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व्यंग्य लेखन पुरस्कार आयोजन : गिरीश पंकज का व्यंग्य – समीक्षा फोबिया…

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(प्रविष्टि क्रमांक - 37)
(महत्वपूर्ण सूचना : पुरस्कारों में इजाफ़ा – अब रु. 10,000/- से अधिक के पुरस्कार! प्रतियोगिता की अंतिम तिथि 31 दिसम्बर 2009 निकट ही है. अत: अपने व्यंग्य जल्द से जल्द प्रतियोगिता के लिए भेजें. व्यंग्य हेतु नियम व अधिक जानकारी के लिए यहाँ http://rachanakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_18.html देखें)
नया लेखक इन दिनों हिंदी साहित्य के समीक्षकों बनाम आलोचकों से खाँटी नाराज चल रहा है।
वह इतना भयंकर टाईप से नाराज है कि अगर उसे पता चल जाए कि  सामने कोई समीक्षक खड़ा है, तो उसका टेंटुआ ही दबा दे। पिछले दिनों उसने एक समीक्षक द्वारा लिखी समीक्षा को आग के हवाले करने के बाद कसम खा ली है कि '' अब समीक्षाएँ पढऩा बंद''।

लोगबाग़  कहने लगे है कि - ''बेचारे किस्मत के मारे को 'समीक्षा-फोबिया' हो गया है. इसका इलाज़ दिल्ली में ही हो सकता है''.

किस्साकोताह यह है, कि पिछले दिनों नये-नवेले लेखक ने किसी पत्रिका में एक ही समीक्षक द्वारा लिखित दो पुस्तकों की समीक्षाएँ पढ़ लीं। समीक्षक के बारे में कभी नये लेखक ने सुन रखा था कि वह  'मॉडर्न' किस्म का है। मोहल्ले के एक लेखक संघ के होनहार प्रचार सचिव ने उसे एक दिन ज्ञान भी दिया था, ''यही समीक्षक सच्चा है, नंवर वन है। शिष्टभाषा में लोग इसे आलोचक भी कहते हैं। यह शख्स जिस किसी भी पर हाथ रख देता है, वह धन्य हो जाता है। एक तरह का 'आइएसआइ मार्का' है। जिस लेखक पर इसका ठप्पा लग जाता है, वह लेखक धड़ाधड़..धडा़धड़ बिकने लगता है। प्रामाणिक माल की तरह।''
''पुस्तक कितनी महान है, इसका निर्धारण तो पाठक कर सकता है?''  नये लेखक ने चकराते हुए पूछा, 'समीक्षक को इसकी ठेकेदारी क्यों दे दी जाती है?''

''तुम अभी बच्चे हो। साहित्य की बातों को समझने में कच्चे हो। अभी वक्त लगेगा।''  लेखक संघ के सचिव ने पहले तो ऊबड़-खाबड़ किस्म कि हंसी उगली, फिर बीड़ी सुड़कते हुए कहा,  'तुम तो फिलहाल गोष्ठियों में चाय-पानी का इंतज़ाम करते रहो। धीरे-धीरे सब कुछ जान जाओगे।''

नये लेखक ने मजे के साथ समीक्षक की दोनों समीक्षाएँ पढ़ीं। समीक्षक ने अपने जादुई शब्दों में एक पुस्तक की बड़ी तारीफ की थी। कृति को प्रयोगधर्मी, क्रांतिकारी और न जाने क्या-क्या बता दिया था। एक साथ नागार्जुन, मुक्तिबोध, निराला, अज्ञेय से जोड़ दिया था लेखक को। नये लेखक ने इसी समीक्षक की दूसरी समीक्षा पढ़ी, जिसमें उसने किताब को जी भर कर कोसा था और छोटी-सी टिप्पणी के साथ लेखक को निपटा दिया था। नये लेखक ने सोचा कि दोनों किताबें  खरीद कर देखते हैं। पता तो चले कि एक अच्छी, तो दूसरी बुरी क्यों है। इन किताबों को जरूर पढऩा चाहिए, तभी वह कुछ नया सीख सकेगा।
वह दौड़ा-दौड़ा बाज़ार गया और दोनों किताबें खरीद लाया। लेकिन लेखक का दुर्भाग्य था, कि उसके लिए पुस्तकें खरीदना घाटे का सौदा हो गया। और यही से नया लेखक 'टेनशाना'  गया.
समीक्षक ने जिस किताब के बारे में लिखा था, कि वह क्रांतिकारी है, कमाल की है। वह किताब तो फटा हुआ रूमाल निकली। उसमें ऐसा कुछ नहीं था जिससे वह क्रांतिकारी साबित होती। वहाँ तो कदम-कदम पर भ्रांति ही भ्रांति थी। किताब की भाषा ने उसे निराशा से भर दिया। किताब का कथानक उसे भयानक लगा। उसका सिर-पैर ही नहीं था। लेखक कहना क्या चाहता है, यह तो समझ में आए। नये लेखक ने दूसरी किताब पढ़ी। जिसे समीक्षक ने यूँ ही निपटा दिया था, वह किताब तो बड़ी उत्कृष्ट निकली।

नया लेखक गुस्से में बड़बड़ाया-'यह कैसी उल्टी-सीधी समीक्षा है? क्या यह समीक्षक अब तक इसी गोत्र की समीक्षाएँ करता रहा है?''
नया लेखक भयानक गुस्से में उबल रहा था। जैसा कि शुरू में कहा जा चुका है, कि उस दिन अगर सचमुच उसे लेखक, प्रकाशक, समीक्षक और गलत-सलत समीक्षा छापने वाला संपादक भी मिल जाता, तो वह उन सबको गोलियों से उड़ा देता। लेकिन लेखक गाँधीगीरी वाला था। शाकाहारी किस्म का जीव। उसने ऐसा नहीं किया। मगर नासपीटे गुस्से का क्या करता। आखिरकार उसने रास्ता निकाल ही लिया। उसने अपनी खिलौना रिवाल्वर निकाली और एक-एक करके चार हवाई फायर कर दिए:
लेखक : ठाँय...
प्रकाशक : ठाँय...
समीक्षक : ठाँय..।
संपादक : ठाँय.

