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घमंडीलाल अग्रवाल की बाल कविता

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आए जाडे भइया

रोब दिखाते

रंग जमाते

आए जाडे भइया।

थर-थर-थर-थर

कांपे काया

कठिन हो गया जीना,

घडी-घडी अब

शुरू हुआ है

गर्म पेय का पीना,

दूर जा गिरी

कट कर देखो

वर्षा की कनकइया।

ऊनी कपडे

धूम मचाएं

स्वेटर निकली तनके,

बडी देर से

आए भू पर

सूरज जी बन ठन के,

किटकिट किटकिट

दांत गिन रहे

गिनती उफ री दइया।

 

- घमंडीलाल अग्रवाल,-

785/8, अशोक विहार,-

गुडगांव- 122॰॰1, (हरि.)

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प्रस्तुति -

Deendayal sharma. Hanumangarh Jn. rajasthan.

http://www.deendayalsharma.blogspot.com

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वाह !
बहुत प्यारी कविता..........

अभिनन्दन !

घमंडीलाल अग्रवाल (राजीव) को एक ज़माने बाद फिर पढ़ा अच्छा लगा. (यदि ये वहीं है !)

बेहद सुंदर रचना

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