मुस्कराते हुए बोले-हम तो बस टाइम पास कर रहे हैं।

-सब टाइम पास ही तो करते हैं।

-आजकल टाइम पास भी तो नहीं होता। पेशाब भी कितनी बार करें। मैं तीसरी बार आ रहा हूं। अख़बार भी दो बार पढ़ लिया। दो बार चाय पी ली। घड़ी है कि चलने का नाम ही नहीं लेती। और जब स्कूल आना होता है तो घड़ी के मानो पंख ही लग जाते हैं। मैं तो रोज लेट हो जाता हूं।

-तुम क्या एक-दो को छोड़कर दुनिया लेट आती है। तुम मानते तो हो कि लेट आते हो। कुछ ऐसे भी हैं जो लेट भी आएं और रौब भी जमाएं। ‘यथा राजा तथा प्रजा’ वाली बात यहां लागू नहीं होती। यहां तो ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ सटीक है।

-आओ...कक्षा की ओर चलते हैं। नहीं तो हैडसा’ब यूं ही ‘प्यां-प्यां’ करेंगे।

-इनकी तो आदत है ‘प्यां-प्यां’ करने की। दोनों साथ चल पड़ते हैं तभी एक बोला-क्या बात है पेशाब नहीं करोगे?

-ना रै...मैं तो यूं ही आ गया था इधर। जाना तो कक्षा में था। पर पता ही नहीं चला। यहां आने के बाद पता चला कि मैं पेशाबघर के पास हूं। चलो...आओ चलें।

-और वे बातें करते-करते पानी की टंकी के पास आ गए। दोनों ने हाथ धोए। कुल्ला किया। घण्टा लगे हुए अब पंद्रह मिनट हो गए। तभी एक लड़का उन दोनों गुरुजन के पास आया और बोला-सर, सारे बच्चे शोर कर रहे हैं जी।

-चल, मैं आ रहा हूं। एक गुरुजी बोले। लड़का कक्षा की तरफ जाने लगा। गुरुजन दबी आवाज़ में बातें करने लगे। एक बोला-बच्चों को मारना-पीटना मत। टाइम बहुत खराब है। पढ़ाई करवा कर तुहें कौनसे कलैक्टर बनाने हैं।

-तभी एक और लड़का आकर दूसरे गुरुजी से बोला-गुरुजी, हमारी कक्षा में सभी बच्चे शोर मचा रहे हैं जी।

-तो मैं क्या करूं?

-आपका पीरियड है जी।

-मेरा चुप करवाने का पीरियड नहीं है। चलो..कक्षा में चलो..मैं आ रहा हूं। बच्चा मायूस होकर कक्षा की तरफ जा रहा है।

-यार हैडसा’ब भी कम नहीं है...कोई पांच-चार मिनट कक्षा में नहीं पंहुचे तो बच्चे बुलाने आ जाते हैं।

-हां यार, हैडसा’ब सारे दिन ‘डांग’ ही रखते हैं। चलो, कक्षाओं में जाना तो पड़ेगा ही। और वे दोनों अपनी-अपनी कक्षाओं की तरफ जाने लगे। घण्टा लगे अब बीस मिनट हो चुके हैं।

-गुरुजी जैसे ही कक्षा के दरवाजे पर पहुंचे..बच्चों का शोर बंद। गुरुजी अब कक्षा में पधारे। बच्चे उनके समान में खड़े हुए। गुरुजी बोले-बैठ जाओ..और अपनी-अपनी किताबें निकालो। जिनके पास किताबें नहीं हैं, वे खड़े हो जाओ। सात बच्चे खड़े हो गए।

-क्यूं भई, किताबें क्यूं नहीं लाए? पढ़ना नहीं है क्या? जब सरकार फ्री में किताबें देती है, फिर लेकर क्यों नहीं आते? तुम इधर आओ..थोड़ प्रसाद ले लो। बिना किताब वाले सातों बच्चों की अच्छी तरह धुनाई करके गुरुजी हाथ झाड़ते हुए कक्षा से बाहर आ गए। कक्षा से जाते-जाते बोले-कल सब बच्चे किताबें लेकर आना..तभी पढ़ाऊंगा। समझे?

-‘हां जी।’ सब बच्चे एक साथ बोले।

-कोई भी लड़का शोर-शराबा नहीं करेगा। चुपचाप पढ़ाई करना। फिर एक लड़के की ओर इशारा करके बोले-तुम ऐसा करना.. शोर करने वाले बच्चे का नाम लिख लेना। और अब..गुरुजी विद्यालय परिसर में बिछी दरी की ओर बढ़ रहे थे।

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- दीनदयाल शर्मा, हनुमानगढ़ जं., राजस्थान

टिप्पणियाँ

  1. रवि भाई, नवा बछर के गाड़ा-गाड़ा बधई

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  2. दीनदयाल शर्मा जी का व्यंग्य गुरु जी का टाइम पास पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. आज सरकारी स्कूलों के ये ही हाल हैं. तीस चालीस हजार वेतन लेने वाले गुरु जी नहीं पढ़ाते हैं तो बड़ा दुःख होता है. शर्मा जी को ढेर सारी बधाई. रितुप्रिया जोशी, राजस्थान

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  3. कड़वा सच है "गुरूजी का टाइम पास". हमारी शुभकामनाएं. मानसी शर्मा, नेशनल पब्लिक स्कूल , हनुमानगढ़ , राज.

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  4. गुरूजी का टाइम पास.... इतना सरल और सहज व्यंग्य है कि पढ़ कर मजा आ गया. इतने वर्षों बाद इनका व्यंग्य पढने को मिला. लगभग ८६-८७ में दीनदयाल जी की एक किताब आई थी मैं उल्लू हूँ... इसके बाद १९९४ में व्यंग्य की इनकी दूसरी किताब आई ... सारी खुदाई एक तरफ ...आज फिर रचनाकार पर ये आलेख पढ़ कर मन को सुकून मिला. रचनाकार की टीम और दीनदयाल जी को बधाई. नरेश मेहन, राजस्थान.

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  5. सरकारी स्कूल पर बेबाक टिपण्णी के लिए दीनदयाल शर्मा और रचनाकार कि पूरी टीम को बधाएयाँ. सतीश गोल्यान , जसाना, नोहर, राजस्थान.

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  6. मैंने रचनाकार ब्लॉग में दीनदयाल शर्मा का व्यंग्य " गुरूजी का टाइम पास" पढ़ा. मुझे यह बहुत अच्छा लगा. यह व्यंग्य सरकारी स्कूल की सच्ची पोल खोलता है. इस व्यंग्य से सरकारी स्कूल की भीतरी व्यवस्था का पता चलता है. लोग इसीलिए अपने बच्चो को सरकारी स्कूल में पढ़ाना पसंद नहीं करते. नव वर्ष की हार्दिक बधाई.

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  7. दीनदयाल शर्मा जी का व्यंग्य " गुरूजी का टाइम पास " रचंकर में देखा पढ़ा .उनके फोन पर बताने के बावजूद मैं देरी से समय दे पाया. व्यंग्य बहुत सटीक बन पड़ा है, शिक्षक समाज को इस व्यंग्य से शिक्षा लेनी चाहिए. मैं खुद शिक्षक हूँ,,लेकिन कोई शिक्षक बच्चों के अधिकारों का हनन करता है तो पीड़ा होती है. व्यंग्यकार दीनदयाल जी व रचनाकार ब्लॉग को शुबकामनाएं. राजेंद्र कुमार डाल, वरिष्ठ शिक्षक , राजकीय माध्यमिक विद्यालय, जडावाली , हनुमानगढ़ , राजस्थान,

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