हवाई फायर करने के बाद नया लेखक का चेहरा कुछ तनाव मुक्त हुआ। वह बुदबुदाया- 'मैंने चारों का काम तमाम कर दिया'।
मरने वालों की अंत्येष्टि भी तो की जाती है। इसलिए उसने चारों के नाम की अलग-अलग पर्चियाँ बनार्इं और गीता के श्लोकों का उच्चारण करते हुए उन्हें आग के हवाले कर दिया।

वह दिन और आज का दिन, नया लेखक समीक्षाएं पढ़ते हुए डरता है। समीक्षा के चक्कर में घनचक्कर बनना ठीक नहीं। किसी दूसरे समीक्षक के बारे में लाख समझाओ, कि बड़ा भला है, निष्पक्ष है, लेकिन नया लेखक मानता ही नहीं। कहता है, कि '' लगता है कि ई सारे समीक्षक जौन है तौन एक ही थैली के 'चट्टे-बट्टे'  हैं। ससुर के नाती फर्जी समीक्षाएँ करते हैं। किताब कुछ और समीक्षा कुछ?''

अब नये लेखक को घाघ लेखक कैसे समझाए, कि बेचारा समीक्षक भी मनुष्य होता है। वह भी कुछ पाने की आशा में रिश्तेदारी निभाने लगता है। खेलों की तरह अब साहित्य में भी  'फिक्सिंग' होने लगी है। यानी साहित्य भी अब एक तरह का खेल हो गया है। गुट तो बन ही जाते है न...
नये लेखक को बीड़ीफूँकू साहित्यकार समझाता है-'' हे मूढ़ बालक, निराला के दौर का साहित्यिक माहौल अब नहीं रहा। अब तो बड़ा आदमी होने का मतलब ही है कि वह अच्छा लेखक भी होगा। देखो, मैंने एक दोहा लिखा है, कि
'पद, पैसा और हुस्न स्वयं ही काव्य है।
कोई कवि हो जाए सहज संभाव्य है''।


कविनुमा आदमी अगर मंत्री या बड़ा अफसर बन जाए, तो जिसे देखो वही उसकी कविताएँ गाने लगता है। जैसे ही वह मंत्री भूतपूर्व होता है, तो सब कुछ भूत हो जाता है। आजकल का यही फंडा है।''
नया लेखक मुसकराते हुए सुझाव देता है- ''क्यों न हर प्रकाशित समीक्षा के अंत में साफ-साफ ये पाद टिप्पणी दी जाए, कि '' इस समीक्षा से संपादकीय सहमति अनिवार्य नहीं है। पाठक अपने विवेक से राय बना लें। समीक्षा पढ़ कर पुस्तक खरीदने के बाद पत्रिका को जिम्मेदार न ठहराया जाए''।
बीड़ीफूँक साहित्यकार को खाँसी आ जाती है। वह पतली गली से निकल लेता है।

बहरहाल, समीक्षा की ठगी चालू आहे। इधर लेखक, प्रकाशक और पालकी ढोनेवाले समीक्षक मालामाल, उधर पाठक हलाल। नये लेखक ने फिलहाल पहली कसम खाई है, कि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाली समीक्षाए बिल्कुल नहीं पढ़ेगा। वह पाठकों के पत्र पढ़ लेगा, चड्डी--बनियान वाले या फिर और किसी विज्ञापन के मैटर पढ़ लेगा, ऊलजलूल किस्म की कविताएँ भी वह झेल लेगा, लेकिन समीक्षा...? नक्को बाबा।
पिछले दिनों एक लड़की ने नये लेखक की ओर देखा और मुसकराते हुए कहा,  'माइ नेम इज आलोचना'.
'' ऐ...?'' इतना सुनना था कि लेखक के मुंह से निकला-''अईययियो...करुँ मै क्या, सूकू सूकू..?'' लेखक के पसीने छूटने लगे। दरअसल नये लेखक को एक तरह का समीक्षा-फोबिया हो गया है। बेचारा... गँवार। जब कभी कहीं कोई समीक्षा देखता है, तो बेचारा घबरा जाता है।

फिर किसी समीक्षक ने ठग लिया तो..?
फिर उसके रुपये पानी में चले गए तो..?
फिर हवाई फायर की नौबत आ गई तो..?
---
गिरीश पंकज, संपादक, " सद्भावना दर्पण", सदस्य, " साहित्य अकादमी", नई दिल्ली. जी-३१,  नया पंचशील नगर, रायपुर. छत्तीसगढ़. ४९२००१ मोबाइल : ०९४२५२ १२७२०
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गिरीश पंकज का व्यंग्य "समीक्षा फोबिया" रोचक लगा. वास्तव में आज किसी भी किताब की सही समीक्षा नहीं होती. क्या करे पाठक? संबंधों के चक्कर में हलके स्तर की किताब को अच्छी कह दिया जाता है और बेचारा विश्वास के कारण पाठक मारा जाता है. दीनदयाल शर्मा. हनुमानगढ़ जं., राजस्थान,
http://www.deendayalsharma.blogspot.com, http://www.tabartoli.blogspot.com

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