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व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन – विवेक रंजन श्रीवास्तव का व्यंग्य : घर की सरकार

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(प्रविष्टि क्रमांक - 30)

(महत्वपूर्ण सूचना : पुरस्कारों में इजाफ़ा – अब रु. 10,000/- से अधिक के पुरस्कार! प्रतियोगिता की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2009 निकट ही है. अत: अपने व्यंग्य जल्द से जल्द प्रतियोगिता के लिए भेजें. व्यंग्य हेतु नियम व अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html देखें)

देश की संसद के चुनाव हुये, सरकार बनी . हम चुनावों के खर्च से बढ़ी हुई महंगाई को सहने की शक्ति जुटा ही रहे थे कि लोकतंत्र की दुहाई देते हुये राज्य की सरकार के गठन के लिये चुनावी अधिसूचना जारी हो गई . आदर्श आचार संहिता लग गई , सरकारी कर्मचारियों की छुट्टियां कैंसिल कर दी गई . उन्हें एक बार फिर से चुनावी प्रशिक्षण दिया गया . अखबारों में पुनः नेता जी की फुल पेज रंगीन तस्वीर के विज्ञापन छपने लगे . नेता जी पुनः गली मोहल्ले में सघन जन संपर्क करते नजर आने लगे . वोट पड़े . त्रिशंकु विधान सभा चुनी गई . हार्स ट्रेडिंग , दल बदल , भीतर बाहर से समर्थन वगैरह के जुमले , कामन मिनिमम प्रोग्राम इत्यादि इत्यादि के साथ अंततोगत्वा सरकार बन ही गई . लोकतंत्र की रक्षा हुई . लोग खुश हुये . मंत्री जी प्रदेश के न होकर अपनी पार्टी और अपने विधान सभा क्षेत्र के होकर रह गये , नेता गण हाई कमान के एक इशारे पर अपना इस्तीफा हाथ में लिये गलत सही मानते मनवाते दिखे . कुर्सी से चिपके नेता अपने कुर्सी मोह को शब्दों के वाक्जाल से आदर्शों का नाम देते रहे .

साल डेढ़ साल बीता होगा कि फिर से चुनाव आ गये , इस बार नगर निगम और ग्राम पंचायतों के चुनाव होने थे . झंडे , बैनर वाले , टेंट हाउस वाले , माला और पोस्टर वाले को फिर से रोजगार मिल गया . पिछले चुनावों के बाद हार जीत के आधार पर मुख्यमंत्री जी द्वारा बदल दिया गया सरकारी अमला पुनः लोकतंत्र की रक्षा हेतु चुनाव कराने में जुट गया . इस बार एक एक वोट की कीमत ज्यादा थी , इसलिये नेता जी ने झुग्गी बस्तियों में नाच गाने के आयोजन करवाये , अब यह तो समझने की बात है कि जब हर वोट कीमती हो तो दारू वारू , कम्बल धोती जैसी छोटी मोटी चीजें उपहार स्वरूप ली दी गईं होंगी , पत्रकारों को रुपये बांटकर अखबारों में जगह बनाई गई होगी . एवरी थिंग इज फेयर इन लव वार एण्ड इलेक्शन . खैर , ये चुनाव भी सुसंपन्न हुये , क्या हुआ जो कुछ एक घटनायें मार पीट की हुई , कही छुरे चले , दो एक वारदात गोली बारी की हुईं . इतनी कीमत में जनता की जनता के द्वारा , जनता के लिये चुनी गई सरकार कुछ ज्यादा बुरी नही है .

लगातार, हर साल दो साल में होते इन चुनावों का असर मेरे घर पर भी हुआ . मेरी एक मात्र पत्नी , और बच्चों के अवचेतन मस्तिष्क में लोकतांत्रिक भावनायें संपूर्ण परिपक्वता के साथ घर कर गई . उन्हे लगने लगा कि घर में जो मेरा राष्ट्रपति शासन चल रहा है वह नितांत अलोकतांत्रिक है . मुझे अमेरिका से कंम्पेयर किया जाने लगा , जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकतांत्रिक सिद्धांतों की सबसे ज्यादा बात तो करता है पर करता वही है जो उसे करना होता है . बच्चों के सिनेमा जाने की मांग को उनकी ही पढ़ाई के भले के लिये रोकने की मेरी वीटो पावर को चैलेंज किया जाने लगा , पत्नी की मायके जाने की डिमांड बलवती हो गई . मुझे लगने लगा कि एंटी इनकंम्बेंसी फैक्टर मुझे कहीं का नही छोड़ेगा . अस्तु , एक दिन चाय पर घर की सरकार के लोकतांत्रिक स्वरूप को लेकर खुली बहस हई . महिला आरक्षण का मुद्दा गरमाया .

मैंने अपना तर्क रखते हुये भारतीय संस्कृति की दुहाई दी और बच्चों को बताया कि हमारे संस्कारों में विवाह के बाद पत्नी स्वतः ही घर की स्वामिनी होती है , मैं जो कुछ करता कहता हूं उसमे उनकी मम्मी की भी सहमति होती है . पर मेरी बातें संसद में विपक्ष के वक्तव्य की तरह अनसुनी कर दी गई . तय हुआ कि घर के सुचारु संचालन के लिये चुनाव हों . निष्पक्ष चुनावों के लिये बच्चों ने दादा जी की एक सदस्यीय समिति का गठन कर , तद्संबंधी सूचना परिवार के सभी सदस्यों को दे दी . अपने अस्तित्व की लोकतांत्रिक लड़ाई लड़ने के लिये गृह प्रतिनिधि चयन हेतु मुझे अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करनी ही पड़ी .

मुख्य प्रतिद्वंदी मेरी ही अपनी पत्नी थी , मतदान से पहले एक सप्ताह का समय , प्रचार के लिये मिला था . जिसके चलते पत्नी जी नित नये पकवान बनाकर बच्चों सहित हम सबका मन मोह लेना चाहती थी , मैंने भी कुछ लिबरल एटीट्यूड अपनाते हुये सबको फिल्म ले जाने की पेशकश की है , सरप्राइज गिफ्ट के तौर पर बच्चों के लिये नये कपड़े , पिताजी की एक छड़ी सही सलामत होते हुये भी नई मेडिको वाकिंग स्टिक और पत्नी के लिये मेकअप का ढ़ेर सा सामान ले आया हूं . इन चुनावों के चक्कर में जो बजट बिगड़ा है उसकी पूर्ति हेतु मै एक नया लोन लेने के लिये बैंक से फार्म ले आया हूं ... मतदान की तिथि अभी दूर है पर बिना मतदान हुये , केवल घर की सरकार के चुनावों के नाम पर ही घर में रंगीनियों का सुमधुर वातावरण है , और हम सब उसका लुत्फ ले रहे हैं .

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विवेक रंजन श्रीवास्तव

ओ बी ११

, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर मप्र

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